Category: Economy

  • शेयर बाजार की शीर्ष कंपनियों में बड़ा बदलाव, एसबीआई की वैल्यूएशन में सबसे ज्यादा बढ़त

    शेयर बाजार की शीर्ष कंपनियों में बड़ा बदलाव, एसबीआई की वैल्यूएशन में सबसे ज्यादा बढ़त

    नई दिल्ली ।भारतीय शेयर बाजार की शीर्ष 10 सबसे अधिक मूल्यवान कंपनियों में बीते सप्ताह बाजार पूंजीकरण के स्तर पर मिला-जुला रुझान देखने को मिला। शीर्ष दस में शामिल चार कंपनियों की कुल मार्केट वैल्यूएशन में 1.43 लाख करोड़ रुपये से अधिक की बढ़ोतरी हुई, जबकि छह कंपनियों का संयुक्त बाजार पूंजीकरण करीब 1.23 लाख करोड़ रुपये घट गया। इस दौरान भारतीय स्टेट बैंक यानी एसबीआई सबसे अधिक लाभ पाने वाली कंपनी रही।

    एसबीआई के बाजार पूंजीकरण में सप्ताह के दौरान 63,922.03 करोड़ रुपये की उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई। इसके साथ ही बैंक की कुल बाजार वैल्यूएशन बढ़कर 10,11,721.84 करोड़ रुपये हो गई। बैंक के वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के बेहतर वित्तीय प्रदर्शन को इस बढ़त की प्रमुख वजहों में माना गया।

    मार्केटकैप में बढ़ोतरी के लिहाज से रिलायंस इंडस्ट्रीज दूसरे प्रमुख लाभार्थियों में रही। कंपनी की बाजार वैल्यूएशन 32,816.4 करोड़ रुपये बढ़कर 18,01,925.19 करोड़ रुपये पहुंच गई। इससे कंपनी शीर्ष मूल्यवान कंपनियों की सूची में अपनी मजबूत स्थिति बनाए रखने में सफल रही।

    सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की प्रमुख कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज यानी टीसीएस के बाजार पूंजीकरण में भी अच्छी बढ़त दर्ज हुई। कंपनी की वैल्यूएशन 31,875.35 करोड़ रुपये बढ़कर 8,87,770.13 करोड़ रुपये हो गई। इंजीनियरिंग और निर्माण क्षेत्र की प्रमुख कंपनी लार्सन एंड टुब्रो का मार्केटकैप भी 14,637.76 करोड़ रुपये बढ़ा और 5,56,482.45 करोड़ रुपये पर पहुंच गया।

    दूसरी ओर, शीर्ष 10 कंपनियों में छह कंपनियों को बाजार पूंजीकरण के स्तर पर नुकसान उठाना पड़ा। इनमें सबसे बड़ी गिरावट भारतीय जीवन बीमा निगम यानी एलआईसी में रही। कंपनी की बाजार वैल्यूएशन 40,543.23 करोड़ रुपये कम होकर 4,96,891.82 करोड़ रुपये रह गई।

    बजाज फाइनेंस के बाजार पूंजीकरण में 37,168.96 करोड़ रुपये की कमी दर्ज की गई। इसके बाद कंपनी की कुल वैल्यूएशन 6,73,648.55 करोड़ रुपये रह गई। एचडीएफसी बैंक का मार्केटकैप भी 24,183.16 करोड़ रुपये घटकर 11,27,967.47 करोड़ रुपये पर आ गया।

    आईसीआईसीआई बैंक की बाजार वैल्यूएशन में 9,507.67 करोड़ रुपये की गिरावट आई और यह 10,20,370.63 करोड़ रुपये रह गई। भारती एयरटेल का बाजार पूंजीकरण 7,581.65 करोड़ रुपये घटकर 12,22,423.98 करोड़ रुपये पर पहुंच गया।

    हिंदुस्तान यूनिलीवर भी उन कंपनियों में शामिल रही जिनके मार्केटकैप में गिरावट दर्ज की गई। कंपनी की बाजार वैल्यूएशन 4,793.16 करोड़ रुपये घटकर 4,88,808.97 करोड़ रुपये रह गई। इस तरह शीर्ष 10 कंपनियों के बीच सप्ताह के दौरान बाजार मूल्यांकन में स्पष्ट रूप से अलग-अलग दिशा देखने को मिली।

    इसी अवधि में भारतीय शेयर बाजार कुल मिलाकर बढ़त के साथ बंद हुआ। सेंसेक्स 404.53 अंक यानी 0.51 प्रतिशत की तेजी के साथ बंद हुआ। वहीं, निफ्टी में 187.05 अंक यानी 0.76 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई। बाजार की इस तेजी के बीच कुछ बड़ी कंपनियों के शेयरों में खरीदारी बढ़ी, जबकि कई प्रमुख कंपनियों के मूल्यांकन में गिरावट रही।

    बाजार पूंजीकरण में हुए इस बदलाव से शीर्ष कंपनियों के बीच निवेशकों के रुझान में अंतर भी सामने आया। खास तौर पर एसबीआई की मजबूत बढ़त ने सप्ताह के दौरान उसके कुल बाजार मूल्यांकन को 10 लाख करोड़ रुपये के स्तर से ऊपर पहुंचा दिया। वहीं, कुछ अन्य बड़ी कंपनियों में गिरावट के कारण उनके बाजार पूंजीकरण में कमी दर्ज हुई।

  • निफ्टी-सेंसेक्स की तेजी के बाद अगले हफ्ते निवेशकों की नजर कच्चे तेल और घरेलू आंकड़ों पर रहेगी

    निफ्टी-सेंसेक्स की तेजी के बाद अगले हफ्ते निवेशकों की नजर कच्चे तेल और घरेलू आंकड़ों पर रहेगी

    नई दिल्ली ।भारतीय शेयर बाजार के लिए 10 से 14 अगस्त के बीच आने वाला कारोबारी सप्ताह कई महत्वपूर्ण घटनाक्रमों के कारण अहम माना जा रहा है। वैश्विक स्तर पर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, घरेलू महंगाई के आंकड़े और कंपनियों के पहली तिमाही के नतीजे निवेशकों के रुख को प्रभावित कर सकते हैं। बाजार की दिशा तय करने में इन सभी कारकों की भूमिका महत्वपूर्ण रहने की संभावना है।

    अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव पर निवेशकों की विशेष नजर रहेगी। फिलहाल दोनों देशों के बीच हमले रुके हुए हैं और इसी वजह से कच्चे तेल की कीमत करीब 83 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई है। तेल की कीमतों में किसी भी बड़े बदलाव का असर भारतीय अर्थव्यवस्था और शेयर बाजार पर दिखाई दे सकता है, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है।

    घरेलू मोर्चे पर खुदरा और थोक महंगाई के आंकड़े अगले सप्ताह जारी किए जाएंगे। महंगाई के आंकड़े अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों के दबाव के साथ मांग और आपूर्ति की स्थिति का संकेत देते हैं। ऐसे में निवेशक इन आंकड़ों का विश्लेषण करके बाजार की आगे की दिशा को लेकर अपनी रणनीति तय कर सकते हैं।

    इसके अलावा कई सूचीबद्ध कंपनियों के पहली तिमाही के वित्तीय नतीजे भी बाजार की गतिविधियों को प्रभावित करेंगे। 10 से 14 अगस्त के बीच स्काईगोल्ड, बॉश, बॉम्बे डाइंग, डॉलर, डीबीएल, आईटीडीसी, वोडाफोन आइडिया, आइडियाफोर्ज, हिंदुस्तान कॉपर, लिंडे इंडिया, वीगार्ड, जी, बाटा इंडिया, ईपैक, ईपीएल, आईएफसीआई और जेएनके इंडिया समेत कई कंपनियों के नतीजे सामने आने हैं।

    बीते कारोबारी सप्ताह में भारतीय शेयर बाजार में कुल मिलाकर मजबूती देखने को मिली। निफ्टी 187.05 अंक यानी 0.77 प्रतिशत की बढ़त के साथ 24,570.65 पर बंद हुआ। वहीं सेंसेक्स में 404.53 अंक यानी 0.52 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई और यह 78,499.17 के स्तर पर बंद हुआ।

    बाजार में व्यापक तेजी का असर मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी दिखाई दिया। निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स 548.25 अंक यानी 0.87 प्रतिशत बढ़कर 63,463.55 पर पहुंच गया। निफ्टी स्मॉलकैप 100 इंडेक्स में 528.15 अंक यानी 2.73 प्रतिशत की मजबूत तेजी दर्ज हुई और यह 19,867.80 पर बंद हुआ।

    सेक्टर आधारित प्रदर्शन की बात करें तो निफ्टी पीएसयू बैंक सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाला सूचकांक रहा और इसमें 5.01 प्रतिशत की तेजी दर्ज हुई। निफ्टी इंडिया डिफेंस 4.30 प्रतिशत, निफ्टी मेटल 3.70 प्रतिशत, निफ्टी ऑटो 3.14 प्रतिशत और निफ्टी आईटी 2.73 प्रतिशत की बढ़त के साथ बंद हुए।

    इसी तरह निफ्टी इंडिया मैन्युफैक्चरिंग में 2.04 प्रतिशत, निफ्टी कमोडिटीज में 1.32 प्रतिशत, निफ्टी इंफ्रा में 1.01 प्रतिशत और निफ्टी एफएमसीजी में 0.64 प्रतिशत की मजबूती रही। दूसरी ओर निफ्टी मीडिया 3.94 प्रतिशत गिरा। निफ्टी रियल्टी में 1.72 प्रतिशत और निफ्टी फाइनेंशियल सर्विसेज में 0.48 प्रतिशत की कमजोरी रही। निफ्टी प्राइवेट बैंक 0.47 प्रतिशत और निफ्टी हेल्थकेयर 0.28 प्रतिशत नीचे रहे।

    कुल मिलाकर अगले सप्ताह बाजार की निगाह घरेलू आर्थिक आंकड़ों और कंपनियों के प्रदर्शन के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर रहेगी। कच्चे तेल की कीमत, अमेरिका-ईरान तनाव और महंगाई के आंकड़ों में होने वाले बदलाव निवेशकों के लिए प्रमुख संकेतक रहेंगे। तिमाही नतीजों से कंपनियों के कारोबार और कमाई की तस्वीर भी स्पष्ट होगी, जिससे अलग-अलग शेयरों और क्षेत्रों में गतिविधियां बढ़ सकती हैं।

  • UPI Payment पर MDR की चर्चा के बीच सरकार ने साफ किया पूरा गणित, जानिए किसे देना पड़ सकता है शुल्क

    UPI Payment पर MDR की चर्चा के बीच सरकार ने साफ किया पूरा गणित, जानिए किसे देना पड़ सकता है शुल्क

    नई दिल्ली ।यूपीआई से भुगतान करने वाले करोड़ों लोगों के बीच पिछले कुछ दिनों से मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी MDR को लेकर सवाल उठ रहे थे। खासतौर पर 2000 रुपये से अधिक के यूपीआई लेनदेन पर शुल्क लगाए जाने की चर्चाओं के कारण यह आशंका बनी हुई थी कि आने वाले समय में डिजिटल भुगतान महंगा हो सकता है। अब सरकार ने इस मुद्दे पर स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि आम लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है।

    लोकसभा में पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007 से संबंधित विधेयक पारित होने के बाद सरकार ने यूपीआई भुगतान व्यवस्था और संभावित MDR को लेकर अपना रुख सामने रखा है। सरकार के मुताबिक, एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के बीच होने वाले यूपीआई भुगतान पर कोई शुल्क नहीं लगाया जाएगा। ऐसे में रोजमर्रा के व्यक्तिगत लेनदेन करने वाले ग्राहकों पर प्रस्तावित व्यवस्था का सीधा असर नहीं पड़ेगा।

    MDR यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट उस शुल्क को कहा जाता है, जो डिजिटल भुगतान स्वीकार करने वाले व्यापारी या दुकानदार की ओर से बैंक अथवा भुगतान सेवा उपलब्ध कराने वाली संस्था को दिया जाता है। यह डिजिटल भुगतान की सुविधा से जुड़ी लागत का हिस्सा होता है। इसलिए इसे सीधे ग्राहक पर लगाया जाने वाला शुल्क नहीं माना जाता है।

