Author: bharati

  • Magh Purnima 2026: दान-पुण्य का दिन, लेकिन इन चीजों का दान करना माना जाता है अशुभ

    Magh Purnima 2026: दान-पुण्य का दिन, लेकिन इन चीजों का दान करना माना जाता है अशुभ

    नई दिल्ली माघ पूर्णिमा हिंदू धर्म में स्नान, दान और पुण्य कर्मों का विशेष दिन माना जाता है. इस दिन गंगा स्नान और जरूरतमंदों को दान करने की परंपरा है. लेकिन शास्त्रों और धार्मिक मान्यताओं में यह भी बताया गया है कि कुछ वस्तुओं का दान इस दिन नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे पुण्य के स्थान पर अशुभ फल मिल सकता है. अगर आप माघ पूर्णिमा पर दान करने की योजना बना रहे हैं, तो यह जानना जरूरी है कि किन चीजों से बचना चाहिए.
    माघ पूर्णिमा का धार्मिक महत्व
    माघ पूर्णिमा को भगवान विष्णु चंद्र देव और पवित्र नदियों, विशेषकर मां गंगा को समर्पित माना गया है. मान्यता है कि इस दिन गंगा स्नान से पापों से मुक्ति मिलती है. दान करने से अक्षय पुण्य प्राप्त होता है. संयम और सात्विक आचरण का विशेष महत्व होता है. इसी कारण दान में शुद्धता और विवेक जरूरी बताया गया है.

    माघ पूर्णिमा के दिन किन चीजों का दान नहीं करना चाहिए?
    दान की वस्तु क्यों दान नहीं करना चाहिए धार्मिक मान्यता
    लोहे की वस्तुएं लोहा शनि ग्रह और नकारात्मक ऊर्जा से जुड़ा माना जाता है पूर्णिमा के सात्विक दिन पर अशुभ फल दे सकता है

    काले रंग की वस्तुएं यह दिन चंद्र देव और भगवान विष्णु को समर्पित है काले रंग को इस दिन शुभ नहीं माना जाता
    नमक नमक का संबंध ऋण और आर्थिक असंतुलन से माना गया है शुभ तिथि पर दरिद्रता बढ़ने की मान्यता
    तेल तेल तामसिक प्रकृति का माना जाता है सात्विक पर्व पर वर्जित
    मदिरा / नशीली वस्तुएं पूजा और दान की भावना के विपरीत धार्मिक रूप से निषिद्ध
    फटे या पुराने कपड़े दान में शुद्धता और उपयोगिता जरूरी अशुद्ध वस्तु से पुण्य नहीं मिलता
    लोहे से बनी वस्तुएं
    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार लोहा शनि ग्रह से जुड़ा माना जाता है. ज्योतिषाचार्य संजीत कुमार मिश्रा ने बताया कि इसे भारी और नकारात्मक ऊर्जा वाला तत्व कहा गया है. माघ पूर्णिमा जैसे सात्विक दिन पर लोहे के बर्तन, औजार या अन्य लोहे की वस्तुओं का दान करने से बचना चाहिए.

    काले रंग की वस्तुएं
    माघ पूर्णिमा का दिन चंद्र देव और भगवान विष्णु को समर्पित होता है. इस दिन श्वेत और सात्त्विक रंगों को श्रेष्ठ माना गया है, इसलिए काले वस्त्र, काले तिल, काली चादर जैसी वस्तुओं का दान इस दिन शुभ नहीं माना जाता.

    नमक का दान
    शास्त्रीय मान्यताओं में नमक को ऋण, विवाद और आर्थिक असंतुलन से जोड़ा गया है. इसी कारण पूर्णिमा जैसे शुभ अवसर पर नमक का दान करने से बचने की सलाह दी जाती है. मान्यता है कि इससे आर्थिक परेशानियां बढ़ सकती हैं.

    तेल और मदिरा जैसी तामसिक वस्तुएं
    माघ पूर्णिमा सात्विक पर्व है. इस दिन तेल, शराब, मांसाहार से जुड़ी कोई भी वस्तु दान करना उचित नहीं माना जाता, क्योंकि ये सात्त्विकता को भंग करती हैं, पूजा और दान की भावना के विपरीत होती हैं.

    फटे, पुराने या अशुद्ध कपड़े
    दान का अर्थ केवल देना नहीं, बल्कि सम्मान, उपयोगिता और शुद्धता भी है, इसलिए फटे हुए बहुत पुराने या गंदे कपड़े दान करना अशुभ माना गया है. माघ पूर्णिमा पर स्वच्छ और उपयोगी वस्तुओं का ही दान करना चाहिए.

    माघ पूर्णिमा पर दान करते समय क्या ध्यान रखें?
    दान श्रद्धा और शांत मन से करें
    वस्तु साफ और उपयोगी हो
    दान से पहले अहंकार न रखें
    जरूरतमंद व्यक्ति को ही दान दें
    यही बातें दान को सार्थक बनाती हैं.

    माघ पूर्णिमा 2026 शुभ मुहूर्त
    हिंदू पंचांग के अनुसार माघ पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 1 फरवरी 2026 की सुबह 5:52 बजे होगी और इसका समापन 2 फरवरी 2026 को तड़के 3:38 बजे होगी. इसी अवधि में स्नान, दान और पूजा का विशेष महत्व माना गया है.

