Category: Economy

  • अंडे की कीमतों में 35 से 40 प्रतिशत बढ़ोतरी, पोल्ट्री फीड महंगा होने से मक्का और इथेनॉल की बढ़ती मांग बनी अहम वजह

    अंडे की कीमतों में 35 से 40 प्रतिशत बढ़ोतरी, पोल्ट्री फीड महंगा होने से मक्का और इथेनॉल की बढ़ती मांग बनी अहम वजह

    नई दिल्ली ।अंडों की कीमतों में पिछले एक साल के दौरान तेज बढ़ोतरी देखने को मिली है। पोल्ट्री फार्म से निकलने वाले एक अंडे की कीमत करीब 7 रुपये तक पहुंच गई है, जबकि कई खुदरा बाजारों में उपभोक्ताओं को इसके लिए 8.50 से 9 रुपये तक भुगतान करना पड़ रहा है। कीमतों में करीब 35 से 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी ने रोजमर्रा के खाद्य खर्च पर दबाव बढ़ाया है।

    अंडों की कीमत बढ़ने के पीछे पोल्ट्री फीड की बढ़ती लागत को एक महत्वपूर्ण कारण माना जा रहा है। मुर्गियों के चारे में मक्का प्रमुख कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल होता है। इसके अलावा सोयाबीन और दूसरे फीड इनपुट की कीमतों में बदलाव भी पोल्ट्री उत्पादन की कुल लागत को प्रभावित करता है।

    मक्के की मांग इस समय केवल पोल्ट्री उद्योग तक सीमित नहीं है। भारत में पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण बढ़ाने की नीति के तहत अनाज आधारित इथेनॉल उत्पादन का महत्व लगातार बढ़ा है। इस प्रक्रिया में मक्का प्रमुख फीडस्टॉक के रूप में तेजी से इस्तेमाल किया जा रहा है।

    इथेनॉल क्षेत्र में मक्के की बढ़ती मांग का सीधा असर इसकी उपलब्धता और कीमतों पर पड़ सकता है। जब एक ही कृषि उत्पाद की मांग अलग-अलग क्षेत्रों से बढ़ती है, तो बाजार में उसकी कीमत पर दबाव बनने की संभावना रहती है। इसका असर उन उद्योगों पर भी पड़ता है जो उसी कच्चे माल पर निर्भर हैं।

    पोल्ट्री उद्योग के लिए मक्का फीड का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए मक्के की कीमत में बढ़ोतरी होने पर चारे की लागत बढ़ सकती है। चारे की लागत बढ़ने के बाद उसका प्रभाव मुर्गियों के पालन, उत्पादन लागत और अंततः अंडों के बाजार मूल्य पर दिखाई देता है।

    हालांकि अंडों की मौजूदा महंगाई को केवल इथेनॉल की बढ़ती मांग से जोड़ना पूरी तस्वीर नहीं होगी। मक्के की कीमत पर पोल्ट्री फीड की मांग, मौसम, उत्पादन में बदलाव और दूसरे कृषि इनपुट की लागत का भी प्रभाव पड़ता है। मुर्गियों की उत्पादकता और बाजार में अंडों की उपलब्धता भी कीमत तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

    आने वाले महीनों में मांग का मौसमी असर भी महत्वपूर्ण हो सकता है। सर्दियों के दौरान अंडों की खपत आम तौर पर बढ़ जाती है। ऐसे में यदि पोल्ट्री फीड की लागत ऊंची बनी रहती है और बाजार में आपूर्ति मांग के अनुरूप नहीं रहती, तो अंडों की कीमतों पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है।

    सरकार की ओर से इथेनॉल उत्पादन के लिए मक्के की उपलब्धता बढ़ाने और उत्पादन को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया जा रहा है। इथेनॉल उत्पादन के लिए मक्के के इस्तेमाल में हुई वृद्धि से इस फसल की औद्योगिक मांग का महत्व बढ़ा है। ESY 2025-26 में इथेनॉल उत्पादन के लिए करीब 125.78 लाख टन मक्के के इस्तेमाल का अनुमान इसी बढ़ती मांग को दर्शाता है।

    मक्के की बढ़ती औद्योगिक मांग और पोल्ट्री क्षेत्र की जरूरतों के बीच संतुलन महत्वपूर्ण हो गया है। यदि मक्के की उपलब्धता बढ़ती है और उत्पादन लागत नियंत्रित रहती है, तो पोल्ट्री उद्योग पर दबाव कम हो सकता है। वहीं, फीड लागत ऊंची रहने पर इसका असर अंडों की कीमतों में आगे भी दिखाई दे सकता है।

    फिलहाल अंडों की कीमतों में हुई बढ़ोतरी उपभोक्ताओं के साथ पोल्ट्री कारोबार के लिए भी चुनौती बनी हुई है। आने वाले समय में मक्का उत्पादन, फीड लागत, इथेनॉल की मांग, अंडों की आपूर्ति और मौसमी खपत जैसे कारक मिलकर बाजार की दिशा तय करेंगे।

  • जापान में पीयूष गोयल की बड़ी कारोबारी बैठकें, भारत में निवेश बढ़ाने के लिए वित्तीय और औद्योगिक अवसरों पर जोर

    जापान में पीयूष गोयल की बड़ी कारोबारी बैठकें, भारत में निवेश बढ़ाने के लिए वित्तीय और औद्योगिक अवसरों पर जोर

    नई दिल्ली ।केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने जापान दौरे के तीसरे दिन देश के प्रमुख कारोबारी और वित्तीय संस्थानों के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ कई महत्वपूर्ण बैठकें कीं। इन बैठकों में भारत में निवेश बढ़ाने, व्यापारिक भागीदारी मजबूत करने और दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को नई गति देने से जुड़े अवसरों पर विस्तार से चर्चा हुई।

