Category: Economy

  • सोने में बड़ी गिरावट जारी, 18 साल की सबसे तेज मासिक गिरावट, चांदी भी 43% सस्ती हुई

    सोने में बड़ी गिरावट जारी, 18 साल की सबसे तेज मासिक गिरावट, चांदी भी 43% सस्ती हुई


    नई दिल्ली। सोने की कीमतों में गिरावट का सिलसिला लगातार जारी है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, सोना 18 साल की सबसे बड़ी मासिक गिरावट दर्ज कर रहा है। अक्टूबर 2008 के बाद पहली बार कीमती धातु बाजार में इस तरह का तेज दबाव देखा जा रहा है। 1 जुलाई को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कॉमेक्स गोल्ड में एक बार फिर गिरावट दर्ज की गई, जिससे सोने की कीमतें 4,000 डॉलर के नीचे आ गईं।

    अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना फिसला
    वैश्विक बाजार में सोना 22 डॉलर से अधिक गिरकर 3,985 डॉलर प्रति औंस पर पहुंच गया। इससे पहले सोना 4,005.69 डॉलर प्रति औंस पर खुला था, लेकिन दिनभर में इसमें लगातार गिरावट देखने को मिली। इस गिरावट के साथ ही सोना एक बार फिर 4,000 डॉलर के अहम स्तर से नीचे चला गया है।

    MCX पर भी भारी गिरावट
    घरेलू बाजार MCX पर भी सोने में तेज गिरावट देखने को मिली है। साल 2026 की शुरुआत में 10 ग्राम सोना 1.92 लाख रुपये तक पहुंच गया था। हालांकि जून 2026 में ही सोने की कीमतों में बड़ी गिरावट दर्ज की गई।

    आंकड़ों के अनुसार, सिर्फ एक महीने में सोना करीब 19,700 रुपये तक सस्ता हुआ। महीने की शुरुआत में जहां यह लगभग 1.60 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम पर था, वहीं 30 जून तक यह घटकर करीब 1.40 लाख रुपये पर आ गया।

    रिकॉर्ड स्तर से 20% नीचे आया सोना, चांदी 43% तक टूटी
    साल 2026 के शुरुआती छह महीनों में कीमती धातुओं में बड़ी गिरावट देखने को मिली है। रिपोर्ट्स के अनुसार, सोना अपने हालिया उच्च स्तर से करीब 20 प्रतिशत तक टूट चुका है। वहीं चांदी में इससे भी तेज गिरावट दर्ज की गई है और यह करीब 43 प्रतिशत तक सस्ती हो चुकी है।

    क्यों गिर रहे हैं सोने के दाम?
    विशेषज्ञों के अनुसार, सोने की कीमतों में गिरावट के पीछे कई वैश्विक कारण हैं। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से महंगाई में इजाफा हुआ है, जिससे अमेरिकी फेडरल रिजर्व पर ब्याज दरें बढ़ाने का दबाव बढ़ गया है।

    नए संभावित फेड चेयरमैन केविन वॉर्श के सख्त रुख को भी बाजार में ब्याज दरों में बढ़ोतरी की आशंका के रूप में देखा जा रहा है। ऐसे में ऊंची ब्याज दरों के चलते निवेशक सोने से दूरी बना रहे हैं।

    इसके अलावा डॉलर की मजबूती ने भी सोने की मांग पर असर डाला है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और शेयर बाजार में कमजोर सेंटिमेंट के चलते निवेशक अपने निवेश को संतुलित करने के लिए सोने से पैसा निकाल रहे हैं, जिससे कीमतों पर और दबाव बढ़ गया है।

  • राजकोषीय अनुशासन की राह पर केंद्र, वित्त वर्ष के पहले दो महीनों में घाटा लक्ष्य के दायरे में; कर संग्रह और पूंजीगत व्यय में भी बढ़ोतरी

    राजकोषीय अनुशासन की राह पर केंद्र, वित्त वर्ष के पहले दो महीनों में घाटा लक्ष्य के दायरे में; कर संग्रह और पूंजीगत व्यय में भी बढ़ोतरी

    नई दिल्ली । केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा वित्त वर्ष 2026-27 के पहले दो महीनों अप्रैल और मई के दौरान 1.624 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया, जो पूरे वित्त वर्ष के लिए निर्धारित लक्ष्य का 9.6 प्रतिशत है। शुरुआती वित्तीय आंकड़े संकेत देते हैं कि सरकार राजकोषीय अनुशासन बनाए रखते हुए निर्धारित वित्तीय लक्ष्यों की दिशा में आगे बढ़ रही है। कर संग्रह, गैर-कर राजस्व और पूंजीगत व्यय में दर्ज हुई प्रगति ने भी वित्तीय स्थिति को मजबूती प्रदान की है।

    सरकार ने चालू वित्त वर्ष के लिए 16.96 लाख करोड़ रुपये के राजकोषीय घाटे का लक्ष्य तय किया है। शुरुआती दो महीनों के आंकड़ों को देखते हुए वित्तीय प्रबंधन संतुलित दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि वर्ष की शुरुआत में नियंत्रित राजकोषीय स्थिति सरकार को आगे की आर्थिक प्राथमिकताओं पर प्रभावी ढंग से काम करने का अवसर प्रदान करती है।

    मई महीने के दौरान केंद्र सरकार ने लगभग दो लाख करोड़ रुपये का राजकोषीय अधिशेष दर्ज किया, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में अधिक रहा। इससे पहले अप्रैल में सरकार के कुल व्यय की तुलना में प्राप्तियां कम रहने के कारण घाटा दर्ज हुआ था, लेकिन मई में राजस्व में सुधार से वित्तीय संतुलन मजबूत हुआ। यह संकेत देता है कि सरकारी आय के स्रोतों में निरंतर सुधार हो रहा है।

    गैर-कर राजस्व में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। मई के दौरान यह आय पिछले वर्ष की तुलना में अधिक रही, जिसमें विभिन्न स्रोतों से प्राप्त राजस्व का योगदान रहा। इसी अवधि में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा केंद्र सरकार को अधिशेष राशि हस्तांतरित किए जाने से भी सरकारी वित्तीय स्थिति को अतिरिक्त मजबूती मिली। इससे सरकार के संसाधनों में वृद्धि हुई और वित्तीय प्रबंधन को संतुलित बनाए रखने में सहायता मिली।