  • बिना शादी सेक्स पर 140 कोड़े, प्रेमी जोड़े को 'तालिबानी सजा'

    जाकार्ता। शादी के बिना सेक्स और शराब पीने की सजा क्या हो सकती है, यह सवाल चौंकाने वाला लग सकता है। लेकिन इंडोनेशिया में एक ऐसी सजा दी गई है, जिसे जानकर लोग सन्न रह गए। यहां बिना शादी के शारीरिक संबंध बनाने और शराब पीने के मामले में एक प्रेमी जोड़े को सार्वजनिक रूप से कठोर दंड दिया गया।
    न्यूज एजेंसी एएफपी की रिपोर्ट के अनुसार, इंडोनेशिया के आचे प्रांत में शरिया पुलिस ने इस जोड़े को 140-140 बार बांस की पतली छड़ी से कोड़े मारे। यह सजा इस्लामी कानून लागू होने के बाद दी गई सबसे कठोर सजाओं में से एक मानी जा रही है। आचे इंडोनेशिया का एकमात्र प्रांत है, जहां शरिया कानून का एक रूप लागू है और अविवाहित जोड़ों के बीच सारीरीक संबंध पूरी तरह गैरकानूनी हैं।

    घटनास्थल पर मौजूद एएफपी के संवाददाता के अनुसार, एक सार्वजनिक पार्क में दर्जनों लोगों की मौजूदगी में पुरुष और महिला की पीठ पर बेंत से वार किए गए।

    सजा के दौरान महिला बेहोश हो गई, जिसके बाद उसे एंबुलेंस से अस्पताल ले जाया गया। बांदा आचे की शरिया पुलिस के प्रमुख मुहम्मद रिजाल ने बताया कि दोनों को कुल 140 कोड़े मारे गए। इनमें से 100 कोड़े शादी से बाहर यौन संबंध रखने के लिए और 40 कोड़े शराब पीने के आरोप में दिए गए।

    बताया जा रहा है कि 2001 में आचे को विशेष स्वायत्तता मिलने और शरिया कानून लागू होने के बाद से यह बेंत से दी गई सबसे अधिक सजाओं में शामिल है। इस मामले में कुल छह लोगों को इस्लामी कानून तोड़ने का दोषी पाया गया, जिनमें एक शरिया पुलिस अधिकारी और उसकी महिला साथी भी शामिल थे। उन्हें एक निजी स्थान पर आपत्तिजनक स्थिति में पकड़े जाने पर 23-23 कोड़े मारे गए। रिजाल ने कहा कि शरिया कानून के तहत कोई अपवाद नहीं किया जाता, यहां तक कि अपने ही कर्मियों के लिए भी नहीं।

    उन्होंने कहा कि कानून के उल्लंघन से संस्थान की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचता है।

    गौरतलब है कि आचे प्रांत में जुआ खेलने, शराब पीने, समलैंगिक संबंध बनाने और शादी के बाहर यौन संबंध रखने जैसे मामलों में अब भी बेंत से कोड़े मारने की सजा को व्यापक समर्थन प्राप्त है। पिछले वर्ष भी शरिया अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद दो पुरुषों को सार्वजनिक रूप से 76-76 कोड़े मारे गए थे।

  • अल-कायदा और हमास जैसे आतंकी संगठनों की सूची में ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स …

    अल-कायदा और हमास जैसे आतंकी संगठनों की सूची में ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स …


    वाशिंगटन। यूरोपीय आयोग की उपाध्यक्ष काजा कल्लास ने कहा कि प्रदर्शनकारियों पर क्रूर दमन के दौरान 6,373 लोगों की हत्या करने वाले ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर को यूरोपीय संघ आतंकवादी संगठन के रूप में सूचीबद्ध करने जा रहा है. इस कदम के लिए यूरोपीय संघ के 27 सदस्य देशों के सर्वसम्मत समर्थन की आवश्यकता होगी और उम्मीद है कि इससे ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर को अल-कायदा, इस्लामिक स्टेट, दाएश और हमास जैसे आतंकी समूहों के साथ जोड़ा जाएगा.

    कल्लास ने गुरुवार को पत्रकारों से कहा, “यदि आप आतंकवादी के रूप में कार्य करते हैं, तो आपके साथ आतंकवादी जैसा व्यवहार भी किया जाना चाहिए.”

    एस्टोनिया की पूर्व प्रधानमंत्री रह चुकीं कल्लास ने कहा कि इससे एक स्पष्ट संदेश जाएगा कि यदि आप लोगों का दमन कर रहे हैं, तो इसकी कीमत चुकानी होगी और इसके लिए आपको दंडित किया जाएगा.

    फ्रांस पहले विरोध में था, अब किया समर्थन

    पहले फ्रांस ने रिवोल्यूशनरी गार्ड को आतंकवादी संगठन के रूप में सूचीबद्ध करने पर आपत्ति जताई थी, क्योंकि उसे आशंका थी कि इससे ईरान में हिरासत में लिए गए फ्रांसीसी नागरिकों के साथ-साथ राजनयिक मिशनों को भी खतरा हो सकता है. हालांकि, राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन के कार्यालय ने बुधवार को संकेत दिया कि पेरिस इस निर्णय का समर्थन करता है.

    फ्रांस के विदेश मंत्री जीन-नोएल बैरोट ने गुरुवार को ब्रुसेल्स में विदेश मामलों की परिषद के समक्ष कहा कि फ्रांस ईरान पर और प्रतिबंध लगाने और उसे सूचीबद्ध करने का समर्थन करता है, “क्योंकि किए गए अपराधों के लिए किसी को भी छूट नहीं दी जा सकती.” उन्होंने कहा, “ईरान में, ईरानी जनता के शांतिपूर्ण विद्रोह के दमन को अनदेखा नहीं किया जा सकता.”

    इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर, या ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स, ईरान की सेना की सबसे शक्तिशाली शाखा और उसकी राजनीतिक और आर्थिक संरचना का एक प्रमुख स्तंभ है. 1979 में अयातुल्ला खुमैनी द्वारा इस्लामी क्रांति की रक्षा के लिए स्थापित, यह नियमित सेना से स्वतंत्र रूप से कार्य करता है और केवल सर्वोच्च नेता के प्रति जवाबदेह है.

