Author: bharati

  • डॉलर पर निर्भरता घटाने और आर्थिक सुरक्षा के लिए भारत समेत कई देश बढ़ा रहे सोने का भंडार

    डॉलर पर निर्भरता घटाने और आर्थिक सुरक्षा के लिए भारत समेत कई देश बढ़ा रहे सोने का भंडार


    नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में देशवासियों से एक साल तक सोना न खरीदने की अपील की है, जिससे घरेलू खपत और आयात बिल पर नियंत्रण रखा जा सके। वहीं दूसरी ओर सरकार और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) लगातार अपने सोने के भंडार को बढ़ा रहे हैं, जिससे सवाल उठ रहा है कि एक तरफ आम लोगों को सोना खरीदने से क्यों रोका जा रहा है और दूसरी तरफ सरकारी स्तर पर इसकी खरीद क्यों जारी है।

    आंकड़ों के अनुसार,भारतीय रिजर्व बैंक के पास वर्तमान में करीब 880 टन से अधिक सोना भंडार है, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने लगातार सोने की खरीद बढ़ाई है और वैश्विक गोल्ड रिजर्व रैंकिंग में भी अपनी स्थिति मजबूत की है। इसका उद्देश्य विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर पर निर्भरता कम करना और आर्थिक स्थिरता को मजबूत बनाना है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर भी कई देश जैसे चीन, तुर्किये और पोलैंड अपने गोल्ड रिजर्व को तेजी से बढ़ा रहे हैं। इसकी एक बड़ी वजह अमेरिकी डॉलर पर घटता भरोसा माना जा रहा है। खासकर 2022 में रूस के विदेशी मुद्रा भंडार पर अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंध के बाद कई देशों ने डॉलर की निर्भरता कम करने की रणनीति अपनाई है।

    सोने को सुरक्षित संपत्ति माना जाता है क्योंकि यह किसी एक देश की मुद्रा या नीतियों पर निर्भर नहीं होता। इसी कारण केंद्रीय बैंक इसे अपने रिजर्व में बढ़ा रहे हैं। भारत भी इसी रणनीति के तहत अपने विदेशी मुद्रा भंडार को संतुलित करने और आर्थिक जोखिम कम करने के लिए सोना खरीद रहा है।

    हालांकि, दूसरी तरफ भारत में सोने का आयात भारी मात्रा में डॉलर खर्च करता है। भारत अपनी जरूरत का लगभग पूरा सोना आयात करता है, जिससे देश का आयात बिल बढ़ता है और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ता है। यही कारण है कि सरकार आम लोगों से सोने की खरीद सीमित करने की अपील कर रही है ताकि घरेलू मांग नियंत्रित रहे और विदेशी मुद्रा पर दबाव कम हो।

    आंकड़ों के अनुसार, पिछले वर्ष भारत ने सोने पर भारी खर्च किया है, लेकिन ऊंची कीमतों के कारण खपत में गिरावट भी देखी गई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले समय में अगर सोने की कीमतें और बढ़ती हैं तो आयात और भी महंगा हो जाएगा।

    कुल मिलाकर, एक तरफ सरकार वैश्विक आर्थिक सुरक्षा और डॉलर जोखिम से बचाव के लिए सोना जमा कर रही है, वहीं दूसरी तरफ घरेलू अर्थव्यवस्था और आयात बिल को नियंत्रित रखने के लिए जनता से सोने की खरीद कम करने की अपील की जा रही है।

  • खंडवा में NEET पेपर लीक को लेकर छात्रों का हंगामा, ज्ञापन सौंपा

    खंडवा में NEET पेपर लीक को लेकर छात्रों का हंगामा, ज्ञापन सौंपा


    नई दिल्ली। खंडवा में NEET-2026 परीक्षा को लेकर उठे कथित पेपर लीक विवाद ने छात्र राजनीति को गर्मा दिया। भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (NSUI) के नेतृत्व में बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं कलेक्टर कार्यालय पहुंचे और जोरदार प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपकर मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग की।

