‘Rum’ नहीं, ‘Rum-like’ लिखने के निर्देश से Old Monk को 500 करोड़ रुपये के नुकसान का दावा, FSSAI के रुख से बढ़ा विवाद

नई दिल्ली: लोकप्रिय रम ब्रांड ओल्ड मंक की बिक्री और उत्पाद की लेबलिंग को लेकर खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) और इसकी निर्माता कंपनी के बीच विवाद सामने आया है। विवाद का मुख्य मुद्दा बोतल के लेबल पर ‘Rum’ लिखने के बजाय ‘Rum-like’ शब्द का इस्तेमाल करने से जुड़ा है। इस निर्देश के कारण कंपनी के कारोबार पर असर पड़ने का दावा किया जा रहा है और संभावित नुकसान का आंकड़ा करीब 500 करोड़ रुपये बताया गया है। मामला केवल एक ब्रांड के नाम या लेबल तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे मादक पेय पदार्थों की श्रेणी तय करने और उत्पादों की पहचान से जुड़े नियमों पर भी सवाल उठ रहे हैं।

विवाद के केंद्र में यह सवाल है कि ओल्ड मंक जैसे उत्पाद को लेबल पर किस श्रेणी के तहत पेश किया जा सकता है। ‘Rum’ शब्द किसी खास प्रकार के मादक पेय की पहचान करता है, जबकि ‘Rum-like’ का अर्थ रम जैसा उत्पाद होता है। दोनों शब्दों के अर्थ में अंतर होने के कारण लेबल पर इस्तेमाल होने वाली शब्दावली का व्यावसायिक महत्व है। निर्माता कंपनी के लिए ब्रांड की पहचान और ग्राहकों के बीच उसकी स्थापित छवि अहम है। वहीं, नियामक संस्था का रुख उत्पादों की श्रेणी और लेबलिंग से जुड़े निर्धारित मानकों के पालन पर केंद्रित है। इसी अंतर के चलते कंपनी और नियामक के बीच मतभेद की स्थिति बनी हुई है।

ओल्ड मंक भारतीय बाजार में लंबे समय से पहचाना जाने वाला ब्रांड है। इसकी पहचान के कारण लेबलिंग में बदलाव का असर केवल पैकेजिंग तक सीमित नहीं रह सकता। उत्पाद के नाम और श्रेणी को लेकर किसी भी तरह की अनिश्चितता से वितरण, बिक्री और उपभोक्ताओं की समझ प्रभावित हो सकती है। कंपनी को लगभग 500 करोड़ रुपये के नुकसान का जो आंकड़ा बताया जा रहा है, वह इस विवाद के संभावित कारोबारी प्रभाव को दर्शाता है। हालांकि, इस राशि को वास्तविक रूप से दर्ज हो चुका नुकसान मानने से पहले इसके आधार और गणना से जुड़ी जानकारी स्पष्ट होना जरूरी है। उपलब्ध विवरण से यह भी स्पष्ट नहीं होता कि नुकसान की पूरी राशि बिक्री में कमी, वितरण पर असर या अन्य कारोबारी कारणों से जुड़ी है।

FSSAI की भूमिका खाद्य उत्पादों और संबंधित श्रेणियों के लिए निर्धारित मानकों के अनुपालन को सुनिश्चित करना है। लेबल पर इस्तेमाल होने वाले शब्द उपभोक्ताओं को उत्पाद की प्रकृति और श्रेणी समझने में मदद करते हैं। इसलिए नियामक संस्थाओं के लिए यह जरूरी होता है कि उत्पादों की पहचान निर्धारित नियमों के अनुरूप हो। दूसरी ओर, कंपनियां अपने स्थापित ब्रांड नाम और बाजार में बनी पहचान को बनाए रखना चाहती हैं। जब नियामकीय निर्देश और व्यावसायिक हितों के बीच अंतर पैदा होता है, तो उसका असर उत्पाद की पैकेजिंग, प्रचार और बिक्री पर पड़ सकता है। ओल्ड मंक का मामला इसी तरह के टकराव के रूप में सामने आया है।

इस विवाद का आगे क्या परिणाम होगा, यह नियामकीय रुख और निर्माता कंपनी की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा। यदि लेबलिंग संबंधी निर्देशों में बदलाव नहीं होता है, तो कंपनी को अपने उत्पाद की पैकेजिंग और बाजार में प्रस्तुति के तरीके पर विचार करना पड़ सकता है। वहीं, किसी संभावित समाधान से ब्रांड की पहचान और नियामकीय आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाने का रास्ता निकल सकता है। फिलहाल इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू ‘Rum’ और ‘Rum-like’ शब्दों के इस्तेमाल को लेकर बना मतभेद और इससे जुड़े 500 करोड़ रुपये के नुकसान का दावा है। इस विवाद का अंतिम कारोबारी प्रभाव आगे की स्थिति स्पष्ट होने के बाद ही सामने आएगा।