    सरकार ने कहा है कि यदि भविष्य में यूपीआई लेनदेन पर MDR लागू किया जाता है तो उसका दायरा सीमित रखा जाएगा। सभी तरह के यूपीआई भुगतान पर एक समान शुल्क लगाने की कोई योजना नहीं बताई गई है। व्यक्ति से व्यक्ति होने वाले लेनदेन इससे बाहर रहेंगे और अधिकांश छोटे दुकानदारों तथा कारोबारियों पर भी इसका बड़ा असर नहीं पड़ने की बात कही गई है।

    संभावित व्यवस्था के तहत तय सीमा से अधिक मूल्य वाले कुछ चुनिंदा मर्चेंट भुगतान पर MDR लगाया जा सकता है। सरकार के अनुसार, ऐसी स्थिति में शुल्क की राशि काफी कम रखी जा सकती है। यह शुल्क कार्ड के जरिए होने वाले डिजिटल भुगतान पर लगने वाले शुल्क की तुलना में भी कम हो सकता है।

    सरकार ने संभावित MDR की जरूरत के पीछे यूपीआई के लगातार बढ़ते इस्तेमाल को प्रमुख कारण बताया है। डिजिटल भुगतान का दायरा बढ़ने के साथ साइबर सुरक्षा को मजबूत करने, ऑनलाइन धोखाधड़ी रोकने और भुगतान प्रणाली को सुरक्षित बनाए रखने के लिए लगातार खर्च की आवश्यकता होती है। इसी वजह से डिजिटल भुगतान व्यवस्था की लागत और उसके प्रबंधन को लेकर चर्चा चल रही है।

    हालांकि, अभी यूपीआई पर MDR लागू करने को लेकर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। वित्त मंत्री ने भी स्पष्ट किया है कि यदि भविष्य में MDR लागू किया जाता है तो उसका भुगतान व्यापारी करेंगे, ग्राहकों से सीधे शुल्क लेने की व्यवस्था नहीं होगी। इससे व्यक्तिगत यूपीआई भुगतान करने वाले लोगों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ने की आशंका फिलहाल नहीं है।

    भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा भी इस विषय में जल्दबाजी में कोई निष्कर्ष निकालने से बचने की बात कह चुके हैं। भुगतान व्यवस्था से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर अभी बातचीत जारी है। अंतिम नीति तय होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि किन श्रेणियों के मर्चेंट भुगतान को संभावित शुल्क के दायरे में रखा जा सकता है।

    इस बीच वित्त मंत्रालय ने उन दावों को भी गलत बताया है, जिनमें कहा गया था कि किसी बाहरी दबाव के कारण यूपीआई से जुड़ी नीति में बदलाव किया जा रहा है। सरकार का मौजूदा रुख स्पष्ट है कि व्यक्ति से व्यक्ति होने वाले यूपीआई भुगतान पर कोई शुल्क नहीं लगाया जाएगा और यदि भविष्य में MDR की व्यवस्था लागू होती है तो उसका दायरा सीमित रखा जाएगा।

    इसलिए फिलहाल सामान्य यूपीआई उपयोगकर्ताओं के लिए राहत की स्थिति है। छोटे व्यक्तिगत भुगतान करने वालों को किसी नए शुल्क की चिंता करने की जरूरत नहीं है। दूसरी ओर, व्यापारिक लेनदेन को लेकर अंतिम नियम आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि संभावित MDR किन भुगतान श्रेणियों पर लागू होगा और उसकी वास्तविक दर कितनी होगी।

  • प्रमुख सरकारी तेल कंपनियों का बड़ा फैसला, मध्यरात्रि से सस्ते मिलेंगे पेट्रोल के दाम

    प्रमुख सरकारी तेल कंपनियों का बड़ा फैसला, मध्यरात्रि से सस्ते मिलेंगे पेट्रोल के दाम

    नई दिल्ली ।अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियों और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में आई मजबूती को देखते हुए प्रमुख सरकारी तेल विपणन कंपनियों ने पेट्रोल की खुदरा कीमतों में कटौती करने का निर्णय लिया है। कंपनियों द्वारा की गई इस कटौती के तहत पेट्रोल के दामों में औसतन 56 पैसे प्रति लीटर की कमी दर्ज की गई है। नई दरें मध्यरात्रि से देश भर में प्रभावी हो जाएंगी, जिससे वाहन चालकों और आम जनता को कुछ हद तक आर्थिक राहत मिलने की उम्मीद है।

    कीमतों में संशोधन के बाद देश की राजधानी दिल्ली में इंडियन ऑयल के पेट्रोल पंपों पर पेट्रोल की नई दरें 67.90 रुपये प्रति लीटर तय की गई हैं, जो इससे पहले 68.46 रुपये प्रति लीटर के स्तर पर दर्ज की जा रही थीं। देश की अन्य प्रमुख तेल विपणन कंपनियों भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन द्वारा भी इसी तर्ज पर अपने खुदरा मूल्यों में संशोधन किया जाता है। स्थानीय करों और भिन्न व्यवस्थाओं के कारण अलग-अलग कंपनियों के आउटलेट पर कीमतों में एक से दो पैसे का मामूली अंतर देखा जा सकता है।

    तेल कंपनियों द्वारा जारी आधिकारिक जानकारी के अनुसार, विभिन्न राज्यों में स्थानीय करों और वैट की दरों के आधार पर अलग-अलग शहरों में कटौती की राशि भिन्न रखी गई है। वित्तीय राजधानी मुंबई में पेट्रोल के दामों में 71 पैसे प्रति लीटर की कमी की गई है, जिसके बाद वहां नया मूल्य 74.43 रुपये प्रति लीटर हो जाएगा। इसी प्रकार कोलकाता में 70 पैसे प्रति लीटर की कटौती के साथ नई दर 75.44 रुपये प्रति लीटर और चेन्नई में 71 पैसे की कमी के साथ नया दाम 71.48 रुपये प्रति लीटर तय किया गया है।

    उल्लेखनीय है कि प्रशासनिक सुधारों के तहत पेट्रोल के मूल्य निर्धारण को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर दिया गया था, जिससे तेल कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की लागत और विनिमय दर के अनुरूप कीमतें तय करने का अधिकार मिला है। इससे पहले जून माह के अंत में पेट्रोल की दरों में 70 पैसे प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई थी।