    छात्रों का आरोप है कि परीक्षा प्रणाली में कुछ भ्रष्ट तत्वों ने सेंध लगाकर मेहनती और ईमानदार विद्यार्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया है। उनका कहना है कि मेडिकल प्रवेश परीक्षा जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण एग्जाम में ऐसी घटनाएं पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े करती हैं।

    जांच और सख्त कार्रवाई की मांग
    ज्ञापन में छात्रों ने स्पष्ट रूप से कई मांगें रखीं-
    पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच कराई जाए
    दोषी व्यक्तियों, संस्थानों और संबंधित अधिकारियों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई हो
    परीक्षा प्रणाली को और अधिक सुरक्षित व पारदर्शी बनाया जाए
    भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जाए ताकि छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ न हो

    प्रदर्शन में कांग्रेस जिला अध्यक्ष उत्तमपाल सिंह और चंदन राजपूत भी मौजूद रहे। नेताओं ने छात्रों के आंदोलन का समर्थन करते हुए कहा कि परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता बेहद जरूरी है।

    आंदोलन के बीच उठा स्थानीय मुद्दों का सवाल भी
    कलेक्ट्रेट में ज्ञापन सौंपने के दौरान केवल NEET मामला ही नहीं, बल्कि इलाके की अन्य समस्याएं भी उठीं। कांग्रेस नेताओं ने किल्लोद ब्लॉक में फ्लोराइड युक्त पानी से हो रही बीमारियों का मुद्दा उठाया। उन्होंने बताया कि कुएं खुदवाए जाने के बावजूद अब तक कनेक्शन न मिलने से ग्रामीणों को राहत नहीं मिल पाई है। इसके अलावा लहाड़पुर क्षेत्र में पेयजल संकट को भी गंभीर समस्या बताया गया।

     प्रशासन का जवाब
    कलेक्टर ने मामले को गंभीरता से लेते हुए संबंधित पीएचई विभाग और जनपद सीईओ को तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। अधिकारियों को पंचायत स्तर पर समाधान सुनिश्चित करने को कहा गया है। प्रशासन ने ग्रामीणों को जल्द राहत मिलने का आश्वासन भी दिया है।

  • 242 पन्नों के फैसले का होगा कानूनी परीक्षण, मुस्लिम पक्ष ने जताई अपील की बात

    242 पन्नों के फैसले का होगा कानूनी परीक्षण, मुस्लिम पक्ष ने जताई अपील की बात

    इंदौर/धार। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच द्वारा भोजशाला मामले में दिए गए ऐतिहासिक फैसले के बाद अब यह कानूनी विवाद एक नए चरण में प्रवेश करता नजर आ रहा है। फैसले के खिलाफ मुस्लिम पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी शुरू कर दी है। पक्षकारों का कहना है कि वे 242 पन्नों के विस्तृत फैसले का गहन अध्ययन करने के बाद इसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देंगे।

    हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की याचिका को स्वीकार करते हुए भोजशाला परिसर में हिंदू पक्ष को पूजा का विशेष अधिकार प्रदान किया है। साथ ही, वर्ष 2003 में दिए गए उस आदेश को भी निरस्त कर दिया गया है, जिसमें मुस्लिम पक्ष को सीमित समय के लिए नमाज की अनुमति दी गई थी। कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट को इस फैसले का प्रमुख आधार माना है।

    ASI की रिपोर्ट को मामले में निर्णायक माना गया है, जिसमें 98 दिनों के सर्वे और लगभग 2100 पन्नों की जांच रिपोर्ट शामिल है। रिपोर्ट के अनुसार, भोजशाला परिसर ऐतिहासिक रूप से मां वाग्देवी और संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केंद्र रहा है। कोर्ट ने इन्हीं तथ्यों के आधार पर परिसर को हिंदू धार्मिक स्वरूप से जुड़ा माना है।

    हिंदू पक्ष के वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि अदालत ने स्पष्ट रूप से माना है कि भोजशाला का स्वरूप मंदिर जैसा है। उन्होंने यह भी कहा कि यह मामला अयोध्या राम जन्मभूमि विवाद से अलग प्रकृति का है, क्योंकि यह रिट याचिका के रूप में सुना गया था।

