Category: Economy

  • सितंबर को बाजार में संभलकर कदम रखें निवेशक, ग्लोबल संकेतों से लेकर तेल कीमतों तक कई फैक्टर तय करेंगे Nifty-Sensex की दिशा

    सितंबर को बाजार में संभलकर कदम रखें निवेशक, ग्लोबल संकेतों से लेकर तेल कीमतों तक कई फैक्टर तय करेंगे Nifty-Sensex की दिशा


    नई दिल्ली। 1 सितंबर को भारतीय शेयर बाजार की चाल पर निवेशकों की नजर बनी हुई है। अगस्त के आखिरी कारोबारी सत्र में घरेलू बाजार दबाव में नजर आया और अब नए महीने की शुरुआत कई महत्वपूर्ण संकेतों के बीच हो रही है। सोमवार को Nifty 50 और Sensex में गिरावट दर्ज की गई थी जबकि कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और वैश्विक स्तर पर ब्याज दरों को लेकर बढ़ती चिंता ने बाजार के सेंटीमेंट पर दबाव बनाया। 31 अगस्त को Nifty 50 करीब 0.74 प्रतिशत की गिरावट के साथ 23997.10 के स्तर तक पहुंच गया था जबकि Sensex भी करीब 0.66 प्रतिशत नीचे 76751.32 के आसपास रहा।

    1 सितंबर के कारोबार में सबसे बड़ा फोकस MSCI रीबैलेंसिंग पर रहने वाला है। इंडेक्स में बदलाव प्रभावी होने के साथ कई शेयरों में फंड फ्लो बढ़ सकता है। बाजार रिपोर्टों के मुताबिक Laurus Labs Adani Energy Solutions Lenskart और Groww जैसे शेयरों को इंडेक्स बदलाव से फायदा मिल सकता है जबकि Reliance Industries और Jio Financial Services जैसे बड़े शेयरों में आउटफ्लो का दबाव देखने को मिल सकता है। ऐसे में बाजार का मुख्य सूचकांक भले ही सीमित दायरे में रहे लेकिन कुछ खास शेयरों में तेज खरीदारी या बिकवाली देखने को मिल सकती है।

    MSCI रीबैलेंसिंग के साथ बाजार में नए Closing Auction Session को लेकर भी निवेशकों की नजर बनी हुई है। यह व्यवस्था अगस्त की शुरुआत से लागू हुई है और 1 सितंबर का MSCI बदलाव इस नई व्यवस्था के लिए पहला बड़ा परीक्षण माना जा रहा है। बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक कम ट्रेडिंग वॉल्यूम वाले शेयरों में इंडेक्स से जुड़े बड़े फंड फ्लो आने पर कीमतों में सामान्य दिनों की तुलना में ज्यादा उतार चढ़ाव देखने को मिल सकता है। हालांकि व्यापक बाजार पर इसका असर सीमित रहने की उम्मीद जताई गई है।

    इसके अलावा कच्चे तेल की कीमतें भी भारतीय बाजार के लिए अहम संकेत बनी हुई हैं। तेल की कीमतों में तेजी से भारत के आयात बिल पर दबाव बढ़ सकता है और इससे महंगाई तथा रुपये की चाल पर भी असर पड़ सकता है। दूसरी ओर 31 अगस्त को भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले करीब 0.2 प्रतिशत मजबूत होकर 95.1625 पर बंद हुआ और करीब चार सप्ताह के उच्च स्तर पर पहुंच गया। बाजार में MSCI से जुड़े प्रवाह और भारतीय रिजर्व बैंक के समर्थन को रुपये की मजबूती के प्रमुख कारणों में गिना गया।

    बैंकिंग शेयरों में भी निवेशकों को सतर्क नजर रखनी होगी। HDFC Bank के शेयरों में हालिया कमजोरी ने बाजार के प्रमुख सूचकांकों पर दबाव बढ़ाया है। 31 अगस्त को बैंक के शेयर में करीब 1.6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी। वहीं बाजार में वैश्विक ब्याज दरों को लेकर भी चिंता बनी हुई है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व की संभावित नीति को लेकर संकेत आने वाले दिनों में विदेशी निवेशकों की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

    ऐसे माहौल में 1 सितंबर का कारोबार निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। बाजार में किसी एक दिशा में तेजी या गिरावट के बजाय शेयर आधारित गतिविधियां ज्यादा देखने को मिल सकती हैं। इसलिए निवेशकों को केवल बाजार की तेजी देखकर खरीदारी करने या गिरावट देखकर घबराकर बिकवाली करने के बजाय कंपनी के फंडामेंटल और बाजार के जोखिम को ध्यान में रखना चाहिए। खासतौर पर MSCI बदलाव से प्रभावित शेयरों में अचानक आने वाली हलचल को समझना जरूरी होगा। कुल मिलाकर नए महीने की शुरुआत घरेलू संकेतों के साथ वैश्विक बाजार कच्चे तेल रुपये और इंडेक्स रीबैलेंसिंग के बीच होने जा रही है और यही फैक्टर मंगलवार को शेयर बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

  • ग्लोबल तनाव के बीच भारत की इकोनॉमी ने पकड़ी रफ्तार GDP 7.8% बढ़ी घरेलू मांग और सर्विस सेक्टर ने संभाली विकास की कमान

    ग्लोबल तनाव के बीच भारत की इकोनॉमी ने पकड़ी रफ्तार GDP 7.8% बढ़ी घरेलू मांग और सर्विस सेक्टर ने संभाली विकास की कमान


