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  • ममता बनर्जी के लिए राहत या नई चुनौती? बागी सांसदों के विवाद पर 19 जून को ओम बिरला से मिलेंगे अभिषेक बनर्जी

    ममता बनर्जी के लिए राहत या नई चुनौती? बागी सांसदों के विवाद पर 19 जून को ओम बिरला से मिलेंगे अभिषेक बनर्जी

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रही उथल-पुथल के बीच एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। पार्टी में बढ़ती असहमति और बागी सांसदों के अलग रुख के बीच लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी को 19 जून को बैठक के लिए आमंत्रित किया है। इस मुलाकात को पार्टी के भीतर जारी संकट और उसके संभावित राजनीतिक प्रभावों के संदर्भ में बेहद अहम माना जा रहा है।

    हाल के दिनों में तृणमूल कांग्रेस के कई सांसदों द्वारा पार्टी नेतृत्व के खिलाफ असंतोष जताए जाने के बाद राजनीतिक माहौल गरमा गया है। कुछ सांसदों ने अलग राजनीतिक रास्ता अपनाने का संकेत देते हुए एक अन्य क्षेत्रीय दल के साथ जुड़ने की घोषणा की थी। इस घटनाक्रम ने न केवल पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ाई है, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी नई चर्चाओं को जन्म दिया है।

    लोकसभा अध्यक्ष द्वारा अभिषेक बनर्जी को बुलाए जाने के पीछे मुख्य उद्देश्य पूरे मामले पर उनका पक्ष जानना और संसदीय स्थिति को स्पष्ट करना माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बैठक के बाद बागी सांसदों की स्थिति, संसदीय मान्यता और दलगत अधिकारों से जुड़े कई प्रश्नों पर तस्वीर साफ हो सकती है। यही कारण है कि राजनीतिक दलों और पर्यवेक्षकों की नजरें अब इस मुलाकात पर टिकी हुई हैं।

    तृणमूल कांग्रेस लंबे समय से पश्चिम बंगाल की प्रमुख राजनीतिक शक्ति रही है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में पार्टी को कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। संगठन के भीतर नेतृत्व शैली, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और राजनीतिक रणनीति को लेकर समय-समय पर मतभेद सामने आते रहे हैं। हालिया घटनाक्रम ने इन चर्चाओं को और तेज कर दिया है।

    राजनीतिक जानकारों का कहना है कि किसी भी बड़े दल में असहमति होना असामान्य नहीं है, लेकिन जब निर्वाचित जनप्रतिनिधि सार्वजनिक रूप से अलग रुख अपनाने लगें तो उसका असर संगठनात्मक एकता पर पड़ता है। तृणमूल कांग्रेस के मामले में भी यही स्थिति दिखाई दे रही है। ऐसे समय में पार्टी नेतृत्व के लिए संगठन को एकजुट बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।

    इस पूरे घटनाक्रम का असर आगामी राजनीतिक समीकरणों पर भी पड़ सकता है। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव भले अभी कुछ समय दूर हों, लेकिन राजनीतिक दल पहले से ही अपनी रणनीतियों को मजबूत करने में जुटे हुए हैं। ऐसे में किसी भी बड़े दल के भीतर अस्थिरता विपक्षी दलों को राजनीतिक अवसर प्रदान कर सकती है।

    दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस के समर्थक और नेता यह दावा कर रहे हैं कि पार्टी संगठन मजबूत है और किसी भी तरह की चुनौती का सामना करने में सक्षम है। उनका कहना है कि नेतृत्व लगातार संवाद के जरिए स्थिति को संभालने का प्रयास कर रहा है और जल्द ही सभी विवादों का समाधान निकल सकता है।

    अब राजनीतिक हलकों में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या 19 जून की बैठक के बाद स्थिति सामान्य होगी या फिर पार्टी के भीतर जारी मतभेद और अधिक स्पष्ट रूप से सामने आएंगे। फिलहाल सभी की निगाहें इस अहम मुलाकात और उसके बाद होने वाले राजनीतिक घटनाक्रमों पर टिकी हुई हैं।

  • TMC सांसदों का NCPI में विलय: राजनीतिक मास्टरस्ट्रोक या कानूनी जोखिम?

    TMC सांसदों का NCPI में विलय: राजनीतिक मास्टरस्ट्रोक या कानूनी जोखिम?


    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की सियासत में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली All India Trinamool Congress को बड़ा झटका देते हुए उसके 20 बागी सांसदों ने खुद को Nationalist Citizens Party of India में विलय करने का दावा किया है। लोकसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपने और संसद में अलग बैठने की मांग के साथ इस घटनाक्रम ने राष्ट्रीय राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। हालांकि राजनीतिक तौर पर यह कदम बागी सांसदों के लिए सुरक्षित दिखाई देता है, लेकिन संवैधानिक विशेषज्ञ इसे इतना आसान नहीं मान रहे हैं।

    दल-बदल विरोधी कानून के तहत किसी सांसद या विधायक को अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में शामिल होने पर सदस्यता गंवानी पड़ सकती है। इसी खतरे से बचने के लिए बागी सांसदों ने ‘विलय’ का रास्ता चुना है। उनके पास कुल 28 में से 20 सांसदों का समर्थन है, जो दो-तिहाई की कानूनी शर्त पूरी करता है। लेकिन असली विवाद यहीं से शुरू होता है।

    क्या केवल सांसदों का समूह किसी दूसरी पार्टी में विलय कर सकता है?
    संविधान विशेषज्ञों और संसद के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य का कहना है कि दल-बदल कानून के तहत केवल सांसदों या विधायकों का समूह किसी दूसरी पार्टी में शामिल हो जाए, तो उसे विलय नहीं माना जा सकता। कानून के अनुसार मूल राजनीतिक दल का भी दूसरी पार्टी में विलय होना जरूरी है। उनका तर्क है कि दसवीं अनुसूची के पैरा-4 में स्पष्ट रूप से राजनीतिक दल के विलय की बात कही गई है, न कि केवल संसदीय दल के। ऐसे में सांसदों का यह कदम कानूनी चुनौती का सामना कर सकता है।