    गोयल ने जापान के प्रमुख कारोबारी समूह टोयोटा त्सुशो कॉर्पोरेशन, सुमितोमो मित्सुई बैंकिंग कॉर्पोरेशन यानी एसएमबीसी ग्रुप, मित्सुबिशी यूएफजे फाइनेंशियल ग्रुप यानी एमयूएफजी तथा निप्पॉन लाइफ इंश्योरेंस के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात की। बातचीत में अलग-अलग क्षेत्रों में भारत की बढ़ती संभावनाओं और जापानी कंपनियों के लिए उपलब्ध कारोबारी अवसरों को सामने रखा गया।

    टोयोटा त्सुशो कॉर्पोरेशन के अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी तोशिमित्सु इमाई के साथ बैठक में भारत में व्यापार, मोबिलिटी और औद्योगिक क्षेत्रों में कंपनी की भागीदारी बढ़ाने की संभावनाओं पर विचार किया गया। इस दौरान भारत की लागत प्रतिस्पर्धात्मकता और वैश्विक निर्यात केंद्र के रूप में देश की भूमिका को मजबूत करने के अवसरों पर विशेष जोर दिया गया।

    भारत सरकार जापानी कंपनियों को देश में उत्पादन, कारोबार और निर्यात से जुड़े अवसरों का लाभ उठाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। ऐसे में औद्योगिक और मोबिलिटी क्षेत्र में जापानी कंपनियों की भागीदारी बढ़ना दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग को और मजबूत कर सकता है।

    गोयल ने एसएमबीसी ग्रुप के डिप्टी प्रेसिडेंट एग्जीक्यूटिव ऑफिसर योशिहिरो हयाकुतोमे के साथ भी बैठक की। इसमें बैंकिंग क्षेत्र में निवेश बढ़ाने और भारत-जापान के वित्तीय संबंधों को अधिक मजबूत बनाने के अवसरों पर चर्चा हुई। भारत के तेजी से विकसित होते वित्तीय क्षेत्र को जापानी वित्तीय संस्थानों के लिए महत्वपूर्ण अवसर के रूप में पेश किया गया।

    इसके बाद गोयल ने एमयूएफजी के डिप्टी चेयरमैन यासुशी इतागाकी और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बातचीत की। बैठक में बैंकिंग, वाणिज्यिक वित्त और निवेश के क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच सहयोग को विस्तार देने की संभावनाओं पर चर्चा की गई। भारतीय बाजार की बढ़ती जरूरतों और वित्तीय क्षेत्र में उपलब्ध अवसरों को भी बातचीत का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया।

    निप्पॉन लाइफ इंश्योरेंस के मैनेजिंग एग्जीक्यूटिव ऑफिसर और ग्लोबल बिजनेस प्रमुख मिनोरू किमुरा के साथ बैठक में बीमा और वित्तीय सेवाओं के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर विचार हुआ। गोयल ने भारत के तेजी से विस्तार कर रहे बीमा बाजार में जापानी संस्थानों के लिए मौजूद संभावनाओं को रेखांकित किया।

    इन बैठकों के माध्यम से भारत ने जापान के प्रमुख कारोबारी और वित्तीय समूहों के सामने निवेश के विभिन्न अवसरों को स्पष्ट किया। व्यापार, औद्योगिक उत्पादन, मोबिलिटी, बैंकिंग, वाणिज्यिक वित्त, बीमा और निवेश जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की संभावनाएं दोनों देशों के आर्थिक संबंधों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं।

    भारत और जापान के बीच आर्थिक साझेदारी पहले से ही कई क्षेत्रों में व्यापक है। भारत की बड़ी घरेलू अर्थव्यवस्था, बढ़ती औद्योगिक क्षमता और वैश्विक निर्यात केंद्र बनने की दिशा में जारी प्रयास जापानी कंपनियों के लिए नए अवसर पैदा कर रहे हैं। वहीं, जापान की पूंजी, तकनीकी क्षमता और वित्तीय विशेषज्ञता भारत की विकास जरूरतों के साथ महत्वपूर्ण तालमेल बना सकती है।

    पीयूष गोयल की जापान यात्रा के दौरान हुई इन बैठकों का प्रमुख उद्देश्य कारोबारी संबंधों को मजबूत करना और जापानी निवेशकों को भारत में उपलब्ध अवसरों से जोड़ना रहा। इससे दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश सहयोग को आगे बढ़ाने की दिशा में संवाद को मजबूती मिलने की उम्मीद है।

  • वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कनाडाई निवेशकों से बैंकिंग, बीमा, फिनटेक और उभरते क्षेत्रों में भारत के अवसरों का लाभ उठाने को कहा

    वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कनाडाई निवेशकों से बैंकिंग, बीमा, फिनटेक और उभरते क्षेत्रों में भारत के अवसरों का लाभ उठाने को कहा


    नई दिल्ली । 
    केंद्रीय वित्त एवं कॉरपोरेट मामलों की मंत्री निर्मला सीतारमण ने कनाडाई निवेशकों को भारत की विकास यात्रा में सक्रिय भागीदारी के लिए आमंत्रित किया है। टोरंटो में भारतीय प्रवासी कारोबारी समुदाय के लिए आयोजित एक स्वागत समारोह में उन्होंने भारत में निवेश के बढ़ते अवसरों और विभिन्न उभरते क्षेत्रों की संभावनाओं पर विस्तार से बात की।

    वित्त मंत्री ने कहा कि भारत का वित्तीय क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण अवसर उपलब्ध करा रहा है। उन्होंने विशेष रूप से बैंकिंग और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के क्षेत्र में बढ़ती गतिविधियों का उल्लेख करते हुए कहा कि देश के अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक मजबूत स्थिति में हैं और बैंकिंग क्षेत्र में महत्वपूर्ण निवेश हो रहा है।