    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और वैश्विक बाजार में बढ़ती अनिश्चितता के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था ने एक बार फिर अपनी मजबूती का प्रदर्शन किया है। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही यानी अप्रैल से जून के दौरान देश की GDP ग्रोथ 7.8 प्रतिशत दर्ज की गई है। यह आंकड़ा भारतीय रिजर्व बैंक के 7 प्रतिशत के अनुमान से काफी बेहतर है। एक साल पहले इसी अवधि में GDP ग्रोथ 6.9 प्रतिशत रही थी। ऐसे में ताजा आंकड़े यह संकेत दे रहे हैं कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारत की आर्थिक गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं।

    सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक पहली तिमाही में रियल GDP बढ़कर 81.36 लाख करोड़ रुपए हो गई जबकि एक साल पहले इसी अवधि में यह 75.46 लाख करोड़ रुपए थी। इसी दौरान रियल GVA में 8.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई और यह 73.82 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया। नॉमिनल GDP भी 10.3 प्रतिशत बढ़कर 88.27 लाख करोड़ रुपए रही। वहीं नॉमिनल GVA में 11.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

    भारतीय अर्थव्यवस्था के इस मजबूत प्रदर्शन में सर्विस सेक्टर की अहम भूमिका रही है। फाइनेंस रियल एस्टेट IT और प्रोफेशनल सर्विसेज जैसे क्षेत्रों में 12 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि देखने को मिली। इन सेक्टर्स में तेजी ने आर्थिक गतिविधियों को गति देने के साथ घरेलू मांग को भी मजबूती प्रदान की। पैसेंजर व्हीकल और हाउसहोल्ड व्हीकल रजिस्ट्रेशन में भी मजबूत वृद्धि दर्ज की गई है जो उपभोक्ताओं के बीच खर्च करने की क्षमता और आर्थिक भरोसे का संकेत देती है।

    इस प्रदर्शन को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इस दौरान पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण कच्चे तेल और गैस की कीमतों पर दबाव बढ़ा है। ऊर्जा की ऊंची कीमतें भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए महंगाई और लागत दोनों को प्रभावित कर सकती हैं। इसके बावजूद पहली तिमाही में GDP की रफ्तार 7.8 प्रतिशत रहना अर्थव्यवस्था की आंतरिक मजबूती को दर्शाता है। हालांकि विशेषज्ञों के लिए आगे की तिमाहियां भी महत्वपूर्ण रहेंगी क्योंकि लंबे समय तक चलने वाला वैश्विक तनाव आर्थिक गतिविधियों पर दबाव डाल सकता है।

    GDP के आंकड़ों में इस बार एक और महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला है। सरकार ने नई सीरीज के तहत 2022-23 को नया बेस ईयर बनाया है। इसके साथ अर्थव्यवस्था को मापने की प्रक्रिया में कई नए आंकड़ों को शामिल किया गया है। GST नेटवर्क ई-वाहन डेटाबेस और घरेलू सेवाओं से जुड़े आंकड़े भी नई व्यवस्था का हिस्सा बनाए गए हैं। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की GVA गणना में डबल डिफ्लेशन अप्रोच को भी शामिल किया गया है।

    नए बेस ईयर का उद्देश्य अर्थव्यवस्था में समय के साथ आए बदलावों को ज्यादा सटीक तरीके से आंकड़ों में शामिल करना है। मौजूदा अर्थव्यवस्था में डिजिटल भुगतान गिग इकोनॉमी ऑनलाइन सेवाओं और नए उपभोक्ता व्यवहार की भूमिका बढ़ी है। ऐसे में पुराने आधार वर्ष के बजाय नए आर्थिक ढांचे को ध्यान में रखकर आंकड़ों की गणना करना जरूरी माना गया है।

    हालांकि पहली तिमाही का प्रदर्शन उम्मीद से बेहतर रहा है लेकिन पूरे वित्त वर्ष की तस्वीर अभी बाकी है। RBI ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए GDP ग्रोथ का अनुमान 6.7 प्रतिशत रखा है। आगे की तिमाहियों में 6.4 प्रतिशत से 6.8 प्रतिशत के बीच वृद्धि का अनुमान जताया गया है। अगर वैश्विक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों का दबाव लंबे समय तक नहीं रहता है तो मजबूत घरेलू मांग और निवेश भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार को आगे भी बनाए रख सकते हैं।

  • भारतीय अर्थव्यवस्था की ताकत पर मारुति चेयरमैन का भरोसा! 2031 तक 63 लाख कारों का बाजार होने का अनुमान

    भारतीय अर्थव्यवस्था की ताकत पर मारुति चेयरमैन का भरोसा! 2031 तक 63 लाख कारों का बाजार होने का अनुमान


    नई दिल्ली। मारुति सुजुकी इंडिया के चेयरमैन आरसी भार्गव ने भारतीय अर्थव्यवस्था और ऑटो सेक्टर को लेकर बड़ा भरोसा जताया है। उन्होंने कहा है कि जीएसटी 2.0 के सुधारों ने न केवल ऑटोमोबाइल सेक्टर को फायदा पहुंचाया है बल्कि अर्थव्यवस्था के कई दूसरे क्षेत्रों को भी मजबूती दी है। पश्चिमी एशिया में युद्ध के कारण पैदा हुई वैश्विक अस्थिरता के बीच भी भारत की अर्थव्यवस्था का मजबूत प्रदर्शन इस बात का संकेत है कि आर्थिक सुधारों का असर जमीन पर दिखाई दे रहा है। भार्गव ने यह बात कंपनी की वार्षिक आम बैठक में शेयरधारकों को संबोधित करते हुए कही।

