Author: bharati

  • 42°C गर्मी में सड़क पर उतरे PESA मोबिलाइजर, सेवा समाप्ति आदेश रद्द करने की मांग

    42°C गर्मी में सड़क पर उतरे PESA मोबिलाइजर, सेवा समाप्ति आदेश रद्द करने की मांग


    मध्य प्रदेश । खरगोन जिले में भीषण गर्मी के बीच पेसा मोबिलाइजर कर्मचारियों का गुस्सा सड़क पर उतर आया। 42 डिग्री सेल्सियस तापमान में लगभग 200 कर्मचारियों ने सेवा समाप्ति आदेश के विरोध में जोरदार प्रदर्शन किया और सरकार के खिलाफ नारेबाजी की।

    भारतीय मजदूर संघ के बैनर तले निकाली गई यह आक्रोश रैली दोपहर 2 बजे शुरू हुई। प्रदर्शनकारी कर्मचारी नारे लगाते हुए कलेक्ट्रेट पहुंचे और मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में पेसा मोबिलाइजरों की सेवाएं समाप्त करने के आदेश को तुरंत रद्द कर उनकी बहाली की मांग की गई।

    कर्मचारियों ने आरोप लगाया कि पेसा कानून और विभिन्न सरकारी योजनाओं को जमीनी स्तर पर लागू करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है, इसके बावजूद सरकार ने अचानक उनकी सेवाएं समाप्त कर दीं। उनका कहना है कि वे पिछले पांच वर्षों से मात्र 4000 रुपये मासिक वेतन पर कार्य कर रहे थे और अब उन्हें बेरोजगार कर दिया गया है।

    प्रदर्शन के दौरान भारतीय मजदूर संघ के पदाधिकारियों ने भी सरकार पर नाराजगी जताई। संगठन के नेताओं ने कहा कि पेसा मोबिलाइजरों ने ग्रामीण क्षेत्रों में योजनाओं को लागू करने में अहम योगदान दिया है, लेकिन उनके साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार किया गया है।

    कर्मचारियों ने साफ चेतावनी दी है कि यदि सात दिनों के भीतर सेवा समाप्ति आदेश वापस लेकर बहाली नहीं की गई, तो वे बड़ा आंदोलन करेंगे। उन्होंने कहा कि इसके बाद वे भोपाल कूच करेंगे और मुख्यमंत्री आवास का घेराव करेंगे।

    प्रदर्शन में नरेंद्र पटेल, अपर्णा बैरागी और पुनीत तारे सहित बड़ी संख्या में कर्मचारी शामिल रहे। भीषण गर्मी के बावजूद कर्मचारियों का आक्रोश कम नहीं हुआ और वे लगातार सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते रहे।

  • स्ट्रे डॉग्स विवाद पर गरमाई बहस, सोनम बाजवा ने उठाई संवेदनशील समाधान की मांग

    स्ट्रे डॉग्स विवाद पर गरमाई बहस, सोनम बाजवा ने उठाई संवेदनशील समाधान की मांग


    नई दिल्ली। देश में स्ट्रे डॉग्स को लेकर चल रही बहस एक बार फिर सुर्खियों में है, जहां सार्वजनिक सुरक्षा और पशु कल्याण के बीच संतुलन को लेकर अलग-अलग राय सामने आ रही हैं। इसी मुद्दे पर अभिनेत्री सोनम बाजवा ने पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान से अपील करते हुए बेजुबान जानवरों के लिए उचित व्यवस्था और शेल्टर इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि समस्या का समाधान केवल हटाने से नहीं बल्कि एक व्यवस्थित और मानवीय दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए।

    सोनम बाजवा ने सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी बात रखते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को गलत तरीके से समझा जा रहा है। उनके अनुसार अदालत ने स्ट्रे डॉग्स को पूरी तरह हटाने का आदेश नहीं दिया है, बल्कि एबीसी यानी एनिमल बर्थ कंट्रोल, वैक्सीनेशन और शेल्टरिंग जैसे उपायों के जरिए समस्या के समाधान की बात कही है। उन्होंने जोर देकर कहा कि असली सवाल यह है कि आखिर इन जानवरों के लिए पर्याप्त शेल्टर और जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर कहां है।

    अभिनेत्री ने अपने संदेश में यह भी कहा कि सार्वजनिक सुरक्षा निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ-साथ दया और जिम्मेदारी का संतुलन बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि इस मुद्दे पर दोबारा विचार किया जाए और ऐसा समाधान निकाला जाए जो मानव और पशु दोनों के हित में हो।

