Author: bharati

  • रीवा में आधी रात जल सत्याग्रह पर प्रशासन की कार्रवाई, तालाब से बाहर निकाले गए प्रदर्शनकारी, न्यूक्लियर प्लांट के विरोध में आंदोलन जारी

    रीवा में आधी रात जल सत्याग्रह पर प्रशासन की कार्रवाई, तालाब से बाहर निकाले गए प्रदर्शनकारी, न्यूक्लियर प्लांट के विरोध में आंदोलन जारी


    रीवा । मध्य प्रदेश के रीवा जिले के रोझौही में प्रस्तावित टाटा न्यूक्लियर पावर प्लांट को लेकर विरोध लगातार तेज होता जा रहा है। परियोजना के खिलाफ जल सत्याग्रह कर रहे आप नेता प्रमोद शर्मा और आदिवासी प्रदर्शनकारियों को मंगलवार रात करीब एक बजे प्रशासनिक टीम ने तालाब से बाहर निकलवाया। इस दौरान मौके पर लालगांव पुलिस भी मौजूद रही। लगातार आंदोलन और अनशन के कारण कुछ प्रदर्शनकारियों की तबीयत बिगड़ने के बाद प्रमोद शर्मा समेत चार लोगों को एंबुलेंस से संजय गांधी अस्पताल भेजा गया। हालांकि प्रदर्शनकारियों को तालाब से बाहर निकालने के बावजूद आंदोलन खत्म होने के संकेत नहीं मिले हैं। ग्रामीण अब भी परियोजना को रद्द करने की मांग पर अड़े हुए हैं।

    प्रशासन की ओर से प्रदर्शनकारियों को मौखिक आश्वासन दिया गया है कि अगले 10 दिनों तक रोझौही में प्रस्तावित परियोजना से जुड़ी कोई गतिविधि नहीं होगी। हालांकि इस आश्वासन के संबंध में लिखित आदेश जारी नहीं किया गया है। इसी बात को लेकर ग्रामीणों की चिंता बनी हुई है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि केवल मौखिक भरोसे से उनकी समस्याओं का समाधान नहीं होगा। जब तक परियोजना को लेकर ठोस निर्णय नहीं लिया जाता और उनकी मांगों पर स्पष्ट जवाब नहीं मिलता तब तक आंदोलन जारी रहेगा।

    जल सत्याग्रह में शामिल आप नेता प्रमोद शर्मा के साथ संदीप कोल रावेन्द्र कोल और बबली कोल की तबीयत बिगड़ने पर उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया। इससे पहले मदरी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के सीएचओ रविकांत साकेत ने प्रमोद शर्मा की स्वास्थ्य जांच की थी। जांच के दौरान उनका ब्लड प्रेशर और शुगर बढ़ा हुआ पाया गया। लगातार अनशन और पानी में बैठकर विरोध करने के कारण उनकी सेहत को लेकर चिंता जताई गई थी। इसके बाद उन्हें इलाज के लिए अस्पताल भेजने का निर्णय लिया गया।

    इस पूरे मामले में आदिवासी महिला विमला कोल की मौत के बाद ग्रामीणों का आक्रोश और बढ़ गया है। बताया गया है कि परियोजना के विरोध में जल सत्याग्रह कर रही विमला कोल की तबीयत बिगड़ गई थी और इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। इस घटना के बाद ग्रामीणों ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। प्रदर्शनकारियों ने मामले की निष्पक्ष जांच कराने और उनकी मांगों को गंभीरता से सुनने की अपील की है। ग्रामीणों का आरोप है कि उनकी चिंताओं का समय रहते समाधान नहीं किया गया।

    मध्य प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार भी इस आंदोलन के बीच रोझौही पहुंचे थे। उन्होंने आंदोलनकारी आदिवासियों और विमला कोल के परिजनों से मुलाकात की तथा परिवार को एक लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी। सिंघार ने प्रस्तावित परियोजना को लेकर ग्रामसभा की सहमति और अनापत्ति प्रमाणपत्र की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उन्होंने विमला कोल की मौत की जांच की मांग भी की और प्रभावित ग्रामीणों की चिंताओं पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत बताई।

    ग्रामीणों को आशंका है कि प्रस्तावित न्यूक्लियर पावर प्लांट से खेती की जमीन जलस्रोत जंगल और पर्यावरण प्रभावित हो सकते हैं। उनका कहना है कि परियोजना के संभावित असर और भविष्य में स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों को लेकर स्पष्ट जानकारी दी जानी चाहिए। इससे पहले बोरिंग मशीन पहुंचने पर भी ग्रामीणों ने विरोध जताया था। रोझौही के अलावा सरई कला महुआ टोला मदरी और आसपास के गांवों के लोग भी परियोजना के खिलाफ आवाज उठा चुके हैं। फिलहाल प्रशासन के 10 दिन के मौखिक आश्वासन के बावजूद स्थिति पूरी तरह शांत नहीं हुई है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि प्रशासन ग्रामीणों की मांगों पर क्या कदम उठाता है और परियोजना को लेकर आगे क्या निर्णय लिया जाता है।

  • ना बाप बड़ा ना भैया सबसे बड़ा रुपैया, सीएम मोहन यादव के बयान ने खींचा ध्यान, शहडोल में लाखों हितग्राहियों को मिली सौगात

    ना बाप बड़ा ना भैया सबसे बड़ा रुपैया, सीएम मोहन यादव के बयान ने खींचा ध्यान, शहडोल में लाखों हितग्राहियों को मिली सौगात

    मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का शहडोल में दिया गया बयान चर्चा का विषय बन गया है। तेंदूपत्ता संग्राहकों को बोनस वितरण कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने कहा कि ना बाप बड़ा ना भैया सबसे बड़ा रुपैया। उनके इस कथन ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया। हालांकि मुख्यमंत्री ने इस बात को लोगों को उनका अधिकार और सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने के संदर्भ में रखा। शहडोल के बाणगंगा मेला मैदान में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने तेंदूपत्ता संग्राहकों के खातों में करोड़ों रुपये की बोनस राशि अंतरित की। इसके साथ ही क्षेत्र में विकास कार्यों की सौगात और विभिन्न योजनाओं से जुड़े विषयों पर भी चर्चा की।

