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  • US में थम नहीं रही गोलीबारी की घटनाएं, आयोवा राज्य के मुस्काटीन शहर में फायरिंग में 7 लोगों की मौत

    US में थम नहीं रही गोलीबारी की घटनाएं, आयोवा राज्य के मुस्काटीन शहर में फायरिंग में 7 लोगों की मौत


    वाशिंगटन।
    अमेरिका (America) का आयोवा राज्य (Iowa State) सोमवार (स्थानीय समयानुसार) को गोलियों की आवाज से दहल उठा। यहां के एक शहर में कई जगहों पर हुई गोलीबारी की घटनाओं में कम से कम 7 लोगों की मौत होने की खबर सामने आई है। जानकारी के मुताबिक संदिग्ध आरोपी ने पहले 6 लोगों की गोली मारकर हत्या की और फिर पुलिस के सामने खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली। पुलिस ने कहा है कि शुरुआती जांच से यह मामला पारिवारिक विवाद (Family dispute) का लगता है।

    रिपोर्ट के मुताबिक दिल दहला देने वाली यह घटना आयोवा के मुस्काटीन शहर (Muscatine City) में हुई। यहां हमलावर ने दो घरों और एक दुकान में घुसकर ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। मुस्काटीन पुलिस प्रमुख एंथनी कीस ने बताया कि दोपहर करीब 12 बजे पुलिस को गोलीबारी की सूचना मिली। हालांकि जब तक पुलिस वहां पहुंची तब तक लोगों की मौत हो चुकी थी। घटनास्थल से चार लोगों के शव बरामद हुए।

    वहीं पुलिस के पहुंचने से पहले ही आरोपी घटनास्थल से फरार हो चुका था। पुलिस के मुताबिक संदिग्ध की पहचान 52 वर्षीय रयान विलिस मैकफारलैंड के रूप में हुई है। पुलिस ने तलाशी अभियान शुरू कर उसे खोज निकाला। हालांकि जैसे ही अधिकारी उसे पकड़ने वाले थे, उसने खुद को गोली मार ली। पुलिस प्रमुख कीस ने बताया, “अधिकारियों और डॉक्टर्स की टीम ने उसे बचाने की कोशिश की, लेकिन मौके पर ही उसकी मौत हो गई।”

    वहीं जांच के दौरान पुलिस को कुछ और जगहों पर भी गोलीबारी की सूचना मिली। इसके बाद एक अन्य घर और पास के एक दुकान से दो और लोगों के शव बरामद किए गए। सबकी मौत गोली लगने की वजह से ही हुई। मुस्काटीन पुलिस ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा, “प्रारंभिक जांच से संकेत मिलता है कि यह गोलीबारी घरेलू विवाद का नतीजा थी। सभी पीड़ितों के आरोपी के परिवार का सदस्य होने की आशंका है।”

  • फिजी में QUAD का बड़ा दांव: बंदरगाह प्रोजेक्ट से इंडो-पैसिफिक में चीन को चुनौती, भारत की भूमिका अहम

    फिजी में QUAD का बड़ा दांव: बंदरगाह प्रोजेक्ट से इंडो-पैसिफिक में चीन को चुनौती, भारत की भूमिका अहम




    नई दिल्ली। ऑस्ट्रेलिया, भारत, जापान और अमेरिका (QUAD) ने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी रणनीतिक मौजूदगी बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। चारों देशों ने फिजी में मिलकर एक आधुनिक बंदरगाह विकसित करने पर सहमति जताई है। इसे क्वाड के इतिहास में पहली बार ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट माना जा रहा है, जो सीधे तौर पर क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा और रणनीतिक संतुलन से जुड़ा है।

    फिजी, जो प्रशांत महासागर के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में स्थित द्वीप राष्ट्र है, लंबे समय से इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियों का केंद्र बनता जा रहा था। अब क्वाड देशों की यह पहल चीन के प्रभाव को संतुलित करने की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है।

    फिजी में बंदरगाह क्यों अहम?
    फिजी भौगोलिक रूप से ऑस्ट्रेलिया के पूर्व और हवाई के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। यह प्रशांत महासागर के प्रमुख समुद्री मार्गों के बीच आता है। इस कारण यह क्षेत्र रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