    उन्होंने सुझाव दिया कि इस विषय पर पशु कल्याण से जुड़े विशेषज्ञों, एनजीओ, पशु चिकित्सकों और प्रशासनिक अधिकारियों को एक साथ बैठाकर एक व्यावहारिक योजना तैयार की जानी चाहिए। उनके अनुसार केवल सख्त कदम उठाना समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता, बल्कि एक व्यवस्थित नीति और मजबूत ढांचे की जरूरत है।

    यह मुद्दा उस समय और अधिक चर्चा में आ गया है जब सुप्रीम कोर्ट ने स्ट्रे डॉग्स से जुड़े मामलों में राज्य सरकारों को एबीसी कार्यक्रम को प्रभावी ढंग से लागू करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने यह भी कहा है कि कई क्षेत्रों में इस कार्यक्रम के सही तरीके से लागू न होने के कारण समस्या लगातार बढ़ रही है और इससे सार्वजनिक सुरक्षा को लेकर चिंता भी बढ़ी है।

    सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद कई राज्यों में इस मुद्दे पर बहस तेज हो गई है, जहां एक तरफ सुरक्षा को प्राथमिकता देने की बात हो रही है तो दूसरी तरफ पशु अधिकारों और उनके संरक्षण की मांग भी उठ रही है। सोनम बाजवा की यह अपील इसी बहस को एक नया दृष्टिकोण देती है, जिसमें समाधान को केवल नियंत्रण तक सीमित न रखकर एक संवेदनशील और व्यवस्थित नीति की जरूरत पर जोर दिया गया है।

  • कमल हासन की देशवासियों से अपील: संकट के समय राजनीति नहीं, राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए

    कमल हासन की देशवासियों से अपील: संकट के समय राजनीति नहीं, राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में जारी तनाव और वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच अभिनेता और राजनेता कमल हासन ने देशवासियों से एकजुटता और जिम्मेदारी की अपील की है। उन्होंने कहा है कि मौजूदा समय केवल आर्थिक चुनौती नहीं है, बल्कि यह ऐसा दौर है जब पूरे देश को मिलकर राष्ट्रहित में सोचने और कार्य करने की आवश्यकता है।

    कमल हासन ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर जारी एक वीडियो संदेश में कहा कि ईरान क्षेत्र में जारी संघर्षऔर समुद्री व्यापार मार्गों में बाधाओं का असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। भारत जैसे देशों पर इसका सीधा प्रभाव देखने को मिल रहा है, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर हैं। इसके कारण पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ता जा रहा है।

    उन्होंने कहा कि यह स्थिति केवल सरकारों के लिए ही नहीं, बल्कि आम नागरिकों के लिए भी जिम्मेदारी का समय है। कमल हासन ने लोगों से अपील की कि वे ईंधन और बिजली की खपत कम करने जैसे छोटे-छोटे कदम उठाकर देश की आर्थिक स्थिरता में योगदान दे सकते हैं। उन्होंने कहा कि कई विकसित देश पहले ही ऊर्जा संरक्षण को लेकर सख्त नीतियां अपना चुके हैं और नागरिकों को जागरूक किया जा रहा है।

    अपने संदेश में उन्होंने ऐतिहासिक उदाहरणों का उल्लेख करते हुए कहा कि संकट के समय भारत ने हमेशा एकजुटता दिखाई है। उन्होंने 1962 के युद्ध और 1965 के खाद्य संकट का जिक्र करते हुए बताया कि उस समय देशवासियों ने त्याग और सहयोग की मिसाल पेश की थी। उन्होंने कहा कि आज भले ही परिस्थितियां उतनी गंभीर न हों, लेकिन सामूहिक जिम्मेदारी उतनी ही आवश्यक है।

    कमल हासन ने यह भी कहा कि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति की है। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, कोल गैसीफिकेशन और परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में निवेश देश को ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ा रहा है। उन्होंने इस प्रयास को सकारात्मक बताते हुए कहा कि विदेशी तेल और गैस पर निर्भरता कम करना दीर्घकालिक आर्थिक मजबूती के लिए जरूरी है।

    उन्होंने केंद्र और राज्य सरकारों से भी अपील की कि वे मिलकर ईंधन पर लगने वाले करों में संतुलन लाएं और सार्वजनिक परिवहन को अधिक सुलभ और किफायती बनाएं। उनका कहना था कि यदि बस, ट्रेन और मेट्रो जैसे साधनों को बढ़ावा दिया जाए तो निजी वाहनों पर निर्भरता कम होगी और ईंधन की बचत संभव होगी।