    मुस्लिम पक्ष की ओर से कहा गया है कि वे इस निर्णय को स्वीकार नहीं करते और सुप्रीम कोर्ट में इसे चुनौती देंगे। उनका कहना है कि पूरे फैसले का कानूनी और तथ्यात्मक विश्लेषण करने के बाद ही अगला कदम तय किया जाएगा।

    इस बीच, हिंदू पक्ष ने इस फैसले को अपनी बड़ी जीत बताते हुए इसे ऐतिहासिक न्याय करार दिया है। वहीं, क्षेत्र में फिलहाल स्थिति शांत बनी हुई है, लेकिन कानूनी लड़ाई के अगले चरण को लेकर दोनों पक्षों में सक्रियता बढ़ गई है।

  • बांग्लादेश बनाम पाकिस्तान टेस्ट में बड़ा हादसा: हसन अली गंभीर रूप से चोटिल

    बांग्लादेश बनाम पाकिस्तान टेस्ट में बड़ा हादसा: हसन अली गंभीर रूप से चोटिल


    नई दिल्ली।  बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच सिलहट इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम में खेले जा रहे दूसरे टेस्ट मैच के पहले दिन एक बड़ा हादसा देखने को मिला, जब पाकिस्तान के तेज गेंदबाज हसन अली गेंदबाजी करते समय गंभीर रूप से चोटिल हो गए। यह घटना बांग्लादेश की पारी के आठवें ओवर के दौरान हुई, जब हसन अली अपनी ही गेंद को रोकने के प्रयास में संतुलन खो बैठे और बुरी तरह मैदान पर गिर पड़े।

    गिरने के दौरान उनका सिर जमीन से जोर से टकराया, जिसके बाद वे दर्द से कराहते नजर आए। मैदान पर मौजूद खिलाड़ियों और अंपायरों ने तुरंत मेडिकल टीम को बुलाया। फिजियो ने शुरुआती जांच के बाद उनकी स्थिति गंभीर देखते हुए उन्हें स्ट्रेचर पर बाहर ले जाने का फैसला किया, जिससे मैदान पर कुछ समय के लिए चिंता का माहौल बन गया।

    हालांकि राहत की बात यह रही कि कुछ देर बाद हसन अली की स्थिति में सुधार हुआ और वे वापस मैदान पर लौटे। इसके बाद उन्होंने गेंदबाजी भी की, जिससे टीम और प्रशंसकों ने राहत की सांस ली।

    इस मैच में पाकिस्तान के कप्तान शान मसूद ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने का फैसला किया था। बांग्लादेश की शुरुआत शानदार नहीं रही और शुरुआती झटके लगते ही टीम दबाव में आ गई। वहीं पाकिस्तान ने प्लेइंग इलेवन में तीन बड़े बदलाव किए, जिसमें बाबर आजम की वापसी भी शामिल रही।

    पाकिस्तान की टीम में अजान अवैस, शान मसूद, बाबर आजम, सऊद शकील और मोहम्मद रिजवान जैसे खिलाड़ी शामिल रहे, जबकि बांग्लादेश की ओर से नजमुल हुसैन शान्तो और लिटन दास जैसे अनुभवी खिलाड़ी मैदान में उतरे।

    पहले टेस्ट में बांग्लादेश ने पाकिस्तान को 104 रनों से हराकर इतिहास रचा था, जिससे यह सीरीज और भी रोमांचक हो गई है। इस ताजा हादसे ने मैच के पहले दिन को चर्चा में ला दिया, हालांकि हसन अली की वापसी ने टीम को राहत दी।

  • आर्थिक संकट के बीच पाकिस्तान पर IMF की सख्ती, बढ़ेगा राजस्व लक्ष्य

    आर्थिक संकट के बीच पाकिस्तान पर IMF की सख्ती, बढ़ेगा राजस्व लक्ष्य


    नई दिल्ली/इस्लामाबाद। पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति पर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की सख्ती एक बार फिर बढ़ गई है। आईएमएफ ने अगले वित्तीय वर्ष के लिए पाकिस्तान के पेट्रोलियम लेवी टारगेट को बढ़ाकर लगभग 1.73 लाख करोड़ रुपये तय कर दिया है, जो मौजूदा लक्ष्य से करीब 25,900 करोड़ रुपये अधिक है। इस फैसले के बाद पाकिस्तान में पहले से जारी महंगाई संकट के और गहराने की आशंका जताई जा रही है।