    उन्होंने कनाडाई निवेशकों से भारत के साथ व्यापक आर्थिक और कारोबारी जुड़ाव स्थापित करने का आग्रह किया। उनके अनुसार, भारत की बड़ी आबादी, बढ़ती क्रय शक्ति, मजबूत घरेलू खपत और लगातार विकसित होती मांग देश को दीर्घकालिक निवेश के लिए आकर्षक बाजार बनाती है।

    सीतारमण ने इंटरनेशनल फाइनेंशियल सर्विसेज सेंटर यानी आईएफएससी गिफ्ट सिटी को भी अंतरराष्ट्रीय पूंजी के लिए महत्वपूर्ण मंच बताया। उन्होंने कहा कि गिफ्ट सिटी पहले ही कई विदेशी बैंकों को आकर्षित कर चुकी है और आने वाले समय में अधिक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के लिए यहां कारोबार स्थापित करने की पर्याप्त संभावनाएं मौजूद हैं।

    वित्त मंत्री के मुताबिक, गिफ्ट सिटी का नियामकीय और कर ढांचा सीमा-पार वित्तीय गतिविधियों को सुविधाजनक बनाने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इससे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों को भारत के साथ जुड़ने और व्यापक क्षेत्रीय गतिविधियों के लिए देश को आधार बनाने का अवसर मिल सकता है।

    बीमा क्षेत्र को लेकर भी उन्होंने निवेश की संभावनाओं को रेखांकित किया। अब भारत में बीमा क्षेत्र में 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति है। सरकार की इस व्यवस्था से विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय बीमा बाजार में भागीदारी का दायरा बढ़ा है।

    फिनटेक क्षेत्र को सीतारमण ने भारत की प्रमुख ताकतों में शामिल किया। उन्होंने कहा कि बड़े पैमाने पर विकसित हो रहा भारतीय फिनटेक क्षेत्र वैश्विक पूंजी के लिए महत्वपूर्ण अवसर पैदा कर रहा है। डिजिटल वित्तीय सेवाओं के विस्तार और तकनीक आधारित वित्तीय समाधानों ने इस क्षेत्र को अंतरराष्ट्रीय निवेश के लिहाज से महत्वपूर्ण बनाया है।

    इसके साथ ही सेमीकंडक्टर, मैग्नेट और दुर्लभ पृथ्वी तत्वों जैसे उभरते क्षेत्रों को भी कनाडाई निवेशकों के लिए संभावनाओं वाला क्षेत्र बताया गया। इन क्षेत्रों को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं और रणनीतिक विनिर्माण के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    सीतारमण ने कहा कि भारत वैश्विक बाजारों के लिए भरोसेमंद और लागत प्रभावी आपूर्ति श्रृंखला के विकल्प उपलब्ध करा सकता है। इससे भारत में निवेश करने वाली कंपनियों को घरेलू बाजार के साथ-साथ व्यापक क्षेत्रीय और वैश्विक कारोबारी गतिविधियों से जुड़ने का अवसर मिल सकता है।

    उन्होंने कनाडाई संस्थागत निवेशकों के लिए भारत को केवल एक बड़े बाजार के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक क्षेत्रीय और वैश्विक वित्तीय गतिविधियों के संभावित मंच के रूप में देखने पर जोर दिया। वित्त मंत्री का यह आह्वान भारत और कनाडा के कारोबारी समुदायों के बीच निवेश संबंधों को और व्यापक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    भारत सरकार की ओर से बैंकिंग, बीमा, फिनटेक, सेमीकंडक्टर और महत्वपूर्ण खनिजों जैसे क्षेत्रों में निवेश अवसरों को सामने रखना इस बात को दर्शाता है कि देश वैश्विक पूंजी को अपनी विकास प्रक्रिया से जोड़ने पर जोर दे रहा है। कनाडाई निवेशकों के लिए इन क्षेत्रों में मौजूद अवसर भारत की आर्थिक क्षमता और बदलती वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के बीच नए कारोबारी विकल्प उपलब्ध करा सकते हैं।

  • कमजोर वैश्विक संकेतों और प्रमुख सेक्टरों में बिकवाली के चलते सेंसेक्स 183.15 अंक और निफ्टी 126.80 अंक गिरकर बंद हुए।

    कमजोर वैश्विक संकेतों और प्रमुख सेक्टरों में बिकवाली के चलते सेंसेक्स 183.15 अंक और निफ्टी 126.80 अंक गिरकर बंद हुए।

    नई दिल्ली ।भारतीय शेयर बाजार में बुधवार को कारोबारी सप्ताह के तीसरे दिन गिरावट देखने को मिली। पिछले सत्र में तेजी के बाद घरेलू बाजार बुधवार को कमजोर वैश्विक संकेतों के बीच दबाव में रहा। आईटी, एफएमसीजी और ऑटो शेयरों में कमजोरी ने प्रमुख सूचकांकों पर असर डाला। कारोबार समाप्त होने पर सेंसेक्स 183.15 अंक यानी 0.24 प्रतिशत की गिरावट के साथ 77,472.94 अंक पर बंद हुआ। निफ्टी 50 भी 126.80 अंक यानी 0.52 प्रतिशत टूटकर 24,207.75 अंक पर पहुंच गया।

    बुधवार के सत्र की शुरुआत हालांकि सकारात्मक रुख के साथ हुई थी। सेंसेक्स पिछले कारोबारी सत्र के 77,656.09 अंक के स्तर से 236 अंक की बढ़त के साथ 77,892.10 अंक पर खुला। शुरुआती कारोबार में खरीदारी बढ़ने से यह 330.75 अंक तक चढ़कर 77,986.84 अंक के इंट्रा-डे उच्च स्तर पर पहुंच गया। हालांकि बाद में बाजार की शुरुआती बढ़त कायम नहीं रह सकी और सूचकांक फिसलकर 77,472.94 अंक के दिन के निचले स्तर पर बंद हुआ।