    कमल हासन ने अपने संदेश में प्रधानमंत्री से सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों की एक संयुक्त बैठक बुलाने का भी आग्रह किया, ताकि ऊर्जा संकट और उससे जुड़ी चुनौतियों पर सामूहिक रणनीति बनाई जा सके। उन्होंने कहा कि देश को इस समय राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर सोचने की आवश्यकता है, क्योंकि राष्ट्रहित सबसे महत्वपूर्ण है।

    उन्होंने यह भी कहा कि यदि देशवासी मिलकर ऊर्जा बचत और जिम्मेदारी से खपत की दिशा में कदम उठाते हैं, तो भारत इस वैश्विक संकट से और अधिक मजबूत होकर बाहर निकल सकता है। उनके अनुसार, आज बचाया गया हर यूनिट बिजली और हर लीटर ईंधन भविष्य की पीढ़ियों के लिए महत्वपूर्ण निवेश है।

  • जेनजी में बढ़ती लोकप्रियता पर बोले जैकी श्रॉफ, इंसानियत और अपनापन ही मेरी असली पहचान है

    जेनजी में बढ़ती लोकप्रियता पर बोले जैकी श्रॉफ, इंसानियत और अपनापन ही मेरी असली पहचान है

    नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता जैकी श्रॉफ अपनी अलग शैली, सहज व्यक्तित्व और दमदार अभिनय के लिए लंबे समय से दर्शकों के बीच खास पहचान बनाए हुए हैं। 80 और 90 के दशक में बड़े पर्दे पर अपनी छाप छोड़ने के बाद भी आज वह नई पीढ़ी यानी जेनजी के बीच उतने ही लोकप्रिय हैं। सोशल मीडिया से लेकर युवा दर्शकों तक उनकी बढ़ती लोकप्रियता लगातार चर्चा का विषय बनी हुई है।

    इसी बीच अपनी आगामी फिल्म के प्रमोशन के दौरान बातचीत में जैकी श्रॉफ ने अपनी इस लोकप्रियता का कारण बेहद सरल शब्दों में बताया। उन्होंने कहा कि वह हमेशा लोगों को उम्र के आधार पर नहीं देखते, बल्कि इंसानियत और व्यवहार को सबसे ज्यादा महत्व देते हैं। उनके अनुसार कोई भी व्यक्ति चाहे किसी भी उम्र का हो, हर किसी के साथ समान सम्मान और अपनापन रखना ही उनके स्वभाव की असली पहचान है।

    अभिनेता ने कहा कि उनके लिए जीवन में सबसे महत्वपूर्ण चीज इंसानी रिश्ते हैं। वह मानते हैं कि जब कोई व्यक्ति अपने दिल को खुला रखता है और दूसरों की बातों को ध्यान से सुनता है, तो संबंध अपने आप मजबूत हो जाते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि हर व्यक्ति से कुछ न कुछ सीखने को मिलता है, इसलिए खुद को किसी से बड़ा या बेहतर समझना सही नहीं है।

    जैकी श्रॉफ ने यह भी बताया कि वह हमेशा लोगों के साथ सहजता से जुड़ने की कोशिश करते हैं, चाहे वह बच्चे हों, युवा हों या बुजुर्ग। उनके अनुसार जब व्यवहार में सादगी और अपनापन होता है, तो पीढ़ियों के बीच की दूरी अपने आप खत्म हो जाती है। यही कारण है कि वह अलग-अलग उम्र के दर्शकों से आसानी से जुड़ पाते हैं और उनकी लोकप्रियता हर पीढ़ी में बनी रहती है।

    नई दिल्ली। अपनी आगामी फिल्म को लेकर बात करते हुए उन्होंने कहा कि यह प्रोजेक्ट उनके लिए बेहद खास है क्योंकि इसमें एक अनोखी और अलग सोच को दिखाया गया है। फिल्म में उनका किरदार एक दादा का है, जो अपने पोते के साथ दोस्त जैसा रिश्ता साझा करता है। यह कहानी पारिवारिक संबंधों को एक नए दृष्टिकोण से पेश करती है, जहां उम्र की दीवारें रिश्तों को सीमित नहीं करतीं।

    अभिनेता ने कहा कि इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी इसका नया कॉन्सेप्ट है, जो पारंपरिक सोच से हटकर एक ताजा अनुभव देता है। यह फिल्म यह संदेश देती है कि प्यार, समझ और अपनापन किसी भी पीढ़ी के बीच दूरी को खत्म कर सकता है।

    जैकी श्रॉफ का यह नजरिया न केवल उनके व्यक्तित्व को दर्शाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि कैसे एक कलाकार अपने व्यवहार और सोच के जरिए सभी उम्र के दर्शकों से जुड़ा रह सकता है। उनकी सरलता और मानवीय दृष्टिकोण ही उन्हें आज भी दर्शकों के बीच खास बनाता है।

