Author: bharati

  • बड़वानी में बड़ा खुलासा: नर्मदा किनारे अवैध भट्टों से बढ़ रहा प्रदूषण और स्वास्थ्य संकट

    बड़वानी में बड़ा खुलासा: नर्मदा किनारे अवैध भट्टों से बढ़ रहा प्रदूषण और स्वास्थ्य संकट


    मध्यप्रदेश। बड़वानी जिले के राजघाट क्षेत्र में नर्मदा नदी के किनारे पर्यावरण नियमों की खुलेआम अनदेखी सामने आई है। सावरिया हॉस्पिटल से लेकर राजघाट के पहले पुल तक महज 500 मीटर के दायरे में सड़क के दोनों ओर लगभग 140 अवैध ईंट भट्टे धड़ल्ले से संचालित हो रहे हैं। यहां बड़े पैमाने पर व्यावसायिक ईंट उत्पादन किया जा रहा है, जिससे प्रतिवर्ष करोड़ों ईंटें तैयार हो रही हैं और आसपास के जिलों तक सप्लाई की जा रही हैं।

    स्थानीय स्तर पर तैयार हो रही ये ईंटें 6500 रुपए प्रति हजार के भाव से बिक रही हैं और ट्रैक्टर, आयसर व ट्रकों के जरिए धार, इंदौर, खरगोन सहित महाराष्ट्र के शाहदा तक पहुंचाई जा रही हैं। हालांकि इस व्यावसायिक गतिविधि का सबसे गंभीर असर पर्यावरण और जनस्वास्थ्य पर पड़ रहा है।

    ग्रामीणों और चिकित्सकों का कहना है कि भट्टों से निकलने वाला धुआं आसपास के वातावरण को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। अस्पतालों में सांस संबंधी मरीजों की संख्या बढ़ रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि खेतों पर गिरने वाली राख से फसल उत्पादन भी प्रभावित हो रहा है, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।

    नियमों के अनुसार मध्यप्रदेश गौण खनिज नियम 1996 और एनजीटी के प्रावधानों के तहत नदी किनारे 800 मीटर के दायरे में किसी भी ईंट भट्टे का संचालन प्रतिबंधित है। इसके अलावा जल संरचनाओं के 100 मीटर दायरे में भी खनन कार्य की अनुमति नहीं है। इसके बावजूद कई भट्टे बैकवाटर से मात्र 200 मीटर की दूरी पर संचालित हो रहे हैं।

    पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार यह स्थिति गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि लगातार बढ़ता प्रदूषण न केवल नर्मदा के पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर रहा है, बल्कि क्षेत्रीय स्वास्थ्य और कृषि व्यवस्था पर भी दीर्घकालिक असर डाल सकता है। प्रशासनिक कार्रवाई की मांग लगातार तेज हो रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति जस की तस बनी हुई है।

  • मध्य प्रदेश में सत्ता वापसी की कोशिश: कांग्रेस ने बनाया नया ट्राइबल वोट रणनीति फॉर्मूला

    मध्य प्रदेश में सत्ता वापसी की कोशिश: कांग्रेस ने बनाया नया ट्राइबल वोट रणनीति फॉर्मूला


    मध्यप्रदेश। मध्य प्रदेश में ‘मसाला गुटखा’ पर 2012 में लगाए गए प्रतिबंध के बावजूद जमीनी हकीकत चिंताजनक बनी हुई है। सरकार ने उस समय तंबाकू और सुपारी के खतरनाक मिश्रण को रोकने के लिए सख्त कदम उठाने का दावा किया था, लेकिन 14 साल बाद भी ओरल कैंसर के मामलों में कमी के बजाय बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है।

    जवाहरलाल नेहरू कैंसर अस्पताल के आंकड़ों के अनुसार प्रतिबंध के बाद से ओरल कैंसर के मरीजों में लगभग 42.37 प्रतिशत तक की वृद्धि देखी गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रतिबंध का वास्तविक असर इसलिए नहीं दिखा क्योंकि गुटखा कंपनियों ने अपने उत्पाद बेचने का तरीका बदल दिया।

