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  • टीएमसी संकट के बीच शत्रुघ्न सिन्हा की चुप्पी चर्चा में, बंगाल की सियासत में बढ़े नए कयास..

    टीएमसी संकट के बीच शत्रुघ्न सिन्हा की चुप्पी चर्चा में, बंगाल की सियासत में बढ़े नए कयास..

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों तृणमूल कांग्रेस के भीतर उभर रहे मतभेदों और सांसदों के रुख को लेकर चर्चाओं का दौर जारी है। इसी बीच पार्टी सांसद शत्रुघ्न सिन्हा की चुप्पी राजनीतिक गलियारों में विशेष चर्चा का विषय बन गई है। जहां विभिन्न नेताओं की ओर से लगातार बयान सामने आ रहे हैं, वहीं अनुभवी नेता और अभिनेता से राजनेता बने शत्रुघ्न सिन्हा ने अब तक किसी भी पक्ष में सार्वजनिक रूप से कोई स्पष्ट टिप्पणी नहीं की है। उनकी यही खामोशी राजनीतिक विश्लेषकों और पर्यवेक्षकों का ध्यान अपनी ओर खींच रही है।

    तृणमूल कांग्रेस के भीतर कथित असंतोष और सांसदों के अलग-अलग रुख की चर्चाओं के बीच कई नेताओं ने खुलकर अपनी स्थिति स्पष्ट की है। इसके विपरीत शत्रुघ्न सिन्हा ने न तो किसी संभावित बागी समूह के समर्थन में कोई बयान दिया है और न ही सार्वजनिक रूप से पार्टी नेतृत्व के पक्ष में कोई विशेष प्रतिक्रिया व्यक्त की है। इस कारण राजनीतिक हलकों में उनके अगले कदम को लेकर विभिन्न तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शत्रुघ्न सिन्हा का लंबा राजनीतिक अनुभव उन्हें जल्दबाजी में कोई निर्णय लेने से रोक सकता है। राष्ट्रीय राजनीति में कई दशक सक्रिय रहने और विभिन्न राजनीतिक परिस्थितियों का अनुभव रखने वाले सिन्हा अक्सर महत्वपूर्ण मुद्दों पर सोच-समझकर प्रतिक्रिया देने के लिए जाने जाते हैं। ऐसे में मौजूदा घटनाक्रम पर उनकी चुप्पी को कुछ लोग रणनीतिक प्रतीक्षा की स्थिति के रूप में देख रहे हैं।

    शत्रुघ्न सिन्हा ने वर्ष 2022 में तृणमूल कांग्रेस का दामन थामा था। इसके बाद उन्हें आसनसोल लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में उतारा गया, जहां उन्होंने जीत दर्ज की। बाद में आम चुनाव में भी उन्होंने अपनी सीट बरकरार रखी। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में उनकी सक्रिय भूमिका को स्थापित करने में पार्टी नेतृत्व की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यही कारण है कि उनके रुख को लेकर राजनीतिक हलकों में विशेष रुचि बनी हुई है।

    विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि किसी भी बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के दौरान वरिष्ठ नेता अक्सर तत्काल प्रतिक्रिया देने के बजाय परिस्थितियों का आकलन करना पसंद करते हैं। शत्रुघ्न सिन्हा का नाम उन नेताओं में शामिल रहा है जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न दलों के नेताओं के साथ लंबे समय तक काम किया है। उनके राजनीतिक संबंध और अनुभव उन्हें परिस्थितियों को गहराई से समझने का अवसर देते हैं।

    राजनीतिक चर्चाओं में यह भी कहा जा रहा है कि बंगाल की मौजूदा परिस्थितियों पर राष्ट्रीय दलों की भी नजर बनी हुई है। ऐसे माहौल में किसी भी वरिष्ठ नेता का सार्वजनिक रुख महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत माना जा सकता है। हालांकि अभी तक शत्रुघ्न सिन्हा की ओर से कोई आधिकारिक टिप्पणी सामने नहीं आई है, इसलिए उनके बारे में लगाए जा रहे अधिकांश अनुमान केवल राजनीतिक चर्चाओं तक ही सीमित हैं।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच पार्टी के कुछ सांसद नेतृत्व के समर्थन में खुलकर सामने आए हैं, जबकि कुछ अन्य नेताओं ने सार्वजनिक रूप से अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं की है। इसी श्रेणी में शत्रुघ्न सिन्हा का नाम भी लिया जा रहा है। फिलहाल उनकी चुप्पी को लेकर कई तरह के राजनीतिक अर्थ निकाले जा रहे हैं, लेकिन वास्तविक स्थिति तभी स्पष्ट होगी जब वह स्वयं इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया देंगे।

    बंगाल की राजनीति में आने वाले दिनों में घटनाक्रम किस दिशा में आगे बढ़ता है, इस पर सभी की नजर बनी हुई है। ऐसे समय में शत्रुघ्न सिन्हा जैसे वरिष्ठ नेता का रुख न केवल पार्टी के भीतर बल्कि व्यापक राजनीतिक परिदृश्य में भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है। फिलहाल उनकी खामोशी ही सबसे अधिक चर्चा का विषय बनी हुई है।

  • "जमीन पर काम करने वालों को सीख न दें", महुआ पर काकोली घोष का तीखा हमला

    "जमीन पर काम करने वालों को सीख न दें", महुआ पर काकोली घोष का तीखा हमला


    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में चल रही अंदरूनी कलह अब सार्वजनिक रूप से सामने आने लगी है। पार्टी की बागी सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने वरिष्ठ सांसद महुआ मोइत्रा पर सीधा हमला बोलते हुए उन्हें राजनीति से ज्यादा प्रचार में रुचि रखने वाली नेता बताया है। उनके बयान ने टीएमसी के भीतर बढ़ते मतभेदों और नेतृत्व को लेकर उठ रहे सवालों को और तेज कर दिया है।

