Category: Economy

  • जलवायु संकट और बढ़ती कृषि चुनौतियों के बीच भारत का संदेश, छोटे किसानों को मजबूत किए बिना सुरक्षित नहीं होगा खाद्य भविष्य

    जलवायु संकट और बढ़ती कृषि चुनौतियों के बीच भारत का संदेश, छोटे किसानों को मजबूत किए बिना सुरक्षित नहीं होगा खाद्य भविष्य

    नई दिल्ली । वैश्विक स्तर पर खाद्य सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन और कृषि क्षेत्र की बढ़ती चुनौतियों के बीच भारत ने ब्रिक्स देशों से छोटे और सीमांत किसानों को सशक्त बनाने के लिए सामूहिक प्रयास तेज करने का आह्वान किया है। भारत का मानना है कि दुनिया की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने और टिकाऊ कृषि विकास सुनिश्चित करने के लिए किसानों को आर्थिक, तकनीकी और संस्थागत रूप से सक्षम बनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

    इंदौर में आयोजित ब्रिक्स देशों के कृषि मंत्रियों के दो दिवसीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि सदस्य देशों के बीच गहरा सहयोग वैश्विक कृषि व्यवस्था को नई दिशा दे सकता है। उन्होंने कहा कि यदि ब्रिक्स देश अपनी सामूहिक क्षमता, अनुभव और संसाधनों का प्रभावी उपयोग करें तो कृषि क्षेत्र में सकारात्मक और दूरगामी बदलाव संभव हैं।

    उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में कृषि क्षेत्र अनेक जटिल चुनौतियों का सामना कर रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम की अनिश्चितता बढ़ रही है, प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है, उत्पादन लागत में वृद्धि हो रही है और वैश्विक कृषि बाजारों में अस्थिरता किसानों के लिए नई कठिनाइयां पैदा कर रही है। इन परिस्थितियों में छोटे किसानों की सुरक्षा और समृद्धि को प्राथमिकता देना आवश्यक हो गया है।

    कृषि मंत्री ने कहा कि दुनिया के अधिकांश देशों में छोटे और सीमांत किसान खाद्य उत्पादन की रीढ़ हैं। यदि इन्हें आधुनिक तकनीक, वित्तीय सहायता, बेहतर बाजार और नवाचार आधारित कृषि प्रणालियों तक पहुंच मिलती है तो न केवल उनकी आय बढ़ेगी, बल्कि वैश्विक खाद्य आपूर्ति श्रृंखला भी अधिक मजबूत और स्थिर बनेगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि किसानों का सशक्तिकरण ही खाद्य सुरक्षा की सबसे मजबूत नींव है।

    भारत की कृषि उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए चौहान ने कहा कि पिछले एक दशक में देश के कृषि क्षेत्र ने लगातार उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। उन्होंने बताया कि कृषि क्षेत्र की औसत वार्षिक वृद्धि दर लगभग 4.5 प्रतिशत रही है, जो इस क्षेत्र की मजबूती और क्षमता को दर्शाती है। खाद्यान्न उत्पादन में निरंतर वृद्धि ने देश को आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाया है।

    उन्होंने जानकारी दी कि भारत का कुल खाद्यान्न उत्पादन लगभग 376 मिलियन टन तक पहुंच चुका है। वहीं गेहूं उत्पादन करीब 118 मिलियन टन के स्तर पर पहुंच गया है। बागवानी क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई है और इसका उत्पादन 378 मिलियन टन से अधिक हो चुका है। इसके अलावा मत्स्य उत्पादन 19 मिलियन टन के आंकड़े को पार कर गया है, जो कृषि से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक विकास का संकेत है।

    सम्मेलन के दौरान मंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की कृषि नीति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की प्रतिबद्धता को भी रेखांकित किया। उन्होंने ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत पूरी दुनिया को एक परिवार के रूप में देखता है और कृषि क्षेत्र में साझा प्रगति का समर्थन करता है।

    चौहान ने कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम संचालित कर रहा है, जिसके माध्यम से करोड़ों लोगों को खाद्यान्न उपलब्ध कराया जा रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि देश की लगभग 43 प्रतिशत कार्यशक्ति कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों पर निर्भर है, जिससे यह क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बना हुआ है।

    उन्होंने विशेष रूप से इस तथ्य पर जोर दिया कि भारत के लगभग 87 प्रतिशत किसान छोटे और सीमांत वर्ग से आते हैं। ऐसे में उनकी आय, उत्पादकता और संसाधनों तक पहुंच बढ़ाना केवल राष्ट्रीय नहीं बल्कि वैश्विक खाद्य सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत का मानना है कि ब्रिक्स देशों का साझा सहयोग कृषि क्षेत्र को अधिक टिकाऊ, समावेशी और भविष्य के लिए तैयार बना सकता है।

  • आईडीएफसी बैंक फंड दुरुपयोग मामले में सीबीआई की बड़ी कार्रवाई, हरियाणा और चंडीगढ़ प्रकरणों में 9 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल

    आईडीएफसी बैंक फंड दुरुपयोग मामले में सीबीआई की बड़ी कार्रवाई, हरियाणा और चंडीगढ़ प्रकरणों में 9 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल

    नई दिल्ली । हरियाणा सरकार और चंडीगढ़ स्मार्ट सिटी लिमिटेड के फंड के कथित दुरुपयोग से जुड़े मामलों में केंद्रीय जांच ब्यूरो ने जांच को आगे बढ़ाते हुए नौ आरोपियों के खिलाफ विशेष अदालतों में चार्जशीट दाखिल कर दी है। एजेंसी के अनुसार इन मामलों में सरकारी अधिकारियों, बैंक कर्मचारियों और निजी व्यक्तियों की कथित मिलीभगत के जरिए सरकारी धन के अनुचित उपयोग और वित्तीय अनियमितताओं को अंजाम दिया गया।

