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  • US: ट्रंप को बड़ा झटका…. यौन शोषण मामले में जीन कैरोल को मिले 5.63 मिलियन डॉलर

    US: ट्रंप को बड़ा झटका…. यौन शोषण मामले में जीन कैरोल को मिले 5.63 मिलियन डॉलर


    वाशिंगटन।
    अमेरिकी लेखिका ई. जीन कैरोल (American writer E. Jean Carroll) को डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) से करीब 56 लाख 30 हजार डॉलर (लगभग 5.63 मिलियन डॉलर) मिल गए हैं. यह पैसा उन्हें 2023 में एक जूरी के फैसले के बाद मिला है, जिसमें ट्रंप को कैरोल का यौन उत्पीड़न करने और उन्हें बदनाम करने का दोषी ठहराया गया था।

    अदालत के रिकॉर्ड के मुताबिक यह रकम सोमवार को कैरोल की लॉ फर्म को भेज दी गई. यह फैसला ट्रंप की आपत्तियों के बावजूद लिया गया. जज लुईस कैप्लान (Judge Lewis Kaplan) ने पांच दिन पहले ही इस भुगतान को मंजूरी दी थी। यह रकम मूल रूप से 5 मिलियन डॉलर के सिविल वर्डिक्ट और उस पर लगे ब्याज को मिलाकर बनी है. यह पहली बार है जब ट्रंप को कैरोल को कोई भुगतान करने पर मजबूर होना पड़ा है।

    पिछले सात साल में कैरोल कुल 88.3 मिलियन डॉलर के सिविल फैसले ट्रंप के खिलाफ जीत चुकी हैं. यह मामला 1996 के आसपास न्यूयॉर्क के बर्गडॉर्फ गुडमैन डिपार्टमेंट स्टोर की एक ड्रेसिंग रूम में हुई कथित घटना से जुड़ा है, जिसे ट्रंप ने हमेशा नकारा है।

    राष्ट्रपति ट्रंप कैरोल के आरोपों को झूठा बताते रहे हैं. उनका कहना है कि वे कैरोल को जानते तक नहीं और कैरोल ने अपनी किताब बेचने के लिए यह कहानी गढ़ी है. पिछले महीने अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट ने भी ट्रंप की उस अपील को खारिज कर दिया था, जिसमें उन्होंने 5 मिलियन डॉलर के फैसले को चुनौती दी थी. ट्रंप की कानूनी टीम ने मंगलवार को फिर कहा कि यह पूरा मामला राजनीति से प्रेरित है।

    इससे पहले ट्रंप के वकील ने अदालत से भुगतान रोकने की मांग की थी. वकील का कहना था कि अगर कैरोल यह पैसा दान कर देती हैं, जैसा उन्होंने पहले कहा था, तो यह रकम वापस मिलनी मुश्किल हो जाएगी. हालांकि कैरोल ने बाद में भरोसा दिलाया कि वे इस पैसे को अपने रिटायरमेंट के लिए एक ब्याज वाले खाते में रखेंगी।

  • US ने ईरान पर लगाया सात कारोबारी जहाजों पर हमले का आरोप, भारतीय नाविक भी प्रभावित

    US ने ईरान पर लगाया सात कारोबारी जहाजों पर हमले का आरोप, भारतीय नाविक भी प्रभावित


    वॉशिंगटन।
    पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव (West Asia Crisis) के बीच अमेरिका (America) ने ईरान (Iran) पर गंभीर आरोप लगाए हैं। अमेरिकी सेना की सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) (US Central Command -CENTCOM) ने कहा है कि पिछले सात दिनों में ईरान ने सात वाणिज्यिक (कमर्शियल) जहाजों को निशाना बनाया, जिससे करीब एक दर्जन नागरिक चालक दल (क्रू) के सदस्य मारे गए, लापता हुए या घायल हुए हैं। अमेरिका ने कहा कि इन घटनाओं के लिए वह ईरान को जिम्मेदार मानता है।

    सेंटकॉम के कमांडर एडमिरल ब्रैड कूपर ने बयान जारी कर कहा कि ईरानी बलों ने जानबूझकर नागरिक जहाजों को निशाना बनाया है। उनके मुताबिक, पिछले एक सप्ताह में ईरान ने सात कारोबारी जहाजों पर हमले किए। इसके अलावा ईरान ने पड़ोसी खाड़ी देशों की ओर दर्जनों मिसाइलें और ड्रोन भी दागे। उन्होंने कहा कि अमेरिका निर्दोष लोगों की जान को खतरे में डालने वाली ईरान की आक्रामक गतिविधियों के लिए उसे जवाबदेह ठहरा रहा है।


    होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बढ़ा तनाव

    अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। अमेरिका का आरोप है कि ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य में अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार और जहाजों की आवाजाही को बाधित कर रहा है। यह जलमार्ग दुनिया के सबसे व्यस्त तेल और व्यापारिक मार्गों में से एक माना जाता है। सेंटकॉम ने बताया कि उसने ईरानी बंदरगाहों और तटीय क्षेत्रों से आने-जाने वाले जहाजों पर नौसैनिक नाकेबंदी फिर से शुरू कर दी है। अमेरिकी सेना का कहना है कि यह कदम ईरान की उन सैन्य क्षमताओं को कमजोर करने के लिए उठाया गया है, जिनका इस्तेमाल व्यापारिक जहाजों पर हमलों में किया जा रहा है। अमेरिका के अनुसार, इस अभियान के तहत क्षेत्र में 20 से अधिक अमेरिकी युद्धपोत और सैकड़ों सैन्य विमान तैनात किए गए हैं।


