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  • वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच तेजी से बढ़ रही भारत की अर्थव्यवस्था 7% रहेगी GDP ग्रोथ

    वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच तेजी से बढ़ रही भारत की अर्थव्यवस्था 7% रहेगी GDP ग्रोथ


    नई दिल्ली।
    भारत (India) की अर्थव्यवस्था (Economy) वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भी मजबूत वृद्धि दर्ज कर सकती है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund- IMF) ने वर्ष 2026 और 2027, दोनों में भारत की GDP ग्रोथ 7 फीसदी रहने का अनुमान जताया है। इसके मुकाबले वैश्विक अर्थव्यवस्था की विकास दर 2026 में 3.1 फीसदी और 2027 में 3.4 प्रतिशत रहने की संभावना है। हालांकि, ऊर्जा और खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतें, सरकारी कर्ज और वित्तीय जोखिम दुनिया की अर्थव्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती बने हुए हैं।

    IMF ने AI में बढ़ते निवेश को ग्लोबल ग्रोथ के संभावित सहारे के रूप में देखा है। कंप्यूटिंग हार्डवेयर, डेटा सेंटर और AI तकनीक पर खर्च बढ़ने से आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहन मिल रहा है। लंबे समय में यह तकनीक उत्पादकता बढ़ाने, कामकाज की लागत घटाने और कारोबार की दक्षता सुधारने में मदद कर सकती है।


    मूडीज, एसएंडपी, वर्ल्ड बैंक और फिच भी बढ़ा चुके हैं अनुमान

    इससे पहले मूडीज रेटिंग्स, उसके बाद एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स और विश्व बैंक (World Bank) ने भी भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर अपना अनुमान बढ़ा चुके हैं। वर्ल्ड बैंक ने चालू वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की GDP ग्रोथ 7.1% रहने का अनुमान जताया है। इससे पहले इसने भारत की आर्थिक वृद्धि दर 6.6% रहने का अनुमान लगाया था।

    पिछले महीने मूडीज ने भी जीडीपी ग्रोथ का अनुमान 1 प्रतिशत बढ़ाकर 7 प्रतिशत किया, जबकि एसएंडपी ने अपने अनुमान में 0.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी की। फिच ने भी पिछले महीने भारत के ग्रोथ का अनुमान 6.4 से 6.9% किया था।


    IMF ने चेताया

    IMF के मुताबिक, वैश्विक अर्थव्यवस्था अब तक लगातार आर्थिक झटकों के बावजूद मजबूती से आगे बढ़ी है, लेकिन यह मजबूती पहले के मुकाबले अधिक नाजुक और असमान होती जा रही है। IMF ने चेतावनी दी है कि एनर्जी सप्लाई में रुकावटें लंबे समय तक बनी रहीं तो आर्थिक विकास पर दबाव बढ़ सकता है। वहीं, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) में निवेश से उत्पादकता बढ़ने और आर्थिक गतिविधियों को नई गति मिलने की उम्मीद है।


    दुनिया के मुकाबले भारत की ग्रोथ दोगुने से ज्यादा

    IMF के अनुमान के मुताबिक, भारत की अर्थव्यवस्था की विकास दर 2026 और 2027 में 7 फीसदी रह सकती है। वहीं, वैश्विक अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर इन वर्षों में क्रमशः 3.1 फीसदी और 3.4 फीसदी रहने का अनुमान है। इस तरह भारत की अनुमानित वृद्धि दर वैश्विक औसत से दोगुने से भी अधिक है।


    दुनिया के मुकाबले भारत की ग्रोथ दोगुने से ज्यादा

    IMF के अनुमान के मुताबिक, भारत की अर्थव्यवस्था की विकास दर 2026 और 2027 में 7 प्रतिशत रह सकती है। वहीं, वैश्विक अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर इन वर्षों में क्रमशः 3.1 प्रतिशत और 3.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है। इस तरह भारत की अनुमानित वृद्धि दर दुनिया के औसत से दोगुने से भी अधिक है।


    दुनिया की ग्रोथ 2027 में 3.4% रहने का अनुमान

    IMF के अनुसार, ग्लोबल इकोनॉमिक ग्रोथ रेट 2026 में 3.1 प्रतिशत रहने की उम्मीद है। 2027 में इसके बढ़कर 3.4 प्रतिशत होने का अनुमान है। हालांकि, यह वृद्धि वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने मौजूद जोखिमों को पूरी तरह दूर नहीं करती। फंड का कहना है कि कंपनियां बार-बार आने वाले आर्थिक झटकों के अनुसार खुद को ढाल रही हैं। दूसरी ओर, तकनीकी कंपनियों में निवेश की तेजी ने वित्तीय बाजारों को उम्मीद दी है, लेकिन बाजारों में जोखिमों को कम करके आंकने की आशंका भी बनी हुई है।

  • शेयर बाजार में गिरावट के बाद अब क्या होगा, 13 अक्टूबर को इन बड़े संकेतों से तय होगी सेंसेक्स और निफ्टी की दिशा

    शेयर बाजार में गिरावट के बाद अब क्या होगा, 13 अक्टूबर को इन बड़े संकेतों से तय होगी सेंसेक्स और निफ्टी की दिशा

    नई दिल्ली । निवेशकों के लिए अहम रहेगा मंगलवार का कारोबारी सत्र भारतीय शेयर बाजार में मंगलवार 13 अक्टूबर 2026 को निवेशकों की नजर सेंसेक्स और निफ्टी की चाल पर रहेगी। पिछले कारोबारी सत्र में बाजार में शुरुआती मजबूती के बावजूद बिकवाली का दबाव देखने को मिला। इससे निवेशकों के बीच सतर्कता बढ़ गई है। अब बाजार की दिशा घरेलू आर्थिक संकेतों के साथ वैश्विक बाजारों के रुख पर भी निर्भर करेगी।

