Category: Economy

  • EPFO Update: मार्च खत्म हुए दो महीने बीते, पीएफ खाते में कब आएगा 8.25% ब्याज? जानिए ताजा अपडेट

    EPFO Update: मार्च खत्म हुए दो महीने बीते, पीएफ खाते में कब आएगा 8.25% ब्याज? जानिए ताजा अपडेट

    नई दिल्ली। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) के करोड़ों खाताधारकों को वित्त वर्ष 2025-26 के लिए घोषित ब्याज राशि का इंतजार है। मार्च में ब्याज दर तय किए जाने के बावजूद जून की शुरुआत तक खातों में ब्याज जमा नहीं होने से कई कर्मचारियों के मन में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर पीएफ खाते में ब्याज कब आएगा। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इसमें चिंता की कोई बात नहीं है, क्योंकि ब्याज दर घोषित होने और उसे खातों में जमा किए जाने के बीच कई प्रशासनिक प्रक्रियाएं पूरी की जाती हैं।

    ईपीएफओ ने मार्च 2026 की शुरुआत में वित्त वर्ष 2025-26 के लिए कर्मचारी भविष्य निधि पर 8.25 प्रतिशत ब्याज दर बनाए रखने का फैसला किया था। यह निर्णय केंद्रीय न्यासी बोर्ड की बैठक के बाद लिया गया था। इसके बाद श्रम एवं रोजगार मंत्रालय की ओर से इस संबंध में जानकारी भी साझा की गई थी। हालांकि ब्याज दर की घोषणा के बाद इसे लागू करने के लिए केंद्र सरकार की औपचारिक अधिसूचना जारी होना आवश्यक होता है। इसी प्रक्रिया के पूरा होने के बाद ईपीएफओ अपने करोड़ों सदस्यों के खातों में ब्याज की राशि जमा करता है।

    देशभर में लगभग सात करोड़ से अधिक पीएफ खाताधारक हैं, जिनकी नजर हर साल अपने खाते में जमा होने वाले ब्याज पर रहती है। वित्त वर्ष समाप्त होने के दो महीने बाद भी ब्याज राशि जमा नहीं होने से कर्मचारियों के बीच चर्चा बढ़ गई है। कई लोग यह जानना चाहते हैं कि जब ब्याज दर मार्च में ही तय हो चुकी है तो राशि अब तक खातों में क्यों नहीं पहुंची। विशेषज्ञों के अनुसार ब्याज क्रेडिट करने से पहले सरकार की मंजूरी, तकनीकी अपडेट और खातों का सत्यापन जैसी कई प्रक्रियाएं पूरी करनी होती हैं, जिनमें कुछ समय लगना सामान्य बात है।

    वित्तीय मामलों के जानकारों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों के अनुभव को देखें तो ईपीएफओ आमतौर पर जून या जुलाई के दौरान खातों में ब्याज की राशि जमा करता है। पहले यह प्रक्रिया सितंबर या अक्टूबर तक चलती थी, लेकिन हाल के वर्षों में इसमें तेजी आई है। ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि इस वर्ष भी सरकार की अधिसूचना जारी होने के बाद जून या जुलाई के दौरान करोड़ों खाताधारकों के खातों में ब्याज की राशि दिखाई देने लगेगी। हालांकि अंतिम समयसीमा को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।

    ईपीएफओ सदस्य अपने खाते में ब्याज जमा हुआ है या नहीं, इसकी जानकारी घर बैठे मोबाइल फोन के जरिए भी प्राप्त कर सकते हैं। इसके लिए उमंग ऐप एक आसान विकल्प माना जाता है। उपयोगकर्ता सबसे पहले अपने मोबाइल फोन में उमंग ऐप डाउनलोड कर सकते हैं और मोबाइल नंबर के माध्यम से पंजीकरण कर सकते हैं। इसके बाद ईपीएफओ सेवाओं के विकल्प में जाकर ‘व्यू पासबुक’ पर क्लिक करना होगा। ओटीपी सत्यापन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद सदस्य अपने खाते का बैलेंस और ब्याज से जुड़ी जानकारी देख सकते हैं।

    इसके अलावा ईपीएफओ की आधिकारिक वेबसाइट के माध्यम से भी पीएफ खाते का विवरण देखा जा सकता है। सदस्य पोर्टल पर लॉग इन करने के बाद ‘मेंबर पासबुक’ विकल्प पर क्लिक करके अपने खाते में जमा राशि, मासिक योगदान और ब्याज संबंधी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। यदि ब्याज की राशि खाते में जमा कर दी गई होगी तो वह पासबुक में दिखाई देने लगेगी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि पीएफ खाताधारकों को फिलहाल घबराने की आवश्यकता नहीं है। ब्याज राशि में किसी प्रकार की कटौती या देरी की कोई आधिकारिक सूचना नहीं है। सरकार की अधिसूचना जारी होने के बाद ईपीएफओ निर्धारित प्रक्रिया के तहत सभी पात्र खातों में ब्याज जमा करेगा। ऐसे में कर्मचारियों को समय-समय पर अपनी पासबुक जांचते रहना चाहिए और किसी भी अपडेट के लिए आधिकारिक स्रोतों पर नजर बनाए रखनी चाहिए।