  • सोने की कीमतों में उछाल से ज्वेलरी बाजार पर दबाव, बिक्री घटी लेकिन कंपनियों की कमाई में जोरदार बढ़ोतरी का अनुमान

    सोने की कीमतों में उछाल से ज्वेलरी बाजार पर दबाव, बिक्री घटी लेकिन कंपनियों की कमाई में जोरदार बढ़ोतरी का अनुमान

    नई दिल्ली । देश में लगातार बढ़ती सोने की कीमतों ने ज्वेलरी बाजार की दिशा और दशा दोनों को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। एक ओर जहां ग्राहकों की खरीदारी क्षमता पर दबाव बढ़ा है, वहीं दूसरी ओर ज्वेलरी कंपनियों की आय में वृद्धि के संकेत भी सामने आए हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, सोने की कीमतों में तेज उछाल और हाल ही में आयात शुल्क में की गई बढ़ोतरी का सीधा असर बाजार की मांग पर पड़ रहा है, जिससे आने वाले समय में बिक्री मात्रा में उल्लेखनीय गिरावट देखने को मिल सकती है।

    बाजार विश्लेषण के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष में संगठित गोल्ड ज्वेलरी सेक्टर की बिक्री मात्रा में लगभग 13 से 15 प्रतिशत तक की कमी आने का अनुमान है। पिछले वित्त वर्ष में भी ज्वेलरी बिक्री में करीब 8 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी, लेकिन इस बार परिस्थितियां और अधिक चुनौतीपूर्ण मानी जा रही हैं। सोने की ऊंची कीमतों के कारण उपभोक्ता अपनी खरीदारी योजनाओं में बदलाव कर रहे हैं और भारी तथा महंगे गहनों की बजाय हल्के वजन और कम कैरेट वाले विकल्पों को प्राथमिकता दे रहे हैं।

    इसके बावजूद, कंपनियों के लिए राहत की बात यह है कि बिक्री मात्रा में गिरावट के बावजूद कुल राजस्व में वृद्धि की संभावना बनी हुई है। अनुमान है कि ज्वेलरी कंपनियों की आय में लगभग 20 से 25 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है। इसका मुख्य कारण सोने की ऊंची कीमतें हैं, जिनकी वजह से प्रति यूनिट बिक्री मूल्य बढ़ गया है। यानी ग्राहक कम मात्रा में सोना खरीद रहे हैं, लेकिन कीमत अधिक होने के कारण कंपनियों की कुल कमाई बढ़ सकती है।

    सरकारी स्तर पर हाल ही में सोने पर आयात शुल्क बढ़ाकर 15 प्रतिशत किए जाने का भी बाजार पर प्रभाव पड़ा है। इसका उद्देश्य न केवल आयात को नियंत्रित करना है, बल्कि देश के व्यापार घाटे को कम करना और रुपये को स्थिर बनाए रखना भी है। इस कदम से घरेलू बाजार में सोने की कीमतों पर अतिरिक्त दबाव देखने को मिल रहा है, जिससे मांग और प्रभावित हो रही है।

    रिपोर्टों के अनुसार, देश में गोल्ड की कुल मांग इस वित्त वर्ष में 620 से 640 टन के बीच रहने का अनुमान है, जो पिछले कई वर्षों में सबसे कमजोर स्तरों में से एक माना जा सकता है। कोविड काल को छोड़ दिया जाए तो यह आंकड़ा पिछले एक दशक में सबसे निचले स्तर पर पहुंच सकता है।

    सोने की बढ़ती कीमतों ने उपभोक्ताओं के व्यवहार में भी बड़ा बदलाव किया है। अब लोग निवेश और गहनों दोनों के लिए सोने की खरीद में अधिक सतर्क हो गए हैं। बीते वर्षों में जहां निवेश के लिए गोल्ड बार और सिक्कों की मांग में तेजी देखी गई थी, वहीं अब बाजार में हल्के और डिजाइनर ज्वेलरी की ओर झुकाव बढ़ा है। 16 से 22 कैरेट ज्वेलरी की मांग में वृद्धि दर्ज की जा रही है क्योंकि ये अपेक्षाकृत सस्ती और उपयोगी विकल्प मानी जा रही हैं।

    कुल मिलाकर, मौजूदा हालात यह संकेत दे रहे हैं कि सोने की कीमतों का यह उछाल बाजार के स्वरूप को बदल रहा है। जहां एक ओर मांग में कमी चिंता का विषय है, वहीं दूसरी ओर कीमतों के सहारे कंपनियों की आय में बढ़ोतरी एक नया संतुलन बना रही है, जो आने वाले महीनों में और स्पष्ट रूप से देखने को मिल सकता है।