    आईएमएफ की स्टाफ-लेवल रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान सरकार को अपने राजस्व लक्ष्यों को पूरा करने के लिए अब अतिरिक्त 86 हजार करोड़ रुपये के बराबर संसाधन जुटाने होंगे। इसके लिए केंद्र और प्रांतीय सरकारों पर भी अतिरिक्त जिम्मेदारी डाली गई है। केंद्र सरकार को नए टैक्स उपायों और प्रवर्तन सुधारों के जरिए लगभग आधा लक्ष्य हासिल करना होगा, जबकि प्रांतीय सरकारें सेवाओं पर सेल्स टैक्स और कृषि आयकर के माध्यम से राजस्व बढ़ाने की कोशिश करेंगी।

    रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पाकिस्तान का कुल बजट आकार 17 लाख करोड़ रुपये से अधिक रहने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 9 प्रतिशत अधिक है। वहीं, देश का रक्षा बजट भी बढ़कर लगभग 2.66 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की संभावना है।

    आईएमएफ ने पाकिस्तान के फेडरल बोर्ड ऑफ रेवेन्यू (FBR) के लिए भी लक्ष्य और कड़े कर दिए हैं। अब उसे 15 लाख करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व जुटाना होगा। लगातार दो वर्षों से लक्ष्य पूरा न कर पाने के कारण इस बार निगरानी व्यवस्था को और सख्त कर दिया गया है।

    सबसे अहम बदलाव यह है कि अब केवल इंडिकेटिव टारगेट नहीं बल्कि क्वांटिटेटिव परफॉर्मेंस क्राइटेरिया लागू किया गया है। इसका मतलब यह है कि लक्ष्य पूरा न होने पर पाकिस्तान को आईएमएफ बोर्ड से विशेष छूट लेनी होगी, जिससे उसकी वित्तीय स्वतंत्रता और सीमित हो जाएगी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आईएमएफ की ये सख्त शर्तें पाकिस्तान की आर्थिक चुनौतियों को और बढ़ा सकती हैं। पहले से ही महंगाई, कर्ज और कमजोर राजस्व व्यवस्था से जूझ रहे देश पर यह फैसला आम जनता के लिए अतिरिक्त बोझ साबित हो सकता है।

  • पेट्रोल महंगा, डीजल-एटीएफ सस्ता? टैक्स स्ट्रक्चर में हुआ बदलाव

    पेट्रोल महंगा, डीजल-एटीएफ सस्ता? टैक्स स्ट्रक्चर में हुआ बदलाव


    नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात से जुड़े टैक्स ढांचे में अहम बदलाव करते हुए पेट्रोल पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (SAED) बढ़ा दिया है, जबकि डीजल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) पर राहत दी गई है। सरकार के इस फैसले को वैश्विक तेल बाजार में बढ़ती अस्थिरता और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच एक रणनीतिक कदम माना जा रहा है।

    वित्त मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, पेट्रोल के निर्यात पर अब 3 रुपये प्रति लीटर का अतिरिक्त शुल्क लगाया जाएगा। वहीं डीजल पर निर्यात शुल्क घटाकर 16.5 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है। इसके साथ ही पेट्रोल और डीजल दोनों पर लागू सड़क और इंफ्रास्ट्रक्चर सेस को शून्य कर दिया गया है।

    सरकार ने स्पष्ट किया है कि इस संशोधन से घरेलू ईंधन की कीमतों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और यह बदलाव केवल निर्यात से जुड़े ढांचे पर लागू होगा। नए आदेश को शनिवार से प्रभावी कर दिया गया है।