    पूंजीगत व्यय के मोर्चे पर भी सरकार ने निवेश की गति बनाए रखी। अप्रैल और मई के दौरान पूंजीगत खर्च में पिछले वर्ष की तुलना में वृद्धि दर्ज की गई। बुनियादी ढांचे, विकास परियोजनाओं और सार्वजनिक निवेश पर लगातार खर्च किए जाने से अर्थव्यवस्था में मांग को समर्थन मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। सरकार लंबे समय से पूंजीगत निवेश को आर्थिक विकास का प्रमुख आधार मानती रही है और शुरुआती महीनों के आंकड़े उसी दिशा में निरंतरता का संकेत देते हैं।

    कर संग्रह में भी सकारात्मक रुझान देखने को मिला। अप्रैल-मई के दौरान कुल कर राजस्व में पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में वृद्धि दर्ज की गई। बेहतर कर संग्रह सरकार की आय बढ़ाने के साथ-साथ राजकोषीय घाटे को नियंत्रित रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इससे विकास योजनाओं के लिए आवश्यक संसाधन जुटाने में सुविधा मिलती है।

    सरकार ने पिछले वित्त वर्ष में सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में निर्धारित राजकोषीय घाटे का लक्ष्य हासिल किया था और चालू वित्त वर्ष में इसे और कम करने का लक्ष्य रखा गया है। राजकोषीय घाटे में कमी से सरकार की उधारी पर दबाव घटता है, जिससे बैंकिंग प्रणाली में निजी क्षेत्र और उपभोक्ताओं के लिए ऋण उपलब्धता बेहतर होती है। साथ ही महंगाई को नियंत्रित रखने, निवेश बढ़ाने और दीर्घकालिक आर्थिक विकास को गति देने में भी यह महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शुरुआती वित्तीय आंकड़े संकेत देते हैं कि सरकार निर्धारित राजकोषीय संतुलन बनाए रखने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

  • रणनीतिक तैयारी और लगातार राजनयिक प्रयासों से खाड़ी संकट का असर रहा सीमित, पूर्व पेट्रोलियम सचिव ने भारत की ऊर्जा नीति को सराहा

    रणनीतिक तैयारी और लगातार राजनयिक प्रयासों से खाड़ी संकट का असर रहा सीमित, पूर्व पेट्रोलियम सचिव ने भारत की ऊर्जा नीति को सराहा

    नई दिल्ली । खाड़ी क्षेत्र में उत्पन्न संकट के दौरान भारत ने समय पर लिए गए नीतिगत निर्णयों, मजबूत ऊर्जा अवसंरचना और निरंतर कूटनीतिक प्रयासों के बल पर देश में ईंधन आपूर्ति को प्रभावित नहीं होने दिया। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के पूर्व सचिव विवेक कुमार ने कहा कि सरकार की सक्रिय रणनीति के कारण आम उपभोक्ताओं पर संकट का व्यापक प्रभाव नहीं पड़ा और ऊर्जा आपूर्ति व्यवस्था पूरे समय स्थिर बनी रही।

    उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर ऊर्जा बाजार अत्यंत जटिल और परस्पर जुड़ा हुआ है, जहां किसी भी क्षेत्र में उत्पन्न तनाव का असर अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ सकता है। इसके बावजूद भारत ने अपनी पूर्व तैयारी, नीति-निर्माण और रणनीतिक समन्वय के जरिए स्थिति को प्रभावी ढंग से संभाला। उनके अनुसार सरकार ने ऐसे कदम उठाए जिनसे ईंधन की उपलब्धता बनी रही और खुदरा स्तर पर आपूर्ति में किसी बड़े व्यवधान की स्थिति नहीं बनने दी गई।

    विवेक कुमार ने कहा कि संकट के शुरुआती चरण में ही सरकार ने परिस्थितियों का आकलन करते हुए आवश्यक प्रशासनिक और परिचालन संबंधी कदम उठाने शुरू कर दिए थे। उनका कहना था कि समय रहते किए गए हस्तक्षेपों ने संभावित आपूर्ति संकट को सीमित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके परिणामस्वरूप पेट्रोल और डीजल की उपलब्धता सामान्य बनी रही तथा उपभोक्ताओं को व्यापक असुविधा का सामना नहीं करना पड़ा।

    उन्होंने ऊर्जा सुरक्षा को किसी भी देश की आर्थिक स्थिरता का महत्वपूर्ण आधार बताते हुए कहा कि वर्तमान समय में कोई भी राष्ट्र पूरी तरह ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर नहीं है। वैश्विक तेल और गैस व्यापार आयातकों तथा निर्यातकों के व्यापक नेटवर्क पर आधारित है, इसलिए किसी भी देश की सफलता उसकी रणनीतिक तैयारी, भंडारण क्षमता और परिवहन अवसंरचना पर निर्भर करती है।

    पूर्व सचिव के अनुसार पिछले एक दशक में भारत ने ऊर्जा क्षेत्र के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए व्यापक निवेश किया है। सरकार के साथ निजी क्षेत्र की भागीदारी ने भी इस दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। तेल भंडारण क्षमता, परिवहन नेटवर्क, रिफाइनिंग सुविधाओं और आपूर्ति तंत्र में हुए विस्तार ने संकट के समय देश की ऊर्जा व्यवस्था को मजबूती प्रदान की। उनका कहना था कि इसी दीर्घकालिक निवेश का लाभ खाड़ी संकट के दौरान देखने को मिला।

    उन्होंने यह भी बताया कि ऊर्जा आपूर्ति बनाए रखने में कूटनीतिक प्रयासों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। भारत ने संबंधित देशों और विभिन्न पक्षों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखा ताकि समुद्री मार्गों के माध्यम से तेल की आपूर्ति निर्बाध बनी रहे। अधिकारियों ने लगातार समन्वय स्थापित करते हुए यह सुनिश्चित किया कि भारतीय तेल टैंकरों की आवाजाही प्रभावित न हो और आवश्यक ऊर्जा संसाधन समय पर देश तक पहुंचते रहें।