    सुप्रीम कोर्ट के फैसले क्यों बन सकते हैं परेशानी?
    इस पूरे मामले में कई महत्वपूर्ण न्यायिक फैसलों का उल्लेख किया जा रहा है। वर्ष 2023 में हुए Shiv Sena Political Crisis से जुड़े फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि ‘मूल राजनीतिक दल’ और ‘विधायक या सांसद दल’ अलग-अलग इकाइयाँ हैं। अदालत ने कहा था कि किसी पार्टी के निर्वाचित प्रतिनिधि खुद को संगठन का मालिक नहीं मान सकते। पार्टी के आधिकारिक फैसलों का अधिकार मूल संगठन और उसके नेतृत्व के पास ही रहता है। यही सिद्धांत अब TMC के पक्ष को मजबूत करता दिखाई दे रहा है।

    ममता खेमे की कानूनी तैयारी शुरू
    TMC नेतृत्व ने बागी सांसदों के कदम को चुनौती देने की तैयारी शुरू कर दी है। पार्टी की ओर से लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर किसी अलग गुट को मान्यता नहीं देने की मांग की गई है। साथ ही, पश्चिम बंगाल में बागी विधायकों को मिली मान्यता के खिलाफ अदालत का दरवाजा भी खटखटाया गया है। पार्टी का कहना है कि संगठन स्तर पर किसी प्रकार का विलय नहीं हुआ है, इसलिए सांसदों का दावा संवैधानिक रूप से टिकाऊ नहीं है।

    NCPI को अचानक मिला राष्ट्रीय महत्व
    त्रिपुरा में पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त Nationalist Citizens Party of India अब अचानक राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में आ गई है। 2023 में गठित यह छोटी पार्टी अब बागी सांसदों के कारण संसद में उल्लेखनीय उपस्थिति का दावा कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम कानूनी सुरक्षा हासिल करने की रणनीति हो सकती है, लेकिन अंतिम फैसला अदालतों और लोकसभा अध्यक्ष की व्याख्या पर निर्भर करेगा।

    आगे क्या होगा?
    अब सबकी निगाहें लोकसभा अध्यक्ष और न्यायपालिका पर टिकी हैं। यदि बागी सांसदों का ‘विलय’ कानूनी रूप से मान्य माना जाता है तो यह दल-बदल कानून की नई व्याख्या का रास्ता खोल सकता है। लेकिन यदि अदालतों ने इसे केवल ‘दल-बदल’ माना, तो सांसदों की सदस्यता पर संकट गहरा सकता है। फिलहाल यह मामला भारतीय राजनीति में दल-बदल कानून की प्रभावशीलता, उसकी खामियों और भविष्य में संभावित संशोधनों को लेकर नई बहस छेड़ चुका है।

  • टीएमसी संकट से विपक्षी राजनीति में हलचल, क्षेत्रीय दलों के भविष्य पर उठे सवाल, कांग्रेस फिर बनी संभावित केंद्रबिंदु

    टीएमसी संकट से विपक्षी राजनीति में हलचल, क्षेत्रीय दलों के भविष्य पर उठे सवाल, कांग्रेस फिर बनी संभावित केंद्रबिंदु

    नई दिल्ली । देश की विपक्षी राजनीति इन दिनों एक महत्वपूर्ण संक्रमण काल से गुजरती दिखाई दे रही है। कई क्षेत्रीय दलों के भीतर उभर रहे असंतोष, नेतृत्व संबंधी चुनौतियों और संभावित राजनीतिक पुनर्संरचना की चर्चाओं ने राष्ट्रीय राजनीति को नई दिशा देने की संभावना पैदा कर दी है। विशेष रूप से पश्चिम बंगाल की राजनीति में सामने आए हालिया घटनाक्रमों के बाद विपक्षी खेमे में नए समीकरणों को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि क्षेत्रीय दलों ने पिछले तीन दशकों में भारतीय राजनीति की दिशा और दशा को गहराई से प्रभावित किया है। उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और अन्य राज्यों में इन दलों ने न केवल कांग्रेस के पारंपरिक आधार को चुनौती दी, बल्कि कई स्थानों पर उसकी जगह भी ले ली। यही कारण रहा कि राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस का प्रभाव धीरे-धीरे सीमित होता गया और क्षेत्रीय नेतृत्व मजबूत होकर उभरा।

    हालांकि हाल के वर्षों में कई क्षेत्रीय दलों के सामने संगठनात्मक चुनौतियां बढ़ती दिखाई दी हैं। कुछ दलों में नेतृत्व को लेकर मतभेद सामने आए, तो कुछ जगहों पर वरिष्ठ नेताओं और जनप्रतिनिधियों के अलग रास्ता अपनाने की खबरें सुर्खियों में रहीं। इन परिस्थितियों ने क्षेत्रीय राजनीति की स्थिरता और भविष्य को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

    पश्चिम बंगाल में उभरे राजनीतिक संकट ने इस बहस को और तेज कर दिया है। राजनीतिक गलियारों में ऐसी चर्चाएं हैं कि यदि क्षेत्रीय दलों के सामने अस्तित्व का संकट गहराता है तो वे व्यापक विपक्षी एकजुटता की दिशा में अधिक गंभीरता से कदम बढ़ा सकते हैं। इसी संदर्भ में कांग्रेस की भूमिका पर भी चर्चा बढ़ी है, क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर वह अभी भी सबसे बड़ा विपक्षी राजनीतिक संगठन मानी जाती है।