    सीबीआई द्वारा दाखिल आरोपपत्रों के अनुसार हरियाणा सरकार से जुड़े मामले में अवैध बैंकिंग लेन-देन के कारण लगभग 504 करोड़ रुपये का वित्तीय नुकसान हुआ। वहीं चंडीगढ़ स्मार्ट सिटी लिमिटेड से जुड़े मामले में करीब 153 करोड़ रुपये की धनराशि प्रभावित होने का दावा किया गया है। दोनों मामलों को मिलाकर कथित अनियमितताओं का आंकड़ा 650 करोड़ रुपये से अधिक पहुंचता है।

    जांच एजेंसी ने कहा है कि आरोपियों के खिलाफ आपराधिक साजिश, आपराधिक विश्वासघात, जालसाजी और धोखाधड़ी जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इसके साथ ही भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं को भी आरोपपत्र में शामिल किया गया है। एजेंसी का कहना है कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों की भूमिका का विस्तृत विश्लेषण किया गया है और आगे की जांच भी जारी रहेगी।

    हरियाणा सरकार से जुड़े मामले में दाखिल चार्जशीट पंचकूला स्थित विशेष सीबीआई अदालत में प्रस्तुत की गई है। इस मामले में दो निजी व्यक्तियों को कथित रूप से अपराध से अर्जित धन का लाभार्थी बताते हुए आरोपी बनाया गया है। यह इस प्रकरण में दाखिल दूसरी चार्जशीट है। इससे पहले एजेंसी 15 अन्य आरोपियों के खिलाफ भी आरोपपत्र दाखिल कर चुकी है, जिनमें सरकारी कर्मचारी, बैंक अधिकारी, निजी कंपनियां और अन्य व्यक्ति शामिल थे।

    दूसरी ओर चंडीगढ़ स्मार्ट सिटी लिमिटेड से जुड़े मामले में पहली बार आरोपपत्र दाखिल किया गया है। चंडीगढ़ स्थित विशेष अदालत में प्रस्तुत इस चार्जशीट में सात आरोपियों को नामजद किया गया है। इनमें पांच बैंक अधिकारी, स्मार्ट सिटी परियोजना से जुड़ा एक अधिकारी तथा एक निजी व्यक्ति शामिल हैं। एजेंसी का आरोप है कि वित्तीय लेन-देन की प्रक्रिया में नियमों का उल्लंघन करते हुए सरकारी धन को अनुचित तरीके से स्थानांतरित किया गया।

    सीबीआई के अनुसार इन मामलों की जांच विभिन्न एजेंसियों से प्राप्त शिकायतों और प्राथमिक जांच रिपोर्टों के आधार पर शुरू की गई थी। हरियाणा के कई सरकारी विभागों से जुड़े मामलों की जांच राज्य सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक तंत्र से सीबीआई को सौंपी गई थी। वहीं चंडीगढ़ में आर्थिक अपराध से जुड़े मामलों की जांच भी बाद में केंद्रीय एजेंसी के हवाले की गई।

    जांच के दौरान एजेंसी ने हाल ही में चंडीगढ़, पंचकूला और दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में कई स्थानों पर तलाशी अभियान चलाया था। इन छापों के दौरान कुछ सरकारी अधिकारियों के आवासों, निजी कंपनियों और संबंधित व्यक्तियों के परिसरों की जांच की गई। एजेंसी का उद्देश्य वित्तीय लेन-देन से जुड़े दस्तावेजों, डिजिटल रिकॉर्ड और कथित तौर पर अपराध से अर्जित धन के प्रवाह की जानकारी जुटाना था।

    सीबीआई का दावा है कि जांच में ऐसे संकेत मिले हैं जिनसे पता चलता है कि कुछ सरकारी अधिकारियों और बैंक कर्मचारियों ने आपसी समन्वय के साथ खातों के संचालन, धन हस्तांतरण और रकम को विभिन्न माध्यमों से आगे भेजने में भूमिका निभाई। एजेंसी अब वित्तीय लेन-देन की पूरी श्रृंखला को खंगाल रही है ताकि कथित अनियमितताओं के सभी पहलुओं को सामने लाया जा सके।

    जांच एजेंसी ने स्पष्ट किया है कि यह प्रक्रिया अभी समाप्त नहीं हुई है और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर भविष्य में अतिरिक्त आरोपपत्र भी दाखिल किए जा सकते हैं। मामले की सुनवाई विशेष अदालतों में आगे बढ़ेगी, जहां प्रस्तुत साक्ष्यों और आरोपों की न्यायिक जांच की जाएगी।

  • तेल कंपनियों को रोजाना 500 करोड़ रुपये की चोट, सरकार ने डीजल बिक्री पर लगाई बड़ी रोक, 90 दिन के लिए नए नियम लागू

    तेल कंपनियों को रोजाना 500 करोड़ रुपये की चोट, सरकार ने डीजल बिक्री पर लगाई बड़ी रोक, 90 दिन के लिए नए नियम लागू

    नई दिल्ली । वैश्विक ऊर्जा बाजार में जारी अस्थिरता और बढ़ती कच्चे तेल की कीमतों के बीच केंद्र सरकार ने डीजल वितरण व्यवस्था में बड़ा बदलाव करते हुए रिटेल आउटलेट्स से बल्क डीजल बिक्री पर रोक लगाने का फैसला किया है। सरकार का मानना है कि इस कदम से सरकारी तेल कंपनियों को राहत मिलेगी, जो वर्तमान परिस्थितियों में प्रतिदिन सैकड़ों करोड़ रुपये की अंडर रिकवरी का सामना कर रही हैं।

    नए प्रावधानों के तहत देशभर के पेट्रोल पंपों पर डीजल की बिक्री को लेकर सख्त नियम लागू किए गए हैं। अब डीजल केवल वाहनों के ईंधन टैंक या अधिकृत और स्वीकृत कंटेनरों में ही दिया जा सकेगा। साथ ही प्रति वाहन या ग्राहक प्रतिदिन अधिकतम 200 लीटर डीजल खरीदने की सीमा तय की गई है। सरकार ने यह व्यवस्था प्रारंभिक रूप से 90 दिनों के लिए लागू की है।