  • TVK के प्रस्‍ताव पर कांग्रेस बोली- राहुल गांधी ही हमारा ‘बूस्ट’

    TVK के प्रस्‍ताव पर कांग्रेस बोली- राहुल गांधी ही हमारा ‘बूस्ट’

    चैन्‍नई। दक्षिण के चुनावी राज्य तमिलनाडु की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। दरअसल, अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी तमिलगा वेट्री कड़गम (TVK) की ओर से कांग्रेस को गठबंधन का प्रस्ताव मिला है। यह पेशकश विजय के पिता और प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक एस.ए. चंद्रशेखर ने की है। तिरुवारूर जिले में एक शादी समारोह में शामिल होने के बाद पत्रकारों से बात करते हुए चंद्रशेखर ने कहा कि कांग्रेस तमिलनाडु में अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन तलाश रही है और विजय उसे फिर से ‘पुरानी शान’ दिलाने को तैयार हैं।

    उन्होंने कहा, “कांग्रेस का एक इतिहास और विरासत रही है। अब वह ढलान पर है लेकिन विजय कांग्रेस को समर्थन देने के लिए तैयार हैं। यह मौका कांग्रेस को गंवाना नहीं चाहिए।” हालांकि, अभी तक न तो विजय और न ही उनकी पार्टी TVK ने इस प्रस्ताव की आधिकारिक पुष्टि या खंडन किया है।

    कांग्रेस बोली- राहुल गांधी ही हमारा ‘बूस्ट’
    विजय के पिता के इस बयान पर कांग्रेस की ओर से भी तुरंत प्रतिक्रिया आई।

    तमिलनाडु कांग्रेस अध्यक्ष के. सेल्वापेरुंथगई ने इस ऑफर को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने तंज़ कसते हुए कहा, “हमारे कार्यकर्ताओं को किसी बाहरी बूस्ट की जरूरत नहीं है। हमारे नेता राहुल गांधी ही हमें ‘बूस्ट, हॉर्लिक्स और बॉर्नविटा’ दे रहे हैं।” बावजूद इसके चंद्रशेखर के इस बयान ने राजनीतिक गलियारों में चर्चा और तेज कर दी है।
    DMK से बढ़ती दूरी?
    कांग्रेस का यह बयान सख़्त जरूर है, लेकिन सियासी अटकलें थमी नहीं हैं। कांग्रेस फिलहाल सत्तारूढ़ DMK की सहयोगी है और 2019, 2021 और 2024 के चुनावों में दोनों ने साथ मिलकर जीत हासिल की थी। लेकिन अब कांग्रेस DMK से सत्ता में हिस्सेदारी चाहती है। सूत्रों के हवाले से NDTV की रिपोर्ट में कहा गया है कि कांग्रेस कम से कम छह मंत्री पद मांग रही है, जिस पर DMK अभी तक सहमत नहीं हुई है।
    सीट बंटवारे पर भी फंसा पेच
    इसके अलावा आगामी विधानसभा चुनाव से पहले सीट बंटवारे पर भी दोनों दलों में सहमति नहीं बन पाई है। कांग्रेस चाहती है कि उसे कम से कम 35 सीटें मिलें लेकिन DMK 19 से ज़्यादा सीटें देने को तैयार नहीं है। यही वजह है कि कांग्रेस के भीतर असंतोष बढ़ता जा रहा है। 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने राज्य में DMK गठबंधन के साथ 9 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जबकि 2021 के विधानसभा चुनावों में 25 में से 18 सीटों पर जीत दर्ज की थी।

    TVK का ऑफर क्यों लुभावना?
    सूत्रों के अनुसार, TVK ने कांग्रेस को 60 से अधिक सीटें और सरकार बनने की स्थिति में मंत्री पदों का भी संकेत दिया है। यही कारण है कि भले ही सार्वजनिक तौर पर कांग्रेस इनकार कर रही हो, लेकिन अंदरखाने इस प्रस्ताव पर मंथन जारी है। विश्लेषकों का कहना है कि तमिलनाडु की राजनीति में नए समीकरण बनते-बिगड़ते देर नहीं लगती। ऐसे में कांग्रेस और विजय की पार्टी के बीच संभावित गठबंधन को पूरी तरह नकारा भी नहीं जा सकता। आने वाले दिनों में यह साफ़ होगा कि कांग्रेस DMK के साथ बनी रहती है या किसी नए सियासी रास्ते की ओर बढ़ती है।

  • UPI यूजर्स को Payment फेल होने पर मुआवजा के रूप में मिलेगा अतिरिक्त पैसा, जानें क्या है RBI के नियम

    UPI यूजर्स को Payment फेल होने पर मुआवजा के रूप में मिलेगा अतिरिक्त पैसा, जानें क्या है RBI के नियम


    नई दिल्ली।
    आजकल ज्यादातर लोग UPI से पेमेंट करते हैं। दूध, सब्जी, किराया या ऑनलाइन शॉपिंग (Online Shopping) हर जगह लोग गूगल पे (Google Pay), फोन पे (PhonePe) और पेटीएम (Paytm) का इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन क्या हो अगर पैसा अकाउंट से कट जाए और सामने वाले तक न पहुंचे, तो सबसे पहले यही डर लगता है कि कहीं पैसा डूब तो नहीं गया। ऐसे मामलों में आरबीआई (RBI) ने साफ नियम बना रखे हैं, जिनके तहत पैसा वापस मिलने के साथ-साथ मुआवजा भी मिल सकता है।


    पैसा कट गया लेकिन पेमेंट फेल हो गया, तो क्या होता है?