    ऐसे में कारोबारियों को मंगलवार के सत्र में जल्दबाजी के बजाय सोच समझकर फैसले लेने की जरूरत होगी। सोमवार को भारतीय बाजार में उतार चढ़ाव देखने को मिला। सेंसेक्स करीब 0.76 प्रतिशत गिरकर 71 हजार 924 अंक के आसपास बंद हुआ जबकि निफ्टी 50 में भी लगभग 0.7 प्रतिशत की कमजोरी दर्ज की गई और यह 22 हजार 400 के स्तर से नीचे चला गया। बाजार में गिरावट के पीछे कच्चे तेल की कीमतों को लेकर चिंता और वैश्विक परिस्थितियों से जुड़ी अनिश्चितता प्रमुख कारण रहे। निवेशक महंगाई के आंकड़ों और ब्याज दरों की आगे की दिशा को लेकर भी सतर्क हैं।

    मंगलवार को बाजार की चाल तय करने वाले प्रमुख कारकों में कच्चे तेल की कीमतें शामिल रहेंगी। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है इसलिए तेल महंगा होने पर कंपनियों की लागत बढ़ सकती है और महंगाई पर दबाव आ सकता है। इसके उलट कच्चे तेल की कीमतों में नरमी बाजार के लिए राहत का संकेत बन सकती है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भू राजनीतिक तनाव और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़ी खबरों पर भी निवेशकों की नजर रहेगी।

    विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी एफआईआई की गतिविधियां भी बाजार के लिए महत्वपूर्ण रहेंगी। हाल के सत्रों में विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली ने बाजार की धारणा पर दबाव बनाया है। हालांकि घरेलू संस्थागत निवेशकों की खरीदारी से कुछ सहारा मिल रहा है। यदि विदेशी निवेशकों की बिकवाली जारी रहती है तो तेजी टिकने में मुश्किल हो सकती है। इसके विपरीत खरीदारी बढ़ने पर बाजार को समर्थन मिल सकता है।

    इस सप्ताह निवेशकों की निगाह महंगाई के आंकड़ों और कंपनियों के दूसरी तिमाही के नतीजों पर भी रहेगी। इन आंकड़ों से अर्थव्यवस्था की स्थिति और कंपनियों के प्रदर्शन को समझने में मदद मिलेगी। मजबूत नतीजे चुनिंदा शेयरों में खरीदारी बढ़ा सकते हैं जबकि कमजोर प्रदर्शन वाले शेयरों पर दबाव आ सकता है। अमेरिकी बाजारों की दिशा डॉलर और रुपये की चाल तथा वैश्विक बॉन्ड यील्ड में बदलाव भी भारतीय बाजार को प्रभावित कर सकते हैं।

    निवेशकों के लिए मंगलवार को सबसे जरूरी बात बाजार के शुरुआती रुख को देखकर तुरंत फैसला नहीं करना है। शुरुआती तेजी के बाद बिकवाली या गिरावट के बाद खरीदारी दोनों स्थितियों में बाजार की मजबूती की पुष्टि देखना जरूरी होगा। केवल अफवाह या सोशल मीडिया पर चल रही किसी खबर के आधार पर शेयर खरीदने से बचना चाहिए। किसी शेयर में निवेश से पहले कंपनी के नतीजे कारोबार की स्थिति और जोखिम का आकलन करना बेहतर होगा।

    कुल मिलाकर 13 अक्टूबर को शेयर बाजार में सतर्क कारोबार रहने की संभावना है। कच्चे तेल में राहत विदेशी निवेशकों की गतिविधियां और महंगाई से जुड़े संकेत बाजार को दिशा दे सकते हैं। हालांकि बाजार की वास्तविक चाल कारोबारी सत्र के दौरान सामने आने वाले आंकड़ों और खबरों पर निर्भर करेगी। निवेशकों को ध्यान रखना चाहिए कि बाजार का अनुमान निश्चित परिणाम नहीं होता इसलिए अपनी जोखिम क्षमता और निवेश अवधि के अनुसार ही फैसला लें।

  • दीवाली से पहले चावल, चीनी और दालों की कीमतों में तेजी, खराब मौसम और महंगी ढुलाई से वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित

    दीवाली से पहले चावल, चीनी और दालों की कीमतों में तेजी, खराब मौसम और महंगी ढुलाई से वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित

    नई दिल्ली ।दीवाली से पहले खाद्य वस्तुओं की बढ़ती कीमतें आम लोगों के घरेलू बजट पर दबाव डाल रही हैं। चावल, चीनी, दाल और खाने के तेल समेत कई कृषि उत्पादों के दाम में तेजी देखी जा रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी इन वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसके पीछे खराब मौसम, फसलों के उत्पादन में संभावित कमी, अंतरराष्ट्रीय तनाव और सामान की ढुलाई महंगी होने जैसे कारण बताए जा रहे हैं। त्योहारों के दौरान खाद्य वस्तुओं की मांग के बीच आपूर्ति प्रभावित होने से कीमतों को लेकर चिंता बढ़ रही है।

    चावल की कीमतों में तेजी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में चावल के दाम पिछले दो वर्षों के उच्च स्तर पर पहुंच गए हैं। इसकी प्रमुख वजह बाजार में आपूर्ति कम होना और माल को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने की लागत बढ़ना बताई जा रही है। कंटेनर के जरिए सामान भेजने का खर्च पांच हजार डॉलर से बढ़कर करीब 55 हजार डॉलर तक पहुंचने का उल्लेख किया गया है। इससे अंतरराष्ट्रीय कारोबार की लागत में बड़ा अंतर आया है और खाद्य वस्तुओं की आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका बढ़ी है।

    खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुमान के अनुसार, दुनिया में चावल का उत्पादन पिछले वर्ष की तुलना में 2.4 प्रतिशत घट सकता है। भारत में भी उत्पादन कम होने का अनुमान जताया गया है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, देश में चावल का उत्पादन 15.4 करोड़ टन से घटकर 14.4 करोड़ टन रह सकता है। वहीं, अंतरराष्ट्रीय बाजार में चावल के वायदा भाव में 30 से 70 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज किए जाने की बात कही गई है। उत्पादन में संभावित गिरावट और आपूर्ति की बढ़ती लागत का असर बाजार की कीमतों पर पड़ रहा है।

    चीनी के बाजार में भी तेजी बनी हुई है। अक्टूबर में कच्ची चीनी के वायदा भाव करीब 8 प्रतिशत बढ़े हैं। वहीं, जुलाई में दर्ज निचले स्तर से कीमतों में लगभग 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। ब्राजील, भारत, थाईलैंड और यूरोपीय संघ में खराब मौसम के कारण चीनी उत्पादन में 10 से 20 प्रतिशत तक की कमी आने की आशंका जताई गई है। यूरोपीय संघ में उत्पादन 19 प्रतिशत और थाईलैंड में 17 प्रतिशत तक घट सकता है। यदि उत्पादन में यह गिरावट आती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी की उपलब्धता पर दबाव बढ़ सकता है।

    खाने के तेल की कीमतों पर भी वैश्विक ऊर्जा बाजार का असर दिखाई दे रहा है। कच्चे तेल की कीमतों से जुड़ी परिस्थितियों के बीच जैव ईंधन की मांग बढ़ रही है। जैव ईंधन बनाने में इस्तेमाल होने वाले वनस्पति तेल की मात्रा भी बढ़ रही है। उपलब्ध अनुमान के मुताबिक, दुनिया में इस्तेमाल होने वाले कुल वनस्पति तेल का लगभग 27 प्रतिशत हिस्सा जैव ईंधन उत्पादन में खर्च हो रहा है। अमेरिकी कृषि विभाग के अनुमान में जैव ईंधन के लिए वनस्पति तेल का इस्तेमाल 30 से 32 प्रतिशत तक बढ़ने की संभावना जताई गई है। इससे खाद्य तेलों की उपलब्धता और कीमतों पर दबाव पड़ सकता है।

    दालों और अन्य कृषि उत्पादों की कीमतों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पिछले एक वर्ष में चने के दाम 23 प्रतिशत, उड़द के 24 प्रतिशत और मटर के 47 प्रतिशत तक बढ़े हैं। इनकी कीमतों में तेजी के पीछे आयात पर अधिक शुल्क को भी एक कारण बताया गया है। इसके अलावा, जौ की कीमतों में 44 प्रतिशत, मक्का में 9 प्रतिशत और चाय में 10 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।

    खराब मौसम के कारण कृषि उत्पादन प्रभावित होने और अंतरराष्ट्रीय तनाव से परिवहन तथा आपूर्ति व्यवस्था में रुकावट आने की स्थिति में महंगाई का दबाव आगे भी बना रह सकता है। चावल, चीनी, दालों और खाद्य तेलों की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी का असर उपभोक्ताओं के खर्च पर पड़ सकता है। हालांकि, आने वाले समय में कीमतें किस दिशा में जाएंगी, यह उत्पादन, उपलब्धता और ढुलाई की लागत में होने वाले बदलावों पर निर्भर करेगा।

  • गोल्ड ईटीएफ में सितंबर के दौरान निवेश 71.4 प्रतिशत बढ़कर 4,451 करोड़ रुपये पहुंचा, इक्विटी फंड और एसआईपी में भी निवेशकों की मजबूत भागीदारी

    गोल्ड ईटीएफ में सितंबर के दौरान निवेश 71.4 प्रतिशत बढ़कर 4,451 करोड़ रुपये पहुंचा, इक्विटी फंड और एसआईपी में भी निवेशकों की मजबूत भागीदारी

    नई दिल्ली ।सितंबर 2026 में गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) में निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ी है। इस दौरान गोल्ड ईटीएफ में शुद्ध निवेश अगस्त के 2,597 करोड़ रुपये से बढ़कर 4,451 करोड़ रुपये हो गया। महीने-दर-महीने आधार पर इसमें 71.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। यह आंकड़ा दर्शाता है कि निवेशकों का रुझान सोने से जुड़े निवेश विकल्पों की ओर बढ़ा है। हालांकि, सोने में निवेश बढ़ने के बावजूद व्यापक म्यूचुअल फंड उद्योग को सितंबर में शुद्ध निकासी का सामना करना पड़ा।

    सितंबर के दौरान पूरे म्यूचुअल फंड उद्योग से कुल 1.33 लाख करोड़ रुपये की शुद्ध निकासी दर्ज की गई। इसके विपरीत, अगस्त में उद्योग में 41,353 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश आया था। इस बड़े बदलाव की प्रमुख वजह फिक्स्ड इनकम से जुड़ी म्यूचुअल फंड योजनाओं से भारी निकासी रही। खासतौर पर डेट म्यूचुअल फंड से निवेशकों ने बड़ी रकम निकाली, जिससे उद्योग के कुल निवेश प्रवाह पर दबाव पड़ा।

