Author: bharati

  • व्हाइट हाउस डिनर में प्रेस की आजादी पर जोर ट्रंप से कहा लोकतंत्र बचाना है तो सवालों से नहीं भागिए

    व्हाइट हाउस डिनर में प्रेस की आजादी पर जोर ट्रंप से कहा लोकतंत्र बचाना है तो सवालों से नहीं भागिए


    नई दिल्ली। व्हाइट हाउस कॉरेस्पोंडेंट्स एसोसिएशन के वार्षिक डिनर में इस बार सबसे प्रमुख मुद्दा प्रेस की स्वतंत्रता और लोकतंत्र की मजबूती रहा। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मौजूदगी में एसोसिएशन के नेताओं ने स्पष्ट संदेश दिया कि लोकतंत्र तभी मजबूत रह सकता है जब मीडिया बिना किसी डर और दबाव के अपना काम करता रहे। कार्यक्रम के दौरान कहा गया कि पत्रकारों से असहमति या उनकी आलोचना लोकतांत्रिक व्यवस्था का सामान्य हिस्सा है लेकिन स्वतंत्र प्रेस को कमजोर करने का कोई भी प्रयास संविधान की भावना और लोकतांत्रिक व्यवस्था दोनों के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।

    एसोसिएशन की निवर्तमान अध्यक्ष वेइजिया जियांग ने अपने संबोधन में कहा कि अमेरिकी इतिहास में राष्ट्रपति और पत्रकारों के रिश्ते हमेशा आसान नहीं रहे हैं। कई बार तीखी बहस और असहमति देखने को मिली है लेकिन इन सबके बावजूद दोनों की जिम्मेदारी जनता के हित में काम करना है। उन्होंने कहा कि पत्रकार सवाल पूछते हैं और सरकार जवाब देती है। इसी संवाद से लोकतंत्र मजबूत होता है और जनता तक सही जानकारी पहुंचती है। उन्होंने राष्ट्रपति ट्रंप को संबोधित करते हुए कहा कि सवाल पूछना और जवाब देना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा है तथा इसे किसी टकराव के रूप में नहीं बल्कि जवाबदेही के रूप में देखा जाना चाहिए।

    जियांग ने राष्ट्रपति ट्रंप के कारोबारी अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि सौदे की भाषा में बात की जाए तो फर्स्ट अमेंडमेंट कोई ऐसा विषय नहीं है जिस पर समझौता किया जा सके। यह अमेरिकी लोकतंत्र की स्थायी और संवैधानिक व्यवस्था है जिसे किसी भी परिस्थिति में कमजोर नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि प्रेस की आलोचना और प्रेस को कमजोर करने की कोशिश के बीच बहुत बड़ा अंतर है। आलोचना व्यवस्था को बेहतर बनाती है जबकि स्वतंत्र मीडिया को कमजोर करने की कोशिश लोकतंत्र की बुनियाद पर चोट करती है।

    इस वर्ष का समारोह विशेष महत्व रखता था क्योंकि निर्धारित समय पर आयोजित होने वाला यह कार्यक्रम अप्रैल में राष्ट्रपति ट्रंप पर हुए हमले के बाद स्थगित कर दिया गया था। अपने संबोधन में जियांग ने उस घटना को याद करते हुए कहा कि हिंसा ने पत्रकारों का मनोबल तोड़ने के बजाय उनकी जिम्मेदारी और संकल्प को और मजबूत किया। उन्होंने बताया कि संकट की उस घड़ी में भी रिपोर्टर फोटोग्राफर और टीवी क्रू लगातार घटनास्थल से तथ्य जुटाने और लोगों तक सही जानकारी पहुंचाने में लगे रहे। उनका कहना था कि यही स्वतंत्र पत्रकारिता की असली पहचान है।

    उन्होंने उस कठिन समय के अनुभव साझा करते हुए बताया कि राष्ट्रपति ट्रंप और उनकी टीम लगातार हालात की समीक्षा कर रही थी और जनता तक सही सूचना पहुंचाने के सर्वोत्तम तरीके पर चर्चा कर रही थी। जियांग ने कहा कि यही जिम्मेदारी पत्रकारों की भी होती है और यही कारण है कि सरकार और मीडिया दोनों का अंतिम उद्देश्य नागरिकों तक विश्वसनीय और सटीक जानकारी पहुंचाना होना चाहिए।

    कार्यक्रम में एसोसिएशन की नवनिर्वाचित अध्यक्ष जैकी हेनरिक ने भी स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता के प्रति संगठन की प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने कहा कि संस्था बिना किसी डर और पक्षपात के तथ्यों की खोज और सत्य को सामने लाने का कार्य जारी रखेगी। उन्होंने कार्यक्रम में शामिल होने के लिए राष्ट्रपति ट्रंप का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह परंपरा लोकतंत्र में स्वतंत्र मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका को सम्मान देने का अवसर है।

    समारोह के दौरान अप्रैल में हुए हमले में बहादुरी दिखाने वाले सीक्रेट सर्विस अधिकारी विक्टर गोंजालेज को सम्मानित किया गया। इसके साथ ही उत्कृष्ट रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों फोटोग्राफरों और मीडिया संस्थानों को भी सम्मान प्रदान किया गया। पूरे कार्यक्रम का केंद्रीय संदेश यही रहा कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए स्वतंत्र प्रेस केवल एक अधिकार नहीं बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण आधारशिला है।