    पिछले कुछ वर्षों में चीन ने छोटे द्वीपीय देशों में निवेश और कर्ज के जरिए अपनी पकड़ मजबूत की है। कई जगहों पर बंदरगाह और बुनियादी ढांचे के विकास के पीछे चीन की रणनीतिक उपस्थिति को लेकर भी चिंता जताई जाती रही है। इसी पृष्ठभूमि में क्वाड का यह कदम देखा जा रहा है।

    भारत के लिए क्या है महत्व?
    फिजी में लगभग 37% आबादी भारतीय मूल की है, जिन्हें “गिरमिटिया” समुदाय के वंशज माना जाता है। भारत और फिजी के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध बहुत मजबूत हैं।

    इस प्रोजेक्ट में भारत की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। भारत अपने समुद्री अनुभव, बंदरगाह विकास विशेषज्ञता और तकनीकी सहयोग के जरिए इस परियोजना में योगदान देगा। इसके अलावा भारत के Information Fusion Centre-IOR (गुरुग्राम) के माध्यम से समुद्री गतिविधियों की निगरानी में भी सहयोग संभव है।

    QUAD की नई रणनीति
    इस प्रोजेक्ट के साथ QUAD ने “Indo-Pacific Maritime Surveillance Cooperation” की भी शुरुआत की है, जिसके तहत समुद्री क्षेत्र में रीयल टाइम डेटा साझा किया जाएगा। इसका उद्देश्य अवैध मछली पकड़ने, संदिग्ध जहाजों और समुद्री सुरक्षा चुनौतियों पर नजर रखना है।

    साथ ही “Quad-at-Sea” नाम से एक संयुक्त अभ्यास योजना भी प्रस्तावित है, जिसमें चारों देशों की कोस्ट गार्ड एक साथ समुद्री अभ्यास करेंगे।

    चीन की चिंता क्यों बढ़ी?
    विशेषज्ञों के मुताबिक, यह पहली बार है जब QUAD ने केवल बयानबाजी से आगे बढ़कर किसी तीसरे देश में संयुक्त इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट शुरू करने का फैसला किया है। इससे चीन की “स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स” रणनीति को सीधी चुनौती मिल सकती है।

    चीन पहले से ही सोलोमन आइलैंड्स जैसे देशों में सुरक्षा समझौतों के जरिए अपनी उपस्थिति बढ़ा चुका है। ऐसे में फिजी में क्वाड की सक्रियता को बीजिंग एक रणनीतिक दबाव के रूप में देख सकता हैफिजी में प्रस्तावित यह बंदरगाह परियोजना केवल एक विकासात्मक कदम नहीं, बल्कि इंडो-पैसिफिक में शक्ति संतुलन बदलने की दिशा में बड़ा भू-राजनीतिक संकेत है। भारत समेत QUAD देशों की यह साझेदारी आने वाले समय में समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय कूटनीति में नई दिशा तय कर सकती है।

  • नेपाल में अमेरिका की बढ़ती सक्रियता, चीन की बढ़ी चिंता क्या बन रहा नया भू-राजनीतिक मोर्चा?

    नेपाल में अमेरिका की बढ़ती सक्रियता, चीन की बढ़ी चिंता क्या बन रहा नया भू-राजनीतिक मोर्चा?




    नई दिल्ली। नेपाल में हाल के राजनीतिक बदलावों के बाद United States की सक्रियता तेजी से बढ़ती दिख रही है। अमेरिका के वरिष्ठ अधिकारियों के लगातार दौरे और कूटनीतिक संपर्कों ने क्षेत्रीय राजनीति को नया मोड़ दे दिया है। खासकर चीन और भारत के बीच स्थित नेपाल अब बड़ी भू-रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बनता जा रहा है।

    रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका की अंडर सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर पब्लिक डिप्लोमेसी सराह बी. रोजर्स के नेपाल दौरे की तैयारी ने इस गतिविधि को और तेज कर दिया है। इससे पहले भी कई वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी काठमांडू का दौरा कर चुके हैं। इस बढ़ती कूटनीतिक हलचल को लेकर China ने भी सतर्क रुख अपनाया है और अपनी रणनीतिक निगरानी बढ़ा दी है।

    विश्लेषकों का मानना है कि नेपाल में बढ़ती अमेरिकी रुचि का एक कारण क्षेत्रीय प्रभाव और सुरक्षा रणनीति हो सकता है। वहीं चीन का फोकस तिब्बती मुद्दों और अपने क्षेत्रीय हितों की सुरक्षा पर है। इसी वजह से नेपाल में दोनों देशों की गतिविधियां बढ़ती जा रही हैं।