    भारत ने जताई चिंता

    इस बीच भारत ने होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर रहे दो जहाजों; एमटी अल बहियाह और एमटी मोम्बासा; पर हुए हमले पर गहरी चिंता व्यक्त की है। इन दोनों जहाजों पर कुल 46 चालक दल के सदस्य सवार थे, जिनमें 30 भारतीय नाविक शामिल थे।


    यूएई ने भी हमले की पुष्टि की

    संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के रक्षा मंत्रालय ने पुष्टि की है कि यूएई के झंडे वाले टैंकर मोम्बासा और बहियाह को होर्मुज जलडमरूमध्य के दक्षिणी हिस्से में, ओमान के क्षेत्रीय जल में, ईरानी क्रूज मिसाइलों से निशाना बनाया गया। इन घटनाओं के बाद पश्चिम एशिया में सुरक्षा स्थिति और अधिक गंभीर हो गई है। समुद्री व्यापार, तेल आपूर्ति और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ गई है। वहीं, अमेरिका और ईरान के बीच टकराव और तेज होने की आशंका भी जताई जा रही है।

  • US की H-1B वीजा फर्जीवाड़े पर बड़ी कार्रवाई….. भारतीय दिग्गज IT समेत कई बड़ी कंपनियां रडार पर

    US की H-1B वीजा फर्जीवाड़े पर बड़ी कार्रवाई….. भारतीय दिग्गज IT समेत कई बड़ी कंपनियां रडार पर


    वाशिंगटन।
    अमेरिका (America) ने H-1B और पर्म (PERM) वर्क वीजा में चल रही कथित धोखाधड़ी के खिलाफ एक बड़ा जांच अभियान छेड़ दिया है। अमेरिकी श्रम विभाग के एक शीर्ष अधिकारी ने बताया कि इस बड़े फर्जीवाड़े की जांच के रडार पर दिग्गज भारतीय आईटी कंपनी ‘कॉग्निजेंट’ (Leading Indian IT company ‘Cognizant’) समेत कई बड़ी कंपनियां शामिल हैं।


    उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के नेतृत्व में हुआ एक्शन

    वीजा से जुड़े इस बड़े गोरखधंधे के खिलाफ यह सख्त कदम अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस (US Vice President JD Vance) के नेतृत्व वाली ‘टास्क फोर्स टू एलिमिनेट फ्रॉड’ के तहत उठाया गया है।


    कैसे खुला फर्जीवाड़े का राज?

    श्रम विभाग के तहत काम करने वाले ‘ऑफिस ऑफ द इंस्पेक्टर जनरल’ (OIG) ने बड़े स्तर पर चल रहे इस फर्जीवाड़े का पर्दाफाश किया है। OIG के आधिकारिक बयान में जांच से जुड़ी कई अहम बातें सामने आई हैं।

    कई नियोक्ताओं और लेबर ब्रोकर्स ने मिलकर वीजा के लिए फर्जी आवेदन जमा किए। विदेशी कामगारों का शोषण किया गया, उनसे जबरन कम वेतन पर काम कराया गया और उनके पैसों में अवैध कटौती की गई। कम मजदूरी वाले विदेशी कर्मचारियों से बाजार को भर दिया गया, जिसका सीधा नुकसान अमेरिकी कामगारों को हुआ और उनकी नौकरियां छिन गईं।


    ‘दर्जनों कंपनियों को जारी किए गए समन’

    बुधवार को फॉक्स बिजनेस से बातचीत के दौरान श्रम विभाग के इंस्पेक्टर जनरल एंथोनी डी एस्पोसिटो ने इस कार्रवाई को लेकर खुलकर बात की। उन्होंने कहा, “हमने इस मामले में पहले ही दर्जनों समन जारी कर दिए हैं। हम यह सुनिश्चित करेंगे कि हम जांच में मिले हर एक सुराग की तह तक जाएं।”

    आईटी दिग्गज कॉग्निजेंट का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया, “हमारे पास ऐसे व्हिसलब्लोअर्स मौजूद हैं जो ‘कॉग्निजेंट’ जैसी कुछ सबसे बड़ी कंपनियों के बारे में जानकारी दे रहे हैं। ये कंपनियां पर्म और H-1B वीजा से जुड़े मुद्दों में पहले से ही काफी चर्चा में रही हैं।”


    अमेरिकी नागरिकों की नौकरियों से समझौता नहीं

    OIG ने अपने बयान में स्पष्ट किया है कि ऐसे जालसाज उन श्रम कार्यक्रमों की साख को नुकसान पहुंचाते हैं, जिन्हें देश में श्रमिकों की वास्तविक कमी को दूर करने के लिए बनाया गया है। इन कार्यक्रमों का मकसद अमेरिकी नागरिकों की नौकरियों की कीमत पर भ्रष्ट लोगों की जेब भरना बिल्कुल नहीं है।

    जांच एजेंसी ने कहा कि वह विदेशी गेस्ट वर्कर वीजा सिस्टम का गलत इस्तेमाल करने वाले मानव तस्करी और जबरन मजदूरी कराने वाले पूरे नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए प्रतिबद्ध है। संस्था का साफ कहना है कि वह उन सभी साजिशों को जड़ से खत्म करेगी जो मजबूर मजदूरों का शोषण करते हैं और अमेरिकी नागरिकों के हक की नौकरियां छीनते हैं।

  • अमेरिका ने ट्रेड डील से पहले दिए सकारात्मक संकेत… 4 भारतीय कंपनियों को से हटाए बैन

    अमेरिका ने ट्रेड डील से पहले दिए सकारात्मक संकेत… 4 भारतीय कंपनियों को से हटाए बैन