    एक समाचार चैनल से बातचीत के दौरान काकोली घोष ने कहा कि जब ममता बनर्जी ने राजनीति में अपनी पहचान बनानी शुरू की थी, तब आज खुद को उनका करीबी बताने वाले कई चेहरे राजनीतिक परिदृश्य में मौजूद भी नहीं थे। उन्होंने बिना नाम लिए महुआ मोइत्रा पर निशाना साधते हुए कहा कि विदेश में बैठकर ट्वीट करने वाले लोग वास्तविक राजनीति नहीं करते, बल्कि केवल मीडिया का ध्यान आकर्षित करने और अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए बयानबाजी करते हैं।

    काकोली घोष की यह प्रतिक्रिया उस समय सामने आई है जब हाल ही में महुआ मोइत्रा ने पार्टी के बागी सांसदों को “लालची”, “मतलबी” और “गद्दार” करार दिया था। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच जुबानी जंग और तेज हो गई है। घोष ने कहा कि कुछ नेता लगातार ऐसे बयान देते हैं, जिनसे मीडिया में उनकी चर्चा बनी रहे, लेकिन इससे पार्टी संगठन को नुकसान पहुंचता है।

    इस बीच बागी खेमे ने दावा किया है कि उसके साथ करीब 20 सांसदों का समर्थन मौजूद है। काकोली घोष ने स्वयं को भी इस गुट का हिस्सा बताया है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि बागी सांसदों ने हाल के दिनों में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के साथ भी बैठकें की हैं, जिससे टीएमसी नेतृत्व की चिंताएं बढ़ गई हैं।

    उधर, पार्टी के राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय के इस्तीफे ने भी टीएमसी में असंतोष की खबरों को बल दिया है। बताया जा रहा है कि रॉय कई सांसदों के साथ केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता भूपेंद्र यादव के आवास पर पहुंचे थे, जहां महत्वपूर्ण राजनीतिक चर्चा हुई। इस बैठक में तृणमूल कांग्रेस के कई लोकसभा सांसदों की मौजूदगी की खबरें सामने आई हैं।

    दिल्ली में चल रहे इस राजनीतिक घटनाक्रम के समानांतर पश्चिम बंगाल में भी पार्टी के भीतर उथल-पुथल जारी है। रिपोर्टों के अनुसार, विधानसभा चुनाव के बाद कई विधायक पार्टी नेतृत्व से नाराज बताए जा रहे हैं। बागी गुट का दावा है कि बड़ी संख्या में विधायकों ने पार्टी की आधिकारिक लाइन से अलग रुख अपनाया है और संगठनात्मक बदलाव की मांग कर रहे हैं।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि टीएमसी के भीतर यह असंतोष और बढ़ता है, तो इसका असर आगामी राजनीतिक रणनीतियों और विपक्षी गठबंधन की एकजुटता पर भी पड़ सकता है। फिलहाल ममता बनर्जी विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने की कोशिशों में जुटी हैं, लेकिन पार्टी के भीतर उठ रहे विरोध के स्वर उनके लिए नई चुनौती बनते दिखाई दे रहे हैं।

  • बंगाल में TMC के भीतर बढ़ी हलचल! सांसदों की दिल्ली बैठक से तेज हुई अटकलें, ममता के सामने नई चुनौती?

    बंगाल में TMC के भीतर बढ़ी हलचल! सांसदों की दिल्ली बैठक से तेज हुई अटकलें, ममता के सामने नई चुनौती?


    कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों हलचल तेज है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के कुछ सांसदों की दिल्ली में भाजपा नेता भूपेंद्र यादव के आवास पर हुई मुलाकात ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। हालांकि पार्टी की ओर से इसे सामान्य शिष्टाचार भेंट बताया गया, लेकिन घटनाक्रम को लेकर कई तरह के राजनीतिक कयास लगाए जा रहे हैं।

    इस बैठक में राज्यसभा सदस्य पद से इस्तीफा दे चुके सुखेंदु शेखर रॉय की मौजूदगी सबसे ज्यादा चर्चा का विषय रही। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हाल के दिनों में पार्टी के भीतर उभर रहे असंतोष के संकेत अब खुलकर सामने आने लगे हैं।

    दिल्ली में जुटे कई सांसद
    दिल्ली में हुई इस मुलाकात में TMC के सांसद जगदीश बसुनिया, प्रसून बनर्जी, शर्मिला सरकार, अरूप चक्रवर्ती और कालीपदा सोरेन समेत कई नेता शामिल बताए गए। वहीं शाम को सांसद शताब्दी रॉय के आवास पर भी एक बैठक हुई, जिसमें विभिन्न राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा की खबरें सामने आईं। इसी बीच TMC सांसद काकोली घोष ने दावा किया कि प्रदेश के विकास से जुड़े मुद्दों पर केंद्र सरकार के साथ मिलकर काम करने की आवश्यकता है और इसी उद्देश्य से संवाद किया जा रहा है।

    इस्तीफे के बाद सुखेंदु शेखर रॉय के आरोप
    राज्यसभा सदस्य पद से इस्तीफा देने के बाद सुखेंदु शेखर रॉय ने पार्टी नेतृत्व पर कई गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने संगठन में भ्रष्टाचार, महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चिंता और आंतरिक लोकतंत्र की कमी जैसे मुद्दों का जिक्र किया था। उनके बयान को पार्टी के अंदरूनी असंतोष का संकेत माना गया।