    तेल विपणन कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि हाल के दिनों में डॉलर के मुकाबले रुपये की विनिमय दर में सुधार दर्ज किया गया है, जिसके कारण आयात लागत पर आंशिक राहत मिली है। हालांकि, वैश्विक बाजार में अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतें अब भी ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। कंपनियों का कहना है कि पूर्ण स्वतंत्रता मिलने के बावजूद बाजार की अनिश्चितताओं के कारण लागत के अनुपात में दरें नहीं बढ़ाई जा सकी थीं, जिससे चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में कंपनियों को संभावित राजस्व में काफी घाटे का सामना करना पड़ा है।

  • Nifty vs Sensex: कौन सा इंडेक्स देता है बेहतर निवेश का मौका? समझें आसान भाषा में पूरा फर्क

    Nifty vs Sensex: कौन सा इंडेक्स देता है बेहतर निवेश का मौका? समझें आसान भाषा में पूरा फर्क


    नई दिल्ली। शेयर बाजार में निवेश करने वाले लोगों के बीच अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि निफ्टी और सेंसेक्स में से कौन सा बेहतर है। दोनों ही भारतीय शेयर बाजार के प्रमुख इंडेक्स हैं और देश की बड़ी कंपनियों के प्रदर्शन को दर्शाते हैं। हालांकि दोनों के बीच कई महत्वपूर्ण अंतर हैं जिन्हें समझना किसी भी निवेशक के लिए जरूरी है। खासकर नए निवेशकों के लिए यह जानना महत्वपूर्ण है कि निफ्टी और सेंसेक्स सीधे तौर पर निवेश के साधन नहीं बल्कि बाजार के प्रदर्शन को मापने वाले प्रमुख सूचकांक हैं। इनके आधार पर कई इंडेक्स फंड और एक्सचेंज ट्रेडेड फंड में निवेश किया जा सकता है।

    सेंसेक्स बीएसई यानी बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का प्रमुख इंडेक्स है। इसमें देश की 30 बड़ी और प्रमुख कंपनियां शामिल होती हैं। इन कंपनियों का चयन बाजार पूंजीकरण और अन्य निर्धारित मानकों के आधार पर किया जाता है। सेंसेक्स का प्रदर्शन इन कंपनियों के शेयरों में होने वाली तेजी और गिरावट से प्रभावित होता है। दूसरी तरफ निफ्टी 50 एनएसई यानी नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का प्रमुख इंडेक्स है। इसमें 50 बड़ी और प्रमुख कंपनियां शामिल होती हैं। इसलिए निफ्टी में सेंसेक्स की तुलना में कंपनियों की संख्या अधिक होती है और इसका दायरा भी थोड़ा व्यापक माना जाता है।

    दोनों इंडेक्स में भारत की प्रमुख कंपनियां शामिल रहती हैं और कई बड़ी कंपनियां दोनों में भी मौजूद होती हैं। यही वजह है कि लंबे समय में दोनों के प्रदर्शन में बहुत ज्यादा अंतर देखने को जरूरी नहीं है। हालांकि किसी खास समय में सेक्टर और कंपनियों के प्रदर्शन के कारण दोनों इंडेक्स के रिटर्न में अंतर आ सकता है। उदाहरण के लिए यदि निफ्टी में शामिल किसी विशेष सेक्टर की कंपनियां बेहतर प्रदर्शन करती हैं तो निफ्टी को उसका फायदा मिल सकता है। इसी तरह सेंसेक्स में शामिल कंपनियों के बेहतर प्रदर्शन से सेंसेक्स मजबूत हो सकता है।

    अगर निवेश के नजरिए से देखा जाए तो किसी एक इंडेक्स को हर निवेशक के लिए बेहतर बताना सही नहीं होगा। निवेशक को अपने लक्ष्य और जोखिम क्षमता के आधार पर फैसला करना चाहिए। जो व्यक्ति लंबे समय के लिए बाजार में निवेश करना चाहता है और अलग-अलग बड़ी कंपनियों के प्रदर्शन में भागीदारी चाहता है वह निफ्टी 50 या सेंसेक्स आधारित इंडेक्स फंड पर विचार कर सकता है। दोनों ही विकल्प बाजार की बड़ी कंपनियों में अप्रत्यक्ष रूप से निवेश का अवसर देते हैं।

    नए निवेशकों के लिए इंडेक्स आधारित निवेश का एक फायदा यह है कि इसमें किसी एक कंपनी के शेयर चुनने का जोखिम अपेक्षाकृत कम हो सकता है क्योंकि निवेश कई कंपनियों में फैला होता है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि इसमें जोखिम नहीं होता। शेयर बाजार से जुड़े निवेश में बाजार की स्थिति के अनुसार उतार-चढ़ाव बना रहता है और निवेश की रकम घट या बढ़ सकती है।

    निफ्टी और सेंसेक्स में चुनाव करते समय केवल पिछले रिटर्न को देखकर फैसला करना भी उचित नहीं है। निवेशक को फंड का खर्च अनुपात ट्रैकिंग एरर निवेश की अवधि और अपने वित्तीय लक्ष्य जैसे पहलुओं पर भी ध्यान देना चाहिए। इसके अलावा निवेश शुरू करने से पहले अपनी जोखिम क्षमता समझना और जरूरत पड़ने पर योग्य वित्तीय सलाहकार की मदद लेना बेहतर रहता है।

    कुल मिलाकर निफ्टी और सेंसेक्स दोनों ही भारतीय शेयर बाजार के मजबूत और महत्वपूर्ण इंडेक्स हैं। किसी एक को हमेशा दूसरे से बेहतर कहना सही नहीं होगा। लंबे समय के निवेश के लिए दोनों से जुड़े इंडेक्स फंड या अन्य निवेश विकल्प उपयोगी हो सकते हैं लेकिन अंतिम फैसला निवेशक के लक्ष्य जोखिम और निवेश अवधि के आधार पर होना चाहिए। सबसे जरूरी बात यह है कि केवल इंडेक्स का नाम देखकर निवेश करने के बजाय उसके पीछे की कंपनियों बाजार की स्थिति और निवेश उत्पाद की लागत को समझकर ही फैसला लेना चाहिए।

  • बैंकिंग नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए मौका, पंजाब नेशनल बैंक में एलबीओ भर्ती की आवेदन तारीख बढ़ी

    बैंकिंग नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए मौका, पंजाब नेशनल बैंक में एलबीओ भर्ती की आवेदन तारीख बढ़ी