    निफ्टी 50 भी 24,334.55 अंक के पिछले बंद स्तर की तुलना में मामूली बढ़त के साथ 24,341.95 अंक पर खुला। कारोबार के दौरान यह 24,378.60 अंक के उच्च स्तर तक पहुंचा, लेकिन बाद में बिकवाली का दबाव बढ़ने से 24,207.75 अंक के निचले स्तर तक आ गया। अंत में निफ्टी 0.52 प्रतिशत की गिरावट के साथ बंद हुआ।

    व्यापक बाजार में भी एक समान रुख नहीं रहा। निफ्टी मिडकैप इंडेक्स में 0.10 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जबकि निफ्टी स्मॉलकैप इंडेक्स 0.81 प्रतिशत की बढ़त के साथ बंद हुआ। इससे संकेत मिला कि बड़े शेयरों में दबाव के बावजूद कुछ छोटे शेयरों में निवेशकों की दिलचस्पी बनी रही।

    सेक्टरवार कारोबार में निफ्टी आईटी इंडेक्स सबसे कमजोर क्षेत्रों में रहा। एफएमसीजी, ऑटो और रियल्टी शेयरों पर भी दबाव देखा गया। इसके विपरीत मेटल, प्राइवेट बैंक और सीमेंट से जुड़े शेयरों में मजबूती रही। बैंकिंग और मेटल क्षेत्र की कुछ कंपनियों में खरीदारी ने बाजार की गिरावट को सीमित करने में मदद की।

    निफ्टी 50 के प्रमुख बढ़त वाले शेयरों में कोटक महिंद्रा बैंक, एक्सिस बैंक, जेएसडब्ल्यू स्टील, अल्ट्राटेक सीमेंट, एचडीएफसी लाइफ और एसबीआई लाइफ शामिल रहे। दूसरी ओर भारती एयरटेल, पावरग्रिड, इंफोसिस, एलएंडटी, नेस्ले इंडिया और श्रीराम फाइनेंस कमजोर प्रदर्शन करने वाले प्रमुख शेयरों में रहे।

    बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, शुरुआती बढ़त के बाद अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग रुझान बनने से प्रमुख सूचकांकों पर दबाव बढ़ा। वैश्विक बाजारों के संकेतों के साथ कच्चे तेल की कीमतों में बदलाव और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक घटनाक्रम भी निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण रहे।

    ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों में संभावित ढील से महंगाई को लेकर कुछ चिंताएं कम होने की बात कही गई। इससे घरेलू बॉन्ड यील्ड में नरमी और बैंकिंग शेयरों में मजबूती देखने को मिली। बेहतर कमाई की उम्मीदों से मेटल शेयरों में भी खरीदारी रही। हालांकि आईटी शेयरों में गिरावट ने इन क्षेत्रों की तेजी का असर काफी हद तक कम कर दिया।

    अमेरिका में आव्रजन नियमों को लेकर सख्ती और वीजा अपॉइंटमेंट से जुड़े घटनाक्रम के कारण आईटी कंपनियों के मार्जिन पर दबाव की आशंकाएं बनी हुई हैं। आने वाले दिनों में निवेशकों की नजर अमेरिकी महंगाई के प्रमुख आंकड़ों पर रहेगी। विशेष रूप से कोर पीसीई आंकड़ों से ब्याज दरों की दिशा को लेकर बाजार को संकेत मिलने की उम्मीद है। इन आंकड़ों के आधार पर वैश्विक निवेश धारणा और उभरते बाजारों में पूंजी प्रवाह की दिशा प्रभावित हो सकती है।

  • नौकरी छोड़ने की बढ़ती तैयारी के बीच कार्यस्थलों में जेन जी का प्रभाव बढ़ा, एआई को लेकर भी कर्मचारियों में चिंता

    नौकरी छोड़ने की बढ़ती तैयारी के बीच कार्यस्थलों में जेन जी का प्रभाव बढ़ा, एआई को लेकर भी कर्मचारियों में चिंता

    नई दिल्ली ।भारत के प्रोफेशनल सर्विसेज क्षेत्र में कर्मचारियों के बीच नौकरी बदलने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार करीब हर दो में से एक कर्मचारी सक्रिय रूप से नई नौकरी की तलाश कर रहा है। वहीं, चार में से तीन कर्मचारी अगले 12 महीनों के भीतर अपनी मौजूदा कंपनी छोड़ने की योजना बना रहे हैं। यह स्थिति कंपनियों के सामने प्रतिभाओं को बनाए रखने की चुनौती को और गंभीर बनाती है।

    रिपोर्ट के मुताबिक कार्यबल की संरचना में भी बड़ा बदलाव आया है। जेन जी यानी नई पीढ़ी के कर्मचारियों की हिस्सेदारी 2023 में 17 प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर 34 प्रतिशत हो गई है। यानी केवल तीन वर्षों में इस पीढ़ी की कार्यबल में हिस्सेदारी दोगुनी हो गई है। इसके साथ ही कंपनियों को नई पीढ़ी की बदलती अपेक्षाओं के अनुरूप कार्यस्थल नीतियों में बदलाव की जरूरत महसूस हो रही है।

    जेन जी कर्मचारियों में वेतन, पहचान और पदोन्नति के मानदंडों को लेकर अस्पष्टता स्वीकार करने की क्षमता अपेक्षाकृत कम बताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार जब उन्हें अपनी अपेक्षाओं और वास्तविक कार्यस्थल अनुभव के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है तो वे नौकरी बदलने का फैसला तेजी से ले सकते हैं।

    कर्मचारियों को बनाए रखने की समस्या केवल युवा कार्यबल तक सीमित नहीं है। आंकड़ों के अनुसार 86 प्रतिशत फ्रंटलाइन मैनेजर और सुपरवाइजर सक्रिय रूप से नई नौकरी की तलाश कर रहे हैं। व्यक्तिगत योगदान देने वाले कर्मचारियों में यह आंकड़ा 53 प्रतिशत है। इससे प्रबंधन स्तर पर बढ़ते दबाव और असंतोष की स्थिति का संकेत मिलता है।