    नेपाल सरकार फिलहाल सभी पक्षों के साथ संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रही है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में यह देश अमेरिका और चीन के बीच कूटनीतिक प्रतिस्पर्धा का अहम केंद्र बन सकता है।

  • US में हजारों H-1B वीजा धारक मुश्किल में…. 60 दिन में दूसरी नौकरी नहीं मिली तो छोड़ना पड़ेगा अमेरिका

    US में हजारों H-1B वीजा धारक मुश्किल में…. 60 दिन में दूसरी नौकरी नहीं मिली तो छोड़ना पड़ेगा अमेरिका


    वॉशिंगटन।
    अमेरिका (America) की दिग्गज टेक कंपनियों मेटा (Meta), अमेज़न (Amazon) और ओरेकल (Oracle) में हाल ही में बड़े पैमाने पर हुई छंटनी ने हजारों भारतीय टेक पेशेवरों (Indian Tech Professionals) को मुश्किल में डाल दिया है। नौकरी जाने के बाद अब H-1B वीज़ा धारक भारतीयों (H-1B Visa holding Indians.) के सामने केवल 60 दिनों का समय बचा है। इसी दौरान उन्हें नई नौकरी खोजनी होगी वरना उन्हें अमेरिका छोड़ना पड़ सकता है। दरअसल, अमेरिकी इमिग्रेशन नियमों के अनुसार, H-1B वीजा पर काम कर रहे किसी विदेशी कर्मचारी की नौकरी जाने के बाद उसे 60 दिनों का “ग्रेस पीरियड” मिलता है। इस दौरान अगर उसे कोई नया नियोक्ता नहीं मिलता जो उसके वीज़ा को स्पॉन्सर करे, तो उसे अमेरिका छोड़ना पड़ सकता है।

    अब इस संकट की वजह से वर्षों से अमेरिका में बसे कई भारतीय परिवारों के लिए स्थिति बेहद तनावपूर्ण हो गई है। उनके सामने अब नौकरी ढूंढ़ने से लेकर अपना घर बचाने, बच्चों की शिक्षा और अमेरिका में रहने के अधिकार पर भी खतरा मंडरा रहा है। कई भारतीयों के लिए, जिन्होंने वहाँ अपनी ज़िंदगी बनाने में सालों बिताए हैं, यह स्थिति बहुत भारी टेंशन लेकर आया है।


    अतिरिक्त कागजात की माँग

    इस बीच, कई छंटनीशुदा कर्मचारी अब कथित तौर पर अस्थायी रूप से B-2 विजिटर वीजा पर जाने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे उन्हें अमेरिका में छह महीने तक रहने की अनुमति मिल सकती है। लेकिन इमिग्रेशन विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका में मौजूदा इमिग्रेशन माहौल को देखते हुए, यह रास्ता भी अब और ज़्यादा मुश्किल होता जा रहा है। इकॉनमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इमिग्रेशन अधिकारी अब B-2 विजिटर वीजा ची चाहत रखने वालों से अतिरिक्त कागज़ात की माँग कर रहे हैं और छंटनीशुदा H-1B कर्मचारियों के वीज़ा आवेदन ज़्यादा संख्या में खारिज कर रहे हैं।


    भारतीयों पर सबसे बड़ा असर

    अमेरिका स्थित इमिग्रेशन वकील राजीव खन्ना के मुताबिक, हाल के महीनों में B-1/B-2 स्टेटस परिवर्तन से जुड़े मामलों में अतिरिक्त दस्तावेजों की मांग और अस्वीकृति नोटिस तेजी से बढ़े हैं। उन्होंने कहा कि उनके करियर में पहली बार इतनी बड़ी संख्या में ऐसे मामले सामने आ रहे हैं। H-1B वीजा कार्यक्रम में भारतीयों की भागीदारी सबसे अधिक है। आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025 में मंजूर की गई 4,06,348 H-1B याचिकाओं में से 2,83,772 केवल भारतीयों की थीं। 2026 में अब तक 144 टेक कंपनियों में 1,10,000 से अधिक कर्मचारी अपनी नौकरी खो चुके हैं, जिनमें बड़ी संख्या भारतीयों की है।

