Category: Economy

  • डेयरी, ड्रिंक्स, तेल और घी समेत कई खाद्य कंपनियां जांच के घेरे में, नियम उल्लंघन पर लाइसेंस रद्द होने का खतरा

    डेयरी, ड्रिंक्स, तेल और घी समेत कई खाद्य कंपनियां जांच के घेरे में, नियम उल्लंघन पर लाइसेंस रद्द होने का खतरा

    नई दिल्ली । खाद्य उत्पादों के विज्ञापन और लेबलिंग में किए जाने वाले दावों को लेकर भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण यानी FSSAI ने बड़ी कार्रवाई की है। खाद्य नियामक ने हाल के महीनों में 150 से अधिक फूड ब्रांड्स और खाद्य कारोबार से जुड़े प्रतिष्ठानों को कारण बताओ नोटिस जारी किए हैं। यह कार्रवाई मुख्य रूप से भ्रामक विज्ञापनों, बिना पर्याप्त आधार किए गए दावों और लेबलिंग नियमों के उल्लंघन को लेकर की गई है।

    नियामक की कार्रवाई में कई बड़े और जाने-पहचाने ब्रांड्स के नाम भी सामने आए हैं। इनमें नेस्ले इंडिया, पेप्सिको, एबॉट इंडिया, रेड बुल इंडिया, डैनोन इंडिया, मॉन्स्टर एनर्जी इंडिया, हेल एनर्जी, मोंडेलेज इंडिया, कोका-कोला इंडिया, डियाजियो, पेरनोड रिकार्ड, फेरेरो इंडिया और केनव्यू जैसे नाम शामिल हैं। हालांकि नोटिस जारी होना अपने आप में किसी कंपनी को दोषी ठहराने के बराबर नहीं है। संबंधित कंपनियों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाता है।

    FSSAI की नजर ऐसे विज्ञापनों पर है जिनमें खाद्य और पेय उत्पादों को लेकर ऐसे दावे किए जाते हैं, जिन्हें पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण या निर्धारित नियमों के आधार पर साबित करना जरूरी होता है। इनमें उत्पाद को 100 प्रतिशत प्राकृतिक बताना, किसी तरह की मिलावट नहीं होने का दावा करना, वजन घटाने में प्रभावी बताना या प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने जैसे दावे शामिल हो सकते हैं।

    खाद्य उत्पादों के प्रचार में किए जाने वाले स्वास्थ्य संबंधी दावों का उपभोक्ताओं के फैसले पर सीधा असर पड़ता है। इसी वजह से नियामक ने कंपनियों को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा है कि विज्ञापन और पैकेजिंग पर दी गई जानकारी वास्तविक, स्पष्ट और निर्धारित मानकों के अनुरूप हो।

    इस कार्रवाई का एक महत्वपूर्ण हिस्सा लेबलिंग से जुड़ा है। पैकेट पर उत्पाद की सामग्री, पोषण संबंधी जानकारी और अन्य जरूरी विवरण उपभोक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। यदि लेबल पर दी गई जानकारी नियमों के अनुरूप नहीं है या उपभोक्ताओं को भ्रमित कर सकती है, तो नियामकीय कार्रवाई की जा सकती है।

    FSSAI ने केवल कंपनियों के पारंपरिक विज्ञापनों तक अपनी निगरानी सीमित नहीं रखी है। खाद्य उत्पादों के प्रचार के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, फूड डिलीवरी ऐप और प्रभावशाली लोगों यानी इंफ्लुएंसर्स के माध्यम से किए जाने वाले दावों को भी जांच के दायरे में रखा गया है। इसका उद्देश्य विज्ञापन के अलग-अलग माध्यमों में उपभोक्ताओं तक पहुंचने वाली जानकारी की निगरानी करना है।

    नियामक के अनुसार, खाद्य सुरक्षा कानून और संबंधित मानकों के गंभीर उल्लंघन के मामलों में आगे भी कार्रवाई की जा सकती है। यदि नोटिस के जवाब संतोषजनक नहीं पाए जाते हैं और उल्लंघन साबित होता है, तो संबंधित कारोबारियों पर आर्थिक दंड लगाया जा सकता है। गंभीर मामलों में विनिर्माण लाइसेंस के निलंबन या रद्द किए जाने जैसी कार्रवाई भी संभव है।

    इस कार्रवाई से खाद्य कारोबार करने वाली कंपनियों के लिए यह संकेत स्पष्ट है कि उत्पाद की गुणवत्ता के साथ उसके विज्ञापन और पैकेजिंग में दी जाने वाली जानकारी भी नियामकीय निगरानी के दायरे में है। वहीं उपभोक्ताओं के लिए भी यह जरूरी है कि वे खाद्य उत्पाद खरीदते समय पैकेट पर लिखी जानकारी और स्वास्थ्य संबंधी दावों को सावधानी से देखें।

    FSSAI की कार्रवाई ऐसे समय में सामने आई है जब खाद्य और पेय कंपनियां अपने उत्पादों को स्वास्थ्य, पोषण और जीवनशैली से जोड़कर बड़े पैमाने पर प्रचारित कर रही हैं। ऐसे में वैज्ञानिक प्रमाण और नियमों के अनुरूप दावे करना कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण हो गया है। आने वाले समय में नियामक की निगरानी और कार्रवाई से खाद्य विज्ञापनों में पारदर्शिता बढ़ने की उम्मीद है।

  • भारत ने सितंबर डिलीवरी के लिए 23 डॉलर से अधिक में LNG खरीदी, यूरोप की मांग से बढ़ी बाजार चुनौती

    भारत ने सितंबर डिलीवरी के लिए 23 डॉलर से अधिक में LNG खरीदी, यूरोप की मांग से बढ़ी बाजार चुनौती

    नई दिल्ली । ईरान युद्ध के बीच वैश्विक गैस आपूर्ति व्यवस्था पर बढ़ते दबाव का असर अब भारत की LNG खरीद पर भी दिखाई देने लगा है। भारतीय कंपनियों को प्राकृतिक गैस की जरूरत पूरी करने के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार से अपेक्षाकृत ऊंची कीमत पर LNG खरीदनी पड़ रही है। सितंबर में डिलीवरी के लिए किए गए कुछ सौदों में कीमत 23 डॉलर प्रति MMBtu से अधिक बताई गई है। यह स्तर वर्ष 2022 के बाद भारत की महंगी LNG खरीद में शामिल है।

