समानता के अधिकार की दलील खारिज याचिकाकर्ता दर्पण सिंह अवस्थी की ओर से पेश हुए प्रसिद्ध अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने संविधान के अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार का हवाला देते हुए तर्क दिया था कि या तो सभी श्रद्धालुओं को जलाभिषेक के लिए गर्भगृह में जाने दिया जाए या फिर किसी को भी नहीं। उन्होंने दलील दी कि कलेक्टर की सिफारिश पर ‘वीआईपी’ को प्रवेश देना आम भक्तों के अधिकारों का हनन है। हालांकि, CJI सूर्यकांत ने इस तर्क को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यदि मंदिर के भीतर मौलिक अधिकारों को इस तरह लागू किया गया, तो व्यवस्था संभालना नामुमकिन हो जाएगा।
कोर्ट की तल्ख टिप्पणी सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता की मंशा पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि ऐसी याचिकाएं श्रद्धा से प्रेरित नहीं लगतीं, बल्कि इनके पीछे कुछ और ही उद्देश्य प्रतीत होता है। बेंच ने चेतावनी दी कि अगर आज गर्भगृह में प्रवेश को समानता के अधिकार से जोड़ा गया, तो कल लोग वहां जाकर अपनी पसंद के मंत्रोच्चार करने या अन्य गतिविधियों के लिए अनुच्छेद 19 वाक् स्वतंत्रता का दावा करने लगेंगे। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि मंदिर प्रशासन को सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने के लिए कुछ विवेकपूर्ण निर्णय लेने का अधिकार है।
हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर सुप्रीम कोर्ट के इस रुख के बाद याचिकाकर्ता ने अपनी अर्जी वापस ले ली। इससे पहले मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने भी इसी तरह का फैसला सुनाया था, जिसे अब शीर्ष अदालत ने भी सही माना है। इस फैसले से साफ है कि महाकाल मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश के नियम यथावत रहेंगे और मंदिर समिति के दिशा-निर्देशों का ही पालन होगा।