    भार्गव के मुताबिक भारतीय अर्थव्यवस्था मौजूदा चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी अच्छा प्रदर्शन कर रही है। पश्चिमी एशिया में युद्ध के कारण दुनिया के कई हिस्सों में आर्थिक अनिश्चितता बढ़ी है लेकिन इसके बावजूद भारत का जीएसटी कलेक्शन अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर बना हुआ है। उनका मानना है कि अगर जीएसटी में सुधार नहीं किए गए होते तो पिछले कुछ मुश्किल महीनों में भारतीय अर्थव्यवस्था इतना बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाती। उन्होंने जीएसटी सुधारों को ऐतिहासिक बदलाव बताते हुए केंद्र सरकार और संबंधित सभी पक्षों के प्रयासों की सराहना की।

    मारुति सुजुकी चेयरमैन ने कहा कि आर्थिक सुधारों से देश की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ती है और इसका सीधा असर आर्थिक गतिविधियों पर पड़ता है। जब कारोबार का विस्तार होता है तो रोजगार के अवसर भी बढ़ते हैं। उन्होंने केंद्र और राज्य सरकारों से सुधारों की प्रक्रिया को और तेज करने की अपील की। साथ ही कारोबार करना आसान बनाने और तकनीक के इस्तेमाल को बढ़ावा देने पर जोर दिया। उनके अनुसार सरकारी कामकाज में तकनीक का अधिक इस्तेमाल होने से भ्रष्टाचार और देरी को कम करने में मदद मिल सकती है।

    आरसी भार्गव ने यह भी कहा कि देश में जितनी तेजी से संपत्ति का निर्माण होगा उतनी ही तेजी से सरकारी राजस्व में भी बढ़ोतरी होगी। उनका मानना है कि यदि सरकारी कार्यक्रम इसी दिशा में आगे बढ़ते रहे तो आर्थिक विकास का लाभ समाज के ज्यादा बड़े हिस्से तक पहुंच सकता है। इस दौरान उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था में मौजूद विकास की संभावनाओं को लेकर भी सकारात्मक रुख जाहिर किया।

    ऑटोमोबाइल सेक्टर की बात करें तो मारुति सुजुकी ने आने वाले वर्षों में कार बाजार के मजबूत विस्तार का अनुमान जताया है। कंपनी के अनुसार वर्ष 2031 तक भारत में कार इंडस्ट्री का आकार 61 लाख से 63 लाख यूनिट तक पहुंच सकता है। खासतौर पर छोटी कारों के बाजार में आने वाले वर्षों में तेज वृद्धि की उम्मीद जताई गई है। कंपनी इस बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए अपनी उत्पादन क्षमता में लगातार विस्तार कर रही है।

    मारुति सुजुकी की इंस्टॉल्ड प्रोडक्शन क्षमता वित्त वर्ष 2026-27 के अंत तक 29 लाख यूनिट तक पहुंचाने की योजना है। इसके बाद वित्त वर्ष 2030-31 के अंत तक इसे बढ़ाकर 36.5 लाख यूनिट करने का लक्ष्य रखा गया है। कंपनी ने अगले पांच वर्षों के लिए अपना पूंजीगत खर्च भी बढ़ाकर 77500 करोड़ रुपए कर दिया है। भार्गव ने संकेत दिया कि कंपनी का यह बड़ा निवेश भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास क्षमता और आने वाले समय में ऑटोमोबाइल बाजार में बढ़ती मांग पर भरोसे को दर्शाता है।

  • देश में क्रेडिट कार्ड का चलन बढ़ा… जानिए कितने Card बनवा सकता है एक व्यक्ति

    देश में क्रेडिट कार्ड का चलन बढ़ा… जानिए कितने Card बनवा सकता है एक व्यक्ति


    नई दिल्ली।
    लोग अपने आज के खर्चो (Expenses) को पूरा करने के साथ ही अपने आने वाले कल के लिए बचत (Savings) भी करते हैं, लेकिन इस बीच लोगों में एक चलन तेजी से बढ़ा है और वो है क्रेडिट कार्ड (Credit Card) का चलन।

    खासतौर पर नौकरीपेशा लोग क्रेडिट कार्ड (Credit Card) काफी बनवा रहे हैं। वो भी एक बैंक (Bank) के लिए नहीं बल्कि, कई अलग-अलग बैंकों को अलग-अलग क्रेडिट कार्ड बनवाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक व्यक्ति कितने क्रेडिट कार्ड बनवा सकता है? शायद नहीं, तो चलिए जानते हैं इसको लेकर नियम क्या हैं…

    क्रेडिट कार्ड बनवाने के फायदे क्या हैं?

    – क्रेडिट स्कोर बेहतर होता है जिससे आसानी से बड़ा लोन मिल सकता है
    – इमरजेंसी में मदद मिलती है
    – पैसे न होने पर एकदम आप खर्चा कर सकते हैं और उसे आराम से EMI में भर सकते हैं
    – डिस्काउंट, कैशबैक जैसी सुविधाएं मिलती हैं आदि


    क्रेडिट कार्ड बनवाने के नुकसान क्या हैं?

    – अनावश्यक खर्चे की आदत लग सकती है
    – अगर समय पर पैसे नहीं भरे, तो सिबिल स्कोर खराब हो सकता है जिससे भविष्य में लोन नहीं मिल पाता या दिक्कतें आती हैं आदि


    कितने क्रेडिट कार्ड बनवा सकता है एक व्यक्ति?