    विपक्षी गठबंधन की राजनीति में कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के रिश्ते हमेशा सरल नहीं रहे हैं। कई राज्यों में सीट बंटवारे, नेतृत्व और रणनीति को लेकर मतभेद सार्वजनिक रूप से सामने आते रहे हैं। इसके बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर सत्तारूढ़ गठबंधन के मुकाबले एक मजबूत राजनीतिक विकल्प खड़ा करने के लिए इन दलों को साथ काम करना पड़ा है। यही व्यावहारिक राजनीति आज भी विपक्षी दलों को सहयोग की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रही है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान परिस्थितियां कांग्रेस के लिए राजनीतिक अवसर भी लेकर आई हैं। जिन राज्यों में क्षेत्रीय दलों का प्रभाव लंबे समय तक कांग्रेस के विस्तार में बाधा बना रहा, वहां अब नए समीकरण बनने की संभावना पर चर्चा हो रही है। कांग्रेस नेतृत्व भी लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि व्यापक विपक्षी एकता राष्ट्रीय राजनीति की आवश्यकता है और इसके लिए सभी दलों को व्यक्तिगत तथा क्षेत्रीय हितों से ऊपर उठकर सोचना होगा।

    दूसरी ओर क्षेत्रीय दलों के सामने भी चुनौती कम नहीं है। उन्हें अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाए रखने के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी भूमिका निभाने के बीच संतुलन स्थापित करना होगा। यही कारण है कि विपक्षी राजनीति के भीतर सहयोग और प्रतिस्पर्धा दोनों समानांतर रूप से दिखाई दे रहे हैं।

    आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विपक्षी दल किस प्रकार अपनी रणनीति तय करते हैं। यदि क्षेत्रीय दल और कांग्रेस साझा राजनीतिक मंच को मजबूत करने में सफल रहते हैं तो राष्ट्रीय राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हो सकता है। वहीं यदि संगठनात्मक चुनौतियां और आंतरिक मतभेद बढ़ते हैं तो विपक्षी खेमे के सामने नई कठिनाइयां भी खड़ी हो सकती हैं। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि बदलते राजनीतिक घटनाक्रमों ने विपक्षी राजनीति को एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है।

  • ‘वंदे मातरम’ और सरकारी योजनाओं पर मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का बड़ा बयान, लाभार्थियों की पात्रता पर उठाए सवाल

    ‘वंदे मातरम’ और सरकारी योजनाओं पर मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का बड़ा बयान, लाभार्थियों की पात्रता पर उठाए सवाल

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम में आयोजित एक जनकल्याण कार्यक्रम के दौरान कई महत्वपूर्ण राजनीतिक और प्रशासनिक मुद्दों पर अपनी सरकार का पक्ष रखते हुए विपक्ष पर तीखे आरोप लगाए। अपने संबोधन में उन्होंने राष्ट्रभक्ति, सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता, सीमा सुरक्षा, सामाजिक कल्याण योजनाओं में कथित अनियमितताओं तथा सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं में सुधार जैसे विषयों को प्रमुखता से उठाया। उनके बयान के बाद राज्य की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है।

    कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने ‘वंदे मातरम’ और राष्ट्रगान के मुद्दे का उल्लेख करते हुए कहा कि राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान देश के प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि कुछ लोगों को ‘वंदे मातरम’ बोलने या राष्ट्रगान के प्रति सम्मान व्यक्त करने में आपत्ति है, तो सरकारी योजनाओं के लाभ को लेकर भी चर्चा होना स्वाभाविक है। उन्होंने कहा कि सरकार लाभार्थियों की पात्रता और प्रक्रियाओं को अधिक व्यवस्थित बनाने के लिए आवश्यक दस्तावेजी व्यवस्थाओं पर काम कर रही है।

    मुख्यमंत्री ने अपने भाषण में सीमा सुरक्षा और जनसंख्या संबंधी विषयों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में केंद्र और राज्य स्तर पर निगरानी को मजबूत किया जा रहा है। उनके अनुसार सरकारी योजनाओं का लाभ केवल वास्तविक और पात्र नागरिकों तक पहुंचे, यह सुनिश्चित करना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है। उन्होंने यह भी कहा कि अवैध रूप से आने वाले लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने से रोकने के लिए विभिन्न स्तरों पर जांच और सत्यापन की प्रक्रिया को मजबूत किया जा रहा है।

    अपने संबोधन में शुभेंदु अधिकारी ने पूर्ववर्ती प्रशासन पर सरकारी धन के दुरुपयोग का आरोप भी लगाया। उन्होंने दावा किया कि विभिन्न सामाजिक कल्याण योजनाओं में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहां वास्तविक पात्रता की जांच किए बिना लाभ वितरित किया गया। मुख्यमंत्री के अनुसार कुछ क्षेत्रों में ऐसे लाभार्थियों की पहचान हुई है, जिन्हें नियमों के अनुरूप सहायता नहीं मिलनी चाहिए थी। उन्होंने कहा कि सरकार ऐसे मामलों की समीक्षा कर रही है और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं।

    उन्होंने छात्रवृत्ति वितरण और अन्य कल्याणकारी योजनाओं से जुड़े कथित फर्जी खातों का भी जिक्र किया। मुख्यमंत्री का कहना था कि लाभार्थी डेटा के सत्यापन के दौरान कई संदिग्ध प्रविष्टियां सामने आई हैं, जिनकी जांच जारी है। उनका दावा है कि सरकारी संसाधनों का उपयोग केवल वास्तविक जरूरतमंद लोगों तक सीमित रखने के लिए प्रशासनिक स्तर पर व्यापक सुधार किए जा रहे हैं।

    रोजगार और ग्रामीण विकास के मुद्दे पर भी मुख्यमंत्री ने महत्वपूर्ण घोषणा की। उन्होंने कहा कि रोजगार उपलब्ध कराने के लिए राज्य सरकार नए विकल्पों पर काम कर रही है और कार्यदिवसों को बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं। इसके लिए बजटीय प्रावधान भी सुनिश्चित किए गए हैं ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों का विस्तार किया जा सके।

    सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता को लेकर भी मुख्यमंत्री ने नई व्यवस्था का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भविष्य में अभ्यर्थियों को परीक्षा से संबंधित दस्तावेजों तक अधिक पहुंच दी जाएगी। उनका मानना है कि इससे भर्ती प्रक्रिया पर विश्वास बढ़ेगा और किसी भी प्रकार की अनियमितता की आशंका कम होगी। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक सुधारों का उद्देश्य केवल व्यवस्था को पारदर्शी बनाना ही नहीं, बल्कि युवाओं के विश्वास को मजबूत करना भी है।

    मुख्यमंत्री के इन बयानों के बाद राज्य की राजनीति में बहस तेज होने की संभावना है। आने वाले दिनों में विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया और सरकार द्वारा उठाए जाने वाले कदम इस मुद्दे को और अधिक चर्चा में ला सकते हैं।

  • TMC में बड़ा सियासी संकट, 19 सांसद अलग गुट बनाने की तैयारी में, NDA के साथ जाने के संकेत

    TMC में बड़ा सियासी संकट, 19 सांसद अलग गुट बनाने की तैयारी में, NDA के साथ जाने के संकेत


    कोलकाता। पश्चिम बंगाल में हालिया राजनीतिक घटनाक्रम के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर अंदरूनी कलह अब संसद तक पहुंचती नजर आ रही है। पार्टी के 28 लोकसभा सांसदों में से 19 सांसदों के एक अलग गुट बनाने के दावे ने राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है। यह बागी समूह सोमवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर अलग गुट के रूप में मान्यता देने की मांग कर सकता है और साथ ही सदन में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के साथ बैठने की अनुमति भी चाहता है।

    सूत्रों और बागी गुट के नेताओं के अनुसार, सांसद खुद को “असली टीएमसी” के रूप में मान्यता देने की मांग करेंगे। इस समूह की ओर से वरिष्ठ सांसद काकोली घोष दस्तीदार को नेता और शताब्दी रॉय को उपनेता के रूप में प्रस्तावित किए जाने की बात भी सामने आई है। साथ ही यह भी दावा किया जा रहा है कि उनके पास 19 सांसदों का समर्थन है और अन्य सांसदों के लिए भी दरवाजे खुले हैं।

    बताया जा रहा है कि इस घटनाक्रम के बाद NDA की संसदीय ताकत बढ़ सकती है, जिससे संसद में विपक्षी समीकरणों पर भी असर पड़ सकता है। हालांकि, इस पूरे मामले में अंतिम निर्णय लोकसभा अध्यक्ष और आगे चलकर चुनाव आयोग (EC) की प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।

    बागी गुट के नेताओं ने आरोप लगाया है कि पार्टी में आंतरिक असंतोष की वजह नेतृत्व शैली और संगठनात्मक फैसले हैं। उनका कहना है कि पहले जब तक ममता बनर्जी का सीधा नियंत्रण था, स्थिति स्थिर थी, लेकिन अब संगठन में बदलाव के बाद असंतोष बढ़ा है। कुछ नेताओं ने यहां तक दावा किया है कि पार्टी अब “कॉरपोरेट ढांचे” की तरह काम कर रही है, जहां जमीनी नेताओं की अनदेखी हो रही है।

    बागी सांसदों का यह भी तर्क है कि वे जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि हैं और अपने क्षेत्रों के विकास कार्यों के लिए केंद्र सरकार के साथ बेहतर समन्वय आवश्यक है। इसी वजह से वे NDA के साथ जुड़कर काम करने की बात कर रहे हैं। उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि पहले लोकसभा अध्यक्ष से मान्यता लेने की प्रक्रिया अपनाई जाएगी और उसके बाद चुनाव आयोग का रुख किया जाएगा।

    इसी बीच, पार्टी के भीतर अन्य स्तरों पर भी असंतोष के संकेत सामने आए हैं। वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी और बैठक से दूरी बनाए जाने की खबरों ने राजनीतिक माहौल को और गर्म कर दिया है। कुछ नेताओं ने संगठनात्मक फैसलों और रणनीतिक प्रबंधन पर सवाल उठाए हैं, जिससे TMC के भीतर गुटबाजी की चर्चाएं तेज हो गई हैं।

    फिलहाल, इस पूरे घटनाक्रम पर सभी की नजरें लोकसभा अध्यक्ष के निर्णय और चुनाव आयोग की संभावित भूमिका पर टिकी हुई हैं, जो आगे की राजनीतिक दिशा तय कर सकते हैं।

  • TMC के 20वें सांसद के भी बगावत के चर्चे…. बागी गुट ने पार्टी सिंबल पर ठोका अपना दावा

    TMC के 20वें सांसद के भी बगावत के चर्चे…. बागी गुट ने पार्टी सिंबल पर ठोका अपना दावा


    कोलकाता।
    पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों (West Bengal Assembly elections) में तृणमूल कांग्रेस (Trinamool Congress- TMC) की करारी शिकस्त के बाद पार्टी के भीतर मची बगावत अब दिल्ली दरबार तक पहुंच गई है। टीएमसी के बागी गुट ने लोकसभा स्पीकर को एक पत्र भेजकर संसद में खुद को असली टीएमसी के रूप में मान्यता देने और पार्टी सिंबल पर अपना दावा ठोका है। इस चिट्ठी के सामने के बाद 20वें सांसद के बगावत की भी चर्चा तेज हो गई है।

    सूत्रों के मुताबिक, यह पत्र 18 मई का है जिस पर टीएमसी के 19 लोकसभा सांसदों के हस्ताक्षर हैं। दिलचस्प बात यह है कि पत्र में हस्ताक्षर करने वालों के सीरियल नंबर 1 से 20 तक हैं, लेकिन 13वें नंबर के आगे किसी का हस्ताक्षर नहीं है। इससे यह राजनीतिक कयास लगाए जा रहे हैं कि टीएमसी का कोई अन्य कद्दावर सांसद भी इस बागी गुट के संपर्क में है और सही समय पर सामने आ सकता है।