    गौरतलब है कि पश्चिम एशिया संकट के बाद पहली बार पेट्रोल निर्यात पर शुल्क लगाया गया है, जबकि डीजल और एटीएफ पर लगातार बदलावों के बाद अब दरों में कटौती की गई है। डीजल पर पहले 21.5 रुपये प्रति लीटर, फिर 55.5 रुपये प्रति लीटर तक वृद्धि और बाद में 23 रुपये प्रति लीटर तक कमी की गई थी, जिसे अब घटाकर 16.5 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है।

    इसी तरह एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) पर भी कई बार संशोधन किया गया। पहले यह शुल्क 29.5 रुपये प्रति लीटर था, जिसे बढ़ाकर 42 रुपये और फिर 33 रुपये किया गया था। अब इसे घटाकर 16 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, विंडफॉल टैक्स ढांचे के तहत यह बदलाव वैश्विक बाजार में अस्थिरता के बीच घरेलू आपूर्ति सुनिश्चित करने और निर्यात प्रवाह को नियंत्रित करने के उद्देश्य से किया गया है। सरकार ने यह कदम ऐसे समय उठाया है जब अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है।

    पश्चिम एशिया तनाव और अमेरिका-ईरान के बीच जारी कूटनीतिक गतिरोध के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है। ऐसे में भारत का यह टैक्स संशोधन नीति संतुलन बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

  • शेयर बाजार में गिरावट: सेंसेक्स-निफ्टी 2% से ज्यादा टूटे, निवेशकों में चिंता

    शेयर बाजार में गिरावट: सेंसेक्स-निफ्टी 2% से ज्यादा टूटे, निवेशकों में चिंता


    नई दिल्ली। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल ने भारतीय शेयर बाजार को इस सप्ताह गहरे दबाव में डाल दिया। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच निवेशकों की धारणा कमजोर रही, जिसका असर सीधे तौर पर प्रमुख बेंचमार्क सूचकांकों सेंसेक्स और निफ्टी पर देखने को मिला। दोनों सूचकांक सप्ताह के अंत में 2 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट के साथ बंद हुए।

    एनएसई निफ्टी-50 इस सप्ताह 2.2 प्रतिशत यानी 532 अंक टूटकर 23,643.5 के स्तर पर आ गया, जबकि बीएसई सेंसेक्स 2.7 प्रतिशत यानी 2,000 से अधिक अंकों की गिरावट के साथ 75,238 पर बंद हुआ। बाजार में यह गिरावट केवल बड़े इंडेक्स तक सीमित नहीं रही, बल्कि व्यापक बाजार भी इसकी चपेट में आ गया। मिडकैप इंडेक्स में 2 प्रतिशत से ज्यादा और स्मॉलकैप इंडेक्स में करीब 4 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जिससे निवेशकों की संपत्ति पर और अधिक दबाव बना।

    सेक्टोरल प्रदर्शन की बात करें तो रियल्टी और आईटी सेक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित रहे। बीएसई रियल्टी इंडेक्स में लगभग 8 प्रतिशत की तेज गिरावट दर्ज हुई, जबकि आईटी इंडेक्स 5.7 प्रतिशत टूट गया। ऑटो, कैपिटल गुड्स, कंज्यूमर ड्यूरेबल, बैंकिंग और पीएसयू सेक्टर में भी लगातार बिकवाली का दबाव देखने को मिला। हालांकि, कुछ रक्षात्मक सेक्टर जैसे मेटल और हेल्थकेयर ने थोड़ी मजबूती दिखाई और मामूली बढ़त दर्ज की।

    सेंसेक्स के प्रमुख शेयरों में टाइटन सबसे बड़ा नुकसान झेलने वाला स्टॉक रहा, जिसमें 7.6 प्रतिशत की गिरावट आई। इसके अलावा रिलायंस इंडस्ट्रीज, टेक महिंद्रा और महिंद्रा एंड महिंद्रा जैसे बड़े शेयरों में भी कमजोरी देखी गई, जिससे बाजार पर दबाव और बढ़ गया।

