पौराणिक कथाओं के अनुसार, नागराज वासुकी भगवान शिव के परम भक्त थे और हमेशा उनके समीप रहना चाहते थे। समुद्र मंथन के दौरान जब देवताओं और असुरों ने समुद्र से अमृत और कई रत्नों के साथ-साथ हलाहल विष निकाला, तो उसका प्रभाव पृथ्वी पर भारी पड़ने लगा। इस विष को खत्म करने के लिए भगवान शिव ने अपने कंठ में हलाहल विष पी लिया, जिससे उनका शरीर जलने लगा। इस संकट की घड़ी में वासुकी ने भी महादेव का साथ दिया और विष के प्रभाव को सहने में उनकी मदद की। वासुकी की भक्ति से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें अपने गले में धारण करने का वरदान दिया और तभी से वासुकी अमर हो गए। यही कारण है कि भगवान शिव अपने गले में सांपों की माला धारण करते हैं।
शिव और नाग के इस संबंध का उल्लेख शिव पुराण और स्कंद पुराण में मिलता है। इन ग्रंथों में शिव-नाग की कथा का विस्तार से वर्णन है और इसे भक्तों के लिए प्रेरणास्रोत माना गया है। ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार, शिव के साथ नाग की पूजा करने से कालसर्प दोष और पितृ दोष से राहत मिलती है। खासकर महाशिवरात्रि या सोमवार के दिन चांदी के नाग-नागिन की जोड़ी अर्पित करने से राहु-केतु शांत होते हैं और जीवन में बाधाओं से मुक्ति मिलती है।
महाशिवरात्रि के दिन भक्त शिवलिंग पर जल, दूध, दही, घी, शहद, और बेलपत्र अर्पित करते हैं। वहीं नाग-नागिन की पूजा भी विशेष रूप से की जाती है। ऐसा माना जाता है कि इससे जीवन में सुख-शांति, समृद्धि और सुरक्षा बनी रहती है। इस महापर्व के दिन भक्त विशेष व्रत रखते हैं और रात भर जागरण करके शिव की भक्ति में लीन रहते हैं। महाशिवरात्रि के दौरान शिवालयों में विशेष पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और शिव-प्रसाद का आयोजन होता है, जिससे भक्तों को आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव होता है।
