Category: Economy

  • भारत में वित्त वर्ष 2027 में 95 अरब डॉलर तक आ सकता है पूंजी प्रवाह, मजबूत एफसीएनआर निवेश से भुगतान संतुलन होगा बेहतर

    भारत में वित्त वर्ष 2027 में 95 अरब डॉलर तक आ सकता है पूंजी प्रवाह, मजबूत एफसीएनआर निवेश से भुगतान संतुलन होगा बेहतर

    नई दिल्ली । भारत की अर्थव्यवस्था के लिए वित्त वर्ष 2026-27 में बाहरी वित्तीय मोर्चे पर राहत की उम्मीद बढ़ गई है। मजबूत फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट बैंक यानी एफसीएनआर (बी) जमा प्रवाह और भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से विदेशी पूंजी आकर्षित करने के लिए किए गए नीतिगत उपायों के चलते देश में 90 से 95 अरब डॉलर तक पूंजी प्रवाह आने का अनुमान है। इससे भारत की बाहरी स्थिति मजबूत होने के साथ भुगतान संतुलन में भी उल्लेखनीय सुधार हो सकता है।

    एक आकलन के अनुसार, वित्त वर्ष 2027 में भारत का भुगतान संतुलन यानी बैलेंस ऑफ पेमेंट्स करीब 64 अरब डॉलर के अधिशेष में रह सकता है। यह अनुमान पिछले वर्षों की तुलना में काफी बेहतर स्थिति को दर्शाता है। वित्त वर्ष 2026 में भारत का भुगतान संतुलन 23.6 अरब डॉलर के अधिशेष में रहा था, जबकि वित्त वर्ष 2025 में करीब 5 अरब डॉलर का घाटा दर्ज किया गया था।

    अनुमान के मुताबिक एफसीएनआर (बी) के जरिए करीब 80 अरब डॉलर का प्रवाह हो सकता है। इसके अलावा बाहरी वाणिज्यिक उधारी और विदेशी मुद्रा में बाहरी स्रोतों से मिलने वाली पूंजी से 10 से 15 अरब डॉलर अतिरिक्त आने की संभावना है। इन दोनों माध्यमों से आने वाले धन से देश के पूंजी खाते की स्थिति में भी बड़ा सुधार होने की उम्मीद है।

    पूंजी खाते का अधिशेष वित्त वर्ष 2027 में करीब 108 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया है, जबकि वित्त वर्ष 2026 में यह केवल लगभग 2 अरब डॉलर रहा था। यदि यह अनुमान वास्तविक प्रवाह में बदलता है तो भारत के विदेशी मुद्रा भंडार, वित्तीय स्थिरता और बाहरी भुगतान क्षमता को मजबूती मिल सकती है।

    विदेशी पूंजी आकर्षित करने के लिए जून 2026 में घोषित नीतिगत उपायों का शुरुआती असर भी दिखाई दे रहा है। एफसीएनआर (बी) जमा, बाहरी वाणिज्यिक उधारी और विदेशी मुद्रा में बाहरी उधारी के लिए रियायती स्वैप व्यवस्था शुरू किए जाने के बाद विदेशी निवेशकों और बैंकों की ओर से अच्छी प्रतिक्रिया मिली है।

    5 जून से 31 जुलाई 2026 के बीच इन उपायों के माध्यम से कुल 40.8 अरब डॉलर की पूंजी आकर्षित होने का अनुमान है। इसमें एफसीएनआर (बी) जमा का हिस्सा 36.7 अरब डॉलर रहा, जबकि बाहरी वाणिज्यिक उधारी और विदेशी मुद्रा आधारित बाहरी उधारी से करीब 4.1 अरब डॉलर आए।

    एफसीएनआर जमा को आकर्षक बनाने में ब्याज दरों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। बड़े बैंक फिलहाल एफसीएनआर जमा पर लगभग 6 से 6.5 प्रतिशत तक ब्याज दे रहे हैं, जबकि कुछ छोटे और नए बैंक करीब 7 प्रतिशत तक की दर पेश कर रहे हैं। इससे प्रवासी भारतीयों और विदेशी मुद्रा रखने वाले निवेशकों के लिए भारतीय बैंकिंग प्रणाली में धन रखने की दिलचस्पी बढ़ सकती है।