    फ्रंटलाइन मैनेजर और सुपरवाइजर कंपनियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे एक ओर प्रोजेक्ट पूरा करने और ग्राहकों की अपेक्षाओं का दबाव संभालते हैं, वहीं दूसरी ओर अपनी टीम की जरूरतों और समस्याओं पर भी ध्यान देते हैं। संगठन में होने वाले बदलावों को कर्मचारियों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी अक्सर इन्हीं स्तरों पर आती है।

    रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि कर्मचारियों की अपनी औपचारिक जिम्मेदारियों से आगे बढ़कर अतिरिक्त प्रयास करने की इच्छा में कमी आई है। हालांकि कार्यस्थल की बुनियादी परिस्थितियों में सुधार हुआ है, लेकिन केवल सुविधाओं में बदलाव कर्मचारियों के लंबे समय तक जुड़े रहने के लिए पर्याप्त साबित नहीं हो रहा है। कर्मचारी संगठन की संस्कृति, विकास के अवसर और काम की स्पष्टता जैसे व्यापक पहलुओं को भी महत्व दे रहे हैं।

    प्रोफेशनल सर्विसेज क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल भी तेजी से बढ़ रहा है। करीब 10 में से छह संगठन अपने रोजमर्रा के कामकाज में एआई का उपयोग कर रहे हैं। इसके बावजूद केवल 10 में से दो कर्मचारियों ने पूरी तरह सहमति जताई कि उन्हें एआई उपकरणों से जुड़े संभावित फायदे और जोखिमों की पर्याप्त जानकारी दी गई है।

    इस स्थिति में कंपनियों के सामने दोहरी चुनौती है। उन्हें एक तरफ नई पीढ़ी के कर्मचारियों की बदलती अपेक्षाओं को समझना होगा और दूसरी तरफ अनुभवी कर्मचारियों तथा प्रबंधकीय स्तर पर बढ़ते नौकरी बदलाव के रुझान को रोकना होगा। स्पष्ट वेतन और पदोन्नति व्यवस्था, बेहतर संवाद, विकास के अवसर और एआई के सुरक्षित इस्तेमाल की जानकारी इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

  • शक्कर की कीमत में 18% की गिरावट…, 55 रुपये प्रति किलो पर आए थोक दाम

    शक्कर की कीमत में 18% की गिरावट…, 55 रुपये प्रति किलो पर आए थोक दाम


    नई दिल्ली।
    चीनी के आयात (Sugar imports) की अनुमति और सट्टेबाजी व जमाखोरी पर सरकार (Government) के अंकुश का असर अब दिखने लगा है। खाद्य सचिव संजीव चोपड़ा (Food Secretary Sanjeev Chopra) ने बताया कि चीनी की एक्स-मिल कीमत (Ex-mill price Sugar) (थोक भाव) 18 फीसदी घटकर 55 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई है और आने वाले दिनों में इनमें और गिरावट आएगी। हालांकि, मिल भाव में आई गिरावट का असर खुदरा बाजारों में दिखना अभी बाकी है।

    उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के मुताबिक, 24 अगस्त को देश में चीनी का औसत थोक भाव 58.29 रुपये और खुदरा भाव 63.05 रुपये प्रति किलोग्राम रहा। विशेषज्ञों के मुताबिक, आमतौर पर मिल और खुदरा भाव में सात-आठ रुपये प्रति किलो का अंतर होता है। पिछले हफ्ते चीनी की एक्स-मिल कीमतें बढ़कर रिकॉर्ड 67 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई थीं।

    चोपड़ा ने इसके लिए मिलों की ओर से भाव बढ़ाने को जिम्मेदार ठहराया था। कहा, कीमतों में उछाल बुनियादी वजहों से नहीं आया है। देश में चीनी का पर्याप्त भंडार है। खाद्य सचिव ने कहा, भले ही विपणन वर्ष 2025-26 अक्तूबर-सितंबर) के लिए चीनी का उत्पादन पहले के 343 लाख टन के अनुमान से घटकर 306 लाख टन रह गया है, फिर भी देश में स्टॉक काफी है। घरेलू मांग 285 लाख टन है।


    10 लाख टन आयात को मिली मंजूरी

    चीनी के दाम बढ़ने के बाद सरकार ने पिछले सप्ताह 10 लाख टन कच्ची चीनी के आयात की अनुमति दी थी। इसके साथ ही थोक खरीदारों के लिए भंडार सीमा भी लागू की थी।


    कीमतों पर कितना असर

    मिल भावों में गिरावट का खुदरा बाजार की कीमतों पर फिलहाल कोई असर नहीं पड़ा है। चीनी की कीमत मंगलवार को लगभग एक रुपये बढ़कर करीब 64 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई। एक दिन पहले खुदरा मार्केट में चीनी की औसत कीमत 63.05 रुपये प्रति किलो थी।

  • शेयर मार्केट में पैसा डुबोना है या बढ़ाना, निवेश से पहले समझ लें ये नियम; इन जगहों पर गलती से भी न लगाएं पैसा

    शेयर मार्केट में पैसा डुबोना है या बढ़ाना, निवेश से पहले समझ लें ये नियम; इन जगहों पर गलती से भी न लगाएं पैसा

    नई दिल्ली । शेयर मार्केट में निवेश करके पैसा बढ़ाने की चाहत आज बहुत से लोगों में है लेकिन शेयर बाजार में कमाई जितनी आकर्षक दिखाई देती है इसमें जोखिम भी उतना ही मौजूद रहता है। इसलिए निवेश करने से पहले यह समझना जरूरी है कि पैसा कहां लगाया जाए और किन जगहों पर निवेश करने से बचना चाहिए। शेयर बाजार में कोई भी निवेश पूरी तरह जोखिम रहित नहीं होता और पुराने प्रदर्शन के आधार पर भविष्य में निश्चित मुनाफे की गारंटी नहीं दी जा सकती। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड यानी सेबी भी निवेशकों को बाजार में पैसा लगाने से पहले जानकारी हासिल करने और जोखिम को समझने पर जोर देता है।

