दरअसल, जैसे-जैसे भारत तेजी से आर्थिक विकास की ओर बढ़ रहा है, बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स, उद्योग, स्टार्टअप और सामाजिक योजनाओं के लिए भारी वित्तीय संसाधनों की जरूरत पड़ रही है। ऐसे में बैंकिंग सिस्टम को भी उसी गति से विकसित करना जरूरी है, ताकि वह देश की विकास यात्रा का मजबूत आधार बन सके। इसी उद्देश्य से यह कमिटी बैंकिंग सेक्टर की पूरी समीक्षा करेगी और यह तय करेगी कि आने वाले समय में उसे किस दिशा में आगे बढ़ाना है।
वित्त मंत्री ने स्पष्ट किया कि विकसित भारतका सपना केवल योजनाओं से नहीं, बल्कि मजबूत वित्तीय ढांचे से पूरा होगा। इसके लिए पर्याप्त फंडिंग, क्रेडिट की उपलब्धता और बैंकिंग सुविधाओं का आम लोगों तक पहुंचना बेहद जरूरी है। कमिटी इसी बात का ब्लूप्रिंट तैयार करेगी कि बैंकिंग क्षेत्र कैसे देश की अगली विकास छलांग का साथ दे सकता है।
इस प्रस्ताव का जिक्र 1 फरवरी 2026 को पेश किए गए केंद्रीय बजट 2026-27 में भी किया गया था। बजट भाषण में वित्त मंत्री ने कहा था कि विकसित भारत के लिए बैंकिंग पर हाई-लेवल कमिटीबनाई जाएगी, जो पूरे सेक्टर की समीक्षा करेगी और इसे भारत के अगले विकास चरण से जोड़ेगी। साथ ही यह सुनिश्चित करेगी कि वित्तीय स्थिरता, वित्तीय समावेशन और उपभोक्ता संरक्षण से कोई समझौता न हो।
सरकार का फोकस केवल बड़े उद्योगों को फंडिंग देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि बैंकिंग सेवाएं देश के हर व्यक्ति तक पहुंचें। ग्रामीण क्षेत्रों, छोटे कारोबारियों, महिलाओं और युवाओं को सस्ती और आसान वित्तीय सेवाएं मिलें, इसके लिए भी कमिटी सुझाव देगी। वित्त मंत्री ने कहा कि बैंकिंग को इतना बड़ा और सक्षम बनाना है कि वह देश की बढ़ती आर्थिक जरूरतों को पूरा कर सके और आम आदमी की पहुंच में भी बनी रहे।
उन्होंने यह भी कहा कि विकसित भारत तक पहुंचने के लिए बड़े पैमाने पर पूंजी की आवश्यकता होगी। इसके लिए बैंकिंग सिस्टम को मजबूत, लचीला और भविष्य के लिए तैयार बनाना जरूरी है। यही कारण है कि सरकार इस कमिटी का गठन जल्द से जल्द करने की दिशा में काम कर रही है।
बजट में बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र को मजबूत बनाने की दिशा में कुछ शुरुआती कदम भी उठाए गए हैं। इसी कड़ी में पावर फाइनेंस कॉर्पोरेश PFC और रूरल इलेक्ट्रिफिकेशन कॉर्पोरेशनस REC जैसे बड़े पब्लिक सेक्टर एनबीएफसी को पुनर्गठित करने का प्रस्ताव रखा गया है। इसका मकसद इन संस्थानों का आकार बढ़ाना और उनकी कार्यक्षमता को और बेहतर बनाना है, ताकि वे बड़े स्तर पर परियोजनाओं को फंडिंग दे सकें।
हाल ही में PFC के बोर्ड ने REC के साथ मर्जर को सैद्धांतिक मंजूरी भी दे दी है। REC पहले से ही PFC की सब्सिडियरी है और दोनों ही नवरत्नश्रेणी की केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां हैं, जो बिजली क्षेत्र की परियोजनाओं को वित्तीय सहायता देती हैं। गौरतलब है कि वर्ष 2019 में PFC ने सरकार से REC में 52.63 प्रतिशत हिस्सेदारी लगभग 14,500 करोड़ रुपये में खरीदी थी, जिससे उसे प्रबंधन का नियंत्रण मिला था। अब यह कदम वित्तीय संस्थानों के समेकन की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
जब वित्त मंत्री से पूछा गया कि क्या यह कमिटी भविष्य में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के मर्जर की भी सिफारिश कर सकती है, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि इस पहल को केवल मर्जर के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। उनका कहना था कि इसका मुख्य उद्देश्य बैंकिंग सेक्टर को इतना बड़ा और मजबूत बनाना है कि वह विकसित भारत की वित्तीय जरूरतों को आसानी से पूरा कर सके।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि मंत्रालय के भीतर इस दिशा में काफी काम पहले से चल रहा है और कई विचार सामने आ चुके हैं। अब यह कमिटी उन सभी पहलुओं का गहराई से अध्ययन कर आगे की रणनीति तय करेगी। माना जा रहा है कि बैंकिंग सेक्टर पहले से ही अपेक्षाकृत अच्छी स्थिति में है, ऐसे में यह सही समय है जब इसे अगले स्तर पर ले जाने की योजना बनाई जाए।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था जिस तेजी से बढ़ रही है, उसे देखते हुए आने वाले वर्षों में बड़े पैमाने पर निवेश की जरूरत होगी। इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा, डिजिटल इकोनॉमी, मैन्युफैक्चरिंग और स्टार्टअप सेक्टर में पूंजी की मांग लगातार बढ़ेगी। ऐसे में बैंकिंग सिस्टम की क्षमता बढ़ाना समय की जरूरत है।
हाई-लेवल कमिटी का गठन इसी सोच के साथ किया जा रहा है, ताकि बैंकिंग सेक्टर केवल पारंपरिक सेवाओं तक सीमित न रहे, बल्कि देश की आर्थिक प्रगति का मुख्य इंजन बन सके। यह कमिटी इस बात पर भी ध्यान देगी कि वित्तीय स्थिरता बनी रहे और बैंकिंग सेवाओं का लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंचे।
