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  • वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भारत रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाकर 300 एमएमटीपीए करेगा, इंडो-पैसिफिक में मजबूत होगी ऊर्जा आपूर्ति

    वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भारत रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाकर 300 एमएमटीपीए करेगा, इंडो-पैसिफिक में मजबूत होगी ऊर्जा आपूर्ति

    नई दिल्ली । वैश्विक स्तर पर युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव के कारण ऊर्जा आपूर्ति व्यवस्था पर दबाव बढ़ने के बीच भारत ने अपनी तेल रिफाइनिंग क्षमता को और विस्तार देने की तैयारी तेज कर दी है। देश की मौजूदा रिफाइनिंग क्षमता करीब 272 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष है, जिसे बढ़ाकर 300 एमएमटीपीए करने का लक्ष्य रखा गया है। केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने शुक्रवार को यह जानकारी दी।

    भारत वर्तमान में दुनिया के सबसे बड़े तेल रिफाइनिंग देशों में शामिल है और उसकी रिफाइनरियां घरेलू मांग पूरी करने के साथ पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। क्षमता में प्रस्तावित वृद्धि से देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने की क्षमता बढ़ेगी और अंतरराष्ट्रीय बाजार में आपूर्ति संबंधी अनिश्चितताओं के बीच रणनीतिक मजबूती हासिल करने में मदद मिलेगी।

    केंद्रीय मंत्री के अनुसार भारत दुनिया के प्रमुख रिफाइनिंग केंद्रों में अपनी स्थिति मजबूत कर चुका है। देश में 23 रिफाइनरियां सालाना करीब 270 मिलियन मीट्रिक टन कच्चे तेल को संसाधित करने की क्षमता रखती हैं। रिफाइनिंग क्षेत्र के विस्तार को भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक ऊर्जा बाजार में भूमिका बढ़ाने से जोड़कर देखा जा रहा है।

    भारत पेट्रोलियम उत्पादों का शुद्ध निर्यातक भी है। ऐसे में अतिरिक्त रिफाइनिंग क्षमता देश को घरेलू खपत के साथ-साथ मित्र देशों को भरोसेमंद ऊर्जा आपूर्ति उपलब्ध कराने में सक्षम बनाएगी। विशेष रूप से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में ऊर्जा सुरक्षा को लेकर बढ़ती चुनौतियों के बीच भारत अपनी रिफाइनिंग और आपूर्ति क्षमता को रणनीतिक संपत्ति के रूप में विकसित कर रहा है।

    इसी व्यापक ऊर्जा सहयोग के तहत भारत और मॉरिशस के बीच तेल और गैस क्षेत्र में महत्वपूर्ण समझौता हुआ है। दोनों देशों ने ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके साथ ही इंडियनऑयल और मॉरिशस की स्टेट ट्रेडिंग कॉरपोरेशन के बीच पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति को लेकर पांच साल का समझौता भी हुआ है।

    समझौते के तहत मॉरिशस को पेट्रोलियम उत्पादों की नियमित और भरोसेमंद आपूर्ति सुनिश्चित करने की दिशा में काम किया जाएगा। इससे द्वीपीय देश की ऊर्जा जरूरतों के लिए स्थिर आपूर्ति व्यवस्था विकसित करने में मदद मिलने की उम्मीद है। भारत के लिए यह समझौता क्षेत्रीय ऊर्जा सहयोग को मजबूत करने और अपने रिफाइनिंग नेटवर्क की उपयोगिता बढ़ाने का अवसर भी है।

    भारत और मॉरिशस के बीच ऊर्जा साझेदारी को दोनों देशों की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता से जोड़कर देखा जा रहा है। सरकार से सरकार और कारोबार से कारोबार स्तर पर हुए समझौतों से ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग के नए रास्ते खुलने की उम्मीद है। इससे पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति, व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में दोनों देशों के संबंध और मजबूत हो सकते हैं।

    वैश्विक बाजार में कच्चे तेल और रिफाइंड उत्पादों की कीमतों तथा आपूर्ति पर बाहरी घटनाओं का प्रभाव लगातार दिखाई देता है। ऐसे माहौल में घरेलू रिफाइनिंग क्षमता का विस्तार भारत को ऊर्जा क्षेत्र में अधिक लचीलापन प्रदान कर सकता है। 300 एमएमटीपीए का लक्ष्य हासिल होने पर भारत की उत्पादन और निर्यात क्षमता में भी महत्वपूर्ण विस्तार की संभावना बनेगी।

    सरकार का जोर केवल रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत को एक भरोसेमंद और स्थिर ऊर्जा भागीदार के रूप में स्थापित करने पर भी है। मॉरिशस के साथ हुआ समझौता इसी दिशा में उठाया गया कदम माना जा रहा है। आने वाले वर्षों में रिफाइनिंग क्षमता और क्षेत्रीय ऊर्जा साझेदारियों का विस्तार भारत की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

  • भारत-ईयू एफटीए से व्यापार और निवेश को नई गति मिलने की उम्मीद, यूरोपीय कंपनियां भारतीय उद्योगों के साथ सहयोग को उत्साहित

    भारत-ईयू एफटीए से व्यापार और निवेश को नई गति मिलने की उम्मीद, यूरोपीय कंपनियां भारतीय उद्योगों के साथ सहयोग को उत्साहित

    नई दिल्ली ।भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुआ मुक्त व्यापार समझौता दोनों पक्षों के कारोबार और निवेश के लिए नए अवसर खोल सकता है। फिनलैंड दूतावास के ट्रेड काउंसलर एंटी हेरलेवी ने कहा कि यूरोपीय कंपनियां भारतीय उद्योगों के साथ अधिक गहराई से सहयोग करने को लेकर उत्साहित हैं और समझौते के प्रभावी क्रियान्वयन से जुड़ी व्यावहारिक प्रक्रियाएं जल्द पूरी होने की उम्मीद कर रही हैं।

    हेरलेवी के मुताबिक भारत और यूरोप के कारोबारी संबंधों के लिए मौजूदा वर्ष महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार एफटीए पर हस्ताक्षर होने के बाद दोनों क्षेत्रों की कंपनियों के बीच व्यापार विस्तार, निवेश और व्यावसायिक साझेदारी की संभावनाएं बढ़ी हैं। यूरोपीय कारोबारी भारतीय बाजार और यहां के उद्योगों के साथ अधिक नजदीकी से काम करने में रुचि दिखा रहे हैं।

    मुक्त व्यापार समझौते का उद्देश्य दोनों पक्षों के बीच कारोबार को आसान बनाना और व्यावसायिक गतिविधियों के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार करना है। इससे विभिन्न क्षेत्रों में कंपनियों के लिए बाजार तक पहुंच बढ़ने की संभावना है। साथ ही भारत और यूरोप के बीच निवेश तथा आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ा सहयोग भी मजबूत हो सकता है।

    हेरलेवी ने वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के संदर्भ में भी भारत और यूरोप के बीच बढ़ते सहयोग को महत्वपूर्ण बताया। बदलते वैश्विक कारोबारी वातावरण में कंपनियां अपनी आपूर्ति शृंखलाओं को अधिक विविध और टिकाऊ बनाने पर ध्यान दे रही हैं। ऐसे में भारत और यूरोपीय देशों के बीच औद्योगिक सहयोग दोनों पक्षों के लिए उपयोगी हो सकता है।