    – दरअसल, भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआई का इसको लेकर कोई लिमिट तय नहीं है
    – एक व्यक्ति जितने बैंक के चाहे उतने क्रेडिट कार्ड बनवा सकता है
    – हालांकि, क्रेडिट कार्ड की पेमेंट को लेकर नियम जरूर सख्त हैं
    – क्रेडिट कार्ड आप जितने बैंक के मर्जी बनवा लें, लेकिन पेमेंट आपको सभी की समय पर करनी होती है
    – अगर पेमेंट मिस हुई या आप पेमेंट नहीं कर पाते
    – ऐसे में आप लोन डिफॉल्टर घोषित किए जा सकते हैं
    – इसलिए क्रेडिट कार्ड तो बनवा लें, लेकिन पेमेंट का ध्यान जरूर रखें

  • शेयर मार्केट में पैसा लगाने वालों के लिए बड़ी खबर: बिना सोचे समझे निवेश से बचें बाजार की चाल के साथ इन बातों पर दें खास ध्यान

    शेयर मार्केट में पैसा लगाने वालों के लिए बड़ी खबर: बिना सोचे समझे निवेश से बचें बाजार की चाल के साथ इन बातों पर दें खास ध्यान


    नई दिल्ली। शेयर मार्केट में निवेश करने वालों के लिए बाजार की चाल हमेशा एक जैसी नहीं रहती है। कभी सेंसेक्स और निफ्टी में तेजी देखने को मिलती है तो कभी अचानक गिरावट निवेशकों की चिंता बढ़ा देती है। ऐसे माहौल में शेयर बाजार से कमाई की उम्मीद रखने वाले निवेशकों के लिए सबसे जरूरी है कि वे बिना सोचे समझे किसी शेयर में पैसा लगाने के बजाय बाजार की स्थिति और कंपनी के प्रदर्शन को अच्छी तरह समझें। शेयर बाजार में मुनाफे की संभावना जरूर होती है लेकिन इसके साथ जोखिम भी जुड़ा रहता है इसलिए निवेश का फैसला सोच समझकर करना बेहद जरूरी है।

    बाजार में तेजी के दौरान अक्सर निवेशकों का उत्साह बढ़ जाता है और कई लोग तेजी से बढ़ते शेयरों को देखकर बिना पर्याप्त जानकारी के निवेश कर देते हैं। यही जल्दबाजी बाद में नुकसान का कारण बन सकती है। किसी भी कंपनी के शेयर खरीदने से पहले उसके कारोबार की स्थिति वित्तीय प्रदर्शन कर्ज मुनाफा और भविष्य की संभावनाओं को समझना जरूरी है। केवल सोशल मीडिया पर चल रही चर्चा या किसी दूसरे व्यक्ति की सलाह के आधार पर निवेश करना जोखिम भरा हो सकता है।

    शेयर बाजार में सफल निवेश के लिए धैर्य को सबसे महत्वपूर्ण गुणों में से एक माना जाता है। बाजार में रोज होने वाले उतार चढ़ाव से घबराकर बार बार खरीद और बिक्री करने से निवेश की रणनीति प्रभावित हो सकती है। अगर किसी निवेशक का लक्ष्य लंबे समय का है तो उसे बाजार की छोटी अवधि की हलचल के बजाय कंपनी की बुनियादी स्थिति पर ध्यान देना चाहिए। वहीं कम अवधि में निवेश करने वाले लोगों के लिए बाजार की अस्थिरता और जोखिम को समझना और भी जरूरी हो जाता है।

    निवेशकों को अपने पूरे पैसे को एक ही शेयर या एक ही सेक्टर में लगाने से भी बचना चाहिए। अलग अलग क्षेत्रों और परिसंपत्तियों में निवेश का संतुलन जोखिम को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है। निवेश से पहले यह तय करना भी जरूरी है कि व्यक्ति कितना जोखिम उठा सकता है और उसे अपने पैसे की जरूरत कब पड़ सकती है। आपातकालीन जरूरत के लिए रखे गए पैसे को शेयर बाजार में लगाने से बचना समझदारी हो सकती है।

    बाजार पर घरेलू और वैश्विक घटनाओं का भी असर पड़ता है। ब्याज दरों में बदलाव महंगाई कंपनियों के तिमाही नतीजे कच्चे तेल की कीमतें विदेशी निवेशकों की गतिविधियां और वैश्विक बाजारों का रुख भारतीय शेयर बाजार को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा किसी बड़ी आर्थिक या राजनीतिक घटना के बाद बाजार में अचानक उतार चढ़ाव देखने को मिल सकता है। ऐसे समय में निवेशकों को भावनाओं के आधार पर फैसला लेने के बजाय तथ्यों और विश्वसनीय जानकारी पर ध्यान देना चाहिए।

    शेयर बाजार में निवेश करते समय यह समझना भी जरूरी है कि पिछला रिटर्न भविष्य में उसी तरह का प्रदर्शन होने की गारंटी नहीं देता। किसी शेयर का लगातार बढ़ना यह सुनिश्चित नहीं करता कि वह आगे भी उसी गति से बढ़ेगा। इसी तरह बाजार में गिरावट का मतलब हमेशा यह नहीं होता कि हर कंपनी खराब प्रदर्शन कर रही है। इसलिए निवेश का निर्णय कंपनी की वास्तविक स्थिति और अपनी वित्तीय योजना को ध्यान में रखकर लेना चाहिए।