    सरकार का कहना है कि हाल के महीनों में डीजल की रिटेल कीमत और बल्क आपूर्ति कीमत के बीच बड़ा अंतर देखने को मिला। इसका लाभ उठाते हुए कई औद्योगिक, व्यावसायिक और संस्थागत उपभोक्ता निर्धारित चैनलों की बजाय सामान्य पेट्रोल पंपों से डीजल खरीदने लगे थे। इससे सरकारी तेल विपणन कंपनियों पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव बढ़ गया था।

    ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े जानकारों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊंची कीमतों के बावजूद घरेलू स्तर पर उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए डीजल की कीमतों को नियंत्रित रखा गया। यही कारण रहा कि रिटेल स्तर पर मिलने वाला डीजल बल्क आपूर्ति के मुकाबले काफी सस्ता पड़ रहा था। इस मूल्य अंतर ने बड़े उपभोक्ताओं को रिटेल आउटलेट्स की ओर आकर्षित किया, जिससे सामान्य उपभोक्ताओं के लिए उपलब्धता प्रभावित होने का जोखिम बढ़ गया।

    सरकारी आंकड़ों के अनुसार, कई जिलों में डीजल की मांग में असामान्य वृद्धि दर्ज की गई है। बड़ी मात्रा में डीजल खरीदकर उसके पुनर्विक्रय और अनधिकृत उपयोग की शिकायतें भी सामने आईं। कुछ मामलों में जेरी कैन और अन्य कंटेनरों के माध्यम से बड़ी मात्रा में डीजल खरीदे जाने की जानकारी मिली, जिसके बाद सरकार ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए यह कदम उठाया।

    नए नियमों के तहत औद्योगिक, संस्थागत और वाणिज्यिक उपभोक्ताओं को अब निर्धारित उपभोक्ता पंपों से ही डीजल प्राप्त करना होगा। रिटेल आउटलेट्स से खरीदे गए डीजल के पुनर्विक्रय पर भी स्पष्ट रूप से रोक लगा दी गई है। सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सब्सिडी या राहत आधारित मूल्य व्यवस्था का लाभ केवल वास्तविक उपभोक्ताओं तक पहुंचे।

    विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से सरकारी तेल कंपनियों के वित्तीय दबाव में कुछ कमी आ सकती है। साथ ही डीजल की उपलब्धता को लेकर पैदा हो रही असंतुलित स्थिति भी नियंत्रित होगी। हालांकि उद्योग जगत के कुछ वर्गों को नई व्यवस्था के अनुसार अपनी खरीद प्रणाली में बदलाव करना पड़ सकता है।

    सरकार ने राज्य प्रशासन, तेल कंपनियों और पेट्रोल पंप संचालकों को नियमों के प्रभावी पालन के निर्देश दिए हैं। कालाबाजारी, अनधिकृत भंडारण और ईंधन के गलत उपयोग पर निगरानी बढ़ाने के लिए भी संबंधित एजेंसियों को सक्रिय किया गया है। आने वाले महीनों में इस व्यवस्था के प्रभाव का आकलन किया जाएगा और आवश्यकता पड़ने पर आगे की रणनीति तय की जाएगी।

  • न्यूक्लियर सेक्टर को कर राहत का तोहफा: सरकार ने पूर्व प्रभाव से कस्टम ड्यूटी माफी दी, ऊर्जा परियोजनाओं की लागत घटने की उम्मीद

    न्यूक्लियर सेक्टर को कर राहत का तोहफा: सरकार ने पूर्व प्रभाव से कस्टम ड्यूटी माफी दी, ऊर्जा परियोजनाओं की लागत घटने की उम्मीद

    नई दिल्ली । केंद्र सरकार ने देश में परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को प्रोत्साहन देने और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन को मजबूत बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए परमाणु बिजली उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले कुछ विशेष आयातित सामानों पर कस्टम ड्यूटी से छूट प्रदान कर दी है। सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार यह राहत 1 अप्रैल 2019 से 31 जनवरी 2026 तक की अवधि के लिए प्रभावी मानी जाएगी, जिससे इस दौरान किए गए पात्र आयातों पर सीमा शुल्क देनदारी समाप्त हो जाएगी।

    सरकारी निर्णय के तहत गैर-विकिरणित फ्यूल एलिमेंट्स तथा परमाणु रिएक्टरों में उपयोग किए जाने वाले विशेष कार्ट्रिज जैसे महत्वपूर्ण उपकरणों और सामग्रियों के आयात पर कस्टम ड्यूटी नहीं लगेगी। ये सामग्री परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के संचालन और बिजली उत्पादन प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ऐसे में यह कदम परमाणु ऊर्जा क्षेत्र की परिचालन लागत को कम करने में सहायक माना जा रहा है।

    सरकार का कहना है कि इन उत्पादों के आयात पर शुल्क नहीं लेने की व्यवस्था लंबे समय से व्यवहारिक रूप से लागू थी, लेकिन अब इसे औपचारिक वैधानिक मान्यता प्रदान की गई है। इससे संबंधित संस्थानों और कंपनियों को पूर्व अवधि के आयातों के संबंध में किसी प्रकार की कर अनिश्चितता या अतिरिक्त वित्तीय दायित्व का सामना नहीं करना पड़ेगा।

    इस फैसले का सबसे अधिक लाभ न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड को मिलने की संभावना है, जो देश के विभिन्न परमाणु बिजली संयंत्रों के लिए आवश्यक ईंधन असेंबली और तकनीकी सामग्री का आयात करती है। इसके अतिरिक्त, परमाणु ऊर्जा क्षेत्र से जुड़ी अन्य एजेंसियों और सहयोगी संस्थानों को भी इस राहत का लाभ प्राप्त होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे परियोजनाओं की लागत में कमी आएगी और भविष्य में निवेश का वातावरण अधिक अनुकूल बनेगा।