    विवेक कुमार ने कहा कि वैश्विक संकटों के समय केवल आर्थिक संसाधन पर्याप्त नहीं होते, बल्कि प्रभावी कूटनीति, त्वरित निर्णय क्षमता और मजबूत प्रशासनिक समन्वय भी उतना ही आवश्यक होता है। उनके अनुसार भारत ने इन सभी क्षेत्रों में संतुलित रणनीति अपनाई, जिससे ऊर्जा आपूर्ति व्यवस्था सुरक्षित रही और बाजार में अनिश्चितता का असर सीमित रखा जा सका।

    उन्होंने विश्वास जताया कि ऊर्जा क्षेत्र में निरंतर निवेश, आधुनिक अवसंरचना का विस्तार और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की नीति भविष्य में भी भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। उनका कहना था कि बदलते वैश्विक हालात के बीच दीर्घकालिक रणनीतिक योजना ही देश को संभावित ऊर्जा संकटों से प्रभावी ढंग से निपटने में सक्षम बनाएगी।

  • RBI रिपोर्ट में बड़ा खुलासा, भारत का विदेशी कर्ज 762.8 अरब डॉलर के पार; निजी क्षेत्र की बढ़ी उधारी बनी प्रमुख वजह

    RBI रिपोर्ट में बड़ा खुलासा, भारत का विदेशी कर्ज 762.8 अरब डॉलर के पार; निजी क्षेत्र की बढ़ी उधारी बनी प्रमुख वजह

    नई दिल्ली । भारतीय रिजर्व बैंक की ताजा रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2026 के अंत तक भारत का कुल विदेशी कर्ज बढ़कर 762.8 अरब डॉलर, यानी लगभग 72.2 लाख करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच गया है। पिछले वित्त वर्ष की तुलना में इसमें 26.3 अरब डॉलर की वृद्धि दर्ज की गई है। रिपोर्ट में विदेशी कर्ज बढ़ने के साथ-साथ उससे जुड़े कई ऐसे संकेत भी सामने आए हैं, जो अर्थव्यवस्था के लिए राहत और सतर्कता दोनों का संदेश देते हैं।

    रिपोर्ट के अनुसार विदेशी कर्ज में बढ़ोतरी का असर देश के डेट-टू-जीडीपी अनुपात पर भी दिखाई दिया है। मार्च 2025 में यह अनुपात 19.8 प्रतिशत था, जो मार्च 2026 तक बढ़कर 20.8 प्रतिशत हो गया। इसका अर्थ है कि देश की अर्थव्यवस्था के आकार की तुलना में विदेशी देनदारियों का अनुपात बढ़ा है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्तर अभी भी नियंत्रण में है, लेकिन आने वाले समय में इस पर लगातार निगरानी बनाए रखना आवश्यक होगा।

    रिजर्व बैंक ने स्पष्ट किया है कि विदेशी कर्ज में वृद्धि का प्रमुख कारण सरकारी उधारी नहीं, बल्कि निजी क्षेत्र की बढ़ी हुई विदेशी फंडिंग है। रिपोर्ट के अनुसार गैर-वित्तीय कॉरपोरेट कंपनियों, वाणिज्यिक बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों ने कारोबार के विस्तार और निवेश आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विदेशों से अधिक उधार लिया है। कुल विदेशी कर्ज में गैर-वित्तीय कॉरपोरेट क्षेत्र की हिस्सेदारी 36.4 प्रतिशत के साथ सबसे अधिक दर्ज की गई है।

    रिपोर्ट में वैल्यूएशन इफेक्ट का भी उल्लेख किया गया है। विभिन्न वैश्विक मुद्राओं और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले विनिमय दरों में हुए बदलाव के कारण भारत के विदेशी कर्ज पर अतिरिक्त दबाव कम हुआ। केंद्रीय बैंक के अनुसार यदि विनिमय दरों का यह प्रभाव नहीं होता, तो विदेशी कर्ज में वृद्धि 26.3 अरब डॉलर के बजाय लगभग 51 अरब डॉलर तक पहुंच सकती थी। इससे स्पष्ट होता है कि मुद्रा विनिमय में आए बदलावों ने कुल देनदारी के आंकड़े को सीमित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    विदेशी कर्ज की मुद्रा संरचना पर नजर डालें तो अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी सबसे अधिक 55.5 प्रतिशत रही। इसके बाद भारतीय रुपये में 29.4 प्रतिशत कर्ज दर्ज किया गया। जापानी येन की हिस्सेदारी 6.4 प्रतिशत, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स 4.3 प्रतिशत और यूरो की हिस्सेदारी 3.7 प्रतिशत रही। कर्ज के स्वरूप में सबसे बड़ा हिस्सा ऋण यानी लोन का रहा, जिसकी हिस्सेदारी कुल विदेशी कर्ज में 34.7 प्रतिशत दर्ज की गई।

    हालांकि विदेशी कर्ज बढ़ने के बावजूद कुछ आर्थिक संकेतकों ने राहत भी दी है। रिपोर्ट के अनुसार देश की डेट सर्विसिंग क्षमता में सुधार हुआ है। चालू प्राप्तियों के मुकाबले कर्ज और ब्याज चुकाने का अनुपात घटकर 5.8 प्रतिशत रह गया है, जबकि एक वर्ष पहले यह 6.6 प्रतिशत था। इसका अर्थ है कि भारत की कर्ज चुकाने की क्षमता पहले की तुलना में बेहतर हुई है।

    रिजर्व बैंक ने यह भी बताया कि देश का विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत स्थिति में बना हुआ है। 672 अरब डॉलर से अधिक के फॉरेक्स रिजर्व को बाहरी आर्थिक झटकों से निपटने के लिए पर्याप्त सुरक्षा कवच माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और नियंत्रित कर्ज प्रबंधन नीति के कारण भारत फिलहाल वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं का सामना करने की बेहतर स्थिति में है, हालांकि निजी क्षेत्र की बढ़ती विदेशी उधारी पर भविष्य में सतर्क निगरानी बनाए रखना आवश्यक रहेगा।