    मुश्किलें और बढ़ती चुनौतियां
    पारिवारिक और आर्थिक संकट: कई भारतीय पिछले एक दशक से अमेरिका में रह रहे हैं और ग्रीन कार्ड के लंबे इंतजार (backlog) में फंसे हैं। उनके बच्चे वहां पैदा हुए हैं और उनके ऊपर होम लोन जैसी बड़ी वित्तीय जिम्मेदारियां हैं।

    वीजा नियमों में सख्ती: समय बढ़ाने के लिए कई कर्मचारी अस्थायी रूप से B-2 (विजिटर) वीजा में स्विच करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अब प्रशासन इसमें भी अधिक कागजी कार्रवाई और ‘सबूतों की मांग’ (RFE) कर रहा है।


    विकल्प की तलाश

    इमिग्रेशन विशेषज्ञों का कहना है कि अब वीजा मंजूरी मिलना पहले से कहीं अधिक कठिन हो गया है। ऐसे में अब नए विकल्पों की तलाश हो रही है। कई भारतीय अब कनाडा और यूरोप को एक विकल्प के रूप में देख रहे हैं। इसके अलावा, कुछ लोग F-1 (छात्र वीजा) या O-1 (असाधारण क्षमता वाले व्यक्तियों के लिए वीजा) जैसे अन्य मार्गों पर भी विचार कर रहे हैं। बता दें कि मेटा जैसी कंपनियां अब अपनी संरचना को ‘फ्लैट’ करने और AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) पर ध्यान केंद्रित करने के लिए छंटनी का सहारा ले रही हैं, जिससे आने वाले दिनों में टेक सेक्टर में काम करने वाले भारतीयों की चिंताएं और बढ़ सकती हैं।

  • US: कोर्ट ने फिर दिया ट्रंप को बड़ा झटका….. 10% टैरिफ को बताया अवैध

    US: कोर्ट ने फिर दिया ट्रंप को बड़ा झटका….. 10% टैरिफ को बताया अवैध


    वाशिंगटन।
    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) को अमेरिकी अदालत (American Court) में एक बार फिर हार का सामना करना पड़ा है। गुरुवार को अमेरिकी व्यापार अदालत ने राष्ट्रपति द्वारा लगाए गए 10% वैश्विक आयात शुल्क (10% Global Import Duty) को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि 1970 के दशक के व्यापार कानून का हवाला देकर लगाए गए ये शुल्क तर्कसंगत नहीं हैं। आपको बता दें कि ट्रंप प्रशासन ने 24 फरवरी को दुनिया भर से आने वाले सामानों पर 10% का नया आयात शुल्क लागू किया था। इसके खिलाफ 24 राज्यों और कई छोटे व्यापारियों ने मुकदमा दायर किया था।

    राज्यों का तर्क था कि ट्रंप ने यह कदम सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले से बचने के लिए उठाया है, जिसने 2025 में लगाए गए उनके पिछले भारी-भरकम टैरिफ को असंवैधानिक बताकर रद्द कर दिया था। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार अदालत ने 2-1 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए कहा कि राष्ट्रपति ने 1974 के व्यापार कानून की धारा 122 का गलत इस्तेमाल किया है।


    क्या है धारा 122?

    यह कानून राष्ट्रपति को केवल तब शुल्क लगाने की अनुमति देता है जब देश गंभीर भुगतान संतुलन घाटे का सामना कर रहा हो या डॉलर की कीमत में भारी गिरावट रोकने की जरूरत हो। अदालत ने सरकार को आदेश दिया है कि वह 5 दिनों के भीतर इस फैसले का पालन करे और उन आयातकों को पैसे वापस करे जिन्होंने यह टैक्स भरा था।


    इन क्षेत्रों पर असर नहीं

    ध्यान देने वाली बात यह है कि स्टील, एल्युमीनियम और ऑटोमोबाइल सेक्टर पर लगे टैरिफ फिलहाल जारी रहेंगे, क्योंकि वे इस कानूनी चुनौती या सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसले के दायरे में नहीं आते हैं।


    सरकार की दलील?

    ट्रंप प्रशासन ने इन शुल्कों का बचाव करते हुए कहा था कि अमेरिका का वार्षिक व्यापार घाटा 1.2 ट्रिलियन ड़लर तक पहुंच गया है और चालू खाता घाटा जीडीपी का 4% है। हालांकि अर्थशास्त्रियों और विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका किसी भुगतान संतुलन संकट से नहीं जूझ रहा है, इसलिए इन शुल्कों का कोई कानूनी आधार नहीं था।


    आगे क्या होगा?