    प्रतिबंध के बाद कंपनियों ने ‘ट्विन-पाउच’ सिस्टम शुरू किया, जिसमें पान मसाला और तंबाकू को अलग-अलग पैकेट में बेचा जाने लगा। उपभोक्ता दोनों को मिलाकर उपयोग करते हैं, जिससे अंतिम उत्पाद वही खतरनाक मिश्रण बन जाता है जिसे रोकने के लिए बैन लगाया गया था।

    विशेषज्ञों के अनुसार, यह व्यवस्था कानून की एक तकनीकी खामी का फायदा उठाती है, क्योंकि नियम केवल मिश्रित उत्पाद पर रोक लगाते हैं, जबकि अलग-अलग पैकेट में बिक्री वैध मानी जाती है। परिणामस्वरूप बाजार में तंबाकू की उपलब्धता और उसका सेवन लगभग पहले जैसा ही बना हुआ है।

    डॉक्टरों का कहना है कि ओरल कैंसर के शुरुआती लक्षणों को पहचानना बेहद जरूरी है। यदि किसी व्यक्ति को मुंह खोलने में दिक्कत, लंबे समय तक घाव या सफेद-लाल धब्बे जैसे लक्षण दिखें तो तुरंत चिकित्सकीय जांच करानी चाहिए। शुरुआती चरण में इलाज से बीमारी को गंभीर रूप लेने से रोका जा सकता है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों की राय है कि जब तक तंबाकू उत्पादों पर सख्त और व्यावहारिक नियंत्रण नहीं होगा, तब तक ओरल कैंसर के मामलों में उल्लेखनीय कमी लाना मुश्किल रहेगा।

  • मन की बात में चोल ताम्र-पत्रों की वापसी पर पीएम मोदी का जिक्र, बोले- यह हर भारतीय के लिए गर्व और खुशी का क्षण

    मन की बात में चोल ताम्र-पत्रों की वापसी पर पीएम मोदी का जिक्र, बोले- यह हर भारतीय के लिए गर्व और खुशी का क्षण

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को ‘मन की बात’ कार्यक्रम में भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत से जुड़े एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम का उल्लेख करते हुए नीदरलैंड से 11वीं सदी के चोल काल के ताम्र-पत्रों की वापसी को हर भारतीय के लिए गर्व और खुशी का क्षण बताया। उन्होंने कहा कि यह केवल ऐतिहासिक दस्तावेजों की वापसी नहीं है, बल्कि भारत की समृद्ध सभ्यता और सांस्कृतिक पहचान को पुनः प्राप्त करने जैसा है, जो देशवासियों के लिए अत्यंत भावनात्मक और प्रेरणादायक क्षण है।

    प्रधानमंत्री ने बताया कि हाल ही में अपनी नीदरलैंड यात्रा के दौरान उन्हें एक विशेष समारोह में इन प्राचीन ताम्र-पत्रों को भारत को सौंपे जाने का अवसर मिला। इस दौरान नीदरलैंड के प्रधानमंत्री भी मौजूद थे। उन्होंने कहा कि यह क्षण इसलिए भी विशेष था क्योंकि देश-विदेश से लगातार लोगों के संदेश प्राप्त हो रहे हैं, जिसमें भारतीय समुदाय और विशेष रूप से तमिल समाज ने इस ऐतिहासिक वापसी पर गहरा उत्साह और गर्व व्यक्त किया है।

    इन ताम्र-पत्रों के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए प्रधानमंत्री ने बताया कि यह कुल 24 पट्टिकाएं हैं, जिनमें 21 बड़ी और 3 छोटी पट्टिकाएं शामिल हैं। ये मुख्य रूप से चोल शासक राजराजा चोला प्रथम और उनके पुत्र राजेंद्र चोला प्रथम से जुड़े ऐतिहासिक विवरणों को दर्शाती हैं। इनमें एक महत्वपूर्ण घटना का उल्लेख है जिसमें आनइमंगलम गांव को एक बौद्ध विहार को दान देने की जानकारी मिलती है, जो उस समय की धार्मिक सहिष्णुता और सामाजिक संरचना को दर्शाता है।