    सरकारी गैस कंपनी GAIL India ने सितंबर में डिलीवरी के लिए LNG की एक खेप स्पॉट मार्केट से खरीदी है। इसके लिए कंपनी ने 23 डॉलर प्रति MMBtu से ज्यादा कीमत चुकाई है। गुजरात स्टेट पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन यानी GSPC ने भी सितंबर में मिलने वाली LNG के लिए करीब 23 डॉलर प्रति MMBtu की कीमत पर खरीदारी की है। इन सौदों से संकेत मिलता है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस की उपलब्धता और कीमत दोनों ही भारत के लिए चुनौती बन रहे हैं।

    भारत में महंगी LNG खरीदने की जरूरत कई कारणों से बढ़ी है। देश की गैस और बिजली कंपनियां घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए स्पॉट मार्केट से अतिरिक्त LNG खरीद रही हैं। विशेष रूप से उर्वरक क्षेत्र में गैस की लगातार आपूर्ति बनाए रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि प्राकृतिक गैस उर्वरक उत्पादन की प्रमुख जरूरतों में शामिल है। ऐसे में कंपनियों को ऊंची कीमतों के बावजूद खरीदारी करनी पड़ रही है।

    भारत लंबे समय से LNG की जरूरत का एक बड़ा हिस्सा दीर्घकालिक समझौतों के माध्यम से पूरा करता रहा है। कतर भारत के प्रमुख LNG आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है। हालांकि पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव और ऊर्जा ढांचे पर असर पड़ने से समुद्री मार्गों और LNG आपूर्ति पर दबाव बढ़ा है। होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए होने वाली आवाजाही में बाधा की आशंका ने भी वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ाई है।

    कतर के LNG निर्यात ढांचे पर संघर्ष से जुड़े प्रभावों ने भी बाजार की चिंता बढ़ाई है। आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका के कारण एशियाई खरीदारों को वैकल्पिक स्रोतों से गैस जुटाने की कोशिश करनी पड़ रही है। इसका असर कीमतों पर पड़ रहा है और भारत जैसे आयात पर निर्भर बाजारों के लिए खरीद लागत बढ़ रही है।

    भारत को LNG खरीद के लिए यूरोपीय खरीदारों से भी प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है। यूरोप में गैस की कीमतों में तेजी आने से वहां LNG की मांग बढ़ी है। ऐसे में उपलब्ध कार्गो के लिए एशियाई और यूरोपीय खरीदारों के बीच प्रतिस्पर्धा तेज होने की स्थिति बनी हुई है। इसका सीधा असर स्पॉट मार्केट की कीमतों पर पड़ सकता है।

    सरकारी ऊर्जा कंपनी BPCL ने भी इस सप्ताह स्पॉट मार्केट से LNG की एक खेप खरीदने का समझौता किया है। हालांकि इस सौदे की कीमत सार्वजनिक नहीं हुई है। लगातार महंगी LNG खरीदने की स्थिति बनी रहती है तो गैस आधारित बिजली, उर्वरक और अन्य औद्योगिक क्षेत्रों की लागत पर दबाव बढ़ सकता है।

    LPG की कीमतों पर इसका असर तुरंत और सीधे पड़ना तय नहीं माना जा सकता, क्योंकि घरेलू रसोई गैस की कीमतें कई नीतिगत और बाजार संबंधी कारकों पर निर्भर करती हैं। हालांकि आयातित गैस और ऊर्जा लागत में लंबे समय तक बढ़ोतरी रहने पर पेट्रोलियम क्षेत्र की लागत संरचना पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में आने वाले समय में LPG की कीमतों को लेकर उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ना स्वाभाविक है।

    फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती वैश्विक LNG आपूर्ति को लेकर बनी अनिश्चितता है। पश्चिम एशिया में तनाव, समुद्री परिवहन की स्थिति और यूरोप की बढ़ती मांग के बीच भारत के लिए सस्ती गैस की उपलब्धता महत्वपूर्ण रहेगी। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो भारतीय कंपनियों की खरीद लागत और ऊर्जा क्षेत्र पर उसका प्रभाव आने वाले महीनों में और स्पष्ट हो सकता है।

  • सोना फिर रिकॉर्ड स्तर की ओर बढ़ा, चांदी में भी जोरदार तेजी, वैश्विक घटनाक्रमों से बाजार पर असर

    सोना फिर रिकॉर्ड स्तर की ओर बढ़ा, चांदी में भी जोरदार तेजी, वैश्विक घटनाक्रमों से बाजार पर असर


    नई दिल्ली । सोने और चांदी की कीमतों में अगस्त के दौरान एक बार फिर तेज तेजी देखने को मिली है। महीने के शुरुआती दौर में अपेक्षाकृत नरम रहने के बाद दोनों कीमती धातुओं ने तेजी पकड़ी और पिछले करीब 20 दिनों में सोने का भाव लगभग 10 हजार रुपये प्रति 10 ग्राम तथा चांदी का भाव करीब 32 हजार रुपये प्रति किलोग्राम बढ़ गया है। इस तेजी ने निवेशकों की नजर एक बार फिर सर्राफा बाजार पर केंद्रित कर दी है।

    इस साल की शुरुआत में भी सोने और चांदी ने रिकॉर्ड स्तर बनाया था। 29 जनवरी को सोने की कीमत करीब 1.76 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम तक पहुंच गई थी, जबकि चांदी का भाव करीब 3.86 लाख रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर पर रहा था। इसके बाद फरवरी से जुलाई के बीच वैश्विक बाजार की परिस्थितियों और अमेरिकी मौद्रिक नीति से जुड़े फैसलों के कारण दोनों धातुओं की कीमतों में गिरावट आई।

    जुलाई के अंत तक सोने का भाव घटकर करीब 1.42 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर आ गया था। हालांकि अगस्त में बाजार की दिशा फिर बदल गई। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े तनाव तथा डॉलर इंडेक्स में आई कमजोरी को सोने और चांदी की हालिया तेजी से जोड़कर देखा जा रहा है। अनिश्चितता बढ़ने पर निवेशकों का रुझान अक्सर सुरक्षित निवेश माने जाने वाली कीमती धातुओं की ओर बढ़ता है।