    नई दिल्ली।
    भारत (India) के लिए अमेरिका (America) से अच्छी खबर आई है. रूस के साथ कथित व्यापार संबंधों को लेकर चार भारतीय कंपनियों (Indian Companies) पर लगाए गए प्रतिबंध हटा लिए गए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, बुधवार से अमेरिका द्वारा ये बैन हटाए गए हैं और इसकी जानकारी अमेरिकी वित्त विभाग ने शेयर करते हुए कहा है कि US ने चार भारतीय कंपनियों पर उन बैन को हटाया है, जो रूस के सैन्य-औद्योगिक अड्डे का समर्थन करने के लिए लेटेस्ट टेक्नोलॉजी और उपकरण की आपूर्ति करने के आरोपों पर लगाए गए थे. अब अमेरिका की प्रतिबंध लिस्ट से अलग हो गई हैं।


    इन कंपनियों को बड़ी राहत

    एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी वित्त विभाग के मुताबिक हैदराबाद स्थित आरआरजी इंजीनियरिंग टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड (RRG Engineering Technologies) और लोकेश मशीन्स लिमिटेड पर से प्रतिबंध हटाए गए हैं. तो वहीं अहमदाबाद स्थित गैलेक्सी बियरिंग्स और नई दिल्ली स्थित शौर्य एरोनॉटिक्स प्राइवेट लिमिटेड को विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय (OFC) की बैन लिस्ट से हटा दिया गया है.


    गैलेक्सी पर 2024 में लगा था बैन

    भारतीय कंपनी गैलेक्सी बियरिंग्स लिमिटेड पर अक्टूबर 2024 में प्रतिबंध लगाया गया था. अमेरिका ने उस समय कंपनी पर रोलर बियरिंग और रोलर असेंबली समेत दर्जनों हाई क्वालिटी वाले दोहरे उपयोग वाली वस्तुओं को रूसी संस्थाओं को निर्यात करने का आरोप लगाया था. अब अमेरिकी वित्त विभाग ने इन आरोपों को वापस लेते हुए कंपनी पर से हैन हटा दिए हैं.

    अन्य तीन कंपनियों में अगला नाम शौर्य एरोनॉटिक्स प्राइवेट लिमिटेड का है, जिसे बैन मुक्त कर दिया गया है. इसपर कथित तौर पर रडार उपकरण, रेडियो नेविगेशनल एंड उपकरण, रेडियो रिमोट कंट्रोल उपकरण और दूसरे इलेक्ट्रिक उपकरण रूस को भेजने के आरोप लगा गए थे.


    RRG पर इसलिए था प्रतिबंध

    अमेरिका ने भारतीय कंपनी आरआरजी इंजीनियरिंग टेक्नोलॉजीज पर रूस स्थित कंपनी आर्टेक्स लिमिटेड को माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स की 100 से अधिक खेपें भेजने का आरोप लगाया गया था. इसके बाद इसे प्रतिबंध वाली अमेरिकी लिस्ट में शामिल किया गया था.

    एक अन्य भारतीय कंपनी अमेरिका की इस प्रतिबंधों वाली लिस्ट में शामिल थी, जिसका नाम लोकेश मशीन्स है और इस पर विभिन्न रूसी मैन्युफेक्चरिंग कंपनियों को मशीन टूल्स की दर्जनों खेपों की आपूर्ति करने का आरोप लगाया गया था.


    ट्रेड डील से पहले आई खबर

    US-Iran Trade Deal पर बातचीत का दौर जारी है और दोनों ही देश टैरिफ विवाद के बाद अब अपने रिश्तों को ट्रैक पर लाने की कोशिश में लगे हुए हैं. अमेरिका की ओर से भारतीय कंपनियों पर प्रतिबंध हटाया जाना एक पॉजिटिव सिग्नल माना जा रहा है. रिपोर्ट्स में दोनों देशों के बीच डील पर बातचीत अब अंतिम चरण में बताई जा रही है।

  • US: ट्रंप की तेल कंपनियों को सख्त चेतावनी, बोले- 'पेट्रोल के दाम कम करो वरना…'

    US: ट्रंप की तेल कंपनियों को सख्त चेतावनी, बोले- 'पेट्रोल के दाम कम करो वरना…'


    वाशिंगटन।
    अंतरराष्ट्रीय बाजार (International Market) में कच्चे तेल की कीमतों (Crude Oil Prices) में आई भारी गिरावट के बाद अब अमेरिकी राजनीति में उबाल आ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने देश के सभी पेट्रोल रिटेलर्स (पेट्रोल पंप मालिकों) और बड़ी तेल कंपनियों को सख्त लहजे में चेतावनी देते हुए ईंधन की कीमतों में तुरुंत कटौती करने का आदेश दिया है। ट्रंप ने तेल कंपनियों पर आम जनता की जेब काटने और ‘प्राइस गॉजिंग’ यानी नाजायज मुनाफाखोरी का सीधा आरोप लगाया है।

    राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया और आधिकारिक बयानों के जरिए अमेरिकी तेल कंपनियों और पेट्रोल पंप एसोसिएशनों को आड़े हाथों लिया है। उन्होंने कहा कि हाल ही में वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों (जैसे अमेरिका-इरान वार्ता) और बाजार के रुख के कारण कच्चे तेल की कीमत गिरकर लगभग $68 प्रति बैरल पर आ गई।

    ट्रंप का तर्क है कि जब कच्चा तेल महंगा होता है, तो ये कंपनियां कुछ ही घंटों में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ा देती हैं। लेकिन अब जब कच्चा तेल $68 पर आ चुका है, तो आम अमेरिकी नागरिकों को इसका फायदा क्यों नहीं दिया जा रहा है?