    प्रधानमंत्री ने कहा कि इन ताम्र-पत्रों में चोल साम्राज्य की समुद्री शक्ति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों का भी विस्तृत उल्लेख मिलता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि चोल वंश का प्रभाव केवल भारतीय उपमहाद्वीप तक सीमित नहीं था, बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों के साथ भी उनके व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंध मजबूत थे। यह भारत के प्राचीन समुद्री इतिहास और वैश्विक संपर्कों का महत्वपूर्ण प्रमाण है।

    उन्होंने कहा कि चोल साम्राज्य की यह ऐतिहासिक धरोहर भारत की गौरवशाली परंपरा का प्रतीक है और इसे संरक्षित रखना अत्यंत आवश्यक है। सरकार की ओर से देश की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहरों को सुरक्षित रखने और उन्हें वापस लाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। इसी क्रम में ‘ज्ञान भारतम् अभियान’ के तहत भी प्राचीन ऐतिहासिक दस्तावेजों और शिलालेखों की खोज और संरक्षण का कार्य किया जा रहा है।

    प्रधानमंत्री ने छत्तीसगढ़ के मल्हार क्षेत्र में हाल ही में हुई एक महत्वपूर्ण खोज का भी उल्लेख किया, जहां तीन दुर्लभ ताम्र-पत्र प्राप्त हुए हैं। विशेषज्ञों के अनुसार ये शिलालेख छठी और सातवीं शताब्दी के बीच के हैं और पांडुवंशी शासक महर्षि बालार्जुन के शासनकाल से संबंधित माने जाते हैं। इनमें प्राचीन ब्राह्मी लिपि और पाली भाषा का उपयोग किया गया है, जो उस समय की शासन व्यवस्था, धार्मिक परंपराओं और सामाजिक जीवन को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    प्रधानमंत्री ने कहा कि ऐसी ऐतिहासिक खोजें न केवल भारत की प्राचीन सभ्यता को समझने में मदद करती हैं, बल्कि यह भी दर्शाती हैं कि हमारा इतिहास कितना समृद्ध और व्यापक रहा है। उन्होंने देशवासियों से अपील की कि वे अपनी सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और उसके प्रति जागरूकता बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभाएं।

  • गुटखा बैन की हकीकत: कानून के बावजूद नहीं थमा तंबाकू, बढ़ते रहे कैंसर केस

    गुटखा बैन की हकीकत: कानून के बावजूद नहीं थमा तंबाकू, बढ़ते रहे कैंसर केस


    मध्यप्रदेश। मध्य प्रदेश में ‘मसाला गुटखा’ पर 2012 में लगाए गए प्रतिबंध के बावजूद जमीनी हकीकत चिंताजनक बनी हुई है। सरकार ने उस समय तंबाकू और सुपारी के खतरनाक मिश्रण को रोकने के लिए सख्त कदम उठाने का दावा किया था, लेकिन 14 साल बाद भी ओरल कैंसर के मामलों में कमी के बजाय बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है।

    जवाहरलाल नेहरू कैंसर अस्पताल के आंकड़ों के अनुसार प्रतिबंध के बाद से ओरल कैंसर के मरीजों में लगभग 42.37 प्रतिशत तक की वृद्धि देखी गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रतिबंध का वास्तविक असर इसलिए नहीं दिखा क्योंकि गुटखा कंपनियों ने अपने उत्पाद बेचने का तरीका बदल दिया।

    प्रतिबंध के बाद कंपनियों ने ‘ट्विन-पाउच’ सिस्टम शुरू किया, जिसमें पान मसाला और तंबाकू को अलग-अलग पैकेट में बेचा जाने लगा। उपभोक्ता दोनों को मिलाकर उपयोग करते हैं, जिससे अंतिम उत्पाद वही खतरनाक मिश्रण बन जाता है जिसे रोकने के लिए बैन लगाया गया था।

    विशेषज्ञों के अनुसार, यह व्यवस्था कानून की एक तकनीकी खामी का फायदा उठाती है, क्योंकि नियम केवल मिश्रित उत्पाद पर रोक लगाते हैं, जबकि अलग-अलग पैकेट में बिक्री वैध मानी जाती है। परिणामस्वरूप बाजार में तंबाकू की उपलब्धता और उसका सेवन लगभग पहले जैसा ही बना हुआ है।

