इस फैसले के बाद अब किसी भी अन्य जज या पीठ के सामने ऐसे मामलों को पेश करने की अनुमति नहीं होगी भले ही मुख्य न्यायाधीश किसी संविधान पीठ की अध्यक्षता कर रहे हों यह बदलाव 6 अप्रैल को जारी एक आधिकारिक परिपत्र के माध्यम से लागू किया गया है
पहले की व्यवस्था में यह प्रावधान था कि यदि मुख्य न्यायाधीश उपलब्ध नहीं हैं या किसी अन्य महत्वपूर्ण पीठ में व्यस्त हैं तो अत्यावश्यक मामलों को उच्चतम न्यायालय के सबसे वरिष्ठ जज के सामने उल्लेख किया जा सकता था इससे मामलों की त्वरित सुनवाई सुनिश्चित करने की कोशिश की जाती थी लेकिन अब इस प्रक्रिया को पूरी तरह बदल दिया गया है
नए नियम के तहत अदालत संख्या 1 यानी मुख्य न्यायाधीश की कोर्ट में ही ऐसे मामलों का उल्लेख किया जाएगा और किसी अन्य पीठ के समक्ष इसे प्रस्तुत करने की अनुमति नहीं होगी इस कदम को न्यायिक प्रक्रिया में एकरूपता और स्पष्टता लाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है
इस बीच भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने हाल ही में न्यायिक ढांचे को मजबूत करने पर भी जोर दिया उन्होंने विभिन्न राज्यों में न्यायिक परिसरों के शिलान्यास के दौरान कहा कि देशभर में न्यायिक बुनियादी ढांचे को मजबूत करना अब विकल्प नहीं बल्कि आवश्यकता बन चुका है
उन्होंने यह भी कहा कि संविधान निर्माताओं ने न्याय तक आसान पहुंच को बेहद महत्वपूर्ण माना था और इसी सोच के तहत हर राज्य में उच्च न्यायालय की स्थापना को संवैधानिक जिम्मेदारी बनाया गया उनका मानना है कि न्याय व्यवस्था को मजबूत करना केवल कानूनी जरूरत नहीं बल्कि लोकतंत्र के प्रति एक गंभीर प्रतिबद्धता भी है सुप्रीम कोर्ट का यह नया नियम न्यायिक कार्यप्रणाली में बड़ा बदलाव माना जा रहा है अब देखना यह होगा कि इससे अत्यावश्यक मामलों के निपटारे की प्रक्रिया कितनी प्रभावी और तेज हो पाती है