    अमेरिकी न्याय विभाग इस फैसले को यूएस कोर्ट ऑफ अपील्स में चुनौती दे सकता है। वर्तमान में लगाए गए ये 10% वैश्विक टैरिफ 24 जुलाई को समाप्त होने वाले थे, लेकिन इस अदालती फैसले ने प्रशासन की व्यापारिक रणनीति को समय से पहले ही संकट में डाल दिया है।

  • ऑपरेशन ‘एपिक फ्यूरी’ के बाद अमेरिका का बड़ा वार, ईरान की मदद करने पर चीनी कंपनियों पर लगाए सख्त प्रतिबंध

    ऑपरेशन ‘एपिक फ्यूरी’ के बाद अमेरिका का बड़ा वार, ईरान की मदद करने पर चीनी कंपनियों पर लगाए सख्त प्रतिबंध



    नई दिल्ली। ऑपरेशन ‘एपिक फ्यूरी’ के बाद अमेरिका ने ईरान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव और बढ़ा दिया है, जिसके तहत ईरान को तकनीकी और सैन्य सहायता देने के आरोप में तीन चीनी कंपनियों पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए हैं। वॉशिंगटन का कहना है कि इन कंपनियों ने सैटेलाइट इमेजरी और डेटा उपलब्ध कराकर मध्य पूर्व में अमेरिकी और सहयोगी सैन्य ठिकानों की सुरक्षा को खतरे में डाला।

    अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार प्रतिबंधित कंपनियों में चीन की हैंगझोउ स्थित “मीएन्ट्रॉपी टेक्नोलॉजी (जिसे मिजारविजन भी कहा जाता है)”, बीजिंग की “द अर्थ आई” और “चांग गुआंग सैटेलाइट टेक्नोलॉजी कंपनी” शामिल हैं। अमेरिका का दावा है कि इन कंपनियों ने या तो ओपन-सोर्स सैटेलाइट तस्वीरें जारी कीं या सीधे ईरान को संवेदनशील सैन्य लोकेशन की इमेजरी उपलब्ध कराई।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन सैटेलाइट तस्वीरों का इस्तेमाल कथित तौर पर मध्य पूर्व में अमेरिकी सेना और उसके सहयोगी ठिकानों की गतिविधियों पर नजर रखने और संभावित हमलों की योजना बनाने में किया गया। हालांकि चीन और संबंधित कंपनियों की ओर से इन आरोपों पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है।

    अमेरिका ने यह भी दावा किया है कि इनमें से एक कंपनी पर पहले भी प्रतिबंध लगाए जा चुके हैं, क्योंकि उस पर यमन में हूती विद्रोहियों को अमेरिकी सैन्य ठिकानों की जानकारी देने का आरोप था।

    इसके साथ ही अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने ईरान, चीन, बेलारूस और यूएई से जुड़े 10 व्यक्तियों और संस्थाओं पर भी कार्रवाई की है, जिन पर ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रमों के लिए तकनीक और कच्चा माल उपलब्ध कराने का आरोप है।

    वॉशिंगटन ने साफ किया है कि वह ईरान के सैन्य और परमाणु नेटवर्क को फिर से मजबूत होने से रोकने के लिए ऐसे प्रतिबंधों को आगे भी जारी रखेगा और अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन करने वाली किसी भी संस्था पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।

  • पाकिस्तान पर ईरानी विमान छिपाने के आरोप से मचा अंतरराष्ट्रीय विवाद, अमेरिका रिपोर्ट से बढ़ा तनाव, इस्लामाबाद ने किया खंडन

    पाकिस्तान पर ईरानी विमान छिपाने के आरोप से मचा अंतरराष्ट्रीय विवाद, अमेरिका रिपोर्ट से बढ़ा तनाव, इस्लामाबाद ने किया खंडन



    नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव और सीजफायर से जुड़े हालात के बीच पाकिस्तान को लेकर एक नई अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट सामने आने के बाद विवाद बढ़ गया है। CBS न्यूज की रिपोर्ट में दावा किया गया कि ईरान के कुछ सैन्य विमान सीजफायर के बाद पाकिस्तान के रावलपिंडी स्थित नूर खान एयरबेस पर पहुंचे थे, जिनमें खुफिया और निगरानी से जुड़े विमान भी शामिल बताए गए। हालांकि इन दावों की किसी भी स्वतंत्र स्रोत से पुष्टि नहीं हुई है।