    सितंबर में डेट म्यूचुअल फंड योजनाओं से शुद्ध निकासी बढ़कर 1.83 लाख करोड़ रुपये हो गई, जबकि अगस्त में यह आंकड़ा 8,127 करोड़ रुपये था। डेट फंड से इतनी बड़ी निकासी का असर म्यूचुअल फंड उद्योग की कुल प्रबंधन अधीन परिसंपत्तियों यानी एसेट अंडर मैनेजमेंट (एयूएम) पर भी दिखाई दिया। अगस्त में उद्योग का कुल एयूएम 87.08 लाख करोड़ रुपये था, जो सितंबर में घटकर 82.64 लाख करोड़ रुपये रह गया। इस तरह एक महीने में कुल एयूएम में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई।

    दूसरी ओर, इक्विटी म्यूचुअल फंड योजनाओं में निवेशकों की भागीदारी मजबूत बनी रही। सितंबर में इक्विटी फंड में शुद्ध निवेश 30.6 प्रतिशत बढ़कर 38,307 करोड़ रुपये पहुंच गया, जबकि अगस्त में यह 29,328 करोड़ रुपये था। इक्विटी श्रेणी में स्मॉल-कैप फंड निवेशकों की पसंद बने रहे। इन योजनाओं में सितंबर के दौरान 9,039 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश आया, जो अगस्त के 7,973 करोड़ रुपये से अधिक था।

    मिड-कैप फंड में भी निवेश बढ़ा। सितंबर में इन योजनाओं में 7,835 करोड़ रुपये का निवेश दर्ज किया गया, जबकि अगस्त में यह 6,989 करोड़ रुपये था। इसी तरह फ्लेक्सी-कैप फंड में शुद्ध निवेश अगस्त के 5,059 करोड़ रुपये से बढ़कर सितंबर में 6,702 करोड़ रुपये हो गया। सेक्टोरल और थीमैटिक फंड में भी निवेशकों की भागीदारी बढ़ी। इन योजनाओं में सितंबर में 3,640 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश आया, जबकि पिछले महीने यह 1,713 करोड़ रुपये था।

    लार्ज-कैप फंड भी सितंबर में सकारात्मक स्थिति में लौट आए। अगस्त में इन योजनाओं से 1,147 करोड़ रुपये की शुद्ध निकासी हुई थी, लेकिन सितंबर में इनमें 859 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश दर्ज किया गया। वहीं, मल्टी-एसेट एलोकेशन फंड में निवेश लगभग स्थिर रहा। सितंबर में इन योजनाओं को 3,667 करोड़ रुपये मिले, जबकि अगस्त में यह राशि 3,671 करोड़ रुपये थी।

    नियमित निवेश के मामले में सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (एसआईपी) के जरिए योगदान मजबूत बना रहा। सितंबर में मासिक एसआईपी निवेश बढ़कर रिकॉर्ड 32,490 करोड़ रुपये पहुंच गया, जबकि अगस्त में यह 32,297 करोड़ रुपये था। इस तरह गोल्ड ईटीएफ और इक्विटी फंड में बढ़ते निवेश के साथ एसआईपी योगदान ने भी निवेशकों की निरंतर भागीदारी को दर्शाया। वहीं, डेट फंड से भारी निकासी सितंबर के दौरान म्यूचुअल फंड उद्योग की सबसे प्रमुख वित्तीय गतिविधियों में शामिल रही।

  • गोल्डमैन सैश ने ब्रेंट क्रूड का अनुमान बढ़ाकर 90 डॉलर प्रति बैरल किया, पश्चिम एशिया में तनाव से तेल आपूर्ति पर दबाव

    गोल्डमैन सैश ने ब्रेंट क्रूड का अनुमान बढ़ाकर 90 डॉलर प्रति बैरल किया, पश्चिम एशिया में तनाव से तेल आपूर्ति पर दबाव


    नई दिल्ली ।
    वैश्विक निवेश फर्म गोल्डमैन सैश ने दिसंबर 2026 के लिए ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत का अनुमान बढ़ाकर 90 डॉलर प्रति बैरल कर दिया है। इससे पहले यह अनुमान 85 डॉलर प्रति बैरल था। नए अनुमान के मुताबिक कच्चे तेल की संभावित औसत कीमत में करीब 6 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और तेल आपूर्ति से जुड़े जोखिमों के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। इसी स्थिति को ध्यान में रखते हुए निवेश फर्म ने अपने पूर्वानुमान में बदलाव किया है।

    नई रिपोर्ट के अनुसार, दिसंबर 2026 के लिए ब्रेंट क्रूड का अनुमान बढ़ाने की प्रमुख वजह आपूर्ति संबंधी जोखिमों के कारण कीमतों में शामिल अतिरिक्त जोखिम प्रीमियम का धीरे-धीरे कम होना है। यह जोखिम प्रीमियम फिलहाल 20 डॉलर प्रति बैरल से कुछ अधिक बताया गया है। हालांकि, दिसंबर के लिए 90 डॉलर प्रति बैरल का नया अनुमान मौजूदा कीमत करीब 103 डॉलर प्रति बैरल से लगभग 13 प्रतिशत कम है। इसका अर्थ है कि निवेश फर्म को आगे चलकर कीमतों में कुछ नरमी आने की संभावना भी दिखाई दे रही है।

    गोल्डमैन सैश ने वर्ष 2027 के लिए ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत का अनुमान 80 डॉलर प्रति बैरल पर बरकरार रखा है। इस अनुमान में खाड़ी देशों से तेल आपूर्ति में संभावित बदलाव, आपूर्ति संबंधी जोखिमों और जोखिम प्रीमियम में कमी की गति को ध्यान में रखा गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, यदि खाड़ी देशों से तेल की आपूर्ति उम्मीद से अधिक तेजी से बढ़ती है, तो इससे कीमतों पर दबाव पड़ सकता है। दूसरी ओर, जोखिम प्रीमियम लंबे समय तक ऊंचा रहने पर तेल की कीमतों को समर्थन मिल सकता है।