    डॉक्टरों का कहना है कि ओरल कैंसर के शुरुआती लक्षणों को पहचानना बेहद जरूरी है। यदि किसी व्यक्ति को मुंह खोलने में दिक्कत, लंबे समय तक घाव या सफेद-लाल धब्बे जैसे लक्षण दिखें तो तुरंत चिकित्सकीय जांच करानी चाहिए। शुरुआती चरण में इलाज से बीमारी को गंभीर रूप लेने से रोका जा सकता है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों की राय है कि जब तक तंबाकू उत्पादों पर सख्त और व्यावहारिक नियंत्रण नहीं होगा, तब तक ओरल कैंसर के मामलों में उल्लेखनीय कमी लाना मुश्किल रहेगा।

  • जल संकट के बीच चेतावनी: तालाबों की जमीन पर बढ़ते अतिक्रमण से बिगड़ सकता है हालात

    जल संकट के बीच चेतावनी: तालाबों की जमीन पर बढ़ते अतिक्रमण से बिगड़ सकता है हालात


    मध्यप्रदेश। इंदौर में बढ़ते जल संकट के बीच तालाबों की स्थिति को लेकर सामने आई नगर निगम की ताजा रिपोर्ट ने गंभीर चिंता पैदा कर दी है। 27 मई 2026 तक की समीक्षा में शहर के 26 प्रमुख तालाबों में से 23 पर अतिक्रमण पाया गया है। इनमें से केवल 8 मामलों में ही अतिक्रमण हटाया जा सका है, जबकि 9 मामलों में कार्रवाई अभी भी जारी है।

    रिपोर्ट के अनुसार सबसे अधिक अतिक्रमण सिरपुर तालाब क्षेत्र में दर्ज किए गए हैं। छोटा सिरपुर तालाब पर पांच और बड़ा सिरपुर तालाब पर तीन अतिक्रमण चिन्हित किए गए हैं। इसके अलावा पीपल्यापाला, बिलावली और अन्य जलाशयों के आसपास भी अवैध कब्जों की स्थिति सामने आई है।

    नगर निगम के रिकॉर्ड के मुताबिक अधिकांश अतिक्रमण तालाब की भूमि और उसके कैचमेंट क्षेत्र में किए गए हैं, जो बारिश के पानी के संग्रहण और भूजल पुनर्भरण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। कई मामलों में प्रशासन द्वारा नोटिस जारी किए गए हैं और सीमांकन की कार्रवाई भी की गई है, लेकिन अभी तक सभी अवैध कब्जे पूरी तरह हटाए नहीं जा सके हैं।

    शहर में करोड़ों रुपए खर्च कर तालाबों के सौंदर्यीकरण, गहरीकरण और संरक्षण के प्रयास किए गए हैं, लेकिन इसके बावजूद अतिक्रमण की समस्या लगातार बनी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि तालाबों की जमीन और जलग्रहण क्षेत्र पर कब्जे इसी तरह बढ़ते रहे, तो आने वाले समय में इंदौर में जल संकट और गंभीर रूप ले सकता है।

    विशेषज्ञ लगातार यह चेतावनी दे रहे हैं कि तालाब केवल जल संग्रहण का साधन नहीं हैं, बल्कि भूजल स्तर को बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाते हैं। ऐसे में इनका संरक्षण और अतिक्रमण हटाना बेहद जरूरी है, ताकि शहर की जल सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

  • ओरल कैंसर का बढ़ता संकट: शुरुआती पहचान से बच सकते हैं 90% मरीज, फिर भी देरी जारी