  • आरबीआई का बड़ा बयान: सोना बेचने की खबरें फर्जी, भारत के पास अब भी 880.52 टन गोल्ड रिजर्व सुरक्षित

    आरबीआई का बड़ा बयान: सोना बेचने की खबरें फर्जी, भारत के पास अब भी 880.52 टन गोल्ड रिजर्व सुरक्षित

    नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने देश के स्वर्ण भंडार को लेकर फैल रही अटकलों और मीडिया रिपोर्टों को सिरे से खारिज कर दिया है। केंद्रीय बैंक ने स्पष्ट किया है कि भारत के पास मौजूद भौतिक सोने के भंडार में किसी प्रकार की बिक्री या कमी नहीं हुई है और यह पहले की तरह 880.52 टन पर स्थिर है।

    आरबीआई ने बुधवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर जारी बयान में कहा कि कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा किया गया था कि केंद्रीय बैंक ने अपने गोल्ड रिजर्व का एक हिस्सा बेच दिया है, जो पूरी तरह गलत और भ्रामक है। बैंक ने दोहराया कि उसके पास मौजूद भौतिक सोने का भंडार सुरक्षित है और इसमें कोई बदलाव दर्ज नहीं किया गया है।

    केंद्रीय बैंक ने यह भी बताया कि स्वर्ण भंडार से संबंधित सभी आधिकारिक आंकड़े नियमित रूप से मासिक बुलेटिन में प्रकाशित किए जाते हैं, जिन्हें आरबीआई की आधिकारिक वेबसाइट पर देखा जा सकता है। बैंक ने लोगों से अपील की कि वे केवल आधिकारिक स्रोतों से जारी जानकारी पर ही भरोसा करें और अफवाहों से बचें।

    इस मामले में प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) की फैक्ट चेक यूनिट ने भी स्थिति स्पष्ट करते हुए इन खबरों को फर्जी बताया है। पीआईबी ने कहा कि सोशल मीडिया और कुछ अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स में यह दावा किया गया था कि आरबीआई ने लगभग 12 अरब डॉलर मूल्य का सोना बेच दिया है, लेकिन यह जानकारी तथ्यात्मक रूप से गलत है।

    पीआईबी के अनुसार, भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। सितंबर 2025 के अंत में यह हिस्सेदारी 13.92 प्रतिशत थी, जो 31 मार्च 2026 तक बढ़कर 16.70 प्रतिशत हो गई। इसके बाद 22 मई 2026 तक यह और बढ़कर 16.85 प्रतिशत तक पहुंच गई। ये आंकड़े यह संकेत देते हैं कि देश के विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की भूमिका मजबूत हो रही है।

    इससे पहले एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया था कि ब्लूमबर्ग के हवाले से आरबीआई ने हाल के दो हफ्तों में लगभग 12 अरब डॉलर मूल्य का सोना बेचकर विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां खरीदी हैं। इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद वित्तीय बाजारों और निवेशकों के बीच तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई थीं।

    हालांकि आरबीआई और पीआईबी दोनों ने इन दावों को स्पष्ट रूप से खारिज करते हुए कहा कि यह रिपोर्ट तथ्यों पर आधारित नहीं है। केंद्रीय बैंक ने दोहराया कि भारत का स्वर्ण भंडार पूरी तरह सुरक्षित है और इसमें किसी तरह की बिक्री या गिरावट नहीं हुई है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की बढ़ती हिस्सेदारी देश की आर्थिक स्थिरता और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच एक सुरक्षा कवच के रूप में देखी जाती है। सोने को हमेशा से एक सुरक्षित निवेश माना जाता है और केंद्रीय बैंक भी इसे अपने रिजर्व पोर्टफोलियो का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाए रखते हैं।

    इस स्पष्टीकरण के बाद अब बाजार में फैली अटकलों पर विराम लगने की उम्मीद है और निवेशकों के बीच स्थिति को लेकर स्पष्टता आई है। आरबीआई ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि देश की वित्तीय स्थिति मजबूत है और स्वर्ण भंडार पूरी तरह सुरक्षित और स्थिर बना हुआ है।

  • आरबीआई एमपीसी की तीन दिवसीय बैठक शुरू, ब्याज दरों पर फैसले को लेकर बाजार की निगाहें टिकीं, महंगाई और वैश्विक तनाव बना मुख्य फोकस

    आरबीआई एमपीसी की तीन दिवसीय बैठक शुरू, ब्याज दरों पर फैसले को लेकर बाजार की निगाहें टिकीं, महंगाई और वैश्विक तनाव बना मुख्य फोकस

    नई दिल्ली । भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की तीन दिवसीय बैठक बुधवार से शुरू हो गई है, जिसमें देश की मौद्रिक नीति की दिशा तय करने को लेकर गहन विचार-विमर्श किया जा रहा है। यह बैठक ऐसे समय पर हो रही है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था कई प्रकार की चुनौतियों से गुजर रही है और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव ने ऊर्जा बाजारों को अस्थिर कर दिया है। ऐसे में भारतीय अर्थव्यवस्था पर महंगाई और विकास दर दोनों को संतुलित रखने का दबाव बढ़ गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार आरबीआई रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं करेगा और मौजूदा दरों को यथावत बनाए रखेगा, हालांकि नीति वक्तव्य में अधिक सतर्क रुख देखने को मिल सकता है।