    अगर UPI ट्रांजैक्शन फेल हो जाता है और पैसा कट जाता है, तो बैंक या UPI ऐप की जिम्मेदारी होती है कि तय समय के अंदर इस समस्या को सुलझाए। आमतौर पर 1 दिन के अंदर पैसा अपने आप वापस आ जाना चाहिए। कई बार यह प्रोसेस तुरंत हो जाता है, लेकिन कुछ मामलों में देरी भी होती है। यही देरी आगे चलकर आपको Compensation लेने में मदद करती है।


    किन मामलों में मिलता है Compensation?

    RBI और NPCI के नियमों के अनुसार, अगर बैंक या UPI सर्विस प्रोवाइडर तय समय में फेल ट्रांजैक्शन को ठीक नहीं करता, तो यूजर मुआवजे का हकदार होता है। यह मुआवजा रिफंड से अलग होता है, यानी पहले आपका कटा हुआ पैसा वापस आएगा और फिर उसके बाद अतिरिक्त रकम दी जा सकती है। लेकिन ध्यान दें कि यह नियम तभी लागू होता है जब गलती बैंक, सर्वर या ऐप की तरफ से हो।


    कितना Compensation मिल सकता है?

    Compensation की रकम ट्रांजैक्शन की देरी पर निर्भर करती है। RBI के नियमों के मुताबिक, अगर तय समय सीमा के बाद भी समस्या हल नहीं होती, तो प्रति दिन के हिसाब से जुर्माना लगाया जाता है, जो सीधे यूजर को दिया जाता है। हालांकि इसकी रकम बहुत ज्यादा नहीं होती, लेकिन यह यूजर के अधिकार के तौर पर दी जाती है ताकि कंपनियां लापरवाही न करें।


    UPI पेमेंट फेल होने पर शिकायत कैसे करें?

    अगर आपका पैसा कट गया है और वापस नहीं आया, तो सबसे पहले उसी UPI ऐप में शिकायत दर्ज करें जिससे आपने पेमेंट किया था। ट्रांजैक्शन हिस्ट्री में जाकर फेल पेमेंट चुनें और “Help” या “Report a Problem” ऑप्शन पर क्लिक करें। यहां आपको UTR नंबर या ट्रांजैक्शन ID डालनी होती है, जिससे आपकी शिकायत जल्दी ट्रैक हो सके।


    हर फेल ट्रांजैक्शन पर नहीं मिलता मुआवजा

    यह समझना जरूरी है कि हर फेल UPI ट्रांजैक्शन पर मुआवजा नहीं मिलता। अगर गलती आपकी तरफ से हुई है, जैसे गलत UPI ID डालना, नेटवर्क खुद बंद हो जाना या ट्रांजैक्शन तुरंत रिवर्स हो जाना, तो ऐसे मामलों में मुआवजा का नियम लागू नहीं होता।


    समस्या न सुलझे तो कहां करें शिकायत?

    अगर ऐप और बैंक दोनों से बात करने के बाद भी आपकी समस्या हल नहीं होती, तो आप NPCI या RBI के ऑफिशियल शिकायत पोर्टल पर कंप्लेंट दर्ज करें। दर्ज की गई शिकायतों पर गंभीरता से जांच होती है और सही पाए जाने पर यूजर को उसका पैसा और मुआवजा मिल सकता है।


    UPI इस्तेमाल करते समय इन बातों का रखें ध्यान

    UPI पेमेंट करते समय हमेशा सही UPI ID चेक करें, मजबूत इंटरनेट कनेक्शन रखें और पेमेंट पूरा होने तक ऐप बंद न करें। साथ ही, हर ट्रांजैक्शन का स्क्रीनशॉट संभालकर रखें, ताकि जरूरत पड़ने पर शिकायत दर्ज करते समय आपके पास सबूत मौजूद हो।

  • “बहुत बड़ी और बहुत अच्छी खबर, लेकिन…” भारत-EU FTA पर शशि थरूर ने जताई अहम चिंता

    “बहुत बड़ी और बहुत अच्छी खबर, लेकिन…” भारत-EU FTA पर शशि थरूर ने जताई अहम चिंता

    नई दिल्ली  शशि थरूर ने भारत-ईयू में हुए एफटीएम पर कहा कि इसके लागू होने में शायद एक और साल लगेगा। इसलिए, किसी भी शॉर्ट-टर्म फायदे की उम्मीद न करें, लेकिन लंबे समय में यह बहुत अच्छा होना चाहिए।

    भारत-यूरोपियन यूनियन (ईयू) के बीच हुए व्यापार समझौते (FTA) पर कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि यह बहुत बड़ी खबर है, बहुत अच्छी खबर है, लेकिन इसमें एक साल लगेगा क्योंकि यूरोपियन यूनियन में 27 सदस्य देश हैं जिन्हें इस समझौते को लागू होने से पहले मंजूरी देनी होगी।

    उन्होंने आगे कहा कि ऐसे में इसके लागू होने में शायद एक और साल लगेगा। इसलिए, किसी भी शॉर्ट-टर्म फायदे की उम्मीद न करें, लेकिन लंबे समय में यह बहुत अच्छा होना चाहिए, और मुझे उम्मीद है कि मैन्युफैक्चरर्स, एक्सपोर्टर्स वगैरह आने वाले बड़े अवसरों के लिए खुद को तैयार करेंगे।

    भारत और यूरोप के 27 देशों के साझा बाजार यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच बहुप्रतीक्षित मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर सोमवार को राष्ट्रीय राजधानी में सहमति हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को इसकी घोषणा करते हुए इस समझौते को ऐतिहासिक करार दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “कल ही भारत और यूरोपीय संघ के बीच एक बहुत बड़ा समझौता हुआ है। दुनिया के लोग इसकी चर्चा मदर ऑफ ऑल डील्स (अबतक के सबसे बड़े व्यापार समझौते) के रूप में कर रहे हैं।”