    विश्लेषकों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें 105 से 110 डॉलर प्रति बैरल के बीच बनी हुई हैं, जो महंगाई और आर्थिक स्थिरता के लिए चिंता का विषय है। इसके साथ ही अमेरिकी डॉलर की मजबूती और वैश्विक बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी ने उभरते बाजारों से विदेशी निवेश को बाहर खींचा है, जिससे एफआईआई की लगातार बिकवाली देखने को मिल रही है।

    हालांकि, इस नकारात्मक माहौल के बीच घरेलू निवेशकों की भागीदारी बाजार के लिए एक सहारा बनी रही। एसआईपी के जरिए लगातार आने वाले निवेश ने बाजार को कुछ हद तक स्थिर बनाए रखने में मदद की। अप्रैल में एसआईपी निवेश 31,115 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जिसने विदेशी बिकवाली के असर को आंशिक रूप से संतुलित किया।

    कुल मिलाकर, वैश्विक तनाव, तेल कीमतों में उछाल और आर्थिक अनिश्चितताओं के चलते भारतीय शेयर बाजार में दबाव बना हुआ है, और आने वाले समय में निवेशकों की नजर अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और कच्चे तेल के रुझानों पर टिकी रहेगी।

  • भोजशाला में हनुमान चालीसा पाठ, हाईकोर्ट फैसले के बाद बढ़ी श्रद्धा

    भोजशाला में हनुमान चालीसा पाठ, हाईकोर्ट फैसले के बाद बढ़ी श्रद्धा


    धार मध्य प्रदेश। धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला-कमाल मौला परिसर को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के इंदौर बेंच के फैसले के बाद शनिवार सुबह परिसर में धार्मिक गतिविधियों का माहौल देखने को मिला। कोर्ट के निर्णय के बाद बड़ी संख्या में श्रद्धालु और विभिन्न संगठनों के पदाधिकारी भोजशाला पहुंचे और पूजा-अर्चना की।

    श्रद्धालुओं ने परिसर में स्थित मां वाग्देवी स्थल और यज्ञ कुंड के पास पहुंचकर विधिवत दर्शन किए और हनुमान चालीसा का पाठ किया। पूरे क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी रही और प्रशासन की निगरानी में कार्यक्रम शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ।

    हाईकोर्ट के फैसले का प्रभाव, पूजा के अधिकार को लेकर चर्चा
    हाईकोर्ट के आदेश में भोजशाला परिसर को ऐतिहासिक रूप से राजा भोज कालीन वाग्देवी मंदिर से संबंधित माना गया है। फैसले के बाद हिंदू पक्ष को पूजा-अर्चना का अधिकार मिलने के बाद परिसर में गतिविधियां बढ़ गई हैं।
    हिंदू पक्ष के वकील के अनुसार, कोर्ट ने वर्ष 2003 के ASI आदेश को आंशिक रूप से निरस्त किया है, जिसमें मुस्लिम समुदाय को तय समय पर नमाज की अनुमति दी गई थी। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि परिसर संरक्षित स्मारक रहेगा और इसकी निगरानी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अधीन ही होगी।

    श्रद्धालुओं में उत्साह, वर्षों बाद पूजा का अवसर मिलने का दावा
    पूजा-अर्चना के बाद श्रद्धालुओं ने कहा कि उन्हें वर्षों बाद बिना किसी रोक-टोक के दर्शन और पूजा करने का अवसर मिला है। श्रद्धालुओं का कहना है कि भोजशाला परिसर उनके लिए आस्था का केंद्र है और यह स्थान प्राचीन मंदिर का स्वरूप रखता है। भोज उत्सव समिति के पदाधिकारियों ने भी परिसर में पहुंचकर पुष्प अर्पित किए और धार्मिक अनुष्ठान में भाग लिया।

    कानूनी प्रक्रिया अभी जारी, सुप्रीम कोर्ट जाने की संभावना
    मामले में आगे कानूनी कार्रवाई की संभावना भी बनी हुई है। मुस्लिम पक्ष के सुप्रीम कोर्ट जाने की संभावना को देखते हुए हिंदू पक्ष ने पहले से ही कैविएट याचिकाएं दायर कर दी हैं, ताकि मामले में सुनवाई के दौरान उनका पक्ष भी सुना जा सके।