  • अजय राय के बयान से बढ़ा राजनीतिक घमासान, योगी आदित्यनाथ ने कांग्रेस को बताया हताश और मानसिक रूप से दिवालिया

    अजय राय के बयान से बढ़ा राजनीतिक घमासान, योगी आदित्यनाथ ने कांग्रेस को बताया हताश और मानसिक रूप से दिवालिया


    नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर कांग्रेस नेता अजय राय की कथित विवादित टिप्पणी के बाद राजनीतिक माहौल गरमा गया है। इस मामले को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कांग्रेस की आलोचना करते हुए कहा कि इस तरह की अभद्र और असंसदीय भाषा पार्टी के राजनीतिक संस्कारों को दर्शाती है।

    मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के लिए इस प्रकार की टिप्पणी न केवल अनुचित है बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भी खिलाफ है। उन्होंने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि पार्टी लगातार राजनीतिक हताशा और निराशा में डूबती जा रही है, जिसका असर उसके नेताओं की भाषा और व्यवहार में साफ दिखाई दे रहा है। योगी ने यह भी कहा कि कांग्रेस अब ऐसी स्थिति में पहुंच चुकी है जहां वह देशवासियों से क्षमा मांगने लायक भी नहीं बची है।

    यह विवाद उस समय बढ़ा जब सोशल मीडिया पर कांग्रेस नेता अजय राय का एक वीडियो तेजी से वायरल होने लगा। वीडियो में कथित तौर पर वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल करते दिखाई दे रहे हैं। वीडियो सामने आने के बाद भाजपा नेताओं ने इसे मुद्दा बनाते हुए कांग्रेस पर लगातार हमले शुरू कर दिए।

    राजनीतिक विवाद बढ़ने के बाद उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने भी कांग्रेस पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस नेताओं की भाषा लगातार मर्यादा से बाहर होती जा रही है और यह पार्टी की राजनीतिक हताशा को दर्शाता है। उनके अनुसार लगातार चुनावी हार और जनाधार में गिरावट के कारण कांग्रेस अब व्यक्तिगत टिप्पणियों और आक्रामक बयानबाजी का सहारा ले रही है।

    भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष ने भी इस मामले को लेकर कांग्रेस पर हमला बोलते हुए कहा कि जब किसी राजनीतिक दल के पास जनता के सामने रखने के लिए मुद्दे नहीं बचते, तब वह व्यक्तिगत आरोपों और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करने लगता है। उन्होंने यह भी कहा कि लोकतांत्रिक राजनीति में भाषा की मर्यादा बनाए रखना बेहद जरूरी है और इस तरह की टिप्पणियां राजनीतिक संस्कृति को कमजोर करती हैं।

    इस पूरे विवाद ने एक बार फिर राजनीतिक संवाद की भाषा और मर्यादा को लेकर बहस छेड़ दी है। विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच तीखी बयानबाजी पहले भी देखने को मिलती रही है, लेकिन इस तरह के विवाद अक्सर राजनीतिक माहौल को और अधिक तनावपूर्ण बना देते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतंत्र में असहमति और आलोचना स्वाभाविक है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में भाषा की गरिमा बनाए रखना सभी नेताओं की जिम्मेदारी होती है।

    फिलहाल यह मामला राजनीतिक स्तर पर लगातार तूल पकड़ता दिखाई दे रहा है और आने वाले दिनों में इस पर और प्रतिक्रियाएं सामने आ सकती हैं। भाजपा इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस पर हमलावर बनी हुई है, जबकि राजनीतिक गलियारों में इस बयान को लेकर चर्चाओं का दौर जारी है।

  • कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर बड़ा अपडेट, 1,000 श्रद्धालुओं का चयन पूरा

    कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर बड़ा अपडेट, 1,000 श्रद्धालुओं का चयन पूरा


    नई दिल्ली विदेश मंत्रालय ने बताया कि कैलाश मानसरोवर यात्रा 2026 का आयोजन जून से अगस्त के बीच किया जाएगा। चयनित यात्रियों को 20 अलग-अलग बैचों में भेजा जाएगा और हर बैच में 50 श्रद्धालु शामिल होंगे। यात्रा दो प्रमुख मार्गों  Lipulekh Pass और Nathu La Pass  से कराई जाएगी। दोनों रास्तों को अब पूरी तरह मोटरेबल बना दिया गया है, जिससे यात्रियों को पहले की तुलना में काफी कम ट्रैकिंग करनी पड़ेगी।

    विदेश मंत्रालय के अनुसार चयनित यात्रियों को एसएमएस और ईमेल के जरिए सूचना भेज दी गई है। यात्री आधिकारिक पोर्टल पर लॉगिन करके अपना चयन स्टेटस देख सकते हैं। इसके अलावा हेल्पलाइन नंबर 011-23088214 भी जारी किया गया है, जहां यात्रा से जुड़ी जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