    रविवार को भारतीय बुलियन बाजार में कारोबार बंद रहता है। इसलिए 23 अगस्त को सोने के भाव शुक्रवार के बंद स्तर के आधार पर रहे। प्रमुख शहरों में 24 कैरेट सोने की कीमत मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, बेंगलुरु और हैदराबाद में करीब 1,63,090 रुपये प्रति 10 ग्राम दर्ज की गई। दिल्ली में इसका भाव करीब 1,63,240 रुपये और अहमदाबाद में करीब 1,63,140 रुपये प्रति 10 ग्राम रहा।

    22 कैरेट सोने की कीमत भी ऊंचे स्तर पर बनी हुई है। कई बड़े शहरों में इसका भाव करीब 1,49,500 रुपये प्रति 10 ग्राम रहा। दिल्ली में 22 कैरेट सोने की कीमत लगभग 1,49,650 रुपये और अहमदाबाद में करीब 1,49,550 रुपये प्रति 10 ग्राम बताई गई।

    चांदी की बात करें तो इसकी कीमत भी अगस्त में काफी मजबूत हुई है। मौजूदा स्तर करीब 2.60 लाख रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास है। शहर, गुणवत्ता और स्थानीय बाजार की स्थिति के आधार पर वास्तविक खुदरा कीमत में मामूली अंतर हो सकता है।

    साल 2026 की शुरुआत से भी सोने और चांदी ने निवेशकों को अच्छा रिटर्न दिया है। 31 दिसंबर 2025 को 24 कैरेट सोने की कीमत करीब 1,33,195 रुपये प्रति 10 ग्राम थी, जो अब औसतन करीब 1,60,620 रुपये तक पहुंच चुकी है। यानी साल की शुरुआत से इसमें लगभग 27,425 रुपये की बढ़ोतरी हुई है। इसी अवधि में चांदी 2,30,420 रुपये से बढ़कर करीब 2,46,630 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई है।

    आगे की दिशा वैश्विक तनाव, डॉलर की चाल, ब्याज दरों और केंद्रीय बैंकों की खरीदारी जैसे कारकों पर निर्भर करेगी। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भू-राजनीतिक तनाव बना रहता है और केंद्रीय बैंक सोने की खरीद जारी रखते हैं, तो साल के अंत तक कीमतों में और तेजी की संभावना बनी रह सकती है। हालांकि कीमती धातुओं में निवेश से पहले बाजार के उतार-चढ़ाव और जोखिम को ध्यान में रखना जरूरी है।

  • देशभर में चीनी के दाम में तेज उछाल, उत्तर प्रदेश से महानगरों तक महंगी हुई रोजमर्रा की जरूरत

    देशभर में चीनी के दाम में तेज उछाल, उत्तर प्रदेश से महानगरों तक महंगी हुई रोजमर्रा की जरूरत

    नई दिल्ली ।देशभर में चीनी की कीमतों में लगातार तेजी देखने को मिल रही है। त्योहारों और शादियों के सीजन से पहले रोजमर्रा की इस जरूरी वस्तु के महंगे होने से घरेलू बजट पर दबाव बढ़ने की आशंका है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक साल में करीब 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में चीनी के दाम में 10 से 18 रुपये प्रति किलो तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

    चीनी की कीमतों में सबसे अधिक वृद्धि ओडिशा में दर्ज की गई है। 21 अगस्त को यहां चीनी का भाव 64.72 रुपये प्रति किलोग्राम रहा, जो पिछले साल की समान अवधि की तुलना में करीब 17.80 रुपये अधिक है। इसके बाद मध्य प्रदेश और पंजाब जैसे राज्यों में भी कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।

    देश में चीनी की औसत कीमत फिलहाल करीब 58.23 रुपये प्रति किलोग्राम बताई जा रही है। हालांकि कई राज्यों में खुदरा बाजार का भाव राष्ट्रीय औसत से काफी ऊपर है। असम, दिल्ली, गोवा, केरल, मध्य प्रदेश, मेघालय, पंजाब, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल समेत कई इलाकों में चीनी की कीमत 65 रुपये प्रति किलो या उससे अधिक के स्तर तक पहुंच गई है।

    मध्य प्रदेश में भी चीनी के दाम में तेज बढ़ोतरी देखने को मिली है। पिछले महीने की समान तारीख की तुलना में राज्य में कीमत करीब 15.70 रुपये प्रति किलोग्राम बढ़ी है। पंजाब में भी लगभग 14.67 रुपये प्रति किलो की वृद्धि दर्ज की गई है। इन बढ़ती कीमतों का असर घरों के साथ-साथ मिठाई, बेकरी और अन्य खाद्य कारोबारों पर भी पड़ सकता है।

    उत्तर प्रदेश में स्थिति विशेष रूप से चर्चा में है। यहां चीनी मिलों से निकलने वाली चीनी का थोक भाव 5,400 से 5,800 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया है। थोक बाजार में तेजी का सीधा असर खुदरा कीमतों पर दिखाई दे रहा है और कई स्थानों पर उपभोक्ताओं को चीनी के लिए 65 से 68 रुपये प्रति किलो तक खर्च करना पड़ रहा है।

    दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे बड़े शहरों में भी अच्छी गुणवत्ता वाली चीनी की खुदरा कीमत 65 से 70 रुपये प्रति किलो के आसपास पहुंच गई है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, कुछ महानगरों में एक महीने के भीतर ही चीनी के दाम में 15 से 20 रुपये प्रति किलो तक की बढ़ोतरी हुई है।

    बढ़ती कीमतों के पीछे बाजार में आपूर्ति और मांग से जुड़े कई कारक अहम माने जा रहे हैं। त्योहारों के दौरान मिठाइयों और अन्य खाद्य पदार्थों में चीनी की मांग बढ़ती है। ऐसे में यदि बाजार में उपलब्धता अपेक्षाकृत सीमित रहती है तो कीमतों पर दबाव और बढ़ सकता है।