    कुल मिलाकर शेयर बाजार में सफलता केवल तेजी के दौरान मुनाफा कमाने से नहीं बल्कि जोखिम को समझने और सही रणनीति अपनाने से जुड़ी है। निवेशकों को बाजार की खबरों पर नजर रखने के साथ अपनी वित्तीय स्थिति निवेश अवधि और जोखिम क्षमता का आकलन करना चाहिए। बिना रिसर्च के निवेश और जल्दबाजी में लिए गए फैसलों से बचना जरूरी है। जरूरत पड़ने पर किसी योग्य वित्तीय सलाहकार से सलाह लेकर निवेश की रणनीति बनाना भी बेहतर विकल्प हो सकता है। बाजार में अवसर हमेशा मौजूद रहते हैं लेकिन सही अवसर पहचानने के लिए धैर्य जानकारी और अनुशासन सबसे जरूरी हथियार हैं।

  • 18 हजार की बेसिक सैलरी सीधे 72 हजार! 8वें वेतन आयोग में फिटमेंट फैक्टर को लेकर तेज हुई हलचल, जानिए किस प्रस्ताव से कितना बढ़ेगा वेतन

    18 हजार की बेसिक सैलरी सीधे 72 हजार! 8वें वेतन आयोग में फिटमेंट फैक्टर को लेकर तेज हुई हलचल, जानिए किस प्रस्ताव से कितना बढ़ेगा वेतन


    नई दिल्ली। केंद्र सरकार के लाखों कर्मचारियों और पेंशनभोगियों की नजर अब 8वें वेतन आयोग की सिफारिशों पर टिकी हुई है। आयोग के गठन के बाद जैसे जैसे परामर्श की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है वैसे वैसे कर्मचारियों के बीच सबसे ज्यादा चर्चा फिटमेंट फैक्टर को लेकर हो रही है। यही वह गुणांक है जिसके आधार पर मौजूदा मूल वेतन को संशोधित कर नया बेसिक वेतन तय किया जाता है। इस समय केंद्रीय कर्मचारियों का न्यूनतम मूल वेतन 18 हजार रुपए है और अब अलग अलग कर्मचारी संगठनों की ओर से फिटमेंट फैक्टर को बढ़ाकर 3.61 से 4 तक किए जाने की मांग सामने आई है। अगर इन प्रस्तावों में से किसी को मंजूरी मिलती है तो न्यूनतम बेसिक सैलरी में बड़ा उछाल देखने को मिल सकता है।

    मौजूदा वेतन व्यवस्था को देखें तो 6वें वेतन आयोग में फिटमेंट फैक्टर 1.86 था जबकि 7वें वेतन आयोग में इसे बढ़ाकर 2.57 किया गया था। इसी बदलाव के बाद न्यूनतम मूल वेतन 7 हजार रुपए से बढ़कर 18 हजार रुपए हो गया था। अब 8वें वेतन आयोग के सामने इससे कहीं ज्यादा फिटमेंट फैक्टर की मांग रखी गई है। कर्मचारी संगठन चाहते हैं कि बढ़ती महंगाई और जीवनयापन की लागत को ध्यान में रखते हुए नए वेतन ढांचे में कर्मचारियों को पर्याप्त राहत दी जाए।

    सर्वे ऑफ इंडिया की मिनिस्टीरियल स्टाफ एसोसिएशन ने 3.61 फिटमेंट फैक्टर का प्रस्ताव रखा है। यदि इस प्रस्ताव को स्वीकार किया जाता है तो 18 हजार रुपए की मौजूदा न्यूनतम बेसिक सैलरी बढ़कर लगभग 64 हजार 980 रुपए यानी करीब 65 हजार रुपए हो सकती है। इसका मतलब है कि मौजूदा न्यूनतम बेसिक वेतन की तुलना में कर्मचारियों को काफी बड़ा उछाल मिल सकता है। हालांकि यह केवल प्रस्ताव के आधार पर निकाला गया अनुमान है और इसे अंतिम वेतन नहीं माना जा सकता।

    वहीं नेशनल काउंसिल जेसीएम स्टाफ साइड और भारत पेंशनर्स समाज की ओर से 3.833 फिटमेंट फैक्टर की मांग की गई है। इस हिसाब से 18 हजार रुपए की बेसिक सैलरी लगभग 69 हजार रुपए तक पहुंच सकती है। अगर यह प्रस्ताव स्वीकार होता है तो कर्मचारियों के साथ पेंशनभोगियों को भी बड़ा फायदा मिलने की संभावना बन सकती है क्योंकि पेंशन और कई सेवानिवृत्ति लाभ मूल वेतन से जुड़े होते हैं।

    सबसे ज्यादा फिटमेंट फैक्टर की मांग भारतीय प्रतिरक्षा मजदूर संघ की ओर से की गई है। संगठन ने 4 फिटमेंट फैक्टर का सुझाव दिया है। यदि सरकार इस प्रस्ताव को मंजूरी देती है तो 18 हजार रुपए का न्यूनतम मूल वेतन बढ़कर करीब 72 हजार रुपए हो सकता है। यानी 3.61 और 4 के फिटमेंट फैक्टर वाले प्रस्तावों के बीच न्यूनतम बेसिक सैलरी में लगभग 7 हजार 20 रुपए का अंतर बन सकता है।

    हालांकि कर्मचारियों को यह समझना जरूरी है कि 65 हजार 69 हजार और 72 हजार रुपए के आंकड़े अभी केवल अलग अलग संगठनों की मांगों के आधार पर लगाए गए अनुमान हैं। 8वें वेतन आयोग की अंतिम सिफारिश आने से पहले यह तय नहीं माना जा सकता कि कर्मचारियों का वास्तविक न्यूनतम वेतन कितना होगा। अंतिम वेतन वृद्धि केवल फिटमेंट फैक्टर से तय नहीं होगी बल्कि नए वेतन मैट्रिक्स महंगाई भत्ते अन्य भत्तों और आयोग की व्यापक सिफारिशों का भी इसमें महत्वपूर्ण योगदान होगा।