    ओरल कैंसर का बढ़ता संकट: शुरुआती पहचान से बच सकते हैं 90% मरीज, फिर भी देरी जारी


    मध्यप्रदेश। इंदौर में ओरल (मुख) कैंसर को लेकर बेहद चिंताजनक स्थिति सामने आई है। दंत विशेषज्ञों के अनुसार देश में लगभग 60 से 80 प्रतिशत मरीज तब अस्पताल पहुंचते हैं जब बीमारी तीसरी या चौथी यानी अंतिम स्टेज में पहुंच चुकी होती है। इसका मुख्य कारण तंबाकू, गुटखा, बीड़ी-सिगरेट जैसे नशे की आदतों को सामान्य मान लेना और शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज करना बताया जा रहा है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस बीमारी की पहचान शुरुआती चरण में हो जाए, तो लगभग 90 प्रतिशत मरीज पूरी तरह स्वस्थ हो सकते हैं। लेकिन देरी होने पर इलाज की सफलता दर घटकर केवल 20 से 30 प्रतिशत रह जाती है, जिससे मरीज की जान पर गंभीर खतरा बना रहता है।

    यह खुलासा ‘विश्व तंबाकू निषेध दिवस’ के अवसर पर आयोजित एक दंत एवं मुख परीक्षण शिविर में सामने आया, जहां 500 से अधिक लोगों की स्क्रीनिंग की गई। यह शिविर इंडियन डेंटल एसोसिएशन (IDA) मध्यप्रदेश, इंदौर शाखा और शासकीय दंत चिकित्सा महाविद्यालय के सहयोग से आयोजित किया गया।

    डॉक्टरों के अनुसार शासकीय दंत चिकित्सा महाविद्यालय में प्रतिदिन औसतन 3 से 5 ऐसे मरीज सामने आ रहे हैं, जिनमें प्रीकैंसर यानी कैंसर से पहले के लक्षण पाए जाते हैं। समय पर जांच, बायोप्सी और इलाज से इन मामलों को गंभीर अवस्था में जाने से रोका जा सकता है। सरकारी अस्पतालों में ओरल कैंसर का इलाज निशुल्क उपलब्ध है।

    चिकित्सकों ने सलाह दी है कि जो लोग तंबाकू या अन्य नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं, उन्हें हर छह महीने में नियमित रूप से मुख परीक्षण जरूर कराना चाहिए।

    जागरूकता बढ़ाने के लिए रविवार सुबह कृष्णपुरा छत्री से राजबाड़ा तक एक रैली भी निकाली जाएगी, जिसमें डॉक्टर, छात्र और सामाजिक संगठन शामिल होंगे। इसका उद्देश्य लोगों को तंबाकू से होने वाले खतरों और मुख कैंसर के शुरुआती लक्षणों के प्रति जागरूक करना है।

    विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि मुंह में लंबे समय तक न भरने वाले घाव, सफेद या लाल धब्बे, भोजन निगलने में दिक्कत और आवाज में बदलाव जैसे लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, क्योंकि यही आगे चलकर गंभीर बीमारी का संकेत हो सकते हैं।

  • महाकालेश्वर मंदिर में भव्य भस्म आरती: पंचामृत से अभिषेक, रजत आभूषणों से श्रृंगार

    महाकालेश्वर मंदिर में भव्य भस्म आरती: पंचामृत से अभिषेक, रजत आभूषणों से श्रृंगार


    मध्यप्रदेश। उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में रविवार तड़के भस्म आरती के दौरान भक्तों ने अलौकिक और दिव्य दर्शन का अनुभव किया। सुबह चार बजे जैसे ही मंदिर के पट खोले गए, पंडे-पुजारियों ने गर्भगृह में विराजित सभी देव प्रतिमाओं का विधिवत पूजन किया। इसके बाद भगवान महाकाल का जलाभिषेक किया गया और पंचामृत—दूध, दही, घी, शक्कर और फलों के रस—से अभिषेक कर आरती की शुरुआत हुई।

    भस्म आरती के दौरान प्रथम घंटा बजाकर भगवान को हरि ओम जल अर्पित किया गया। इसके पश्चात कपूर आरती संपन्न हुई और भगवान महाकाल के मस्तक पर भांग, चंदन एवं त्रिपुंड अर्पित कर भव्य श्रृंगार प्रारंभ किया गया। श्रृंगार पूरा होने के बाद ज्योतिर्लिंग को वस्त्र से आच्छादित कर विधिवत भस्म रमाई गई।