    सरकार भी चीनी बाजार की स्थिति पर नजर बनाए हुए है और कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं। हालांकि खुदरा बाजार में अलग-अलग शहरों और गुणवत्ता के आधार पर वास्तविक कीमत में अंतर हो सकता है।

    वर्तमान स्थिति में दिल्ली में चीनी का खुदरा भाव करीब 60 से 63 रुपये किलो, मुंबई में 65 से 70 रुपये, कोलकाता में 64 से 70 रुपये, पंजाब और ओडिशा में 64 से 65 रुपये, लखनऊ में 65 से 68 रुपये तथा पटना में 65 से 68 रुपये किलो के आसपास बताया गया है। आने वाले दिनों में त्योहारों की मांग और बाजार की आपूर्ति के आधार पर कीमतों में आगे बदलाव देखने को मिल सकता है।

  • LPG e-KYC की समयसीमा आज खत्म, सरकार ने अभी नहीं बढ़ाई डेडलाइन, उपभोक्ताओं के लिए वेरिफिकेशन जरूरी

    LPG e-KYC की समयसीमा आज खत्म, सरकार ने अभी नहीं बढ़ाई डेडलाइन, उपभोक्ताओं के लिए वेरिफिकेशन जरूरी

    नई दिल्ली ।देशभर के एलपीजी उपभोक्ताओं के लिए 23 अगस्त 2026 की तारीख महत्वपूर्ण है, क्योंकि घरेलू गैस कनेक्शन से जुड़े ई-केवाईसी की बढ़ाई गई समयसीमा आज समाप्त हो रही है। इंडेन गैस, एचपी गैस और भारत गैस के उपभोक्ताओं को आधार आधारित बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण की प्रक्रिया पूरी करने के लिए पहले 16 अगस्त तक का समय दिया गया था, जिसे बाद में बढ़ाकर 23 अगस्त किया गया था। फिलहाल इस समयसीमा को आगे बढ़ाने की कोई आधिकारिक घोषणा सामने नहीं आई है।

    ई-केवाईसी का उद्देश्य एलपीजी उपभोक्ताओं की पहचान और कनेक्शन से जुड़ी जानकारी का सत्यापन करना है। बड़ी संख्या में ग्राहक इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए अपने संबंधित गैस वितरक केंद्रों का रुख कर रहे हैं। जिन उपभोक्ताओं ने अभी तक अपना सत्यापन पूरा नहीं किया है, उनके लिए आज प्रक्रिया पूरी करना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    ई-केवाईसी लंबित रहने की स्थिति में उपभोक्ताओं को भविष्य में गैस कनेक्शन से जुड़ी सेवाओं में परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। सत्यापन नहीं होने पर कनेक्शन की सेवाओं, रिफिल बुकिंग या सब्सिडी से संबंधित लाभ प्रभावित होने की आशंका है। हालांकि किसी भी उपभोक्ता के मामले में वास्तविक कार्रवाई संबंधित नियमों और तेल विपणन कंपनियों की प्रक्रिया के अनुसार होगी।

    ई-केवाईसी पूरा करने के लिए उपभोक्ताओं को अपने गैस कनेक्शन से जुड़े विवरण और आधार से संबंधित जानकारी तैयार रखनी चाहिए। ऑनलाइन सुविधा उपलब्ध होने पर संबंधित गैस कंपनी के आधिकारिक डिजिटल माध्यम से प्रक्रिया पूरी की जा सकती है। जिन लोगों को ऑनलाइन सत्यापन में परेशानी हो रही है, वे अपने गैस वितरक से संपर्क कर बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण की प्रक्रिया पूरी कर सकते हैं।

    समयसीमा बढ़ाने की संभावना को लेकर फिलहाल उपभोक्ताओं के बीच सवाल बने हुए हैं। इससे पहले निर्धारित अंतिम तारीख को उपभोक्ताओं की सुविधा और तकनीकी समस्याओं से जुड़ी शिकायतों के बीच आगे बढ़ाया गया था। लेकिन 23 अगस्त के बाद नई समयसीमा घोषित की गई है या नहीं, इसे लेकर आधिकारिक सूचना का इंतजार करना होगा। इसलिए जिन ग्राहकों का ई-केवाईसी अभी बाकी है, उन्हें केवल डेडलाइन बढ़ने की उम्मीद पर निर्भर रहने के बजाय उपलब्ध समय में सत्यापन पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए।

    एलपीजी उपभोक्ताओं के लिए सब्सिडी और घरेलू सिलेंडर से जुड़े लाभ भी ई-केवाईसी व्यवस्था से जुड़े हुए हैं। खासकर प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों के लिए पहचान सत्यापन महत्वपूर्ण है। सत्यापन प्रक्रिया पूरी नहीं होने पर संबंधित लाभों पर असर पड़ सकता है, इसलिए पात्र उपभोक्ताओं को अपनी स्थिति समय रहते जांच लेनी चाहिए।

    इस बीच 23 अगस्त को घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। 14.2 किलोग्राम के घरेलू सिलेंडर के दाम शहर के अनुसार अलग-अलग हैं। दिल्ली में इसकी कीमत 942 रुपये, मुंबई में 941.50 रुपये, जयपुर में 945.50 रुपये और कोलकाता में 968 रुपये बताई गई है। पटना में घरेलू सिलेंडर की कीमत 1,031.50 रुपये है, जबकि लखनऊ में यह 979.50 रुपये और हैदराबाद में 994 रुपये है।

    वहीं 19 किलोग्राम वाले कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमतें भी शहर के हिसाब से अलग हैं। दिल्ली में इसकी कीमत 2,738 रुपये, मुंबई में 2,691.50 रुपये और पटना में 3,018 रुपये बताई गई है। घरेलू और व्यावसायिक सिलेंडरों की कीमतों में अंतर के साथ उपभोक्ताओं को अपने कनेक्शन की स्थिति और लागू नियमों की जानकारी भी रखनी चाहिए।

    ई-केवाईसी को लेकर किसी भी अंतिम निर्णय के लिए उपभोक्ताओं को संबंधित गैस कंपनी और सरकारी स्तर से जारी आधिकारिक सूचना पर ही भरोसा करना चाहिए। अगर आज तक सत्यापन नहीं हुआ है, तो जल्द से जल्द प्रक्रिया पूरी करना भविष्य में संभावित असुविधा से बचने का सबसे सुरक्षित विकल्प है।

