सात बेटों वाली मां और सबसे छोटे बेटे की कहानी की शुरुआत
पौराणिक कथा के अनुसार एक गांव में एक वृद्ध महिला रहती थी, जिसके सात पुत्र थे। छह पुत्र मेहनती और कमाने वाले थे, जबकि सबसे छोटा पुत्र बेरोजगार और निकम्मा था। मां हमेशा छह बेटों का जूठा भोजन सातवें पुत्र को दे देती थी। यह देखकर पत्नी ने पति को सच्चाई दिखाने की सलाह दी।
एक दिन त्योहार पर घर में विशेष भोजन बना। छोटे बेटे ने छुपकर देखा कि मां सभी बेटों को प्रेम से भोजन करा रही है, लेकिन अंत में जूठा बचाकर उसी को देती है। यह देखकर वह दुखी होकर परदेश चला जाता है।
परदेश में संघर्ष और सफलता
परदेश में वह एक साहूकार के यहां नौकरी करने लगता है। अपनी मेहनत, ईमानदारी और समझदारी से वह कुछ ही समय में व्यापारी का भरोसेमंद बन जाता है और धीरे-धीरे एक बड़ा सेठ बन जाता है। भाग्य उसके साथ बदलने लगता है।
पत्नी का संघर्ष और संतोषी माता का व्रत
दूसरी ओर उसकी पत्नी घर में अत्याचार सहती रहती है। एक दिन जंगल में उसे कुछ महिलाएं संतोषी माता का व्रत करती दिखती हैं। वे उसे व्रत की विधि बताती हैं कि श्रद्धा से गुड़-चना लेकर शुक्रवार का व्रत करने से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।
पत्नी श्रद्धा से व्रत शुरू करती है और संतोषी माता से अपने पति की वापसी की प्रार्थना करती है।
माता की कृपा से बदल गया भाग्य
संतोषी माता उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर उसके पति को स्वप्न में मार्गदर्शन देती हैं। धीरे-धीरे उसका व्यापार बढ़ता है और वह अपने गांव लौट आता है। दोनों पति-पत्नी का पुनर्मिलन होता है और घर में सुख-समृद्धि आ जाती है।
व्रत भंग और माता का कोप
कथा में आगे बताया गया है कि पत्नी जब व्रत का उद्यापन करती है तो कुछ बच्चों की शरारत के कारण खटाई खिलाई जाती है, जिससे व्रत भंग हो जाता है और कष्ट वापस आ जाते हैं। बाद में वह फिर से माता से क्षमा मांगती है और विधिपूर्वक व्रत पूरा करती है।
अंत में सुख-समृद्धि की प्राप्ति
संतोषी माता उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर उसे एक सुंदर पुत्र का आशीर्वाद देती हैं। घर में सुख, शांति और समृद्धि लौट आती है।
