हनुमान भक्ति, सादगी और रहस्यमयी किस्से… क्यों दुनिया भर में प्रसिद्ध हुए बाबा नीम करौली, जानिए उनकी पूरी कहानी


नई दिल्ली । बाबा नीम करौली का नाम आज सिर्फ एक संत के रूप में नहीं बल्कि गहरी आस्था और आध्यात्मिक प्रेरणा के प्रतीक के तौर पर लिया जाता है। उत्तराखंड के कैंची धाम से लेकर देश विदेश तक उनके अनुयायियों की बड़ी संख्या है। कंबल ओढ़े रहने वाले बाबा को भक्त प्यार से महाराजजी कहकर बुलाते थे। उनकी सादगी हनुमान भक्ति और मानव सेवा से जुड़ी शिक्षाओं ने उन्हें दूसरे संतों से अलग पहचान दी। हाल के समय में फिल्म हनुमान अंश की चर्चा के बीच एक बार फिर बाबा नीम करौली के जीवन और उनकी आध्यात्मिक यात्रा को जानने में लोगों की दिलचस्पी बढ़ी है।

बाबा नीम करौली का मूल नाम लक्ष्मी नारायण शर्मा बताया जाता है। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के टुंडला क्षेत्र के अकबरपुर गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बाद में उनका संबंध फर्रुखाबाद जिले के नीब करोरी गांव से जुड़ा और इसी वजह से उन्हें बाबा नीब करोरी के नाम से जाना जाने लगा। समय के साथ नीब करोरी का प्रचलित रूप नीम करौली हो गया और आज दोनों नाम इसी संत के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। कहा जाता है कि उन्होंने नीब करोरी में गुफा के भीतर कठिन साधना की थी और बाद में उसी स्थान पर हनुमान मंदिर का निर्माण हुआ।

बाबा के जीवन से जुड़ी ट्रेन वाली कहानी भी बेहद प्रसिद्ध है। भक्तों के बीच प्रचलित कथा के अनुसार बाबा बिना टिकट ट्रेन के फर्स्ट क्लास डिब्बे में यात्रा कर रहे थे। टिकट जांच के दौरान उन्हें नीब करोरी के पास ट्रेन से उतार दिया गया। बाबा पास ही एक नीम के पेड़ के नीचे जाकर बैठ गए। मान्यता है कि इसके बाद ट्रेन आगे नहीं बढ़ी। कई कोशिशों के बाद भी इंजन नहीं चला तो अधिकारियों और यात्रियों ने बाबा से क्षमा मांगी और उन्हें वापस ट्रेन में बैठाया गया। बाबा के ट्रेन में बैठने के बाद ट्रेन चल पड़ी। इस घटना को लेकर कई तरह की मान्यताएं हैं और इसे बाबा से जुड़े चमत्कारों में गिना जाता है।

बाबा का बचपन और गृहस्थ जीवन भी उनकी कहानी का अहम हिस्सा है। बताया जाता है कि कम उम्र में ही उनका विवाह हुआ था और आध्यात्म के प्रति गहरा आकर्षण होने के कारण उन्होंने घर छोड़ दिया था। इसके बाद उन्होंने अलग अलग स्थानों पर साधना की। गुजरात के बावनिया गांव में तालाब के पास साधना करने के कारण उन्हें तलैया बाबा भी कहा गया। बाद में वे परिवार के पास लौटे और गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियां निभाईं। उनके दो बेटे और एक बेटी होने की जानकारी मिलती है।

बाबा नीम करौली की सबसे बड़ी पहचान उनकी हनुमान भक्ति रही। उनके भक्त उन्हें हनुमान जी का अंश या अवतार तक मानते हैं। हालांकि यह आस्था और धार्मिक मान्यता का विषय है इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। बाबा की शिक्षाओं में प्रेम सेवा सादगी और सभी को समान दृष्टि से देखने का भाव प्रमुख था। वे लोगों को ईश्वर का स्मरण करने दूसरों की सेवा करने और सत्य के रास्ते पर चलने की प्रेरणा देते थे। उनका संदेश सब एक यानी सभी में एक ही ईश्वर का अंश देखने की भावना से जुड़ा माना जाता है।

बाबा से जुड़े अनेक चमत्कारिक किस्से भी भक्तों के बीच प्रचलित रहे हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि वे लोगों की परेशानियों को बिना बताए समझ लेते थे और कई बार अलग अलग स्थानों पर एक साथ दिखाई देने जैसी घटनाओं का भी उल्लेख मिलता है। इन कथाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं है लेकिन उनके अनुयायियों की आस्था में इनका विशेष स्थान है। अमीर हो या गरीब अलग धर्म का हो या अलग सामाजिक वर्ग का बाबा के पास आने वाले लोगों के साथ समान व्यवहार की बातें उनके संस्मरणों में मिलती हैं।

यही वजह है कि बाबा नीम करौली की लोकप्रियता केवल भारत तक सीमित नहीं रही। कैंची धाम आज उनकी सबसे प्रसिद्ध पहचान बन चुका है जहां हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। उनकी सादगी हनुमान भक्ति और प्रेम सेवा का संदेश आज भी लोगों को आकर्षित करता है। बाबा का जीवन इस बात का उदाहरण माना जाता है कि किसी संत की पहचान केवल उसके चमत्कारों की कहानियों से नहीं बल्कि उसकी शिक्षाओं और लोगों के जीवन पर पड़े प्रभाव से भी बनती है।