    फिलहाल 8वें वेतन आयोग के सामने कर्मचारी और पेंशनभोगी संगठनों की मांगों और सुझावों पर विचार का दौर जारी है। आयोग की अध्यक्षता न्यायमूर्ति सेवानिवृत्त रंजना प्रकाश देसाई कर रही हैं और उसे अपनी सिफारिशें देने के लिए 18 महीने का समय दिया गया है। ऐसे में केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को अभी अंतिम रिपोर्ट का इंतजार करना होगा। आयोग की सिफारिशें सामने आने और सरकार की मंजूरी के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि कर्मचारियों की बेसिक सैलरी में वास्तव में कितना इजाफा होता है।

  • भारत-चिली की आर्थिक साझेदारी को मिलेगी नई उड़ान, साल के अंत तक व्यापार समझौता पूरा करने का लक्ष्य; कई सेक्टरों में बढ़ेंगे अवसर

    भारत-चिली की आर्थिक साझेदारी को मिलेगी नई उड़ान, साल के अंत तक व्यापार समझौता पूरा करने का लक्ष्य; कई सेक्टरों में बढ़ेंगे अवसर


    नई दिल्ली। भारत और चिली के बीच आर्थिक रिश्तों को नई मजबूती देने की दिशा में बातचीत तेज हो गई है। दोनों देश व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते यानी सीईपीए को आगे बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं और सरकार को उम्मीद है कि इस साल के अंत तक इस अहम व्यापार समझौते को पूरा किया जा सकता है। प्रस्तावित समझौते का मकसद दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश के अवसरों को बढ़ाना तथा कारोबारियों के लिए बाजार तक पहुंच को आसान बनाना है। केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के मुताबिक भारत और चिली के बीच आर्थिक सहयोग को विस्तार देने के लिए उच्च स्तर पर बातचीत जारी है और दोनों पक्ष एक संतुलित तथा आपसी फायदे वाले समझौते की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

    इसी सिलसिले में वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने 26 अगस्त को चिली की राजधानी सैंटियागो में चिली की अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंधों की उपाध्यक्ष पाउला एस्टेवेज वेनस्टीन से मुलाकात की। बैठक में दोनों देशों ने सीईपीए वार्ता को तेजी से आगे बढ़ाने और ऐसा समझौता तैयार करने पर जोर दिया जिससे दोनों देशों के कारोबारियों और आम लोगों को वास्तविक आर्थिक लाभ मिल सके। भारत ने बातचीत के दौरान खुले लगातार और संतुलित दृष्टिकोण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता भी दोहराई। दोनों देश ग्लोबल साउथ का हिस्सा होने के कारण कई साझा आर्थिक और रणनीतिक हित रखते हैं और इन्हीं समानताओं को द्विपक्षीय आर्थिक सहयोग का मजबूत आधार माना जा रहा है।

    प्रस्तावित समझौते के जरिए भारत और चिली के बीच व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ाने के साथ निवेश के नए रास्ते खोलने की उम्मीद है। खास तौर पर हेल्थकेयर फार्मास्यूटिकल्स ऊर्जा खनिज कृषि मशीनरी और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में सहयोग की बड़ी संभावनाएं देखी जा रही हैं। इन क्षेत्रों में दोनों देशों की जरूरतों और क्षमताओं को जोड़कर कारोबार का दायरा बढ़ाया जा सकता है। इसके अलावा तकनीक टैलेंट और मजबूत सप्लाई चेन के निर्माण में भी दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ने की संभावना है।

    भारत की कोशिश है कि यह समझौता केवल व्यापार बढ़ाने तक सीमित न रहे बल्कि दोनों देशों के उद्योगों के लिए व्यावसायिक रूप से सार्थक अवसर भी तैयार करे। बेहतर बाजार पहुंच मिलने से भारतीय कंपनियों को चिली में अपने उत्पाद और सेवाएं विस्तार देने का मौका मिल सकता है जबकि चिली की कंपनियों के लिए भी भारत जैसे बड़े बाजार में संभावनाएं बढ़ेंगी। इससे निवेश के साथ साथ दोनों देशों के बीच कारोबारी संबंधों को भी नई गति मिल सकती है।

    सरकार का मानना है कि सीईपीए के सफल समापन से भारत और चिली के बीच पहले से बढ़ रहे आर्थिक रिश्तों को और मजबूत आधार मिलेगा। वैश्विक स्तर पर सप्लाई चेन में लगातार बदलाव के बीच दोनों देशों के लिए नए कारोबारी साझेदार और भरोसेमंद आर्थिक सहयोग महत्वपूर्ण हो गए हैं। ऐसे में प्रस्तावित समझौता व्यापारिक अवसरों के साथ रणनीतिक महत्व भी रखता है।

    भारत ने 2026 तक सीईपीए वार्ता पूरी करने का लक्ष्य रखा है। अब दोनों पक्षों की कोशिश बातचीत के शेष मुद्दों को तेजी से सुलझाकर एक ऐसा संतुलित समझौता तैयार करने की है जिससे दोनों देशों के कारोबारियों को समान और ठोस लाभ मिल सके। यदि वार्ता तय समयसीमा के भीतर पूरी होती है तो भारत और चिली के आर्थिक संबंधों में यह समझौता एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हो सकता है और आने वाले वर्षों में व्यापार निवेश तथा तकनीकी सहयोग के लिए नए दरवाजे खोल सकता है।