    उल्लेखनीय है कि ईयू भारत का एक प्रमुख व्यापारिक और आर्थिक भागीदार है। साल 2024-2025 में दोनों के बीच 136 अरब डॉलर के सामान का व्यापार हुआ था। भारत वहां से मुख्य रूप से मशीनें, परिवहन उपकरण और रसायनों का आयात करता है, जबकि भारत की ओर से वहां मशीनें, रसायन, लोहा, एल्मुनियम और तांबा जैसी प्राथमिक धातुएं, खनिज उत्पाद तथा कपड़ा और चमड़े के सामान आदि का निर्यात होता है।

  • कीमतें आसमान पर… आम आदमी की पहुंच से दूर हुआ सोना, मांग में भारी गिरावट

    कीमतें आसमान पर… आम आदमी की पहुंच से दूर हुआ सोना, मांग में भारी गिरावट


    नई दिल्ली।
    कीमतों के रिकॉर्ड स्तर (Record levels Prices) पर पहुंचने और उपभोक्ताओं के खरीद व्यवहार में बदलाव के कारण वर्ष 2025 में भारत (India) की सोने की मांग (Gold Demand) में 11 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (World Gold Council) की गुरुवार को जारी रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सोने की कुल मांग 2025 में गिरकर 710.9 टन रह गई, जो 2024 में 802.8 टन थी। परिषद का अनुमान है कि 2026 में देश में सोने की मांग 600 से 700 टन के बीच रह सकती है। हालांकि, कीमतों में भारी उछाल के कारण मूल्य के संदर्भ में सोने की मांग 30 प्रतिशत बढ़कर 7,51,490 करोड़ रुपये पर पहुंच गई, जबकि पिछले वर्ष यह 5,75,930 करोड़ रुपये थी।

    डब्ल्यूजीसी ने बताया, ‘वर्ष, 2025 की चौथी तिमाही में सोने की मांग पर ऊंची कीमतों और उपभोक्ताओं के बदलते व्यवहार का असर स्पष्ट दिखा। मात्रा के आधार पर इस तिमाही में मांग नौ प्रतिशत गिरकर 241.3 टन रही, लेकिन मूल्य के आधार पर यह 49 प्रतिशत बढ़कर करीब 3,03,470 करोड़ रुपये हो गई।

    वर्ष 2025 के दौरान आभूषणों की कुल मांग 24 प्रतिशत घटकर 430.5 टन रही, जो 2024 में 563.4 टन थी। हालांकि, मूल्य के लिहाज से यह 12 प्रतिशत बढ़कर 4,54,390 करोड़ रुपये रही, जो इससे पिछले साल 4,04,510 करोड़ रुपये रही थी। शादियों के सीजन के बावजूद ऊंची कीमतों और महंगाई के कारण आभूषणों की बिक्री में 23 प्रतिशत की कमी आई। 2025 में सोने ने 60 प्रतिशत से अधिक का रिटर्न दिया और 53 बार सर्वकालिक उच्च स्तर को छुआ। इसके विपरीत, निवेश के रूप में सोने की मांग बढ़ी है। चौथी तिमाही में निवेश मांग 26 प्रतिशत बढ़कर 96 टन रही, जबकि इसका मूल्य 108 प्रतिशत उछलकर 1,20,700 करोड़ रुपये हो गया।


    सोने की वैश्विक मांग 5,000 टन से अधिक हुई

    वैश्विक स्तर पर सोने की मांग 2025 में 5,000 टन से अधिक होकर एक नए सर्वकालिक उच्चस्तर पर पहुंच गई है। रिपोर्ट के अनुसार, कुल सोने की मांग 2025 में 5,002 टन के नए ऑल टाइम हाई पर पहुंच गई, जो पिछले वर्ष 4,961.9 टन थी। यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से निवेश मांग में तेज उछाल के कारण हुई, जो 2025 में बढ़कर 2,175.3 टन हो गई जबकि यह 2024 में 1,185.4 टन थी। चालू वित्त वर्ष की अक्तूबर-दिसंबर तिमाही में उपभोक्ता मांग दो प्रतिशत बढ़कर 1,345.3 टन हो गई जो पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही में 1,318.5 टन थी।

  • ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने की हामी भरकर संकट में फंसा पाकिस्तान…. फीस के लिए भी लेना पड़ेगा कर्ज

    ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने की हामी भरकर संकट में फंसा पाकिस्तान…. फीस के लिए भी लेना पड़ेगा कर्ज


    इस्लामाबाद।
    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने अपनी नई वैश्विक नीतियों (New Global Policies) से पिछले एक साल में हालात को काफी बदल दिया है। यूरोपीय देशों समेत दुनिया के तमाम मुल्क अब अमेरिका का विकल्प खोज रहे हैं। इसमें सबसे बड़ी परेशानी पाकिस्तान के लिए खड़ी हो गई है। एक तरफ वह ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ (Trump’s ‘Board of Peace’) में शामिल होने के लिए हामी भर चुका है, लेकिन इसकी फीस चुकाने के लिए शायद उसे एक बार फिर से कर्ज का सहारा लेना पड़े। दावोस में ट्रंप द्वारा घोषित किए गए इस बोर्ड में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ (Pakistan’s Prime Minister Shahbaz Sharif) भी शामिल हुए। इस बोर्ड का मुख्य उद्देश्य मध्य-पूर्व में शांति को स्थापित करके गाजा के पुननिर्माण का है। लेकिन पाकिस्तान के लिए एक परेशानी का सबब बन गया है। एक तरफ तो पैसे वाली बात है, दूसरी तरफ घरेलू स्तर पर भी शहबाज सरकार को विरोध का सामना करना पड़ रहा है।