    मुख्यमंत्री ने सिंगल क्लिक के माध्यम से तेंदूपत्ता संग्रहण से जुड़े हितग्राहियों के खातों में बोनस की राशि भेजी। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार छह वन मंडलों और पांच जिलों के 8.66 लाख से अधिक हितग्राहियों को करीब 22.85 करोड़ रुपये की राशि वितरित की गई। कुछ रिपोर्टों में यह राशि 22.89 करोड़ रुपये से अधिक बताई गई है। इस सहायता का उद्देश्य तेंदूपत्ता संग्रहण से जुड़े परिवारों को आर्थिक लाभ पहुंचाना है। वन उपज पर निर्भर रहने वाले अनेक परिवारों के लिए तेंदूपत्ता संग्रहण आय का महत्वपूर्ण साधन है। ऐसे में बोनस की राशि उनके घरेलू खर्च और आर्थिक जरूरतों को पूरा करने में मददगार हो सकती है।

    कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार का प्रयास है कि प्रत्येक पात्र व्यक्ति तक उसका हक पहुंचे। इसी संदर्भ में उन्होंने अपने बयान के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की कि सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तविक हितग्राहियों तक पहुंचना चाहिए। उनके संबोधन में जनकल्याण और विकास से जुड़े मुद्दे प्रमुख रहे। उन्होंने प्रदेश में विकास कार्यों को गति देने और जनता के हित में योजनाओं को लागू करने की सरकार की प्रतिबद्धता भी दोहराई। बयान का एक हिस्सा राजनीतिक चर्चा का विषय बना लेकिन कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य तेंदूपत्ता संग्राहकों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना और क्षेत्र में विकास गतिविधियों को आगे बढ़ाना था।

    शहडोल दौरे के दौरान मुख्यमंत्री ने विकास कार्यों से जुड़ी कई गतिविधियों में भी हिस्सा लिया। रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने क्षेत्र में 134 विकास कार्यों के लोकार्पण और भूमिपूजन से संबंधित कार्यक्रम में भाग लिया। इन कार्यों की कुल लागत को लेकर अलग-अलग रिपोर्टों में आंकड़ों में अंतर है। एक रिपोर्ट में करीब 461.83 करोड़ रुपये के कार्यों का उल्लेख किया गया है। इसके अलावा क्षेत्र में औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा देने और रोजगार के अवसर तैयार करने से जुड़े प्रस्तावों पर भी चर्चा हुई। मुख्यमंत्री ने शहडोल में इस्पात फैक्ट्री स्थापित करने की घोषणा की और कहा कि इससे रोजगार के अवसर बढ़ने की उम्मीद है। प्रस्तावित परियोजना की समयसीमा और अन्य विस्तृत जानकारी सामने आने के बाद इसकी प्रगति का आकलन किया जा सकेगा।

    मुख्यमंत्री ने शिक्षा और जनकल्याण से जुड़े मुद्दों पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कांग्रेस के शासनकाल की व्यवस्थाओं पर सवाल उठाते हुए वर्तमान सरकार की योजनाओं का उल्लेख किया। अपने संबोधन में उन्होंने विद्यार्थियों को लैपटॉप और स्कूटी उपलब्ध कराने जैसे कदमों का जिक्र किया। राजनीतिक टिप्पणी के साथ उन्होंने सरकार की प्राथमिकताओं को जनता तक पहुंचाने की बात कही। कार्यक्रम में मौजूद जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच बोनस वितरण तथा विकास योजनाओं से जुड़े विषय भी चर्चा में रहे।

    शहडोल का यह कार्यक्रम तेंदूपत्ता संग्राहकों को आर्थिक सहायता देने के साथ क्षेत्रीय विकास की योजनाओं को सामने रखने का अवसर बना। मुख्यमंत्री का बयान सुर्खियों में जरूर आया लेकिन हितग्राहियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण पहलू उनके खातों में पहुंची बोनस राशि है। अब इन योजनाओं और घोषित परियोजनाओं का लाभ जमीन पर किस तरह पहुंचता है और प्रस्तावित विकास कार्य कितनी तेजी से आगे बढ़ते हैं इस पर लोगों की नजर रहेगी।

  • रीवा में इकलौते बेटे की मौत के बाद अस्पताल में हंगामा, परिजनों ने डॉक्टरों पर ओवरडोज दवा देने का लगाया आरोप

    रीवा में इकलौते बेटे की मौत के बाद अस्पताल में हंगामा, परिजनों ने डॉक्टरों पर ओवरडोज दवा देने का लगाया आरोप

    मध्य प्रदेश: के रीवा में एक युवक की मौत के बाद अस्पताल में परिजनों ने हंगामा किया। मृतक परिवार का इकलौता बेटा बताया जा रहा है। घटना के बाद परिजनों ने इलाज में लापरवाही का आरोप लगाते हुए डॉक्टरों पर अधिक मात्रा में दवा देने की बात कही। बेटे की मौत से परिवार में शोक का माहौल है। अस्पताल में हुए हंगामे के दौरान परिजनों ने इलाज के तरीके पर सवाल उठाए और मामले की जांच की मांग की।

    परिजनों ने डॉक्टरों पर लगाए गंभीर आरोप

    परिजनों का आरोप है कि इलाज के दौरान मरीज को दवा की अधिक मात्रा दी गई, जिसके बाद उसकी हालत बिगड़ गई। उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर अस्पताल में नाराजगी जताई। परिवार का कहना है कि बेटे की मौत से उन्हें गहरा सदमा पहुंचा है। हालांकि, दवा की मात्रा, मरीज की स्थिति और मौत के वास्तविक कारणों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध जानकारी के आधार पर नहीं की जा सकती।

    अस्पताल में हंगामे के बाद मामले को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। यह स्पष्ट होना जरूरी है कि मरीज को किस बीमारी के कारण भर्ती कराया गया था, उसका इलाज किस तरह किया जा रहा था और उसकी हालत में गिरावट कब आई। इन तथ्यों की जानकारी और मेडिकल रिकॉर्ड की जांच के बाद ही उपचार में किसी तरह की लापरवाही के आरोपों की पुष्टि हो सकती है।