    अगर आप शेयरों में निवेश करना चाहते हैं तो सबसे पहले मजबूत कारोबार और बेहतर वित्तीय स्थिति वाली कंपनियों पर नजर डालना बेहतर हो सकता है। किसी कंपनी का शेयर खरीदने से पहले उसके कारोबार का मॉडल कंपनी की कमाई कर्ज मुनाफा नकदी प्रवाह और भविष्य की संभावनाओं को समझना चाहिए। केवल इसलिए किसी शेयर को नहीं खरीदना चाहिए क्योंकि उसकी कीमत कम है। कम कीमत वाला शेयर जरूरी नहीं कि सस्ता हो और महंगा दिखने वाला शेयर जरूरी नहीं कि खराब निवेश हो। निवेश का फैसला कंपनी की वास्तविक स्थिति और उसके मूल्यांकन को देखकर करना चाहिए।

    नए निवेशकों के लिए सबसे बड़ी गलती अक्सर एक ही कंपनी या एक ही सेक्टर में पूरा पैसा लगा देना होती है। बाजार में किसी एक कंपनी या सेक्टर पर ज्यादा निर्भरता जोखिम बढ़ा सकती है। अलग अलग कंपनियों और सेक्टर में निवेश करके पोर्टफोलियो में विविधता लाई जा सकती है। सेबी के निवेशक शिक्षा पोर्टल के अनुसार इंडेक्स म्यूचुअल फंड व्यापक स्तर पर कई शेयरों में निवेश के जरिए व्यक्तिगत शेयरों के जोखिम को कम करने में मदद कर सकते हैं।

    अगर आपको कंपनियों का विश्लेषण करने का पर्याप्त अनुभव नहीं है तो म्यूचुअल फंड और इंडेक्स फंड जैसे विकल्पों को भी समझा जा सकता है। म्यूचुअल फंड में पेशेवर प्रबंधन और विविधीकरण जैसे फायदे हो सकते हैं लेकिन इनमें भी बाजार से जुड़ा जोखिम रहता है। इसलिए केवल यह सोचकर निवेश नहीं करना चाहिए कि म्यूचुअल फंड में नुकसान नहीं होगा।

    वहीं दूसरी तरफ उन शेयरों से सावधान रहना चाहिए जिनमें केवल सोशल मीडिया या किसी व्यक्ति की टिप के आधार पर तेजी की चर्चा हो रही हो। व्हाट्सऐप ग्रुप टेलीग्राम चैनल या सोशल मीडिया पोस्ट में किसी शेयर के जल्द दोगुना होने का दावा देखकर पैसा लगाना जोखिम भरा हो सकता है। इसी तरह बिना कंपनी की जानकारी देखे लगातार अपर सर्किट या तेजी वाले शेयर के पीछे भागना भी नुकसान का कारण बन सकता है।

    निवेश करते समय अपनी पूरी बचत शेयर बाजार में लगाना भी सही रणनीति नहीं मानी जानी चाहिए। सबसे पहले अपनी वित्तीय जरूरतों और जोखिम उठाने की क्षमता को समझना जरूरी है। जिस पैसे की जरूरत निकट भविष्य में पड़ सकती है उसे अत्यधिक जोखिम वाले निवेश में लगाने से बचना चाहिए। बाजार में गिरावट आने पर घबराकर तुरंत बेचने के बजाय पहले यह समझना चाहिए कि गिरावट कंपनी की वास्तविक स्थिति से जुड़ी है या पूरे बाजार की अस्थायी कमजोरी है।

    सबसे जरूरी बात यह है कि शेयर बाजार को जल्दी अमीर बनने का जरिया न समझें। लंबी अवधि का नजरिया अनुशासन और सही जानकारी निवेश की बेहतर नींव बन सकते हैं। अगर किसी निवेश को समझने में परेशानी हो तो सेबी के आधिकारिक निवेशक शिक्षा संसाधनों का इस्तेमाल किया जा सकता है।

  • पर्सनल लोन रिजेक्ट होने की पांच बड़ी वजहें, बैंक आवेदन मंजूर करने से पहले क्रेडिट स्कोर और आय समेत क्या देखते हैं

    पर्सनल लोन रिजेक्ट होने की पांच बड़ी वजहें, बैंक आवेदन मंजूर करने से पहले क्रेडिट स्कोर और आय समेत क्या देखते हैं

    नई दिल्ली ।पर्सनल लोन लेना कई लोगों के लिए अचानक आई आर्थिक जरूरत पूरी करने का आसान विकल्प माना जाता है। इसमें आमतौर पर किसी संपत्ति को गिरवी रखने की जरूरत नहीं होती, लेकिन इसी कारण बैंक और वित्तीय संस्थान आवेदक की भुगतान क्षमता और आर्थिक स्थिति का बारीकी से आकलन करते हैं। आवेदन करने से पहले कुछ महत्वपूर्ण बातों की जांच नहीं करने पर लोन का आवेदन अस्वीकार हो सकता है।

    पर्सनल लोन की मंजूरी में क्रेडिट हिस्ट्री की अहम भूमिका होती है। यदि पहले लिए गए लोन या क्रेडिट कार्ड की EMI समय पर नहीं चुकाई गई है, भुगतान में बार-बार देरी हुई है या खाते में बकाया लंबे समय तक रहा है तो इससे आपकी क्रेडिट प्रोफाइल प्रभावित हो सकती है। ऐसी स्थिति में बैंक को भविष्य में समय पर भुगतान को लेकर जोखिम दिखाई दे सकता है।