    बागी गुट की वरिष्ठ नेता और सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा, “हां, मैंने पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं और हमने इसे काफी समय पहले ही स्पीकर को भेज दिया था।” वहीं, सांसद जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया ने कहा कि इस पत्र से यह साफ हो जाता है कि लोकसभा में असली टीएमसी हम ही हैं।


    इन 19 सांसदों के हस्ताक्षर

    शुक्रवार को सामने आई चिट्ठी में जिन सांसदों के हस्ताक्षर हैं उनमें काकोली घोष दस्तीदार, शताब्दी रॉय, बापी हालदार, शर्मिला सरकार, प्रसून बंदोपाध्याय, जगदीश बर्मा बसुनिया, असित कुमार माल, अरूप चक्रवर्ती, रचना बनर्जी, सयानी घोष, खलीलुर रहमान, अबू ताहेर खान, यूसुफ पठान, मिताली बाग, माला रॉय, कालीपद सोरेन, दीपक अधिकारी (देव), जून मालिया और पार्थ भौमिक जैसे नाम शामिल हैं।


    बागी गुट के सामने क्या विकल्प

    लोकसभा में टीएमसी के कुल 28 सांसद हैं। इनमें ममता बनर्जी के भतीजे और डायमंड हार्बर से सांसद अभिषेक बनर्जी भी शामिल हैं, जो इस समय बागियों के मुख्य निशाने पर हैं। दलबदल विरोधी कानून से बचने के लिए बागी गुट के पास दो मुख्य रास्ते हैं। बागी गुट खुद को मूल पार्टी बताकर चुनाव आयोग (EC) के पास जा सकता है। इसके लिए उन्हें विधायी बहुमत साबित करना होगा। दलबदल कानून के तहत अयोग्य घोषित होने से बचने के लिए कम से कम दो-तिहाई सांसदों का साथ होना जरूरी है। 28 सांसदों का दो-तिहाई यानी 19 होता है। यही वजह है कि बागी गुट 19 सांसदों के साथ सुरक्षित होने का दावा कर रहा है।

    हाल ही में अप्रैल में आम आदमी पार्टी (AAP) के 10 राज्यसभा सांसदों ने इसी तरह दो-तिहाई बहुमत के साथ भाजपा में अपना विलय कर लिया था। यदि टीएमसी के ये 19 सांसद भी भाजपा या एनडीए में सीधे विलय करते हैं, तो उनकी सदस्यता बची रहेगी।

    टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने इस पर पलटवार करते हुए एक्स लिखा, “गद्दार टीएमसी सांसदों को कानून नहीं पता। 2003 के 91वें संविधान संशोधन ने पार्टी में विभाजन या अलग ब्लॉक के प्रावधान को खत्म कर दिया है। सांसदों की संख्या मायने नहीं रखती, मूल राजनीतिक दल के 2/3 हिस्से का किसी अन्य दल में विलय होना जरूरी है। इन सभी 19 गद्दारों को इस्तीफा देकर भाजपा के टिकट पर दोबारा चुनाव लड़ना चाहिए।”

    भाजपा इस पूरे घटनाक्रम पर पैनी नजर रखे हुए है, लेकिन वह फूंक-फूंक कर कदम बढ़ा रही है। राज्यसभा के नवनिर्वाचित सदस्य और भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ ने इसे टीएमसी का आंतरिक विस्फोट और उनके पापों का नतीजा बताया है। सूत्रों के अनुसार, बागी गुट की नेता काकोली घोष दस्तीदार ने इस हफ्ते दिल्ली में केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव से उनके आवास पर मुलाकात की थी। भाजपा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा, “हमने टीएमसी को नहीं तोड़ा, वे खुद एनडीए और राष्ट्रवादी विचारधारा का समर्थन करने के लिए हमारे पास आए हैं। अब यह उन्हें तय करना है कि वे एकनाथ शिंदे या अजीत पवार का रास्ता चुनते हैं या नहीं।”

    हालांकि, इस कूटनीतिक बढ़त के बीच बंगाल भाजपा के जमीनी कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं में थोड़ा असंतोष भी है। भाजपा का एक धड़ा इन टीएमसी बागियों को पार्टी में शामिल करने और भविष्य में एनडीए सरकार में कैबिनेट मंत्री पद दिए जाने की संभावना का खुलकर विरोध कर रहा है।


    केंद्र सरकार को क्या होगा फायदा?

    भले ही स्थानीय स्तर पर मतभेद हों, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर एनडीए के लिए यह बहुत बड़ी राहत होगी। लोकसभा में इन 19 सांसदों का समर्थन मिलने से मोदी सरकार को परिसीमन विधेयक और ‘एक देश, एक चुनाव’ जैसे बड़े और कड़े नीतिगत कानूनों को आसानी से पारित कराने में भारी मदद मिलेगी। वहीं राज्यसभा में भी टीएमसी के 3 सांसदों सुखेन्दु शेखर, सुष्मिता देव और प्रकाश बड़ाईक के इस्तीफे के बाद खाली हुई सीटों को भाजपा विधानसभा में बहुमत के दम पर आसानी से जीत लेगी।

  • TMC में बगावत के बीच ममता के साथ खड़े हुए शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आजाद, बागियों पर साधा निशाना

    TMC में बगावत के बीच ममता के साथ खड़े हुए शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आजाद, बागियों पर साधा निशाना


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) इस समय गंभीर अंदरूनी संकट से गुजर रही है। विधानसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी के भीतर असंतोष और गुटबाजी की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। कई नेताओं और जनप्रतिनिधियों के बागी रुख अपनाने की चर्चाओं के बीच पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी को उस समय बड़ी राहत मिली जब वरिष्ठ सांसद शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आजाद खुलकर उनके समर्थन में सामने आए।