  • फास्ट ट्रैक कोर्ट में 3 माह में होगा परीक्षा जैसे अन्य मामलों का निराकरण : मुख्यमंत्री डॉ. यादव

    फास्ट ट्रैक कोर्ट में 3 माह में होगा परीक्षा जैसे अन्य मामलों का निराकरण : मुख्यमंत्री डॉ. यादव


    भोपाल । मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि मध्यप्रदेश सरकार शिक्षक और विद्यार्थी वर्ग के कल्याण से जुड़े सभी विषयों पर अत्यंत गंभीर और संवेदनशील है। शिक्षा के क्षेत्र में सुधार और विद्यार्थियों के हित में लगातार महत्वपूर्ण निर्णय लिए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा देश की जनता के हित में जब भी कोई निर्णय लिया जाता है, मध्यप्रदेश उसे लागू करने और निर्णय के अनुरूप नीतिगत व्यवस्था बनाने वाला पहला राज्य होता है। समय की जरूरत है कि युवाओं से संबंधित न्यायिक फैसले द्रुत गति से हों। इसके लिए मध्यप्रदेश में 4 फास्ट ट्रैक कोर्ट्स (भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर में) बनाये जायेंगे। पेपर लीक और परीक्षा सहित अन्य मामलों का फास्ट ट्रैक कोर्ट में मात्र 3 माह में निराकरण किया जाएगा। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने शनिवार को मध्यप्रदेश विधानसभा स्थित सेंट्रल हॉल में मीडिया प्रतिनिधियों से चर्चा में यह जानकारी दी।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के मन में विद्यार्थियों के कल्याण और उनसे जुड़े सभी विषयों को लेकर बेहद सकारात्मक भाव हैं। उन्होंने कहा कि जैसे ही नीट पेपर लीक की खबर सामने आई, उसकी जांच के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने तत्काल कार्रवाई करते हुए स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) गठित की। प्रकरण दर्ज हुआ और देशभर में तेज गति से आरोपियों की गिरफ्तारियां भी की गई, फिर दोबारा नीट परीक्षा कराई गई। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि राज्य सरकार पूरी सहानुभूति और संवेदना विद्यार्थियों के साथ है। हम हर परिस्थिति में विद्यार्थियों के साथ खड़े हैं। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने भरोसा दिलाया कि भविष्य में नीट परीक्षाएं बेहतर और पारदर्शी तरीके से सम्पन्न हों, इसके लिए स्टैंडर्ड ऑफ प्रोटोकॉल्स (एसओपी) तैयार कर सभी जरूरी कदम उठाए जाएंगे।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा मध्यप्रदेश वह राज्य है, जहां राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 देश में सबसे पहले लागू की गई। पिछले ढाई साल के कार्यकाल में राज्य सरकार ने 3 नए शासकीय विश्वविद्यालय प्रारंभ किए हैं। प्रदेश में विकास की गतिविधियों को गति देकर तेज़ी लाने के साथ-साथ युवाओं और विद्यार्थियों के लिए कल्याण की चिंता कर इनके हित में निर्णय लेना भी हमारा कर्तव्य है। विद्यार्थियों के लिए कई महत्वपूर्ण निर्णय हमारी सरकार ले चुकी है और यह आगे भी लगातार जारी रहेंगी। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने बताया कि प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में मेडिकल कॉलेज की संख्या दोगुनी से अधिक हो चुकी है। पूरे देश में पहले मात्र 641 विश्वविद्यालय थे, आज इनकी संख्या बढ़कर 1400 से अधिक हो गई है। मेडिकल एजुकेशन की सीटें भी 50 हजार से बढ़कर 1 लाख से अधिक हो चुकी हैं।

  • गोलीबारी के बाद पहली बार कॉरेस्पोंडेंट्स डिनर में पहुंचे ट्रंप, बोले- राजनीतिक हिंसा के आगे कभी नहीं झुकेंगे

    गोलीबारी के बाद पहली बार कॉरेस्पोंडेंट्स डिनर में पहुंचे ट्रंप, बोले- राजनीतिक हिंसा के आगे कभी नहीं झुकेंगे


    वाशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस कॉरेस्पोंडेंट्स डिनर में पहली पूर्ण उपस्थिति दर्ज कराते हुए राजनीतिक हिंसा के खिलाफ कड़ा संदेश दिया। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत संवाद और बहस है, न कि हिंसा। ट्रंप ने स्पष्ट किया कि वह अगले वर्ष भी इस प्रतिष्ठित कार्यक्रम में शामिल होंगे और किसी भी प्रकार की राजनीतिक हिंसा उन्हें या लोकतांत्रिक संस्थाओं को डरा नहीं सकती।

    ट्रंप का यह संबोधन ऐसे समय आया, जब इसी वर्ष अप्रैल में आयोजित होने वाले व्हाइट हाउस कॉरेस्पोंडेंट्स एसोसिएशन (WHCA) डिनर के दौरान गोलीबारी की घटना हुई थी। हमले के बाद कार्यक्रम को स्थगित करना पड़ा था। राष्ट्रपति ने उस घटना को याद करते हुए कहा कि यह केवल किसी व्यक्ति पर नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था और स्वतंत्र प्रेस पर हमला था।