    इस बैठक पर बाजार और निवेशकों की खास नजर बनी हुई है क्योंकि इससे आने वाले महीनों में ऋण, निवेश और आर्थिक गतिविधियों की दिशा तय होगी। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा शुक्रवार को बैठक के बाद नीतिगत फैसलों की घोषणा करेंगे। वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता ने स्थिति को और जटिल बना दिया है, जिसका सीधा असर भारत की महंगाई दर पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तेल की कीमतें स्थिर नहीं रहती हैं तो उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर दबाव बढ़ सकता है और महंगाई अनुमान में वृद्धि संभव है।

    एचएसबीसी और अन्य वैश्विक वित्तीय संस्थानों के विश्लेषकों का कहना है कि निकट भविष्य में आरबीआई ब्याज दरों को स्थिर रखने की रणनीति अपनाएगा, लेकिन परिस्थितियों के अनुसार आगे चलकर सख्ती की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। वहीं कुछ रिपोर्टों में यह भी संकेत दिए गए हैं कि बाजार 2026 के अंत तक दरों में हल्की कटौती की संभावना को देख रहा है, हालांकि यह पूरी तरह वैश्विक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

    अर्थशास्त्रियों का यह भी कहना है कि महंगाई का मौजूदा दबाव मुख्य रूप से आपूर्ति पक्ष से जुड़ा हुआ है, न कि मांग में तेजी के कारण। ऐसे में आरबीआई के लिए चुनौती यह होगी कि वह विकास दर को प्रभावित किए बिना मूल्य स्थिरता बनाए रखे। अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की जीडीपी वृद्धि दर लगभग 6.6 से 6.7 प्रतिशत के बीच रह सकती है, बशर्ते वैश्विक तेल कीमतें नियंत्रित रहें।

  • अंतरराष्ट्रीय अनिश्चितता के बावजूद कीमती धातुओं में गिरावट, MCX पर चांदी 1,300 रुपए तक फिसली

    अंतरराष्ट्रीय अनिश्चितता के बावजूद कीमती धातुओं में गिरावट, MCX पर चांदी 1,300 रुपए तक फिसली

    नई दिल्ली । वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद कीमती धातुओं के बाजार में बुधवार को कमजोरी का रुख देखने को मिला। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अनिश्चितता जरूर बढ़ाई है, लेकिन इसका सीधा फायदा सोने और चांदी को नहीं मिल सका। इसके विपरीत घरेलू वायदा बाजार मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज में दोनों धातुओं की कीमतों में उतार-चढ़ाव और गिरावट दर्ज की गई, जिससे निवेशकों के बीच सतर्कता का माहौल बन गया है।

    सोने की कीमतों में शुरुआत में मामूली मजबूती देखी गई, लेकिन कारोबार आगे बढ़ने के साथ इसमें दबाव बढ़ता गया। अगस्त डिलीवरी वाला सोना अपने पिछले बंद स्तर की तुलना में हल्की बढ़त के साथ खुला, लेकिन जल्द ही इसमें गिरावट दर्ज की गई और यह नीचे फिसल गया। विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और महंगाई बढ़ने की आशंका ने ब्याज दरों के लंबे समय तक ऊंचे बने रहने की संभावना को मजबूत किया है, जिससे सोने में निवेश की मांग सीमित हो गई है।

    चांदी के बाजार में अधिक अस्थिरता देखने को मिली। जुलाई वायदा चांदी की कीमतों में करीब 1,300 रुपए प्रति किलोग्राम तक की गिरावट दर्ज की गई, जो बाजार में कमजोर धारणा को दर्शाती है। कारोबार के दौरान चांदी ने शुरुआती स्तर पर स्थिरता दिखाई, लेकिन बाद में बिकवाली दबाव बढ़ने से यह नीचे आ गई। विश्लेषकों का कहना है कि चांदी की चाल फिलहाल सीमित दायरे में बनी हुई है, लेकिन वैश्विक संकेतों के कारण इसमें तेज उतार-चढ़ाव की संभावना बनी रह सकती है।

    अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी सोना और चांदी दोनों में कमजोरी का रुख देखने को मिला। स्पॉट गोल्ड और फ्यूचर्स दोनों में हल्की गिरावट दर्ज की गई, जबकि चांदी की कीमतें भी दबाव में रहीं। पश्चिम एशिया में तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी ने वैश्विक महंगाई की चिंता को बढ़ा दिया है, लेकिन इसके बावजूद निवेशक सुरक्षित निवेश की ओर अपेक्षित रूप से आकर्षित नहीं हो पा रहे हैं। इसका मुख्य कारण वैश्विक आर्थिक संकेतों में अनिश्चितता और ब्याज दरों की दिशा को लेकर असमंजस माना जा रहा है।

    बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में सोने और चांदी की दिशा काफी हद तक अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर निर्भर करेगी। यदि भू-राजनीतिक तनाव और तेल की कीमतों में बढ़ोतरी जारी रहती है तो कीमतों में सुधार देखने को मिल सकता है, अन्यथा दबाव बना रह सकता है। निवेशकों के लिए फिलहाल बाजार में सतर्कता बनाए रखना ही बेहतर रणनीति मानी जा रही है क्योंकि किसी भी दिशा में तेज उतार-चढ़ाव की संभावना बनी हुई है।