    फिनलैंड के ट्रेड काउंसलर ने भारत के लिए चक्रीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में फिनलैंड के अनुभव को भी महत्वपूर्ण बताया। चक्रीय अर्थव्यवस्था में संसाधनों का अधिकतम इस्तेमाल, उत्पादों का लंबे समय तक उपयोग और कचरे को कम करने पर जोर दिया जाता है। इस मॉडल में इस्तेमाल हो चुकी सामग्री को दोबारा उत्पादन प्रक्रिया में शामिल करने की कोशिश की जाती है।

    उनके अनुसार फिनलैंड और अन्य यूरोपीय देशों ने संसाधनों के पुन: उपयोग, पुनर्चक्रण और टिकाऊ उत्पादन प्रणालियों के विकास में लंबे समय तक काम किया है। भारत और फिनलैंड की कंपनियों के बीच इस क्षेत्र में सहयोग बढ़ने से संसाधनों की खपत कम करने और उत्पादन प्रक्रियाओं को अधिक टिकाऊ बनाने में मदद मिल सकती है।

    चक्रीय अर्थव्यवस्था का प्रभाव केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहता। संसाधनों का कम इस्तेमाल करने से कंपनियों की लागत घट सकती है और उत्पादन प्रक्रिया में ऊर्जा तथा पानी की खपत भी कम की जा सकती है। साथ ही नई कच्ची सामग्री पर निर्भरता कम होने से उत्पादन से जुड़े पर्यावरणीय प्रभाव को घटाने में मदद मिल सकती है।

    हेरलेवी ने इस बदलाव की शुरुआत उत्पाद के डिजाइन चरण से करने पर जोर दिया। उनके अनुसार कंपनियों को ऐसे उत्पाद तैयार करने चाहिए जिनमें कम सामग्री की जरूरत हो, जिनका उपयोग लंबे समय तक किया जा सके और जिन्हें इस्तेमाल के बाद आसानी से पुनर्चक्रित किया जा सके।

    उन्होंने कहा कि बेहतर योजना और शुरुआती स्तर पर सही उत्पाद डिजाइन चक्रीय अर्थव्यवस्था की मजबूत नींव बन सकता है। इस दृष्टिकोण से कंपनियां उत्पादन के साथ-साथ उत्पाद के पूरे जीवनचक्र को ध्यान में रखकर काम कर सकती हैं।

    भारत-ईयू एफटीए और टिकाऊ उत्पादन जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ने से आने वाले समय में दोनों पक्षों के कारोबारी संबंधों को व्यापक आधार मिलने की संभावना है। व्यापार, निवेश, तकनीक और पर्यावरण अनुकूल उत्पादन में साझेदारी बढ़ने से भारतीय और यूरोपीय कंपनियों के लिए नए कारोबारी रास्ते खुल सकते हैं।

  • ई20 ईंधन दौर में माइलेज बढ़ाने के लिए किआ की बड़ी योजना, हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक एसयूवी करेगी लॉन्च

    ई20 ईंधन दौर में माइलेज बढ़ाने के लिए किआ की बड़ी योजना, हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक एसयूवी करेगी लॉन्च


    नई दिल्ली । 
    भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार में ई20 पेट्रोल के बढ़ते चलन के बीच वाहन निर्माताओं ने गाड़ियों के माइलेज को बेहतर बनाने के लिए रणनीतिक तैयारियां तेज कर दी हैं। ईंधन की बदलती संरचना के कारण उपभोक्ताओं को मिलने वाले माइलेज पर पड़ रहे प्रभाव को ध्यान में रखते हुए वाहन कंपनियां अब हाइब्रिड तकनीकों पर बड़ा दांव लगा रही हैं। इसी क्रम में किआ मोटर्स ने भारतीय बाजार के लिए अपनी भविष्य की योजनाओं की घोषणा की है, जिसके तहत कंपनी अपनी लोकप्रिय कारों को हाइब्रिड पावरट्रेन के साथ उतारने की तैयारी कर रही है।

    कंपनी के वार्षिक वैश्विक निवेशक सम्मेलन के दौरान किआ के शीर्ष नेतृत्व ने भारतीय बाजार में हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक वाहनों के विस्तार की पुष्टि की। कंपनी की योजना के अनुसार आने वाले वर्षों में किआ सोनेट और कारेन्स को हाइब्रिड इंजन विकल्प के साथ बाजार में पेश किया जाएगा। इसके अतिरिक्त कंपनी भारतीय ग्राहकों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए एक स्थानीय रूप से विकसित बी-सेगमेंट इलेक्ट्रिक एसयूवी लाने पर भी काम कर रही है।

    कंपनी के रणनीति रोडमैप के तहत वर्ष 2027 से भारतीय बाजार में उपलब्ध लोकप्रिय मॉडलों जैसे सोनेट, कारेन्स और सेल्टॉस के लिए हाइब्रिड इलेक्ट्रिक व्हीकल विकल्प चरणबद्ध तरीके से पेश किए जाएंगे। सोनेट कंपनी के सबसे किफायती मॉडलों में से एक है, इसलिए इसके हाइब्रिड संस्करण को मजबूत पावरट्रेन के साथ तैयार किया जा रहा है। कंपनी का लक्ष्य वर्ष 2028 या 2029 तक इस किफायती एसयूवी को हाइब्रिड तकनीक से लैस करके ग्राहकों के लिए पेश करना है।

    नई पीढ़ी की सोनेट को उन्नत के1 प्लेटफॉर्म पर तैयार किए जाने की संभावना है। यह नया प्लेटफॉर्म न केवल हाइब्रिड पावरट्रेन को सपोर्ट करने में सक्षम है, बल्कि इसमें आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स आर्किटेक्चर, ओवर-द-एयर अपडेट और रिमोट डायग्नोस्टिक्स जैसी तकनीकें भी शामिल हैं। इसके अलावा इस प्लेटफॉर्म की मदद से वाहन के केबिन के भीतर रियर सीट स्पेस और आराम को भी बेहतर बनाने का प्रयास किया गया है, जो भारतीय उपभोक्ताओं के लिए एक महत्वपूर्ण कारक माना जाता है।

    हाइब्रिड तकनीक के आने से मध्य प्रदेश समेत देश के विभिन्न राज्यों के शहरी और ग्रामीण इलाकों में यात्रा करने वाले वाहन चालकों को बेहतर ईंधन दक्षता मिलेगी। मौजूदा समय में किआ कारेन्स विभिन्न ईंधन विकल्पों जैसे पेट्रोल, टर्बो पेट्रोल, डीजल और ऑल-इलेक्ट्रिक में उपलब्ध है, जिसे आने वाले समय में हाइब्रिड अवतार देकर और अधिक कुशल बनाने की योजना है। ऑटो विशेषज्ञ मानते हैं कि स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड पावरट्रेन से न केवल माइलेज में बढ़ोतरी होगी बल्कि कार्बन उत्सर्जन में भी भारी कमी देखने को मिलेगी।