  • सोलर पैनल की उम्र और बिजली उत्पादन बढ़ाना है तो अपनाएं सही सफाई तरीका, एक्सपर्ट्स ने दी महत्वपूर्ण सलाह

    सोलर पैनल की उम्र और बिजली उत्पादन बढ़ाना है तो अपनाएं सही सफाई तरीका, एक्सपर्ट्स ने दी महत्वपूर्ण सलाह

    नई दिल्ली । घरों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और कृषि क्षेत्रों में सोलर पैनलों का उपयोग लगातार बढ़ रहा है। बढ़ती बिजली लागत के बीच सौर ऊर्जा एक किफायती और पर्यावरण अनुकूल विकल्प बनकर उभरी है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि बेहतर बिजली उत्पादन और लंबे समय तक पैनलों की कार्यक्षमता बनाए रखने के लिए उनकी नियमित एवं सही तरीके से सफाई करना बेहद जरूरी है। सफाई के दौरान की गई छोटी सी लापरवाही भी पैनलों को नुकसान पहुंचा सकती है और उनकी कार्यक्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार सोलर पैनलों की सतह पर समय के साथ धूल, मिट्टी, प्रदूषण के कण, सूखे पत्ते, परागकण और पक्षियों की बीट जमा हो जाती है। इससे सूर्य की किरणें सीधे पैनल तक नहीं पहुंच पातीं और बिजली उत्पादन में 20 से 30 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। इसलिए समय-समय पर पैनलों की सफाई करना आवश्यक माना जाता है।

    सफाई के लिए सबसे उपयुक्त समय सुबह का शुरुआती समय या सूर्यास्त के बाद का होता है। दोपहर के समय तेज धूप में सोलर पैनल का तापमान काफी अधिक हो जाता है। ऐसे में गर्म पैनल पर अचानक ठंडा पानी डालने से थर्मल शॉक की स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जिससे पैनल का ग्लास चटकने या उसमें दरार आने का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा गर्म सतह पर पानी तेजी से सूखने के कारण दाग भी पड़ सकते हैं, जो प्रकाश के अवशोषण को प्रभावित कर सकते हैं।

    विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि सफाई शुरू करने से पहले पूरे सोलर सिस्टम को सुरक्षित तरीके से बंद कर देना चाहिए। सबसे पहले इनवर्टर और उसके बाद एसी तथा डीसी डिस्कनेक्ट स्विच बंद किए जाएं। इससे सफाई के दौरान बिजली के झटके या अन्य तकनीकी जोखिमों की संभावना काफी कम हो जाती है। सफाई पूरी होने के बाद सभी स्विच निर्धारित क्रम में दोबारा चालू किए जाने चाहिए।

    सोलर पैनलों की ऊपरी सतह पर विशेष सुरक्षात्मक कोटिंग होती है, जो सूर्य की रोशनी को प्रभावी ढंग से अवशोषित करने में मदद करती है। इसलिए सफाई के दौरान कठोर ब्रश, स्टील स्क्रबर, झाड़ू या खुरदरे कपड़े का उपयोग नहीं करना चाहिए। ऐसे उपकरणों से सतह पर खरोंच आ सकती है, जिससे पैनल की क्षमता और आयु दोनों प्रभावित हो सकती हैं। सफाई के लिए माइक्रोफाइबर कपड़ा, मुलायम स्पंज या सॉफ्ट कपड़े का उपयोग सबसे सुरक्षित माना जाता है।

    सोलर पैनलों की सफाई करते समय हाई प्रेशर वाटर जेट या तेज दबाव वाले पाइप का इस्तेमाल भी नहीं करना चाहिए। अधिक दबाव से पानी डालने पर पैनल की सीलिंग कमजोर पड़ सकती है और नमी अंदर प्रवेश कर सकती है, जिससे तकनीकी खराबी का जोखिम बढ़ जाता है। इसी प्रकार तेज रासायनिक क्लीनर, एसिड, फिनायल या अन्य कठोर केमिकल का प्रयोग भी नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे पैनल की सुरक्षात्मक परत को नुकसान पहुंच सकता है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि सामान्य साफ पानी अधिकांश परिस्थितियों में पर्याप्त होता है। यदि अधिक गंदगी जमी हो तो हल्के साबुन के घोल का सीमित मात्रा में उपयोग किया जा सकता है। नियमित अंतराल पर सही तरीके से की गई सफाई न केवल सोलर पैनलों की कार्यक्षमता बनाए रखती है, बल्कि उनकी उम्र बढ़ाने और अधिकतम बिजली उत्पादन सुनिश्चित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

  • जीएसटीएटी पोर्टल पर भारी दबाव के बाद सरकार का बड़ा फैसला, अपील दाखिल करने की अंतिम तारीख एक माह बढ़ाई

    जीएसटीएटी पोर्टल पर भारी दबाव के बाद सरकार का बड़ा फैसला, अपील दाखिल करने की अंतिम तारीख एक माह बढ़ाई

    नई दिल्ली । केंद्र सरकार ने वस्तु एवं सेवा कर अपीलीय न्यायाधिकरण (जीएसटीएटी) में अपील दाखिल करने वाले करदाताओं को बड़ी राहत देते हुए अंतिम तारीख एक माह बढ़ा दी है। वित्त मंत्रालय ने घोषणा की कि अब करदाता और अन्य पात्र पक्ष 31 जुलाई 2026 तक जीएसटीएटी में अपील दाखिल कर सकेंगे। पहले यह समय-सीमा 30 जून 2026 तक निर्धारित थी।

    वित्त मंत्रालय ने अपने बयान में कहा कि यह निर्णय जीएसटीएटी पोर्टल पर अत्यधिक ट्रैफिक और उससे उत्पन्न तकनीकी समस्याओं को देखते हुए लिया गया है। मंत्रालय के अनुसार, बड़ी संख्या में करदाताओं और हितधारकों ने शिकायत की थी कि पोर्टल पर भारी दबाव के कारण समय पर अपील दाखिल करने में कठिनाई हो रही है।