    मौत के कारणों की जांच जरूरी

    इस तरह के मामले में मरीज के इलाज से जुड़े दस्तावेज, दी गई दवाओं की मात्रा, चिकित्सकीय निगरानी और मौत से संबंधित मेडिकल रिपोर्ट महत्वपूर्ण होती हैं। परिजनों की ओर से लगाए गए आरोपों की जांच के लिए संबंधित रिकॉर्ड की समीक्षा जरूरी होगी। केवल आरोपों के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मरीज की मौत ओवरडोज के कारण हुई।

    फिलहाल उपलब्ध जानकारी में मृतक की उम्र, अस्पताल का नाम, भर्ती होने की तारीख, इलाज करने वाले डॉक्टरों का पक्ष और पुलिस की कार्रवाई का विवरण सामने नहीं आया है। इन जानकारियों के बिना घटना के पूरे क्रम और जिम्मेदारी से जुड़े पहलुओं पर निश्चित रूप से कुछ कहना संभव नहीं है।

    मामले में अस्पताल प्रबंधन का पक्ष और संबंधित अधिकारियों की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण होगी। जांच में यह सामने आ सकेगा कि मरीज को कौन-सी दवाएं दी गई थीं और उपचार के दौरान निर्धारित चिकित्सकीय प्रक्रिया का पालन किया गया या नहीं। परिजनों के आरोपों की पुष्टि या खंडन जांच के निष्कर्षों के आधार पर ही किया जा सकेगा।

  • मध्यप्रदेश शासन का नया आदेश जारी, 5 IAS अधिकारियों की पदस्थापना बदली, मंत्रालय से लेकर जिलों तक नई जिम्मेदारियां

    मध्यप्रदेश शासन का नया आदेश जारी, 5 IAS अधिकारियों की पदस्थापना बदली, मंत्रालय से लेकर जिलों तक नई जिम्मेदारियां


    मध्यप्रदेश । मध्यप्रदेश में प्रशासनिक स्तर पर महत्वपूर्ण बदलाव किया गया है। राज्य शासन के सामान्य प्रशासन विभाग ने 27 अक्टूबर 2026 को आदेश जारी कर भारतीय प्रशासनिक सेवा के पांच अधिकारियों की नई पदस्थापना की है। इस आदेश के तहत सागर देवास और सिवनी जिलों के कलेक्टरों की जिम्मेदारियों में बदलाव किया गया है। इसके साथ ही मध्यप्रदेश राज्य पर्यटन विकास निगम और मंत्रालय के सामान्य प्रशासन विभाग में भी अधिकारियों को नई जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। शासन की ओर से जारी आदेश में इन पदस्थापनाओं को आगामी आदेश तक अस्थायी रूप से प्रभावी बताया गया है। इस फेरबदल के बाद संबंधित अधिकारियों को अपनी नई जिम्मेदारियों के अनुसार कार्यभार संभालना होगा।

    आदेश के अनुसार वर्ष 2012 बैच की आईएएस अधिकारी प्रतिमा पाल को सागर कलेक्टर के पद से स्थानांतरित कर मध्यप्रदेश राज्य पर्यटन विकास निगम भोपाल का प्रबंध संचालक नियुक्त किया गया है। उनके स्थान पर वर्ष 2014 बैच के अधिकारी दिलीप कुमार यादव को सागर जिले का नया कलेक्टर बनाया गया है। दिलीप कुमार यादव इससे पहले मध्यप्रदेश राज्य पर्यटन विकास निगम में प्रबंध संचालक की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। अब उन्हें सागर जिले का प्रशासनिक नेतृत्व सौंपा गया है। जिले में सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन राजस्व संबंधी कार्यों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं के संचालन की जिम्मेदारी उनके कार्यक्षेत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा होगी।

    इसी फेरबदल में देवास जिले की प्रशासनिक कमान भी बदली गई है। वर्ष 2014 बैच की आईएएस अधिकारी नेहा मीना को सिवनी कलेक्टर के पद से स्थानांतरित कर देवास जिले का कलेक्टर नियुक्त किया गया है। नेहा मीना के सामने अब देवास जिले में प्रशासनिक व्यवस्थाओं को सुचारु बनाए रखने और शासन की योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू कराने की जिम्मेदारी होगी। वहीं देवास में कलेक्टर के पद पर कार्यरत वर्ष 2015 बैच के अधिकारी ऋतुराज को मंत्रालय भोपाल में सामान्य प्रशासन विभाग का उप सचिव बनाया गया है। जिला प्रशासन से मंत्रालय में नई जिम्मेदारी मिलने के बाद उनके कार्यक्षेत्र में बदलाव होगा।

    सिवनी जिले में भी नए कलेक्टर की नियुक्ति की गई है। वर्ष 2017 बैच की आईएएस अधिकारी अंजू अरुण कुमार को पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में उप सचिव के पद से स्थानांतरित कर सिवनी जिले का कलेक्टर बनाया गया है। अब वे जिले की प्रशासनिक व्यवस्था का संचालन करेंगी। उनके सामने ग्रामीण विकास से जुड़ी योजनाओं के क्रियान्वयन और सरकारी सेवाओं को आम नागरिकों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने जैसी जिम्मेदारियां रहेंगी। इस बदलाव के बाद सिवनी जिले में प्रशासनिक नेतृत्व की नई व्यवस्था लागू होगी।

    सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से जारी आदेश पर मध्यप्रदेश शासन के मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल के हस्ताक्षर हैं। आदेश की प्रतिलिपि भारत सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग सहित राज्य के संबंधित विभागों और अधिकारियों को आवश्यक कार्रवाई के लिए भेजी गई है। इस प्रशासनिक फेरबदल में तीन जिलों के कलेक्टरों की जिम्मेदारियां बदली गई हैं जबकि दो अधिकारियों को मंत्रालय और पर्यटन विकास निगम में नई पदस्थापना दी गई है। अब संबंधित अधिकारियों के कार्यभार ग्रहण करने और अपने नए कार्यक्षेत्र में प्रशासनिक प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने पर नजर रहेगी।

  • खाद्य सुरक्षा पर सवाल, देश में 1.85 लाख नमूने फेल, राजस्थान में सिर्फ 31 मामलों में दोषियों को सजा

    खाद्य सुरक्षा पर सवाल, देश में 1.85 लाख नमूने फेल, राजस्थान में सिर्फ 31 मामलों में दोषियों को सजा