    उन्होंने समारोह में मौजूद सैकड़ों पत्रकारों, प्रशासनिक अधिकारियों और अतिथियों से कहा कि राजनीतिक मतभेदों का समाधान कभी भी गोलियों से नहीं हो सकता। उनके शब्दों में, “हम राजनीतिक हिंसा के सामने झुकने वाले नहीं हैं। हम अपने मतभेदों को खुली और मजबूत बहस के जरिए सुलझाते हैं।” उनके इस बयान पर सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।

    ट्रंप ने हमले के दौरान घायल हुए सीक्रेट सर्विस अधिकारी विक्टर गोंजालेज की विशेष रूप से सराहना की। उन्होंने बताया कि घायल होने के बावजूद गोंजालेज अस्पताल जाने की बजाय अपनी जिम्मेदारी निभाने पर अड़े रहे। राष्ट्रपति ने सीक्रेट सर्विस, मेट्रोपॉलिटन पुलिस और सभी सुरक्षा एजेंसियों का धन्यवाद करते हुए कहा कि उनकी सतर्कता की वजह से बड़ा हादसा टल गया। समारोह में मौजूद लोगों ने भी सुरक्षा अधिकारियों के सम्मान में खड़े होकर तालियां बजाईं।

    अपने भाषण में ट्रंप ने हल्के-फुल्के अंदाज में यह भी स्वीकार किया कि गोलीबारी के बाद उन्हें अपना पहले से तैयार किया गया “ज्यादा आक्रामक” भाषण बदलना पड़ा। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि वह भाषण शायद अब कभी नहीं दिया जाएगा, हालांकि उन्होंने कार्यक्रम के दौरान राजनीतिक विरोधियों और मीडिया पर हल्के-फुल्के व्यंग्य भी किए।

    राष्ट्रपति ने व्हाइट हाउस प्रेस कोर की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि अधिकांश पत्रकार अपना काम पूरी निष्ठा से करते हैं। उन्होंने व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट के बारे में मजाक करते हुए कहा कि उनके पास सबसे कठिन जिम्मेदारियों में से एक है, क्योंकि उन्हें हर दिन पत्रकारों के कठिन सवालों का सामना करना पड़ता है।

    ट्रंप ने व्हाइट हाउस कॉरेस्पोंडेंट्स एसोसिएशन की मौजूदा अध्यक्ष वेइजिया जियांग की भी प्रशंसा की और कहा कि कठिन परिस्थितियों में साथ काम करने से दोनों के बीच आपसी सम्मान बढ़ा है। साथ ही उन्होंने नई अध्यक्ष जैकी हेनरिक को शुभकामनाएं देते हुए उन्हें एक बेहद सख्त लेकिन सक्षम पत्रकार बताया।

    कार्यक्रम के दौरान ट्रंप ने भविष्य में व्हाइट हाउस परिसर में बन रहे नए बॉलरूम में कॉरेस्पोंडेंट्स डिनर आयोजित करने का सुझाव भी दिया। उन्होंने कहा कि निर्माण कार्य तय समय से पहले और बजट के भीतर पूरा हो रहा है। अपने संबोधन के अंत में ट्रंप ने अमेरिका के भविष्य को लेकर भरोसा जताते हुए कहा कि देश एक बड़े परिवर्तन के दौर में प्रवेश कर रहा है और यह “अमेरिका का स्वर्ण युग” साबित होगा।

  • 'विनीत जोशी का ट्रांसफर सजा नहीं, जवाबदेही तय करे सरकार', NEET विवाद पर विजेता दहिया का हमला

    'विनीत जोशी का ट्रांसफर सजा नहीं, जवाबदेही तय करे सरकार', NEET विवाद पर विजेता दहिया का हमला


    नई दिल्ली। NEET पेपर लीक विवाद को लेकर देशभर में जारी छात्र आंदोलन के बीच कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) की पूर्व प्रवक्ता विजेता दहिया ने परीक्षा प्रणाली की जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि किसी अधिकारी का सिर्फ तबादला कर देना समस्या का समाधान नहीं है और न ही इसे सजा माना जा सकता है। उनका कहना है कि जब किसी विभाग में गंभीर लापरवाही या अनियमितता सामने आती है तो जिम्मेदारी तय होना सबसे जरूरी है।

    आईएएनएस से बातचीत में विजेता दहिया ने कहा कि NEET जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्र महीनों नहीं, बल्कि कई बार वर्षों तक दिन-रात मेहनत करते हैं। परीक्षा के बाद सफलता की उम्मीद लेकर बैठे छात्रों को जब यह पता चलता है कि पेपर लीक जैसी घटनाओं के कारण पूरी परीक्षा प्रक्रिया सवालों के घेरे में आ गई है और दोबारा परीक्षा देनी पड़ सकती है, तो इसका उनके मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ता है। उन्होंने कहा कि यही वजह है कि कई लोग इन घटनाओं से जुड़ी छात्र मौतों को केवल आत्महत्या नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का परिणाम मानते हैं।