  • भारतीय अर्थव्यवस्था को मिला बूस्ट: मई में सेवा क्षेत्र में मजबूत विस्तार, विदेशी मांग और नए कारोबार ने बढ़ाई रफ्तार

    भारतीय अर्थव्यवस्था को मिला बूस्ट: मई में सेवा क्षेत्र में मजबूत विस्तार, विदेशी मांग और नए कारोबार ने बढ़ाई रफ्तार

    नई दिल्ली। भारत की अर्थव्यवस्था के लिए सेवा क्षेत्र से एक सकारात्मक संकेत सामने आया है। नए कारोबार में लगातार बढ़ोतरी और डिजिटल, आईटी, ई-कॉमर्स तथा लॉजिस्टिक्स सेक्टर में बढ़ती मांग के चलते मई में भारत के सेवा क्षेत्र का परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (PMI) बढ़कर 59.8 पर पहुंच गया है, जो अप्रैल में 58.8 था। यह वृद्धि देश के सेवा आधारित उद्योगों में मजबूत विस्तार और आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार को दर्शाती है।

    एचएसबीसी इंडिया सर्विसेज पीएमआई के ताजा आंकड़ों के अनुसार, माल ढुलाई, डिजिटल सेवाओं, मनोरंजन, ई-कॉमर्स और आईटी सेवाओं की मांग में लगातार वृद्धि दर्ज की गई, जिसके कारण कंपनियों के नए ऑर्डरों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई। इस बढ़त के चलते सेवा क्षेत्र की कंपनियों ने अपनी कारोबारी गतिविधियों को तेज किया और उत्पादन क्षमता में विस्तार किया।

    रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि नए कारोबार में वृद्धि के साथ-साथ रोजगार के अवसरों में भी सुधार हुआ है। सेवा क्षेत्र की कंपनियों ने मई में कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने का सिलसिला जारी रखा, जिससे यह संकेत मिलता है कि मांग में बढ़ोतरी के चलते कंपनियां विस्तार की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। हालांकि, सर्वे में शामिल अधिकांश कंपनियों ने अपने स्टाफ स्तर में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया, लेकिन एक छोटे हिस्से ने नई भर्तियां की हैं।

    अर्थशास्त्रियों के अनुसार, भारत के सेवा क्षेत्र में लागत का दबाव अभी भी बना हुआ है, लेकिन मई में इसमें हल्की कमी देखी गई है। यह पिछले चार महीनों में सबसे निचला स्तर है। लागत दबाव में कमी आने से कंपनियों पर सेवाओं की कीमत बढ़ाने का दबाव भी कम हुआ है। इसी कारण मई में सेवाओं की कीमतों में वृद्धि की गति भी जनवरी के बाद सबसे धीमी रही।

    एचएसबीसी की चीफ इंडिया इकोनॉमिस्ट प्रांजुल भंडारी के अनुसार, मई में सेवा क्षेत्र में विस्तार का मुख्य कारण नए ऑर्डरों की लगातार बढ़ती संख्या रही। उन्होंने कहा कि घरेलू मांग के साथ-साथ विदेशी बाजारों से भी सेवाओं की मांग में सुधार देखने को मिला है। अप्रैल में आई गिरावट के बाद निर्यात आधारित सेवाओं में अच्छी रिकवरी दर्ज की गई, जिससे कुल कारोबार को मजबूती मिली।

    रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि भारत की सेवाओं की मांग कई अंतरराष्ट्रीय बाजारों से मजबूत रही, जिनमें ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, हांगकांग, मलेशिया, संयुक्त अरब अमीरात और यूनाइटेड किंगडम शामिल हैं। हालांकि, विदेशी मांग की वृद्धि दर कुल घरेलू बिक्री की तुलना में थोड़ी कम रही और यह 2025 के औसत से नीचे रही, फिर भी इसमें स्थिरता बनी रही।

    कुल मिलाकर, सेवा क्षेत्र में इस तेजी को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। आईटी और डिजिटल सेवाओं की मजबूत मांग, ई-कॉमर्स का विस्तार और वैश्विक स्तर पर बढ़ती सेवाओं की जरूरत भारत के सेवा उद्योग को नई ऊंचाइयों की ओर ले जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही रफ्तार जारी रही तो आने वाले महीनों में रोजगार और निवेश दोनों में और अधिक सुधार देखने को मिल सकता है।

  • चीनी अरबपति झांग यिमिंग बने एशिया के सबसे अमीर व्यक्ति, मुकेश अंबानी को छोड़ा पीछे

    चीनी अरबपति झांग यिमिंग बने एशिया के सबसे अमीर व्यक्ति, मुकेश अंबानी को छोड़ा पीछे


    नई दिल्ली।
    बाइटडांस कंपनी (ByteDance Company) की कीमत बढ़ने और उसके एआई चैटबॉट (AI Chatbot) की सफलता से झांग यिमिंग (Zhang Yiming) मुकेश अंबानी (Mukesh Ambani) को पीछे छोड़कर एशिया के दूसरे सबसे अमीर बन गए हैं। ब्लूमबर्ग के मुताबिक, झांग के पास अब 92.8 अरब डॉलर हैं। वह चीन के सबसे अमीर व्यक्ति हैं। 2019 में उनके पास सिर्फ 13 अरब डॉलर थे। यानी उनकी दौलत सात गुना से भी ज्यादा बढ़ गई है। बता दें 117 अरब डॉलर के नेटवर्थ के साथ गौतम अडानी (Gautam Adani) दुनिया के अरबपतियों की लिस्ट में तो 17वें स्थान पर हैं, लेकिन उनके सिर पर एशिया के सबसे अमीर व्यक्ति का ताज बरकरार है।