    सरकार ने स्पष्ट किया कि यह विस्तार केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर (सीजीएसटी) अधिनियम की धारा 112(1) और धारा 112(3) के तहत दायर की जाने वाली अपीलों पर लागू होगा। यानी जिन मामलों में करदाता जीएसटी अपीलीय न्यायाधिकरण का दरवाजा खटखटाना चाहते हैं, उन्हें अब अतिरिक्त समय उपलब्ध रहेगा।

    मंत्रालय के अनुसार, पिछले कुछ सप्ताह में अपील दाखिल करने की प्रक्रिया में अचानक तेजी आई। केवल अंतिम 15 दिनों में करीब 30 हजार अपीलें पोर्टल पर दर्ज की गईं। कुछ दिनों में प्रतिदिन लगभग 5,500 अपीलें दाखिल होने से सिस्टम पर दबाव काफी बढ़ गया, जिसके कारण तकनीकी बाधाएं सामने आईं।

    वित्त मंत्रालय ने बताया कि बढ़ती शिकायतों और पोर्टल की क्षमता पर पड़ रहे दबाव का आकलन करने के बाद समय-सीमा बढ़ाने का निर्णय लिया गया। सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी करदाता को तकनीकी कारणों से अपील दाखिल करने के अधिकार से वंचित न होना पड़े।

    गौरतलब है कि सरकार ने सितंबर 2025 में जारी अधिसूचना के माध्यम से 30 जून 2026 को अपील दाखिल करने की अंतिम तारीख तय की थी। हालांकि, अंतिम चरण में अपीलों की संख्या उम्मीद से कहीं अधिक बढ़ने के कारण यह समय-सीमा बढ़ानी पड़ी।

    सरकार ने करदाताओं से यह भी आग्रह किया है कि वे अंतिम दिनों तक प्रतीक्षा न करें और समय रहते अपनी अपील दाखिल कर दें। मंत्रालय का कहना है कि इससे पोर्टल पर अचानक भीड़ नहीं बढ़ेगी और तकनीकी व्यवधानों की संभावना भी कम होगी।

    इस बीच सरकार के कर संग्रह के आंकड़े भी सकारात्मक संकेत दे रहे हैं। मई 2026 में सकल जीएसटी संग्रह पिछले वर्ष की तुलना में 3.2 प्रतिशत बढ़कर 1.94 लाख करोड़ रुपये रहा। वहीं शुद्ध जीएसटी संग्रह 3.3 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 1.67 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया।

    इसी अवधि में जीएसटी रिफंड में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई और यह 27,281 करोड़ रुपये रहा। दूसरी ओर, प्रत्यक्ष कर संग्रह के आंकड़े भी मजबूत वृद्धि दर्शाते हैं। आयकर विभाग के अनुसार, 1 अप्रैल से 17 जून 2026 के बीच शुद्ध प्रत्यक्ष कर संग्रह 14.64 प्रतिशत बढ़कर 5.21 लाख करोड़ रुपये हो गया, जबकि सकल प्रत्यक्ष कर संग्रह 12.46 प्रतिशत बढ़कर 6.10 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अपील की समय-सीमा बढ़ाने से हजारों करदाताओं को राहत मिलेगी और वे बिना तकनीकी दबाव के अपने मामलों को जीएसटी अपीलीय न्यायाधिकरण के समक्ष प्रस्तुत कर सकेंगे। साथ ही यह कदम सरकार की उस नीति को भी दर्शाता है, जिसमें कर प्रशासन को अधिक सुगम और करदाता-अनुकूल बनाने पर जोर दिया जा रहा है।

  • पश्चिम एशिया तनाव, महंगाई की आशंका और ब्याज दरों का दबाव, सोना-चांदी 1 प्रतिशत से ज्यादा फिसले, बाजार की नजर अब अमेरिकी आंकड़ों पर

    पश्चिम एशिया तनाव, महंगाई की आशंका और ब्याज दरों का दबाव, सोना-चांदी 1 प्रतिशत से ज्यादा फिसले, बाजार की नजर अब अमेरिकी आंकड़ों पर

    नई दिल्ली । वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं, अमेरिकी फेडरल रिजर्व की सख्त मौद्रिक नीति की आशंकाओं और पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच मंगलवार को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में सोने और चांदी की कीमतों पर भारी दबाव देखने को मिला। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) से लेकर वैश्विक बुलियन बाजार तक दोनों कीमती धातुओं में एक प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई। हालांकि कारोबारी सत्र के दौरान कुछ रिकवरी देखने को मिली, लेकिन बाजार का समग्र रुख कमजोर बना रहा।

    घरेलू वायदा बाजार में अगस्त डिलीवरी वाला सोना कारोबार की शुरुआत से ही दबाव में रहा। शुरुआती कारोबार में इसकी कीमत पिछले बंद स्तर की तुलना में एक प्रतिशत से अधिक टूटकर खुली। दिन के दौरान बिकवाली और तेज हुई, जिससे सोना करीब 1.37 प्रतिशत तक फिसलकर दिन के निचले स्तर पर पहुंच गया। बाद में सीमित खरीदारी लौटने से इसमें कुछ सुधार जरूर हुआ, लेकिन बाजार की धारणा पूरी तरह सकारात्मक नहीं बन सकी।

    चांदी की कीमतों में भी इसी तरह कमजोरी देखने को मिली। सितंबर डिलीवरी वाला चांदी वायदा शुरुआती कारोबार में करीब एक प्रतिशत गिरावट के साथ खुला और दिन के शुरुआती सत्र में ही निचले स्तर तक पहुंच गया। बाद के कारोबार में मामूली सुधार हुआ, लेकिन कुल मिलाकर निवेशकों का रुझान सतर्क बना रहा और बड़े निवेशकों ने जोखिम कम करने की रणनीति अपनाई।

    अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी सोने और चांदी पर दबाव स्पष्ट दिखाई दिया। स्पॉट गोल्ड में लगभग डेढ़ प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जबकि स्पॉट सिल्वर दो प्रतिशत तक टूट गया। इसके अलावा प्लेटिनम और पैलेडियम जैसी अन्य कीमती धातुओं में भी कमजोरी देखने को मिली। विश्लेषकों का मानना है कि यदि मौजूदा रुझान जारी रहा तो सोना कई वर्षों की सबसे बड़ी मासिक गिरावट दर्ज कर सकता है।