    ई20 पेट्रोल की उपस्थिति में पारंपरिक इंजनों की माइलेज क्षमता पर पड़ रहे असर को देखते हुए हाइब्रिड वाहन भारतीय ऑटो सेक्टर के लिए एक व्यावहारिक विकल्प साबित हो सकते हैं। किआ द्वारा उठाए गए इन कदमों से स्पष्ट है कि कंपनी भारतीय बाजार में पर्यावरण अनुकूल और लागत प्रभावी ड्राइविंग अनुभव प्रदान करने के लिए दीर्घकालिक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ रही है।

  • भारत विकास की राह पर तेजी से अग्रसर…. 2021 के बाद से GDP ग्रोथ रेट में चीन को छोड़ा पीछे

    भारत विकास की राह पर तेजी से अग्रसर…. 2021 के बाद से GDP ग्रोथ रेट में चीन को छोड़ा पीछे


    नई दिल्ली।
    दुनिया के दो सबसे ज्यादा आबादी वाले देश, भारत (India) और चीन (China), कभी एशियाई सदी (Asian Century) के दो इंजन माने जाते थे. उन्होंने अपनी आर्थिक यात्रा का आधुनिक दौर लगभग एक जैसी आय के स्तर से शुरू किया था, लेकिन जल्द ही उनके रास्ते अलग-अलग हो गए. भारत की आर्थिक वृद्धि दर (India Economic Growth rate) इस समय चीन से तेज नजर आ रही है. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की GDP विकास दर का अनुमान 7.7% लगाया गया था, जबकि चीन के लिए यह लगभग 5% था. हालांकि, यह अंतर सिर्फ एक साल का नहीं है. 2015 के बाद से दोनों देशों की ग्रोथ रफ्तार में लगातार बदलाव देखने को मिला है और 2021 से भारत सालाना आर्थिक वृद्धि के मामले में चीन से आगे रहा है।

    1980 में चीन की GDP ग्रोथ करीब 7.9% थी, जबकि भारत 6.7% की दर से बढ़ रहा था. इसके बाद 1980, 1990 और 2000 के दशकों में चीन ने भारत से काफी तेज आर्थिक विस्तार किया. हालांकि, 2010 के दशक में दोनों देशों की ग्रोथ के बीच का अंतर कम होने लगा. वर्ल्ड बैंक के 2025 के आंकड़ों में भारत की ग्रोथ 7.6% और चीन की करीब 5% रही. वहीं, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के जुलाई 2026 अपडेट में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि दर 6.7% रहने का अनुमान लगाया गया है।


    कभी बराबर थी दोनों देशों की जीडीपी

    दोनों देशों की आर्थिक यात्रा की शुरुआत पूरी तरह अलग नहीं थी. 1987 में भारत और चीन की नॉमिनल GDP लगभग बराबर थी. PPP यानी Purchasing Power Parity के आधार पर भी 1990 में चीन भारत से बहुत आगे नहीं था. उस समय प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत चीन से आगे था. हालांकि, इसके बाद चीन ने बेहद तेज गति से आर्थिक विस्तार किया. 1961 से 2024 के बीच चीन 22 बार 10% से ज्यादा सालाना GDP ग्रोथ दर्ज कर चुका है, जबकि भारत इस अवधि में कभी भी 10% की सालाना वृद्धि दर तक नहीं पहुंचा।

    आर्थिक आकार में चीन अभी बहुत आगे
    तेज ग्रोथ के बावजूद भारत और चीन की अर्थव्यवस्थाओं के आकार में बड़ा अंतर है. 2025 में चीन की नॉमिनल GDP करीब 19.5 ट्रिलियन डॉलर रही, जबकि भारत की GDP करीब 3.96 ट्रिलियन डॉलर थी. PPP के आधार पर चीन की अर्थव्यवस्था करीब 41 ट्रिलियन डॉलर और भारत की लगभग 17.7 ट्रिलियन डॉलर रही. प्रति व्यक्ति GDP में भी दोनों देशों के बीच बड़ा अंतर है. नॉमिनल आधार पर चीन की प्रति व्यक्ति GDP करीब 13,806 डॉलर थी, जबकि भारत में यह लगभग 2,818 डॉलर रही।


    चीन का मॉडल और भारत की ताकत

    चीन ने दशकों तक इंडस्ट्री, एक्सपोर्ट और बड़े पैमाने पर निवेश के सहारे अपनी अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाया. दूसरी ओर, भारत की आर्थिक वृद्धि में घरेलू मांग, सर्विसेज और निजी खपत की बड़ी भूमिका रही है. 2024 में भारत में घरेलू खपत GDP का करीब 61% थी. व्यापक तौर पर देखें तो भारतीय अर्थव्यवस्था का लगभग 70% हिस्सा खपत से जुड़ा है. चीन में घरेलू खपत का GDP में हिस्सा करीब 40% रहा।


    चीन की धीमी रफ्तार के पीछे क्या वजह

    चीन की मौजूदा सुस्ती को सिर्फ एक कमजोर साल के तौर पर नहीं देखा जा सकता. वहां प्रॉपर्टी सेक्टर का संकट, डेवलपर्स पर कर्ज का दबाव, संपत्तियों की गिरती कीमतें, कमजोर उपभोक्ता भरोसा और जनसांख्यिकीय चुनौतियां आर्थिक मांग पर असर डाल रही हैं. इन चुनौतियों के बीच चीन EV, बैटरी, सोलर उपकरण और एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे सेक्टर पर जोर दे रहा है. हालांकि, इन क्षेत्रों में बढ़ती उत्पादन क्षमता के कारण ओवरकैपेसिटी की चिंता भी बढ़ी है. इससे चीन की बाहरी बाजारों पर निर्भरता और ट्रेड बैरियर का जोखिम बढ़ सकता है।


    भारत के सामने बड़ा मौका, आर्थिक आंकड़े पॉजिटिव

    पोस्ट-कोविड दौर में ग्लोबल सप्लाई चेन में बदलाव भारत के लिए एक बड़ा अवसर लेकर आया है. कई मल्टीनेशनल कंपनियां भारत को सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग बेस नहीं, बल्कि बड़े कंज्यूमर मार्केट के तौर पर भी देख रही हैं. लेकिन यहां एक बड़ी चुनौती भी है. अगर हाई-वैल्यू मैन्युफैक्चरिंग चीन, वियतनाम और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में बनी रहती है और भारत मुख्य रूप से दूसरे देशों में तैयार सामान का बड़ा बाजार बन जाता है, तो इसका फायदा सीमित रह सकता है. भारत के मौजूदा आर्थिक आंकड़े उम्मीद जगाते हैं. देश का कंजम्पशन इंजन मजबूत है, सर्विस सेक्टर टिकाऊ बना हुआ है, और यहां की आबादी व बाजार का आकार ऐसे मौके देता है जो बहुत कम बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को मिलते हैं।