    कई महीनों से चल रही है नाराजगी की चर्चा
    राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, TMC के भीतर पिछले कुछ समय से असंतोष की चर्चा लगातार होती रही है। हालांकि पार्टी नेतृत्व की ओर से ऐसे दावों को खारिज किया जाता रहा है, लेकिन हालिया घटनाक्रम ने इन चर्चाओं को फिर हवा दे दी है। हाल के दिनों में पार्टी की बैठकों में कई नेताओं की अनुपस्थिति भी चर्चा का विषय बनी रही है। इससे संगठन के भीतर चल रही गतिविधियों को लेकर राजनीतिक अटकलें और तेज हो गई हैं।

    ऋतब्रत बंद्योपाध्याय की भूमिका पर नजर
    विपक्ष के नेता ऋतब्रत बंद्योपाध्याय का नाम भी इस पूरे घटनाक्रम में प्रमुखता से सामने आ रहा है। उन्होंने दावा किया है कि TMC के कई नेता उनके संपर्क में हैं और पार्टी के भीतर चल रही हलचलों को लेकर लगातार संवाद जारी है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन विपक्ष इसे राज्य की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत के रूप में पेश कर रहा है।

    फिरहाद हाकिम की मुलाकात ने बढ़ाई चर्चा
    मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के करीबी सहयोगी माने जाने वाले फिरहाद हाकिम की विपक्षी नेताओं से हुई मुलाकात ने भी राजनीतिक हलकों में चर्चा को और तेज कर दिया है। इसे लेकर अलग-अलग राजनीतिक अर्थ निकाले जा रहे हैं। कुछ इसे संवाद की कोशिश मान रहे हैं तो कुछ इसे पार्टी के भीतर की स्थिति को समझने की कवायद बता रहे हैं।

    ममता बनर्जी की चुप्पी भी बनी चर्चा का विषय
    दिल्ली दौरे के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मीडिया से अपेक्षाकृत दूरी बनाए रखी। आमतौर पर राष्ट्रीय राजनीति और केंद्र सरकार के मुद्दों पर मुखर रहने वाली ममता की इस बार की चुप्पी को भी राजनीतिक विश्लेषक अलग-अलग नजरिए से देख रहे हैं।

    आगे क्या?
    फिलहाल पश्चिम बंगाल की राजनीति में स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, लेकिन हालिया घटनाक्रम ने यह संकेत जरूर दिया है कि TMC के भीतर कुछ महत्वपूर्ण राजनीतिक गतिविधियां चल रही हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी नेतृत्व इन चुनौतियों से कैसे निपटता है और क्या संगठन में किसी बड़े बदलाव की स्थिति बनती है।

    राजनीतिक पर्यवेक्षकों की नजर अब TMC के अगले कदम और संभावित रणनीति पर टिकी हुई है, क्योंकि बंगाल की राजनीति में होने वाला हर बदलाव राज्य के भविष्य की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

  • चुनाव चिह्न विवाद के बीच TMC का सख्त संदेश, ममता बनर्जी पर सांसद का बड़ा बयान

    चुनाव चिह्न विवाद के बीच TMC का सख्त संदेश, ममता बनर्जी पर सांसद का बड़ा बयान



    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रहा सत्ता संघर्ष चर्चा का विषय बना हुआ है। पार्टी से निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी खेमे को विधानसभा अध्यक्ष द्वारा मुख्य विपक्षी दल की मान्यता दिए जाने के बाद TMC नेतृत्व और बागी गुट के बीच टकराव और तेज हो गया है। इसी बीच TMC सांसद Mahua Moitra ने बागी विधायकों पर जमकर हमला बोला है।

    एक इंटरव्यू में महुआ मोइत्रा ने कहा कि जिन नेताओं ने वर्षों तक Mamata Banerjee की लोकप्रियता और पार्टी के संगठनात्मक बल का लाभ उठाया, वही आज पार्टी को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने बागी नेताओं को निशाने पर लेते हुए कहा कि सत्ता में रहने की आदत पड़ चुकी है, इसलिए वे विपक्ष में संघर्ष करने के बजाय आसान रास्ता चुन रहे हैं। महुआ ने दो टूक कहा कि यदि किसी नेता को पार्टी छोड़नी है तो वह खुलकर जाए, लेकिन खुद को तृणमूल कांग्रेस बताने का अधिकार नहीं है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि बागी नेता चाहें तो अपनी अलग पार्टी बना लें, लेकिन TMC के नाम और पहचान का इस्तेमाल न करें।

    भाजपा पर गंभीर आरो
    महुआ मोइत्रा ने इस पूरे घटनाक्रम के पीछे भारतीय जनता पार्टी की भूमिका होने का आरोप भी लगाया। उनका कहना है कि भाजपा योजनाबद्ध तरीके से TMC को तोड़ने की कोशिश कर रही है। उन्होंने पश्चिम बंगाल के नेता Suvendu Adhikari का नाम लेते हुए कहा कि वे कभी तृणमूल का हिस्सा रहे हैं और पार्टी के नेताओं की राजनीतिक कमजोरियों से भली-भांति परिचित हैं। इसी जानकारी का इस्तेमाल कर भाजपा नेताओं पर दबाव बनाया जा रहा है।

    महुआ ने दावा किया कि कुछ नेताओं को केंद्रीय एजेंसियों और कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर पक्ष बदलने के लिए मजबूर किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ विधायकों और नेताओं को गिरफ्तारी की धमकियां दी गईं, जिसके चलते वे बागी खेमे के साथ चले गए।