    पाकिस्तान में इसका विरोध होने का सबसे बड़ा कारण इस बोर्ड की संरचना पर है। इस बोर्ड के अध्यक्ष ट्रंप होंगे और सदस्यता और इसकी दिशा तय करने का पूरा हक उनके पास ही होगा। इस बोर्ड को संयुक्त राष्ट्र संघ के एक विकल्प के तौर पर भी देखा जा रहा है। हालांकि, पाकिस्तानी विपक्ष का कहना है कि आखिर ट्रंप के कार्यकाल के बाद इस बोर्ड का क्या होगा इस पर बहुत बड़ा संशय है। क्योंकि यह बोर्ड मुख्य तौर पर ट्रंप के भरोसेमंद देशों का एक समूह नजर आता है।


    ट्रंप के भरोसेमंद पिछलग्गू देश बोर्ड ऑफ पीस में शामिल

    इस बोर्ड में अब तक दो दर्जन से ज्यादा देशों ने शामिल होने की पेशकश की है। हालांकि ट्रंप ने लगभग 100 से ज्यादा देशों को इसके लिए बुलाया था, लेकिन भारत समेत ज्यादातर देशों ने इससे दूरी ही बनाए रखी। वर्तमान में इसमें हंगरी, बुल्गारिया, इजराइल, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र, तुर्की, बेलारूस, बहरीन, जॉर्डन, कतर, आर्मेनिया, अजरबैजान, मोरक्को, पाकिस्तान, इंडोनेशिया, कोसोवो, उज्बेकिस्तान, कजाखस्तान, पैराग्वे और वियतनाम शामिल हैं।


    नाटो ने किया किनारा

    सबसे बड़ी और दिलचस्प बात है कि इसमें अमेरिका के अलावा संयुक्त राष्ट्र स्थायी सुरक्षा समिति का कोई और देश शामिल नहीं है और न ही नाटो सदस्य देशों ने इसमें शामिल होने का उत्साह दिखाया है। यहां तक की यूरोप में ट्रंप समर्थक मानी जाने वाली इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी ने भी इससे दूरी बनाकर रखी है। इसके अलावा अमेरिका से सीमा साझा करने वाले कनाडा ने भी इसको नकार दिया है और तो और पीएम कार्नी की बातों से ट्रंप इतने नाराज हुए कि उन्होंने उनको दिया हुआ निमंत्रण भी कैंसिल कर दिया।

    दरअसल, इस बोर्ड में शामिल होने को लेकर देशों के बीच असमंजस की स्थिति है। इसमें ट्रंप अमेरिका का भी नहीं, बल्कि स्वयं का एकाधिकार चाहते हैं। विदेशी मामलों के जानकारों की मानें तो ट्रंप इसके जरिए सीधे-सीधे संयुक्त राष्ट्र संघ के वर्चस्व को चुनौती देना चाहते हैं। एक बार यह प्रयास गाजा में सफल हुआ तो उसके बाद इसे दुनिया के दूसरे युद्धों और मसलों की तरफ भी आगे बढ़ाने की कोशिश है।


    एक अरब डॉलर है फीस

    इस बोर्ड के लिए ट्रंप का सीधा प्रयास है कि 1 अरब डॉलर दीजिए और अपने लिए एक सीट ले लीजिए। उनके मुताबिक इस पैसे का इस्तेमाल गाजा के पुनर्निर्माण के लिए होगा। बोर्ड के चार्टर के मसौदे के मुताबिक प्रत्येक सदस्य देश अधिकतम तीन वर्षों के लिए कार्यकाल निभाएगा, जिसे अध्यक्ष द्वारा नवीनीकृत किया जा सकता है। हालांकि, जो देश पहले वर्ष के भीतर 1 अरब डॉलर से अधिक नकद योगदान देते हैं, उन पर यह तीन साल की सीमा लागू नहीं होगी।”

    पाकिस्तान इस बोर्ड में शामिल होने की पुष्टि कर चुका है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कहा है कि संघीय कैबिनेट ने इस फैसले को मंजूरी दे दी है। उन्होंने लंदन में पाकिस्तान हाई कमीशन के बाहर बताया कि दावोस में उन्हें ट्रंप के निमंत्रण पर चर्चा में बुलाया गया था और वहीं उनसे बोर्ड में शामिल होने को कहा गया। लेकिन पाकिस्तान के लिए पैसा भी एक परेशानी है। बाकी जो इस्लामिक देश इसमें शामिल हुए हैं, वह पैसा चुकाने की स्थिति में हैं, लेकिन पाकिस्तान के साथ ऐसा नहीं है।


    विदेशी कर्ज से बेहाल है पाकिस्तान

    पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था लगातार दबाव में है, छोटी-छोटी चीजों के लिए भी वह विदेशी कर्ज पर निर्भर है। हाल ही में आईएमएफ ने पाकिस्तान के लिए 1.2 अरब डॉलर के फंड की मंजूरी दी है। आईएमएफ की इस कार्यक्रम के तहत कुल मिलाकर पाकिस्तान को 3.3 अरब डॉलर दिए जाने हैं। अभी तक पाकिस्तान के ऊपर आईएमएफ का 7.35 अरब डॉलर से अधिक का कर्ज है।

    पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की हालात इस कदर पतली है कि अभी उसके ऊपर जीडीपी का 70 फीसदी से अधिक सार्वजनिक कर्ज है। यूएई और चीन से मिले कई कर्जों को पाकिस्तान चुकाने की स्थिति में नहीं होने की वजह से उन्हें रोल ओवर करने की मांग कर रहा है। 1958 से लेकर अब तक आईएमएफ करीब 12 बार पाकिस्तान की बिगड़ती अर्थव्यवस्था को संभालने की मदद कर चुका है। 2023 में जब पाकिस्तान पूरी तरह से डिफॉल्ट होने की स्थिति में आ गया था, तब भी आईएमएफ ने ही उसे अरबों डॉलर की मदद दी थी। इसके बाद पिछले साल भी कुछ शर्तों पर पाकिस्तान को 7 अरब डॉलर मिले थे।