    इसलिए नया लोन लेने से पहले अपनी क्रेडिट रिपोर्ट की जानकारी लेना उपयोगी होता है। रिपोर्ट में किसी पुराने भुगतान, खाते या व्यक्तिगत जानकारी से जुड़ी गलती दिखाई दे तो उसे ठीक कराने की प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए। बेहतर क्रेडिट इतिहास होने से आवेदन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, हालांकि केवल क्रेडिट स्कोर के आधार पर लोन मंजूरी सुनिश्चित नहीं होती।

    दूसरी बड़ी वजह कम आय या पहले से चल रही ज्यादा EMI हो सकती है। बैंक यह देखता है कि आवेदक की मासिक आमदनी कितनी है और उसका कितना हिस्सा पहले से मौजूद कर्ज चुकाने में खर्च हो रहा है। यदि आय की तुलना में मौजूदा वित्तीय जिम्मेदारियां अधिक हैं तो नई EMI चुकाने की क्षमता पर सवाल उठ सकता है।

    नौकरी या आय में अस्थिरता भी आवेदन प्रभावित कर सकती है। बार-बार नौकरी बदलना, मौजूदा नौकरी में कम अवधि या अनियमित आय बैंक के जोखिम आकलन को प्रभावित कर सकती है। स्वरोजगार करने वाले आवेदकों से आय की निरंतरता और आर्थिक स्थिति समझने के लिए अतिरिक्त दस्तावेज मांगे जा सकते हैं।

    कम समय में कई लोन या क्रेडिट कार्ड के लिए आवेदन करना भी सावधानी का विषय है। लगातार कई क्रेडिट आवेदन करने पर क्रेडिट प्रोफाइल में कई जांच दर्ज हो सकती हैं। इससे यह संकेत मिल सकता है कि व्यक्ति एक साथ कई जगह से कर्ज लेने की कोशिश कर रहा है। इसलिए एक आवेदन अस्वीकार होने के तुरंत बाद कई अन्य संस्थानों में आवेदन करने से बचना बेहतर है।

    दस्तावेजों में छोटी सी गलती भी आवेदन की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है। पहचान, आय, नौकरी, बैंक खाते या व्यक्तिगत विवरण में अलग-अलग जानकारी होने पर सत्यापन में परेशानी आ सकती है। आवेदन जमा करने से पहले सभी दस्तावेजों में नाम, पता, आय और रोजगार संबंधी विवरण सही तथा एक-दूसरे से मेल खाते होने चाहिए।

    यदि पर्सनल लोन का आवेदन अस्वीकार हो जाए तो तुरंत दूसरे बैंक या वित्तीय संस्थान में आवेदन करने के बजाय पहले अस्वीकृति का कारण समझना चाहिए। क्रेडिट रिपोर्ट की जांच, मौजूदा कर्ज की समीक्षा और दस्तावेजों में सुधार के बाद ही अगला आवेदन करना अधिक उचित होता है। लोन का एक बार रिजेक्ट होना स्थायी बाधा नहीं है, लेकिन अगला आवेदन करने से पहले उस कमी को दूर करना जरूरी है जिसकी वजह से पिछला आवेदन प्रभावित हुआ था।

  • ईरान-US जंग का तेल पर असर: 170 में से 145 देशों में बढ़े पेट्रोल के दाम, भारत में भी महंगा

    ईरान-US जंग का तेल पर असर: 170 में से 145 देशों में बढ़े पेट्रोल के दाम, भारत में भी महंगा


    नई दिल्ली। ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़े तनाव का असर अब वैश्विक तेल बाजार पर दिखाई दे रहा है। जंग के बाद दुनिया के ज्यादातर देशों में पेट्रोल की कीमतें बढ़ी हैं। अंतरराष्ट्रीय वेबसाइट GlobalPetrolPrices के मुताबिक फरवरी के अंत से अगस्त के बीच 170 में से 145 देशों में पेट्रोल महंगा हुआ है। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा, हालांकि यहां कीमतों में बढ़ोतरी कई देशों के मुकाबले सीमित रही।

    म्यांमार में 56%, भूटान में 55% तक बढ़े दाम
    GlobalPetrolPrices के आंकड़ों के अनुसार म्यांमार में पेट्रोल की कीमत 56%, भूटान में 55% और क्यूबा में 51% बढ़ी। UAE में करीब 50% और नाइजीरिया में 48% तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई। अमेरिका में भी पेट्रोल महंगा हुआ है। यहां औसत कीमत 2.94 डॉलर से बढ़कर 4.09 डॉलर प्रति गैलन हो गई, यानी करीब 39% की वृद्धि। इसका सीधा असर वाहन चलाने की लागत पर पड़ा है।

    भारत में करीब 8% बढ़ी कीमत
    मध्य पूर्व में तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का असर भारत में भी देखने को मिला। दिल्ली में फरवरी के मुकाबले पेट्रोल और डीजल की कीमत करीब 7.5 रुपए प्रति लीटर बढ़ी। हालांकि, जहां कई देशों में पेट्रोल 40-50% तक महंगा हुआ, वहीं भारत में बढ़ोतरी करीब 8% रही। भारत अपनी जरूरत का करीब 85% कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में लंबे समय तक तेल महंगा रहने का असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

    सिर्फ पेट्रोल नहीं, हर सेक्टर पर असर
    कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर सिर्फ वाहन चलाने तक सीमित नहीं रहता। खेती, फैक्ट्रियों, ट्रांसपोर्ट और सप्लाई चेन की लागत बढ़ने से सामान की कीमतों पर भी दबाव आता है। तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का इस्तेमाल फूड पैकेजिंग, प्लास्टिक बोतल, मेडिकल सिरिंज, पॉलिएस्टर, नायलॉन, कॉस्मेटिक्स, डिटर्जेंट और पेंट समेत कई उत्पादों में होता है। इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी उत्पादन से लेकर बाजार तक पूरी लागत को प्रभावित कर सकती है।