    पहले मुकेश अंबानी के सिर पर कई वर्षों तक एशिया के सबसे रईस का ताज था। कुछ महीने पहले ही इनसे यह ताज अडानी ने छीन लिया और अंबानी एशिया के दूसरे नंबर के रईस बन गए। अब यह पोजीशन भी उनकी चली गई।


    दुनिया के अमीरों में घटा अंबानी का रुतबा

    यही नहीं, दुनिया के अरबपतियों की लिस्ट में अंबानी अब 4 पायदान नीचे 25वें स्थान पर चले गए हैं। इसकी वजह एक ही दिन में झांग की दौलत में 24.1 अरब डॉलर की छलांग, जेफ यास की दौलत में 7.56 अरब डॉलर, डेविड सुन की दौलत में 2.75 अरब डॉलर और झान तू की दौलत में 2.75 अरब डॉलर की उछाल है। ये चारों अब अंबानी से ऊपर पहुंच गए हैं।


    झांग को 24 अरब डॉलर का फायदा

    ब्लूमबर्ग ने ब्लैकरॉक, फिडेलिटी, टी. रो प्राइस, एचएसजी और जनरल अटलांटिक जैसे निवेशकों के मूल्यांकन देखे। इसके बाद झांग की दौलत में 24 अरब डॉलर से अधिक का उछाल आया।


    टिकटॉक और दोउबाओ ने दिया मौका

    झांक के ऊपर अचानक हुई डॉलर की बारिश यूं ही नहीं हुई। इसमें टिकटॉक ऐप की लोकप्रियता और एआई चैटबॉट ‘दोउबाओ’ का बड़ा योगदान है। दोउबाओ हर महीने 30 करोड़ लोग इस्तेमाल करते हैं। यह चीन का सबसे पसंदीदा चैटबॉट है। बाइटडांस ने इसी साल अपने अमेरिका के कुछ कामकाज वहां के निवेशकों को बेच भी दिए थे।


    चीन की सबसे बड़ी निजी कंपनी

    बाइटडांस चीन की सबसे चर्चित निजी कंपनी है। दोउबाओ इतना सफल हुआ कि कंपनी अब उसके लिए पैसे लेने की तैयारी कर रही है। चीन में लोग ऑनलाइन सेवाओं के लिए पैसे देने को तैयार नहीं होते, इसलिए यह बड़ी बात है। कंपनी को भविष्य में शेयर बाजार में उतरने की भी उम्मीद है।


    अमेरिका में टिकटॉक का मामला सुलझा

    टिकटॉक के अमेरिकी व्यापार को ओरेकल, सिल्वर लेक और अबू धाबी के एमजीएक्स को दे दिया गया। इससे कई सालों से चली आ रही अनिश्चितता खत्म हुई। आलोचक टिकटॉक को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बता रहे थे।


    एआई पर बड़ा दांव

    अब बाइटडांस एआई पर जोर लगा रहा है। ब्लूमबर्ग की खबर के अनुसार, कंपनी इस साल 70 अरब डॉलर तक खर्च करने की बात कर रही है। इससे चीन के एआई बाजार में कंपनी सबसे आगे रहेगी और अमेरिकी कंपनियों को टक्कर देगी। यह पैसा 2025 में कंपनी द्वारा कमाए गए करीब 50 अरब डॉलर के मुनाफे से आएगा।

  • अदाणी समूह का बड़ा दांव: FY26 में सबसे अधिक कैपेक्स, इंफ्रास्ट्रक्चर और ग्रीन एनर्जी पर फोकस

    अदाणी समूह का बड़ा दांव: FY26 में सबसे अधिक कैपेक्स, इंफ्रास्ट्रक्चर और ग्रीन एनर्जी पर फोकस

    नई दिल्ली । देश के प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर और यूटिलिटी समूहों में शामिल अदाणी पोर्टफोलियो ने वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान पूंजीगत निवेश के क्षेत्र में नया रिकॉर्ड स्थापित किया है। समूह ने इस अवधि में करीब 1.53 लाख करोड़ रुपये का कैपेक्स किया, जिसे किसी भी भारतीय कॉर्पोरेट समूह द्वारा एक वित्तीय वर्ष में किया गया सबसे बड़ा निवेश बताया जा रहा है। इस निवेश के साथ समूह का कुल परिसंपत्ति आधार भी उल्लेखनीय रूप से बढ़कर 7.85 लाख करोड़ रुपये से अधिक पहुंच गया है। यह वृद्धि ऐसे समय में दर्ज की गई है जब देश में बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर विकास और ऊर्जा परिवर्तन परियोजनाओं पर जोर दिया जा रहा है।