  • DA Hike News: केंद्रीय कर्मचारियों के जुलाई डीए में 3 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की संभावना, रक्षाबंधन पर घोषणा पर नजर

    DA Hike News: केंद्रीय कर्मचारियों के जुलाई डीए में 3 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की संभावना, रक्षाबंधन पर घोषणा पर नजर

    नई दिल्ली । केंद्रीय कर्मचारियों को जुलाई 2026 से लागू होने वाले महंगाई भत्ते में बढ़ोतरी का इंतजार है। सरकार की ओर से अभी तक इस संबंध में आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन कर्मचारियों के बीच संभावित वृद्धि को लेकर चर्चा तेज है। मौजूदा संकेतों के आधार पर महंगाई भत्ते में 2 से 3 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की संभावना जताई जा रही है।

    केंद्र सरकार के कर्मचारियों के महंगाई भत्ते में सामान्य तौर पर साल में दो बार संशोधन किया जाता है। पहला संशोधन जनवरी से और दूसरा जुलाई से प्रभावी माना जाता है। जनवरी वाले संशोधन की घोषणा आमतौर पर वर्ष की शुरुआत के बाद होती है, जबकि जुलाई वाले संशोधन का फैसला बाद के महीनों में सामने आता है।

    इस बार कर्मचारियों की नजर रक्षाबंधन के अवसर पर भी बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार सितंबर की शुरुआत में महंगाई भत्ते की घोषणा करना चाहती है, तो अगस्त के अंत में इसकी जानकारी दी जा सकती है। हालांकि रक्षाबंधन के दिन ही घोषणा होने की बात अभी निश्चित नहीं है और इसे केवल संभावना के तौर पर देखा जा रहा है।

    महंगाई भत्ते में संशोधन का फैसला केंद्र सरकार की कैबिनेट मंजूरी के बाद होता है। इसके लिए महंगाई और उपभोक्ता कीमतों से जुड़े आंकड़ों को आधार बनाया जाता है। महंगाई भत्ते का उद्देश्य कर्मचारियों की आय पर बढ़ती महंगाई के प्रभाव को कुछ हद तक संतुलित करना है।

    मौजूदा व्यवस्था सातवें वेतन आयोग के तहत जारी है। आठवें वेतन आयोग के लागू होने तक केंद्रीय कर्मचारियों के वेतन में महंगाई भत्ते से संबंधित संशोधन इसी व्यवस्था के अनुसार होते रहेंगे। इसलिए जुलाई 2026 के संशोधन को लेकर कर्मचारियों और पेंशनभोगियों की नजर सरकार के अगले फैसले पर है।

    इस वर्ष पहले संशोधन में महंगाई भत्ते में 2 प्रतिशत की वृद्धि की गई थी। इसके बाद महंगाई भत्ता 58 प्रतिशत से बढ़कर 60 प्रतिशत हो गया था। अब जुलाई के लिए संभावित संशोधन में भी 2 प्रतिशत की वृद्धि की संभावना बताई जा रही है। कुछ आकलनों में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के रुझानों को देखते हुए 3 प्रतिशत वृद्धि की संभावना भी जताई गई है।

    यदि सरकार 3 प्रतिशत की वृद्धि को मंजूरी देती है, तो केंद्रीय कर्मचारियों का महंगाई भत्ता मूल वेतन का 63 प्रतिशत हो जाएगा। वहीं 2 प्रतिशत की वृद्धि होने पर यह 62 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। हालांकि अंतिम प्रतिशत और लागू होने की तारीख का फैसला सरकार की आधिकारिक घोषणा के बाद ही स्पष्ट होगा।

    कर्मचारी संगठनों की ओर से भी सरकार से महंगाई भत्ते की घोषणा जल्द करने की मांग की जा रही है। कर्मचारी प्रतिनिधियों का कहना है कि त्योहारों के मौसम में कर्मचारियों को समय पर वेतन और भत्तों से जुड़े निर्णय मिलने से उन्हें आर्थिक राहत मिल सकती है।

    रक्षाबंधन और ओणम जैसे त्योहारों को देखते हुए कुछ कर्मचारी संगठनों ने वेतन समय से पहले जारी करने की मांग भी उठाई है। उनका कहना है कि यदि सितंबर में महंगाई भत्ते में बढ़ोतरी की योजना है, तो अगस्त के अंत तक इसकी घोषणा की जा सकती है।

    फिलहाल केंद्रीय कर्मचारियों को सरकार की आधिकारिक घोषणा का इंतजार है। संभावित 2 से 3 प्रतिशत वृद्धि की चर्चा के बीच सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि कैबिनेट कब निर्णय लेती है और संशोधन को किस तारीख से लागू किया जाता है। घोषणा होने के बाद कर्मचारियों को बढ़े हुए महंगाई भत्ते के साथ बकाया राशि के संबंध में भी स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

  • Gold Price: सोना 8,257 रुपए महंगा होकर 1.60 लाख के पार, चांदी भी 2.46 लाख रुपए के स्तर पर पहुंची

    Gold Price: सोना 8,257 रुपए महंगा होकर 1.60 लाख के पार, चांदी भी 2.46 लाख रुपए के स्तर पर पहुंची

    नई दिल्ली ।देश के सर्राफा बाजार में इस सप्ताह सोने और चांदी की कीमतों में उल्लेखनीय तेजी दर्ज की गई। दोनों कीमती धातुओं के भाव में लगातार मजबूती देखने को मिली, जिसके चलते 24 कैरेट सोने की कीमत 1.60 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम के स्तर को पार कर गई। वहीं, चांदी का भाव भी 2.46 लाख रुपए प्रति किलोग्राम से ऊपर पहुंच गया।

    इंडिया बुलियन ज्वेलर्स एसोसिएशन के आंकड़ों के अनुसार, 24 कैरेट सोने का भाव इस सप्ताह 8,257 रुपए बढ़कर 1,60,620 रुपए प्रति 10 ग्राम हो गया। इससे पहले इसका भाव 1,52,363 रुपए प्रति 10 ग्राम था। इस तरह सप्ताह के दौरान सोने में मजबूत बढ़त दर्ज की गई और निवेशकों का ध्यान एक बार फिर कीमती धातुओं की ओर बढ़ा।