    असली चुनौती ग्रोथ को रोजगार और आय में बदलना

    भारत का चीन से तेज बढ़ना निश्चित तौर पर एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन सिर्फ GDP ग्रोथ रेट पूरी तस्वीर नहीं बताती. चीन अब भी आर्थिक आकार, प्रति व्यक्ति आय और औद्योगिक क्षमता के मामले में भारत से काफी आगे है. भारत के लिए असली परीक्षा यह होगी कि क्या वह तेज आर्थिक वृद्धि को ज्यादा रोजगार, बेहतर आय, मजबूत मैन्युफैक्चरिंग और जीवन स्तर में सुधार में बदल पाता है. IMF और वर्ल्ड बैंक के अनुमान फिलहाल भारत की ग्रोथ रफ्तार को चीन से बेहतर दिखा रहे हैं. लेकिन अब सबसे जरूरी सवाल यह नहीं है कि क्या भारत चीन से तेजी से विकास कर सकता है. बल्कि सवाल यह है कि क्या भारत उस बढ़त को इतने लंबे समय तक बनाए रख सकता है जिससे इन दो एशियाई दिग्गजों के बीच पैदा हुए भारी आर्थिक अंतर को खत्म किया जा सके।

  • मिडिल ईस्ट तनाव का असर….कच्चे तेल ने बिगाड़ा खेल, गेहूं-प्याज की कीमतों में भारी उछाल

    मिडिल ईस्ट तनाव का असर….कच्चे तेल ने बिगाड़ा खेल, गेहूं-प्याज की कीमतों में भारी उछाल


    नई दिल्ली।
    मिडिल ईस्ट तनाव (Middle East tensions) के बाद तेल कंपनियों ने मई में पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाए थे. जून के बाद अमेरिका और ईरान में तनाव घटने से कच्चे तेल की कीमतों में जब कमी आई तो फ्यूल प्राइस कम होने का भरोसा बढ़ गया था. लेकिन खाड़ी में तनाव फिर बढ़ने से ईंधन की कीमतों में कमी की उम्मीद टूटने लगी है. दरअसल, इस वक्त दुनियाभर में चल रहे तनाव का असर भारत के ईंधन और खाने-पीने के सामानों पर सबसे ज्यादा नजर आ रहा है.


    कच्चा तेल में फिर तेजी
    अमेरिका-ईरान के बीच नए समझौते की उम्मीदें कमजोर पड़ने से कच्चे तेल में तेजी आ रही है. इससे ब्रेंट क्रूड 92 डॉलर प्रति बैरल के करीब और WTI क्रूड करीब 85 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया है. आशंका है कि क्रूड जल्द ही 100 डॉलर प्रति बैरल के पास पहुंच सकता है. तेल की कीमतों में ये तेजी ऐसे समय आई है, जब भारत में पेट्रोल और डीजल सस्ता होने की उम्मीद लगाई जा रही थी. लेकिन हालात फिलहाल राहत वाले नहीं दिख रहे क्योंकि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर बनी अनिश्चितता और ईरान-अमेरिका के बीच बढ़ी दूरी ने एनर्जी मार्केट की बेचैनी बढ़ा दी है।


    भारत पर ज्यादा असर

    भारत के लिए हालात ज्यादा गंभीर हैं, क्योंकि देश अपनी जरूरत का 85 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है. महंगे कच्चे तेल से ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स की लागत बढ़ सकती है. लंबे समय तक ऊंचे दाम रहने पर ईंधन कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

    तेल के साथ-साथ खाने की थाली से जुड़ी एक और चिंता भी सिर उठाने लगी है. गेहूं की कीमतों में तेजी ने आटा और ब्रेड जैसे जरूरी सामान को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं. दुनिया के बड़े गेहूं निर्यातक रूस और यूक्रेन के बीच जारी तनाव ने काला सागर क्षेत्र में सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ा दी है. इसका असर अंतरराष्ट्रीय बाजार से लेकर भारतीय मंडियों तक दिखाई देने लगा है. वैश्विक बाजार में गेहूं करीब 6.7 डॉलर प्रति बुशेल के स्तर पर पहुंच गया है. देश की प्रमुख मंडियों में एक महीने में गेहूं के भाव करीब 4 फीसदी तक बढ़ गए हैं. जाहिर है कि गेहूं की बढ़ती कीमतें आटा, ब्रेड और दूसरे खाद्य उत्पादों की लागत बढ़ा सकती हैं।


    प्याज भी महंगा
    रसोई की चिंता यहीं खत्म नहीं होती, प्याज भी लोगों की जेब पर दबाव बढ़ाने लगा है. प्याज का औसत खुदरा भाव 37 रुपये 20 पैसे प्रति किलो पर पहुंच गया है जबकि एक महीने पहले कीमत 34 रुपये 53 पैसे प्रति किलो थी. एक साल पहले प्याज का भाव 26 रुपये 86 पैसे प्रति किलो था. इस तेजी की वजह खरीफ प्याज की आवक में देरी है जिससे बाजार पर दबाव बढ़ गया है।

    तेल से लेकर गेहूं और प्याज तक, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में पैदा हुआ तनाव भारतीय ग्राहकों की जेब तक पहुंच रहा है. ऐसे में सबकी नजर दो मोर्चों पर टिकी हैं. पहला है कि मिडिल ईस्ट में तेल की दिशा क्या रहती है और दूसरा ये कि काला सागर क्षेत्र में सप्लाई का संकट कितना गहराता है क्योंकि इन दोनों का असर सीधे आपकी गाड़ी के खर्च और रसोई के बजट पर पड़ सकता है।

  • निवेशकों के लिए अहम दिन 20 अगस्त को बाजार में दिख सकता है बड़ा उतार-चढ़ाव, सेंसेक्स-निफ्टी के लिए इन स्तरों पर रहेगी नजर

    निवेशकों के लिए अहम दिन 20 अगस्त को बाजार में दिख सकता है बड़ा उतार-चढ़ाव, सेंसेक्स-निफ्टी के लिए इन स्तरों पर रहेगी नजर


    नई दिल्ली। 20 अगस्त 2026 को भारतीय शेयर बाजार के लिए कारोबारी माहौल काफी अहम रहने वाला है। लगातार सात कारोबारी सत्रों की गिरावट के बाद निवेशकों की नजर इस बात पर रहेगी कि सेंसेक्स और निफ्टी में अब रिकवरी आती है या बिकवाली का दबाव आगे भी जारी रहता है। 19 अगस्त को सेंसेक्स 326 अंक गिरकर 76909.68 के स्तर पर बंद हुआ जबकि निफ्टी 77 अंक फिसलकर 24078.30 पर पहुंच गया। निफ्टी लगातार सातवें सत्र में गिरावट के साथ बंद हुआ और इस दौरान इसमें करीब 2.1 प्रतिशत की कमजोरी आई।

    बाजार में मौजूदा कमजोरी के पीछे सबसे बड़ा कारण वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितता और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी को माना जा रहा है। ब्रेंट क्रूड करीब 92 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है इसलिए तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से देश के आयात बिल और महंगाई पर दबाव बढ़ने की आशंका रहती है। यही वजह है कि निवेशक फिलहाल जोखिम लेने से बचते दिखाई दे रहे हैं।

    इसके अलावा पश्चिम एशिया में जारी भू राजनीतिक तनाव भी बाजार की दिशा को प्रभावित कर रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव तथा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर अनिश्चितता ने निवेशकों की चिंता बढ़ाई है। अगर इस मोर्चे पर तनाव और बढ़ता है तो कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी देखने को मिल सकती है जिसका असर भारतीय शेयर बाजार पर भी पड़ सकता है। दूसरी ओर तनाव कम होने की कोई सकारात्मक खबर आती है तो बाजार में राहत की खरीदारी देखने को मिल सकती है।

    अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी भी भारतीय बाजार के लिए चिंता का कारण बनी हुई है। ऊंची यील्ड की स्थिति में विदेशी निवेशकों के लिए विकसित बाजारों में पैसा लगाना अधिक आकर्षक हो सकता है। ऐसे माहौल में उभरते बाजारों से विदेशी पूंजी निकलने का दबाव बढ़ सकता है। भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की गतिविधियां आने वाले सत्रों में बेहद महत्वपूर्ण रहने वाली हैं।

    19 अगस्त को बाजार में अधिकांश प्रमुख सेक्टर दबाव में रहे। हालांकि आईटी और फार्मा जैसे कुछ क्षेत्रों में अपेक्षाकृत मजबूती दिखाई दी। ऐसे में 20 अगस्त को निवेशकों की नजर सेक्टर आधारित प्रदर्शन पर भी रहेगी। मजबूत नतीजों और बेहतर कारोबारी संभावनाओं वाले शेयरों में चुनिंदा खरीदारी देखने को मिल सकती है जबकि कमजोर वैश्विक संकेतों वाले क्षेत्रों में दबाव कायम रह सकता है।

    विशेषज्ञों के मुताबिक मौजूदा दौर में निवेशकों को बाजार में जल्दबाजी से बड़े दांव लगाने के बजाय जोखिम प्रबंधन पर ध्यान देना चाहिए। लगातार गिरावट के बाद कुछ शेयर आकर्षक स्तर पर नजर आ सकते हैं लेकिन बाजार की दिशा पूरी तरह बदल गई है ऐसा मान लेना जल्दबाजी होगी। निफ्टी के 24000 के आसपास के स्तर पर निवेशकों की खास नजर रह सकती है। इसके नीचे कमजोरी बढ़ने पर बाजार में और दबाव बन सकता है जबकि मजबूती की स्थिति में रिकवरी की कोशिश दिखाई दे सकती है।

    कुल मिलाकर 20 अगस्त का कारोबारी सत्र भारतीय शेयर बाजार के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है। क्रूड ऑयल की कीमतें वैश्विक बाजारों का रुख विदेशी निवेशकों की गतिविधियां और पश्चिम एशिया से आने वाली खबरें बाजार की चाल तय करने वाले प्रमुख कारक रहेंगे। निवेशकों के लिए जरूरी है कि वे बाजार की तेजी या गिरावट देखकर घबराहट में फैसला न लें और किसी भी निवेश निर्णय से पहले अपनी जोखिम क्षमता तथा वित्तीय सलाह को ध्यान में रखें

  • फिक्स्ड डिपॉजिट निवेशकों के लिए जरूरी खबर, SBI ने छोटी अवधि की बल्क एफडी पर ब्याज दरें घटाईं

    फिक्स्ड डिपॉजिट निवेशकों के लिए जरूरी खबर, SBI ने छोटी अवधि की बल्क एफडी पर ब्याज दरें घटाईं

    नई दिल्ली ।स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने अपनी घरेलू बल्क फिक्स्ड डिपॉजिट की कुछ अवधि वाली ब्याज दरों में बदलाव किया है। बैंक ने 3 करोड़ रुपये या उससे अधिक की जमा राशि वाली चुनिंदा बल्क टर्म डिपॉजिट पर ब्याज दरों में कटौती की है। नई दरें 15 अगस्त 2026 से लागू हो गई हैं। यह बदलाव मुख्य रूप से कम अवधि वाली बल्क एफडी पर किया गया है, जबकि लंबी अवधि की कई जमाओं की दरों में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है।

    बैंक की ओर से किए गए बदलाव के तहत 7 दिन से 179 दिन की अवधि वाली बल्क फिक्स्ड डिपॉजिट पर ब्याज दर में 25 बेसिस प्वाइंट की कमी की गई है। इसके अलावा 180 दिन से 210 दिन की अवधि वाली जमा पर ब्याज दर में 10 बेसिस प्वाइंट की कटौती की गई है। इससे इन अवधि में बड़ी राशि एफडी के रूप में रखने वाले ग्राहकों को पहले की तुलना में कम ब्याज मिलेगा।

    हालांकि 211 दिन से लेकर 10 साल तक की अवधि वाली 3 करोड़ रुपये या उससे अधिक की बल्क फिक्स्ड डिपॉजिट की ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। बैंक की नई बल्क एफडी दरें अलग-अलग अवधि के आधार पर 5.25 प्रतिशत से 6.50 प्रतिशत के बीच हैं। इसलिए बड़ी राशि को कम अवधि के लिए एफडी में लगाने वाले निवेशकों के लिए यह बदलाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

    बल्क एफडी में किया गया यह बदलाव सामान्य एफडी ग्राहकों पर लागू नहीं होता। 3 करोड़ रुपये से कम की घरेलू जमा राशि पर बैंक ने ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया है। इसका मतलब है कि सामान्य ग्राहक जिनकी एफडी राशि इस सीमा से कम है, उनके मौजूदा ब्याज ढांचे पर इस फैसले का सीधा असर नहीं पड़ेगा।

    सामान्य एफडी में आम नागरिकों को अलग-अलग अवधि के आधार पर 3.05 प्रतिशत से 6.40 प्रतिशत तक ब्याज मिलता है। वहीं वरिष्ठ नागरिकों के लिए ब्याज दरें सामान्य ग्राहकों की तुलना में अधिक हैं। वरिष्ठ नागरिकों को अवधि के अनुसार 3.55 प्रतिशत से 7.05 प्रतिशत तक ब्याज मिल रहा है। इस वजह से कम राशि वाली नियमित एफडी करने वाले ग्राहकों के लिए मौजूदा दरों में तत्काल कोई बदलाव नहीं हुआ है।

    बल्क फिक्स्ड डिपॉजिट और सामान्य फिक्स्ड डिपॉजिट के बीच राशि की सीमा महत्वपूर्ण होती है। बड़ी राशि जमा करने वाले ग्राहकों के लिए बैंक अलग दरें निर्धारित कर सकता है। ऐसे में निवेश से पहले संबंधित अवधि और लागू ब्याज दर को देखना जरूरी होता है। खास तौर पर छोटी अवधि की एफडी में मामूली दर बदलाव भी बड़ी जमा राशि पर मिलने वाले कुल ब्याज को प्रभावित कर सकता है।

    एफडी को आमतौर पर निश्चित रिटर्न वाले निवेश विकल्प के रूप में देखा जाता है। ब्याज दर पहले से तय होने के कारण निवेशक को मैच्योरिटी तक संभावित रिटर्न का अनुमान लगाने में आसानी होती है। हालांकि अलग-अलग अवधि के लिए ब्याज दर अलग होती है और समय से पहले एफडी तोड़ने पर लागू नियमों के अनुसार ब्याज या जुर्माने में बदलाव हो सकता है।