    नई दिल्ली ।देश में खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और मिलावट रोकने के लिए की जा रही कार्रवाई के आंकड़े खाद्य सुरक्षा व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती दिखाते हैं। वर्ष 2025-26 में देशभर में 2,23,808 खाद्य नमूनों की जांच की गई। इनमें 40,023 नमूने तय मानकों पर खरे नहीं उतरे। इसके बावजूद दोषियों को सजा मिलने वाले मामलों की संख्या 1,918 रही। यानी जांच में खामियां सामने आने के मुकाबले सजा तक पहुंचने वाले मामले काफी कम हैं।

    पिछले पांच वर्षों के आंकड़े भी इसी स्थिति की ओर इशारा करते हैं। वर्ष 2021-22 से 2025-26 के बीच देशभर में 8.86 लाख खाद्य नमूनों की जांच हुई। इनमें 1,85,780 नमूने फेल पाए गए। इन मामलों में 1,39,507 का निपटारा जुर्माना लगाकर किया गया, जबकि केवल 6,203 मामलों में दोषियों को सजा सुनाई गई। इससे स्पष्ट होता है कि खाद्य सुरक्षा नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई के अलग-अलग परिणाम सामने आए हैं।

    सजा की दर में पिछले वर्षों के दौरान कुछ सुधार जरूर हुआ है, लेकिन यह अब भी पांच प्रतिशत से कम है। वर्ष 2021-22 में 32,935 नमूने फेल हुए और 671 मामलों में सजा हुई। अगले वर्ष 44,626 नमूनों के फेल होने पर 1,188 मामलों में दोषियों को सजा मिली। वर्ष 2023-24 में सजा की दर 3.4 प्रतिशत और 2024-25 में 3.7 प्रतिशत रही। वर्ष 2025-26 में यह बढ़कर 4.8 प्रतिशत हो गई।

    राजस्थान के आंकड़े विशेष रूप से ध्यान खींचते हैं। वर्ष 2025-26 में राज्य में 17,325 खाद्य नमूनों की जांच की गई, जिनमें 4,594 नमूने फेल पाए गए। यह कुल जांचे गए नमूनों का 26.5 प्रतिशत है। फेल नमूनों की संख्या के मामले में राजस्थान देश में दूसरे स्थान पर रहा। हालांकि, राज्य में केवल 31 मामलों में दोषियों को सजा मिली। फेल नमूनों की संख्या के मुकाबले यह दर एक प्रतिशत से भी कम है।

    मध्य प्रदेश में भी स्थिति में सुधार की जरूरत दिखाई देती है। वर्ष 2025-26 के दौरान राज्य में फेल हुए खाद्य नमूनों के करीब चार प्रतिशत मामलों में ही सजा हुई। यह राष्ट्रीय औसत 4.8 प्रतिशत से कम है। ऐसे में राज्य में खाद्य सुरक्षा से जुड़े मामलों की जांच, कानूनी प्रक्रिया और दोषियों को सजा दिलाने की व्यवस्था पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है।

    छत्तीसगढ़ में इसी अवधि के दौरान 2,065 खाद्य नमूनों की जांच हुई। इनमें 214 नमूने फेल पाए गए, जो कुल नमूनों का लगभग 10.4 प्रतिशत है। हालांकि, नमूनों के फेल होने की दर अपेक्षाकृत कम होने के बावजूद खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए नियमित निगरानी आवश्यक बनी रहती है।

    दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश में खाद्य नमूनों के फेल होने का आंकड़ा काफी अधिक रहा। वर्ष 2025-26 में वहां 39,519 नमूनों की जांच की गई, जिनमें 20,427 फेल मिले। यह कुल नमूनों का 51.7 प्रतिशत है। इसके बावजूद राज्य में 342 मामलों में ही सजा हुई। हरियाणा में 31 प्रतिशत और झारखंड में 27.8 प्रतिशत नमूने फेल हुए। महाराष्ट्र में यह आंकड़ा 17.4 प्रतिशत और पंजाब में 13.2 प्रतिशत रहा।

    कुछ राज्यों में दोषियों को सजा मिलने की दर बेहतर दर्ज की गई। तमिलनाडु में 3,984 फेल नमूनों के मुकाबले 857 मामलों में सजा हुई, जबकि केरल में 1,863 फेल नमूनों के मुकाबले 330 मामलों में दोषियों को सजा मिली। इसके विपरीत, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, झारखंड, गोवा, असम, बिहार और पुडुचेरी में दिए गए आंकड़ों के अनुसार किसी मामले में सजा दर्ज नहीं हुई।

    दूध और डेयरी उत्पादों की जांच भी चिंता का विषय है। वर्ष 2025-26 में इनके 39,351 नमूनों की जांच की गई, जिनमें 14,668 फेल मिले। यानी लगभग 37.3 प्रतिशत नमूने तय मानकों पर खरे नहीं उतरे। दूध रोजमर्रा के इस्तेमाल की वस्तु है, इसलिए इसकी गुणवत्ता सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है।

    खाद्य सुरक्षा कानून, 2006 के तहत नियमों का उल्लंघन करने पर जुर्माने और जेल का प्रावधान है। असुरक्षित खाद्य पदार्थ से गंभीर नुकसान होने पर छह साल तक की कैद और पांच लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। यदि असुरक्षित भोजन से किसी की मौत होती है, तो उम्रकैद और कम से कम 10 लाख रुपये के जुर्माने का प्रावधान है।

    हालांकि, हर फेल नमूना मिलावट का मामला नहीं होता। इसमें असुरक्षित खाद्य पदार्थ, निर्धारित गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतरने वाले उत्पाद और गलत लेबल वाले सामान भी शामिल हो सकते हैं। सरकार के मुताबिक, करीब 98 प्रतिशत खाद्य कारोबारी राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।

    खाद्य पदार्थों की निगरानी के लिए वर्ष 2025-26 में देशभर में 5,20,566 निरीक्षण किए गए। वर्ष 2024-25 में 4,01,391 और 2023-24 में 3,57,072 निरीक्षण हुए थे। पिछले पांच वर्षों में 4,461 लाइसेंस निलंबित और 11,493 लाइसेंस रद्द किए गए। इन आंकड़ों के बीच सबसे अहम चुनौती यह है कि जांच में खामी मिलने के बाद मामलों का प्रभावी निपटारा हो और नियम तोड़ने वालों के खिलाफ समय पर कानूनी कार्रवाई हो।

