विशेषज्ञों ने क्या कहा
याचिका में मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्न कुमार की ओर से दलील दी गई कि उन्हें “अविश्वसनीय” बताना उचित नहीं है और उनकी पेशेवर विश्वसनीयता प्रभावित हुई है। उन्होंने अदालत से पूरी प्रक्रिया सामने रखने का मौका मांगा।
आलोक प्रसन्न कुमार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि पिछली टिप्पणियों से शिक्षाविदों को नुकसान हुआ है और वे संदर्भ स्पष्ट करना चाहते हैं। वहीं सुपर्णा दिवाकर की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जे साई दीपक ने कहा कि पाठ्य सामग्री तैयार करना सामूहिक निर्णय की प्रक्रिया थी।
कोर्ट ने क्या कहा
पीठ ने आवेदन रिकॉर्ड में लेने का निर्देश दिया और दो सप्ताह बाद सुनवाई तय की। अदालत ने यह भी दर्ज किया कि संशोधित अध्याय की समीक्षा के लिए एक समिति बनाई गई है, जिसमें इंदु मल्होत्रा, के.के. वेणुगोपाल और प्रकाश सिंह शामिल हैं।
समिति राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी के सहयोग से काम करेगी, जिसकी अध्यक्षता अनिरुद्ध बोस कर रहे हैं।
पहले दिया था संबंध तोड़ने का निर्देश
इससे पहले 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को तीनों विशेषज्ञों से संबंध खत्म करने का निर्देश दिया था। अदालत ने कहा था कि विवादित सामग्री से न्यायपालिका की नकारात्मक छवि प्रस्तुत होती है।
माफी भी दायर
मामले में दिनेश प्रसाद सकलानी ने बिना शर्त माफी का हलफनामा दाखिल किया। इससे पहले अदालत ने विवादित अध्याय वाले प्रकाशन, पुनर्मुद्रण और डिजिटल प्रसार पर भी रोक लगा दी थी।
अब इस मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद होगी, जिसमें विशेषज्ञों की दलीलों पर विस्तार से विचार किया जाएगा।