    भारत वर्तमान समय में ऊर्जा सुरक्षा और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन दोनों लक्ष्यों को समान प्राथमिकता दे रहा है। बढ़ती ऊर्जा मांग, जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने की आवश्यकता तथा कार्बन उत्सर्जन में कमी के वैश्विक लक्ष्यों को देखते हुए परमाणु ऊर्जा को एक महत्वपूर्ण विकल्प माना जा रहा है। यही कारण है कि सरकार लगातार इस क्षेत्र में निवेश, तकनीकी उन्नयन और नीतिगत समर्थन बढ़ाने पर जोर दे रही है।

    विशेषज्ञों के अनुसार परमाणु ऊर्जा स्थिर और बड़े पैमाने पर बिजली उत्पादन का ऐसा स्रोत है जो मौसम संबंधी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं रहता। सौर और पवन ऊर्जा के साथ संतुलन बनाते हुए यह देश के ऊर्जा मिश्रण को अधिक मजबूत और विश्वसनीय बना सकता है। ऐसे में आयातित महत्वपूर्ण सामग्रियों पर कर छूट का यह निर्णय राष्ट्रीय ऊर्जा रणनीति के व्यापक लक्ष्यों के अनुरूप माना जा रहा है।

    उल्लेखनीय है कि हाल ही में सरकार ने अधिक एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल पर भी उत्पाद शुल्क को शून्य करने का निर्णय लिया था। 22 प्रतिशत से 30 प्रतिशत तक एथेनॉल मिश्रण वाले मोटर स्पिरिट को इस राहत के दायरे में लाया गया है। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि सरकार ऊर्जा क्षेत्र में वैकल्पिक और स्वच्छ स्रोतों को बढ़ावा देने के लिए कर संबंधी नीतियों का सक्रिय उपयोग कर रही है। परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को मिली यह नई राहत भी उसी व्यापक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है, जिसका उद्देश्य देश को अधिक टिकाऊ, सुरक्षित और आत्मनिर्भर ऊर्जा व्यवस्था की ओर अग्रसर करना है।

  • मध्य पूर्व में शांति समझौते की उम्मीद से चमकी बुलियन मार्केट, सोना 1.50 लाख के पार तो चांदी ने भी दिखाई जोरदार तेजी

    मध्य पूर्व में शांति समझौते की उम्मीद से चमकी बुलियन मार्केट, सोना 1.50 लाख के पार तो चांदी ने भी दिखाई जोरदार तेजी

    नई दिल्ली । मध्य पूर्व में लंबे समय से जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच शांति समझौते की संभावनाओं ने वैश्विक वित्तीय बाजारों में नई ऊर्जा का संचार किया है। इसी सकारात्मक माहौल का असर भारतीय कमोडिटी बाजार में भी दिखाई दिया, जहां सप्ताह के अंतिम कारोबारी दिन सोने और चांदी की कीमतों में उल्लेखनीय बढ़त दर्ज की गई। निवेशकों के बीच बढ़े विश्वास और वैश्विक जोखिम धारणा में सुधार के कारण दोनों कीमती धातुओं में खरीदारी का रुझान मजबूत रहा।

    शुक्रवार सुबह मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज पर अगस्त डिलीवरी वाले सोने के वायदा भाव में तेजी देखने को मिली। कारोबार की शुरुआत से ही सोना मजबूत स्तर पर खुला और दिन के शुरुआती सत्र में 1.50 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के महत्वपूर्ण स्तर को पार कर गया। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्तर निवेशकों की मनोवैज्ञानिक धारणा के लिहाज से काफी अहम माना जाता है और इसके ऊपर टिके रहना बाजार की मजबूती का संकेत देता है।

    चांदी के बाजार में भी इसी तरह का रुख देखने को मिला। जुलाई डिलीवरी वाली चांदी ने मजबूत शुरुआत की और कारोबार के दौरान 2.40 लाख रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर से ऊपर पहुंच गई। औद्योगिक मांग, निवेशकों की दिलचस्पी और वैश्विक बाजारों में सुधरते संकेतों ने चांदी को भी मजबूती प्रदान की। बाजार विश्लेषकों के अनुसार चांदी में फिलहाल रिकवरी का क्रम जारी है, हालांकि इसमें उतार-चढ़ाव की संभावना बनी हुई है।

    कीमती धातुओं में यह तेजी उस समय सामने आई है जब अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं। हालिया बयानों के बाद दोनों देशों के बीच तनाव कम होने की उम्मीद बढ़ी है। इससे वैश्विक निवेशकों के बीच जोखिम लेने की क्षमता में सुधार हुआ है, जिसका प्रभाव शेयर बाजारों के साथ-साथ कमोडिटी बाजारों पर भी दिखाई दिया।

    बुलियन बाजार के आंकड़ों के अनुसार शुद्धता के आधार पर सोने और चांदी की कीमतों में भी मजबूती बनी हुई है। घरेलू बाजार में कीमती धातुओं की मांग और अंतरराष्ट्रीय संकेतों के संयुक्त प्रभाव से निवेशकों की रुचि लगातार बनी हुई है। बाजार में यह धारणा मजबूत हुई है कि यदि वैश्विक परिस्थितियां स्थिर रहती हैं तो आने वाले समय में कीमतों को और समर्थन मिल सकता है।

    तकनीकी विश्लेषण के अनुसार सोने के लिए 1.52 लाख रुपये का स्तर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि कीमतें इस स्तर के ऊपर स्थिर रहने में सफल होती हैं तो आगे और तेजी देखने को मिल सकती है। दूसरी ओर, 1.50 लाख रुपये से नीचे फिसलने की स्थिति में मुनाफावसूली और बिकवाली का दबाव बढ़ सकता है। इसी तरह चांदी के लिए 2.48 लाख से 2.51 लाख रुपये का दायरा प्रमुख प्रतिरोध क्षेत्र माना जा रहा है। इस स्तर को पार करने पर तेजी और मजबूत हो सकती है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले दिनों में वैश्विक राजनीतिक घटनाक्रम, निवेशकों की जोखिम धारणा, मुद्रा बाजार की चाल और सुरक्षित निवेश की मांग सोने तथा चांदी की कीमतों को प्रभावित करती रहेगी। फिलहाल दोनों धातुओं का निकट अवधि का रुख सकारात्मक दिखाई दे रहा है, हालांकि निवेशकों को अंतरराष्ट्रीय घटनाओं पर लगातार नजर बनाए रखने की आवश्यकता होगी।