    रिपोर्ट सामने आने के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की भूमिका को लेकर सवाल उठे, लेकिन पाकिस्तान ने इन सभी आरोपों को सख्ती से खारिज कर दिया है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने कहा कि नूर खान एयरबेस पर ईरानी विमानों को “छिपाने” या “संरक्षण देने” जैसे दावे पूरी तरह भ्रामक और तथ्यहीन हैं।

    पाकिस्तान की ओर से जारी बयान में कहा गया कि सीजफायर के बाद क्षेत्रीय शांति प्रयासों के तहत कुछ बातचीत और कूटनीतिक गतिविधियां जरूर हुईं, लेकिन इसका किसी तरह के सैन्य विमान छिपाने या विशेष अनुमति से कोई संबंध नहीं है। मंत्रालय ने इसे “सनसनी फैलाने वाली और अटकलों पर आधारित रिपोर्ट” बताया।

    पाकिस्तान ने यह भी कहा कि वह इस पूरे मामले में एक जिम्मेदार और निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है और सभी पक्षों के साथ पारदर्शी संवाद बनाए हुए है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, क्षेत्रीय स्थिरता को कमजोर करने के लिए इस तरह की अपुष्ट खबरें फैलाई जा रही हैं।

    इस पूरे मामले में अब तक किसी भी स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय संस्था या सरकार की ओर से इन दावों की पुष्टि नहीं की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा अमेरिका-ईरान तनाव के बीच सूचना युद्ध और राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है, जिससे अपुष्ट खबरें तेजी से फैल रही हैं।

    फिलहाल यह मामला मीडिया रिपोर्ट्स, राजनीतिक प्रतिक्रियाओं और कूटनीतिक खंडनों के बीच उलझा हुआ है और इसकी वास्तविक सच्चाई को लेकर स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है।

  • तेल संकट के बीच ईरान का बड़ा बयान: अमेरिका-इजरायल पर आरोप, भारत समेत दुनिया पर असर

    तेल संकट के बीच ईरान का बड़ा बयान: अमेरिका-इजरायल पर आरोप, भारत समेत दुनिया पर असर



    नई दिल्ली। ईरान ने पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और युद्ध जैसी स्थिति के बीच वैश्विक सप्लाई चेन और तेल संकट पर गंभीर चिंता जताई है, जिसका असर भारत सहित कई देशों पर पड़ रहा है। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बकाई ने कहा कि इस स्थिति से ईरान “खुश नहीं” है, लेकिन इसके लिए सीधे तौर पर अमेरिका और इजरायल को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, जिन्होंने क्षेत्र में तनाव को बढ़ाया है।

    बकाई के अनुसार, पश्चिम एशिया में मौजूदा संकट की जड़ में अमेरिका और इजरायल की नीतियां हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करते हुए खाड़ी क्षेत्र के देशों की जमीन का इस्तेमाल सैन्य गतिविधियों के लिए किया। उन्होंने कहा कि ईरान को अपनी सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए जवाबी कदम उठाने पड़े, जो अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत उचित हैं।

    उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ईरान को इस संघर्ष के कारण भारत या किसी अन्य देश को होने वाले आर्थिक नुकसान पर कोई खुशी नहीं है। उनके मुताबिक, ईरान एक तटीय देश होने के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य पर काफी निर्भर है और वह इस क्षेत्र में शांति और सुरक्षा चाहता है।

    तेल और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़ा यह संकट वैश्विक स्तर पर असर डाल रहा है, जिससे सप्लाई चेन बाधित हुई है और कई देशों में तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ गया है। भारत जैसे देश, जो ऊर्जा आयात पर निर्भर हैं, इस स्थिति से सीधे प्रभावित हो रहे हैं।

    ईरानी प्रवक्ता ने यह भी संकेत दिया कि होर्मुज स्ट्रेट जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा सभी देशों के हित में है और इसे खुला और स्थिर बनाए रखना जरूरी है। उन्होंने कहा कि संघर्ष का समाधान बातचीत और कूटनीति से ही संभव है, न कि सैन्य टकराव से।