    बाजार विशेषज्ञों के अनुसार इस गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण अमेरिकी फेडरल रिजर्व की संभावित सख्त मौद्रिक नीति है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव और महंगाई बढ़ने की आशंकाएं मजबूत हुई हैं। ऐसी स्थिति में निवेशकों को उम्मीद है कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति पर नियंत्रण के लिए आगे भी ब्याज दरों को ऊंचे स्तर पर बनाए रख सकता है या उनमें बढ़ोतरी कर सकता है।

    ऊंची ब्याज दरों की संभावना से अमेरिकी डॉलर को मजबूती मिलती है, जिसका सीधा असर सोने और चांदी जैसी बिना ब्याज वाली परिसंपत्तियों की मांग पर पड़ता है। जब डॉलर मजबूत होता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना अपेक्षाकृत महंगा हो जाता है, जिससे निवेशकों का आकर्षण कम होता है और बिकवाली का दबाव बढ़ने लगता है। यही वजह रही कि सुरक्षित निवेश मानी जाने वाली कीमती धातुओं में भी इस बार कमजोरी देखने को मिली।

    इस बीच कच्चे तेल के बाजार में भी उतार-चढ़ाव जारी रहा। अमेरिका और ईरान के बीच संभावित बातचीत की उम्मीदों के बावजूद हालिया मिसाइल हमलों ने क्षेत्रीय तनाव को फिर बढ़ा दिया है। इसके चलते निवेशक फिलहाल किसी बड़े जोखिम वाले निवेश से बचते हुए आर्थिक संकेतकों का इंतजार कर रहे हैं। तेल बाजार में आई नरमी ने भी वैश्विक निवेश धारणा को प्रभावित किया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में सोने और चांदी की दिशा काफी हद तक अमेरिकी आर्थिक आंकड़ों पर निर्भर करेगी। विशेष रूप से गैर-कृषि रोजगार, बेरोजगारी दर, विनिर्माण और सेवा क्षेत्र से जुड़े आंकड़े तथा यूरोजोन की मुद्रास्फीति रिपोर्ट निवेशकों की रणनीति तय करेंगे। यदि अमेरिकी अर्थव्यवस्था मजबूत संकेत देती है और फेड की सख्त नीति बरकरार रहती है तो कीमती धातुओं पर दबाव आगे भी जारी रह सकता है। वहीं किसी भी भू-राजनीतिक घटनाक्रम या आर्थिक संकेत में बदलाव से बाजार में तेज उतार-चढ़ाव देखने की संभावना बनी रहेगी।

  • ग्रीस तक पहुंचा भारत का यूपीआई नेटवर्क, पीयूष गोयल बोले- डिजिटल भुगतान के साथ निवेश, व्यापार और साझेदारी को मिलेगी नई रफ्तार

    ग्रीस तक पहुंचा भारत का यूपीआई नेटवर्क, पीयूष गोयल बोले- डिजिटल भुगतान के साथ निवेश, व्यापार और साझेदारी को मिलेगी नई रफ्तार

    नई दिल्ली । भारत के डिजिटल भुगतान तंत्र को वैश्विक स्तर पर लगातार मिल रही स्वीकार्यता के बीच यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) की सेवाएं अब ग्रीस में भी शुरू हो गई हैं। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने इसे भारत की डिजिटल नवाचार क्षमता और तकनीक आधारित वित्तीय समाधानों की अंतरराष्ट्रीय पहचान का महत्वपूर्ण पड़ाव बताया। उन्होंने कहा कि इस पहल से योग्य उपभोक्ताओं को तेज, सुरक्षित और सुविधाजनक डिजिटल भुगतान का विकल्प मिलेगा, वहीं सीमा पार लेनदेन की लागत भी पारंपरिक भुगतान प्रणालियों की तुलना में कम होगी।

    पीयूष गोयल ने कहा कि दुनिया के विभिन्न देशों में यूपीआई को मिल रही बढ़ती स्वीकृति इस बात का प्रमाण है कि भारत द्वारा विकसित डिजिटल भुगतान प्रणाली पर वैश्विक भरोसा लगातार मजबूत हो रहा है। उनके अनुसार तकनीक आधारित समाधान केवल भुगतान को सरल बनाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सहयोग, व्यापारिक संपर्क और साझा विकास के नए अवसर भी तैयार कर रहे हैं।

    ग्रीस यात्रा के दौरान केंद्रीय मंत्री ने यूरोबैंक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी फोकियन करावियास से मुलाकात कर दोनों देशों के बीच आर्थिक और निवेश संबंधों को मजबूत बनाने पर विस्तृत चर्चा की। बैठक में ग्रीस की कंपनियों को भारत में निवेश के लिए प्रोत्साहित करने के साथ-साथ विनिर्माण, बुनियादी ढांचा और अन्य रणनीतिक क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाओं पर विचार किया गया। दोनों पक्षों ने भविष्य में आर्थिक भागीदारी को और व्यापक बनाने की आवश्यकता पर सहमति व्यक्त की।

    एथेंस स्थित यूरोबैंक मुख्यालय में मंत्री ने यूरोबैंक और एनपीसीआई इंटरनेशनल पेमेंट्स लिमिटेड की साझेदारी के तहत शुरू हुई यूपीआई सेवा का लाइव प्रदर्शन भी देखा। इस अवसर पर बैंकिंग और डिजिटल भुगतान क्षेत्र से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों ने नई व्यवस्था की कार्यप्रणाली और इसके संभावित लाभों की जानकारी दी। इसे भारत के डिजिटल भुगतान नेटवर्क के वैश्विक विस्तार की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

    अपने दौरे के दौरान पीयूष गोयल ने भारत-ग्रीस बिजनेस फोरम को भी संबोधित किया। उन्होंने कहा कि भारत की मजबूत आर्थिक वृद्धि, स्थिर व्यापक आर्थिक स्थिति और तेजी से विकसित होता औद्योगिक वातावरण विदेशी निवेशकों के लिए आकर्षक अवसर प्रदान करता है। उन्होंने ग्रीस के उद्योग जगत से भारत में दीर्घकालिक निवेश और औद्योगिक सहयोग बढ़ाने का आह्वान किया।