    “असली TMC ममता के साथ”
    बागी गुट के बढ़ते प्रभाव और चुनाव चिह्न पर संभावित विवाद के सवाल पर महुआ मोइत्रा ने स्पष्ट कहा कि असली तृणमूल कांग्रेस आज भी ममता बनर्जी और उनके साथ खड़े नेताओं के पास ही है। उन्होंने कहा कि पार्टी का मूल संगठन, विचारधारा और जनाधार ममता बनर्जी के नेतृत्व में कायम है।

    महुआ ने यह भी कहा कि यदि कभी ऐसी स्थिति आती है कि पार्टी को अपना मौजूदा चुनाव चिह्न छोड़ना पड़े, तब भी उन्हें कोई चिंता नहीं है। उन्होंने याद दिलाया कि जब ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर नई राजनीतिक राह चुनी थी, तब उन्होंने अपनी पहचान और चुनावी प्रतीक खुद तैयार किया था।

    नया सिंबल बनाकर भी जीत सकती हैं ममता
    महुआ मोइत्रा ने विश्वास जताया कि ममता बनर्जी का राजनीतिक कद किसी चुनाव चिह्न का मोहताज नहीं है। उन्होंने कहा कि जिस नेता ने नया दल बनाकर और नया प्रतीक लेकर पश्चिम बंगाल में तीन बार सरकार बनाई, वह भविष्य में भी नया चुनावी चिह्न बनाकर जनता का समर्थन हासिल कर सकती हैं।

    उनके अनुसार, चुनाव चिह्न या पार्टी का नाम बदल सकता है, लेकिन जनता के बीच ममता बनर्जी की पहचान और राजनीतिक प्रभाव को कोई नहीं छीन सकता।

  • TMC के विद्रोह में मुस्लिम MLA भी पीछे नहीं…. मुर्शिदाबाद के 9 में से 8 ने छोड़ा ममता का साथ

    TMC के विद्रोह में मुस्लिम MLA भी पीछे नहीं…. मुर्शिदाबाद के 9 में से 8 ने छोड़ा ममता का साथ


    कोलकाता।
    तृणमूल कांग्रेस (Trinamool Congress) में हुए विद्रोह में टीएमसी (TMC) के अल्पसंख्यक विधायक (Minority MLA) भी पीछे नहीं हैं. इन विधायकों ने ममता बनर्जी (Mamata Banerjee .) की बजाय ऋतब्रत बनर्जी (Ritabrata Banerjee) के साथ जाना ज्यादा बेहतर समझा है. मुर्शिदाबाद में TMC के जो 9 विधायक जीते थे उनमें से 8 ने ममता का साथ छोड़ दिया है और ऋतब्रत बनर्जी का दामन थाम लिया है।

    इस सूची में तृणमूल कांग्रेस के लंबे समय से विश्वसनीय और वरिष्ठ नेता जावेद खान के साथ-साथ काजल शेख जैसे प्रभावशाली नेता भी शामिल हैं। बागी गुट के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने इन मुस्लिम विधायकों को बगावत का भरपूर इनाम दिया है. बागियों में शामिल जावेद खान को विधानसभा में विपक्ष का उपनेता बनाया गया है. वहीं दूसरी ओर अखुरुज्जमां को चीफ व्हिप बनाया गया है।


    तृणमूल की ‘टूट’ बीजेपी के लिए बंगाल से ज्यादा दिल्ली में फायदेमंद

    एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले मंत्रिमंडल के चार अल्पसंख्यक मंत्री भी आंदोलनकारी विधायकों के इस समूह में शामिल हैं. ये विधायक हैं- जावेद खान, सबीना यास्मीन, गुलाम रब्बानी और अखरूजमां।

    तृणमूल के आंदोलनकारी खेमे के जिन अल्पसंख्यक विधायकों के नाम अब तक सामने आए हैं, वे इस प्रकार हैं – जावेद खान, अखरूजमां, काजल शेख, गुलाम रब्बानी, डॉ. मोशर्रफ हुसैन, इमानी बिस्वास, नियामत शेख, रेयात हुसैन, गुलशन मल्लिक, तौसीफुर रहमान, मुस्तफिजुर रहमान, बहारुल इस्लाम।

    लेकिन कुल आंकड़ा कही ज्यादा है. रिपोर्ट के अनुसार तृणमूल के टिकट पर चुनाव जीतने वाले 34 मुस्लिम विधायकों में से 17 बागी खेमे में शामिल हो गए हैं।

    सबसे खास बात यह है कि मुर्शिदाबाद के 9 अल्पसंख्यक विधायकों में से 8 ऋतब्रत बनर्जी के खेमे में शामिल हो गए हैं. अखरुजमां कहते हैं, ‘मुर्शिदाबाद जिले के 9 विधायकों में से 8 ने हमारा समर्थन किया है. हमने पार्टी के बहुमत के साथ खड़े रहने का फैसला किया है.’ केवल नव निर्वाचित विधायक और शिक्षाविद बाबर अली (जलंगी विधायक) ने ही पार्टी नेता ममता बनर्जी के नेतृत्व पर भरोसा जताया है।

    रघुनाथगंज के विधायक अख्रुज्जमां को इस ‘विद्रोह’ के सूत्रधारों में से एक माना जा रहा है. अखरूजमां ने 2018 में कांग्रेस छोड़ दी थी और तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए थे, तब शुभेंदु अधिकारी मुर्शिदाबाद जिले में तृणमूल कांग्रेस के पर्यवेक्षक थे. इस बार वे ऋतब्रता के साथ आए हैं. जिले के दूसरे विधायकों शमशेरगंज के नूर आलम, सुती विधायक इमानी बिस्वास, लालगोला के अब्दुल अजीज, भगवानगोला के रियात हुसैन सरकार और हरिहरपारा के नियामत शेख तथा भरतपुर के विधायकों मुस्तफिजुर रहमान।