    दहिया ने दावा किया कि छात्र आंदोलन को लेकर सरकार और सीजेपी के प्रतिनिधियों के बीच सकारात्मक बातचीत हुई है। उनके अनुसार सरकार ने सिद्धांततः यह आश्वासन दिया है कि पेपर लीक प्रकरण से प्रभावित होकर जान गंवाने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजा देने पर विचार किया जाएगा। इसके अलावा आंदोलनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस लेने का भी भरोसा दिया गया है। हालांकि उन्होंने कहा कि आंदोलन की तीसरी और प्रमुख मांग शिक्षा मंत्री के इस्तीफे तथा जिम्मेदारी तय करने की रही है।

    उन्होंने स्पष्ट किया कि आंदोलन का उद्देश्य केवल विरोध प्रदर्शन करना नहीं, बल्कि परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही और सुधार सुनिश्चित कराना है। उनका मानना है कि देश के लाखों छात्रों का भरोसा तभी लौटेगा, जब सरकार ठोस और प्रभावी कदम उठाएगी।

    विपक्षी दलों से फंडिंग मिलने के आरोपों को भी विजेता दहिया ने सिरे से खारिज किया। उन्होंने कहा कि यह आंदोलन पूरी तरह आम लोगों के सहयोग से चल रहा है। कई लोग अपनी क्षमता के अनुसार भोजन, पंखे, कूलर, कालीन और अन्य आवश्यक सामान उपलब्ध करा रहे हैं। उन्होंने कहा कि कई बार इतनी अधिक सहायता मिल जाती है कि अतिरिक्त सहयोग लेने से भी मना करना पड़ता है। उनके अनुसार यह किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि जनता और छात्रों का आंदोलन है।

    विजेता दहिया ने कहा कि वे अब सीजेपी की आधिकारिक प्रवक्ता नहीं हैं, लेकिन एक समर्थक के रूप में आंदोलन से जुड़े हुए हैं। उन्होंने कहा कि शुरुआत से ही राजनीतिक दलों से अपील की गई थी कि यदि वे छात्रों का समर्थन करना चाहते हैं तो पार्टी के झंडों के बिना आंदोलन में शामिल हों। उन्होंने माना कि विभिन्न दलों के समर्थन से आंदोलन को मजबूती मिली है, लेकिन इसकी मूल भावना गैर-दलीय जन आंदोलन की ही है।

    उच्च शिक्षा सचिव विनीत जोशी के तबादले का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि यदि किसी अधिकारी के कार्यकाल में इतनी बड़ी गड़बड़ी सामने आती है तो केवल विभाग बदल देना जवाबदेही तय करने के बराबर नहीं है। उनका कहना है कि वास्तविक सुधार तभी संभव होगा, जब जिम्मेदार लोगों के खिलाफ स्पष्ट कार्रवाई हो और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए मजबूत व्यवस्था बनाई जाए।

  • NEET विवाद पर बड़ा फैसला 36 दिन के आंदोलन के बाद धर्मेंद्र प्रधान ने छोड़ा पद सरकार ने स्वीकारा इस्तीफा

    NEET विवाद पर बड़ा फैसला 36 दिन के आंदोलन के बाद धर्मेंद्र प्रधान ने छोड़ा पद सरकार ने स्वीकारा इस्तीफा


    नई दिल्ली: देशभर में परीक्षा प्रणाली को लेकर उठे विवाद और दिल्ली के जंतर-मंतर पर 36 दिनों से जारी छात्र आंदोलन के बीच केंद्र सरकार ने बड़ा राजनीतिक फैसला लेते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा स्वीकार कर लिया है। लंबे समय से छात्र संगठन, विपक्षी दल और विभिन्न सामाजिक संगठन परीक्षा प्रणाली में कथित गड़बड़ियों को लेकर उनकी जवाबदेही तय करने और इस्तीफे की मांग कर रहे थे। सरकार के इस फैसले को आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

    पिछले कई सप्ताह से राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर हजारों छात्र लगातार प्रदर्शन कर रहे थे। आंदोलन के दौरान सरकार और छात्र प्रतिनिधियों के बीच कई दौर की बातचीत भी हुई, लेकिन शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग पर सहमति नहीं बन सकी थी। आखिरकार सरकार ने बड़ा निर्णय लेते हुए धर्मेंद्र प्रधान को पद छोड़ने का निर्देश दिया और उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया।

    इस्तीफे की खबर सामने आते ही जंतर-मंतर पर मौजूद प्रदर्शनकारियों में उत्साह का माहौल बन गया। छात्रों ने नारेबाजी कर इसे लोकतांत्रिक संघर्ष और एकजुटता की जीत बताया। छात्र नेताओं का कहना है कि यह केवल पहला कदम है और अब सरकार को परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, जवाबदेही और व्यापक शिक्षा सुधारों के लिए ठोस कदम उठाने होंगे।

    विपक्षी दलों ने भी इस घटनाक्रम को छात्रों और जनता की आवाज की जीत बताया है। विपक्ष का दावा है कि संसद से लेकर सड़क तक लगातार बने जनदबाव और विरोध प्रदर्शनों के कारण सरकार को यह फैसला लेना पड़ा। विपक्षी नेताओं ने शिक्षा व्यवस्था में सुधार और परीक्षा प्रणाली को अधिक विश्वसनीय बनाने की मांग दोहराई है।

    अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी किसे सौंपी जाएगी। राजनीतिक गलियारों में नए शिक्षा मंत्री के नाम को लेकर चर्चाएं तेज हैं। माना जा रहा है कि केंद्र सरकार जल्द ही नए शिक्षा मंत्री की घोषणा कर सकती है और शिक्षा सुधारों के लिए नई कार्ययोजना भी सामने ला सकती है।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच देशभर के छात्र और अभिभावक सरकार के अगले कदम पर नजर बनाए हुए हैं। उम्मीद की जा रही है कि आने वाले समय में प्रतियोगी परीक्षाओं की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, सुरक्षित और तकनीक आधारित बनाने के लिए बड़े फैसले लिए जा सकते हैं।

  • देश की राजनीति में बड़ा झटका NEET विवाद के बीच धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा जवाबदेही का दिया संदेश

    देश की राजनीति में बड़ा झटका NEET विवाद के बीच धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा जवाबदेही का दिया संदेश

    नई दिल्ली: देशभर में NEET-UG परीक्षा में कथित अनियमितताओं को लेकर जारी विवाद के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपना इस्तीफा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेजते हुए कहा कि उन्होंने हमेशा शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए काम किया है और किसी भी परिस्थिति में अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हटे।

    धर्मेंद्र प्रधान ने सोशल मीडिया पर अपने इस्तीफे की जानकारी साझा करते हुए एक भावुक संदेश भी जारी किया। उन्होंने लिखा कि पिछले चार दशक से अधिक समय से वे छात्र, शिक्षक और शिक्षा सुधार के लिए समर्पित रहे हैं। उनका विश्वास हमेशा इस बात पर रहा है कि मजबूत, समावेशी और दूरदर्शी शिक्षा व्यवस्था ही किसी भी राष्ट्र के विकास की आधारशिला होती है।

    उन्होंने अपने पत्र में कहा कि 3 मई 2026 को आयोजित NEET-UG परीक्षा में अनियमितताओं की शिकायतें सामने आने के बाद केंद्र सरकार ने तत्काल कार्रवाई की। मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई, परीक्षा रद्द कर दोबारा आयोजित करने का निर्णय लिया गया और अगले वर्ष से NEET परीक्षा को पूरी तरह कंप्यूटर आधारित टेस्ट (CBT) मोड में कराने की घोषणा भी की गई।

    धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि सरकार ने परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता और छात्रों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। उनका मानना है कि सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसी भावना के तहत उन्होंने अपना इस्तीफा सौंपने का निर्णय लिया।

    गौरतलब है कि NEET-UG परीक्षा में कथित पेपर लीक और अन्य अनियमितताओं को लेकर पिछले कई सप्ताह से देशभर में छात्र संगठन प्रदर्शन कर रहे थे। दिल्ली के जंतर-मंतर सहित कई राज्यों में परीक्षा प्रणाली में सुधार, दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और जवाबदेही तय करने की मांग उठाई जा रही थी।

    हालांकि, इस घटनाक्रम पर केंद्र सरकार की ओर से आधिकारिक रूप से इस्तीफा स्वीकार किए जाने अथवा नए शिक्षा मंत्री की नियुक्ति को लेकर विस्तृत जानकारी का इंतजार है।

    नोट: यह खबर आपके द्वारा साझा की गई जानकारी पर आधारित है। यदि आधिकारिक तौर पर राष्ट्रपति भवन या प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से इस्तीफा स्वीकार किए जाने या नए मंत्री की घोषणा होती है, तो उससे संबंधित स्थिति अलग हो सकती है।

  • SVEP से ग्रामीण उद्यमिता को नई उड़ान, 4.32 लाख कारोबारों को मिला सहारा; 86% लाभार्थी वंचित वर्गों से

    SVEP से ग्रामीण उद्यमिता को नई उड़ान, 4.32 लाख कारोबारों को मिला सहारा; 86% लाभार्थी वंचित वर्गों से


    नई दिल्ली: ग्रामीण भारत में उद्यमिता को बढ़ावा देने और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ाने की दिशा में केंद्र सरकार की स्टार्ट-अप विलेज एंटरप्रेन्योरशिप प्रोग्राम (SVEP) योजना प्रभावी साबित हो रही है। सरकार ने शनिवार को जानकारी दी कि जून 2026 के अंत तक इस योजना के माध्यम से 4.32 लाख ग्रामीण उद्यमों को सहायता प्रदान की जा चुकी है। इससे न केवल हजारों लोगों को स्वरोजगार मिला है, बल्कि उनकी आय और मुनाफे में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।

    सरकार के अनुसार, इस योजना का सबसे बड़ा लाभ समाज के वंचित वर्गों तक पहुंचा है। करीब 86 प्रतिशत लाभार्थी उद्यमी अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और अल्पसंख्यक समुदायों से आते हैं। यह योजना सामाजिक समावेशन और आर्थिक सशक्तिकरण का मजबूत उदाहरण बनकर उभरी है।