    इसके बाद भगवान महाकाल का राजसी स्वरूप में अलंकरण किया गया, जिसमें भांग, ड्रायफ्रूट, चंदन, आभूषण और विभिन्न प्रकार के पुष्पों का उपयोग किया गया। विशेष रूप से रजत शेषनाग मुकुट, रजत मुंडमाल, रुद्राक्ष माला और सुगंधित पुष्पों की मालाएं भगवान को अर्पित की गईं। मोगरा और गुलाब के पुष्पों से सुसज्जित स्वरूप ने मंदिर में उपस्थित श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया।

    आरती के दौरान भगवान महाकाल को फल और मिष्ठान का भोग भी लगाया गया। भस्म आरती में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए और बाबा महाकाल के दिव्य स्वरूप के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। महा निर्वाणी अखाड़े की ओर से भस्म अर्पण की परंपरा का निर्वहन किया गया।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भस्म अर्पित होने के बाद भगवान महाकाल निराकार से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। यही कारण है कि भस्म आरती को महाकाल मंदिर की सबसे विशेष और अलौकिक आरती माना जाता है, जिसमें देश-विदेश से श्रद्धालु शामिल होने पहुंचते हैं।

  • इंदौर में बड़ी राहत: प्रभावित मकान मालिकों को टीडीआर से मिलेगा आर्थिक लाभ

    इंदौर में बड़ी राहत: प्रभावित मकान मालिकों को टीडीआर से मिलेगा आर्थिक लाभ


    मध्यप्रदेश। इंदौर नगर निगम शहर के मास्टर प्लान के तहत प्रमुख सड़कों के चौड़ीकरण कार्य को तेजी से आगे बढ़ा रहा है। यातायात व्यवस्था को सुगम बनाने के उद्देश्य से छावनी रोड और जिंसी रोड के चौड़ीकरण कार्य को प्राथमिकता दी जा रही है। इस दौरान जिन भवनों और मकानों का हिस्सा सड़क चौड़ीकरण की जद में आया है, उनके भू-स्वामियों को टीडीआर (ट्रांसफरेबल डेवलपमेंट राइट्स) का लाभ दिया जाएगा।

    नगर निगम ने स्पष्ट किया है कि प्रभावित भू-खण्ड धारकों को अपने स्वामित्व संबंधी आवश्यक दस्तावेज संबंधित जोनल कार्यालय में जमा कराने होंगे। भवन अधिकारी या भवन निरीक्षक द्वारा दस्तावेजों का सत्यापन पूरा होने के बाद टीडीआर प्रमाण पत्र जारी किया जाएगा।

    निगम के अनुसार, प्रभावित संपत्तियों के शेष हिस्से पर भवन स्वीकृति के समय निर्धारित एफएआर (फ्लोर एरिया रेशियो) के अतिरिक्त एफएआर का लाभ टीडीआर प्रमाण पत्र के माध्यम से प्राप्त किया जा सकेगा। इससे मकान मालिकों को अपने बचे हुए भू-भाग पर निर्माण क्षमता में अतिरिक्त सुविधा मिलेगी।

    इसके अलावा यदि भू-स्वामी अपने शेष भू-भाग पर अतिरिक्त एफएआर का उपयोग नहीं करना चाहते हैं, तो वे टीडीआर प्रमाण पत्र को नगर निगम सीमा क्षेत्र में कहीं भी कलेक्टर गाइडलाइन दर के अनुसार विक्रय कर सकते हैं। इससे उन्हें आर्थिक लाभ प्राप्त होगा।

    टीडीआर प्रमाण पत्र के लिए कई प्रकार के दस्तावेज आवश्यक होंगे, जिनमें फॉर्म-1, आधार कार्ड, पैन कार्ड, रजिस्ट्री की प्रति, म्यूटेशन प्रमाण पत्र, प्रॉपर्टी टैक्स रसीद और फॉर्म-3 शामिल हैं। इसके साथ ही फॉर्म-4, खसरा पी-2, भू-उपयोग प्रमाण पत्र, नक्शा, सर्वे प्लान, नोटिस प्रतियां, कलेक्टर गाइडलाइन और शपथ पत्र भी जमा करना अनिवार्य किया गया है।