    आंकड़ों के अनुसार 2021 के विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस ने मुर्शिदाबाद जिले की 22 सीटों में से 20 सीटें जीती थीं. तृणमूल कांग्रेस के सुनहरे दिनों में जब अभिषेक बनर्जी या ममता बनर्जी कोलकाता में बैठक बुलाते थे तो मुर्शिदाबाद जिले से बुलाए गए सभी विधायक लगभग एक दिन पहले ही कोलकाता में होटल बुक कर लेते थे, ताकि वे समय पर बैठक में पहुंच सकें और पीछे की पंक्ति में न बैठना पड़े. लेकिन इस विधानसभा चुनाव के बाद स्थिति बदल गई है।

    पिछले रविवार को पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के घर पर हुई तृणमूल कांग्रेस विधायक दल की बैठक में ये विधायक नजर नहीं आए. 2011 से ही मुस्लिम बड़ी संख्या में तृणमूल को वोट देते आ रहे हैं. ममता बनर्जी को लगता था कि मुस्लिम उनके स्थायी वोट बैंक रहेंगे. लेकिन इस चुनाव में पूरी तस्वीर बदल गई है।

  • पश्चिम बंगालः टूट की कगार पर ममता बनर्जी की पार्टी TMC…. अलग गुट बनाने चले 60 MLAs

    पश्चिम बंगालः टूट की कगार पर ममता बनर्जी की पार्टी TMC…. अलग गुट बनाने चले 60 MLAs


    कोलकाता।
    ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस (Trinamool Congress) टूट की कगार पर है। अटकलें हैं कि पार्टी के दो फाड़ हो सकते हैं और करीब 60 विधायक ऋतब्रत बनर्जी (Ritabrata Banerjee) को समर्थन देने की तैयारी कर रहे हैं। हालांकि, इसे लेकर आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा गया है। संभावनाएं हैं कि बुधवार को विधायक एकजुट होकर पश्चिम बंगाल विधानसभा स्पीकर को समर्थन पत्र सौंप सकते हैं। अगर ऐसा होता है, तो पार्टी 60 और 20 के गुट में बंट जाएगी और ममता बनर्जी गुट से विपक्ष का दर्ज भी छिन जाएगा।

    कथित नए गुट के सदस्यों ने 80 में से 60 टीएमसी विधायकों का समर्थन हासिल कर लिया है। एक नेता ने अखबार से कहा, ‘मान्यता पाने के लिए हमारा पत्र तैयार है, क्योंकि असली टीएमसी तैयार है। हम बुधवार को बंगाल विधानसभा स्पीकर रतींद्रनाथ बोस को पत्र सौंप देंगे।’ कहा जा रहा है कि ये सभी विधायक ऋतब्रत बनर्जी की उम्मीदवारी को समर्थन दे रहे हैं।


    पश्चिम बंगाल के मंत्री ने बढ़ाई चर्चा

    पश्चिम बंगाल के मंत्री तापस रॉय ने मंगलवार को दावा किया कि तृणमूल कांग्रेस में महाराष्ट्र जैसी टूट होने के संकेत दिखाई दे रहे हैं।रॉय ने दावा किया कि तृणमूल ने कई ऐसे लोगों को शामिल किया, जिनका राजनीति से ज्यादा सरोकार नहीं था। उन्होंने दावा किया कि अब पार्टी के अंदरूनी मतभेद और अंतर्विरोध सतह पर दिखाई देने लगे हैं।


    ऋतब्रत बनर्जी विधायकों से मिले

    विधानसभा परिसर से बाहर आने के बाद पत्रकारों से बातचीत में ऋतब्रत बनर्जी ने स्वीकार किया कि उनकी मुलाकात विधायक हॉस्टल में कुछ विधायकों से हुई और उनके साथ मुरमुरा खाया था। बनर्जी ने कहा कि वह ‘एक-एक दिन के हिसाब से आगे बढ़ने’ में विश्वास रखते हैं। उन्होंने 50 से ज्यादा विधायकों के उनके साथ आने की अटकलों पर कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

    उन्होंने दावा किया कि शोभनदेब चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता निर्वाचित करने संबंधी कोई औपचारिक प्रस्ताव पारित नहीं हुआ था। बनर्जी के अनुसार, जिस कागज पर उनके हस्ताक्षर लिए गए थे, वह महज उपस्थिति दर्ज करने के लिए था। टीएमसी ने ऋतब्रत समेत दो विधायकों को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित कर दिया था।


    विरोध प्रदर्शन में नहीं पहुंचे सांसद और विधायक

    ममता बनर्जी ने विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की हार के बाद मंगलवार को पहली बड़ी राजनीतिक लामबंदी की, लेकिन एस्प्लेनेड के वाई-चैनल पर आयोजित धरना कार्यक्रम में कम भीड़ और कई सांसदों-विधायकों की अनुपस्थिति चर्चा का विषय रही। बनर्जी के विरोध प्रदर्शन के लिए वाई-चैनल के बस अड्डे के करीब एक धरना मंच तैयार किया गया था।

    यहां चंद्रिमा भट्टाचार्य, शोभनदेब चट्टोपाध्याय, डेरेक ओ’ब्रायन, फिरहाद हकीम और अन्य वरिष्ठ नेता बनर्जी के साथ मौजूद रहे, लेकिन बड़ी संख्या में सांसदों और विधायकों की गैरमौजूदगी ने पार्टी के भीतर असंतोष की अटकलों को और बल दिया।

  • बंगाल: TMC में सब कुछ ठीक नहीं…. टूट की अटकलें तेज…. 50 MLA छोड़ सकते हैं पार्टी !