  • ब्रांड एंबेसडर से निवेशक तक का सफर, रोहित शर्मा ने FITTR में हिस्सेदारी लेकर हेल्थ और वेलनेस सेक्टर पर जताया भरोसा

    ब्रांड एंबेसडर से निवेशक तक का सफर, रोहित शर्मा ने FITTR में हिस्सेदारी लेकर हेल्थ और वेलनेस सेक्टर पर जताया भरोसा

    नई दिल्ली । भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान रोहित शर्मा ने फिटनेस और हेल्थ टेक्नोलॉजी क्षेत्र में अपनी भागीदारी को नया विस्तार देते हुए FITTR में निवेशक और इक्विटी पार्टनर के रूप में प्रवेश किया है। इस कदम को भारत में तेजी से बढ़ रहे हेल्थ और वेलनेस सेक्टर के लिए एक महत्वपूर्ण विकास माना जा रहा है। इससे पहले रोहित शर्मा कंपनी के पहले ब्रांड एंबेसडर के रूप में जुड़े हुए थे, लेकिन अब उन्होंने कंपनी की विकास यात्रा में प्रत्यक्ष भागीदारी का फैसला किया है।

    कंपनी और रोहित शर्मा के बीच यह साझेदारी केवल व्यावसायिक निवेश तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका केंद्र लोगों को बेहतर स्वास्थ्य, नियमित व्यायाम और संतुलित जीवनशैली के प्रति प्रेरित करना भी है। पिछले कुछ वर्षों में जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों में तेजी से वृद्धि देखने को मिली है। ऐसे समय में फिटनेस और निवारक स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक लोगों तक पहुंचाने का प्रयास इस साझेदारी की प्रमुख विशेषता माना जा रहा है।

    जानकारी के अनुसार, निवेश का निर्णय लेने से पहले रोहित शर्मा ने कई महीनों तक कंपनी के संस्थापक और नेतृत्व टीम के साथ विस्तृत चर्चा की। इस दौरान उन्होंने कंपनी के बिजनेस मॉडल, कार्यप्रणाली, दीर्घकालिक रणनीति और विस्तार योजनाओं को करीब से समझा। कंपनी के संचालन और भविष्य की संभावनाओं का मूल्यांकन करने के बाद ही उन्होंने निवेशक बनने का फैसला किया।

    कंपनी के संस्थापक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी जितेंद्र चौकसे का मानना है कि आधुनिक जीवनशैली के कारण स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। उनका कहना है कि लोगों को फिर से व्यायाम, संतुलित आहार और अनुशासित दिनचर्या जैसी मूलभूत आदतों को अपनाने की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी कहा कि अच्छी सेहत का कोई त्वरित विकल्प नहीं होता और दीर्घकालिक परिणाम केवल नियमित प्रयासों से ही प्राप्त किए जा सकते हैं।

    रोहित शर्मा ने भी इस साझेदारी को अपने व्यक्तिगत विश्वास और पेशेवर अनुभव से जुड़ा निर्णय बताया। उनका कहना है कि किसी भी संस्था में निवेश करने से पहले उसकी सोच, उद्देश्य और विकास क्षमता को समझना आवश्यक होता है। FITTR के साथ समय बिताने के दौरान उन्हें यह महसूस हुआ कि कंपनी केवल व्यवसायिक विस्तार पर नहीं, बल्कि लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के लक्ष्य पर भी काम कर रही है।

    उन्होंने कहा कि कंपनी की मजबूत बुनियाद, स्पष्ट दृष्टिकोण और स्वास्थ्य क्षेत्र में दीर्घकालिक प्रभाव पैदा करने की क्षमता ने उन्हें प्रभावित किया। इसी कारण उन्होंने ब्रांड एंबेसडर की भूमिका से आगे बढ़कर निवेशक और इक्विटी पार्टनर बनने का निर्णय लिया।

    विशेषज्ञों का मानना है कि किसी लोकप्रिय खिलाड़ी की सक्रिय भागीदारी से फिटनेस और हेल्थ प्लेटफॉर्म को व्यापक पहचान मिलती है। इससे आम लोगों के बीच स्वास्थ्य जागरूकता बढ़ाने के प्रयासों को भी मजबूती मिल सकती है। रोहित शर्मा जैसे प्रतिष्ठित खिलाड़ी का जुड़ाव कंपनी के लिए विश्वसनीयता और पहुंच दोनों के स्तर पर लाभकारी साबित हो सकता है।

    कंपनी का लक्ष्य आने वाले समय में अपने निवारक स्वास्थ्य तंत्र का विस्तार करना और अधिक लोगों को स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित करना है। रोहित शर्मा की नई भूमिका को इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जो फिटनेस और स्वास्थ्य जागरूकता को जन-जन तक पहुंचाने में सहायक साबित हो सकती है।

  • 15 जून का दुर्लभ ग्रह संयोग चमकाएगा किस्मत, बुधादित्य राजयोग से 4 राशियों को मिलेगा विशेष लाभ

    15 जून का दुर्लभ ग्रह संयोग चमकाएगा किस्मत, बुधादित्य राजयोग से 4 राशियों को मिलेगा विशेष लाभ


    नई दिल्ली। वैदिक ज्योतिष के अनुसार 15 जून को एक महत्वपूर्ण ग्रह परिवर्तन होने जा रहा है। ग्रहों के राजा सूर्य वृषभ राशि से निकलकर मिथुन राशि में प्रवेश करेंगे, जहां पहले से ही बुध देव विराजमान हैं। सूर्य और बुध की युति से अत्यंत शुभ बुधादित्य राजयोग का निर्माण होगा, जिसे करियर, प्रतिष्ठा, बुद्धि और आर्थिक उन्नति के लिए विशेष फलदायी माना जाता है।

    ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस योग के शुरुआती चरण में चंद्रमा की उपस्थिति से त्रिग्रही योग का प्रभाव भी बनेगा, जिससे इसका शुभ असर और बढ़ जाएगा। इस महासंयोग का सबसे अधिक लाभ चार राशियों के जातकों को मिलने की संभावना है।

    मेष राशि: करियर में तरक्की और कारोबार में लाभ के संकेत
    मेष राशि के जातकों के लिए यह योग कार्यक्षेत्र में नए अवसर लेकर आ सकता है। नौकरीपेशा लोगों को पदोन्नति और वेतन वृद्धि मिलने के योग हैं, जबकि नई नौकरी की तलाश कर रहे लोगों को भी सफलता मिल सकती है।

    व्यापार से जुड़े लोगों के लिए यह समय नई शुरुआत और विस्तार के लिहाज से अनुकूल माना जा रहा है। बाजार में प्रतिष्ठा बढ़ेगी और लाभ के अवसर मजबूत होंगे। साथ ही स्वास्थ्य संबंधी पुरानी परेशानियों में भी राहत मिलने की संभावना है।

    वृषभ राशि: अटके काम बनेंगे, भाग्य देगा साथ
    वृषभ राशि वालों के लिए यह राजयोग लंबे समय से रुके हुए कार्यों को गति दे सकता है। सरकारी प्रक्रियाओं या अन्य कारणों से अटके मामलों के समाधान के संकेत हैं।

    प्रतियोगी परीक्षाओं और सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों को मेहनत का सकारात्मक परिणाम मिल सकता है। इसके अलावा धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों में रुचि बढ़ेगी तथा लंबी दूरी की यात्राओं के योग भी बन सकते हैं।

    मिथुन राशि: आत्मविश्वास बढ़ेगा, मिलेगा मान-सम्मान
    मिथुन राशि में ही यह बुधादित्य राजयोग बनने से इस राशि के जातकों को विशेष लाभ मिलने की संभावना है। कार्यस्थल पर नेतृत्व क्षमता उभरकर सामने आएगी और वरिष्ठ अधिकारियों से सराहना प्राप्त हो सकती है।

    व्यापार में बड़ी डील या नया अवसर मिलने के संकेत हैं। आर्थिक मामलों में अचानक लाभ हो सकता है और अटका हुआ धन वापस मिलने की संभावना भी बन रही है। इस दौरान व्यक्तित्व में आकर्षण बढ़ेगा और संवाद कौशल से लोगों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

    सिंह राशि: आय में वृद्धि और पारिवारिक सुख
    सूर्य की स्वामित्व वाली सिंह राशि के लिए यह ग्रह संयोग बेहद शुभ माना जा रहा है। आय के नए स्रोत बनने से आर्थिक स्थिति मजबूत हो सकती है और धन संचय के अवसर बढ़ेंगे।

    पारिवारिक जीवन में चल रही समस्याएं दूर होने के संकेत हैं। जीवनसाथी का सहयोग मिलेगा और रिश्तों में मधुरता आएगी। वहीं निवेश की योजना बना रहे लोगों के लिए भी यह समय अनुकूल माना जा रहा है।

    ज्योतिषीय दृष्टि से महत्वपूर्ण रहेगा यह संयोग
    ज्योतिष शास्त्र में बुधादित्य राजयोग को बुद्धिमत्ता, नेतृत्व क्षमता, आर्थिक प्रगति और सामाजिक प्रतिष्ठा का कारक माना जाता है। 15 जून को बनने वाला यह विशेष ग्रह संयोग कई लोगों के लिए नए अवसर और सकारात्मक बदलाव लेकर आ सकता है।

  • बिजली बिल में 30% तक कटौती का नया फॉर्मूला, उद्योगों ने पारंपरिक सप्लाई छोड़ हरित ऊर्जा की ओर बढ़ाए कदम

    बिजली बिल में 30% तक कटौती का नया फॉर्मूला, उद्योगों ने पारंपरिक सप्लाई छोड़ हरित ऊर्जा की ओर बढ़ाए कदम

    नई दिल्ली । देश का औद्योगिक और वाणिज्यिक क्षेत्र बिजली खरीदने की पारंपरिक व्यवस्था से तेजी से दूरी बनाता दिखाई दे रहा है। बढ़ती ऊर्जा लागत और प्रतिस्पर्धी बाजार के दबाव के बीच बड़ी कंपनियां अब सस्ती, स्थिर और दीर्घकालिक बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए हरित ऊर्जा विकल्पों को प्राथमिकता दे रही हैं। इसका परिणाम यह है कि सौर और पवन ऊर्जा आधारित परियोजनाओं में कॉरपोरेट निवेश लगातार बढ़ रहा है और ऊर्जा क्षेत्र की तस्वीर तेजी से बदल रही है।

    फैक्ट्रियों, आईटी कंपनियों, कॉरपोरेट कार्यालयों और बड़े डेटा सेंटरों की बिजली आवश्यकता लगातार बढ़ रही है। ऐसे में केवल पारंपरिक बिजली आपूर्ति पर निर्भर रहना कई कंपनियों के लिए महंगा साबित हो रहा है। यही वजह है कि अब वे सीधे नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादकों से बिजली खरीदने के विकल्प तलाश रही हैं। इससे न केवल बिजली की लागत कम हो रही है बल्कि लंबे समय के लिए ऊर्जा सुरक्षा भी सुनिश्चित हो रही है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि उद्योगों और व्यावसायिक उपभोक्ताओं की कुल बिजली मांग देश की कुल खपत का लगभग आधा हिस्सा है। इसके बावजूद इस मांग का बड़ा भाग अभी भी पारंपरिक स्रोतों से पूरा किया जाता है। यही कारण है कि हरित ऊर्जा क्षेत्र में विस्तार की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं। आने वाले वर्षों में औद्योगिक क्षेत्र की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा नवीकरणीय स्रोतों से पूरा होने की संभावना जताई जा रही है।