    पाकिस्तान अपनी वैश्विक राजनीति को चमकाने के लिए भले ही बड़े-बड़े दांव खेलने की कोशिश कर रहा है, लेकिन इतना साफ है कि उसकी अर्थव्यवस्था इसके लिए तैयार नहीं है। हालांकि, भारत के साथ ईयू और रूस के रिश्तों को देखते हुए और इन सभी देशों की बोर्ड ऑफ पीस से दूरी अमेरिका को पाकिस्तान के करीब रखने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर भी लगातार अपने चाटुकारिता से ट्रंप को खुश करने में लगे रहते हैं। अब पाकिस्तान इसके पैसे चुकाएगा या ट्रंप से उधार की बात करेगा यह तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इतना तय है कि अगर वह पाकिस्तानी जनता के पैसे को इसमें खर्च करता है, तो इस्लामाबाद में इससे विरोध की लहर तो जरूर उठेगी।

  • Turkiye: इकलौता मुस्लिम देश जहां घटती जनसंख्या का संकट.. रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंची जन्म दर

    Turkiye: इकलौता मुस्लिम देश जहां घटती जनसंख्या का संकट.. रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंची जन्म दर


    अंकारा।
    पड़ोसी पाकिस्तान (Neighboring Pakistan) का मददगार देश तुर्किये (Turkey) तेजी से एक गंभीर जनसांख्यिकीय संकट (Demographic crisis) की ओर बढ़ रहा है। यह संभवत: दुनिया का इकलौता ऐसा मुस्लिम मुल्क (Muslim country) है, जहां आबादी तेजी से गिर रही है और यही बात वहां के हुक्मरानों को परेशान कर रही है। तुर्की सांख्यिकीय संस्थान के अनुसार, 2024 में तुर्की की कुल प्रजनन दर गिरकर 1.48 प्रति महिला रह गई है। यह जनसंख्या प्रतिस्थापन स्तर (2.1) से काफी नीचे है। संस्थान के मुताबिक, 25 साल पहले यानी 2001 में यह दर 2.38 थी, जो पिछले 11 वर्षों से लगातार गिर रही है और अब गिरकर 1.48 पर पहुंच गई है।

    देश में जन्म दर में आई ऐतिहासिक गिरावट ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है। तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने इसे देश के अस्तित्व के लिए एक गंभीर खतरा और तबाही करार दिया है। उपराष्ट्रपति सेवडेट यिलमाज़ ने चेतावनी दी है कि तुर्किये का तथाकथित “जनसांख्यिकीय अवसर काल” (Demographic Dividend) 2035 से पहले ही खत्म हो सकता है। बुधवार को जनसंख्या नीति बोर्ड की बैठक से पहले यिलमाज़ ने कहा कि देश अब एक “डेमोग्राफिक टर्निंग पॉइंट” पर खड़ा है और सरकार इस मुद्दे को अस्तित्व से जुड़ा सवाल मानती है। यह वही शब्दावली है जिसका इस्तेमाल राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन लंबे समय से करते आ रहे हैं।


    जन्म दर रिकॉर्ड निचले स्तर पर

    तुर्किये की कुल प्रजनन दर (Fertility Rate) 2017 में 2.08 था जो 2024 में गिरकर 1.48 पर पहुंच गया है। यह दर न सिर्फ आबादी को स्थिर रखने के लिए जरूरी 2.1 से काफी कम है, बल्कि वैश्विक औसत 2.25 से भी नीचे है। यिलमाज़ के मुताबिक, “पिछले 10 वर्षों में जन्म दर में सबसे तेज गिरावट वाले देशों में तुर्किये दुनिया में पांचवें स्थान पर है।” जनसांख्यिकीय अवसर काल वह समय होता है जब कामकाजी आबादी, आश्रित आबादी (बच्चे और बुज़ुर्ग) से कहीं अधिक होती है। इससे आर्थिक विकास को रफ्तार मिलती है। लेकिन यिलमाज़ ने चेताया कि, “अगर मौजूदा रुझान जारी रहे, तो यह अवसर 2035 से काफी पहले खत्म हो सकता है।”


    बुज़ुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ रही

    हालांकि तुर्किये की आबादी अब 8.6 करोड़ से ज्यादा है और यह यूरोप में सबसे अधिक है, लेकिन देश तेजी से बूढ़ा हो रहा है। 2024 में 65 वर्ष से ऊपर की आबादी 10.6% थी। हालांकि कुछ प्रांतों में यह आंकड़ा 20% से ज्यादा है। संयुक्त राष्ट्र के मानकों के अनुसार, तुर्किये अब “अत्यधिक वृद्ध आबादी” वाले देशों की श्रेणी में आ चुका है।

    अनुमान है कि 2050 तक हर चौथा व्यक्ति 65+ होगा और 2075 तक हर तीसरा शख्स 65+ होगा। अनुमान के मुताबिक, 2100 तक हर 10 में से 4 लोग बुज़ुर्ग होंगे। इसका सीधा असर पेंशन, सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ेगा। ग्रामीण क्षेत्रों में युवाओं के पलायन के कारण बुज़ुर्गों का अनुपात राष्ट्रीय औसत से भी अधिक हो चुका है। सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए तीन बच्चों की पॉलिसी लागू की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि तीन या उससे अधिक बच्चों वाली जन्म दर वाले प्रांतों की संख्या 2017 में 10 थी जो 2024 में सिर्फ़ 1 रह गई है।