    बंगाल: TMC में सब कुछ ठीक नहीं…. टूट की अटकलें तेज…. 50 MLA छोड़ सकते हैं पार्टी !


    कोलकाता।
    तृणमूल कांग्रेस (Trinamool Congress- TMC ) में सब ठीक नहीं चल रहा है। पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) ने सोमवार को ही दो विधायकों को निष्कासित कर दिया है। यह घटनाक्रम ऐसे समय पर हुआ, जब पार्षदों लगातार पद छोड़ रहे हैं। वहीं, टीएमसी के कार्यक्रमों से बड़े नेता दूरी बनाते नजर आ रहे हैं। अब अटकलें ये भी हैं कि टीएमसी के 50 विधायक (50 MLAs) टूट सकते हैं। हालांकि, इसे लेकर आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा गया है।

    संघवाद प्रतिदिन की रिपोर्ट के अनुसार, अटकलें हैं कि 50 विधायक तृणमूल कांग्रेस छोड़ सकते हैं और पार्टी टूट सकती है। विधायकों के निष्कासन के बाद टीएमसी के बाद विधानसभा में सदस्यों की संख्या 78 पर आ गई है। चर्चाएं हैं कि रिताब्रता बनर्जी और संदीपन साहा के जरिए नई तृणमूल बनाई जा सकती है। हालांकि, इसे लेकर किसी भी नेता ने सार्वजनिक रूप से अब तक कुछ नहीं कहा है।


    महाराष्ट्र जैसा होगा हाल

    अगर टीएमसी के 50 विधायक अलग होकर दूसरा धड़ बनाते हैं तो बंगाल में महाराष्ट्र की राजनीति का रीकैप देखने को मिल सकता है। उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली शिवसेना से जब एकनाथ शिंदे (अब उप मुख्यमंत्री) विधायकों के साथ अलग हुए थे, तो ठाकरे ने शिवसेना का नाम और चिह्न गंवा दिए थे। ऐसा ही दिग्गज नेता शरद पवार की अगुवाई वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ हुआ था।


    क्यों 2 विधायकों पर हुआ ऐक्शन

    दोनों विधायकों को भेजे गए पत्र में कहा गया है, ‘अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के संज्ञान में सक्षम प्राधिकारी के माध्यम से यह बात लाई गई है कि तृणमूल की तरफ से नामित उम्मीदवार के रूप में निर्वाचित होने के बावजूद आप पार्टी के अधिकृत नेतृत्व द्वारा बुलाई गई बैठकों में शामिल होने में बार-बार विफल रहे हैं और आपने खुद को पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल किया है।’

    पार्टी उपाध्यक्ष चंद्रिमा भट्टाचार्य द्वारा हस्ताक्षरित पत्र में कहा गया है, ‘यह भी पाया गया है कि आप ऐसी गतिविधियों में शामिल रहे हैं और आपने ऐसे बयान दिए हैं, जो तृणमूल कांग्रेस के हितों के प्रतिकूल हैं।’ पत्र में कहा गया है कि मामले पर समुचित विचार-विमर्श के बाद ‘तृणमूल कांग्रेस के सक्षम प्राधिकारी ने आपको पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से तत्काल प्रभाव से निष्कासित करने का फैसला किया है।’


    शुभेंदु अधिकारी ने किया 2 विधायकों का जिक्र

    मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने दो टीएमसी विधायकों का जिक्र किया था। इनमें हावड़ा के उलुबेरिया पूर्व सीट जीतने वाले रीताब्रत बनर्जी और मध्य कोलकाता के एंटाली से विधायक संदीपन साहा थे। उन्होंने कहा था कि इनकी तरफ से दर्ज कराई गई शिकायतों के आधार पर ही विधानसभा सचिवालय ने शोभनदेब चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता घोषित करने के लिए तृणमूल विधायक दल के जाली हस्ताक्षर का मामला हरे स्ट्रीट पुलिस थाने में दर्ज कराया था।

    मुख्यमंत्री ने कहा, ‘यह जांच भाजपा द्वारा शुरू नहीं की गई थी। यह तृणमूल कांग्रेस के दो विधायकों द्वारा 27 मई को विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष दर्ज कराई गई शिकायत के बाद की कार्रवाई थी। विधायकों ने आरोप लगाया था कि छह मई को हुई उनकी पार्टी की बैठक में विपक्ष के नेता के चयन के संबंध में कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया गया था। उन्होंने शिकायत की थी कि 70 विधायकों द्वारा हस्ताक्षरित उनकी पार्टी का समर्थन पत्र फर्जी और मनगढंत है, जिसमें से 14 हस्ताक्षर बड़े अक्षरों में किए गए हैं।’

  • बंगाल चुनाव में बड़ा उलटफेर: बूथ-स्तरीय डेटा से खुलासा, टीएमसी के कई दिग्गज अपने ही क्षेत्रों में कमजोर साबित

    बंगाल चुनाव में बड़ा उलटफेर: बूथ-स्तरीय डेटा से खुलासा, टीएमसी के कई दिग्गज अपने ही क्षेत्रों में कमजोर साबित