    असम, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश ऐसे राज्य हैं, जहां SVEP के तहत सबसे अधिक ग्रामीण उद्यम स्थापित किए गए हैं। इन राज्यों में स्थानीय स्तर पर छोटे व्यवसायों को प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और संस्थागत सहयोग मिलने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति मिली है।

    SVEP का संचालन स्टेट रूरल लाइवलीहुड मिशन (SRLM) के माध्यम से किया जाता है। इसके तहत गैर-कृषि आधारित ग्रामीण उद्यमों को व्यवसाय शुरू करने और आगे बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण, मेंटरिंग, वित्तीय सहायता तथा सामुदायिक सहयोग उपलब्ध कराया जाता है। योजना का उद्देश्य गांवों में आत्मनिर्भर उद्यमियों की नई पीढ़ी तैयार करना है।

    सरकार ने बताया कि स्वयं सहायता समूह (SHG), कम्युनिटी रिसोर्स पर्सन-एंटरप्राइज प्रमोशन (CRP-EP), बैंक लिंकेज और प्रधानमंत्री मुद्रा योजना जैसी योजनाओं के साथ समन्वय कर SVEP का दायरा लगातार बढ़ाया गया है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में उद्यम शुरू करने के लिए वित्त और मार्गदर्शन दोनों उपलब्ध हो रहे हैं।

    योजना के विस्तार के लिए केंद्र सरकार ने फरवरी 2026 तक 942.09 करोड़ रुपए की केंद्रीय हिस्सेदारी जारी की है। यह राशि योजना की शुरुआत के शुरुआती वर्षों में जारी 112.39 करोड़ रुपए की तुलना में लगभग 738 प्रतिशत अधिक है, जो सरकार की बढ़ती प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

    योजना के तहत प्रत्येक ब्लॉक के लिए 6.50 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है, जबकि प्रति उद्यम औसत निवेश 27,083 रुपए निर्धारित किया गया है। सरकार का कहना है कि सीमित निवेश के बावजूद यह मॉडल ग्रामीण क्षेत्रों में टिकाऊ और लाभकारी व्यवसाय स्थापित करने में सफल रहा है।

    SVEP की एक खास विशेषता इसका कम्युनिटी रिसोर्स पर्सन-एंटरप्राइज प्रमोशन (CRP-EP) मॉडल है। इन संसाधन व्यक्तियों का चयन प्रशिक्षण और प्रमाणन के बाद किया जाता है। इनमें स्थानीय लोगों को प्राथमिकता दी जाती है और कम से कम 90 प्रतिशत CRP-EP स्वयं सहायता समूहों से जुड़े परिवारों से चुने जाते हैं। साथ ही इस कैडर में महिलाओं की न्यूनतम 60 प्रतिशत भागीदारी सुनिश्चित की गई है।

    प्रत्येक CRP-EP लगभग 50 उद्यमों को प्रशिक्षण, व्यवसायिक मार्गदर्शन, बैंक ऋण और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराने में सहयोग करता है। सरकार का मानना है कि मजबूत सामुदायिक संस्थाओं और स्थानीय नेतृत्व के सहयोग से ग्रामीण उद्यमिता न केवल गरीबी उन्मूलन का प्रभावी माध्यम बन रही है, बल्कि महिलाओं, युवाओं और पहली पीढ़ी के उद्यमियों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने में भी अहम भूमिका निभा रही है।

  • 69 हजार 725 करोड़ का मेगा निवेश भारत को वैश्विक शिपबिल्डिंग हब बनाने की तैयारी समुद्री अर्थव्यवस्था को मिलेगा बूस्ट

    69 हजार 725 करोड़ का मेगा निवेश भारत को वैश्विक शिपबिल्डिंग हब बनाने की तैयारी समुद्री अर्थव्यवस्था को मिलेगा बूस्ट


    नई दिल्ली: भारत को वैश्विक समुद्री शक्ति बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाते हुए देश के जहाज निर्माण (शिपबिल्डिंग) उद्योग के लिए 69,725 करोड़ रुपए के व्यापक पैकेज को मंजूरी दी है। इस महत्वाकांक्षी पैकेज का उद्देश्य घरेलू शिपयार्ड की क्षमता बढ़ाना, उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाना, समुद्री क्षेत्र के लिए दीर्घकालिक वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना और रोजगार के नए अवसर सृजित करना है।

    लोकसभा में पत्तन, पोत परिवहन एवं जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने बताया कि सरकार भारतीय शिपबिल्डिंग सेक्टर को मजबूत करने के लिए बहुस्तरीय रणनीति पर काम कर रही है। इसके तहत 24,736 करोड़ रुपए की शिपबिल्डिंग फाइनेंशियल असिस्टेंस स्कीम लागू की जाएगी, जिससे भारतीय शिपयार्ड की लागत वैश्विक शिपयार्ड के मुकाबले अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकेगी।

    इस पैकेज का सबसे बड़ा हिस्सा 25,000 करोड़ रुपए का मैरीटाइम डेवलपमेंट फंड है। इसमें 20,000 करोड़ रुपए का मैरीटाइम इन्वेस्टमेंट फंड और 5,000 करोड़ रुपए का इंटरेस्ट इंसेंटिवाइजेशन फंड शामिल किया गया है। इस फंड के जरिए जहाज निर्माण, बंदरगाहों और समुद्री अवसंरचना परियोजनाओं को दीर्घकालिक वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाएगी।