    22 कैरेट सोने की कीमत भी सप्ताह के दौरान तेजी के साथ बढ़ी। इसका भाव 1,39,565 रुपए प्रति 10 ग्राम से बढ़कर 1,47,128 रुपए प्रति 10 ग्राम हो गया। इसी तरह 18 कैरेट सोने की कीमत 1,14,272 रुपए से बढ़कर 1,20,465 रुपए प्रति 10 ग्राम पहुंच गई। इससे अलग-अलग शुद्धता वाले सोने के भाव में व्यापक तेजी का संकेत मिलता है।

    सप्ताह के दौरान सोने की कीमत में उतार-चढ़ाव भी देखने को मिला। 19 अगस्त की सुबह के सत्र में 24 कैरेट सोने का न्यूनतम भाव 1,52,884 रुपए प्रति 10 ग्राम दर्ज किया गया। इसके बाद कीमत में लगातार मजबूती आई और 21 अगस्त की शाम के सत्र में यह बढ़कर 1,60,620 रुपए प्रति 10 ग्राम के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया।

    सोने की तेजी के साथ चांदी ने भी मजबूत प्रदर्शन किया। चांदी का भाव इस सप्ताह 12,788 रुपए बढ़कर 2,46,630 रुपए प्रति किलो हो गया। इससे पहले इसकी कीमत 2,33,842 रुपए प्रति किलो थी। सप्ताह के दौरान चांदी का न्यूनतम भाव 19 अगस्त की सुबह 2,27,392 रुपए प्रति किलो दर्ज किया गया था।

    इसके बाद चांदी की कीमत में तेजी तेज हुई और 21 अगस्त की शाम को यह 2,46,630 रुपए प्रति किलो के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई। इस तरह सप्ताह के दौरान चांदी की कीमत में भी बड़ा उछाल देखने को मिला।

    बुलियन बाजार में सोने और चांदी के भाव दिन में दो बार जारी किए जाते हैं। सुबह और शाम के सत्र में कीमतों में होने वाले बदलाव से बाजार की दिशा और मांग की स्थिति का पता चलता है। घरेलू कीमतों पर अंतरराष्ट्रीय बाजार की चाल का भी महत्वपूर्ण प्रभाव रहता है।

    अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी सोने और चांदी की कीमतें मजबूत बनी हुई हैं। सोने का भाव करीब 4,600 डॉलर प्रति औंस और चांदी का भाव लगभग 69 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गया है। वैश्विक बाजार में मजबूती का असर घरेलू कीमतों पर भी दिखाई दे रहा है।

    बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, सोने और चांदी में तेजी के पीछे बॉन्ड यील्ड में गिरावट और सुरक्षित निवेश की मांग में बढ़ोतरी प्रमुख कारण हैं। वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों को लेकर अनिश्चितता के बीच निवेशक सुरक्षित परिसंपत्तियों की ओर रुख कर रहे हैं। इससे कीमती धातुओं में खरीदारी को समर्थन मिल रहा है और दोनों धातुओं की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं।

  • देश में 1,800 किलोमीटर नए एलपीजी पाइपलाइन नेटवर्क को मंजूरी, 7,000 करोड़ रुपये के निवेश से मजबूत होगी गैस आपूर्ति

    देश में 1,800 किलोमीटर नए एलपीजी पाइपलाइन नेटवर्क को मंजूरी, 7,000 करोड़ रुपये के निवेश से मजबूत होगी गैस आपूर्ति

    नई दिल्ली । देश में रसोई गैस की आपूर्ति व्यवस्था को अधिक मजबूत, सुरक्षित और प्रभावी बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस विनियामक बोर्ड ने लगभग 1,800 किलोमीटर लंबे नए एलपीजी पाइपलाइन नेटवर्क के विकास को मंजूरी दी है। इन परियोजनाओं पर करीब 7,000 करोड़ रुपये का निवेश किया जाएगा। नई पाइपलाइनों के जरिए एलपीजी की लंबी दूरी तक आपूर्ति को सड़क परिवहन की तुलना में अधिक व्यवस्थित बनाने का प्रयास किया जाएगा।

    स्वीकृत परियोजनाएं तेलंगाना, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, कर्नाटक और गोवा में विकसित की जाएंगी। इनका उद्देश्य देश के एलपीजी परिवहन ढांचे का विस्तार करना और विभिन्न क्षेत्रों में रसोई गैस की आपूर्ति को अधिक भरोसेमंद बनाना है। भारत अपनी एलपीजी जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है, जिसके बाद इसे देश के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचाया जाता है।

    नई पाइपलाइन परियोजनाओं के पूरा होने से आयातित एलपीजी को संबंधित क्षेत्रों तक पहुंचाने की प्रक्रिया को अधिक कुशल बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है। पाइपलाइन के जरिए परिवहन से सड़क मार्ग पर निर्भरता कम होगी और एलपीजी की आवाजाही के लिए इस्तेमाल होने वाले टैंकरों की संख्या में भी कमी आ सकती है।

    स्वीकृत प्रमुख परियोजनाओं में तेलंगाना के चेरलापल्ली से महाराष्ट्र के नागपुर तक 556 किलोमीटर लंबी एलपीजी पाइपलाइन शामिल है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के झांसी से उत्तराखंड के सितारगंज तक 611 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन विकसित की जाएगी। महाराष्ट्र के शिकरापुर से गोवा और कर्नाटक के हुबली तक 633 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन परियोजना को भी मंजूरी दी गई है।

    इन सभी परियोजनाओं के निर्माण और संचालन की जिम्मेदारी गेल इंडिया लिमिटेड संभालेगी। परियोजनाओं के पूरा होने के बाद पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस विनियामक बोर्ड द्वारा अधिकृत सामान्य वाहक एलपीजी पाइपलाइन नेटवर्क की कुल लंबाई करीब 7,700 किलोमीटर से बढ़कर लगभग 9,500 किलोमीटर हो जाएगी। इस तरह देश के अधिकृत एलपीजी पाइपलाइन नेटवर्क में लगभग 23.5 प्रतिशत की वृद्धि होगी।