    भोजशाला मामला एक बार फिर धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक दावों के बीच चर्चा का केंद्र बन गया है। फिलहाल हाईकोर्ट के फैसले के बाद परिसर में पूजा-अर्चना शुरू हो गई है, लेकिन कानूनी प्रक्रिया अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।

  • बांग्लादेश में अमेरिका-चीन टकराव तेज, रणनीतिक डील से बदले इंडो-पैसिफिक के समीकरण

    बांग्लादेश में अमेरिका-चीन टकराव तेज, रणनीतिक डील से बदले इंडो-पैसिफिक के समीकरण


    नई दिल्ली। बांग्लादेश अब वैश्विक महाशक्तियों अमेरिका और चीन के बीच एक बड़े रणनीतिक टकराव का केंद्र बनता जा रहा है। हाल ही में अमेरिका और बांग्लादेश के बीच हुए व्यापार और सुरक्षा सहयोग समझौतों ने इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती मौजूदगी को चुनौती दी है। इसके चलते इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शक्ति संतुलन तेजी से बदलता दिखाई दे रहा है।

    जानकारी के अनुसार, अमेरिका ने बांग्लादेश के साथ एक पारस्परिक व्यापार समझौते (ART) पर आगे बढ़ते हुए उसके बंदरगाहों और ढांचे तक पहुंच हासिल की है। इसके बदले में बांग्लादेशी टेक्सटाइल उत्पादों पर अमेरिकी टैरिफ में राहत देने की बात कही गई है। यह समझौता अमेरिकी कंपनियों के लिए बांग्लादेश के ऊर्जा, डिजिटल और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में प्रवेश को भी आसान बनाता है।

    इसके साथ ही सुरक्षा सहयोग से जुड़े दो महत्वपूर्ण प्रस्ताव—GSOMIA और ACSA—पर भी चर्चा बढ़ी है। इन समझौतों के तहत दोनों देशों की सेनाओं के बीच खुफिया जानकारी साझा करने और अमेरिकी सैन्य जहाजों व विमानों को बांग्लादेश के बंदरगाहों और एयरबेस का उपयोग करने की अनुमति मिल सकती है। रिपोर्ट्स के अनुसार, कुछ एयरबेस पर अमेरिकी रडार सिस्टम की मौजूदगी भी दर्ज की गई है, जिससे क्षेत्रीय निगरानी क्षमता बढ़ी है।

    यह घटनाक्रम चीन की “स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स” रणनीति के लिए चुनौती माना जा रहा है, जिसके तहत चीन म्यांमार, पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे देशों में बंदरगाहों और रणनीतिक ढांचे का विकास कर रहा है ताकि अपने समुद्री व्यापार मार्ग सुरक्षित रख सके। बांग्लादेश, विशेषकर चटगांव और मातारबारी जैसे बंदरगाह, इस रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार, अगर बांग्लादेश में अमेरिकी प्रभाव बढ़ता है तो यह चीन के “चीन-म्यांमार आर्थिक गलियारे (CMEC)” और क्षेत्रीय सप्लाई चेन पर असर डाल सकता है। वहीं अमेरिका इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति मजबूत कर चीन के प्रभाव को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है।

    इसी बीच बांग्लादेश की विदेश नीति भी संतुलन की कोशिश में दिखाई दे रही है, जहां एक ओर वह अमेरिका के साथ सहयोग बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी ओर चीन के साथ व्यापारिक संबंध भी मजबूत बनाए हुए है। दोनों देशों के बीच अरबों डॉलर का व्यापार और सैन्य सहयोग इसे और जटिल बनाता है।

    कुल मिलाकर, बांग्लादेश अब केवल एक उभरती अर्थव्यवस्था नहीं बल्कि इंडो-पैसिफिक की एक महत्वपूर्ण जियोपॉलिटिकल धुरी बन चुका है, जहां अमेरिका और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा आने वाले समय में और तेज होने की संभावना है।

  • पटाखा फैक्ट्री हादसा: सिस्टम पर उठे सवाल, अधूरी यूनिट को कैसे मिला लाइसेंस?