    नई दिल्ली ।
    बैंकिंग सेक्टर में सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए पंजाब नेशनल बैंक ने आवेदन का एक और मौका दिया है। बैंक ने लोकल बैंक ऑफिसर यानी एलबीओ के 545 पदों पर भर्ती के लिए आवेदन की अंतिम तिथि बढ़ा दी है। पहले इन पदों के लिए आवेदन करने की आखिरी तारीख 9 अगस्त निर्धारित की गई थी, जिसे अब बढ़ाकर 16 अगस्त 2026 कर दिया गया है। ऐसे में पात्र उम्मीदवारों को आवेदन प्रक्रिया पूरी करने के लिए अतिरिक्त समय मिल गया है।

    पंजाब नेशनल बैंक की इस भर्ती में देश के अलग-अलग राज्यों में लोकल बैंक ऑफिसर के पदों पर नियुक्तियां की जाएंगी। कुल 545 रिक्तियों में आंध्र प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तेलंगाना, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों को शामिल किया गया है। सबसे अधिक रिक्तियों वाले राज्यों में असम में 85, पश्चिम बंगाल में 80, कर्नाटक में 78, गुजरात में 77 और महाराष्ट्र में 67 पद शामिल हैं।

    इसके अलावा तेलंगाना में 41, तमिलनाडु में 51, जम्मू एवं कश्मीर में 9, लद्दाख में 2, अरुणाचल प्रदेश में 4, मणिपुर में 6, मेघालय में 8, मिजोरम में 5, नगालैंड में 5, सिक्किम में 5 और त्रिपुरा में 18 पद निर्धारित किए गए हैं। आंध्र प्रदेश में 4 पदों पर भर्ती होगी। इस तरह अलग-अलग राज्यों के लिए तय रिक्तियों के आधार पर उम्मीदवार आवेदन कर सकते हैं।

    एलबीओ पद के लिए आवेदन करने वाले उम्मीदवार के पास किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय या संस्थान से किसी भी विषय में स्नातक की डिग्री होना जरूरी है। इसके साथ ही अभ्यर्थी को उस राज्य की निर्धारित स्थानीय भाषा का पर्याप्त ज्ञान होना चाहिए, जिसके लिए वह आवेदन कर रहा है। स्थानीय भाषा में पढ़ने, लिखने और बोलने की क्षमता भर्ती प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होगी।

    आयु सीमा की बात करें तो उम्मीदवार की न्यूनतम उम्र 20 वर्ष और अधिकतम उम्र 30 वर्ष निर्धारित की गई है। आयु की गणना 1 जुलाई के आधार पर की जाएगी। आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को सरकारी नियमों के अनुसार अधिकतम आयु सीमा में छूट का लाभ मिलेगा। इसलिए आवेदन करने से पहले अभ्यर्थियों के लिए अपनी पात्रता और आयु सीमा से जुड़े सभी मानकों की जांच करना जरूरी होगा।

    उम्मीदवारों का चयन एक निर्धारित भर्ती प्रक्रिया के माध्यम से किया जाएगा। इसमें ऑनलाइन लिखित परीक्षा के बाद स्क्रीनिंग, स्थानीय भाषा दक्षता परीक्षा यानी एलएलपीटी और व्यक्तिगत साक्षात्कार शामिल होगा। सभी चरणों में निर्धारित मानकों को पूरा करने वाले उम्मीदवारों को अंतिम चयन के लिए योग्य माना जाएगा। चयनित उम्मीदवारों को 48,480 रुपये से लेकर 85,920 रुपये तक मासिक वेतनमान मिलेगा। इसके अलावा बैंक के नियमों के अनुसार अन्य भत्ते और सुविधाएं भी उपलब्ध होंगी।

    आवेदन शुल्क भी उम्मीदवार की श्रेणी के अनुसार अलग-अलग निर्धारित किया गया है। सामान्य, ओबीसी और ईडब्ल्यूएस श्रेणी के उम्मीदवारों के लिए शुल्क 1,180 रुपये रखा गया है, जबकि एससी और एसटी श्रेणी के उम्मीदवारों के लिए आवेदन शुल्क 59 रुपये निर्धारित है। शुल्क का भुगतान ऑनलाइन माध्यम से किया जाना होगा।

    आवेदन प्रक्रिया 20 जुलाई से शुरू हुई थी और अब उम्मीदवार 16 अगस्त तक आवेदन कर सकते हैं। अंतिम तिथि बढ़ने से उन अभ्यर्थियों को राहत मिली है जो किसी कारण से पहले निर्धारित समयसीमा में फॉर्म नहीं भर सके थे। हालांकि आवेदन की अंतिम तारीख का इंतजार करने के बजाय पात्र उम्मीदवारों को समय रहते आवेदन पूरा करना बेहतर रहेगा, ताकि दस्तावेजों, शुल्क भुगतान या आवेदन से जुड़ी किसी तकनीकी समस्या की स्थिति में पर्याप्त समय मिल सके।

  • तेल बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच रुपया मजबूत, अगले सप्ताह वैश्विक घटनाक्रम और डॉलर की चाल से मिलेंगे अहम संकेत

    तेल बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच रुपया मजबूत, अगले सप्ताह वैश्विक घटनाक्रम और डॉलर की चाल से मिलेंगे अहम संकेत

    नई दिल्ली । कमोडिटी बाजार के लिए आने वाला सप्ताह काफी अहम माना जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में उतार चढ़ाव, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपए की चाल और पश्चिम एशिया की भू राजनीतिक स्थिति बाजार की दिशा पर सीधा असर डाल सकती है। खास तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े घटनाक्रम पर निवेशकों की नजर रहेगी, क्योंकि इस क्षेत्र में किसी भी बदलाव का असर वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों पर पड़ सकता है।

    पिछले सप्ताह वैश्विक तेल बाजार में काफी अस्थिरता देखने को मिली। शुक्रवार को ब्रेंट क्रूड 1.29 प्रतिशत बढ़कर 83.55 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। हालांकि, यह स्तर पिछले सप्ताह के 90.12 डॉलर प्रति बैरल के बंद भाव से अभी भी नीचे है। इसी तरह अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट यानी डब्ल्यूटीआई सितंबर डिलीवरी वाला क्रूड 78.18 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ, जबकि पिछले सप्ताह इसका स्तर 84.67 डॉलर प्रति बैरल था।