    केंद्रीय मंत्री ने कहा कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता व्यापार, निवेश और आर्थिक साझेदारी को नई दिशा दे सकता है। उनका मानना है कि यदि इस दिशा में प्रगति होती है तो भारतीय और यूरोपीय उद्योगों के बीच सहयोग का दायरा और अधिक व्यापक होगा तथा दोनों क्षेत्रों की कंपनियों को नए बाजार और निवेश के अवसर प्राप्त होंगे।

    उन्होंने ग्रीस के उद्योगपतियों और निवेशकों से सह-निर्माण, सह-निवेश और संयुक्त औद्योगिक परियोजनाओं में भागीदारी बढ़ाने का आग्रह किया। उनके अनुसार दोनों देशों के बीच तकनीक, विनिर्माण, बुनियादी ढांचा, वित्तीय सेवाओं और डिजिटल नवाचार जैसे क्षेत्रों में व्यापक सहयोग की संभावनाएं मौजूद हैं। इससे रोजगार, निवेश और औद्योगिक विकास को भी गति मिलेगी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रीस में यूपीआई सेवा की शुरुआत भारत की डिजिटल वित्तीय प्रणाली के बढ़ते वैश्विक प्रभाव का संकेत है। इससे अंतरराष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था अधिक सरल और किफायती बनने के साथ-साथ भारत और ग्रीस के बीच व्यापारिक संपर्क, निवेश सहयोग तथा आर्थिक संबंधों को भी नई मजबूती मिलने की उम्मीद है। आने वाले समय में अन्य देशों में भी यूपीआई के विस्तार से भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था की वैश्विक पहुंच और मजबूत हो सकती है।

  • एचडीएफसी बैंक में नेतृत्व परिवर्तन के बीच बाजार सतर्क, नए चेयरमैन की तैनाती के बाद शेयर फिसले, सीईओ चयन प्रक्रिया का इंतजार

    एचडीएफसी बैंक में नेतृत्व परिवर्तन के बीच बाजार सतर्क, नए चेयरमैन की तैनाती के बाद शेयर फिसले, सीईओ चयन प्रक्रिया का इंतजार

    नई दिल्ली । देश के सबसे बड़े निजी क्षेत्र के बैंक एचडीएफसी बैंक में नेतृत्व परिवर्तन के बीच मंगलवार को शेयर बाजार में निवेशकों का रुख सतर्क दिखाई दिया। बैंक द्वारा पूर्व वित्त सचिव राजीव कुमार को तीन वर्ष के लिए नया पार्ट-टाइम चेयरमैन नियुक्त किए जाने के बाद शुरुआती कारोबार में बैंक के शेयरों पर दबाव देखने को मिला। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि निवेशकों की निगाह अब बैंक की शीर्ष प्रबंधन टीम से जुड़े अगले महत्वपूर्ण फैसलों, विशेष रूप से मुख्य कार्यकारी अधिकारी की पुनर्नियुक्ति प्रक्रिया पर टिकी हुई है।

    मंगलवार के शुरुआती कारोबार में एचडीएफसी बैंक का शेयर गिरावट के साथ खुला और कारोबार के दौरान यह 794 रुपये के इंट्रा-डे स्तर तक पहुंच गया। बाद में इसमें कुछ सुधार जरूर देखने को मिला, लेकिन शेयर पूरे कारोबार के दौरान दबाव में बना रहा। निवेशकों ने नए नेतृत्व की घोषणा का स्वागत करने के साथ-साथ बैंक की भविष्य की प्रबंधन रणनीति को लेकर सतर्क रुख अपनाया।

    बैंक ने हाल ही में शेयर बाजार को दी गई सूचना में बताया कि पूर्व वित्त सचिव राजीव कुमार को तीन वर्षों के लिए पार्ट-टाइम चेयरमैन नियुक्त किया गया है। इस नियुक्ति के साथ बैंक को स्थायी नेतृत्व मिल गया है, जिससे बोर्ड स्तर पर लंबे समय से बनी अस्थायी व्यवस्था समाप्त हो गई है। राजीव कुमार ऐसे समय में यह जिम्मेदारी संभाल रहे हैं जब बैंक कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक और रणनीतिक निर्णयों की प्रक्रिया से गुजर रहा है।

    राजीव कुमार ने पूर्व चेयरमैन अतानु चक्रवर्ती का स्थान लिया है। चक्रवर्ती ने इस वर्ष अपने पद से इस्तीफा देते समय बैंक की कुछ कार्यप्रणालियों को अपने व्यक्तिगत मूल्यों और नैतिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं बताया था। उनके इस्तीफे के बाद बैंक ने संचालन में निरंतरता बनाए रखने के उद्देश्य से केकी मिस्त्री को अंतरिम पार्ट-टाइम चेयरमैन नियुक्त किया था। अब स्थायी नियुक्ति होने से बैंक के निदेशक मंडल को स्थिरता मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

    इस बीच बैंक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी की पुनर्नियुक्ति प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, गवर्नेंस, नॉमिनेशन एंड रेम्यूनरेशन कमेटी की हालिया बैठक में इस विषय पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया। माना जा रहा है कि बैंक पहले नए चेयरमैन को पूरी तरह कार्यभार संभालने का अवसर देगा, जिसके बाद सीईओ की पुनर्नियुक्ति प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। यही कारण है कि बाजार फिलहाल नेतृत्व से जुड़े अगले फैसलों पर विशेष नजर बनाए हुए है।

    शेयर बाजार के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पिछले 52 सप्ताह के दौरान एचडीएफसी बैंक के शेयर ने 1,020.35 रुपये का उच्चतम और 726.75 रुपये का न्यूनतम स्तर दर्ज किया है। पिछले एक वर्ष में बैंक के शेयर में 20 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई है, जबकि बीते छह महीनों में भी इसमें लगभग 20 प्रतिशत की कमजोरी दर्ज की गई है। इससे स्पष्ट है कि बैंक का शेयर हाल के महीनों में लगातार दबाव का सामना कर रहा है।

