बांकीपुर में बीजेपी का गढ़ कैसे टूटा? प्रशांत किशोर की ऐतिहासिक जीत के पीछे रहे ये 5 बड़े फैक्टर


पटना । बिहार, मध्य प्रदेश और गुजरात के विधानसभा उपचुनावों के नतीजों में सबसे ज्यादा चर्चा बांकीपुर सीट की रही, जहां जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा को 19 हजार से अधिक वोटों से पराजित कर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की उम्मीदवार रेखा गुप्ता तीसरे स्थान पर रहीं।

यह हार बीजेपी के लिए इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि बांकीपुर सीट 1995 से पार्टी के कब्जे में थी। यह सीट हाल ही में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने नितिन नवीन के इस्तीफे के बाद खाली हुई थी। नवंबर 2025 के विधानसभा चुनाव में नितिन नवीन ने इसी सीट पर करीब 52 हजार वोटों से जीत दर्ज की थी, लेकिन महज आठ महीने बाद पार्टी को यहां हार का सामना करना पड़ा।

1. सम्राट चौधरी के नेतृत्व की पहली परीक्षा
बिहार के मुख्यमंत्री बनने के बाद यह सम्राट चौधरी के नेतृत्व में बीजेपी की पहली चुनावी परीक्षा थी। चुनाव प्रचार के दौरान प्रशांत किशोर ने मुकाबले को सीधे अपने और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के बीच की लड़ाई के रूप में पेश किया। जीत के बाद भी उन्होंने कहा कि बांकीपुर की जनता ने बीजेपी नेतृत्व को स्पष्ट संदेश दिया है कि बिहार को बेहतर नेतृत्व की जरूरत है।

2. लंबे समय से सत्ता विरोधी माहौल
करीब तीन दशक से यह सीट नितिन नवीन और उनके परिवार के पास रही। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लगातार एक ही परिवार के प्रतिनिधित्व के कारण क्षेत्र में सत्ता विरोधी भावना (एंटी-इनकंबेंसी) मजबूत हो चुकी थी। स्थानीय विकास और बदलाव के मुद्दे पर प्रशांत किशोर ने इसका लाभ उठाया।

3. स्थानीय मुद्दों पर केंद्रित प्रचार
प्रशांत किशोर ने चुनाव प्रचार में बड़े राजनीतिक वादों के बजाय स्थानीय विकास को प्राथमिकता दी। उन्होंने जनता से कहा कि विधायक बनने के बाद क्षेत्र रातों-रात नहीं बदलेगा, लेकिन कुछ महीनों में बदलाव दिखाई देगा। यह व्यावहारिक संदेश मतदाताओं को प्रभावित करता नजर आया।

4. राजद के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध
विश्लेषकों के अनुसार मुस्लिम-यादव (एम-वाई) वोट बैंक का एक हिस्सा इस बार राजद के बजाय जन सुराज के साथ गया। बीजेपी को हराने की रणनीति के तहत कई मतदाताओं ने प्रशांत किशोर को मजबूत विकल्प माना। इसका असर यह रहा कि राजद तीसरे स्थान पर खिसक गया और उसकी जमानत तक जब्त हो गई।

5. सवर्ण वोटों का झुकाव
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी के पारंपरिक सवर्ण वोट बैंक, खासकर ब्राह्मण और कायस्थ समुदाय के एक हिस्से ने इस बार प्रशांत किशोर का समर्थन किया। बांकीपुर में इन समुदायों का प्रभाव निर्णायक माना जाता है और वोटों का यह बदलाव चुनाव परिणाम पर भारी पड़ा।

बीजेपी के लिए बड़ा संदेश
बांकीपुर उपचुनाव का परिणाम सिर्फ एक सीट की हार-जीत नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे बिहार की राजनीति में बदलते समीकरणों का संकेत माना जा रहा है। वहीं, जन सुराज पार्टी के लिए यह पहली चुनावी जीत भविष्य की राजनीति में उसकी बढ़ती भूमिका का संकेत मानी जा रही है।