    तेल की कीमतों के आकलन में कम भंडार, आपूर्ति में संभावित बाधाओं और ब्याज दरों के प्रभाव को भी शामिल किया गया है। इन परिस्थितियों का असर तेल की भौतिक खरीद और भंडार दोबारा भरने की गतिविधियों पर पड़ सकता है। इसके अलावा, वित्तीय जोखिम से बचाव के लिए किए जाने वाले हेजिंग सौदे भी बाजार की गतिविधियों को प्रभावित कर सकते हैं। इन सभी कारकों के आधार पर भविष्य में कच्चे तेल की कीमतों का अनुमान लगाया गया है।

    रिपोर्ट में अमेरिकी कच्चे तेल वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) के लिए भी अनुमान दिया गया है। इसके मुताबिक, दिसंबर 2026 में डब्ल्यूटीआई की औसत कीमत 81 डॉलर प्रति बैरल और वर्ष 2027 में 73 डॉलर प्रति बैरल रह सकती है। ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई की अनुमानित कीमतों के बीच अंतर अपेक्षाकृत अधिक है। रिपोर्ट में इसकी एक वजह अमेरिका से यूरोप तक तेल की ढुलाई पर आने वाली ज्यादा लागत को बताया गया है।

    पश्चिम एशिया में फरवरी के आखिर में युद्ध शुरू होने के समय ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 70 डॉलर प्रति बैरल थी। इसके बाद होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की ढुलाई में बाधाएं आने के कारण कीमत बढ़कर 125 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई। दुनिया के कुल तेल शिपमेंट का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है। ऐसे में यहां शिपिंग प्रभावित होने से वैश्विक तेल आपूर्ति पर दबाव बढ़ा है।

    गोल्डमैन सैश ने संभावित जोखिमों का आकलन करते हुए कहा है कि यदि वर्ष 2027 में खाड़ी देशों का औसत तेल उत्पादन फरवरी 2026 के स्तर से प्रतिदिन 50 लाख बैरल कम रहता है, तो ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत करीब 125 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है। रिपोर्ट में तेल संबंधी बुनियादी ढांचे को नुकसान, समुद्री परिवहन पर बढ़ते हमलों और लंबे समय तक बने रहने वाले जोखिम प्रीमियम को कीमतों में संभावित बढ़ोतरी के प्रमुख कारणों में शामिल किया गया है।

  • बायोकॉन लिमिटेड को 3.2 करोड़ रुपये से अधिक का जीएसटी नोटिस, एफडीए भी शाहरुख खान समेत अभिनेताओं को सुनवाई का देगा मौका

    बायोकॉन लिमिटेड को 3.2 करोड़ रुपये से अधिक का जीएसटी नोटिस, एफडीए भी शाहरुख खान समेत अभिनेताओं को सुनवाई का देगा मौका

    नई दिल्ली ।बायोटेक्नोलॉजी क्षेत्र की कंपनी बायोकॉन लिमिटेड को वित्त वर्ष 2022-23 के लिए 3.2 करोड़ रुपये से अधिक का वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) नोटिस मिला है। इसमें कर की बकाया राशि के साथ ब्याज और जुर्माना भी शामिल है। कंपनी को यह नोटिस आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम-2 स्थित जीएसटी कार्यालय से जारी किया गया है। कंपनी ने इस संबंध में शेयर बाजार को जानकारी देते हुए बताया कि नोटिस में कुल देनदारी के रूप में 3.2 करोड़ रुपये से अधिक की राशि निर्धारित की गई है। हालांकि, कंपनी का कहना है कि इस आदेश का उसके वित्तीय और परिचालन कामकाज पर कोई बड़ा प्रभाव पड़ने की आशंका नहीं है।

    नोटिस में 1.85 करोड़ रुपये जीएसटी के रूप में, 1.17 करोड़ रुपये ब्याज के रूप में और 18.52 लाख रुपये जुर्माने के रूप में शामिल हैं। कर विभाग की ओर से कंपनी पर कई तरह की अनियमितताओं से जुड़े आरोप लगाए गए हैं। इनमें विशेष आर्थिक क्षेत्र यानी एसईजेड को की गई जीरो-रेटेड आपूर्ति के संबंध में जरूरी एंडोर्समेंट दस्तावेज जमा नहीं करना शामिल है। इसके अलावा इनपुट टैक्स के गलत रिवर्सल और इनपुट सर्विस डिस्ट्रीब्यूशन क्रेडिट के दावों में अनियमितताओं का भी उल्लेख किया गया है।

    जीरो-रेटेड आपूर्ति के तहत कुछ निर्धारित परिस्थितियों में वस्तुओं या सेवाओं की आपूर्ति पर कर का प्रभाव अलग होता है। ऐसे मामलों में संबंधित दस्तावेजों और कर संबंधी नियमों का पालन महत्वपूर्ण होता है। बायोकॉन को मिले नोटिस में इन्हीं प्रक्रियाओं से संबंधित कथित कमियों को आधार बनाया गया है। कंपनी ने स्पष्ट किया है कि वह इस आदेश के खिलाफ सुधार याचिका दाखिल करने या अपील करने की तैयारी कर रही है। कंपनी की ओर से यह भी कहा गया है कि इस मामले का उसके वित्तीय या परिचालन प्रदर्शन पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा।