    भारत के लिए क्यों बढ़ सकती है चिंता?
    भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से पूरा करता है। यदि मध्य पूर्व में तनाव लंबे समय तक बना रहता है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऊंची रहती हैं, तो इसका असर पेट्रोल-डीजल, माल ढुलाई, खाद, पैकेजिंग और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है। यानी जंग भले ही पश्चिम एशिया में हो रही हो, लेकिन उसकी आर्थिक आंच दुनिया के दूसरे हिस्सों और भारत के घरेलू बाजार तक भी पहुंच सकती है।

  • नतालियो व्हीटली ने निर्मला सीतारमण से मुलाकात कर भारत और ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स के बीच वित्तीय सहयोग बढ़ाने पर चर्चा की

    नतालियो व्हीटली ने निर्मला सीतारमण से मुलाकात कर भारत और ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स के बीच वित्तीय सहयोग बढ़ाने पर चर्चा की

    नई दिल्ली ।केंद्रीय वित्त एवं कॉर्पोरेट कार्य मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को राष्ट्रीय राजधानी में ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स के प्रीमियर और वित्त मंत्री नतालियो डी. व्हीटली से मुलाकात की। बैठक के दौरान भारत और ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स के बीच वित्तीय एवं आर्थिक संबंधों को आगे बढ़ाने के विभिन्न अवसरों पर चर्चा हुई। दोनों पक्षों ने वित्तीय सेवाओं, डिजिटल परिवर्तन, निवेश प्रोत्साहन और क्षमता निर्माण जैसे क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाओं पर विचार किया।

    नतालियो व्हीटली भारत की यात्रा पर वित्तीय सेवाओं से जुड़े विशेषज्ञों के एक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे हैं। उनकी यात्रा का उद्देश्य दोनों पक्षों के बीच मौजूदा संबंधों को मजबूत करने के साथ आर्थिक सहयोग के नए क्षेत्रों की पहचान करना है। प्रतिनिधिमंडल के कार्यक्रम में नई दिल्ली के अलावा गिफ्ट सिटी, मुंबई और बेंगलुरु का दौरा भी शामिल है।

    बैठक के दौरान व्हीटली ने भारत और ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स के बीच साझेदारी को व्यापक बनाने में रुचि व्यक्त की। उन्होंने वित्तीय सेवाओं के साथ फिनटेक, डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन, व्यापार, निवेश संवर्धन और क्षमता निर्माण जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की संभावनाओं पर जोर दिया।

    वित्तीय तकनीक के क्षेत्र में भारत की बढ़ती क्षमता और डिजिटल माध्यमों के व्यापक इस्तेमाल को देखते हुए फिनटेक सहयोग को दोनों पक्षों के लिए महत्वपूर्ण अवसर माना जा रहा है। डिजिटल परिवर्तन के साथ वित्तीय सेवाओं में नवाचार और निवेश के नए रास्ते विकसित हो सकते हैं। क्षमता निर्माण के जरिए विशेषज्ञता और अनुभव साझा करने की संभावनाएं भी इस साझेदारी को मजबूत कर सकती हैं।

    निर्मला सीतारमण ने भारत को वित्तीय सेवाओं और निवेश के लिए दुनिया के सबसे बड़े तथा तेजी से बढ़ते बाजारों में से एक बताया। उन्होंने साझा हित वाले क्षेत्रों में ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स के साथ सहयोग बढ़ाने की संभावनाओं का स्वागत किया। बैठक में दोनों पक्षों के आर्थिक संबंधों को और मजबूत करने के लिए संभावित क्षेत्रों पर विचार-विमर्श हुआ।

    गिफ्ट सिटी और इंटरनेशनल फाइनेंशियल सर्विसेज सेंटर से जुड़े अवसर भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं। ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स के प्रतिनिधिमंडल का गिफ्ट सिटी दौरा वित्तीय सेवाओं और निवेश से जुड़े संभावित सहयोग को समझने का अवसर प्रदान कर सकता है। मुंबई और बेंगलुरु में होने वाली बातचीत से वित्तीय क्षेत्र और तकनीकी क्षमताओं से जुड़े अन्य अवसरों पर भी चर्चा आगे बढ़ सकती है।

    इस बीच, निर्मला सीतारमण 25 अगस्त से 2 सितंबर तक कनाडा और अमेरिका की आधिकारिक यात्रा पर रहेंगी। इस यात्रा का उद्देश्य भारत के साथ दोनों देशों की आर्थिक और वित्तीय साझेदारी को मजबूत करना, निवेश संबंधों को गहरा करना तथा वैश्विक आर्थिक प्राथमिकताओं पर सहयोग बढ़ाना है।

    कनाडा के टोरंटो में सीतारमण कनाडा के वित्त एवं राष्ट्रीय राजस्व मंत्री फ्रांस्वा-फिलिप शैम्पेन के साथ पहले आर्थिक एवं वित्तीय संवाद में हिस्सा लेंगी। इस दौरान व्यापक आर्थिक विकास, वित्तीय क्षेत्र में सहयोग, द्विपक्षीय निवेश अवसरों और वैश्विक आर्थिक मुद्दों पर चर्चा होगी।

    कनाडा यात्रा के दौरान वित्त मंत्री एक विशेष निवेश राउंडटेबल में भी शामिल होंगी। इसमें ऊर्जा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्रिटिकल मिनरल्स क्षेत्रों से जुड़े उद्योगपति, मुख्य कार्यकारी अधिकारी और वरिष्ठ अधिकारी भाग लेंगे। बातचीत का उद्देश्य नए निवेश अवसरों की पहचान करना और दीर्घकालिक कारोबारी साझेदारियों को बढ़ावा देना है।

    भारत और कनाडा के बीच व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने के साथ गिफ्ट सिटी-आईएफएससी में निवेश की संभावनाएं भी चर्चा का हिस्सा रहेंगी। इस तरह ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स के साथ हुई बैठक और आगामी विदेश यात्रा, दोनों ही वित्तीय सेवाओं, निवेश और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सहयोग को विस्तार देने की व्यापक दिशा से जुड़ी हैं।