    पूर्व चेयरमैन अतानु चक्रवर्ती ने अपने इस्तीफे से जुड़ी कानूनी समीक्षा प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि समीक्षा के दौरान मुख्य रूप से नियामकीय अनुपालन पर ध्यान दिया गया, जबकि बैंक की कारोबारी कार्यप्रणालियों को लेकर उनकी व्यापक चिंताओं पर अपेक्षित गंभीरता से विचार नहीं किया गया। ऐसे में निवेशकों की नजर अब इस बात पर भी रहेगी कि नया नेतृत्व बैंक की गवर्नेंस व्यवस्था, प्रबंधन निर्णयों और भविष्य की रणनीति को किस दिशा में आगे बढ़ाता है।

  • भारत के बंदरगाह क्षेत्र में सबसे बड़ा विदेशी निजी निवेश, एमएससी ग्रुप करेगा विझिंजम पोर्ट में 49% हिस्सेदारी का अधिग्रहण; वैश्विक व्यापार को मिलेगी नई रफ्तार

    भारत के बंदरगाह क्षेत्र में सबसे बड़ा विदेशी निजी निवेश, एमएससी ग्रुप करेगा विझिंजम पोर्ट में 49% हिस्सेदारी का अधिग्रहण; वैश्विक व्यापार को मिलेगी नई रफ्तार

    नई दिल्ली । भारत के समुद्री व्यापार क्षेत्र में एक बड़ा निवेश समझौता सामने आया है। अदाणी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन ने घोषणा की है कि उसने वैश्विक शिपिंग कंपनी एमएससी ग्रुप की कंटेनर टर्मिनल संचालन इकाई टर्मिनल इन्वेस्टमेंट लिमिटेड के साथ एक निश्चित समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते के तहत एमएससी ग्रुप विझिंजम पोर्ट में 49 प्रतिशत हिस्सेदारी के लिए लगभग 1.4 अरब डॉलर का निवेश करेगा। इसे भारत के बंदरगाह क्षेत्र में अब तक का सबसे बड़ा विदेशी निजी निवेश माना जा रहा है।

    समझौते के अनुसार टर्मिनल इन्वेस्टमेंट लिमिटेड करीब 1.397 अरब डॉलर का निवेश करेगी। यह राशि विझिंजम पोर्ट के लगभग 2.85 अरब डॉलर के कुल मूल्यांकन के आधार पर निर्धारित की गई है। निवेश पूरा होने के बाद कंपनी पोर्ट में 49 प्रतिशत हिस्सेदारी की भागीदार बनेगी, जबकि नियंत्रण अदाणी समूह के पास रहेगा। हालांकि यह सौदा सभी आवश्यक नियामकीय और वैधानिक मंजूरियां मिलने के बाद प्रभावी होगा।

    अदाणी पोर्ट्स का मानना है कि इस रणनीतिक साझेदारी से विझिंजम पोर्ट की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। कंपनी के अनुसार एमएससी ग्रुप के व्यापक अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से अतिरिक्त कार्गो उपलब्ध होगा, जिससे बंदरगाह की परिचालन क्षमता तेजी से बढ़ेगी और विस्तार योजनाओं को निर्धारित समय से पहले पूरा करने में सहायता मिलेगी। इसके साथ ही भारत की वैश्विक समुद्री व्यापार श्रृंखला में भागीदारी भी और मजबूत होगी।

    कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अश्विनी गुप्ता ने कहा कि विझिंजम पोर्ट ने बहुत कम समय में अपनी अलग पहचान बनाई है। उन्होंने बताया कि परिचालन शुरू होने के केवल 18 महीनों के भीतर बंदरगाह ने 20 लाख टीईयू कार्गो हैंडलिंग का आंकड़ा पार कर लिया, जो इस उपलब्धि तक पहुंचने वाला भारत का पहला बंदरगाह बन गया है। उनके अनुसार एमएससी के साथ लंबे समय से चले आ रहे सहयोग का विस्तार अब विझिंजम पोर्ट तक होना दोनों कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

    कंपनी का कहना है कि इस साझेदारी से बांग्लादेश से आने वाले ट्रांसशिपमेंट कार्गो को आकर्षित करने में मदद मिलेगी, जो वर्तमान में दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्य बंदरगाहों के माध्यम से संचालित होता है। इसके अलावा पूर्वी अफ्रीका के समुद्री व्यापार मार्गों पर भी पोर्ट की मौजूदगी मजबूत होगी और रिले कार्गो की मात्रा में वृद्धि होने की संभावना है। इससे भारत क्षेत्रीय समुद्री लॉजिस्टिक्स नेटवर्क में अधिक प्रभावशाली भूमिका निभा सकेगा।

    टर्मिनल इन्वेस्टमेंट लिमिटेड दुनिया की प्रमुख कंटेनर टर्मिनल परिचालन कंपनियों में शामिल है। कंपनी पांच महाद्वीपों में 100 से अधिक कंटेनर टर्मिनलों का संचालन करती है और हर वर्ष 7 करोड़ टीईयू से अधिक कार्गो का प्रबंधन करती है। ऐसे वैश्विक अनुभव के जुड़ने से विझिंजम पोर्ट को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिलने की उम्मीद है।

    दिसंबर 2024 में परिचालन शुरू करने वाला विझिंजम पोर्ट भारत का पहला डीप-ड्राफ्ट मेगा ट्रांसशिपमेंट पोर्ट है। इसकी वर्तमान क्षमता 16 लाख टीईयू है, जबकि विस्तार कार्य पूरा होने के बाद दिसंबर 2028 तक इसकी क्षमता बढ़कर 57 लाख टीईयू तक पहुंच जाएगी। रणनीतिक दृष्टि से यह बंदरगाह यूरोप, फारस की खाड़ी और सुदूर पूर्व को जोड़ने वाले प्रमुख पूर्व-पश्चिम समुद्री मार्ग से केवल 10 नॉटिकल मील की दूरी पर स्थित है। वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान इस पोर्ट ने 13 लाख टीईयू कार्गो और 615 जहाजों का संचालन किया, जिससे यह भारत के सबसे तेजी से विकसित होते ट्रांसशिपमेंट बंदरगाहों में शामिल हो गया है।