    सरकार की पहल

    इस बीच, राष्ट्रपति एर्दोगन ने पिछले साल 2025 को “परिवार वर्ष” घोषित किया था। इसके अलावा 2026–2035 को “परिवार और जनसंख्या दशक” घोषित किया गया है। आबादी बढ़ाने के लिए सरकार ने इसके अलावा कई प्रोत्साहन योजनाओं की भी घोषणा की है। इसके तहत पहले बच्चे के जन्म पर 5,000 लीरा का एकमुश्त भुगतान और दूसरे बच्चे के लिए मासिक भत्ता भुगतान की व्यवस्था की गई है। इसके अलावा नवविवाहित जोड़ों को 150,000 लीरा तक का ब्याज मुक्त ऋण दिया जा रहा है, जिसमें पहले दो साल कोई भुगतान नहीं करना होगा। राष्ट्रपति एर्दोगन लंबे समय से तुर्की के परिवारों से कम से कम 3 बच्चे पैदा करने की अपील कर रहे हैं ताकि देश की जनसांख्यिकीय शक्ति बनी रहे। इसके अलावा सरकार ने युवाओं के लिए सामाजिक आवास, मातृत्व और बाल भत्ते में बढ़ोतरी की भी व्यवस्था की है।


    क्यों घट रही है जन्म दर?

    विशेषज्ञों और रिपोर्टों के अनुसार, जन्म दर घटने के पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण हैं। इनमें सबसे अहम आर्थिक कारण हैं। तुर्किये में उच्च मुद्रास्फीति (Inflation), आवास की बढ़ती लागत और नौकरी की असुरक्षा के कारण युवा परिवार शुरू करने से डर रहे हैं। इसके अलावा महिलाओं के बीच उच्च शिक्षा का स्तर बढ़ा है, जिससे वे शादी और बच्चों के बजाय करियर को प्राथमिकता दे रही हैं। शहरों में रहने वाले परिवारों की संख्या बढ़ रही है, जहां ग्रामीण इलाकों की तुलना में बच्चों की संख्या कम होती है। इसके अलावा आर्थिक दबाव और जीवन-यापन की बढ़ती लागत भी इसकी एक अहम वजह है। बता दें कि चीन-जापान भी इसी तरह की समस्या का सामना कर रहा है।

  • दिल्ली में आज जुटेंगे सभी अरब देश…. वैश्विक तनाव के बीच भारत में लगेगा मुस्लिम देशों का जमावड़ा

    दिल्ली में आज जुटेंगे सभी अरब देश…. वैश्विक तनाव के बीच भारत में लगेगा मुस्लिम देशों का जमावड़ा


    नई दिल्ली।
    मिडिल ईस्ट (Middle East) में जारी तनाव के बीच भारत (India) में इस सप्ताह के अंत में मुस्लिम देशों (Muslim Countries) का जमावड़ा लगने जा रहा है। भारत आगामी शनिवार को राजधानी दिल्ली में भारत-अरब विदेश मंत्रियों की दूसरी बैठक की मेजबानी करेगा जिसमें अरब लीग के सभी 22 अरब देशों (All 22 Arab countries) के प्रतिनिधि भाग लेंगे। बता दें कि यह बैठक दस साल बाद हो रही है। वहीं यह बात भी अहम है कि यह पहली बार होगा जब भारत इस बैठक की मेजबानी करने जा रहा है।

    जानकारी के मुताबिक अरब देशों के विदेश मंत्री, राज्य मंत्री, वरिष्ठ अधिकारी और अरब लीग सचिवालय इस बैठक में अपने देश का प्रतिनिधित्व करेंगे। विदेश मंत्रालय ने गुरुवार को बताया है कि इस बैठक की सह-अध्यक्षता भारत और संयुक्त अरब अमीरात मिलकर करेंगे। इसमें अरब लीग के सदस्य देशों के विदेश मंत्री और अरब लीग के महासचिव भी भाग लेंगे। वहीं बैठक से पहले शुक्रवार को भारत और अरब वरिष्ठ अधिकारियों के बीच बातचीत भी होगी।


    एजेंडे में क्या?

    दोनों पक्षों की दूसरी बैठक दस सालों के अंतराल के बाद हो रही है। इससे पहले दोनों पक्षों के बीच पहली बैठक 2016 में बहरीन में हुई थी। पहली बैठक के दौरान मंत्रियों ने सहयोग के पांच प्राथमिक क्षेत्रों-अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, शिक्षा, मीडिया और संस्कृति-की पहचान की थी और इन क्षेत्रों में विभिन्न गतिविधियों का प्रस्ताव रखा था। वहीं शनिवार को होने वाली बैठक से मौजूदा सहयोग को आगे बढ़ाने और भारत-अरब साझेदारी को और अधिक सुदृढ़ और व्यापक बनाने की अपेक्षा होगी।


    अरब लीग में पर्यवेक्षक की भूमिका में भारत

    गैरतलब है कि भारत 22 सदस्य देशों वाले पैन-अरब संगठन अरब लीग में पर्यवेक्षक की भूमिका में है। वहीं भारत-अरब विदेश मंत्रियों की बैठक भारत और अरब देशों के बीच साझेदारी को आगे बढ़ाने वाली सर्वोच्च संस्थागत व्यवस्था है। इस साझेदारी को मार्च 2002 में औपचारिक रूप दिया गया था जब भारत और अरब लीग के बीच संवाद प्रक्रिया को संस्थागत स्वरूप देने के लिए एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए।

    इसके बाद दिसंबर 2008 में तत्कालीन अरब लीग महासचिव अमर मूसा की भारत यात्रा के दौरान अरब-भारत सहयोग मंच की स्थापना के लिए एक सहयोग ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए। 2013 में इसकी संरचनात्मक व्यवस्था को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से इसमें संशोधन भी किया गया।