    समूह के वित्तीय प्रदर्शन में भी मजबूती देखने को मिली। वित्त वर्ष 2025-26 में ईबीआईटीडीए बढ़कर लगभग 94,834 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में बेहतर प्रदर्शन को दर्शाता है। इस आय में ऊर्जा, यूटिलिटी, परिवहन और लॉजिस्टिक्स जैसे मुख्य इंफ्रास्ट्रक्चर कारोबारों की सबसे बड़ी हिस्सेदारी रही। समूह का मानना है कि मजबूत परिचालन प्रदर्शन और दीर्घकालिक निवेश रणनीति भविष्य में भी विकास की गति बनाए रखने में मदद करेगी।

    कैपेक्स का बड़ा हिस्सा ऊर्जा और यूटिलिटी सेक्टर में लगाया गया, जहां नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के विस्तार पर विशेष ध्यान दिया गया। वित्त वर्ष के दौरान 5 गीगावाट से अधिक नई रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता जोड़ी गई, जिससे समूह की कुल परिचालन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। इसके साथ ही बैटरी ऊर्जा भंडारण परियोजनाओं को भी विस्तार दिया गया है, जो भविष्य की ऊर्जा जरूरतों और ग्रीन ट्रांजिशन रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जा रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा क्षेत्र में यह निवेश आने वाले वर्षों में समूह के राजस्व और नकदी प्रवाह को मजबूत आधार प्रदान कर सकता है।

    परिवहन और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में भी कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं आगे बढ़ीं। नए एयरपोर्ट, एक्सप्रेसवे और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क के विकास से समूह ने अपने इंफ्रास्ट्रक्चर पोर्टफोलियो को और व्यापक बनाया है। एयरपोर्ट कारोबार में यात्रियों की संख्या में वृद्धि दर्ज की गई, जबकि बंदरगाह कारोबार में कार्गो हैंडलिंग वॉल्यूम ने भी नया स्तर हासिल किया। वैश्विक विस्तार की दिशा में भी कदम बढ़ाते हुए समूह ने विदेशों में रणनीतिक परिसंपत्तियों के अधिग्रहण और विस्तार पर ध्यान केंद्रित किया है।

    वित्तीय मोर्चे पर समूह ने नकदी स्थिति और ऋण प्रबंधन को भी मजबूत बनाए रखा है। बेहतर क्रेडिट प्रोफाइल और वित्तीय अनुशासन के कारण उधारी लागत में कमी दर्ज की गई है। इसके अलावा इक्विटी आधारित वित्तपोषण पर जोर देकर समूह ने अपनी बैलेंस शीट को अपेक्षाकृत स्थिर बनाए रखने की रणनीति अपनाई है। विशेषज्ञों के अनुसार, बड़े निवेश चक्र के बावजूद ऋण और नकदी के बीच संतुलन बनाए रखना किसी भी इंफ्रास्ट्रक्चर समूह के लिए महत्वपूर्ण होता है और यही पहलू निवेशकों का भरोसा बढ़ाता है।

    आने वाले वर्षों में इन परियोजनाओं के पूरी तरह परिचालन में आने के बाद समूह की आय, लाभ और नकदी प्रवाह में और वृद्धि देखने को मिल सकती है। भारत में तेजी से बढ़ती ऊर्जा मांग, शहरीकरण और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास की जरूरतों के बीच इस तरह के बड़े निवेश देश की आर्थिक गतिविधियों को भी नई गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

  • डिजिटल पेमेंट्स का विस्तार: कंबोडिया के 45 लाख व्यापारिक साझेदारों पर चलेगा भारतीय UPI

    डिजिटल पेमेंट्स का विस्तार: कंबोडिया के 45 लाख व्यापारिक साझेदारों पर चलेगा भारतीय UPI

    नई दिल्ली । भारत की डिजिटल भुगतान प्रणाली यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया की अंतरराष्ट्रीय इकाई एनपीसीआई इंटरनेशनल पेमेंट्स लिमिटेड (NIPL) ने कंबोडिया की राष्ट्रीय क्यूआर कोड भुगतान प्रणाली KHQR के साथ साझेदारी कर वहां UPI भुगतान सेवा शुरू कर दी है। इस पहल के साथ भारतीय यात्री अब कंबोडिया में अपने परिचित डिजिटल भुगतान माध्यम का उपयोग करते हुए आसानी से लेनदेन कर सकेंगे। यह कदम भारत के तेजी से विस्तार कर रहे डिजिटल भुगतान नेटवर्क को वैश्विक स्तर पर और मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    इस सेवा की औपचारिक शुरुआत कंबोडिया की राजधानी नोम पेन्ह में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान की गई। इस अवसर पर दोनों देशों के वित्तीय और बैंकिंग क्षेत्र के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। नई व्यवस्था के तहत भारत के UPI उपयोगकर्ता अपने मोबाइल भुगतान एप्लिकेशन के माध्यम से कंबोडिया में KHQR से जुड़े व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर सीधे भुगतान कर सकेंगे। इससे भारतीय पर्यटकों, व्यापारिक यात्रियों और अन्य आगंतुकों को विदेशी मुद्रा विनिमय या नकद भुगतान की जटिलताओं से काफी राहत मिलेगी।