    नगर निगम का कहना है कि छावनी रोड और जिंसी रोड पर चल रहे चौड़ीकरण कार्य के दौरान प्रभावित लोगों को नियमानुसार टीडीआर का लाभ देने की प्रक्रिया जल्द शुरू की जाएगी, ताकि उन्हें समय पर राहत और आर्थिक सुविधा मिल सके।

  • इंदौर में पानी बचाने की मुहिम तेज: कमिश्नर ने दिए सख्त निर्देश, टोटियां न लगाने पर भी कार्रवाई

    इंदौर में पानी बचाने की मुहिम तेज: कमिश्नर ने दिए सख्त निर्देश, टोटियां न लगाने पर भी कार्रवाई


    मध्यप्रदेश। इंदौर में बढ़ते जल संकट को देखते हुए नगर निगम ने सख्त रुख अपना लिया है। नगर निगम कमिश्नर क्षितिज सिंघल ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि शहर में किसी भी स्थिति में पानी की बर्बादी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अब फालतू पानी बहाने वालों को पहले समझाइश दी जाएगी और यदि इसके बाद भी सुधार नहीं होता है तो उन पर चालानी कार्रवाई की जाएगी।

    कमिश्नर ने सभी जोन के स्वास्थ्य अधिकारियों, प्रभारी मुख्य स्वच्छता निरीक्षकों और सहायक निरीक्षकों को नियमित रूप से अपने क्षेत्रों का निरीक्षण करने के निर्देश दिए हैं। खास तौर पर उन स्थानों पर ध्यान देने को कहा गया है जहां जल संयोजनों में टोटियां नहीं लगी हैं और पानी अनियंत्रित रूप से बहता रहता है।

    नगर निगम ने स्पष्ट किया है कि ऐसे मामलों में पहले नागरिकों को जागरूक किया जाएगा और उन्हें पानी की बचत के लिए प्रेरित किया जाएगा। लेकिन बार-बार चेतावनी के बावजूद लापरवाही पाए जाने पर संबंधित लोगों पर नियमानुसार जुर्माना लगाया जाएगा। साथ ही रोजाना की गई कार्रवाई की रिपोर्ट अपर आयुक्त को भेजने के निर्देश भी दिए गए हैं।

    अधिकारियों के अनुसार, शहर में निरीक्षण के दौरान यह सामने आया है कि कई इलाकों में नलों में टोटियां नहीं होने के कारण पानी सप्लाई के समय बड़ी मात्रा में पानी बर्बाद हो रहा है। इससे न केवल जल संकट और गहराता है, बल्कि कई जगह जलभराव और गंदगी की समस्या भी उत्पन्न होती है।

    नगर निगम ने नागरिकों से अपील की है कि वे पीने के पानी का उपयोग केवल आवश्यक कार्यों के लिए करें। गाड़ियों की धुलाई, आंगन और परिसर की सफाई जैसे कार्यों में पानी की बर्बादी से बचने की सलाह दी गई है।

    कमिश्नर ने कहा है कि जल संरक्षण आज की सबसे बड़ी जरूरत है और हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह पानी की एक-एक बूंद का महत्व समझे और उसे बचाने में योगदान दे।

    गौरतलब है कि इंदौर में पिछले कुछ समय से जल संकट को लेकर लोगों में असंतोष देखने को मिला है। कई इलाकों में पानी की किल्लत को लेकर प्रदर्शन और चक्काजाम जैसी स्थितियां भी बन चुकी हैं। ऐसे में नगर निगम अब आपूर्ति प्रबंधन के साथ-साथ जल संरक्षण पर भी विशेष ध्यान दे रहा है।

  • मन की बात’ में पीएम मोदी का संदेश, गर्मी से बचाव के लिए अपनाएं सावधानी और पारंपरिक पेयों का लें सहारा

    मन की बात’ में पीएम मोदी का संदेश, गर्मी से बचाव के लिए अपनाएं सावधानी और पारंपरिक पेयों का लें सहारा