    तेल बाजार में इस उतार चढ़ाव की प्रमुख वजह होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी परिस्थितियां रही हैं। यह जलमार्ग दुनिया के प्रमुख तेल परिवहन मार्गों में शामिल है। यहां जहाजरानी को लेकर किसी संभावित समझौते की उम्मीद से बाजार में आपूर्ति सामान्य होने की संभावना बनी है। अगर जलमार्ग के संचालन को लेकर स्थायी समाधान सामने आता है तो तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

    सप्ताह की शुरुआत में डब्ल्यूटीआई क्रूड में तेज गिरावट देखी गई थी। इसके पीछे अमेरिका की ओर से ईरान के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई को रोकने और कूटनीतिक समाधान की दिशा में आगे बढ़ने के संकेतों को प्रमुख कारण माना गया। बाद में जलमार्ग संचालन से जुड़ी सकारात्मक खबरों के कारण कच्चे तेल में कुछ सुधार आया।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अगले सप्ताह तेल बाजार में दोनों दिशाओं में तेज गतिविधि देखने को मिल सकती है। यदि होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह खोलने को लेकर औपचारिक समझौता होता है तो आपूर्ति संबंधी चिंताएं कम हो सकती हैं और कच्चे तेल की कीमतों में और नरमी आ सकती है। इसके विपरीत क्षेत्र में तनाव बढ़ने पर भू राजनीतिक जोखिम प्रीमियम वापस आ सकता है, जिससे तेल कीमतों में दोबारा तेजी देखने को मिल सकती है।

    घरेलू बाजार में मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज पर कच्चे तेल की कीमत सप्ताह के दौरान करीब 7,100 रुपये प्रति बैरल तक गिर गई थी। बाद में इसमें सुधार हुआ और भाव लगभग 7,400 रुपये के आसपास बंद हुआ। तकनीकी विश्लेषकों के मुताबिक 7,500 से 7,550 रुपये का स्तर निकट अवधि में प्रमुख प्रतिरोध बना हुआ है, जबकि 7,380 से 7,300 रुपये का दायरा अहम समर्थन क्षेत्र माना जा रहा है।

    यदि एमसीएक्स क्रूड इस समर्थन क्षेत्र से नीचे जाता है तो कीमत 7,250 रुपये तक फिसल सकती है। इसके बाद 7,100 से 7,000 रुपये के बीच मजबूत समर्थन मिलने की संभावना है। दूसरी ओर, 7,500 से 7,550 रुपये के ऊपर टिकने पर बाजार में तेजी का रुख मजबूत हो सकता है।

    इधर भारतीय रुपया भी पिछले सप्ताह अपेक्षाकृत मजबूत दिखाई दिया। डॉलर के मुकाबले यूएसडी/आईएनआर करीब 95.2 रुपये पर बंद हुआ, जबकि सप्ताह के दौरान यह लगभग 94.9 रुपये के निचले स्तर तक पहुंचा। तकनीकी संकेत फिलहाल रुपए के पक्ष में नजर आ रहे हैं। यदि विनिमय दर 94.9 रुपये से नीचे बनी रहती है तो रुपया 94.7 से 94.5 रुपये तक मजबूत हो सकता है।

    वहीं 95.2 से 95.4 रुपये का स्तर डॉलर के लिए महत्वपूर्ण प्रतिरोध क्षेत्र माना जा रहा है। इसके ऊपर जाने पर यूएसडी/आईएनआर 95.5 से 95.7 रुपये तक पहुंच सकता है और रुपए पर दबाव बढ़ सकता है। तकनीकी संकेतकों में आरएसआई के ऊंचे स्तरों से नीचे आने और एमएसीडी में डॉलर की तेजी की रफ्तार घटने के संकेत मिल रहे हैं।

    अगले सप्ताह बाजार की दिशा केवल तकनीकी स्तरों से तय नहीं होगी। अमेरिकी डॉलर की चाल, विदेशी निवेशकों का प्रवाह, कच्चे तेल की कीमतें और पश्चिम एशिया की भू राजनीतिक स्थिति प्रमुख कारक रहेंगे। वैश्विक परिस्थितियां स्थिर रहने पर रुपए को मजबूती और तेल कीमतों में नरमी मिल सकती है, जबकि तनाव बढ़ने पर कमोडिटी बाजार में फिर से अस्थिरता बढ़ने की संभावना रहेगी।

  • डीपफेक पर मेटा से सरकार की दो टूक, कार्रवाई नहीं हुई तो भारतीय कानून के तहत तय हो सकती है कंपनी की जवाबदेही

    डीपफेक पर मेटा से सरकार की दो टूक, कार्रवाई नहीं हुई तो भारतीय कानून के तहत तय हो सकती है कंपनी की जवाबदेही

    नई दिल्ली । डीपफेक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार होने वाली भ्रामक सामग्री को लेकर केंद्र सरकार ने सोशल मीडिया मंच मेटा के प्रति सख्त रुख अपनाया है। सरकार ने कंपनी से डीपफेक सामग्री के खिलाफ ठोस और प्रभावी कदम उठाने को कहा है। साथ ही मेटा के साथ हुई बैठकों के परिणामों की समीक्षा के बाद आगे की कार्रवाई को लेकर कानूनी राय लेने की प्रक्रिया शुरू करने की बात सामने आई है। सरकार यह भी जांच कर रही है कि भारतीय कानून के तहत मेटा और अन्य ऑनलाइन मंचों को मिलने वाले मध्यस्थ के दर्जे की शर्तों का सही तरीके से पालन किया जा रहा है या नहीं।

    सरकारी सूत्रों के अनुसार, मौजूदा समीक्षा का मुख्य सवाल यह है कि ऑनलाइन मंच भारतीय कानून में मध्यस्थों के लिए निर्धारित जिम्मेदारियों का पालन कर रहे हैं या नहीं। सरकार यह भी देख रही है कि यदि किसी मंच की तकनीकी प्रणाली यह तय करती है कि किसी यूजर को कौन-सी सामग्री दिखाई जाएगी, तो उस स्थिति में उसकी भूमिका केवल एक निष्क्रिय मध्यस्थ तक सीमित मानी जा सकती है या नहीं। इसी आधार पर संबंधित कंपनियों की जिम्मेदारी तय करने को लेकर कानूनी पहलुओं की जांच की जा रही है।