    फिलहाल यह संकट अंतरराष्ट्रीय राजनीति और ऊर्जा सुरक्षा के बीच गहरे तनाव को दर्शा रहा है, जिसका असर आने वाले समय में वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी देखने को मिल सकता है।

  • ईरान के यूरेनियम भंडार पर US की नजर…. ट्रंप बोले- उसके पास गए तो उड़ा दिए जाओगे

    ईरान के यूरेनियम भंडार पर US की नजर…. ट्रंप बोले- उसके पास गए तो उड़ा दिए जाओगे


    वाशिंगटन।
    राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने रविवार को कहा कि अमेरिका (America) ईरान (Iran) के संवर्धित यूरेनियम भंडार (Enriched Uranium Reserves) पर सख्त नजर रखे हुए है। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा कि यदि कोई भी उस स्थान के पास पहुंचने की कोशिश करता है तो वाशिंगटन को तुरंत पता चल जाएगा और उसे उड़ा दिया जाएगा। ट्रंप ने कहा कि हमें वो किसी न किसी समय मिल ही जाएगा… हम उस पर नजर रख रहे हैं। मैंने ‘स्पेस फोर्स’ नाम की एक संस्था बनाई है और वे उस पर नजर रख रहे हैं। अगर कोई भी उस जगह के पास पहुंचा, तो हमें पता चल जाएगा और हम उसे उड़ा देंगे।

    शैरिल एटकिंसन के साथ बात करते हुए ट्रंप ने कहा कि हमें वो किसी न किसी समय मिल ही जाएगा… हम उस पर नजर रख रहे हैं। मैंने ‘स्पेस फोर्स’ नाम की संस्था बनाई है और वे उस पर पूरी नजर रखे हुए हैं। अगर कोई भी उस जगह के पास पहुंचा तो हमें पता चल जाएगा और हम उसे उड़ा देंगे। उन्होंने आगे कहा कि स्पेस फोर्स इतना सक्षम है कि अगर कोई अंदर घुसा भी तो उसका नाम, पता और बैज नंबर तक बता सकता है।

    वहीं, ईरान के साथ चल रहे सैन्य संघर्ष पर बोलते हुए ट्रंप ने दावा किया कि ईरान पूरी तरह से सैन्य रूप से पराजित हो चुका है। उन्होंने कहा कि उनके पास न नौसेना बची है, न वायुसेना, न विमानरोधी हथियार और न ही कोई नेता। ट्रंप ने कहा कि ईरान लगातार समझौते करता और तोड़ता रहा, लेकिन अब सैन्य दृष्टि से वह पूरी तरह कमजोर हो गया है। इस दौरान राष्ट्रपति ट्रंप ने यह भी कहा कि अगर अमेरिका आज ईरान को अकेला छोड़ दे तो उसे अपने ढांचे को दोबारा खड़ा करने में करीब 20 साल लग जाएंगे।

    ईरान में जारी अमेरिकी सैन्य अभियान के बारे में पूछे जाने पर ट्रंप ने बताया कि अभियान अभी समाप्त नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि हम दो हफ्ते और अभियान जारी रख सकते हैं। साथ ही उन्होंने दावा किया कि अमेरिका ने 70 प्रतिशत लक्ष्यों को नष्ट कर दिया है। ट्रंप ने कहा कि यह तो बस अंतिम काम होगा… लेकिन अगर हम वह भी नहीं करते तो भी उन्हें पुनर्निर्माण में 20 साल लग जाएंगे।

    इस दौरान ट्रंप ने जोर देकर कहा कि वे ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने की कभी अनुमति नहीं देंगे और इसे ‘पागलपन’ करार दिया। उन्होंने ओबामा प्रशासन द्वारा 2015 में हस्ताक्षरित संयुक्त व्यापक कार्य योजना (JCPOA) का जिक्र करते हुए कहा कि अगर उन्होंने उस समझौते को समाप्त नहीं किया होता तो ईरान अब तक इजराइल और पूरे मध्य पूर्व पर परमाणु हथियारों का इस्तेमाल कर चुका होता।

  • होर्मुज में फंसे जहाज निकालने के लिए US का बड़ा कदम….प्रोजेक्ट फ्रीडम पर लगाया अस्थायी ब्रेक