    आसनसोल से सांसद और लंबे समय से राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय रहे Shatrughan Sinha ने पार्टी छोड़ने या किसी बागी गुट में शामिल होने की अटकलों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह ममता बनर्जी के साथ थे, हैं और आगे भी रहेंगे। उनके अनुसार राजनीति में कठिन समय ही रिश्तों और निष्ठा की असली परीक्षा होती है।

    शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा कि जब उनके राजनीतिक जीवन में चुनौतीपूर्ण दौर आया था, तब Mamata Banerjee ने उन पर भरोसा जताया था। उन्होंने दावा किया कि ऐसे समय में उनका कर्तव्य बनता है कि वे भी ममता बनर्जी का साथ दें। उन्होंने यह भी कहा कि उनके नाम को लेकर जो अटकलें लगाई जा रही हैं, वे निराधार हैं और उनका किसी कथित बागी समूह से कोई संबंध नहीं है।

    अपने विशेष अंदाज में शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा कि वह स्वयं अपने लिए “तीन लाइन का व्हिप” जारी कर रहे हैं कि उनका राजनीतिक और नैतिक समर्थन ममता बनर्जी तथा टीएमसी के साथ बना रहेगा। उन्होंने यह भी कहा कि विभिन्न राजनीतिक दलों में उनके मित्र हो सकते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वे पार्टी छोड़ने जा रहे हैं।

    इसी क्रम में बर्धमान-दुर्गापुर से सांसद Kirti Azad भी पार्टी नेतृत्व के समर्थन में मजबूती से सामने आए। उन्होंने बागी नेताओं पर निशाना साधते हुए दावा किया कि कुछ लोग राजनीतिक दबाव और अन्य कारणों से पार्टी छोड़ रहे हैं। कीर्ति आजाद ने आरोप लगाया कि विपक्षी दल टीएमसी को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं और कुछ नेताओं को प्रभावित किया जा रहा है।

    उन्होंने बागी नेताओं के उस दावे को भी चुनौती दी, जिसमें बड़ी संख्या में सांसदों के समर्थन की बात कही गई थी। कीर्ति आजाद के अनुसार, पार्टी के भीतर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन इससे संगठन की मूल ताकत कमजोर नहीं होती। उन्होंने विश्वास जताया कि ममता बनर्जी अपनी राजनीतिक क्षमता और अनुभव के बल पर मौजूदा संकट से पार्टी को बाहर निकाल लेंगी।

    इस दौरान पार्टी के वरिष्ठ नेता कल्याण बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के बीच सामने आए मतभेदों पर भी प्रतिक्रिया दी गई। कीर्ति आजाद ने कहा कि कल्याण बनर्जी लंबे समय से पार्टी के महत्वपूर्ण नेता रहे हैं और उन्होंने हमेशा संगठन के लिए काम किया है। उनके अनुसार, नेतृत्व स्तर पर उत्पन्न मतभेदों का समाधान बातचीत और संगठनात्मक प्रक्रिया के जरिए निकाला जा सकता है।

    गौरतलब है कि हाल के दिनों में टीएमसी के कई नेताओं और सांसदों को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं। कुछ रिपोर्टों में बागी खेमे द्वारा समर्थन जुटाने की बात कही गई है, जबकि पार्टी नेतृत्व इन दावों को गंभीरता से नहीं ले रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पार्टी इस चुनौती से कैसे निपटती है।

    फिलहाल इतना स्पष्ट है कि पार्टी के संकट के दौर में शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आजाद जैसे वरिष्ठ नेताओं का सार्वजनिक समर्थन ममता बनर्जी के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उनके बयानों ने यह संकेत दिया है कि टीएमसी के भीतर चल रही उठापटक के बावजूद नेतृत्व के साथ खड़े रहने वाले नेताओं की संख्या भी कम नहीं है।

  • अभिषेक बनर्जी पर बढ़ा दबाव: कल्याण बनर्जी के बेटे ने छोड़ा केस, बोले- सम्मान नहीं मिलेगा तो साथ नहीं देंगे

    अभिषेक बनर्जी पर बढ़ा दबाव: कल्याण बनर्जी के बेटे ने छोड़ा केस, बोले- सम्मान नहीं मिलेगा तो साथ नहीं देंगे


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की सियासत में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर चल रही खींचतान अब सार्वजनिक रूप से सामने आने लगी है। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी को लेकर वरिष्ठ नेता कल्याण बनर्जी के परिवार की नाराजगी ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। अधिवक्ता शीर्षाण्य बनर्जी, जो वरिष्ठ टीएमसी नेता कल्याण बनर्जी के पुत्र हैं, ने दावा किया है कि पेशेवर सम्मान और वकालत की परंपराओं की अनदेखी किए जाने के कारण उन्होंने अभिषेक बनर्जी से जुड़े कानूनी मामलों से खुद को अलग करने का निर्णय लिया है।

    शीर्षाण्य बनर्जी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि वे 2 जून से एक मामले पर काम कर रहे थे और उनका प्रयास था कि अभिषेक बनर्जी को कानूनी राहत मिल सके। उनका दावा है कि बाद में उन्हें जानकारी दी गई कि मामले की पैरवी के लिए किसी अन्य वकील को जिम्मेदारी दी जा रही है, जो उनके पिता कल्याण बनर्जी से जूनियर हैं। शीर्षाण्य के अनुसार, वकालत के पेशे में वरिष्ठता और पेशेवर शिष्टाचार का विशेष महत्व होता है और इसी सिद्धांत के आधार पर उन्होंने मामले से अलग होने का फैसला किया।

