नई दिल्ली । देशभर में UGC के नए नियम को लेकर भारी विरोध देखने को मिल रहा है। सोशल मीडिया पर यूजीसी आरोलबैक तेजी से ट्रेंड करने लगा, जबकि मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया और इसे भेदभाव बढ़ाने वाला बताया गया। इसी बीच, बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने इस बदलाव का विरोध करते हुए इस्तीफा दे दिया। इस पूरे विवाद के बीच सवाल उठता है कि UGC ने कौन से नियम बनाए हैं और आखिर क्यों टीचर्स, स्टूडेंट्स और आम लोग इसमें नाराज हैं।
UGC का नया नियम क्या है
UGC ने 13 जनवरी 2026 को नया नियम लागू किया, जिसका नाम है उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के विनियम 2026 । इसका उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव और असमानता को रोकना बताया गया है। नए नियम के तहत सभी विश्वविद्यालय और कॉलेजों को इक्विटी सेंटर, इक्विटी स्क्वाड और इक्विटी कमेटी बनाने होंगे, साथ ही 24×7 हेल्पलाइन का प्रावधान भी होगा। अगर कोई संस्थान इन नियमों का पालन नहीं करता, तो UGC उनकी मान्यता रद्द कर सकता है या फंड रोक सकता है। UGC का कहना है कि पिछड़ी जातियों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के खिलाफ शिकायतों में 2020 से 2025 के बीच 100% से अधिक वृद्धि देखी गई है। इसके अलावा, रोहित वेमुला और पायल तड़वी जैसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए यह नियम बनाया गया है, ताकि उच्च शिक्षा में समानता और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
क्यों मचा बवाल
UGC के नए नियम के कुछ सेक्शन विशेष रूप से विवादित बने हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट में दायर जनहित याचिका PIL में कहा गया है कि Section 3C अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता और व्यक्तिगत आज़ादी के अधिकारों का उल्लंघन करता है। इसके अलावा, सामान्य वर्ग यानी सवर्ण समाज के छात्र और शिक्षक भी नाराज हैं। बरेली के मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने इसे सामान्य वर्ग के छात्रों को स्वघोषित अपराधी बनाने जैसा बताया। छात्र और शिक्षक दोनों का कहना है कि नियम एकतरफा है, झूठी शिकायतों पर कार्रवाई की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है, और सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है। यही कारण है कि देशभर में इस नियम को लेकर तीव्र विरोध और बहस चल रही है।
UGC के 4 विवादित नियम / बदलाव ,इक्विटी समिति और इक्विटी स्क्वाड का गठन
नए नियम के तहत हर कॉलेज और विश्वविद्यालय में इक्विटी समिति और इक्विटी स्क्वाड बनाना अनिवार्य है। हालांकि, छात्रों का कहना है कि इसमें सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व जरूरी नहीं है, जिससे निर्णयों में पक्षपात होने का डर है। साथ ही इक्विटी स्क्वाडको बहुत अधिकार दिए गए हैं, लेकिन ‘भेदभाव’ की स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है, जिससे इसकी कार्यवाही और सीमाओं को लेकर शंका बनी हुई है।
अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ी जातियों पर ध्यान
नए नियम का मुख्य उद्देश्य एससी, एसटी और पिछड़ी जातियों के खिलाफ भेदभाव को रोकना है। हालांकि, सामान्य वर्ग के छात्र और शिक्षक इसे एकतरफा मान रहे हैं। उनका कहना है कि इस नियम के तहत सवर्ण छात्रों को ‘संभावित अपराधी’ मानकर देखा जा सकता है, जिससे वास्तव में भेदभाव बढ़ने और माहौल में तनाव पैदा होने की संभावना है।
सख्त कार्रवाई का अधिकार
सख्त कार्रवाई का अधिकार
नए नियम के तहत, अगर कोई संस्थान के नियमों का पालन नहीं करता, तो उसकी मान्यता रद्द की जा सकती है या फंड रोक दिया जा सकता है। छात्र और शिक्षक मानते हैं कि यह कदम संस्थानों पर अत्यधिक दबाव डालता है और बिना पर्याप्त प्रशिक्षण और संसाधन के इसे लागू करना मुश्किल और जटिल होगा।
छात्रों और शिक्षकों की प्रतिक्रिया
कई छात्र संगठन और शिक्षक संघ के नए नियम का विरोध कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर तेजी से ट्रेंड कर रहा है, जबकि बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने इस्तीफा देकर अपना विरोध जताया। छात्रों का कहना है कि नियम एकतरफा है, झूठी शिकायतों पर कोई रोक नहीं है, और सामान्य वर्ग के छात्रों के अधिकार खतरे में पड़ सकते हैं।
UGC का पक्ष
UGC का कहना है कि यह नियम उच्च शिक्षा में समान अवसर और सुरक्षित माहौल सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है। आयोग के अनुसार, बिना निगरानी और संरचना के पिछड़ी जातियों के खिलाफ भेदभाव रोकना मुश्किल है। यह भी बताता है कि नियम धीरे-धीरे लागू किए जाएंगे और उद्देश्य केवल समान अवसर और सुरक्षा सुनिश्चित करना है। जबकि यह कदम शिक्षा प्रणाली में समानता और सुरक्षा बढ़ाने का प्रयास है, नियम के कुछ सेक्शन विवादास्पद माने जा रहे हैं।
सवर्ण छात्रों और शिक्षकों की चिंता और भविष्य की राह
टीचर्स से लेकर स्टूडेंट्स तक सभी इस बात को लेकर चिंतित हैं कि नया नियम सवर्ण छात्रों और शिक्षकों के अधिकारों के खिलाफ तो नहीं जा रहा। अब सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट में दायर जनहित याचिका पर हैं, जिससे तय होगा कि नियम में कोई संशोधन या बदलाव करता है या नहीं। फिलहाल, यह मामला शिक्षा जगत में सबसे बड़ा और गर्म चर्चा का विषय बन गया है, और भविष्य में इसके प्रभाव को लेकर बहस जारी रहने की संभावना है।