    SBI की नई दरों का असर मुख्य रूप से उन ग्राहकों पर पड़ेगा जो 3 करोड़ रुपये या उससे अधिक की राशि को छोटी अवधि की घरेलू बल्क टर्म डिपॉजिट में रखने की योजना बना रहे हैं। ऐसे निवेशकों के लिए एफडी बुक करने से पहले नई दरों और अवधि की तुलना करना उपयोगी होगा।

    वहीं सामान्य ग्राहकों और 3 करोड़ रुपये से कम की जमा राशि रखने वालों के लिए इस बदलाव से राहत है, क्योंकि उनकी एफडी दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। वरिष्ठ नागरिकों के लिए भी मौजूदा नियमित एफडी दरें जारी हैं। इसलिए निवेशकों को अपनी जमा राशि, निवेश अवधि और लागू ब्याज दर के आधार पर फैसला लेना चाहिए।

  • गाजा कैपिटल आईपीओ में निवेश से पहले समझें बड़े जोखिम, नकारात्मक कैश फ्लो और प्रमोटर डिफॉल्ट रिकॉर्ड चिंता बढ़ाते हैं

    गाजा कैपिटल आईपीओ में निवेश से पहले समझें बड़े जोखिम, नकारात्मक कैश फ्लो और प्रमोटर डिफॉल्ट रिकॉर्ड चिंता बढ़ाते हैं


    नई दिल्ली । गाजा कैपिटल का आईपीओ रिटेल निवेशकों के लिए खुल चुका है। कंपनी के रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस में कारोबार और वित्तीय स्थिति से जुड़े कई जोखिमों का उल्लेख किया गया है। इनमें ऑपरेशन से लगातार नकारात्मक कैश फ्लो, कैरिड इंटरेस्ट पर आय की बढ़ती निर्भरता, अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर के ऑडिट ट्रेल की एक अवधि में उपलब्ध नहीं रहने और एक प्रमोटर का नाम डिफॉल्ट से संबंधित सूची में शामिल होना प्रमुख है। निवेशकों के लिए इन बिंदुओं को समझना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कंपनी ने इन्हें अपने आधिकारिक खुलासों में जोखिम कारकों के तौर पर दर्ज किया है।

    कंपनी के अनुसार उसके ऑपरेशन से मिलने वाला नेट कैश फ्लो हाल के वर्षों में नकारात्मक रहा है। वित्त वर्ष 2025 में ऑपरेशंस से नेट कैश फ्लो माइनस 8.75 करोड़ रुपये था। वित्त वर्ष 2026 में यह आंकड़ा और नीचे जाकर माइनस 14.98 करोड़ रुपये हो गया। लगातार नकारात्मक ऑपरेशनल कैश फ्लो कंपनी की नकदी स्थिति को लेकर निवेशकों के लिए विचार करने योग्य महत्वपूर्ण पहलू है।

    गाजा कैपिटल के ऑडिटर्स ने अकाउंटिंग रिकॉर्ड से संबंधित कुछ टिप्पणियां भी की हैं। कंपनी ने वित्त वर्ष 2026 में अपने खातों को बनाए रखने के लिए ऐसे अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया, जिसमें ऑडिट ट्रेल यानी एडिट लॉग रिकॉर्ड करने की सुविधा मौजूद थी। हालांकि, 1 अप्रैल 2025 से 27 अगस्त 2025 तक यह सुविधा सक्रिय नहीं थी।

    ऑडिट ट्रेल का काम अकाउंटिंग रिकॉर्ड में किए गए बदलावों का विवरण सुरक्षित रखना होता है। इसके माध्यम से यह पता लगाया जा सकता है कि किसी रिकॉर्ड में कब और किस तरह का बदलाव किया गया। कंपनी के ऑडिटर ने कहा कि ऑडिट के दौरान ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया, जिसमें ऑडिट ट्रेल सुविधा सक्रिय रहने के दौरान उसके साथ छेड़छाड़ की गई हो।

    कंपनी ने यह भी बताया कि ऑडिट ट्रेल सुविधा दोबारा सक्रिय होने के बाद रिकॉर्ड को संबंधित कानूनी आवश्यकताओं के अनुरूप सुरक्षित रखा गया है। हालांकि, सुविधा के एक निश्चित अवधि तक बंद रहने का उल्लेख कंपनी के आरएचपी में जोखिम और अनुपालन से जुड़े खुलासे के रूप में किया गया है।

    कंपनी की आय में कैरिड इंटरेस्ट का हिस्सा भी एक महत्वपूर्ण जोखिम कारक है। गाजा कैपिटल ने बताया कि वित्त वर्ष 2024 में कुल आय में कैरिड इंटरेस्ट की हिस्सेदारी 17.69 प्रतिशत थी। वित्त वर्ष 2025 में यह बढ़कर 52.25 प्रतिशत और वित्त वर्ष 2026 में 47.79 प्रतिशत हो गई। कंपनी के मुताबिक आय के बड़े हिस्से का कैरिड इंटरेस्ट पर निर्भर होना उसकी कुल आय में उतार-चढ़ाव पैदा कर सकता है।

    आरएचपी में प्रमोटर गोपाल जैन से जुड़ा एक अन्य महत्वपूर्ण खुलासा भी किया गया है। कंपनी ने बताया कि जैन का नाम भारतीय रिजर्व बैंक की एक ऐसी सूची में शामिल है, जिसमें एक करोड़ रुपये से अधिक के डिफॉल्ट वाले ऐसे खाते शामिल हैं, जिनके संबंध में कानूनी कार्रवाई नहीं की गई है।

    कंपनी के अनुसार यह मामला एडुकॉम्प इन्फ्रास्ट्रक्चर एंड स्कूल मैनेजमेंट लिमिटेड से जुड़ा है, जिसके बोर्ड में गोपाल जैन पहले नॉमिनी डायरेक्टर रहे थे। गाजा कैपिटल का कहना है कि संबंधित कंपनी के डिफॉल्ट के समय जैन उससे जुड़े नहीं थे।

    कंपनी ने यह भी बताया कि यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ने गोपाल जैन का नाम संबंधित सूची से हटाने के लिए पत्र दिया है। ऐसे में आईपीओ में निवेश करने वालों के लिए कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन, आय के स्रोत, ऑडिट संबंधी खुलासों और प्रमोटर से जुड़े जोखिमों का समग्र आकलन करना महत्वपूर्ण है। आईपीओ से जुड़े अंतिम निर्णय से पहले निवेशकों को आरएचपी में दर्ज सभी जोखिम कारकों को ध्यान से समझना चाहिए।

  • भारतीय शेयर बाजार में गिरावट, सेंसेक्स 325 अंक टूटा और निफ्टी 24,100 के नीचे बंद हुआ, निवेशकों में सतर्कता बढ़ी

    भारतीय शेयर बाजार में गिरावट, सेंसेक्स 325 अंक टूटा और निफ्टी 24,100 के नीचे बंद हुआ, निवेशकों में सतर्कता बढ़ी