    इसी बीच, महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) ने प्रतिबंधित उत्पादों के अप्रत्यक्ष विज्ञापन से जुड़े मामले में संबंधित अभिनेताओं से जवाब प्राप्त होने की जानकारी दी है। विभाग ने शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ सहित कुछ अभिनेताओं से प्रतिबंधित तंबाकू संबंधी उत्पादों के प्रचार को लेकर जवाब मांगा था। इन अभिनेताओं को भेजे गए नोटिस के बाद विभाग को उनके जवाब मिल गए हैं। अब आगे की कार्रवाई से पहले सभी संबंधित लोगों को अपना पक्ष रखने का एक और अवसर दिया जाएगा।

    महाराष्ट्र एफडीए के आयुक्त तुकाराम मुंडे ने कहा कि विभाग आगे कोई निर्णय लेने से पहले संबंधित लोगों को सुनवाई का एक और मौका देगा। उन्होंने विज्ञापन करने वाले लोगों से यह सुनिश्चित करने को कहा कि उनके प्रचार अभियान कानून के अनुरूप हों। विभाग का रुख है कि किसी उत्पाद का विज्ञापन करते समय लागू कानूनी प्रावधानों का पालन किया जाना जरूरी है।

    मुंडे ने खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 की धारा 24 तथा वर्ष 2018 के विज्ञापन नियमों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि विज्ञापन संबंधी नियम सभी खाद्य उत्पादों पर लागू होते हैं। यदि कोई व्यक्ति या कारोबारी इन प्रावधानों का उल्लंघन करता है, तो उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने उपभोक्ताओं से भी अपील की कि वे खाद्य उत्पाद खरीदते समय पैकेट पर दी गई जानकारी को ध्यानपूर्वक पढ़ें और समझें।

  • कोयला आपूर्ति में तेजी से बिजलीघरों का भंडार स्थिर, अक्टूबर में दैनिक सप्लाई बढ़कर 2.49 मिलियन टन पहुंची

    कोयला आपूर्ति में तेजी से बिजलीघरों का भंडार स्थिर, अक्टूबर में दैनिक सप्लाई बढ़कर 2.49 मिलियन टन पहुंची


    नई दिल्ली । देश के कोयला आधारित बिजलीघरों में कोयले का भंडार अक्टूबर में लगातार 18 मिलियन टन से अधिक बना हुआ है। 29 सितंबर 2026 से शुरू हुई यह स्थिति 10 अक्टूबर तक कायम रही। अक्टूबर के शुरुआती दिनों में कोयले की आपूर्ति मजबूत होने से बिजलीघरों के भंडार में कमी आने की रफ्तार भी धीमी हुई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, बिजली की मांग के लिए कोयले की खपत और आपूर्ति के बीच अंतर पहले की तुलना में कम हुआ है।

    29 सितंबर 2026 को देश के बिजलीघरों में कोयले का कुल भंडार 18.932 मिलियन टन दर्ज किया गया था। 10 अक्टूबर को यह 18.205 मिलियन टन रहा। इस अवधि में भंडार में कुछ कमी आई, लेकिन इसका स्तर 18 मिलियन टन से ऊपर बना रहा। संबंधित आंकड़े बताते हैं कि कोयले की दैनिक आपूर्ति बिजलीघरों की खपत के करीब पहुंची है। इससे ताप बिजलीघरों के लिए ईंधन की उपलब्धता बनाए रखने में मदद मिल रही है।

    अक्टूबर के दौरान कुछ दिनों में कोयले के भंडार में बढ़ोतरी भी दर्ज की गई। 2 अक्टूबर को स्टॉक में 0.024 मिलियन टन की वृद्धि हुई, जबकि 10 अक्टूबर को इसमें 0.017 मिलियन टन का इजाफा हुआ। यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई, जब सितंबर के मुकाबले अक्टूबर में कोयले के भंडार में कमी आने की गति काफी धीमी हो गई।

    आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर 2026 में पूरे महीने बिजलीघरों का कोयला भंडार लगभग 7.28 मिलियन टन घट गया था। इस दौरान औसतन प्रतिदिन 0.24 मिलियन टन कोयले की कमी दर्ज की गई। इसके विपरीत, अक्टूबर के पहले 10 दिनों में कुल भंडार में लगभग 0.56 मिलियन टन की गिरावट आई। इस अवधि में औसत दैनिक कमी घटकर 0.06 मिलियन टन रह गई। दोनों अवधियों के आंकड़ों में अंतर कोयला आपूर्ति की स्थिति में सुधार का संकेत देता है।

    कोयले की ढुलाई में तेजी को इस सुधार का प्रमुख कारण बताया गया है। 1 से 10 अक्टूबर 2026 के बीच बिजली क्षेत्र के लिए प्रतिदिन औसतन 469 रेक कोयला लोड किया गया। सितंबर में यह औसत 426 रेक प्रतिदिन था। इस तरह अक्टूबर में रेक लोडिंग में लगभग 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई। महीने के शुरुआती 10 दिनों में प्रतिदिन लोड किए गए रेक की संख्या 447 से 482 के बीच रही।

    ढुलाई बढ़ने के साथ बिजली क्षेत्र को मिलने वाली वास्तविक कोयला आपूर्ति में भी इजाफा हुआ। अक्टूबर में यह आपूर्ति बढ़कर 2.49 मिलियन टन प्रतिदिन हो गई, जबकि सितंबर में औसत आपूर्ति 2.21 मिलियन टन प्रतिदिन थी। अक्टूबर के 10 दिनों में से नौ दिन बिजली क्षेत्र को तय योजना से अधिक कोयला मिला। इससे बिजलीघरों की ईंधन जरूरतों को पूरा करने में आपूर्ति की भूमिका मजबूत हुई है।