    राष्ट्रपति ने केवल चेतावनी ही नहीं दी, बल्कि अमेरिकी न्याय विभाग को इस पूरे मामले की जांच करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने साफ कहा कि अगर रिटेलर्स ने तुरंत कीमतें कम नहीं कीं, तो उन्हें इसके गंभीर कानूनी नतीजे भुगतने होंगे।


    बड़ी कंपनियों पर आपदा में अवसर खोजने का आरोप

    Fortune और Al Jazeera की रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले कुछ महीनों में मिडिल-ईस्ट संकट और युद्ध के हालातों के चलते अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें आसमान छू रही थीं, जिससे आम जनता पर भारी आर्थिक दबाव था। इस संकट के दौरान वैश्विक तेल कंपनियों (जैसे एक्सॉनमोबिल, शेल और शेवरॉन) ने अरबों डॉलर का ‘अप्रत्याशित मुनाफा’ कमाया है।

    एक तरफ जहां आम अमेरिकी नागरिक $4.50 प्रति गैलन तक की दर से महंगा ईंधन खरीदने को मजबूर थे, वहीं शीर्ष तेल कंपनियों ने युद्ध के शुरुआती महीनों में ही करीब 23 अरब डॉलर का अतिरिक्त मुनाफा कूट लिया। ट्रंप प्रशासन का आरोप है कि बड़ी तेल कंपनियां इस मुनाफे का इस्तेमाल आम उपभोक्ताओं को राहत देने या भविष्य के संकट से निपटने के लिए निवेश करने के बजाय, अपने शेयर होल्डर्स को डिविडेंड बांटने और खुद की जेबें भरने में कर रही हैं।


    तेल कंपनियों की सफाई: “दाम हमारे हाथ में नहीं”

    इस तीखे हमले के बाद तेल उद्योग और रिफाइनिंग संगठनों ने भी अपनी सफाई पेश की है। उद्योग से जुड़े समूहों का कहना है कि पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतें सीधे तौर पर केवल कच्चे तेल पर निर्भर नहीं करतीं। इसके पीछे कई अन्य वैश्विक कारक होते हैं, जैसे:


    रिफाइनिंग क्षमता की कमी:
    कच्चे तेल को पेट्रोल में बदलने वाली रिफाइनरियों की अपनी सीमाएं और लागतें होती हैं।

    स्थानीय टैक्स का बोझ: कैलिफोर्निया जैसे अमेरिकी राज्यों में भारी स्थानीय गैस टैक्स लागू हैं, जिसकी वजह से भी पेट्रोल की कीमतें नीचे नहीं आ पा रही हैं, जिसकी खुद ट्रंप ने भी आलोचना की है।

    अमेरिका में इस समय महंगाई और ईंधन की बढ़ती कीमतें सबसे बड़ा घरेलू मुद्दा बनी हुई हैं। महंगे डीजल के कारण खाने-पीने की चीजों की ढुलाई महंगी हो गई है, जिससे सीधे तौर पर ग्रोसरी और अन्य जरूरी सामान के दाम बढ़ रहे हैं। यही वजह है कि ट्रंप प्रशासन ने अब अपनी पुरानी ‘घरेलू तेल उत्पादन समर्थक’ छवि को थोड़ा बदलते हुए तेल कंपनियों के खिलाफ सीधे टकराव का रास्ता चुना है ताकि आम उपभोक्ताओं को तुरंत राहत पहुंचाई जा सके।

  • US: ट्रंप फेमिली को 1.6 अरब डालर की डील में हुआ बंपर मुनाफा…. वित्त मंत्री का नाम भी शामिल

    US: ट्रंप फेमिली को 1.6 अरब डालर की डील में हुआ बंपर मुनाफा…. वित्त मंत्री का नाम भी शामिल


    वाशिंगटन।
    अमेरिका (America) में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (President Donald Trump) को लेकर एक नया बवाल शुरू हो गया है। हाल ही में हुए एक बड़े खुलासे के मुताबिक, अमेरिकी सरकार ने हाल ही में एक ऐसी डील (Deel) की है जिससे ट्रंप के बेटे को अरबों का फायदा होने जा रहा है। वहीं इस प्रॉफिट वाली डील में ट्रंप के परिवार के साथ साथ अमेरिका के वित्त मंत्री हावर्ड लुटनिक (Finance Minister Howard Lutnick) का नाम भी है। ऐसे में ट्रंप प्रशासन की अमेरिका फर्स्ट की नीति को लेकर सवाल उठने शुरू हो हुए हैं।

    दरअसल यह खुलासा द न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट में हुआ है। इसके मुताबिक कजाकिस्तान (Kazakhstan) के साथ दुनिया के सबसे बड़े दुर्लभ खनिज ‘टंगस्टन’ के भंडार को विकसित करने के लिए अमेरिका ने हाल ही में 1.6 अरब डॉलर यानी करीब 13,500 करोड़ रुपये की सरकारी डील की है। इस डील से सीधे राष्ट्रपति ट्रंप के बेटों और उनके वाणिज्य मंत्री के परिवार को तगड़ा वित्तीय मुनाफा होने जा रहा है।

    बेहद अहम है ये डील
    कजाकिस्तान के साथ हुआ यह सौदा अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से बेहद अहम है। फिलहाल वैश्विक टंगस्टन बाजार पर पूरी तरह चीन का कब्जा है। चीन लगातार इस दुर्लभ खनिज के एक्सपोर्ट पर प्रतिबंध बढ़ा रहा है। बता दें कि टंगस्टन का इस्तेमाल मिसाइल वॉरहेड्स, फाइटर जेट्स, सेमीकंडक्टर्स और कई एडवांस सैन्य तकनीकों में होता है। अमेरिका इस डील के जरिए चीन पर अपनी निर्भरता खत्म करना चाहता है। हालांकि अब टंगस्टन से ज्यादा अब चर्चा उन चेहरों की हो रही है, जिनकी तिजोरियां इस सरकारी सौदे से भरने वाली हैं।