    नई दिल्ली ।भारतीय शेयर बाजार बुधवार को कारोबारी सत्र के अंत में लाल निशान में बंद हुआ। वैश्विक बाजारों में कमजोरी और प्रमुख आर्थिक घटनाक्रमों से पहले निवेशकों की सतर्कता का असर घरेलू इक्विटी बाजार पर दिखाई दिया। कारोबार समाप्त होने पर सेंसेक्स 325.78 अंक यानी 0.42 प्रतिशत की गिरावट के साथ 76,909.68 अंक पर बंद हुआ। वहीं निफ्टी 76.60 अंक यानी 0.32 प्रतिशत कमजोर होकर 24,078.30 अंक पर रहा।

    बाजार में बुधवार को व्यापक स्तर पर बिकवाली का दबाव देखने को मिला। प्रमुख सेक्टोरल सूचकांकों में निफ्टी इंडिया डिफेंस सबसे अधिक प्रभावित रहा और इसमें 1.49 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इसके बाद निफ्टी एनर्जी 1.18 प्रतिशत कमजोर हुआ। मीडिया, पीएसई, इंफ्रास्ट्रक्चर और कमोडिटीज से जुड़े सूचकांक भी गिरावट के साथ बंद हुए।

    इसके अलावा निफ्टी एफएमसीजी, इंडिया मैन्युफैक्चरिंग, ऑयल एंड गैस, हेल्थकेयर, ऑटो, सर्विसेज, फार्मा और कंजप्शन सूचकांकों में भी कमजोरी रही। इससे संकेत मिला कि बाजार में दबाव केवल कुछ चुनिंदा शेयरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कई प्रमुख क्षेत्रों में निवेशकों ने बिकवाली की।

    हालांकि आईटी और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स सेक्टर ने बाजार की व्यापक कमजोरी के बीच कुछ राहत दी। दोनों सूचकांक हरे निशान में बंद हुए। कमजोर रुपये और कुछ शेयरों में वैल्यू बाइंग से आईटी कंपनियों को समर्थन मिलने की बात बाजार जानकारों ने कही।

    लार्जकैप शेयरों के अलावा मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी दबाव देखा गया। निफ्टी मिडकैप 100 सूचकांक 130.65 अंक यानी 0.21 प्रतिशत गिरकर 63,408.75 अंक पर बंद हुआ। निफ्टी स्मॉलकैप 100 में 101.70 अंक यानी 0.51 प्रतिशत की कमजोरी रही और यह 19,707.15 अंक पर रहा।

    सेंसेक्स में कुछ शेयरों ने बाजार की गिरावट को सीमित करने की कोशिश की। एचसीएल टेक, इटरनल, कोटक महिंद्रा बैंक, सन फार्मा, टाइटन, टीसीएस, इंफोसिस और ट्रेंट बढ़त के साथ बंद हुए। दूसरी ओर पावर ग्रिड, बजाज फाइनेंस, एलएंडटी, आईटीसी, हिंदुस्तान यूनिलीवर, बीईएल और इंडिगो में गिरावट दर्ज की गई।

    इसके अलावा एसबीआई, एक्सिस बैंक, एनटीपीसी, आईसीआईसीआई बैंक, टेक महिंद्रा, टाटा स्टील, भारती एयरटेल और एचडीएफसी बैंक भी कमजोर होकर बंद हुए। बैंकिंग, वित्तीय और औद्योगिक क्षेत्र के कई प्रमुख शेयरों में बिकवाली का दबाव बाजार की कमजोरी का एक कारण रहा।

    बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक अमेरिकी फेडरल रिजर्व की बैठक के मिनट्स जारी होने से पहले निवेशकों ने सतर्क रुख अपनाया। बाजार में यह चिंता बनी हुई है कि महंगाई को नियंत्रित करने के लिए अमेरिकी केंद्रीय बैंक मौद्रिक नीति को लेकर सख्त रुख बनाए रख सकता है। इससे वैश्विक स्तर पर जोखिम वाली परिसंपत्तियों पर दबाव बढ़ सकता है।

    इसके साथ ही अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर के बाद स्थायी कूटनीतिक समाधान को लेकर अनिश्चितता बनी रहने से कच्चे तेल की कीमतों और बॉन्ड यील्ड पर भी नजर बनी हुई है। ऊंचे क्रूड और बॉन्ड यील्ड का असर निवेशकों की धारणा पर पड़ रहा है। एशियाई बाजारों में कमजोरी ने भी भारतीय बाजार पर दबाव बढ़ाया।

    बाजार में गिरावट के बावजूद कुछ निवेशकों की ओर से चुनिंदा शेयरों में वैल्यू बाइंग देखने को मिली। कमजोर रुपये से आईटी कंपनियों को संभावित लाभ की उम्मीद ने इस क्षेत्र के कुछ शेयरों को समर्थन दिया। हालांकि वैश्विक संकेतों और आगामी अमेरिकी फेड मिनट्स को लेकर बाजार में सावधानी बनी हुई है। ऐसे में आने वाले कारोबारी सत्रों में वैश्विक बाजारों की दिशा, कच्चे तेल की कीमत और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां भारतीय शेयर बाजार के लिए महत्वपूर्ण कारक रहेंगी।

  • क्रॉम्पटन ने नई मास्टर ब्रांड पहचान के साथ सुपर-प्रीमियम ब्रांड ‘रायन’ और एनर्जी प्लेटफॉर्म ‘एनर्जियन’ लॉन्च किया

    क्रॉम्पटन ने नई मास्टर ब्रांड पहचान के साथ सुपर-प्रीमियम ब्रांड ‘रायन’ और एनर्जी प्लेटफॉर्म ‘एनर्जियन’ लॉन्च किया


    मुंबई। क्रॉम्पटन ग्रीव्स कंज्यूमर इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड ने अपने कारोबार के अगले चरण की शुरुआत करते हुए नई मास्टर ब्रांड पहचान का अनावरण किया है। ‘क्रॉम्पटन 2.0’ के तहत कंपनी खुद को नवाचार आधारित और उपभोक्ता केंद्रित घरेलू समाधान कारोबार के रूप में विकसित कर रही है। इसी रणनीति के तहत कंपनी ने सुपर-प्रीमियम श्रेणी के लिए नया ब्रांड ‘क्रॉम्पटन रायन’ और ऊर्जा समाधान के लिए ‘एनर्जियन’ मंच को भी मजबूत किया है।

    कंपनी के अनुसार, पिछले एक दशक में उसने पारंपरिक विद्युत उत्पाद श्रेणियों से आगे बढ़ते हुए तकनीक, उत्पाद नवाचार और नए उपभोक्ता क्षेत्रों में निवेश किया है। नई ब्रांड पहचान इसी बदलाव को दर्शाती है और नवाचार, प्रीमियम उत्पादों तथा दीर्घकालिक विकास के लिए एक साझा मंच तैयार करती है।

    ‘सेफायर’ बना नई ब्रांड पहचान का प्रतीक

    क्रॉम्पटन की नई पहचान के केंद्र में ‘सेफायर’ नामक नया प्रतीक और दृश्य रूप है। कंपनी के मुताबिक इसका नाम नीलम के गहरे नीले रंग और यूनानी पवन देवता ‘जेफिरस’ से प्रेरित है। यह गुणवत्ता, देखभाल, परिष्कार और स्थायित्व के साथ सहजता तथा गतिशीलता का भाव प्रस्तुत करता है।