  • ट्विशा शर्मा मौत मामले में पूर्व जज गिरिबाला सिंह की जमानत पर हाईकोर्ट का फैसला सुरक्षित, सीबीआई ने उठाए साक्ष्यों से जुड़े सवाल

    ट्विशा शर्मा मौत मामले में पूर्व जज गिरिबाला सिंह की जमानत पर हाईकोर्ट का फैसला सुरक्षित, सीबीआई ने उठाए साक्ष्यों से जुड़े सवाल

    मध्य प्रदेश: हाईकोर्ट में ट्विशा शर्मा की मौत के मामले में आरोपी पूर्व जिला एवं सत्र न्यायाधीश गिरिबाला सिंह की जमानत याचिका पर सुनवाई हुई। सीबीआई और राज्य सरकार ने उनकी जमानत का विरोध करते हुए जांच में सहयोग नहीं करने और साक्ष्यों को प्रभावित किए जाने की आशंका जताई। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट की एकलपीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। फिलहाल गिरिबाला सिंह को जमानत मिलेगी या नहीं, इस पर अदालत का अंतिम निर्णय आना बाकी है।

    सुनवाई के दौरान सरकारी पक्ष ने दलील दी कि जांच के दौरान गिरिबाला सिंह ने अपेक्षित सहयोग नहीं किया। यह आरोप भी लगाया गया कि साक्ष्यों को प्रभावित करने की कोशिश की गई थी। सीबीआई और राज्य सरकार ने आशंका जताई कि यदि उन्हें जमानत मिलती है, तो मामले के गवाहों और साक्ष्यों पर असर पड़ सकता है। इसी आधार पर सरकारी पक्ष ने याचिका खारिज करने की मांग की।

    सीबीआई की ओर से अदालत को बताया गया कि जांच के दौरान जब्त किए गए लैपटॉप, सीसीटीवी रिकॉर्डिंग और अन्य तकनीकी साक्ष्यों से संबंधित रिपोर्ट अभी प्राप्त नहीं हुई हैं। सरकारी पक्ष के अनुसार, इन रिपोर्टों से जांच को आगे बढ़ाने और मामले से जुड़े तथ्यों का आकलन करने में मदद मिल सकती है। रिपोर्ट लंबित होने का मुद्दा भी जमानत का विरोध करते समय उठाया गया।

    वहीं, गिरिबाला सिंह की ओर से पेश बचाव पक्ष ने जमानत दिए जाने की मांग की। उनके वकील ने दलील दी कि आरोपी के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। बचाव पक्ष ने उनकी उम्र, बीमारियों और करीब पांच महीने से न्यायिक हिरासत में रहने का हवाला भी दिया। इसके अलावा यह तर्क रखा गया कि सीबीआई ने उनके खिलाफ दहेज अधिनियम की धाराओं में चालान पेश नहीं किया है। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया।

    यह मामला भोपाल की पूर्व जिला एवं सत्र न्यायाधीश गिरिबाला सिंह की बहू और मॉडल ट्विशा शर्मा की मौत से जुड़ा है। ट्विशा ने 12 मई को फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। इसके बाद पुलिस ने गिरिबाला सिंह और उनके बेटे समर्थ सिंह के खिलाफ दहेज हत्या तथा दहेज अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया था। घटना के बाद मामले की जांच और जमानत को लेकर कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ी।

    गिरिबाला सिंह को 15 मई को भोपाल की जिला एवं सत्र अदालत से अग्रिम जमानत मिली थी। इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। मामले में दोबारा पोस्टमार्टम कराने की मांग भी उठी। इसके बाद हाईकोर्ट ने दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान की टीम से दोबारा पोस्टमार्टम कराने के निर्देश दिए थे। 27 मई को हाईकोर्ट ने गिरिबाला सिंह को मिली अग्रिम जमानत निरस्त कर दी थी। इसके बाद राज्य सरकार ने मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी।

    मामले में ट्विशा शर्मा के पिता नवनिधि शर्मा ने सुनवाई मध्य प्रदेश से बाहर कराने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। इस याचिका में सीबीआई, गिरिबाला सिंह और उनके बेटे समर्थ सिंह को प्रतिवादी बनाया गया था। उपलब्ध विवरण के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने गिरिबाला सिंह की जमानत याचिका पर दो सप्ताह के भीतर सुनवाई करने के निर्देश दिए थे।

    अब हाईकोर्ट के फैसले पर निगाहें टिकी हैं। जमानत के पक्ष में बचाव पक्ष ने स्वास्थ्य, उम्र और हिरासत की अवधि से जुड़े तर्क रखे हैं, जबकि सीबीआई और राज्य सरकार ने जांच की स्थिति तथा साक्ष्यों को प्रभावित किए जाने की आशंका के आधार पर विरोध किया है। अदालत का अंतिम आदेश आने के बाद ही स्पष्ट होगा कि गिरिबाला सिंह को जमानत मिलती है या उन्हें न्यायिक हिरासत में रहना होगा।

  • मध्य प्रदेश में त्योहारी खरीदारी का जोर, प्रीमियम उत्पादों के साथ किफायती सामानों की भी बढ़ी मांग

    मध्य प्रदेश में त्योहारी खरीदारी का जोर, प्रीमियम उत्पादों के साथ किफायती सामानों की भी बढ़ी मांग


    भोपाल।
    अमेज़न ग्रेट इंडियन फेस्टिवल 2026 के दौरान मध्य प्रदेश में ऑनलाइन खरीदारी का रुझान तेजी से बढ़ा है। स्मार्टफोन, कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स, बड़े घरेलू उपकरण, फैशन, ब्यूटी और रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़े उत्पादों की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। कंपनी के अनुसार, राज्य में सामान्य कारोबारी दिनों की तुलना में कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स की मांग सात गुना बढ़ी है। वहीं, प्रीमियम स्मार्टफोन की खरीदारी में 20 गुना वृद्धि दर्ज की गई। इसके साथ ही ग्राहकों ने किफायती खरीदारी के विकल्पों में भी दिलचस्पी दिखाई है।