    तय हुई डील, पीछे-पीछे बेटों ने लगा दिए पैसे
    दस्तावेजों के मुताबिक, जैसे-जैसे सरकारी स्तर पर इस डील की बातचीत आगे बढ़ रही थी, ठीक उसी समय ट्रंप और उनके करीबी मंत्रियों के परिवारों की कंपनियां इस सौदे में अपनी हिस्सेदारी खरीद रही थीं। सितंबर 2025 में न्यूयॉर्क के सेंट रेजिस होटल में अमेरिकी वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक और कजाकिस्तान के राष्ट्रपति कासिम-जोमार्ट तोकायेव के बीच बैठक हुई। इसी बैठक के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप ने खुद फोन कॉल के जरिए कजाकिस्तान के राष्ट्रपति को इस प्रोजेक्ट के लिए राजी किया।

    इस बैठक के ठीक कुछ हफ्तों बाद, ‘डोमिनारी सिक्योरिटीज’ नाम की एक इन्वेस्टमेंट फर्म ने इस कजाकिस्तान माइनिंग प्रोजेक्ट से जुड़ी मुख्य कंपनी में शेयर खरीद लिए। यह कंपनी ट्रंप टावर से चलती है और इसमें डोनाल्ड ट्रंप जूनियर और एरिक ट्रंप की 20% हिस्सेदारी है। दूसरी तरफ, वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक के बेटों ब्रैंडन और काइल की एक कंपनी इन्वेस्टमेंट बैंक ‘कैंटर फिट्जगेराल्ड’ ने इस प्रोजेक्ट में निवेश के लिए 210 मिलियन डॉलर का फंड जुटाया।

    सरकारी तिजोरी से $8.9 अरब पाने की होड़
    यह कोई इकलौता मामला नहीं है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप और लुटनिक परिवारों से जुड़ी कंपनियां कम से कम 14 ऐसी माइनिंग प्रोजेक्ट्स में हित रखती हैं, जिन्हें अमेरिकी सरकार का समर्थन प्राप्त है। ये कंपनियां अमेरिकी सरकार से लगभग 8.9 अरब डॉलर की फेडरल फंडिंग, लोन या रेगुलेटरी मंजूरी पाने की रेस में सबसे आगे हैं।

    संसद में उठे सवाल, वाइट हाउस ने खारिज किए आरोप
    अमेरिकी सांसद मैक्सिन डेक्सटर ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा, “संसद को यह सुनिश्चित करना होगा कि टैक्सपेयर्स के पैसों का इस्तेमाल देश के हित में हो, न कि ट्रंप प्रशासन के करीबी लोगों और उनके परिवार के सदस्यों की जेबें भरने के लिए।” वहीं हितों के टकराव के आरोपों पर अब वाइट हाउस ने अपनी सफाई जारी की है। वाइट हाउस के प्रवक्ता कुश देसाई ने आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा, “ट्रंप प्रशासन के फैसलों के पीछे सिर्फ और सिर्फ अमेरिकी जनता का हित है। अमेरिका की क्रिटिकल सप्लाई चेन को सुरक्षित करना राष्ट्रपति ट्रंप की प्राथमिकता है।” इधर वाणिज्य विभाग ने कहा है कि मंत्री हॉवर्ड लुटनिक ने अपनी पुरानी कंपनी ‘कैंटर फिट्जगेराल्ड’ में अपनी हिस्सेदारी पहले ही बेच दी है और उनका इस लोन या फंडिंग फैसलों से कोई लेना-देना नहीं है।

  • US ने ईरान से तेल ब्रिक्री पर लगे प्रतिबंध को हटाया…. भारत को भी मिलेगा फायदा

    US ने ईरान से तेल ब्रिक्री पर लगे प्रतिबंध को हटाया…. भारत को भी मिलेगा फायदा


    तेहरान।
    अमेरिका (America) ने ईरान (Iran) के तेल सेक्टर (Oil sector) पर लगे कड़े प्रतिबंधों को अस्थायी तौर पर हटा दिया है। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग की ओर से ईरान को 60 दिनों की राहत दी गई है। इसके तहत ईरान अब 21 अगस्त तक कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों (Crude Oil and Petroleum Products) की बिक्री कर सकेगा। अमेरिका के इस कदम का असर ग्लोबल एनर्जी मार्केट के साथ-साथ भारत पर भी देखने को मिलेगा।


    ईरान को क्यों मिली यह छूट?

    17 जून को अमेरिका और ईरान के बीच 60 दिनों के लिए एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर हुए थे। यह 60 दिनों की छूट उसी समझौते का हिस्सा है। इस समझौते के तहत ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बिना किसी रोक-टोक के मुक्त आवाजाही (फ्री एंड ओपन ट्रांजिट) की अनुमति देने का वादा किया है।

    इसके अलावा, ईरान अब अपने देश में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के निरीक्षकों को भी आने की इजाजत देगा। अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने स्विट्जरलैंड में हुई इस बातचीत को ‘अच्छी प्रगति’ बताया है और इसे एक बड़ी उपलब्धि करार दिया है।


    किन देशों को तेल बेच सकेगा ईरान?