    उन्होंने कहा कि वकीलों का भी आत्मसम्मान होता है और पेशेवर सम्मान हर व्यक्ति का अधिकार है। उनका दावा है कि यदि किसी पेशेवर को उचित सम्मान नहीं दिया जाता है तो उसके लिए ऐसे मामलों में काम जारी रखना मुश्किल हो जाता है। शीर्षाण्य ने यह भी कहा कि उन्होंने जो निर्णय लिया है, वह पूरी तरह पेशेवर आधार पर लिया गया है और इसका उद्देश्य अपने पेशे की गरिमा बनाए रखना है।

    हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका यह फैसला पार्टी प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री Mamata Banerjee के प्रति उनके रुख को प्रभावित नहीं करता। शीर्षाण्य ने कहा कि वे ममता बनर्जी के नेतृत्व और पार्टी के लिए पहले की तरह काम करते रहेंगे। उनका कहना था कि टीएमसी केवल किसी एक नेता का नाम नहीं है, बल्कि बूथ स्तर पर काम करने वाले हजारों कार्यकर्ताओं और नेताओं का सामूहिक संगठन है।

    इस बीच, वरिष्ठ टीएमसी नेता Kalyan Banerjee ने भी अभिषेक बनर्जी के खिलाफ नाराजगी जाहिर की है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने पार्टी नेतृत्व के सामने अपनी आपत्तियां रखते हुए अभिषेक बनर्जी पर अहंकारी व्यवहार का आरोप लगाया है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि वे अभिषेक से जुड़े कानूनी मामलों में आगे काम नहीं करेंगे। हालांकि, इन बयानों पर पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधानसभा चुनाव के बाद टीएमसी के भीतर विभिन्न स्तरों पर असंतोष की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। कई नेता संगठनात्मक फैसलों और नेतृत्व शैली को लेकर अपनी राय सार्वजनिक रूप से व्यक्त कर रहे हैं। ऐसे में कल्याण बनर्जी और शीर्षाण्य बनर्जी की टिप्पणियां पार्टी के अंदर चल रही बहस को और तेज कर सकती हैं।

    फिलहाल यह पूरा विवाद राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। एक ओर अभिषेक बनर्जी पार्टी संगठन में अपनी भूमिका को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी पार्टी के लिए नई चुनौती के रूप में देखी जा रही है। आने वाले दिनों में पार्टी नेतृत्व इस मुद्दे को किस तरह संभालता है, इस पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।

  • हाईकोर्ट की सख्ती के बावजूद सड़कों पर घुमाए गए TMC नेता जहांगीर खान, बंगाल पुलिस की कार्रवाई पर उठा विवाद

    हाईकोर्ट की सख्ती के बावजूद सड़कों पर घुमाए गए TMC नेता जहांगीर खान, बंगाल पुलिस की कार्रवाई पर उठा विवाद


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में कानून व्यवस्था और राजनीतिक घटनाक्रम के बीच तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के नेता जहांगीर खान से जुड़ा मामला एक बार फिर चर्चा का केंद्र बन गया है। हाल ही में गिरफ्तार किए गए जहांगीर खान को पुलिस द्वारा दक्षिण 24 परगना जिले के फालता क्षेत्र में सार्वजनिक रूप से पैदल ले जाने के वीडियो और तस्वीरें सामने आने के बाद राजनीतिक और कानूनी बहस तेज हो गई है। यह घटना ऐसे समय में सामने आई है जब कुछ दिन पहले ही कलकत्ता हाईकोर्ट ने पुलिस हिरासत में आरोपियों को सार्वजनिक रूप से घुमाने की प्रथा पर कड़ी टिप्पणी की थी।

    जानकारी के अनुसार, जहांगीर खान को सोमवार को भारत-नेपाल सीमा के निकट उत्तर बंगाल के पानीटंकी क्षेत्र से गिरफ्तार किया गया था। उनके खिलाफ जबरन वसूली सहित कई गंभीर आरोपों में सात एफआईआर दर्ज होने की बात कही जा रही है। गिरफ्तारी के बाद अदालत ने उन्हें पांच दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया था। गुरुवार को सामने आए वीडियो में पुलिसकर्मी उन्हें फालता और आसपास के इलाकों में पैदल ले जाते दिखाई दे रहे हैं, जिसके बाद इस कार्रवाई को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

    जहांगीर खान पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक चर्चित नाम रहे हैं। उन्हें टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद Abhishek Banerjee का करीबी माना जाता है। विधानसभा उपचुनाव के दौरान भी उनका नाम लगातार चर्चा में रहा था। बताया जाता है कि मतदान से पहले वह क्षेत्र से गायब हो गए थे और उसके बाद से उनके खिलाफ विभिन्न मामलों की जांच जारी थी।

    इस मामले ने इसलिए भी ध्यान आकर्षित किया है क्योंकि हाल ही में कलकत्ता हाईकोर्ट की अवकाशकालीन पीठ ने आरोपियों को सार्वजनिक रूप से घुमाने के मामलों पर पश्चिम बंगाल पुलिस से रिपोर्ट मांगी थी। अदालत ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा था कि पुलिस को किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने का अधिकार अवश्य है, लेकिन उसे सार्वजनिक रूप से अपमानित या बदनाम करने का अधिकार नहीं है। न्यायालय ने यह भी संकेत दिया था कि ऐसी कार्रवाइयों को संवैधानिक अधिकारों के संदर्भ में परखा जाना चाहिए।

    कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) में पुलिस को कुछ विशेष परिस्थितियों में ही कड़े नियंत्रण या हथकड़ी के इस्तेमाल की अनुमति दी गई है। कानून का उद्देश्य सुरक्षा और जांच सुनिश्चित करना है, न कि किसी आरोपी को सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा करना। यही कारण है कि आरोपी को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने की घटनाएं अक्सर न्यायिक समीक्षा और मानवाधिकार संबंधी बहस का विषय बन जाती हैं।