    इस परियोजना के पहले चरण में भारतीय ग्राहकों को कंबोडिया के 45 लाख से अधिक व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर भुगतान की सुविधा मिलेगी। इनमें होटल, रेस्तरां, पर्यटन स्थल, शॉपिंग सेंटर और रिटेल स्टोर जैसे अनेक व्यवसाय शामिल हैं। इससे यात्रियों को न केवल तेज और सुरक्षित भुगतान का अनुभव मिलेगा, बल्कि स्थानीय व्यापारियों को भी भारत के विशाल डिजिटल भुगतान उपभोक्ता आधार तक पहुंचने का अवसर प्राप्त होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे पर्यटन और व्यापारिक गतिविधियों को भी सकारात्मक बढ़ावा मिलेगा।

    परियोजना का दूसरा चरण और भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसके तहत भविष्य में कंबोडिया के नागरिक अपने घरेलू बैंकिंग या डिजिटल भुगतान एप्लिकेशन का उपयोग करते हुए भारत में मौजूद लाखों UPI क्यूआर कोड आधारित व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर भुगतान कर सकेंगे। इस प्रकार दोनों देशों के बीच एक द्विपक्षीय और पूरी तरह इंटरऑपरेबल डिजिटल भुगतान नेटवर्क विकसित होगा, जो सीमा-पार लेनदेन को पहले से अधिक सहज और प्रभावी बनाएगा। यह मॉडल भविष्य में अन्य देशों के साथ भी डिजिटल भुगतान सहयोग का आधार बन सकता है।

    डिजिटल भुगतान क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि यह पहल रियल-टाइम भुगतान प्रणाली को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जोड़ने की दिशा में एक बड़ा कदम है। इससे भुगतान प्रक्रिया अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और सुविधाजनक बनेगी। साथ ही स्थानीय व्यापारियों को नकदी प्रबंधन की आवश्यकता कम होगी, परिचालन लागत में कमी आएगी और डिजिटल अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी। यह व्यवस्था छोटे और मध्यम व्यवसायों के लिए भी नए अवसर पैदा कर सकती है, जो अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों तक पहुंच बनाना चाहते हैं।

    भारत ने पिछले कुछ वर्षों में UPI को एक वैश्विक डिजिटल भुगतान ब्रांड के रूप में स्थापित करने की दिशा में लगातार काम किया है। विभिन्न देशों के साथ साझेदारी और सीमा-पार भुगतान नेटवर्क के विस्तार से भारतीय फिनटेक इकोसिस्टम को भी नई पहचान मिल रही है। कंबोडिया में UPI की शुरुआत इसी रणनीति का हिस्सा है, जो भारत को वैश्विक डिजिटल भुगतान नवाचार के अग्रणी देशों में शामिल करने की दिशा में एक और मजबूत कदम साबित हो सकती है।

  • अमेरिका-ईरान तनाव का असर: एक महीने में पेट्रोल-डीजल 7.5 रुपए तक महंगा, एलपीजी भी उछला

    अमेरिका-ईरान तनाव का असर: एक महीने में पेट्रोल-डीजल 7.5 रुपए तक महंगा, एलपीजी भी उछला

    नई दिल्ली । अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिका-ईरान संघर्ष का असर अब भारतीय उपभोक्ताओं की जेब पर भी साफ दिखाई देने लगा है। पिछले एक महीने के दौरान देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जबकि कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर भी महंगा हो गया है। ऊर्जा बाजार में बनी अनिश्चितता और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के कारण ईंधन लागत लगातार बढ़ रही है, जिसका सीधा असर परिवहन, व्यापार और दैनिक जीवन पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

    राजधानी दिल्ली में बीते एक महीने के दौरान पेट्रोल की कीमत में कुल 7.35 रुपए प्रति लीटर की वृद्धि हुई है। इसके बाद पेट्रोल का दाम 94.77 रुपए प्रति लीटर से बढ़कर 102.12 रुपए प्रति लीटर पहुंच गया है। इस अवधि में सरकार ने चार अलग-अलग चरणों में ईंधन कीमतों में संशोधन किया। 15 मई को पेट्रोल के दाम में 3 रुपए प्रति लीटर की वृद्धि की गई, जबकि 19 और 23 मई को 0.87-0.87 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई। इसके बाद 25 मई को फिर 2.61 रुपए प्रति लीटर का इजाफा किया गया। लगातार हुई इन बढ़ोतरी ने उपभोक्ताओं के मासिक बजट पर अतिरिक्त दबाव बढ़ा दिया है।

    डीजल की कीमतों में भी लगभग इसी तरह की वृद्धि दर्ज की गई है। दिल्ली में डीजल का दाम 87.67 रुपए प्रति लीटर से बढ़कर 95.20 रुपए प्रति लीटर हो गया है। कुल मिलाकर डीजल 7.53 रुपए प्रति लीटर महंगा हुआ है। 15 मई को इसमें 3 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई थी, जबकि 19 और 23 मई को 0.91-0.91 रुपए प्रति लीटर की वृद्धि दर्ज की गई। इसके बाद 25 मई को डीजल के दाम में 2.71 रुपए प्रति लीटर का इजाफा किया गया। डीजल कीमतों में बढ़ोतरी का असर माल ढुलाई, कृषि गतिविधियों और सार्वजनिक परिवहन पर भी पड़ सकता है, जिससे कई वस्तुओं की लागत बढ़ने की संभावना है।

