प्रियंका गांधी ने कहा कि यह केवल महिला आरक्षण का मुद्दा नहीं था, बल्कि इसके पीछे परिसीमन से जुड़ा एक बड़ा पहलू छिपा हुआ था। उनके अनुसार सरकार ने इस प्रक्रिया को जिस तरह आगे बढ़ाया, उसमें पारदर्शिता की कमी दिखाई दी। उन्होंने आरोप लगाया कि विधेयक पर पर्याप्त चर्चा का समय नहीं दिया गया और अंतिम समय में दस्तावेज साझा किए गए, जिससे विस्तृत विचार विमर्श संभव नहीं हो सका।
उन्होंने यह भी कहा कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में किसी भी बड़े संवैधानिक बदलाव से पहले सभी राजनीतिक दलों को विश्वास में लेना जरूरी होता है। लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं किया गया, जिससे विपक्ष को अपनी स्थिति स्पष्ट करने में कठिनाई हुई। उनके अनुसार यह तरीका लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है।
प्रियंका गांधी ने परिसीमन के मुद्दे को इस बहस का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि बिना व्यापक सामाजिक और जनसंख्या से जुड़े आंकड़ों को ध्यान में रखे परिसीमन करना उचित नहीं होगा। उनके अनुसार यह केवल सीटों के पुनर्वितरण का मामला नहीं है, बल्कि यह सामाजिक संतुलन और प्रतिनिधित्व से भी जुड़ा हुआ विषय है।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि परिसीमन की प्रक्रिया को लेकर सरकार की योजना एकतरफा प्रतीत होती है। उनके अनुसार यदि इस प्रक्रिया में निष्पक्षता नहीं रखी गई तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर असर डाल सकता है। उन्होंने कहा कि देश के लोग अब पहले से अधिक जागरूक हैं और हर निर्णय को ध्यान से देख रहे हैं।
महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी पर बात करते हुए प्रियंका गांधी ने कहा कि संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या बढ़ाना एक सकारात्मक कदम होगा, लेकिन इसे केवल प्रतीकात्मक नहीं बल्कि वास्तविक भागीदारी के रूप में लागू किया जाना चाहिए। उनके अनुसार महिलाओं को निर्णय लेने की प्रक्रिया में प्रभावी भूमिका मिलनी चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि परिसीमन से पहले जातिगत और सामाजिक आंकड़ों पर आधारित स्पष्ट डेटा होना जरूरी है, ताकि किसी भी वर्ग के साथ अन्याय न हो। उनके अनुसार लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि सभी वर्गों को समान अवसर मिले और किसी भी प्रकार का पक्षपात न हो।
इस पूरे बयान के बाद महिला आरक्षण और परिसीमन को लेकर राजनीतिक बहस और तेज हो गई है। यह मुद्दा अब केवल विधायी प्रक्रिया नहीं बल्कि व्यापक राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है।