    यह मंजूरी ऐसे समय में मिली है जब देश में एलपीजी के सुरक्षित और कम लागत वाले परिवहन के लिए पाइपलाइन नेटवर्क के विस्तार पर जोर दिया जा रहा है। इससे पहले कांडला-गोरखपुर एलपीजी पाइपलाइन परियोजना को मंजूरी मिल चुकी है। लगभग 2,757 किलोमीटर लंबी यह परियोजना देश की सबसे लंबी एलपीजी पाइपलाइन परियोजना मानी जाती है।

    नियामक के अनुसार, एलपीजी को पाइपलाइन के माध्यम से परिवहन करना सुरक्षित, किफायती और पर्यावरण की दृष्टि से बेहतर विकल्प है। सड़क परिवहन में बड़ी संख्या में टैंकरों की आवाजाही होती है, जबकि पाइपलाइन नेटवर्क के विस्तार से इस निर्भरता को कम किया जा सकता है।

    टैंकरों की आवाजाही घटने से सड़क सुरक्षा में सुधार और परिवहन व्यवस्था पर दबाव कम होने की उम्मीद है। इसके साथ ही लॉजिस्टिक्स लागत और ईंधन खपत में कमी आ सकती है। पाइपलाइन आधारित परिवहन से कार्बन उत्सर्जन कम करने में भी मदद मिलने की संभावना है।

    नियामक बोर्ड का दीर्घकालिक लक्ष्य एलपीजी को बॉटलिंग संयंत्रों तक पहुंचाने में सड़क परिवहन पर निर्भरता को न्यूनतम करना है। छह राज्यों में प्रस्तावित नई परियोजनाओं को इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। इनके पूरा होने से देश के एलपीजी परिवहन ढांचे का विस्तार होने के साथ ऊर्जा आपूर्ति व्यवस्था को अधिक टिकाऊ और कुशल बनाने में मदद मिल सकती है।

  • निफ्टी में लगातार दूसरे सप्ताह गिरावट, एफआईआई ने 1,602 करोड़ रुपये निकाले, डीआईआई की खरीदारी ने बाजार को संभाला

    निफ्टी में लगातार दूसरे सप्ताह गिरावट, एफआईआई ने 1,602 करोड़ रुपये निकाले, डीआईआई की खरीदारी ने बाजार को संभाला

    नई दिल्ली ।भारतीय शेयर बाजार में लगातार दूसरे सप्ताह दबाव देखने को मिला। ऊंची कच्चे तेल की कीमतों और अमेरिका ईरान तनाव के बीच निवेशकों की धारणा प्रभावित हुई। इस दौरान विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी एफआईआई ने भारतीय बाजार से 1,602 करोड़ रुपये की शुद्ध निकासी की, जबकि घरेलू संस्थागत निवेशकों यानी डीआईआई ने मजबूत खरीदारी जारी रखते हुए बाजार को सहारा दिया।

    सप्ताह के दौरान एफआईआई का निवेश व्यवहार उतार चढ़ाव वाला रहा। कारोबारी सप्ताह की शुरुआत में विदेशी निवेशकों ने बिकवाली की। इसके बाद लगातार दो कारोबारी सत्रों में उन्होंने खरीदारी की, लेकिन सप्ताह के अंतिम दो सत्रों में फिर से बिकवाली का रुख अपनाया। इससे बाजार में विदेशी पूंजी के प्रवाह को लेकर सतर्कता बढ़ी है।

    20 जुलाई से 21 अगस्त के बीच एफआईआई की गतिविधियों पर नजर डालें तो शुरुआती सप्ताह में वे शुद्ध विक्रेता रहे। इसके बाद लगातार तीन सप्ताह तक उन्होंने खरीदारी की। हालांकि मौजूदा सप्ताह में उनका रुख फिर बदल गया और उन्होंने शुद्ध निकासी की। इसके बावजूद पिछले एक महीने की कुल अवधि में एफआईआई अभी भी 1,282 करोड़ रुपये के शुद्ध खरीदार रहे हैं।

    दूसरी ओर घरेलू संस्थागत निवेशकों ने बाजार में लगातार मजबूती दिखाई। पिछले एक महीने के दौरान डीआईआई ने प्रत्येक सप्ताह शुद्ध खरीदारी की। इस अवधि में उनका कुल निवेश 48,390 करोड़ रुपये रहा। केवल मौजूदा सप्ताह में ही घरेलू संस्थागत निवेशकों ने 17,320 करोड़ रुपये की शुद्ध खरीदारी की, जिससे विदेशी बिकवाली के दबाव को काफी हद तक संतुलित करने में मदद मिली।

    अगस्त महीने के अब तक के आंकड़ों से भी घरेलू निवेशकों की मजबूत भूमिका सामने आती है। इस अवधि में एफआईआई ने कुल 2,510 करोड़ रुपये का निवेश किया है, जबकि डीआईआई का निवेश 34,370 करोड़ रुपये रहा है। इससे संकेत मिलता है कि घरेलू संस्थागत पूंजी बाजार की स्थिरता में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

    प्रमुख सूचकांकों की बात करें तो निफ्टी ने सप्ताह की शुरुआत कमजोरी के साथ की। मध्य सप्ताह में सूचकांक 24,026 के स्तर तक फिसल गया। हालांकि सप्ताह के अंतिम दो कारोबारी सत्रों में इसमें सुधार देखने को मिला और निफ्टी अपने निचले स्तर से ऊपर आया। इसके बावजूद सप्ताह के अंत में यह 24,252 के स्तर पर बंद हुआ, जो पिछले सप्ताह के मुकाबले करीब 0.5 प्रतिशत की गिरावट है।

    व्यापक बाजार में तस्वीर अपेक्षाकृत बेहतर रही। निफ्टी मिडकैप 100 लगभग सपाट स्तर पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी स्मॉलकैप 100 ने नया सर्वकालिक उच्च स्तर बनाया और सप्ताह के दौरान एक प्रतिशत से अधिक की बढ़त दर्ज की। इससे संकेत मिलता है कि निवेशकों की दिलचस्पी छोटी और मध्यम आकार की कंपनियों में बनी हुई है।