    बड़े घरेलू उपकरणों की खरीदारी में जबलपुर सबसे आगे

    त्योहारी सीजन में रेफ्रिजरेटर, वाशिंग मशीन और एयर कंडीशनर जैसे बड़े घरेलू उपकरणों की मांग में जबरदस्त उछाल आया है। सामान्य कारोबारी दिनों की तुलना में जबलपुर में इन उत्पादों की मांग 26 गुना, ग्वालियर में 21 गुना, इंदौर में 16 गुना और भोपाल में 12 गुना बढ़ी है। लैपटॉप, मॉनिटर, टैबलेट, गेमिंग कंसोल, हेडफोन, ईयरफोन, स्मार्ट रिंग और साउंडबार जैसे इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद भी ग्राहकों की पसंद बने हुए हैं।

    फिटनेस और लाइफस्टाइल उत्पादों की बढ़ी लोकप्रियता

    मध्य प्रदेश के प्रमुख शहरों में फिटनेस और लाइफस्टाइल से जुड़े उत्पादों की खरीदारी में भी तेजी आई है। सामान्य कारोबारी दिनों की तुलना में रनिंग शूज की मांग जबलपुर में सात गुना, ग्वालियर में छह गुना और इंदौर में पांच गुना दर्ज की गई। एनालॉग घड़ियों की मांग ग्वालियर और इंदौर में पांच-पांच गुना बढ़ी है। इसके अलावा फिटनेस ट्रैकर्स, बैडमिंटन रैकेट और एक्सरसाइज बाइक जैसे उत्पादों को भी ग्राहकों ने पसंद किया।

    ब्यूटी और पर्सनल केयर उत्पादों की मांग में उछाल

    त्योहारी खरीदारी के दौरान ब्यूटी और पर्सनल केयर श्रेणी में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। भोपाल में बॉडी केयर उत्पादों की मांग सामान्य कारोबारी दिनों की तुलना में 14 गुना बढ़ी। साबुन की मांग भोपाल में 16 गुना, जबलपुर में 10 गुना और इंदौर में आठ गुना दर्ज की गई। स्कैल्प ट्रीटमेंट, फेस केयर और कैजुअल फुटवियर भी प्रमुख शहरों में ग्राहकों की पसंद में शामिल रहे।

    रोजमर्रा के सामान और बेबी केयर उत्पादों की मांग भी बढ़ी

    राज्य में दैनिक उपयोग की वस्तुओं की खरीदारी में भी मजबूती देखने को मिली। भोपाल और जबलपुर में बेबी प्रोडक्ट्स की मांग तीन गुना बढ़ी। हेल्दी ब्रेकफास्ट विकल्पों में योगाबार हाई प्रोटीन ओट्स की मांग भोपाल में आठ गुना और इंदौर में सात गुना दर्ज की गई। घरेलू सफाई और लॉन्ड्री उत्पादों की मांग भोपाल में 15 गुना, जबकि ग्वालियर और इंदौर में 11-11 गुना बढ़ी।

    बेबी केयर श्रेणी में हिमालया हैप्पी बेबी गिफ्ट पैक्स की मांग भोपाल में सामान्य कारोबारी दिनों की तुलना में 95 गुना बढ़ने का दावा किया गया है। यह आंकड़ा त्योहारी खरीदारी के दौरान बच्चों की देखभाल से जुड़े उत्पादों में बढ़ी दिलचस्पी को दर्शाता है।

    होम, किचन और आउटडोर उत्पादों की खरीदारी में भी तेजी

    घर, रसोई और आउटडोर से जुड़े उत्पादों की मांग में भी वृद्धि दर्ज की गई। सामान्य कारोबारी दिनों की तुलना में इस श्रेणी में ग्वालियर में लगभग पांच गुना, इंदौर और जबलपुर में करीब चार-चार गुना तथा भोपाल में तीन गुना से अधिक वृद्धि हुई। फिटनेस उपकरणों, सजावटी और आपातकालीन लाइटिंग, कार के रखरखाव से जुड़े उत्पादों तथा फैमिली कार्ड गेम्स की मांग ने इस वृद्धि में योगदान दिया।

    किफायती खरीदारी के विकल्पों को भी मिला बढ़ावा

    प्रीमियम उत्पादों की बढ़ती मांग के साथ ग्राहकों ने किफायती खरीदारी को भी प्राथमिकता दी। अमेज़न बाजार पर सामान्य कारोबारी दिनों की तुलना में भोपाल में छह गुना, ग्वालियर और जबलपुर में चार-चार गुना तथा इंदौर में तीन गुना वृद्धि दर्ज की गई।

    कंपनी के अनुसार, अमेज़न ग्रेट इंडियन फेस्टिवल 2026 के दौरान मध्य प्रदेश में खरीदारी के रुझान से स्पष्ट है कि ग्राहक एक ओर प्रीमियम इलेक्ट्रॉनिक्स और घरेलू उपकरणों पर खर्च कर रहे हैं, तो दूसरी ओर रोजमर्रा की जरूरतों और बजट के अनुकूल उत्पादों की खरीदारी में भी सक्रिय हैं। कंपनी ने बताया कि ग्राहक त्योहारी सीजन के दौरान जारी ऑफर्स और डील्स का लाभ उठा सकते हैं।

  • सिंगरौली FSTP विवाद में जांच के आश्वासन पर टिकी नजरें, निगम प्रशासन से महापौर तक जवाबदेही को लेकर चर्चा तेज

    सिंगरौली FSTP विवाद में जांच के आश्वासन पर टिकी नजरें, निगम प्रशासन से महापौर तक जवाबदेही को लेकर चर्चा तेज

    सिंगरौली । मध्यप्रदेश के सिंगरौली नगर निगम से जुड़े फीकल स्लज ट्रीटमेंट प्लांट यानी FSTP के संचालन और भुगतान प्रक्रिया को लेकर सवाल उठने लगे हैं। प्लांट में लगी मशीनों की स्थिति से लेकर कार्यों की निगरानी और भुगतान के आधार तक कई बिंदुओं पर स्पष्ट जानकारी मांगी जा रही है। सरकारी धन से संचालित इस परियोजना को लेकर अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्लांट का काम निर्धारित नियमों के अनुसार हो रहा है या नहीं और इसकी वास्तविक स्थिति की पुष्टि किस स्तर पर की जाती है। मामले में जांच का आश्वासन सामने आने के बाद अब संबंधित दस्तावेजों की पड़ताल और नगर निगम प्रशासन के आधिकारिक जवाब का इंतजार किया जा रहा है।