    इस फैसले के बाद ईरान दुनिया के लगभग हर देश को अपना तेल और पेट्रोलियम उत्पाद बेच सकता है। हालांकि, अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कर रहे उत्तर कोरिया, क्यूबा और क्रीमिया को ईरान तेल नहीं बेच पाएगा। इस सौदे में एक अहम बात यह भी है कि ईरान को तेल का भुगतान अमेरिकी डॉलर में किया जा सकेगा।


    क्या अमेरिका भी करेगा ईरान से तेल का आयात?

    1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से अमेरिका ने कभी भी ईरानी तेल का आयात नहीं किया है। लेकिन, अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट की ओर से जारी किए गए नए जनरल लाइसेंस के अनुसार, अगर तेल की बिक्री, डिलीवरी या ऑफलोडिंग की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए जरूरी हुआ, तो ईरानी तेल को अमेरिका में भी आयात किया जा सकता है।


    भारत के लिए इस फैसले के क्या हैं मायने?

    साल 2019 में जब अमेरिका ने ईरान पर प्रतिबंध लगाए थे, उससे पहले तक भारत ईरानी तेल का एक बहुत बड़ा खरीदार था। भारत के अलावा दक्षिण कोरिया, जापान, ग्रीस, ताइवान, इटली और तुर्की भी बड़े खरीदार थे।

    2009 के आंकड़ों पर गौर करें तो भारत के कुल कच्चे तेल के आयात में ईरान की 14 फीसदी हिस्सेदारी थी और वह भारत का दूसरा सबसे बड़ा सप्लायर था। लेकिन 2019 में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति रहते हुए जब ईरान पर फिर से कड़े प्रतिबंध लगाए गए, तब नई दिल्ली ने तेहरान से तेल खरीदना पूरी तरह से बंद कर दिया था। मौजूदा समय में दुनिया भर में तेल सप्लाई की जो किल्लत और अस्थिरता चल रही है, उसे देखते हुए अमेरिका की इस 60 दिन की छूट से भारत को बड़ा फायदा होने की उम्मीद है।

    आपको बता दें कि फिलहाल भारत रूस से रिकॉर्ड स्तर पर तेल खरीद रहा है। मार्केट एनालिटिक्स फर्म केप्लर (Kpler) के अनुसार, केवल जून महीने में भारत ने रूस से 26 लाख बैरल प्रतिदिन तेल का आयात किया है, जो इसी अवधि में भारत के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 54 प्रतिशत है।

  • US में सख्त होंगे H-1B वीजा के नियम…. रिपब्लिकन MP ने संसद में पेश किया नया Bill

    US में सख्त होंगे H-1B वीजा के नियम…. रिपब्लिकन MP ने संसद में पेश किया नया Bill


    वॉशिंगटन।
    अमेरिका (America) में एच-1बी वीजा (H-1B Visa) को लेकर बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। अमेरिकी कांग्रेस (US Congress) में रिपब्लिकन सांसद चिप रॉय (Republican Congressman Chip Roy) ने एक नया विधेयक पेश किया है, जिसमें एच-1बी वीजा प्रणाली में बड़े बदलाव की मांग की गई है। इस प्रस्ताव का सबसे बड़ा असर भारतीय पेशेवरों और छात्रों पर पड़ सकता है, क्योंकि बड़ी संख्या में भारतीय आईटी और तकनीकी क्षेत्र में इसी वीजा के जरिए अमेरिका जाते हैं। विधेयक में एच-1बी वीजा को ग्रीन कार्ड तक पहुंचने का रास्ता खत्म करने, वीजा अवधि घटाने और विदेशी छात्रों के लिए काम करने वाले ओपीटी कार्यक्रम को बंद करने जैसे बड़े प्रस्ताव शामिल हैं।


    एच-1बी वीजा को लेकर नया प्रस्ताव क्या है?

    रिपब्लिकन सांसद चिप रॉय ने अमेरिकन व्हाइट-कॉलर वर्कर जॉब्स एक्ट नाम से यह विधेयक पेश किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले करीब 40 वर्षों में एच-1बी वीजा प्रणाली का गलत इस्तेमाल हुआ है। उनके मुताबिक, अमेरिकी कंपनियां कम वेतन पर विदेशी कर्मचारियों को नौकरी देकर अमेरिकी तकनीकी कर्मचारियों को पीछे कर रही हैं। इस विधेयक में कहा गया है कि अब वीजा प्रणाली को मेरिट यानी योग्यता और ज्यादा वेतन के आधार पर चलाया जाना चाहिए। अभी एच-1बी वीजा का आवंटन लॉटरी सिस्टम के जरिए होता है।


    ग्रीन कार्ड और ओपीटी पर क्या असर पड़ेगा?

    इस विधेयक का सबसे बड़ा प्रस्ताव यह है कि एच-1बी वीजा धारकों के लिए ग्रीन कार्ड का रास्ता लगभग बंद कर दिया जाए। अभी तक एच-1बी वीजा पर काम करने वाले लोग अमेरिका में स्थायी निवास यानी ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन कर सकते थे। लेकिन नए प्रस्ताव में ड्यूल इंटेंट नीति खत्म करने की बात कही गई है। यानी वीजा धारक को यह साबित करना होगा कि वह अमेरिका में स्थायी रूप से बसने का इरादा नहीं रखता। इसके अलावा विदेशी छात्रों के लिए पढ़ाई के बाद सीमित समय तक काम करने की अनुमति देने वाले ओपीटी कार्यक्रम को भी खत्म करने का प्रस्ताव है। इसका असर हजारों भारतीय छात्रों पर पड़ सकता है।


    वीजा अवधि और फीस में क्या बदलाव होंगे?