    गौरतलब है कि भारत और चीन के बीच 2020 में हुए Galwan Valley clash के बाद कैलाश मानसरोवर यात्रा को रोक दिया गया था। लगभग पांच साल तक बंद रहने के बाद 2025 में दोनों देशों के बीच रिश्तों में नरमी आने पर यात्रा दोबारा शुरू की गई थी। पिछले वर्ष सीमित संख्या में श्रद्धालुओं को यात्रा की अनुमति दी गई थी, जिसमें उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे और सिक्किम के नाथू ला मार्ग से यात्राएं कराई गई थीं।

    इस बीच यात्रा मार्ग को लेकर नेपाल ने भी आपत्ति दर्ज कराई है। नेपाल सरकार का कहना है कि भारत और चीन के बीच कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए इस्तेमाल किया जा रहा लिपुलेख क्षेत्र विवादित है और इसका उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि भारत ने इस दावे को खारिज करते हुए अपना रुख साफ कर दिया है।

    विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Randhir Jaiswal ने हाल ही में कहा था कि लिपुलेख दर्रा 1954 से कैलाश मानसरोवर यात्रा का पारंपरिक मार्ग रहा है और दशकों से इसी रास्ते से यात्रा होती आ रही है। उन्होंने कहा कि भारत ऐतिहासिक तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर अपने दावे पर कायम है और एकतरफा तरीके से विवाद बढ़ाना उचित नहीं है।

    धार्मिक आस्था और आध्यात्मिक महत्व के कारण कैलाश मानसरोवर यात्रा को हिंदू, बौद्ध और जैन समुदायों के लिए बेहद पवित्र माना जाता है। हर साल हजारों श्रद्धालु इस कठिन लेकिन दिव्य यात्रा में शामिल होने की इच्छा जताते हैं। 2026 में यात्रा का दायरा बढ़ाकर 1000 यात्रियों तक करना भारत-चीन संबंधों में सुधार और यात्रा सुविधाओं के विस्तार का संकेत माना जा रहा है।

  • अमेरिका में अदाणी ग्रुप की बड़ी निवेश योजना, भारतीय कॉर्पोरेट सेक्टर को मिला नया पहचान

    अमेरिका में अदाणी ग्रुप की बड़ी निवेश योजना, भारतीय कॉर्पोरेट सेक्टर को मिला नया पहचान


    नई दिल्ली भारत के बड़े कारोबारी समूहों में शामिल Adani Group का अमेरिका में प्रस्तावित मल्टी-बिलियन डॉलर निवेश अब सिर्फ एक व्यावसायिक सौदा नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे भारतीय कंपनियों की वैश्विक साख और प्रभाव को मजबूत करने वाले बड़े कदम के रूप में देखा जा रहा है। ग्लोबल इंडस्ट्री लीडर्स और भारतीय-अमेरिकी समुदाय की कई प्रमुख हस्तियों ने इस निवेश योजना को भारत-अमेरिका आर्थिक संबंधों में नया अध्याय बताया है।

    अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump के पहले कार्यकाल के दौरान चुनावी सलाहकार रहे रिपब्लिकन नेता Puneet Ahluwalia ने कहा कि अदाणी समूह का यह निवेश अमेरिकी अर्थव्यवस्था में भारतीय कंपनियों की बढ़ती ताकत और भरोसे को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि भारतीय मूल के पेशेवर और कारोबारी आज अमेरिका में रोजगार और अवसर पैदा कर रहे हैं, ऐसे में अदाणी ग्रुप जैसी बड़ी कंपनी का निवेश दोनों देशों के लिए फायदेमंद साबित होगा।

    अहलूवालिया ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप वैश्विक आर्थिक व्यवस्था को नए सिरे से संतुलित करने की दिशा में काम कर रहे हैं और ऐसे समय में भारत की बड़ी कंपनियों का अमेरिका में निवेश रणनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अदाणी ग्रुप के खिलाफ पहले हुई कुछ कार्रवाइयों में राजनीतिक कारण हो सकते हैं और अगर ऐसा साबित होता है तो उन्हें इसमें कोई हैरानी नहीं होगी।

    वहीं, BJP USA के अध्यक्ष Adapa Prasad ने कहा कि अमेरिकी अभियोजकों द्वारा मामला वापस लेना यह दिखाता है कि आरोपों के समर्थन में पर्याप्त सबूत नहीं थे। उन्होंने इसे भारत की आर्थिक प्रगति को कमजोर करने की कोशिश बताते हुए कहा कि आखिरकार सच्चाई की जीत हुई।