    FSTP प्लांट का उद्देश्य मल-मलिन पदार्थ यानी फीकल स्लज के सुरक्षित उपचार और प्रबंधन की व्यवस्था करना है। ऐसी परियोजनाएं शहर की स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। इसलिए इनके संचालन में मशीनों की कार्यक्षमता नियमित निगरानी और निर्धारित मानकों का पालन जरूरी होता है। सिंगरौली में इसी व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। स्वतंत्र इंजीनियर भूपेश राणा और सत्य प्रकाश की भूमिका तथा जिम्मेदारियों को लेकर भी प्रश्न सामने आए हैं। वहीं अजय प्रताप सिंह की ओर से दिल्ली से मॉनिटरिंग किए जाने की चर्चा के बीच यह जानना जरूरी बताया जा रहा है कि प्लांट का भौतिक निरीक्षण कौन करता है और निरीक्षण रिपोर्ट किस आधार पर तैयार होती है। हालांकि इन सवालों और आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है।

    मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू भुगतान प्रक्रिया है। किसी भी सरकारी परियोजना में भुगतान से पहले कार्य की स्थिति और गुणवत्ता का सत्यापन महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में यह स्पष्ट होना चाहिए कि प्लांट में मशीनों के संचालन की जांच कब और किसके द्वारा की गई। कार्यादेश की शर्तें क्या थीं और संबंधित बिलों को स्वीकृति किस आधार पर मिली। निरीक्षण रिपोर्ट और भुगतान से जुड़े दस्तावेज सामने आने पर इन सवालों के जवाब मिलने में मदद मिल सकती है। फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर किसी अनियमितता को प्रमाणित नहीं माना जा सकता। वास्तविक स्थिति जानने के लिए संबंधित रिकॉर्ड और जिम्मेदार अधिकारियों का पक्ष सामने आना जरूरी है।

    इस पूरे मामले में नगर निगम के जिम्मेदार अधिकारियों के साथ निगमाध्यक्ष और महापौर की भूमिका भी चर्चा में है। सार्वजनिक धन और शहर की स्वच्छता व्यवस्था से जुड़े विषय पर नागरिकों को यह जानने की अपेक्षा रहती है कि प्रशासन ने उठे सवालों पर क्या कदम उठाए हैं। अधिकारियों या जनप्रतिनिधियों की ओर से स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आने को लेकर सवाल किए जा रहे हैं। हालांकि चुप्पी को अपने आप में किसी गड़बड़ी का प्रमाण नहीं माना जा सकता। मामले की स्थिति स्पष्ट करने के लिए आधिकारिक जानकारी और दस्तावेजों का सार्वजनिक होना अधिक महत्वपूर्ण है।

    नगर निगम अध्यक्ष देवेश पांडेय ने इस मामले की जांच कराने और संबंधित लोगों के विरुद्ध कार्रवाई का आश्वासन दिया था। अब निगाहें इस बात पर हैं कि जांच कब शुरू होती है और उसके दायरे में किन बिंदुओं को शामिल किया जाता है। मशीनों की वास्तविक स्थिति कार्यों का भौतिक सत्यापन इंजीनियरों की निरीक्षण रिपोर्ट ठेकेदार के बिल और भुगतान स्वीकृति से जुड़े रिकॉर्ड की जांच से मामले की स्थिति स्पष्ट हो सकती है। जांच निष्पक्ष तरीके से पूरी होने और उसके निष्कर्ष सामने आने पर ही जिम्मेदारी तय करने का आधार बनेगा।

    फिलहाल सिंगरौली के FSTP प्लांट को लेकर तीन प्रमुख सवाल बने हुए हैं। मशीनें किस स्थिति में हैं। कार्यों की निगरानी और गुणवत्ता सत्यापन की जिम्मेदारी किसकी है। भुगतान निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार हुआ या नहीं। इन सवालों के जवाब अटकलों से नहीं बल्कि दस्तावेजों की पड़ताल और आधिकारिक पक्ष से मिलेंगे। अब नगर निगम प्रशासन की कार्रवाई और जांच के निष्कर्षों पर नजर रहेगी।

  • राहुल गांधी की संपत्ति मामले में CJI सूर्यकांत की वकील को फटकार, पूछा- क्या मीडिया का ध्यान खींचने के लिए दायर की याचिका?

    राहुल गांधी की संपत्ति मामले में CJI सूर्यकांत की वकील को फटकार, पूछा- क्या मीडिया का ध्यान खींचने के लिए दायर की याचिका?

    नई दिल्ली ।कांग्रेस नेता राहुल गांधी से जुड़े कथित आय से अधिक संपत्ति के मामले में मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता पक्ष के वकील को फटकार लगाई। अदालत ने मामले को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कराने की मांग पर सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या याचिका दाखिल करने का उद्देश्य केवल मीडिया का ध्यान आकर्षित करना है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इस मुद्दे को उठाने के पीछे कोई स्पष्ट आधार नजर नहीं आता और दलील में पर्याप्त दम भी नहीं है।

    सुनवाई के दौरान वकील ने राहुल गांधी के एक हालिया बयान का हवाला दिया। उनका दावा था कि राहुल गांधी ने एक कार्यक्रम में कहा था कि वह प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के 200 अधिकारियों के संपर्क में हैं। इसी बयान के आधार पर वकील ने सुप्रीम कोर्ट से मामले को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने की मांग की।

    इस दलील पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सवाल किया कि क्या इस मुद्दे पर किसी न्यूज चैनल से सलाह ली गई है। उन्होंने टिप्पणी की कि ऐसा प्रतीत होता है कि मामले को उठाने का उद्देश्य मीडिया का ध्यान आकर्षित करना है। अदालत की इस टिप्पणी से स्पष्ट हुआ कि वह मामले की सुनवाई की मांग के पीछे प्रस्तुत आधार की पर्याप्तता को लेकर संतुष्ट नहीं थी।