    देश के अन्य राज्यों में भी इस तरह के मामलों पर अदालतें सख्त रुख अपना चुकी हैं। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय और राजस्थान उच्च न्यायालय ने भी पूर्व में ऐसी घटनाओं पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि किसी भी आरोपी के सम्मान और गरिमा के अधिकार की रक्षा की जानी चाहिए, चाहे उसके खिलाफ आरोप कितने भी गंभीर क्यों न हों।

    फिलहाल जहांगीर खान का मामला पश्चिम बंगाल की राजनीति और पुलिस प्रशासन दोनों के लिए चर्चा का विषय बना हुआ है। एक ओर उनके खिलाफ दर्ज मामलों की जांच जारी है, वहीं दूसरी ओर पुलिस की कार्रवाई को लेकर कानूनी और संवैधानिक प्रश्न भी उठ रहे हैं। आने वाले दिनों में अदालत और प्रशासन की प्रतिक्रिया इस मामले की दिशा तय कर सकती है।

  • TMC में बगावत और गहराई: काकोली घोष ने ऋतब्रत बनर्जी से बनाई दूरी, NDA समर्थन के दावे से बढ़ी सियासी हलचल

    TMC में बगावत और गहराई: काकोली घोष ने ऋतब्रत बनर्जी से बनाई दूरी, NDA समर्थन के दावे से बढ़ी सियासी हलचल


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर चल रही अंदरूनी कलह अब नए मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है। पार्टी के भीतर उभरे बागी नेताओं के बीच भी रणनीतिक मतभेद सामने आने लगे हैं। लोकसभा में बागी सांसदों के कथित गुट का नेतृत्व करने का दावा कर रहीं टीएमसी सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि उनका बंगाल विधानसभा में बागी गुट का नेतृत्व कर रहे ऋतब्रत बनर्जी से कोई संबंध नहीं है।

    काकोली घोष दस्तीदार का यह बयान ऐसे समय आया है जब टीएमसी के भीतर असंतोष और संभावित टूट की चर्चाएं लगातार तेज हो रही हैं। हाल ही में राज्यसभा के कुछ सदस्यों के इस्तीफों और पार्टी के भीतर बढ़ते मतभेदों ने राजनीतिक हलकों में नई अटकलों को जन्म दिया है। इसी बीच काकोली ने दावा किया कि लोकसभा में उनके साथ कई सांसद खड़े हैं और वे बंगाल के हितों के लिए एक अलग राजनीतिक दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

    मीडिया से बातचीत में काकोली ने कहा कि जब उन्होंने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ आवाज उठाई थी, तब वे अकेली थीं, लेकिन अब कई सांसद उनके साथ आ चुके हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ऋतब्रत बनर्जी विधानसभा की राजनीति में सक्रिय हैं, जबकि उनका संघर्ष संसद के स्तर पर है। इस कारण दोनों की राजनीतिक रणनीति और प्राथमिकताएं अलग हैं।

    टीएमसी के भीतर जारी इस घटनाक्रम में एक बड़ा विरोधाभास भी सामने आया है। जहां ऋतब्रत बनर्जी खुद को राज्य में भाजपा के विकल्प के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं काकोली घोष का दावा है कि उनका गुट केंद्र की एनडीए सरकार को समर्थन देने के पक्ष में है। यही कारण है कि दोनों नेताओं के बीच दूरी और अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगी है।

    काकोली घोष ने लोकसभा सांसद कल्याण बनर्जी को लेकर भी कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर कल्याण बनर्जी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। उनके अनुसार संसद के भीतर महिलाओं के प्रति कथित व्यवहार को लेकर उन्होंने आपत्ति जताई है। काकोली ने स्पष्ट कहा कि वे किसी भी परिस्थिति में कल्याण बनर्जी के साथ राजनीतिक रूप से नहीं जुड़ सकतीं।

    दूसरी ओर, ऋतब्रत बनर्जी ने काकोली के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्हें इस बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है और वे इस तरह के विवादों में पड़ने से बचना चाहते हैं। इससे साफ संकेत मिलता है कि दोनों गुट फिलहाल अपने-अपने राजनीतिक रास्तों पर आगे बढ़ना चाहते हैं।

    सबसे बड़ा विवाद काकोली घोष के उस दावे को लेकर है जिसमें उन्होंने कहा कि टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसदों ने अलग गुट को मान्यता दिलाने और एनडीए सरकार को समर्थन देने के लिए पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं। हालांकि, स्पीकर कार्यालय से जुड़े सूत्रों के अनुसार अभी तक ऐसा कोई आधिकारिक पत्र प्राप्त नहीं हुआ है।

    इतना ही नहीं, जिन सांसदों के नाम कथित रूप से बागी गुट में शामिल बताए जा रहे हैं, उनमें से कुछ ने सार्वजनिक रूप से इन दावों का खंडन भी किया है। आसनसोल से सांसद शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा कि वे पूरी तरह टीएमसी और ममता बनर्जी के साथ हैं। वहीं जयनगर से सांसद प्रतिमा मंडल ने भी ऐसी खबरों को अफवाह बताते हुए चुनौती दी कि यदि कोई पत्र मौजूद है तो उसे सार्वजनिक किया जाए।

    इस बीच दिल्ली में केंद्रीय मंत्री के आवास पर कथित रूप से हुई एक बैठक की चर्चाओं ने राजनीतिक तापमान और बढ़ा दिया है। हालांकि बैठक में शामिल नेताओं और वहां हुई चर्चाओं को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। फिर भी काकोली घोष का दावा है कि उनके साथ सांसदों की संख्या लगातार बढ़ रही है और कई अन्य नेता भी संपर्क में हैं।

    पश्चिम बंगाल की राजनीति में टीएमसी के भीतर बढ़ती यह हलचल आने वाले दिनों में राज्य और राष्ट्रीय राजनीति दोनों पर असर डाल सकती है। फिलहाल सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि पार्टी नेतृत्व इस चुनौती का सामना किस तरह करता है और बागी गुट अपने दावों को किस हद तक साबित कर पाता है।