    सरकार की नजर केवल मेटा तक सीमित नहीं रहने वाली है। आने वाले समय में अन्य प्रमुख ऑनलाइन मंचों को भी बातचीत के लिए बुलाया जा सकता है। इनके माध्यम से यह समझने की कोशिश होगी कि उनकी अनुशंसा प्रणाली किस तरह काम करती है और यूजर्स तक सामग्री पहुंचाने में उनकी तकनीकी भूमिका कितनी सक्रिय है। सरकार यह भी देख रही है कि भुगतान वाली सामग्री को बढ़ावा देने और यूजर के लिए सामग्री चुनने वाली प्रणालियों की भूमिका भारतीय कानून के मौजूदा प्रावधानों के तहत किस तरह निर्धारित होती है।

    डीपफेक को लेकर सरकार की चिंता इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि एआई तकनीक के इस्तेमाल से वास्तविक व्यक्ति के चेहरे, आवाज और वीडियो को बदलकर ऐसी सामग्री तैयार की जा सकती है, जो देखने में वास्तविक लगती है। ऐसी सामग्री का इस्तेमाल गलत सूचना फैलाने, किसी व्यक्ति की छवि खराब करने और लोगों को भ्रमित करने के लिए किया जा सकता है। बिना स्पष्ट लेबल वाली एआई-जनित सामग्री भी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर यूजर्स के लिए भ्रम की स्थिति पैदा कर सकती है।

    सरकार और मेटा के बीच इस मुद्दे पर लगातार कई दौर की बैठकें हुई हैं। दो दिनों तक कंपनी की टीम से विस्तृत पूछताछ के बाद तीसरे दिन तकनीकी स्तर पर चर्चा की गई। इसमें डीपफेक, बाल यौन शोषण सामग्री और बिना लेबल वाली एआई-जनित सामग्री से निपटने के लिए कंपनी की कार्ययोजना पर विशेष रूप से चर्चा हुई। सरकार की ओर से प्लेटफॉर्म की तकनीकी व्यवस्था और कंटेंट मॉडरेशन प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए गए।

    यह पूरा मामला उस घटनाक्रम के बाद और महत्वपूर्ण हो गया, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक सोशल मीडिया पोस्ट पर मेटा के एआई आधारित कंटेंट फिल्टर की वजह से अस्थायी रोक लग गई थी। बाद में कंपनी ने इसे तकनीकी गलती बताया और पोस्ट बहाल करते हुए माफी मांगी थी। इसके बाद सरकार और कंपनी के बीच हुई बैठकों में प्लेटफॉर्म की कंटेंट मॉडरेशन व्यवस्था और तकनीकी प्रणालियों की भूमिका पर विशेष ध्यान दिया गया।

    अब सरकार बैठकों से मिले जवाबों और मेटा की कार्ययोजना की समीक्षा कर रही है। इसके बाद कानूनी राय के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जा सकती है। यदि जांच में यह पाया जाता है कि प्लेटफॉर्म भारतीय कानून के तहत अपनी जिम्मेदारियों का पालन नहीं कर रहे हैं, तो उनकी जवाबदेही तय करने की दिशा में कदम उठाए जा सकते हैं। इससे भारत में डीपफेक, एआई सामग्री और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी को लेकर नियामकीय व्यवस्था और सख्त होने के संकेत मिल रहे हैं।

  • पीयूष गोयल बोले- मिथिला मखाना की बढ़ती विदेशी मांग से बिहार के किसानों को मिल रहे आय और रोजगार के नए अवसर

    पीयूष गोयल बोले- मिथिला मखाना की बढ़ती विदेशी मांग से बिहार के किसानों को मिल रहे आय और रोजगार के नए अवसर

    नई दिल्ली । बिहार के प्रसिद्ध जीआई टैग प्राप्त मिथिला मखाना ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी मजबूत पहचान बनाने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने शनिवार को बताया कि बिहार से पहली बार 18 मीट्रिक टन मिथिला मखाना समुद्री मार्ग के जरिए ऑस्ट्रेलिया निर्यात किया गया है। इस उपलब्धि को राज्य के किसानों और कृषि निर्यात क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सरकार का कहना है कि विदेशी बाजारों में मिथिला मखाना की बढ़ती मांग से बिहार के किसानों के लिए आय बढ़ाने और नए कारोबारी अवसर पैदा होने की संभावनाएं मजबूत हुई हैं।

    पीयूष गोयल ने बताया कि कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण के सहयोग से जीआई टैग वाले मिथिला मखाना की खेप ऑस्ट्रेलिया भेजी गई। खास बात यह रही कि निर्यात के लिए मखाना सीधे दरभंगा के किसानों से खरीदा गया। इससे स्थानीय उत्पादकों को अंतरराष्ट्रीय बाजार से जुड़ने का अवसर मिला। मंत्री के अनुसार, इस पहल में शामिल किसानों को सामान्य बाजार भाव की तुलना में लगभग 18 प्रतिशत अधिक लाभ प्राप्त हुआ है। इससे मखाना उत्पादन से जुड़े किसानों की आय बढ़ाने की संभावनाओं को बल मिला है।

    मिथिला मखाना बिहार की कृषि अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। मिथिला क्षेत्र में उत्पादित यह कृषि उपज अपनी गुणवत्ता, स्वाद और पौष्टिकता के लिए देश के साथ-साथ विदेशी बाजारों में भी पहचान बना रही है। बदलती खाद्य आदतों के बीच मखाना स्वास्थ्यवर्धक स्नैक के रूप में तेजी से लोकप्रिय हुआ है। कम तेल में तैयार किए जाने वाले और विभिन्न स्वादों में उपलब्ध मखाने की मांग विशेष रूप से शहरी तथा अंतरराष्ट्रीय उपभोक्ता बाजार में बढ़ी है।

    ऑस्ट्रेलिया को समुद्री मार्ग से हुआ यह निर्यात ऐसे समय में हुआ है, जब बिहार के मखाना उत्पाद लगातार नए विदेशी बाजारों में पहुंच बना रहे हैं। इससे पहले बिहार से पहली बार समुद्री मार्ग के जरिए कनाडा को भी मखाना निर्यात किया गया था। उस दौरान दरभंगा से सात मीट्रिक टन फ्लेवर्ड मखाना कनाडा भेजा गया था। इस निर्यात को भी कृषि उत्पादों को वैश्विक बाजार से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना गया था।