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति में बूथ-स्तरीय आंकड़ों ने एक बार फिर चुनावी समीकरणों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। तृणमूल कांग्रेस के प्रमुख नेताओं के प्रदर्शन से जुड़े डेटा में सामने आया है कि कई बड़े नेता अपने ही क्षेत्रों में अपेक्षित समर्थन हासिल करने में असफल रहे। यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है जब राज्य की राजनीति में सत्ता और विपक्ष के बीच तीखी प्रतिस्पर्धा बनी हुई है और हर चुनावी आंकड़ा राजनीतिक विश्लेषण का महत्वपूर्ण आधार बनता जा रहा है।

    बूथ स्तर के विस्तृत आंकड़ों के अनुसार, कई वरिष्ठ टीएमसी नेताओं ने अपनी सीटें जीतने के बावजूद अधिकांश मतदान केंद्रों पर अपेक्षित वोट शेयर हासिल नहीं किया। रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि कुछ नेताओं को अपने ही घरेलू पोलिंग बूथों पर भी कमजोर प्रदर्शन का सामना करना पड़ा, जिससे उनकी राजनीतिक पकड़ को लेकर सवाल उठने लगे हैं। हालांकि कुछ नेता मजबूत समर्थन के साथ विजयी भी रहे, लेकिन समग्र तस्वीर मिश्रित परिणामों को दर्शाती है।

    विश्लेषण में यह भी देखा गया कि कई सीटों पर जीत-हार का अंतर केवल कुछ बूथों के प्रदर्शन पर निर्भर रहा। कुछ क्षेत्रों में उम्मीदवारों ने सीमित बूथों पर ही मजबूत प्रदर्शन किया, जबकि अन्य स्थानों पर वे अपेक्षाकृत कमजोर रहे। इसके बावजूद, कुल वोटों के संतुलन ने कई नेताओं को जीत दिलाई, जिससे यह स्पष्ट होता है कि चुनावी परिणाम केवल बूथ स्तर की संख्या पर निर्भर नहीं करते, बल्कि व्यापक वोट वितरण का भी बड़ा प्रभाव होता है।

    राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि इस तरह के बूथ डेटा से यह समझने में मदद मिलती है कि किसी पार्टी की जमीनी पकड़ कितनी मजबूत है। पश्चिम बंगाल जैसे राजनीतिक रूप से सक्रिय राज्य में बूथ स्तर का प्रदर्शन अक्सर भविष्य की रणनीति तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यही कारण है कि पार्टियां अब इन आंकड़ों का गहराई से विश्लेषण कर अपनी रणनीतियों को पुनर्गठित करने में लगी हुई हैं।

    हालांकि, चुनावी परिणाम यह भी दिखाते हैं कि कई सीटों पर स्थानीय मुद्दों, उम्मीदवारों की छवि और क्षेत्रीय समीकरणों ने अंतिम नतीजों को प्रभावित किया। कुछ वरिष्ठ नेताओं ने सीमित बूथों पर मजबूत प्रदर्शन के बावजूद सीट जीत ली, जबकि कुछ अन्य अपेक्षाकृत अधिक बूथों पर बढ़त के बावजूद हार गए। यह स्थिति बताती है कि चुनावी राजनीति में मतदाता व्यवहार काफी जटिल और बहुआयामी होता है।

    राज्य की राजनीति में यह डेटा आने वाले समय में रणनीतिक बदलावों का संकेत माना जा रहा है। पार्टियां अब बूथ स्तर पर संगठनात्मक मजबूती और स्थानीय संपर्क को और अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में काम कर सकती हैं। फिलहाल यह बूथ-स्तरीय विश्लेषण राजनीतिक चर्चाओं का केंद्र बना हुआ है और इसके आधार पर भविष्य की चुनावी रणनीतियों में बदलाव की संभावना भी जताई जा रही है।

  • फालता उपचुनाव में बदले राजनीतिक समीकरण, BJP जीत के बेहद करीब, TMC को बड़ा झटका

    फालता उपचुनाव में बदले राजनीतिक समीकरण, BJP जीत के बेहद करीब, TMC को बड़ा झटका


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की फालता विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव की मतगणना ने राज्य की राजनीति में नया संदेश देने का काम किया है। शुरुआती रुझानों से लेकर लगातार सामने आ रहे आंकड़ों तक भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह बड़ी बढ़त बनाई, उसने चुनावी तस्वीर लगभग साफ कर दी है। भाजपा उम्मीदवार ने एक लाख से अधिक वोटों की बढ़त हासिल कर जीत की ओर मजबूत कदम बढ़ा दिए हैं। दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार जहांगीर खान, जो कुछ समय पहले तक चर्चा के केंद्र में थे, चुनावी मुकाबले में चौथे स्थान पर पहुंचते दिखाई दे रहे हैं।

    फालता सीट पर हुए पुनर्मतदान के बाद यह मुकाबला पहले से ही राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा था। मतदान से ठीक पहले तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवार जहांगीर खान द्वारा चुनाव से पीछे हटने की घोषणा ने पूरे चुनावी समीकरण को बदल दिया था। हालांकि तकनीकी रूप से उनका नाम और चुनाव चिन्ह मतपत्र प्रक्रिया में मौजूद रहा, लेकिन उनके इस फैसले ने राजनीतिक माहौल को पूरी तरह प्रभावित किया। इसका असर मतगणना के दौरान भी साफ दिखाई दिया, जहां अपेक्षा से बिल्कुल अलग तस्वीर सामने आती नजर आई।