    नई दिल्ली । देश के विभिन्न राज्यों में लगातार बढ़ रहे तापमान और लू जैसी परिस्थितियों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागरिकों से विशेष सतर्कता बरतने की अपील की है। उन्होंने कहा कि गर्मी के इस मौसम में स्वास्थ्य की सुरक्षा को प्राथमिकता देना बेहद आवश्यक है और लोगों को पर्याप्त मात्रा में पानी पीने के साथ-साथ धूप और गर्म हवाओं से बचाव के लिए सभी जरूरी उपाय अपनाने चाहिए। उन्होंने नागरिकों से यह भी आग्रह किया कि गर्मी से बचाव के लिए जारी दिशा-निर्देशों का पालन करें और अपनी दिनचर्या में सावधानी को शामिल करें।

    अपने मासिक संवाद कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री ने कहा कि देश के अधिकांश हिस्सों में इस समय तेज गर्मी का प्रभाव देखा जा रहा है। ऐसे में शरीर को हाइड्रेट रखना और अनावश्यक रूप से धूप में निकलने से बचना जरूरी है। उन्होंने कहा कि यदि किसी कारणवश बाहर जाना आवश्यक हो तो लोगों को पूरी तैयारी और सतर्कता के साथ निकलना चाहिए ताकि गर्मी से होने वाली स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से बचा जा सके।

    प्रधानमंत्री ने भारतीय जीवनशैली और पारंपरिक खानपान की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि गर्मी से राहत पाने के कई उपाय हमारी रसोई और लोक परंपराओं में पहले से मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है, वैसे-वैसे देश के विभिन्न हिस्सों में खानपान और पेय पदार्थों की प्रकृति भी बदल जाती है। कहीं मिट्टी के मटकों का ठंडा पानी लोगों की प्यास बुझाता है तो कहीं दही और अन्य शीतल खाद्य पदार्थ भोजन का अहम हिस्सा बन जाते हैं। इसी तरह कई क्षेत्रों में कच्चे आम और अन्य पारंपरिक सामग्री से तैयार पेय गर्मी से राहत देने का काम करते हैं।

    उन्होंने कहा कि भारत के पारंपरिक ग्रीष्मकालीन पेय केवल स्वाद तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे देश की सांस्कृतिक विविधता और स्थानीय परंपराओं का भी महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। विभिन्न राज्यों में तैयार किए जाने वाले ये पेय स्थानीय परिस्थितियों, मौसम और सामाजिक जीवन से गहराई से जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि इनका महत्व केवल खाद्य पदार्थ के रूप में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत के रूप में भी देखा जाता है।

    प्रधानमंत्री ने देश के विभिन्न क्षेत्रों में लोकप्रिय पारंपरिक पेयों का उल्लेख करते हुए कहा कि उत्तर भारत में आम पन्ना गर्मी से राहत देने वाला एक लोकप्रिय पेय है। पंजाब और हरियाणा में लस्सी की अपनी अलग पहचान है, जबकि राजस्थान और गुजरात में छाछ को दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा माना जाता है। पूर्वी भारत के कई हिस्सों में सत्तू का शरबत गर्मी के मौसम में ऊर्जा और ताजगी प्रदान करने वाला प्रमुख पेय माना जाता है।

    उन्होंने पश्चिमी और दक्षिणी भारत की परंपराओं का भी उल्लेख किया। कोंकण और गोवा क्षेत्र में कोकम आधारित पेय लोकप्रिय हैं, जबकि दक्षिण भारत में पानकम और सम्बारम जैसे पेयों का विशेष महत्व है। ओडिशा में बेल से तैयार पेय गर्मी के मौसम में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। प्रधानमंत्री ने कहा कि ये सभी पेय भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और विविधता के प्रतीक हैं।

    उन्होंने देशवासियों से अपील की कि वे गर्मी के मौसम में पारंपरिक और प्राकृतिक पेयों को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं। उनका कहना था कि ये पेय न केवल शरीर को ठंडक प्रदान करते हैं, बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी लाभकारी होते हैं। बढ़ते तापमान के बीच सावधानी, संतुलित खानपान और पर्याप्त जल सेवन ही स्वस्थ रहने का सबसे प्रभावी उपाय है।