    ईंधन के साथ-साथ कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर भी महंगा हुआ है। दिल्ली में 19 किलोग्राम वाले कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमत बढ़कर 3,113.50 रुपए तक पहुंच गई है। एक जून को सिलेंडर के दाम में 42 रुपए की नई बढ़ोतरी की गई। खास बात यह है कि जनवरी से अब तक कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में 1,400 रुपए से अधिक की वृद्धि दर्ज की जा चुकी है। वर्ष की शुरुआत में इसकी कीमत 1,691.50 रुपए थी, जो अब दोगुने के करीब पहुंच चुकी है। इसका असर होटल, रेस्तरां, कैटरिंग और छोटे व्यवसायों की लागत पर पड़ सकता है।

    हालांकि घरेलू बाजार में ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद भारत अभी भी कई देशों की तुलना में अपेक्षाकृत कम कीमत पर पेट्रोल और डीजल उपलब्ध करा रहा है। विकसित अर्थव्यवस्थाओं में पेट्रोल की खुदरा कीमतें 150 रुपए प्रति लीटर से ऊपर बताई जा रही हैं, जबकि कई देशों में यह 180 रुपए प्रति लीटर से भी अधिक है। यूरोपीय संघ के देशों में पेट्रोल और डीजल दोनों की औसत कीमत भारत की तुलना में काफी ज्यादा है। वहीं पड़ोसी देशों पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार और फिलीपींस में भी पेट्रोल की कीमतें भारतीय स्तर से ऊपर बनी हुई हैं।

    वैश्विक ऊर्जा बाजार में जारी अस्थिरता का असर भारत के ईंधन बाजार पर लगातार दिखाई दे रहा है। यदि अंतरराष्ट्रीय तनाव लंबे समय तक बना रहता है, तो आने वाले महीनों में परिवहन लागत और महंगाई पर अतिरिक्त दबाव देखने को मिल सकता है।

  • पेट्रोल की कीमतों का रहस्य: अंतरराष्ट्रीय गिरावट का फायदा क्यों नहीं मिल रहा?

    पेट्रोल की कीमतों का रहस्य: अंतरराष्ट्रीय गिरावट का फायदा क्यों नहीं मिल रहा?


    नई दिल्ली । दुनिया भर के बाजारों में कच्चे तेल यानी क्रूड ऑयल की कीमतों में गिरावट देखी जा रही है, लेकिन इसका फायदा भारतीय उपभोक्ताओं को तुरंत नहीं मिल रहा है। यही कारण है कि आम लोगों के मन में सवाल उठ रहा है कि जब ब्रेंट क्रूड सस्ता हो रहा है तो देश में पेट्रोल और डीजल महंगा क्यों हो रहा है।

    दरअसल, अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल 98 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ चुका है, जिससे यह उम्मीद थी कि भारत में ईंधन सस्ता होगा। लेकिन इसके उलट हाल के हफ्तों में पेट्रोल और डीजल के दामों में कई बार बढ़ोतरी देखने को मिली है। रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले कुछ दिनों में पेट्रोल की कीमत में प्रति लीटर कई रुपये की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

    इस स्थिति की एक बड़ी वजह तेल कंपनियों की मूल्य नीति और उनका वित्तीय संतुलन है। भारत की प्रमुख तेल कंपनियां जैसे Indian Oil Corporation, Bharat Petroleum Corporation Limited और Hindustan Petroleum Corporation Limited पहले वैश्विक बाजार में तेल महंगा होने के बावजूद कीमतें तुरंत नहीं बढ़ा पाईं थीं। उस समय कंपनियों ने उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए खुद घाटा सहा था। अब माना जा रहा है कि वे उसी पुराने नुकसान की भरपाई कर रही हैं।

    इसके अलावा भारत की तेल आयात पर भारी निर्भरता भी कीमतों को प्रभावित करती है। देश अपनी जरूरत का लगभग 85 से 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, जिससे वैश्विक बाजार में मामूली उतार-चढ़ाव भी घरेलू कीमतों पर सीधा असर डालता है।

    एक और अहम कारण है डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी। भारत कच्चे तेल का भुगतान अमेरिकी डॉलर में करता है, इसलिए जब रुपया कमजोर होता है तो आयात महंगा हो जाता है। इसका असर सीधे पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर पड़ता है, भले ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता क्यों न हो रहा हो।

    कीमतों में टैक्स का भी बड़ा योगदान होता है। पेट्रोल और डीजल के दाम सिर्फ कच्चे तेल पर निर्भर नहीं करते, बल्कि इसमें केंद्र और राज्य सरकारों के एक्साइज ड्यूटी और वैट जैसे टैक्स भी शामिल होते हैं। यही टैक्स अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचने वाली कीमत को काफी बढ़ा देते हैं।

    इसके अलावा ट्रांसपोर्टेशन खर्च, डीलर कमीशन और लॉजिस्टिक्स लागत भी अंतिम कीमत में जुड़ते हैं। इन सभी कारकों के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में गिरावट का असर तुरंत भारतीय बाजार में नहीं दिखता।

    विशेषज्ञों के अनुसार, जब तक वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें और नीचे नहीं आतीं, रुपया मजबूत नहीं होता और टैक्स संरचना में राहत नहीं मिलती, तब तक पेट्रोल-डीजल के दामों में बड़ी कमी की उम्मीद करना मुश्किल है।