कश्मीर के वैज्ञानिकों की बड़ी सफलता, अब किसान 40 हजार रुपये किलो वाले दुर्लभ मशरूम की कर सकेंगे खेती

नई दिल्ली। जम्मू-कश्मीर के वैज्ञानिकों ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है, जिसके बाद अब किसान 15 हजार से 40 हजार रुपये प्रति किलो तक बिकने वाला दुर्लभ मशरूम अपने खेतों में भी उगा सकेंगे। श्रीनगर स्थित शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (SKUAST) के वैज्ञानिकों ने पहली बार नियंत्रित वातावरण में इस मशरूम की सफल खेती कर दिखाई है।

जंगलों पर निर्भरता से मिली मुक्ति

यह मशरूम मोरल्स या मोरचेला (स्थानीय नाम कंगाच) है, जो अब तक सिर्फ ऊंचे पहाड़ी जंगलों में बारिश के मौसम में प्राकृतिक रूप से उगता था। इसकी उपलब्धता बेहद सीमित और मुश्किल होने के कारण बाजार में इसकी कीमत बेहद अधिक रहती है।

वैज्ञानिकों की बड़ी उपलब्धि

SKUAST के कुलपति प्रोफेसर नजीर अहमद गनई ने इस उपलब्धि को “गेम चेंजर” बताया है। उनके अनुसार, यह तकनीक जंगलों पर निर्भरता खत्म कर नियंत्रित उत्पादन का रास्ता खोलती है, जिससे किसानों, युवाओं और स्टार्टअप्स के लिए नए अवसर पैदा होंगे।

पांच साल की मेहनत से मिला परिणाम

इस शोध में प्रोफेसर तारिक अहमद सोफी, उनके छात्र कमरान मुनीर और प्रोफेसर विकास गुप्ता शामिल रहे। टीम ने पिछले पांच वर्षों में 1000 से अधिक प्राकृतिक स्थलों से मोरचेला के नमूने एकत्र किए और उनके वातावरण, मिट्टी, नमी और पौधों का गहन अध्ययन किया।

शोध के दौरान 10 किस्मों को चुना गया, जिनमें से 3 किस्मों में सफलतापूर्वक खेती संभव हो सकी।

पॉलीहाउस से लेकर खुले खेत तक सफलता

शुरुआत में इस मशरूम की खेती पॉलीहाउस में की गई, जबकि बाद में इसे खुले वातावरण में भी उगाने में सफलता मिली। वैज्ञानिकों के अनुसार इसके लिए पेटेंट प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है। यह प्रयोग बारामूला, अनंतनाग और श्रीनगर सहित कई क्षेत्रों में किया गया है।

खास पर्यावरण की जरूरत वाला मशरूम

मोरचेला की खेती हमेशा से चुनौतीपूर्ण रही है क्योंकि इसे विशेष तापमान, नमी और मिट्टी की स्थिति की आवश्यकता होती है। साथ ही अलग-अलग किस्मों के लिए अलग पौधों और प्राकृतिक वातावरण का संतुलन भी जरूरी होता है।

किसानों के लिए नई आर्थिक संभावना

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तकनीक से जम्मू-कश्मीर की कृषि अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव आ सकता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारी मांग के चलते यह फसल किसानों की आय बढ़ाने का एक मजबूत विकल्प बन सकती है और जैव-अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा दे सकती है।