    कम भंडार वाले बिजलीघरों की स्थिति पर भी निगरानी रखी जा रही है। जरूरत के अनुसार विभिन्न संयंत्रों के बीच कोयले का पुनर्वितरण किया जा रहा है, ताकि बिजली उत्पादन प्रभावित न हो। कोयले की ढुलाई और आपूर्ति को सुचारू बनाए रखने के लिए कोल इंडिया लिमिटेड, एससीसीएल, रेलवे और बिजली क्षेत्र की कंपनियां मिलकर काम कर रही हैं। कोयला परिवहन में भारतीय रेलवे के प्रयासों और पेशेवर प्रतिबद्धता की भी सराहना की गई है।

  • सोने की कीमतों में 1,443 रुपये की गिरावट, चांदी भी 1,552 रुपये फिसली, जानें घरेलू बाजार में भाव और आगे के अहम स्तर

    सोने की कीमतों में 1,443 रुपये की गिरावट, चांदी भी 1,552 रुपये फिसली, जानें घरेलू बाजार में भाव और आगे के अहम स्तर

    नई दिल्ली । सप्ताह के पहले कारोबारी दिन सोमवार, 12 अक्टूबर 2026 को घरेलू वायदा बाजार में सोने और चांदी की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर शुरुआती कारोबार के दौरान सोना 1,443 रुपये प्रति 10 ग्राम तक टूट गया, जबकि चांदी की कीमत में 1,552 रुपये प्रति किलोग्राम तक की कमी आई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में दोनों कीमती धातुओं के भाव में हल्की तेजी के बावजूद भारतीय बाजार में कीमतें नीचे रहीं। इसके पीछे रुपये की मजबूती और निवेशकों की मुनाफावसूली को प्रमुख कारण बताया गया।

    एमसीएक्स पर 4 दिसंबर को डिलीवरी वाला सोना पिछले कारोबारी सत्र में 1,51,499 रुपये प्रति 10 ग्राम पर बंद हुआ था। सोमवार को यह 1,51,596 रुपये पर खुला, लेकिन शुरुआती कारोबार में बिकवाली बढ़ने से भाव गिरकर 1,50,056 रुपये प्रति 10 ग्राम के निचले स्तर पर पहुंच गया। इस तरह सोने में 1,443 रुपये यानी करीब 0.95 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, सोने के लिए 1,50,000 से 1,50,700 रुपये का दायरा महत्वपूर्ण सपोर्ट स्तर है।

    चांदी में भी कारोबार के दौरान दबाव बना रहा। एमसीएक्स पर दिसंबर डिलीवरी वाली चांदी पिछले सत्र में 2,25,755 रुपये प्रति किलोग्राम पर बंद हुई थी। सोमवार को यह 2,25,494 रुपये पर खुली, जो पिछले बंद भाव से करीब 0.11 प्रतिशत कम था। इसके बाद कीमत और नीचे आई तथा चांदी 2,24,203 रुपये प्रति किलोग्राम के निचले स्तर तक पहुंच गई। इस दौरान इसमें 1,552 रुपये यानी लगभग 0.68 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। विश्लेषकों का मानना है कि औद्योगिक मांग चांदी को कुछ समर्थन दे सकती है, लेकिन रुपये की मजबूती निकट भविष्य में इसकी कीमतों पर दबाव बनाए रख सकती है।

    वैश्विक बाजार में तस्वीर कुछ अलग रही। कॉमेक्स पर सोना 4,200 डॉलर प्रति औंस के ऊपर कारोबार करता दिखाई दिया, जबकि चांदी का भाव करीब 61.1 डॉलर प्रति औंस रहा। अंतरराष्ट्रीय कीमतों में मजबूती के बावजूद भारतीय बाजार में गिरावट की एक प्रमुख वजह रुपये में संभावित मजबूती की उम्मीद है। भारतीय रिजर्व बैंक के हालिया कदमों से रुपये को समर्थन मिलने की संभावना के बीच निवेशक इस घटनाक्रम पर नजर रख रहे हैं। रुपया मजबूत होने पर आयातित सोना और चांदी घरेलू बाजार में अपेक्षाकृत सस्ते पड़ सकते हैं।

    आने वाले दिनों में बाजार की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारकों में अमेरिका के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी सीपीआई के आंकड़े और फेडरल रिजर्व की ब्याज दर नीति शामिल हैं। बाजार में दिसंबर के दौरान ब्याज दरों में संभावित बढ़ोतरी की उम्मीद भी बनी हुई है। आम तौर पर ऊंची ब्याज दरें सोने जैसी ऐसी संपत्तियों का आकर्षण घटा सकती हैं, जिनसे नियमित ब्याज नहीं मिलता। इसलिए आने वाले आर्थिक आंकड़ों के आधार पर निवेशकों की रणनीति में बदलाव देखने को मिल सकता है।

    वैश्विक अर्थव्यवस्था को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है। संयुक्त राष्ट्र की व्यापार एवं विकास एजेंसी ने 2026 में वैश्विक आर्थिक वृद्धि दर घटकर 2.6 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव को भी आर्थिक जोखिमों में शामिल किया गया है। विशेषज्ञों के मुताबिक, भू-राजनीतिक अनिश्चितता लंबे समय में सोने की सुरक्षित निवेश विकल्प के रूप में मांग को समर्थन दे सकती है।