    हरित ऊर्जा की ओर बढ़ते रुझान का सबसे बड़ा कारण आर्थिक लाभ है। कंपनियों को सौर और पवन परियोजनाओं के माध्यम से मिलने वाली बिजली पारंपरिक बिजली की तुलना में काफी सस्ती पड़ती है। इससे बिजली बिल में उल्लेखनीय कमी आती है और उत्पादन लागत पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। बढ़ती प्रतिस्पर्धा के दौर में लागत नियंत्रण किसी भी उद्योग के लिए महत्वपूर्ण रणनीति बन चुका है, इसलिए ऊर्जा क्षेत्र में यह बदलाव स्वाभाविक माना जा रहा है।

    ओपन एक्सेस मॉडल इस परिवर्तन का प्रमुख आधार बनकर उभरा है। इस व्यवस्था के तहत कंपनियां सीधे बिजली उत्पादकों से ऊर्जा खरीद सकती हैं। इससे उन्हें वितरण प्रणाली की कुछ पारंपरिक सीमाओं से राहत मिलती है और अपनी जरूरतों के अनुसार ऊर्जा स्रोत चुनने की स्वतंत्रता भी प्राप्त होती है। पिछले कुछ वर्षों में इस मॉडल की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है और इसे उद्योग जगत में भविष्य की व्यवस्था के रूप में देखा जा रहा है।

    डेटा सेंटर क्षेत्र इस बदलाव का सबसे बड़ा लाभार्थी और प्रेरक दोनों बनकर सामने आया है। डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ डेटा सेंटरों की संख्या और क्षमता लगातार बढ़ रही है। इन संस्थानों के लिए बिजली सबसे महत्वपूर्ण परिचालन लागतों में से एक है। साथ ही उन्हें चौबीसों घंटे निर्बाध बिजली की आवश्यकता होती है। इसी कारण डेटा सेंटर संचालक नवीकरणीय ऊर्जा, बैटरी स्टोरेज और हाइब्रिड ऊर्जा समाधानों की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं।

    हालांकि इस क्षेत्र में कुछ चुनौतियां भी मौजूद हैं। विभिन्न राज्यों में नियमों और शुल्क संरचनाओं में बदलाव से परियोजनाओं की व्यवहारिकता प्रभावित हो सकती है। इसके बावजूद नई तकनीकें, बैटरी भंडारण व्यवस्था और ऊर्जा प्रबंधन प्रणालियां इन चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत कर रही हैं।

    ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत में हरित ऊर्जा आधारित औद्योगिक विकास और तेज होगा। लागत में बचत, ऊर्जा सुरक्षा, बढ़ता डिजिटल बुनियादी ढांचा और नीतिगत समर्थन इस बदलाव को नई गति प्रदान करेंगे। परिणामस्वरूप देश का औद्योगिक ऊर्जा परिदृश्य पहले की तुलना में अधिक स्वच्छ, प्रतिस्पर्धी और टिकाऊ बनने की दिशा में आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है।

  • अमेरिका-ईरान तनाव से डगमगाया निवेशकों का भरोसा, तेल कीमतों में उछाल के बीच गिरावट के साथ खुले सेंसेक्स और निफ्टी

    अमेरिका-ईरान तनाव से डगमगाया निवेशकों का भरोसा, तेल कीमतों में उछाल के बीच गिरावट के साथ खुले सेंसेक्स और निफ्टी

    नई दिल्ली । वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी दिखाई दिया। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती तनातनी तथा कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल के कारण घरेलू निवेशकों का रुख सतर्क नजर आया। कारोबार की शुरुआत में ही प्रमुख शेयर सूचकांकों पर दबाव देखने को मिला और बाजार गिरावट के साथ खुला।

    विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ती अनिश्चितता ने वैश्विक निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। ऊर्जा आपूर्ति को लेकर पैदा हुई आशंकाओं के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है, जिसका सीधा प्रभाव उन देशों पर पड़ता है जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं। भारत भी दुनिया के प्रमुख तेल आयातक देशों में शामिल है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में होने वाली हर बड़ी हलचल का असर घरेलू वित्तीय बाजारों पर दिखाई देता है।

    बाजार में शुरुआती कमजोरी के पीछे वैश्विक संकेत भी एक प्रमुख कारण रहे। विदेशी बाजारों में निवेशकों ने बढ़ते तनाव और महंगाई से जुड़ी चिंताओं के बीच जोखिम वाले निवेशों से दूरी बनाई। इसका प्रभाव एशियाई और भारतीय बाजारों पर भी पड़ा। निवेशकों ने सुरक्षित विकल्पों की ओर रुख किया, जिससे इक्विटी बाजारों में दबाव बढ़ गया।

    तेल कीमतों में तेजी ने बाजार की चिंता को और बढ़ा दिया। ऊर्जा लागत बढ़ने से महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है, जिसका असर कंपनियों की लागत और उपभोक्ता खर्च दोनों पर पड़ता है। यही वजह है कि तेल कीमतों में उछाल को निवेशक अर्थव्यवस्था और कॉर्पोरेट आय के लिए एक महत्वपूर्ण जोखिम के रूप में देखते हैं।

    सेक्टोरल प्रदर्शन पर नजर डालें तो ऊर्जा और तेल उत्पादन से जुड़ी कंपनियों में अपेक्षाकृत मजबूती दिखाई दी। बढ़ती तेल कीमतों से इन कंपनियों को संभावित लाभ मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। दूसरी ओर सूचना प्रौद्योगिकी और कुछ उपभोक्ता आधारित क्षेत्रों के शेयरों में दबाव देखा गया। निवेशक फिलहाल वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों और ब्याज दरों से जुड़े संकेतों का भी आकलन कर रहे हैं।