    सरकार ने 19,989 करोड़ रुपए की शिपबिल्डिंग डेवलपमेंट स्कीम (SBDS) को भी मंजूरी दी है। इस योजना के तहत नए ग्रीनफील्ड शिपबिल्डिंग क्लस्टर विकसित किए जाएंगे और मौजूदा शिपयार्ड का विस्तार किया जाएगा। सरकार का लक्ष्य देश की जहाज निर्माण क्षमता बढ़ाकर प्रति वर्ष 45 लाख ग्रॉस टनेज तक पहुंचाना है।

    यह पहल मैरीटाइम इंडिया विजन 2030 और मैरीटाइम अमृतकाल विजन 2047 के अनुरूप है, जिनका उद्देश्य भारत को विश्व के प्रमुख जहाज निर्माण केंद्रों में शामिल करना है। सरकार का मानना है कि इससे समुद्री व्यापार, निर्यात और औद्योगिक विकास को नई गति मिलेगी।

    शिपबिल्डिंग उद्योग को प्रोत्साहन देने के लिए सरकार ने कई नीतिगत सुधार भी किए हैं। 19 सितंबर 2025 को 10,000 ग्रॉस टनेज (GT) या उससे अधिक क्षमता वाले भारतीय ध्वज वाले वाणिज्यिक जहाजों और भारत में निर्मित 1,500 GT या उससे अधिक क्षमता वाले जहाजों को इन्फ्रास्ट्रक्चर का दर्जा दिया गया था। इससे इस क्षेत्र में निवेश आकर्षित करने और वित्तपोषण आसान बनाने में मदद मिलेगी।

    सरकार ने जहाजों की मांग को एकीकृत करने की रणनीति भी तैयार की है। इसके तहत 400 से अधिक नए जहाजों के अधिग्रहण की योजना बनाई गई है, जिससे भारतीय शिपयार्ड को लंबे समय तक ऑर्डर मिलने की स्पष्टता रहेगी और उद्योग में स्थिरता आएगी।

    इसके अलावा आंध्र प्रदेश, गुजरात और तमिलनाडु में तीन नए ग्रीनफील्ड शिपबिल्डिंग क्लस्टर विकसित करने को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी गई है। इन क्लस्टरों के जरिए आधुनिक तकनीक, कौशल विकास, रोजगार सृजन और समुद्री उद्योग के विस्तार को बढ़ावा मिलेगा।

    सरकार का मानना है कि यह ऐतिहासिक निवेश पैकेज भारत की समुद्री अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाई देगा, घरेलू जहाज निर्माण उद्योग को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करेगा और देश को भविष्य में एक प्रमुख वैश्विक शिपबिल्डिंग हब के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

  • NEET पेपर लीक पर मध्य प्रदेश में आक्रोश 20 जिलों में प्रदर्शन इंदौर से उठी सबसे बुलंद आवाज

    NEET पेपर लीक पर मध्य प्रदेश में आक्रोश 20 जिलों में प्रदर्शन इंदौर से उठी सबसे बुलंद आवाज


    भोपाल । NEET पेपर लीक और दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों के साथ कथित पुलिस कार्रवाई के विरोध में मध्य प्रदेश के 20 से अधिक जिलों में विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। सबसे बड़ा आंदोलन इंदौर के टंट्या भील चौराहे पर चल रहा है, जहां 30 जून को सिर्फ 5 छात्रों से शुरू हुआ धरना अब हजारों लोगों का आंदोलन बन चुका है।

    इंदौर में शनिवार को एक छात्रा नीम की पत्तियां लेकर प्रदर्शन में पहुंची। उसने कहा कि जिस तरह नीम बैक्टीरिया खत्म करती है, उसी तरह शिक्षा व्यवस्था में फैली गड़बड़ियों को भी साफ करने की जरूरत है। लगातार बारिश के बावजूद छात्र पिछले 25 दिनों से धरने पर डटे हुए हैं। आंदोलन स्थल पर पुलिस ड्रोन से निगरानी कर रही है।

    भोपाल के बोर्ड ऑफिस चौराहे पर भी छात्रों का धरना जारी है। प्रदर्शनकारी केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं।

    ग्वालियर में आंदोलन को लेकर समर्थक और विरोधी आमने-सामने आ गए, जबकि जबलपुर में “कॉकरोच जनता पार्टी” के विरोध में “लाल हिट जनता पार्टी” ने प्रदर्शन किया। संगठन ने कहा कि छात्रों की मांगें उचित हैं, लेकिन विरोध का तरीका सही नहीं है।

    धार, मऊगंज, नर्मदापुरम, झाबुआ, सिंगरौली, भिंड, टीकमगढ़, शाजापुर, सतना, सीधी, रतलाम, रीवा, बैतूल, उमरिया, बड़वानी और श्योपुर सहित कई जिलों में भी रैलियां, धरने और ज्ञापन सौंपे गए। कुछ स्थानों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प भी हुई तथा कई कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया।