    बाजार के लिए आगे कच्चे तेल की कीमतें और अमेरिका ईरान के बीच भू राजनीतिक घटनाक्रम महत्वपूर्ण रहेंगे। कच्चे तेल की कीमत 92 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बने रहने से भारतीय बाजार पर दबाव की आशंका है। आने वाले दिनों में एफआईआई की दिशा भी बाजार की चाल तय करने वाले प्रमुख कारकों में शामिल रहेगी। वहीं डीआईआई की मजबूत खरीदारी बाजार को समर्थन देती रह सकती है।

  • चीनी की बढ़ती कीमतों पर विशेषज्ञों ने साफ किया रुख, एथेनॉल डायवर्जन नहीं बल्कि गन्ने की कमी और कम रिकवरी जिम्मेदार

    चीनी की बढ़ती कीमतों पर विशेषज्ञों ने साफ किया रुख, एथेनॉल डायवर्जन नहीं बल्कि गन्ने की कमी और कम रिकवरी जिम्मेदार

    नई दिल्ली । देश में चीनी की कीमतों में हालिया तेजी को लेकर एथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी डायवर्जन को जिम्मेदार ठहराए जाने के बीच कृषि और चीनी उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों ने अलग तस्वीर पेश की है। विशेषज्ञों के मुताबिक मौजूदा तेजी की मुख्य वजह एथेनॉल उत्पादन नहीं, बल्कि गन्ने के उत्पादन, गुणवत्ता और चीनी रिकवरी में आई कमी है। उनका कहना है कि सरकार चीनी की घरेलू जरूरत, एथेनॉल उत्पादन और निर्यात के बीच लगातार संतुलन बनाए रखने की कोशिश करती है।

    नेशनल शुगर इंस्टीट्यूट, कानपुर के पूर्व निदेशक प्रोफेसर नरेंद्र मोहन के अनुसार देश में हर वर्ष घरेलू खपत के लिए करीब 280 लाख टन चीनी की आवश्यकता होती है। इसके बाद उपलब्ध अतिरिक्त मात्रा में से ही एथेनॉल उत्पादन या निर्यात के लिए चीनी के इस्तेमाल की अनुमति दी जाती है। चालू वर्ष में करीब 31 लाख टन चीनी के बराबर मात्रा एथेनॉल उत्पादन के लिए इस्तेमाल की गई, जबकि लगभग सात लाख टन चीनी का निर्यात हुआ है।

    विशेषज्ञ के मुताबिक चालू वर्ष में देश का चीनी उत्पादन लगभग 306 लाख टन रहा है और इसके साथ पिछले वर्ष का कैरी-ओवर स्टॉक भी उपलब्ध था। सामान्य परिस्थितियों में देश में पर्याप्त बफर स्टॉक रखा जाता है, ताकि उत्पादन या आपूर्ति में अचानक कमी आने की स्थिति में घरेलू बाजार प्रभावित न हो। इसलिए केवल एथेनॉल के लिए चीनी डायवर्जन को मौजूदा कीमत वृद्धि का सीधा कारण मानना उचित नहीं है।

    प्रोफेसर नरेंद्र मोहन ने एथेनॉल को चीनी उद्योग के लिए महत्वपूर्ण बदलाव वाला क्षेत्र बताया। पहले जब देश में चीनी का उत्पादन घरेलू मांग से काफी अधिक हो जाता था, तब अतिरिक्त चीनी की वजह से बाजार में कीमतों पर दबाव बढ़ता था। इससे चीनी मिलों की आर्थिक स्थिति प्रभावित होती थी और किसानों को गन्ने का भुगतान मिलने में भी परेशानी पैदा होती थी। निर्यात एक विकल्प जरूर था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतों और प्रतिस्पर्धा के कारण यह हमेशा लाभदायक नहीं रहता था।

    ऐसी परिस्थितियों में अतिरिक्त चीनी को एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल करने की नीति ने उद्योग को एक वैकल्पिक बाजार दिया। इससे चीनी की अधिकता को नियंत्रित करने के साथ ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ावा मिला और पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता घटाने में भी मदद मिली। विशेषज्ञों के अनुसार सरकार उत्पादन के अनुमान और घरेलू जरूरतों को देखते हुए समय-समय पर एथेनॉल डायवर्जन तथा चीनी निर्यात से जुड़े फैसले ले सकती है।

    बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर के गन्ना शोध विभाग के कृषि वैज्ञानिक डॉ. हरिओम ने मौजूदा स्थिति में गुणवत्तापूर्ण गन्ने के उत्पादन और चीनी रिकवरी को महत्वपूर्ण कारक बताया। उनके अनुसार उत्तर भारत में इस समय गन्ना पेराई का अपेक्षाकृत कमजोर दौर चल रहा है। मुख्य पेराई सीजन शुरू होने के बाद बाजार में चीनी की आपूर्ति बढ़ने की संभावना है, जिससे कीमतों पर दबाव कम हो सकता है।

    गन्ने की फसल अवधि और रिकवरी में राज्यों के बीच अंतर भी चीनी उत्पादन को प्रभावित करता है। उत्तर भारत में किसान सामान्यतः करीब 10 से 11 महीने में तैयार होने वाली फसल लेते हैं, जबकि महाराष्ट्र में गन्ना लगभग 13 से 14 महीने और तमिलनाडु में कुछ परिस्थितियों में 18 महीने तक खेत में रहता है। लंबी अवधि से गन्ने में चीनी संचय और रिकवरी बेहतर हो सकती है।

    डॉ. हरिओम के अनुसार उत्तर भारत में किसान धान की कटाई के बाद अक्टूबर-नवंबर में गन्ने की खेती शुरू करने के साथ गेहूं, सरसों, मसूर, चना और सब्जियों जैसी अंतरवर्ती फसलों का विकल्प अपना सकते हैं। इससे अतिरिक्त आय के अवसर बढ़ सकते हैं और गन्ने की खेती की उत्पादकता एवं गुणवत्ता में सुधार की संभावना बन सकती है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि चीनी की कीमतों को समझने के लिए केवल एथेनॉल डायवर्जन पर ध्यान देने के बजाय गन्ने के उत्पादन, रिकवरी, पेराई चक्र और बाजार में उपलब्ध स्टॉक को भी समान रूप से देखना जरूरी है।