    यह विवाद राहुल गांधी की संपत्ति की जांच से संबंधित उस मामले से जुड़ा है, जिसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने मई 2026 में सीबीआई और ईडी को जांच करने का आदेश दिया था। इसके बाद राहुल गांधी ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उन्होंने इस मामले को दिल्ली हाई कोर्ट में स्थानांतरित करने की मांग भी की थी।

    अगस्त 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी थी। साथ ही अदालत ने शिकायतकर्ता, सीबीआई और ईडी से जवाब मांगा था। सुप्रीम कोर्ट ने जांच एजेंसियों को हाई कोर्ट के समक्ष कोई रिपोर्ट दाखिल नहीं करने का निर्देश भी दिया था। इस रोक के कारण हाई कोर्ट के आदेश के तहत आगे की कार्रवाई पर अंतरिम स्थिति बनी हुई है।

    मामले की शुरुआत कर्नाटक के भारतीय जनता पार्टी कार्यकर्ता विग्नेश शिशिर की शिकायत से हुई थी। उन्होंने राहुल गांधी की संपत्ति को लेकर कई आरोप लगाए थे। शिकायत में लगाए गए आरोपों और संपत्ति की जांच से संबंधित मांगों के आधार पर यह मामला न्यायिक प्रक्रिया में पहुंचा।

    राहुल गांधी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। इसके बाद शीर्ष अदालत ने मामले में संबंधित पक्षों से जवाब मांगा और जांच के आदेश पर अंतरिम रोक लगाई। अब सुनवाई के दौरान याचिका को सूचीबद्ध कराने की मांग और उसके समर्थन में दिए गए तर्क चर्चा में रहे।

    संपत्ति से जुड़े आरोपों के मामले में अदालत की कार्यवाही और जांच एजेंसियों की भूमिका महत्वपूर्ण बनी हुई है। हालांकि, शिकायत में लगाए गए आरोप अपने आप में दोष सिद्ध होने का प्रमाण नहीं हैं। मामले में आगे की स्थिति संबंधित पक्षों के जवाब और अदालत के आगामी आदेशों पर निर्भर करेगी।

  • कोटा में शिवपुरी के 18 वर्षीय जेईई छात्र की मौत, छह महीने पहले गया था पढ़ाई करने..

    कोटा में शिवपुरी के 18 वर्षीय जेईई छात्र की मौत, छह महीने पहले गया था पढ़ाई करने..


    मध्य प्रदेश :
    के शिवपुरी जिले के 18 वर्षीय छात्र अजीत धाकड़ की राजस्थान के कोटा में मौत हो गई। वह जवाहर नगर क्षेत्र में एक पीजी में रहकर जेईई की तैयारी कर रहा था। रविवार रात उसका शव कमरे में फंदे पर लटका मिला। घटना की जानकारी मिलने के बाद पुलिस मौके पर पहुंची और शव को अस्पताल भिजवाया। मामले में पुलिस ने मर्ग कायम कर जांच शुरू कर दी है।

    अजीत शिवपुरी जिले के सिरसौद थाना क्षेत्र के रातीकिरार गांव का रहने वाला था। वह छह महीने पहले ही इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा जेईई की तैयारी के लिए कोटा गया था। शिवपुरी से 12वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद उसने आगे की तैयारी के लिए राजस्थान के कोटा में रहना शुरू किया था। घटना की खबर मिलने के बाद उसके परिवार और गांव में शोक का माहौल है।

    जानकारी के अनुसार, रविवार रात करीब 10 बजे अजीत के साथ रहने वाले छात्र उसे टहलने के लिए बुलाने पहुंचे थे। उन्होंने कमरे का दरवाजा अंदर से बंद पाया। काफी कोशिश के बाद भी दरवाजा नहीं खुला, जिसके बाद साथियों ने खिड़की से अंदर झांककर देखा। इस दौरान अजीत का शव फंदे पर लटका दिखाई दिया। इसके बाद पुलिस को सूचना दी गई।

    सूचना मिलने पर पुलिस मौके पर पहुंची और आवश्यक कार्रवाई की। छात्र के शव को कोटा के एमबीएस अस्पताल ले जाया गया। पुलिस ने कमरे की जांच भी की, लेकिन वहां से कोई सुसाइड नोट बरामद नहीं हुआ। सोमवार को पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी होने के बाद शव परिजनों को सौंप दिया गया। पुलिस घटना से जुड़े तथ्यों की जांच कर रही है।

    प्रारंभिक तौर पर आशंका जताई जा रही है कि पढ़ाई से जुड़े तनाव के कारण छात्र ने यह कदम उठाया हो सकता है। हालांकि, इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। कमरे से कोई सुसाइड नोट नहीं मिलने के कारण घटना के पीछे की परिस्थितियों को लेकर अभी स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है। पुलिस जांच के बाद ही मामले से जुड़े अन्य पहलुओं की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

    अजीत के परिवार पर पहले भी दुख का पहाड़ टूट चुका था। उसके पिता अशोक धाकड़ का करीब चार साल पहले निधन हो गया था। पिता की मौत के बाद परिवार की जिम्मेदारी बड़े भाई दिव्यांश ने संभाली थी। उन्होंने छोटे भाई की पढ़ाई का जिम्मा भी उठाया और उसे आगे बढ़ाने के लिए सहयोग किया। अजीत जेईई की तैयारी के लिए कोटा गया था, लेकिन उसकी मौत की खबर से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है।

    घटना के बाद रातीकिरार गांव में शोक का माहौल है। परिवार के लिए यह क्षति बेहद कठिन है, क्योंकि अजीत अपनी पढ़ाई के जरिए भविष्य बनाने की तैयारी कर रहा था। पुलिस मामले की जांच में जुटी है और घटना के कारणों का पता लगाने की कोशिश कर रही है।

    कोटा में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों पर पढ़ाई और परीक्षा से जुड़ा दबाव अक्सर चर्चा का विषय रहता है। हालांकि, अजीत की मौत के पीछे पढ़ाई का तनाव ही कारण था, यह अभी स्थापित नहीं हुआ है। फिलहाल पुलिस की जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही घटना की परिस्थितियों के बारे में स्पष्ट जानकारी सामने आ सकेगी।