    उधर, Foundation for India and Indian Diaspora Studies के संस्थापक निदेशक Khanderao Kand ने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच सहयोग अब सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्होंने संयुक्त रिसर्च, टेक्नोलॉजी, स्किल डेवलपमेंट और नीति निर्माण में गहरे सहयोग की जरूरत पर जोर दिया।

    उन्होंने कहा कि औद्योगीकरण, रिसर्च एंड डेवलपमेंट और बाजार तक आसान पहुंच जैसे क्षेत्रों में साझेदारी दोनों देशों को दीर्घकालिक रणनीतिक लाभ दे सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि अदाणी ग्रुप का यह प्रस्तावित निवेश न केवल अमेरिका में रोजगार के नए अवसर पैदा करेगा, बल्कि इससे भारतीय कंपनियों की वैश्विक विश्वसनीयता और निवेश क्षमता की छवि भी मजबूत होगी।

    भारत-अमेरिका संबंधों के लिहाज से भी यह निवेश अहम माना जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में टेक्नोलॉजी, ऊर्जा, इंफ्रास्ट्रक्चर और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में दोनों देशों के बीच सहयोग तेजी से बढ़ा है। ऐसे में अदाणी समूह का अमेरिकी निवेश आने वाले समय में आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी को नई ऊंचाई देने वाला कदम माना जा रहा है।

  • ईरान पर सख्त रुख: ट्रंप बोले- परमाणु हथियार की इजाजत नहीं दी जा सकती

    ईरान पर सख्त रुख: ट्रंप बोले- परमाणु हथियार की इजाजत नहीं दी जा सकती


    नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ शब्दों में कहा है कि ईरान को परमाणु हथियार रखने की इजाजत किसी भी हालत में नहीं दी जा सकती। ट्रंप ने चेतावनी दी कि यदि तेहरान परमाणु शक्ति बनने की दिशा में आगे बढ़ता है तो इससे पूरे मध्य पूर्व में बड़े युद्ध की स्थिति पैदा हो सकती है, जिसका असर यूरोप और अमेरिका तक महसूस किया जाएगा। व्हाइट हाउस में मीडिया से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि उनकी सरकार बातचीत के जरिए समाधान चाहती है, लेकिन जरूरत पड़ने पर सैन्य विकल्प भी खुला रहेगा।

    दूसरी ओर अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी ईरान को लेकर सख्त रुख अपनाया। भारत रवाना होने से पहले मियामी होमस्टेड एयरपोर्ट पर पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में किसी भी प्रकार का टोल सिस्टम या शुल्क अमेरिका और उसके सहयोगियों को स्वीकार नहीं होगा। रुबियो ने कहा कि अमेरिका बहरीन समर्थित संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव का समर्थन कर रहा है, जिसका उद्देश्य समुद्री मार्गों को सुरक्षित और बाधारहित बनाए रखना है।

    रुबियो ने बताया कि इस प्रस्ताव को दुनिया भर के सौ से अधिक देशों का समर्थन मिला है। उन्होंने कहा कि वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बेहद महत्वपूर्ण है और यहां किसी तरह की बाधा पूरी दुनिया के लिए गंभीर संकट पैदा कर सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि ईरान जहाजों से शुल्क वसूलने जैसी कार्रवाई करता है तो किसी भी कूटनीतिक समझौते की संभावना कमजोर पड़ जाएगी।

    ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिकी सैन्य कार्रवाई और दबाव के कारण ईरान की सैन्य क्षमता पहले की तुलना में काफी कमजोर हो चुकी है। उन्होंने कहा कि ईरान की नौसेना, वायुसेना और मिसाइल सिस्टम को भारी नुकसान पहुंचा है। ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिकी नौसेना की मौजूदगी के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर अमेरिका का पूरा नियंत्रण है और उसकी मंजूरी के बिना कोई जहाज वहां से नहीं गुजर सकता।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच भारत का भी जिक्र अहम रहा। मार्को रुबियो ने कहा कि अमेरिका भारत की ऊर्जा जरूरतों को समझता है और वह भारत को पर्याप्त ऊर्जा आपूर्ति देने के लिए तैयार है। उन्होंने भारत को अमेरिका का बेहतरीन सहयोगी और रणनीतिक साझेदार बताया। रुबियो ने कहा कि भारत यात्रा के दौरान ऊर्जा सहयोग, क्षेत्रीय सुरक्षा और क्वाड देशों के बीच सहयोग को लेकर अहम चर्चा होगी।