    इस प्रतीक में ‘सी’ अक्षर को उपभोक्ता, ग्राहक, देखभाल, संपर्क और क्रॉम्पटन से जोड़ा गया है। इसके भीतर से बाहर की ओर बढ़ता अनंत का चिह्न निरंतर नवाचार और सीमाओं से आगे बढ़ने की कंपनी की सोच को दर्शाता है। प्रतीक को 12 वृत्तों से तैयार किया गया है, जो वर्ष के 12 महीनों का प्रतिनिधित्व करते हैं। कंपनी का कहना है कि इससे पूरे वर्ष बदलती उपभोक्ता जरूरतों के साथ जुड़े रहने का संदेश मिलता है।

    नई पहचान के साथ कंपनी ने नया ब्रांड वादा ‘अमेजिंग, एवरी डे’ भी पेश किया है। इसके जरिए क्रॉम्पटन रोजमर्रा के जीवन को तकनीक, उपयोगिता और भरोसेमंद प्रदर्शन के माध्यम से बेहतर बनाने पर जोर दे रहा है। इसके अलावा कंपनी ने एक विशिष्ट ध्वनि पहचान भी विकसित की है, जिसका इस्तेमाल विज्ञापन, डिजिटल मंच, उत्पाद अनुभव और खुदरा केंद्रों सहित विभिन्न उपभोक्ता संपर्क बिंदुओं पर किया जाएगा।

    क्रॉम्पटन की नई पहचान को चरणबद्ध तरीके से उत्पादों, पैकेजिंग, खुदरा उपस्थिति, डिजिटल मंचों और उपभोक्ता संचार में लागू किया जाएगा।

    ‘एनर्जियन’ के जरिए ऊर्जा समाधान कारोबार का विस्तार

    कंपनी ने अपने ऊर्जा समाधान मंच ‘एनर्जियन’ को भी नई पहचान के साथ मजबूत किया है। ‘द पावर बिहाइंड एवरीडे प्रोग्रेस’ के वादे के साथ एनर्जियन को ऐसे ऊर्जा मंच के रूप में विकसित किया जा रहा है, जो विश्वसनीय, बुद्धिमान और टिकाऊ ऊर्जा समाधान उपलब्ध कराएगा।

    कंपनी के मुताबिक एनर्जियन केवल किसी एक उत्पाद श्रेणी तक सीमित नहीं रहेगा। यह ऊर्जा उत्पादन, रूपांतरण, भंडारण और चार्जिंग से जुड़े समाधान उपलब्ध कराने के लिए पूरी ऊर्जा मूल्य श्रृंखला में काम करेगा। इसका उद्देश्य घरों और कारोबारों की बदलती ऊर्जा जरूरतों को एकीकृत समाधान के जरिए पूरा करना है।

    सुपर-प्रीमियम बाजार में ‘क्रॉम्पटन रायन’ की शुरुआत

    प्रीमियम उत्पादों पर बढ़ते जोर के बीच क्रॉम्पटन ने अपना नया सुपर-प्रीमियम ब्रांड ‘क्रॉम्पटन रायन’ पेश किया है। कंपनी के अनुसार, यह ब्रांड आधुनिक और बेहतर जीवनशैली की आकांक्षा रखने वाले उपभोक्ताओं के लिए तैयार किया गया है। इसमें डिजाइन, तकनीकी दक्षता और उपयोग में सहजता को एक साथ जोड़ा गया है।

    रायन की मूल अवधारणा ‘प्रोवेस इनसाइड, पॉयज आउटसाइड’ है। इसका अर्थ ऐसे उत्पादों से है, जिनमें अंदर उन्नत इंजीनियरिंग और तकनीकी क्षमता हो, जबकि बाहरी डिजाइन परिष्कृत और आकर्षक हो। कंपनी का कहना है कि रायन के उत्पादों में अगली पीढ़ी की तकनीक को मानव केंद्रित डिजाइन के साथ जोड़ा जाएगा।

    क्रॉम्पटन ग्रीव्स कंज्यूमर इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी प्रोमीत घोष ने कहा कि ‘क्रॉम्पटन रायन’ का शुभारंभ कंपनी की प्रीमियम उत्पाद रणनीति में महत्वपूर्ण कदम है। उनके अनुसार, समर्पित सुपर-प्रीमियम ब्रांड के रूप में रायन डिजाइन, उन्नत तकनीक और उपभोक्ताओं की बदलती आकांक्षाओं के अनुरूप समाधान उपलब्ध कराने पर केंद्रित होगा।

    जल शुद्धिकरण क्षेत्र में पहला उत्पाद

    रायन ब्रांड ने प्रीमियम जल शुद्धिकरण श्रेणी में ‘रायन वॉटर बायोफायर’ के साथ शुरुआत की है। कंपनी इसे श्रेणी में नए प्रकार का नवाचार बता रही है। इसका उद्देश्य पारंपरिक जल शुद्धिकरण से आगे बढ़कर उपभोक्ताओं को उनकी जरूरत के अनुरूप बेहतर संतुलित पानी उपलब्ध कराना है।

    कंपनी के अनुसार, भारत में घरेलू विद्युत जल शोधक बाजार का आकार करीब 5,565 करोड़ रुपये है और इसमें रिवर्स ऑस्मोसिस आधारित उत्पादों की हिस्सेदारी लगभग 85 प्रतिशत है। इसके बावजूद देश में घरेलू स्तर पर जल शोधकों की पहुंच करीब छह प्रतिशत ही है। क्रॉम्पटन का मानना है कि कम पहुंच और बढ़ती उपभोक्ता आकांक्षाओं के कारण इस बाजार में आगे विस्तार तथा प्रीमियम उत्पादों की मांग की बड़ी संभावना मौजूद है।

    क्रॉम्पटन 2.0 के तहत कारोबार में बदलाव

    क्रॉम्पटन के मुख्य विपणन अधिकारी तन्मय प्रस्ती ने कहा कि नई ब्रांड पहचान कंपनी के पिछले कुछ वर्षों में हुए बदलाव को सामने लाती है। उनके मुताबिक कंपनी अलग-अलग उत्पाद श्रेणियों में उपभोक्ताओं की बदलती जरूरतों को पूरा करने के लिए एक एकीकृत ब्रांड व्यवस्था तैयार कर रही है।

    प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी प्रोमीत घोष ने कहा कि घरेलू समाधान उद्योग तेजी से बदल रहा है और भविष्य के मजबूत ब्रांड किसी एक उत्पाद श्रेणी के बजाय उपभोक्ताओं के रोजमर्रा के जीवन में निभाई जाने वाली भूमिका से पहचाने जाएंगे। उन्होंने कहा कि क्रॉम्पटन 2.0 का उद्देश्य कंपनी को विविधीकृत और नवाचार आधारित घरेलू समाधान कारोबार के रूप में आगे बढ़ाना है।

    कंपनी के मुताबिक नई ब्रांड पहचान, एनर्जियन और रायन के जरिए वह एक ओर अपनी 85 वर्ष से अधिक पुरानी विद्युत विरासत को मजबूत बनाए रखेगी, वहीं दूसरी ओर नए ऊर्जा समाधान, प्रीमियम उत्पाद और तकनीक आधारित उपभोक्ता अनुभव के क्षेत्रों में विस्तार करेगी।