  • टॉप कंपनियों की दौलत में बड़ी सेंध एक हफ्ते में 1.13 लाख करोड़ का मार्केटकैप साफ एयरटेल को सबसे ज्यादा नुकसान

    टॉप कंपनियों की दौलत में बड़ी सेंध एक हफ्ते में 1.13 लाख करोड़ का मार्केटकैप साफ एयरटेल को सबसे ज्यादा नुकसान


    नई दिल्ली। भारतीय शेयर बाजार में पिछले सप्ताह आई गिरावट का असर देश की दिग्गज कंपनियों के बाजार पूंजीकरण पर भी साफ दिखाई दिया। देश की टॉप 10 सबसे मूल्यवान कंपनियों में से सात कंपनियों का संयुक्त मार्केटकैप करीब 1.13 लाख करोड़ रुपए घट गया। बाजार में कमजोर सेंटीमेंट और प्रमुख सूचकांकों में गिरावट के बीच भारती एयरटेल सबसे बड़ी नुकसान उठाने वाली कंपनी रही। इसके अलावा रिलायंस इंडस्ट्रीज एचडीएफसी बैंक बजाज फाइनेंस लार्सन एंड टुब्रो एलआईसी और हिंदुस्तान यूनिलीवर के बाजार मूल्यांकन में भी कमी दर्ज की गई।

    साप्ताहिक आधार पर भारती एयरटेल के मार्केटकैप में सबसे बड़ी गिरावट देखने को मिली। कंपनी का बाजार मूल्यांकन 40,500.85 करोड़ रुपए घटकर 11,74,462.30 करोड़ रुपए रह गया। इसके बाद रिलायंस इंडस्ट्रीज को बड़ा झटका लगा। रिलायंस का मार्केटकैप 40,056.32 करोड़ रुपए कम होकर 17,38,119.27 करोड़ रुपए पर पहुंच गया। हालांकि इतनी बड़ी गिरावट के बावजूद रिलायंस इंडस्ट्रीज बाजार पूंजीकरण के लिहाज से देश की सबसे मूल्यवान कंपनी बनी हुई है।

    निजी क्षेत्र के प्रमुख बैंक एचडीएफसी बैंक का मार्केटकैप भी 11,558.35 करोड़ रुपए घटा और यह 11,09,600.70 करोड़ रुपए रह गया। बजाज फाइनेंस के बाजार मूल्यांकन में 10,086.05 करोड़ रुपए की कमी आई और इसका मार्केटकैप 6,70,535.57 करोड़ रुपए पर पहुंच गया। एलएंडटी का बाजार मूल्यांकन 6,473.45 करोड़ रुपए घटकर 5,55,987.49 करोड़ रुपए रहा। वहीं भारतीय जीवन बीमा निगम यानी एलआईसी के मार्केटकैप में 3,162.50 करोड़ रुपए की कमी आई और यह 5,32,817.81 करोड़ रुपए रह गया।

    एफएमसीजी क्षेत्र की दिग्गज कंपनी हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड भी गिरावट से अछूती नहीं रही। कंपनी का बाजार मूल्यांकन 1,550.73 करोड़ रुपए घटकर 4,72,361.83 करोड़ रुपए रह गया। इस तरह टॉप 10 कंपनियों में सात कंपनियों के बाजार मूल्यांकन में एक सप्ताह के दौरान गिरावट दर्ज की गई।

    हालांकि सभी बड़ी कंपनियों के लिए सप्ताह कमजोर नहीं रहा। टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज यानी टीसीएस के मार्केटकैप में 16,643.20 करोड़ रुपए की बढ़ोतरी हुई और यह 8,48,079.71 करोड़ रुपए पर पहुंच गया। आईसीआईसीआई बैंक का बाजार मूल्यांकन 4,475.28 करोड़ रुपए बढ़कर 10,22,805.73 करोड़ रुपए हो गया। वहीं भारतीय स्टेट बैंक यानी एसबीआई के मार्केटकैप में भी 599.99 करोड़ रुपए की मामूली बढ़ोतरी दर्ज की गई और यह 9,65,568.75 करोड़ रुपए पर पहुंच गया।

    मार्केटकैप के लिहाज से कंपनियों की रैंकिंग में रिलायंस इंडस्ट्रीज पहले स्थान पर बनी हुई है। भारती एयरटेल दूसरे स्थान पर है जबकि एचडीएफसी बैंक तीसरे पायदान पर है। इसके बाद आईसीआईसीआई बैंक एसबीआई टीसीएस बजाज फाइनेंस एलएंडटी एलआईसी और हिंदुस्तान यूनिलीवर का स्थान है।

    इस गिरावट की पृष्ठभूमि में शेयर बाजार के प्रमुख सूचकांक भी दबाव में रहे। पिछले सप्ताह सेंसेक्स 276.32 अंक यानी 0.35 प्रतिशत गिरकर 77,264 पर बंद हुआ जबकि निफ्टी 76.35 अंक यानी 0.31 प्रतिशत की गिरावट के साथ 24,175 के स्तर पर रहा। हालांकि व्यापक बाजार में तस्वीर कुछ अलग रही। निफ्टी स्मॉलकैप 100 में 0.51 प्रतिशत और निफ्टी मिडकैप 100 में 0.52 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई।