    उधर, खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल आपूर्ति को लेकर चिंता गहराने लगी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में किसी तरह का टकराव बढ़ता है तो इसका सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ेगा। फिलहाल दुनिया की नजर अमेरिका और ईरान के बीच जारी बातचीत और संभावित कूटनीतिक समाधान पर टिकी हुई है।

  • माइग्रेशन मुद्दे पर तनाव: अमेरिकी फैसले के असर का आकलन करेगा मैक्सिको

    माइग्रेशन मुद्दे पर तनाव: अमेरिकी फैसले के असर का आकलन करेगा मैक्सिको


    नई दिल्ली । अमेरिका में अवैध प्रवासियों के खिलाफ सख्त होते कदमों ने अब मैक्सिको की चिंता बढ़ा दी है। Donald Trump प्रशासन द्वारा जारी नए एग्जीक्यूटिव ऑर्डर के बाद मैक्सिको सरकार सतर्क हो गई है। इस आदेश के तहत बिना कानूनी दस्तावेजों के अमेरिका में रह रहे प्रवासियों की बैंकिंग और वित्तीय गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखी जा सकती है। इसी को देखते हुए Claudia Sheinbaum ने अपने अधिकारियों को इस फैसले के संभावित प्रभाव का विस्तृत आकलन करने के निर्देश दिए हैं।

    राष्ट्रपति शीनबॉम ने अपनी नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि उनकी सरकार इस आदेश के आर्थिक और सामाजिक प्रभावों का अध्ययन कर रही है। खासतौर पर इस बात पर ध्यान दिया जा रहा है कि इसका असर अमेरिका में काम कर रहे लाखों मैक्सिकन नागरिकों द्वारा अपने परिवारों को भेजे जाने वाले पैसों यानी रेमिटेंस पर कितना पड़ेगा। मैक्सिको की अर्थव्यवस्था में रेमिटेंस विदेशी मुद्रा का एक बड़ा स्रोत मानी जाती है और हर साल अरबों डॉलर देश में आते हैं।

    मैक्सिको सरकार के अनुसार, वित्त मंत्रालय और अमेरिका में नए मैक्सिकन राजदूत Roberto Lajous इस मामले का संयुक्त रूप से अध्ययन कर रहे हैं। शुरुआती समीक्षा में फिलहाल किसी बड़े खतरे के संकेत नहीं मिले हैं, लेकिन सरकार स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है। अधिकारियों का मानना है कि अगर बैंकिंग सेवाओं और पैसों के लेन-देन पर ज्यादा निगरानी बढ़ी, तो इसका असर प्रवासी समुदाय पर पड़ सकता है।

    अमेरिका के इस नए आदेश में बैंकों और वित्तीय संस्थानों को ग्राहकों की नागरिकता और इमिग्रेशन स्थिति से जुड़े संदिग्ध संकेतों की निगरानी करने के निर्देश दिए गए हैं। इसके तहत सीमा-पार धन भेजने, बैंक खाते खोलने और वित्तीय सेवाओं के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले पहचान पत्रों की जांच और सख्त की जाएगी। माना जा रहा है कि इससे बड़ी संख्या में प्रवासियों की वित्तीय गतिविधियां जांच के दायरे में आ सकती हैं।

    व्हाइट हाउस के मुताबिक, राष्ट्रपति ट्रंप ने 19 मई को इस आदेश पर हस्ताक्षर किए थे। प्रशासन का तर्क है कि अवैध रूप से रह रहे लोगों को बैंकिंग सुविधाएं और ऋण देना वित्तीय व्यवस्था के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। ट्रंप ने कहा कि कई प्रवासियों के पास स्थायी रोजगार नहीं होता और उन पर निर्वासन का खतरा बना रहता है। ऐसे में उन्हें ऋण देना बैंकिंग प्रणाली की स्थिरता के लिए खतरा बन सकता है।

    इसी बीच अमेरिकी कांग्रेस में विदेश भेजे जाने वाले पैसों यानी रेमिटेंस पर 5 प्रतिशत टैक्स लगाने के प्रस्ताव पर भी चर्चा तेज हो गई है। फिलहाल केवल नकद लेन-देन पर 1 प्रतिशत टैक्स लागू है। मैक्सिको सरकार ने इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा है कि यह प्रवासियों पर “दोहरी टैक्स वसूली” जैसा होगा, क्योंकि वे पहले ही अमेरिका में टैक्स का भुगतान करते हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका ने प्रवासियों के वित्तीय लेन-देन पर और सख्ती की, तो इसका असर सिर्फ मैक्सिको ही नहीं बल्कि कई लैटिन अमेरिकी देशों की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह मुद्दा अमेरिका और मैक्सिको के बीच बड़ा राजनीतिक और आर्थिक विषय बन सकता है।