    पटाखा फैक्ट्री हादसा: सिस्टम पर उठे सवाल, अधूरी यूनिट को कैसे मिला लाइसेंस?


    देवास  देवास जिले की पटाखा फैक्ट्री में हुए विस्फोट ने एक बार फिर औद्योगिक सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है। इस दर्दनाक हादसे में 5 मजदूरों की मौत हो चुकी है, जबकि 20 से अधिक लोग घायल हैं। कई मजदूर 90 से 99 प्रतिशत तक झुलस चुके हैं और अस्पतालों में जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं। यह हादसा केवल एक फैक्ट्री ब्लास्ट नहीं, बल्कि एक बड़े सिस्टम की चुप्पी, लापरवाही और निगरानी तंत्र की विफलता का प्रतीक बन गया है।

    लाइसेंस और नियमों के उल्लंघन पर सवाल
    जानकारी के अनुसार फैक्ट्री को सीमित मात्रा में बारूद रखने और उपयोग करने का लाइसेंस दिया गया था, लेकिन मौके पर कथित रूप से नियमों से अधिक मात्रा में विस्फोटक सामग्री पाई गई। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि इतनी बड़ी मात्रा में बारूद जमा किया जा रहा था, तो क्या संबंधित विभागों को इसकी जानकारी नहीं थी? या फिर जानकारी होने के बावजूद कार्रवाई नहीं की गई?

    6 विभागों की जिम्मेदारी पर उठे सवाल
    इस मामले में प्रशासनिक तंत्र के कई विभाग सीधे सवालों के घेरे में हैं-

    राजस्व विभाग: फैक्ट्री की जमीन, सुरक्षा मानक और अनुमति की जांच
    पुलिस विभाग: सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की निगरानी
    श्रम विभाग: मजदूरों की सुरक्षा और कार्य परिस्थितियों की जांच
    बिजली विभाग: तकनीकी सुरक्षा और वायरिंग की जांच
    प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड: पर्यावरण और रासायनिक जोखिम की निगरानी
    PWD/स्थानीय प्रशासन: भवन संरचना और आपातकालीन निकासी व्यवस्था
    इन सभी विभागों की संयुक्त जिम्मेदारी के बावजूद किसी स्तर पर प्रभावी निरीक्षण न होने के आरोप लग रहे हैं।

    राजनीतिक संरक्षण का आरोप भी चर्चा में
    स्थानीय स्तर पर फैक्ट्री संचालक और राजनीतिक हस्तियों के बीच संबंधों को लेकर भी चर्चा तेज है। सोशल मीडिया और स्थानीय सूत्रों के अनुसार, प्रभावशाली संपर्कों के कारण लंबे समय तक कार्रवाई नहीं हुई। हालांकि इस दावे की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।

    निरीक्षण व्यवस्था पर गंभीर सवाल
    फैक्ट्री मात्र कुछ महीने पहले ही शुरू हुई थी, लेकिन इतने कम समय में बड़े पैमाने पर विस्फोटक सामग्री का संग्रह कैसे हुआ यह जांच का मुख्य विषय है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी भी विभाग ने पिछले महीनों में मौके पर जाकर वास्तविक स्थिति की जांच की थी या केवल कागजों पर ही रिपोर्ट तैयार होती रही?

    हादसे के बाद शुरू हुई कार्रवाई
    घटना के बाद प्रशासन ने जांच टीम गठित कर दी है और फैक्ट्री संचालक के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की गई है। मृतकों के परिजनों को मुआवजे की घोषणा भी की गई है, लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल मुआवजा ही पर्याप्त है?

     सिर्फ हादसा नहीं, सिस्टम पर सवाल
    देवास का यह विस्फोट अब केवल एक औद्योगिक दुर्घटना नहीं रहा, बल्कि यह प्रशासनिक निगरानी तंत्र की गंभीर विफलता का उदाहरण बन गया है। सवाल यह है कि क्या इस बार भी जांच केवल छोटे स्तर तक सीमित रहेगी, या जिम्मेदार अधिकारियों और पूरे सिस्टम की जवाबदेही तय होगी?