    इस तरह पिछले सप्ताह जहां बाजार के प्रमुख सूचकांकों में कमजोरी रही वहीं कुछ मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में मजबूती देखने को मिली। बड़ी कंपनियों के बाजार मूल्यांकन में आई गिरावट यह बताती है कि बाजार में उतार चढ़ाव का सीधा असर देश की सबसे मूल्यवान कंपनियों की कुल संपत्ति पर भी पड़ता है। आने वाले कारोबारी सत्रों में निवेशकों की नजर बाजार की दिशा और इन दिग्गज कंपनियों के शेयरों के प्रदर्शन पर बनी रहेगी।

  • 2047 का विकसित भारत अब दूर नहीं! सिर्फ 20 साल बाकी, वित्त मंत्री सीतारमण बोलीं- सुधारों को चाहिए और ज्यादा समर्थन

    2047 का विकसित भारत अब दूर नहीं! सिर्फ 20 साल बाकी, वित्त मंत्री सीतारमण बोलीं- सुधारों को चाहिए और ज्यादा समर्थन


    नई दिल्ली। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को लेकर बड़ा संदेश देते हुए कहा है कि यह लक्ष्य अब मुश्किल से 20 वर्ष दूर रह गया है। ऐसे में भारत को आर्थिक और संरचनात्मक सुधारों की रफ्तार को और तेज करने के लिए व्यापक समर्थन की जरूरत होगी। अमेरिका के शिकागो में भारतीय प्रवासियों को संबोधित करते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि देश को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिभाशाली और व्यापक अनुभव रखने वाले लोगों के साथ ऐसे लोगों का सहयोग भी जरूरी है जो नई सोच और नए विचारों के साथ भारत की विकास यात्रा को मजबूती दे सकें। उन्होंने इस पूरी प्रक्रिया में पूंजी को बेहद महत्वपूर्ण बताया और कहा कि किसी देश की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त पूंजी आवश्यक होती है।

    सीतारमण ने भारत की आर्थिक नीतियों और राजकोषीय अनुशासन का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकार ने वर्ष 2030 तक कर्ज को सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के 50 प्रतिशत तक लाने का लक्ष्य तय किया है। सरकार इसी दिशा में लगातार काम कर रही है। उन्होंने कहा कि कई विकसित अर्थव्यवस्थाओं में कर्ज का स्तर उनकी जीडीपी के 200 प्रतिशत से भी अधिक है लेकिन भारत ने अपने लिए राजकोषीय अनुशासन का स्पष्ट रास्ता चुना है। वित्त मंत्री के अनुसार राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने के लिए तय किए गए लक्ष्यों की दिशा में भी सरकार ने निर्धारित प्रगति हासिल की है।

    वित्त मंत्री ने भारत की आर्थिक स्थिति का जिक्र करते हुए कहा कि देश की क्रेडिट रेटिंग में सुधार हो रहा है और यह सुधार किसी नियम को दरकिनार करके हासिल नहीं किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सामाजिक कल्याण के लिए जरूरी संसाधनों को रोककर भी आर्थिक मजबूती हासिल नहीं की जा रही है बल्कि अर्थव्यवस्था का उचित और संतुलित प्रबंधन इसकी मुख्य वजह है। उनके मुताबिक भारत ने आर्थिक विकास के साथ सामाजिक जरूरतों के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है।

    सीतारमण ने वैश्विक आपूर्ति से जुड़ी चुनौतियों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि हाल के दौर में कच्चे तेल एलपीजी और उर्वरक जैसी महत्वपूर्ण वस्तुओं की वैश्विक आपूर्ति में मुश्किलें सामने आईं। इन वस्तुओं को भारत तक पहुंचाने वाले जहाजों को पर्याप्त बीमा कवर मिलने में भी दिक्कतें आईं और जोखिम प्रीमियम काफी बढ़ गया। ऐसी परिस्थितियों में आयात और आपूर्ति व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता था।

    उन्होंने बताया कि सरकार ने बजट में एक घोषणा के जरिए ऐसा फंड उपलब्ध कराया जिससे जोखिम के कारण शिपिंग कंपनियों को चुकाने पड़ने वाले अतिरिक्त प्रीमियम में सहायता दी जा सके। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि वैश्विक संकट का सीधा असर भारतीय किसानों परिवारों और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र पर न पड़े। वित्त मंत्री के अनुसार इस कदम से आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बनाए रखने में मदद मिली और भारतीय अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से बचाने की कोशिश की गई।

    उर्वरक की उपलब्धता का उदाहरण देते हुए सीतारमण ने कहा कि वैश्विक स्तर पर आपूर्ति में कमी के बावजूद भारत में उर्वरक की कमी महसूस नहीं होने दी गई। सरकार ने बाजारों को लगातार यह जानकारी उपलब्ध कराई कि देश को कितनी मात्रा में उर्वरक की आवश्यकता होगी। इससे आपूर्ति की योजना बनाने और जरूरत के मुताबिक संसाधन जुटाने में मदद मिली।

    वित्त मंत्री ने कहा कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच कई देशों की आर्थिक गणनाएं प्रभावित हुईं लेकिन भारत ने अपनी सीमाओं के बावजूद चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में अपने नागरिकों को सुरक्षित रखने की कोशिश की। उनके बयान का व्यापक संदेश यही रहा कि विकसित भारत 2047 का लक्ष्य हासिल करने के लिए आने वाले वर्षों में आर्थिक अनुशासन निवेश सुधार नवाचार और वैश्विक भारतीय समुदाय के सहयोग को एक साथ आगे बढ़ाना होगा। अब जब लक्ष्य लगभग दो दशक की दूरी पर है तब सुधारों की गति और उनके प्रभाव को बढ़ाना सरकार की बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल रहेगा।