    प्रस्तावित कानून के तहत एच-1बी वीजा की अधिकतम अवधि छह साल से घटाकर सिर्फ दो साल करने की बात कही गई है। साथ ही अब लॉटरी सिस्टम की जगह ज्यादा वेतन देने वाली कंपनियों को प्राथमिकता दी जा सकती है। ट्रंप प्रशासन पहले ही कानूनी माइग्रेशन कार्यक्रमों पर सख्ती बढ़ा चुका है। नई एच-1बी याचिकाओं पर एक लाख डॉलर तक की फीस लगाने और सख्त नियम लागू करने की दिशा में कदम उठाए जा चुके हैं। इस विधेयक को अमेरिकी टेक वर्कर्स और इमिग्रेशन से जुड़े कुछ संगठनों का समर्थन भी मिला है।


    भारतीय पेशेवरों और छात्रों पर क्या असर होगा?

    भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां से सबसे ज्यादा लोग एच-1बी वीजा पर अमेरिका जाते हैं। आईटी, इंजीनियरिंग और तकनीकी क्षेत्र में काम करने वाले हजारों भारतीय पेशेवर और छात्र इस प्रणाली पर निर्भर हैं। अगर यह विधेयक आगे बढ़ता है तो भारतीय युवाओं के लिए अमेरिका में नौकरी और स्थायी बसने का रास्ता मुश्किल हो सकता है। हालांकि यह अभी सिर्फ प्रस्तावित कानून है और इसे लागू होने के लिए अमेरिकी कांग्रेस की कई प्रक्रियाओं से गुजरना होगा। फिर भी इस प्रस्ताव ने भारतीय छात्रों और आईटी सेक्टर में चिंता बढ़ा दी है।

  • भारत सहित 54 देशों पर नया टैरिफ लगाने की तैयारी में अमेरिका…. USTR ने रखा प्रस्ताव

    भारत सहित 54 देशों पर नया टैरिफ लगाने की तैयारी में अमेरिका…. USTR ने रखा प्रस्ताव


    नई दिल्ली।
    भारत और अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल (India and US Delegation) द्विपक्षीय व्यापार वार्ता (Bilateral Trade talks) को अंतिम रूप देने की कोशिशों में जुटा है। इसी बीच अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (US Trade Representative- USTR) ने बंधुआ मजदूरी से निर्मित वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध लागू न करने के आरोप में भारत सहित 54 देशों पर 12.5% अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रस्ताव रखा है। यह प्रस्ताव उन जांच के बाद सामने आया है, जो अमेरिका ने 60 देशों के खिलाफ इस आधार पर शुरू की थीं कि वे बंधुआ मजदूरी से बनी वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध लगाने और उसे प्रभावी ढंग से लागू करने में असफल रहे हैं। इस प्रस्ताव की टाइमिंग काफी अहम है क्योंकि इस वक्त नई दिल्ली में दोनों देशों के बीच व्यापार सौदे को अंतिम रूप दिया जा रहा है। इस लिहाज से इसे एक झटका माना जा रहा है।

    अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTS) जैमीसन ग्रीर ने एक बयान में कहा, ”हमारे सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदारों द्वारा बंधुआ मजदूरी से निर्मित वस्तुओं के आयात पर रोक लगाने में विफल रहना अस्वीकार्य है। इससे ऐसी स्थिति पैदा होती है, जिसमें अमेरिकी श्रमिकों को वैश्विक स्तर पर असमान प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है।” उन्होंने कहा, ”हम अब इस असमानता को बर्दाश्त नहीं करेंगे और इसका उल्लंघन करने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाएंगे” यह प्रस्ताव 1974 के अमेरिकी व्यापार अधिनियम की धारा 301 के तहत की गई 60 जांचों में से एक के बाद आया है।


    क्या है USTR की धारा 301?

    USTR (यूनाइटेड स्टेट्स ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव) की धारा 301 अमेरिकी व्यापार अधिनियम 1974 का एक प्रमुख प्रावधान है। यह अमेरिका को व्यापारिक साझेदार देशों की अनुचित व्यापार नीतियों या वबां प्रचलित परंपराओं की जांच करने और अमेरिकी हितों की रक्षा के लिए आयात शुल्क या व्यापार प्रतिबंध लगाने का अधिकार देता है। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि क्या वे उपाय अनुचित या भेदभावपूर्ण हैं, या क्या वे US के व्यापार और वाणिज्यिक हितों पर कोई बेवजह बोझ तो नहीं डालते हैं।


    सुधारात्मक कार्रवाई करने की अनुमति

    अगर जाँच में यह पाया जाता है कि किसी देश ने द्विपक्षीय व्यापार के लिए ऐसे तौर-तरीके अपनाए हैं, जिन्हें अमेरिकी व्यापार के लिए हानिकारक मानता है, तो धारा-301 के प्रावधान US प्रशासन को उस मामले में सुधारात्मक कार्रवाई करने की अनुमति देता है। इन उपायों में ऊँचे टैरिफ लगाना, व्यापार पर प्रतिबंध लगाना या अन्य ऐसे उपाय शामिल हो सकते हैं जिनका उद्देश्य जाँच के दौरान सामने आई चिंताओं को दूर करना होता है।

    बंधुआ मजदूरी वाले आरोप पर भारत का क्या जवाब?
    भारत ने बंधुआ मजदूरी संबंधी आरोपों को खारिज करते हुए अमेरिका से इन जांचों को समाप्त करने की मांग की है। भारत का कहना है कि ऐसे मुद्दों का समाधान दोनों देशों के बीच चल रही व्यापार वार्ताओं के ढांचे के भीतर किया जाना चाहिए। वाणिज्य मंत्रालय ने कहा, ”भारत धारा-301 कार्यवाही के मामले में अमेरिका के साथ संपर्क में है। साथ ही भारत दो फरवरी 2026 को घोषित समझौते के ढांचे और सात फरवरी 2026 को जारी संयुक्त बयान के अनुरूप अमेरिका के साथ समझौते को अंतिम रूप देने के लिए भी बातचीत कर रहा है।”