    होर्मुज में फंसे जहाज निकालने के लिए US का बड़ा कदम….प्रोजेक्ट फ्रीडम पर लगाया अस्थायी ब्रेक


    वाशिंगटन।
    अमेरिका और ईरान (America and Iran) के बीच जंग के बाद अब एक नया मोड़ आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) में फंसे जहाजों को निकालने के लिए चलाए गए ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ (‘Project Freedom’) को थोड़े समय के लिए रोक दिया है. साथ ही उन्होंने कहा कि ईरान के साथ बातचीत आगे बढ़ रही है और एक पक्का समझौता होने के करीब है. लेकिन नाकेबंदी जारी रहेगी. हालांकि, राष्ट्रपति के इस ऐलान के बाद तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई।

    इन सब के बीच सबसे बड़ी बात है कि अमेरिका ने ऑपरेशन एपिक फ्यूरी को खत्म करने का ऐलान किया है. अमेरिका के विदेश मंत्री मार्क रूबियो ने ये ऐलान किया है. उन्होंने साफ किया कि अब अमेरिका किसी नई लड़ाई की स्थिति नहीं चाहता और शांति का रास्ता अपनाना चाहता है।

    राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा कि पाकिस्तान और दूसरे देशों की मांग पर और अमेरिका की ‘जबरदस्त सैन्य सफलता’ के बाद दोनों पक्षों ने मिलकर यह ऑपरेशन थोड़े समय के लिए रोकने का फैसला किया।

    राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ बातचीत एक ‘पूरे और आखिरी समझौते’ की तरफ बढ़ रही है और बहुत अच्छी प्रगति हुई है. यह रोकना दरअसल यह देखने के लिए किया गया है कि क्या यह समझौता आखिरकार हो सकता है.


    लेकिन नाकेबंदी जारी रहेगी

    यहां एक बहुत जरूरी बात है. राष्ट्रपति ट्रंप ने साफ कहा कि भले ही प्रोजेक्ट फ्रीडम रुक गया हो लेकिन होर्मुज की खाड़ी पर अमेरिका की नाकेबंदी पूरी तरह जारी रहेगी. यानी जहाजों को निकालने का काम रुका है लेकिन ईरान पर दबाव कम नहीं हुआ.


    डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को कड़ी चेतावनी क्या दी?

    एक पत्रकार ने राष्ट्रपति ट्रंप से पूछा कि ईरान को संघर्ष विराम यानी युद्ध रोकने के समझौते का उल्लंघन करने के लिए क्या करना होगा. राष्ट्रपति ट्रंप ने जवाब दिया कि तुम्हें पता चल जाएगा. उन्होंने कहा कि ईरान जानता है कि उसे क्या नहीं करना है. इसके बाद ट्रंप ने एक बड़ी बात कही. उन्होंने कहा कि ईरान ने छोटी-छोटी नावों से छोटे-छोटे हथियारों से हमला किया था. और फिर उन्होंने कहा कि अब ईरान के पास कोई नाव ही नहीं बची. यानी राष्ट्रपति ट्रंप का सीधा इशारा था कि अमेरिका ने ईरान की नौसेना को इतना नुकसान पहुंचाया है कि उनके पास लड़ने के लिए कुछ बचा ही नहीं.


    ईरान के आम लोगों के बारे में डोनाल्ड ट्रंप ने क्या कहा?

    राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि ईरान के लोग विरोध प्रदर्शन करना चाहते हैं लेकिन उनके पास बंदूकें नहीं हैं. फिर उन्होंने कहा कि अगर 2 लाख लोग प्रदर्शन कर रहे हों और 5 या 6 बीमार सोच वाले लोग बंदूक लेकर आ जाएं और उन्हें आंखों के बीच गोली मारने लगें तो बहुत कम लोग वहां खड़े रह पाएंगे.


    UN का ईरान को अल्टीमेटम

    स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बढ़ते तनाव के बीच संयुक्त राष्ट्र में एक अहम प्रस्ताव तैयार किया गया है, जिसमें ईरान को सख्त चेतावनी दी गई है। इस प्रस्ताव के मुताबिक, अगर ईरान जहाजों पर हमले नहीं रोकता, अवैध टोल वसूली बंद नहीं करता और समुद्र में लगाए गए माइंस की जानकारी साझा नहीं करता, तो उस पर प्रतिबंध या अन्य कड़े कदम उठाए जा सकते हैं।