    विशेषज्ञों का कहना है कि बाजार की मौजूदा कमजोरी मुख्य रूप से अनिश्चितता से प्रेरित है। यदि पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ता है तो कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी देखने को मिल सकती है, जिससे वैश्विक वित्तीय बाजारों पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है। वहीं यदि कूटनीतिक प्रयास सफल रहते हैं और हालात सामान्य होते हैं तो बाजारों में स्थिरता लौटने की संभावना भी बनी रहेगी।

    भारत जैसे तेजी से बढ़ते आर्थिक ढांचे के लिए ऊर्जा लागत एक महत्वपूर्ण कारक है। तेल कीमतों में लंबे समय तक बढ़ोतरी रहने से आयात बिल बढ़ सकता है और महंगाई पर असर पड़ सकता है। यही कारण है कि निवेशक केवल शेयर बाजार के आंकड़ों पर नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर भी बारीकी से नजर रखे हुए हैं।

    फिलहाल बाजार की दिशा काफी हद तक वैश्विक परिस्थितियों, तेल कीमतों की चाल और निवेशकों के जोखिम लेने के रुझान पर निर्भर करेगी। आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया से जुड़ी खबरें और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संकेतक बाजार की चाल तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

  • घर खरीदारों के लिए बढ़ सकती है इंतजार की घड़ी, वैश्विक संकट के असर से लाखों मकानों की डिलीवरी पर मंडराया खतरा

    घर खरीदारों के लिए बढ़ सकती है इंतजार की घड़ी, वैश्विक संकट के असर से लाखों मकानों की डिलीवरी पर मंडराया खतरा


    नई दिल्ली ।
    देश का रियल एस्टेट क्षेत्र वर्ष 2026 में एक महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहा है। पिछले कुछ वर्षों में लॉन्च की गई बड़ी आवासीय परियोजनाएं अब अपने अंतिम निर्माण चरण में पहुंच चुकी हैं और लाखों घर खरीदार अपने सपनों के घर का कब्जा मिलने का इंतजार कर रहे हैं। हालांकि वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और सप्लाई चेन से जुड़ी चुनौतियों ने इस उम्मीद के सामने नई अनिश्चितताएं खड़ी कर दी हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय हालात का असर अब केवल ऊर्जा और व्यापार तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसका प्रभाव रियल एस्टेट क्षेत्र पर भी दिखाई देने लगा है। यदि वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था में बाधाएं लंबे समय तक बनी रहती हैं तो निर्माण कार्यों की गति प्रभावित हो सकती है, जिससे कई परियोजनाओं की डिलीवरी तय समय पर नहीं हो पाएगी।

    देश के सात प्रमुख महानगरों में इस वर्ष बड़ी संख्या में आवासीय इकाइयों का निर्माण पूरा होने की उम्मीद है। इनमें दिल्ली-एनसीआर, मुंबई महानगर क्षेत्र, पुणे, बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद और कोलकाता जैसे बड़े आवासीय बाजार शामिल हैं। इन शहरों में हजारों परियोजनाएं अंतिम चरण में हैं और डेवलपर्स खरीदारों को समय पर घर सौंपने की तैयारी कर रहे हैं।

    विशेष रूप से मुंबई महानगर क्षेत्र और पुणे को लेकर अधिक चिंता जताई जा रही है। इन दोनों शहरों में सबसे अधिक आवासीय इकाइयों की डिलीवरी प्रस्तावित है। ऐसे में यदि निर्माण सामग्री की उपलब्धता प्रभावित होती है या लागत में तेज वृद्धि होती है, तो इन बाजारों पर सबसे पहले असर देखने को मिल सकता है। बड़ी परियोजनाओं की संख्या अधिक होने के कारण यहां किसी भी प्रकार की देरी का प्रभाव हजारों परिवारों तक पहुंच सकता है।

    दक्षिण भारत के प्रमुख शहर भी इससे अछूते नहीं हैं। बेंगलुरु, हैदराबाद और चेन्नई में भी बड़ी संख्या में आवासीय परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं। यदि सप्लाई चेन में व्यवधान बना रहता है, तो इन शहरों में भी परियोजनाओं की गति धीमी पड़ सकती है। इसका सीधा असर उन खरीदारों पर होगा जो लंबे समय से अपने घर का इंतजार कर रहे हैं।

    रियल एस्टेट विशेषज्ञों के अनुसार निर्माण क्षेत्र स्टील, एल्युमीनियम, सीमेंट, मशीनरी और परिवहन सेवाओं पर काफी हद तक निर्भर करता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऊर्जा कीमतों में वृद्धि होने पर इन सभी क्षेत्रों की लागत बढ़ जाती है। जब निर्माण लागत बढ़ती है तो परियोजनाओं के बजट और समयसीमा दोनों प्रभावित हो सकते हैं। यही वजह है कि डेवलपर्स मौजूदा परिस्थितियों पर करीबी नजर बनाए हुए हैं।

    हालांकि उद्योग जगत का मानना है कि वर्तमान स्थिति महामारी काल जैसी नहीं है। आज डेवलपर्स की वित्तीय स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत है और परियोजना प्रबंधन में तकनीक का उपयोग भी बढ़ा है। इसके बावजूद वैश्विक आर्थिक और भू-राजनीतिक जोखिमों को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लंबे समय तक बने रहने वाले संकट से निर्माण क्षेत्र पर दबाव बढ़ सकता है।

    एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू नियामकीय व्यवस्था भी है। रेरा जैसे नियमों के कारण डेवलपर्स पर तय समय में परियोजनाएं पूरी करने का दबाव रहता है। यदि लागत बढ़ती है या सप्लाई बाधित होती है, तो समयसीमा का पालन करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ऐसे में आने वाले महीनों में रियल एस्टेट क्षेत्र की दिशा काफी हद तक वैश्विक परिस्थितियों और आपूर्ति व्यवस्था की स्थिरता पर निर्भर करेगी।