    सार्वजनिक सुनवाई सात जुलाई 2026 को

    इसमें कहा गया कि धारा-232 (क्षेत्रीय) शुल्क के तहत आने वाले उत्पादों और कुछ अन्य वस्तुओं को इन प्रस्तावित शुल्कों से बाहर रखा गया है। कपड़ा एवं परिधान उत्पादों के लिए एक विशेष प्रणाली प्रस्तावित की गई है, जिसके तहत चयनित देशों से एक निश्चित मात्रा में आयात को अमेरिका में कम शुल्क दरों पर प्रवेश की अनुमति मिल सकती है। वाणिज्य मंत्रालय ने कहा, ”रिपोर्ट के अनुसार, प्रस्तावित शुल्क अभी अंतिम नहीं हैं और हितधारक 22 जून 2026 तक सार्वजनिक सुनवाई में भाग लेने के लिए आवेदन कर सकते हैं। लिखित टिप्पणियां छह जुलाई 2026 तक प्रस्तुत की जा सकती हैं।” सार्वजनिक सुनवाई सात जुलाई 2026 को होगी।

    उधऱ, ग्रीर ने कहा कि कुछ व्यापारिक साझेदारों ने बंधुआ मजदूरी से बनी वस्तुओं के आयात को रोकने के लिए शुरुआती कदम उठाए हैं। इनमें अमेरिका, मेक्सिको-कनाडा के बीच समझौते (यूएसएमसीए) और पारस्परिक व्यापार समझौतों के तहत जतायी गयी प्रतिबद्धताएं शामिल हैं।हालांकि, उन्होंने कहा कि ”प्रत्येक व्यापारिक साझेदार को यह सुनिश्चित करने के लिए और अधिक प्रयास करने होंगे कि वैश्विक व्यापार बंधुआ मजदूरी को बढ़ावा न दे और उसे स्थायी न बनाए।” अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि ने एक बयान में कहा कि भारत, चीन, जापान, ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और सऊदी अरब सहित 54 देशों ने बंधुआ मजदूरी से बनी वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध लगाने और उसे प्रभावी ढंग से लागू करने में विफलता दिखाई है।

  • US: ट्रंप को बड़ा झटका…. संसद में ईरान युद्ध रोकने का प्रस्ताव मंजूर

    US: ट्रंप को बड़ा झटका…. संसद में ईरान युद्ध रोकने का प्रस्ताव मंजूर


    नई दिल्ली।
    अमेरिका और ईरान (America and Iran) में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) को अपनी ही संसद (Parliament) में बड़े झटके का सामना करना पड़ा है. अमेरिकी संसद (American Parliament) के निचले सदन ‘हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स’ ने ईरान के खिलाफ युद्ध रोकने के एक प्रस्ताव को अपनी मंजूरी दे दी है।

    डेमोक्रेटिक पार्टी के नेतृत्व में लाए गए इस प्रस्ताव का मकसद बिना संसद (कांग्रेस) की अनुमति के ईरान के खिलाफ किसी भी तरह के युद्ध पर रोक लगाना था. इस दौरान वोटिंग से साफ हो गया है कि ईरान के साथ युद्ध की आशंका को लेकर अमेरिकी सांसदों में चिंता काफी बढ़ गई है. खास बात ये है कि राष्ट्रपति ट्रंप की अपनी पार्टी यानी रिपब्लिकन पार्टी के सांसदों ने भी ईरान जंग पर पाला बदल लिया।


    7 वोटों से पास हुआ प्रस्ताव

    सदन में ‘वॉर पावर्स रिजॉल्यूशन’ पर कड़ा मुकाबला देखने को मिला. प्रस्ताव के पक्ष में 215 वोट पड़े, जबकि इसके विरोध में 208 सांसदों ने मतदान किया. हालांकि दोनों सदनों में ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के पास मामूली बहुमत है, लेकिन इसके बावजूद ट्रंप इस प्रस्ताव को रोकने में नाकाम रहे. इस वोटिंग के दौरान रिपब्लिकन पार्टी के चार सांसदों ने अपनी ही पार्टी के रुख के खिलाफ जाकर डेमोक्रेट्स के पक्ष में वोट डाला. कांग्रेस में ट्रंप के लिए ये किसी बड़े झटके से कम नहीं है।


    अब ट्रंप के पास क्या विकल्प?

    संसद के जानकारों का कहना है कि ये वोटिंग फिलहाल काफी हद तक प्रतीकात्मक है. इस प्रस्ताव को कानूनी रूप से प्रभावी बनाने के लिए अभी इसे अमेरिकी संसद के ऊपरी सदन ‘सीनेट’ से भी पास कराना होगा. इसके बाद, अगर ट्रंप इस प्रस्ताव पर वीटो लगा देते हैं, तो उस वीटो को बेअसर करने के लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होगी, जो कि बहुत मुश्किल है।

    हालांकि, ये फैसला काफी अहम माना जा रहा है, क्योंकि संसद में युद्ध के अधिकारों को सीमित करने वाले तीन प्रस्ताव पेश किए गए थे. लेकिन वो बेहद कम अंतर से नाकाम हो गए थे. इसके अलावा, पिछले महीने अमेरिकी सीनेट ने भी एक प्रक्रियात्मक वोटिंग के दौरान इसी तरह के एक प्रस्ताव को आगे बढ़ाया था. सीनेट में भी ये सात बार की नाकाम कोशिशों के बाद कामयाब हुई थी।