    मतगणना के कई चरण पूरे होने के बाद भाजपा उम्मीदवार ने लगातार अपनी बढ़त मजबूत रखी। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार उन्हें भारी संख्या में मतदाताओं का समर्थन मिलता दिखाई दिया। वहीं दूसरे स्थान के लिए भी मुकाबला बना रहा, लेकिन तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार उम्मीद के अनुसार प्रदर्शन नहीं कर सके। चुनावी विश्लेषकों का मानना है कि इस उपचुनाव में परिस्थितियों ने सामान्य राजनीतिक समीकरणों को बदल दिया और इसका सीधा लाभ भाजपा को मिला।

    फालता विधानसभा सीट दक्षिण 24 परगना जिले के अंतर्गत आती है और राज्य की महत्वपूर्ण राजनीतिक सीटों में गिनी जाती है। वर्षों तक यह क्षेत्र अलग-अलग राजनीतिक दलों के प्रभाव का केंद्र रहा है। पहले इसे वामपंथी राजनीति का मजबूत गढ़ माना जाता था, लेकिन बाद के वर्षों में तृणमूल कांग्रेस ने यहां अपनी पकड़ मजबूत की और लगातार चुनावी सफलता हासिल की। हालांकि इस बार के चुनावी रुझान नए बदलाव की ओर संकेत करते दिखाई दे रहे हैं।

    राजनीतिक जानकारों की नजर अब अंतिम परिणामों पर टिकी हुई है, लेकिन मौजूदा स्थिति ने इतना स्पष्ट कर दिया है कि फालता का यह चुनाव सिर्फ एक सीट का मुकाबला नहीं रहा। इसने बंगाल की बदलती राजनीतिक दिशा और मतदाताओं के बदलते रुझानों पर भी नई बहस शुरू कर दी है। अगर अंतिम नतीजों में यही रुझान कायम रहता है तो यह भाजपा के लिए एक बड़ी राजनीतिक उपलब्धि और तृणमूल कांग्रेस के लिए गंभीर आत्ममंथन का विषय बन सकता है।

  • TMC सांसद सायनी घोष ने अभिषेक बनर्जी से जुड़े दावों को नकारा, कानूनी कार्रवाई की चेतावनी

    TMC सांसद सायनी घोष ने अभिषेक बनर्जी से जुड़े दावों को नकारा, कानूनी कार्रवाई की चेतावनी


    नई दिल्ली ।
    कोलकाता की राजनीति एक बार फिर संपत्ति विवाद और आरोप-प्रत्यारोप के नए दौर में पहुंच गई है। इस बार चर्चा के केंद्र में तृणमूल कांग्रेस की सांसद सायनी घोष हैं, जिन्होंने अपने ऊपर और पार्टी के महासचिव अभिषेक बनर्जी से कथित तौर पर जुड़ी संपत्तियों को लेकर लगाए गए आरोपों को सख्ती से खारिज कर दिया है। उन्होंने इन दावों को पूरी तरह निराधार और फर्जी बताते हुए कहा है कि कुछ लोग जानबूझकर गलत सूचनाएं फैलाकर राजनीतिक छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं।

    यह विवाद तब और गहरा गया जब कोलकाता नगर निगम द्वारा कुछ संपत्तियों की जांच शुरू किए जाने की जानकारी सामने आई। यह जांच ऐसे समय में शुरू हुई है जब राजनीतिक हलकों में पहले से ही विभिन्न आरोपों को लेकर तनाव बना हुआ है। आरोपों में यह दावा किया जा रहा था कि कुछ संपत्तियों का संबंध अभिषेक बनर्जी और उनके करीबी लोगों से हो सकता है। हालांकि, इन दावों को लेकर अब तक कोई ठोस आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है।

    सायनी घोष ने इन आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इस तरह की बातें न केवल गलत हैं बल्कि पूरी तरह से राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि किसी भी तरह की अफवाह या झूठी खबर को फैलाने वालों के खिलाफ कानूनी कदम उठाया जाएगा। उनके अनुसार, यह प्रयास केवल उनकी और उनकी पार्टी की छवि को खराब करने के लिए किया जा रहा है, जबकि वास्तविकता में इन दावों का कोई आधार नहीं है।

    इस पूरे मामले में राजनीतिक माहौल और अधिक गर्म हो गया है क्योंकि विपक्षी दलों की ओर से पहले ही कई सवाल उठाए जा चुके हैं। मुख्यमंत्री से जुड़े राजनीतिक विरोधियों ने इन संपत्ति मामलों को लेकर पारदर्शिता की मांग की है और जांच को आगे बढ़ाने की बात कही है। दूसरी ओर, सत्तारूढ़ दल का कहना है कि यह सभी आरोप केवल राजनीतिक लाभ लेने के लिए फैलाए जा रहे हैं और इनका उद्देश्य जनता को भ्रमित करना है।

    सायनी घोष ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि हाल के दिनों में उन्हें व्यक्तिगत रूप से भी निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि एक दिन पहले ही उन्हें जान से मारने की धमकी मिलने की घटना सामने आई थी और अब उनके खिलाफ झूठी खबरों का सहारा लेकर बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने इसे एक सुनियोजित अभियान बताया, जिसका मकसद उनकी आवाज को दबाना है।

    इस पूरे घटनाक्रम ने कोलकाता की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है, जहां एक ओर जांच और आरोपों की प्रक्रिया चल रही है, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। ऐसे में यह मामला केवल संपत्ति विवाद तक सीमित न रहकर राजनीतिक टकराव का एक बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है।

    फिलहाल स्थिति यह है कि जांच की प्रक्रिया जारी है, लेकिन किसी भी पक्ष की ओर से आधिकारिक तौर पर ठोस सबूत प्रस्तुत नहीं किए गए हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में यह मामला और अधिक राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो सकता है, जिससे राज्य की राजनीति में नई हलचल देखने को मिल सकती है।