    विदेशी बाजारों में बढ़ती मांग का असर केवल मखाना किसानों तक सीमित रहने की संभावना नहीं है। निर्यात बढ़ने से मखाना की सफाई, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, भंडारण और मूल्य संवर्धन से जुड़े कारोबार को भी प्रोत्साहन मिल सकता है। इससे बिहार में कृषि आधारित छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए नए अवसर पैदा हो सकते हैं। यदि अंतरराष्ट्रीय मांग लगातार बनी रहती है तो स्थानीय स्तर पर मखाना प्रसंस्करण केंद्रों और आधुनिक पैकेजिंग सुविधाओं के विस्तार को भी बढ़ावा मिल सकता है।

    ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे बाजारों में भारतीय मखाने की पहुंच बढ़ना बिहार के कृषि उत्पादों के लिए सकारात्मक संकेत है। समुद्री मार्ग से निर्यात होने से बड़े अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक नियमित आपूर्ति की संभावनाएं बढ़ती हैं और कृषि उत्पादों को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में शामिल करने में मदद मिलती है। इससे किसानों को स्थानीय बाजार पर निर्भर रहने के बजाय व्यापक बाजार तक पहुंच बनाने का अवसर मिल सकता है।

    मिथिला मखाना का लगातार विदेशी बाजारों में पहुंचना बिहार के कृषि निर्यात के लिए नई संभावनाएं खोल रहा है। बेहतर कीमत, बढ़ता निर्यात और प्रसंस्करण क्षेत्र में संभावित निवेश किसानों की आय बढ़ाने के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती दे सकता है। आने वाले समय में यदि अन्य अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी मिथिला मखाना की मांग बढ़ती है तो बिहार भारत के प्रमुख कृषि निर्यात केंद्रों में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकता है।

  • पीयूष गोयल बोले, बिहार की प्रतिभा और उत्पादों को मिल रही नई पहचान, मुक्त व्यापार समझौतों से बढ़ेंगे निर्यात के अवसर

    पीयूष गोयल बोले, बिहार की प्रतिभा और उत्पादों को मिल रही नई पहचान, मुक्त व्यापार समझौतों से बढ़ेंगे निर्यात के अवसर

    नई दिल्ली । वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने शनिवार को कहा कि बिहार की प्रतिभा और राज्य में तैयार होने वाले उत्पादों को वैश्विक बाजार में नई पहचान मिल रही है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार की ओर से किए जा रहे नए मुक्त व्यापार समझौतों यानी एफटीए के माध्यम से बिहार के किसानों, छोटे उद्योगों, उद्यमियों और निर्यातकों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच के नए अवसर तैयार हो रहे हैं।

    गोयल ने कहा कि बिहार के कृषि और कृषि-प्रसंस्कृत उत्पादों के साथ टेक्सटाइल, चमड़ा, फुटवियर, इंजीनियरिंग, रसायन और फार्मास्युटिकल क्षेत्र से जुड़े उत्पादों के लिए दुनिया के विभिन्न बाजारों के दरवाजे खुल रहे हैं। इससे राज्य के उत्पादों को घरेलू बाजार से आगे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने और निर्यात बढ़ाने में मदद मिल सकती है। उन्होंने इस बदलाव को बिहार की आर्थिक क्षमता और स्थानीय प्रतिभा के लिए महत्वपूर्ण अवसर बताया।

    केंद्र सरकार के अनुसार, भारत ने वित्त वर्ष 2025-26 में 863.1 अरब डॉलर का रिकॉर्ड निर्यात दर्ज किया है। सरकार लगातार भारतीय उत्पादों के लिए नए बाजार तलाशने और मौजूदा बाजारों में पहुंच बढ़ाने पर जोर दे रही है। मुक्त व्यापार समझौतों के जरिए भारतीय कंपनियों को विभिन्न देशों में व्यापार करने के लिए बेहतर परिस्थितियां उपलब्ध कराने की कोशिश की जा रही है। इससे निर्यात को अधिक विविध बनाने के साथ श्रम-प्रधान क्षेत्रों को भी मजबूत करने की उम्मीद है।

    सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में व्यापारिक साझेदार देशों के साथ कई महत्वपूर्ण मुक्त व्यापार समझौतों को आगे बढ़ाया है। इनमें भारत-मॉरीशस सीईसीपीए, भारत-यूएई सीईपीए, भारत-ऑस्ट्रेलिया ईसीटीए, भारत-ईएफटीए टीईपीए, भारत-ओमान सीईपीए, भारत-यूके सीईटीए और भारत-न्यूजीलैंड एफटीए जैसे समझौते शामिल हैं। इन समझौतों का उद्देश्य द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने के साथ भारतीय उत्पादों के लिए नए बाजार उपलब्ध कराना है।

    एफटीए के तहत व्यापारिक साझेदार देशों के बीच शुल्क और अन्य व्यापारिक बाधाओं को कम करने की दिशा में काम किया जाता है। इससे भारतीय निर्यातकों के लिए विदेशी बाजारों में प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता बढ़ सकती है। विशेष रूप से टेक्सटाइल, परिधान, चमड़ा और फुटवियर जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों के लिए ऐसे समझौते रोजगार और उत्पादन बढ़ाने के लिहाज से महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

    सरकार का कहना है कि व्यापार समझौतों को तैयार करते समय भारतीय उद्योग, किसानों, निर्यातकों और अन्य हितधारकों के हितों को ध्यान में रखा जा रहा है। इसके साथ ही विदेशी बाजारों में तकनीकी मानकों और नियमों से जुड़ी बाधाओं को कम करने की दिशा में भी प्रयास किए जा रहे हैं। अलग-अलग देशों के मानकों को समझने और भारतीय उत्पादों को उनके अनुरूप तैयार करने से निर्यातकों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रवेश आसान हो सकता है।

    निर्यात को बढ़ावा देने के लिए सरकार निर्यात संवर्धन मिशन, विदेशों में भारतीय मिशनों, निर्यात संवर्धन परिषदों, उद्योग संगठनों और अन्य संबंधित पक्षों के साथ मिलकर काम कर रही है। द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और बहुपक्षीय मंचों पर लगातार बातचीत के जरिए भारतीय उत्पादों के लिए बेहतर बाजार पहुंच सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसे में बिहार के कृषि, विनिर्माण और श्रम-प्रधान क्षेत्रों के उत्पादों के लिए वैश्विक बाजार में विस्तार की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।