    तकनीकी स्तरों के लिहाज से सोने के लिए 1.50 लाख रुपये के आसपास का भाव अहम माना जा रहा है। यह स्तर टूटने पर कीमत 1.48 लाख रुपये तक जा सकती है, जबकि ऊपर की ओर 1.52 लाख से 1.53 लाख रुपये का दायरा प्रमुख प्रतिरोध स्तर है। चांदी के लिए 2.24 लाख रुपये प्रति किलोग्राम का स्तर महत्वपूर्ण है। कीमतों में मजबूती आने पर इसका भाव 2.28 लाख रुपये तक पहुंचने की संभावना जताई गई है।

  • सितंबर में इक्विटी म्यूचुअल फंड में निवेश 30.61 प्रतिशत बढ़कर 38,306 करोड़ रुपये पहुंचा, उद्योग का कुल एयूएम 82.64 लाख करोड़ रुपये हुआ

    सितंबर में इक्विटी म्यूचुअल फंड में निवेश 30.61 प्रतिशत बढ़कर 38,306 करोड़ रुपये पहुंचा, उद्योग का कुल एयूएम 82.64 लाख करोड़ रुपये हुआ

    नई दिल्ली ।भारतीय म्यूचुअल फंड उद्योग में सितंबर 2026 के दौरान इक्विटी योजनाओं में निवेश में अच्छी बढ़ोतरी दर्ज की गई। सितंबर में इक्विटी म्यूचुअल फंड में 38,306.55 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश आया, जो अगस्त में दर्ज 29,328.62 करोड़ रुपये के मुकाबले 30.61 प्रतिशत अधिक है। इस दौरान पूरे म्यूचुअल फंड उद्योग की कुल एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (एयूएम) 82.64 लाख करोड़ रुपये रही। हालांकि, इक्विटी योजनाओं में निवेश बढ़ने के बावजूद डेट फंड से भारी निकासी के कारण उद्योग का कुल शुद्ध निवेश नकारात्मक रहा।

    सितंबर के आंकड़ों के अनुसार, ओपन-एंडेड इक्विटी योजनाओं में कुल 74,831.96 करोड़ रुपये का निवेश हुआ, जबकि 36,525.41 करोड़ रुपये की निकासी दर्ज की गई। निवेश और निकासी के अंतर के आधार पर इन योजनाओं में शुद्ध निवेश 38,306.55 करोड़ रुपये रहा। इक्विटी योजनाओं का कुल शुद्ध एसेट्स अंडर मैनेजमेंट 37.54 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया। वहीं, सितंबर के दौरान इन योजनाओं का औसत एयूएम 38,50,660.61 करोड़ रुपये रहा।

    इक्विटी फंड की अलग-अलग श्रेणियों में स्मॉल कैप फंड निवेश के मामले में सबसे आगे रहे। इस श्रेणी में सितंबर के दौरान 9,038.57 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश आया। स्मॉल कैप योजनाओं में कुल 13,025.13 करोड़ रुपये का निवेश हुआ, जबकि 3,986.56 करोड़ रुपये की निकासी दर्ज की गई। इस श्रेणी में निवेशकों के कुल 3.03 करोड़ फोलियो दर्ज किए गए। फोलियो से आशय निवेशकों के म्यूचुअल फंड खातों से है।

    अन्य इक्विटी श्रेणियों में मिड कैप फंड में 7,834.84 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश आया। फ्लेक्सी कैप फंड में 6,701.80 करोड़ रुपये, लार्ज एंड मिड कैप फंड में 4,271.22 करोड़ रुपये और मल्टी कैप फंड में 3,859.55 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश दर्ज किया गया। इन आंकड़ों से पता चलता है कि सितंबर में स्मॉल कैप के साथ मिड कैप और फ्लेक्सी कैप योजनाओं में भी निवेशकों की अच्छी भागीदारी रही।

    थीमैटिक फंड में 1,800.07 करोड़ रुपये और सेक्टोरल फंड में 1,840.02 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश आया। इसके अलावा फोकस्ड फंड में 1,390.84 करोड़ रुपये, वैल्यू फंड में 1,290.89 करोड़ रुपये और लार्ज कैप फंड में 859.47 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश दर्ज किया गया। दूसरी ओर, कॉन्ट्रा फंड से 97.88 करोड़ रुपये और ईएलएसएस टैक्स सेवर फंड से 662.14 करोड़ रुपये की शुद्ध निकासी हुई।

    पूरे म्यूचुअल फंड उद्योग की स्थिति देखें तो सितंबर में कुल 1,33,375.57 करोड़ रुपये की शुद्ध निकासी दर्ज की गई। इसका प्रमुख कारण डेट फंड से 1,83,155.76 करोड़ रुपये का भारी आउटफ्लो रहा। इस तरह इक्विटी योजनाओं में मजबूत निवेश के बावजूद डेट श्रेणी से निकासी ने उद्योग के कुल आंकड़ों को प्रभावित किया। सितंबर में उद्योग का कुल एयूएम 82.64 लाख करोड़ रुपये रहा, जबकि अगस्त में यह 87.08 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया था।

    एक्सचेंज ट्रेडेड फंड यानी ईटीएफ में सितंबर के दौरान निवेशकों की दिलचस्पी बनी रही। इस श्रेणी में कुल 15,501.40 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश आया। इक्विटी ईटीएफ में 9,959.96 करोड़ रुपये का निवेश दर्ज किया गया, जबकि गोल्ड ईटीएफ में 4,450.61 करोड़ रुपये और सिल्वर ईटीएफ में 1,974.32 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश आया। अगस्त में इक्विटी फंड में 29,328.62 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश हुआ था, जो जुलाई की तुलना में लगभग 19 प्रतिशत अधिक था। सितंबर में यह निवेश और बढ़कर 38,306.55 करोड़ रुपये पहुंच गया।