    प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगों में NEET पेपर लीक की निष्पक्ष जांच, दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई, परीक्षा प्रणाली में सुधार और केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग शामिल है। वहीं, विभिन्न छात्र संगठनों और राजनीतिक दलों ने भी आंदोलन को अपना समर्थन दिया है, जिससे यह विरोध अब राज्यव्यापी रूप ले चुका है।

  • मुख्यमंत्री मोहन यादव का बड़ा प्रशासनिक फैसला 20 आईएएस अफसरों का ट्रांसफर 6 जिलों में नए कलेक्टर तैनात

    मुख्यमंत्री मोहन यादव का बड़ा प्रशासनिक फैसला 20 आईएएस अफसरों का ट्रांसफर 6 जिलों में नए कलेक्टर तैनात


    भोपाल । मध्य प्रदेश सरकार ने मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल की नियुक्ति के 24 घंटे के भीतर बड़ा प्रशासनिक फेरबदल करते हुए 20 भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारियों के तबादले कर दिए हैं। इस व्यापक प्रशासनिक सर्जरी में छह जिलों के कलेक्टर बदले गए हैं, वहीं मुख्यमंत्री सचिवालय और कई महत्वपूर्ण विभागों में भी नई जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। सरकार का यह कदम आगामी ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट (GIS-2027) और प्रशासनिक कार्यों को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में अहम माना जा रहा है।

    सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा जारी आदेश के अनुसार अपर मुख्य सचिव डॉ. राजेश राजौरा को प्रशासन अकादमी का महानिदेशक (DG) नियुक्त किया गया है। वहीं इंदौर संभाग के आयुक्त डॉ. सुदाम पी. खाड़े को मुख्यमंत्री सचिवालय में सचिव बनाया गया है। उनकी जगह भास्कर लक्षकार को नया इंदौर संभागायुक्त नियुक्त किया गया है।

    मुख्यमंत्री के अपर मुख्य सचिव नीरज मंडलोई को जनवरी 2027 में भोपाल में प्रस्तावित ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट (GIS-2027) की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इसके साथ ही उन्हें उद्योग एवं एमएसएमई विभाग का प्रभार भी दिया गया है। यह विभाग अब तक प्रमुख सचिव राघवेंद्र सिंह के पास था।

    सरकार ने छह जिलों में नए कलेक्टरों की नियुक्ति की है। अजय कटेसरिया को रतलाम, मिशा सिंह को शहडोल, रत्नाकर झा को अनूपपुर, गुरु प्रसाद को खरगोन, दिव्यांक सिंह को मंदसौर और डॉ. शेर सिंह मीना को आगर मालवा का नया कलेक्टर बनाया गया है। वहीं शहडोल के पूर्व कलेक्टर केदार सिंह को लोक निर्माण विभाग में अपर सचिव के रूप में पदस्थ किया गया है।

    मंदसौर की कलेक्टर अदिति गर्ग को खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग में ओएसडी सह आयुक्त बनाया गया है, जबकि आगर मालवा की कलेक्टर प्रीति यादव को औद्योगिक विकास निगम, इंदौर का कार्यकारी संचालक नियुक्त किया गया है। खरगोन की कलेक्टर भव्या मित्तल दो वर्ष की अध्ययन अवकाश (स्टडी लीव) पर चली गई हैं, जिसके चलते वहां गुरु प्रसाद को जिम्मेदारी सौंपी गई है।

    रतलाम के नए कलेक्टर अजय कटेसरिया की नियुक्ति विशेष चर्चा में है। सामान्य प्रशासन विभाग में रहते हुए उन्होंने पदोन्नति नियम-2025 तैयार करने और सरकार की प्राथमिकता वाले समान नागरिक संहिता (UCC) के प्रारूप को तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। पहली बार उन्हें किसी जिले की कलेक्टरी का दायित्व सौंपा गया है।

    प्रशासनिक फेरबदल के तहत प्रमुख सचिव संदीप यादव को जल संसाधन विभाग की जिम्मेदारी दी गई है। अब केन-बेतवा और पार्वती-कालीसिंध जैसी महत्वपूर्ण परियोजनाओं की निगरानी भी वही करेंगे। नर्मदा घाटी विकास (NVD) विभाग का प्रभार प्रमुख सचिव ई. रमेश कुमार को सौंपा गया है। वहीं मनीष सिंह को ऊर्जा विभाग का अतिरिक्त प्रभार और सचिन सिन्हा को लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी (PHE) विभाग का अपर मुख्य सचिव बनाया गया है। राघवेंद्र सिंह को वन विभाग का प्रमुख सचिव नियुक्त करते हुए आनंद विभाग का अतिरिक्त प्रभार भी दिया गया है।

    इस फेरबदल का असर महिला कलेक्टरों की संख्या पर भी पड़ा है। एक माह पहले प्रदेश के 55 जिलों में 17 महिला कलेक्टर कार्यरत थीं, लेकिन अब यह संख्या घटकर 15 रह गई है। हालांकि मिशा सिंह की शहडोल में नियुक्ति से आंशिक संतुलन बना है। माना जा रहा है कि यह प्रशासनिक बदलाव सरकार की आगामी विकास योजनाओं और निवेश आधारित परियोजनाओं को गति देने की रणनीति का हिस्सा है।