    मजबूत पूंजी प्रवाह का असर घरेलू बैंकिंग प्रणाली की तरलता पर भी पड़ने की संभावना है। जुलाई में बैंकिंग प्रणाली में औसत तरलता करीब 1.1 लाख करोड़ रुपये रही थी, जो अगस्त में अब तक बढ़कर लगभग 3 लाख करोड़ रुपये हो गई है। महीने के अंत में आने वाले विदेशी पूंजी प्रवाह ने भी तरलता बढ़ाने में योगदान दिया है।

    भारत के लिए यह स्थिति ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब वैश्विक बाजारों में आर्थिक और वित्तीय अनिश्चितताएं बनी हुई हैं। मजबूत पूंजी प्रवाह से देश को विदेशी भुगतान दायित्वों को पूरा करने में मदद मिल सकती है और वैश्विक अस्थिरता के दौरान बाहरी झटकों से निपटने की क्षमता बेहतर हो सकती है। हालांकि पूंजी प्रवाह का वास्तविक स्तर वैश्विक ब्याज दरों, निवेशकों की धारणा और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

  • Shiprocket IPO से पहले सामने आए कानूनी विवाद, कंपनी पर चार आपराधिक मामले और 5.39 करोड़ रुपये की दावा राशि लंबित

    Shiprocket IPO से पहले सामने आए कानूनी विवाद, कंपनी पर चार आपराधिक मामले और 5.39 करोड़ रुपये की दावा राशि लंबित


    नई दिल्ली । ई-कॉमर्स लॉजिस्टिक्स और शिपिंग प्लेटफॉर्म शिपरॉकेट शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने की तैयारी कर रही है। कंपनी के प्रस्तावित आईपीओ से पहले सामने आए मसौदा दस्तावेज में कई कानूनी, कर और परिचालन जोखिमों का उल्लेख किया गया है। इनमें कंपनी और उसकी सहयोगी इकाइयों से जुड़े लंबित मामले भी शामिल हैं, जिनका संभावित असर कारोबार और वित्तीय स्थिति पर पड़ सकता है।

    दस्तावेज के अनुसार, शिपरॉकेट के खिलाफ चार आपराधिक मामले लंबित हैं। इन मामलों में कुल दावा राशि 5.39 करोड़ रुपये बताई गई है। इसके अलावा कंपनी के खिलाफ दो अन्य आपराधिक कार्यवाहियां और सात कर विवाद भी चल रहे हैं। सहयोगी कंपनियों के स्तर पर भी एक आपराधिक मामला और तीन कर संबंधी मामले लंबित हैं, जिनमें कुल दावा राशि 2.34 करोड़ रुपये बताई गई है।

    कंपनी के सामने मौजूद मामलों में वर्ष 2022 का एक प्रमुख मामला भी शामिल है। इसमें शिपरॉकेट के सह-संस्थापक साहिल गोयल और गौतम कपूर, निदेशक अर्जुन सेठी तथा मुख्य वित्तीय अधिकारी कुमार तनमय को नामजद किया गया है। मामले में धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात, जालसाजी और आपराधिक साजिश जैसे आरोप लगाए गए हैं। यह मामला अभी न्यायिक प्रक्रिया में है और इस पर अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।

    वित्तीय प्रदर्शन की बात करें तो शिपरॉकेट अभी लाभ में नहीं आई है। वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी का शुद्ध घाटा 79.2 करोड़ रुपये रहा। इससे पिछले वित्त वर्ष में घाटा 74.4 करोड़ रुपये था। हालांकि वित्त वर्ष 2023-24 में दर्ज 595.1 करोड़ रुपये के घाटे की तुलना में कंपनी की वित्तीय स्थिति में काफी सुधार हुआ है।

    राजस्व के मोर्चे पर कंपनी ने लगातार वृद्धि दर्ज की है। वित्त वर्ष 2025-26 में परिचालन से प्राप्त आय 24 प्रतिशत बढ़कर 2024.1 करोड़ रुपये हो गई। राजस्व में यह वृद्धि कंपनी के कारोबार के विस्तार का संकेत देती है, लेकिन बढ़ती आय के बावजूद लाभप्रदता हासिल करना अभी भी प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण चुनौती है।

    कंपनी के अनुसार, व्यापारियों का आधार बढ़ाने, नए उत्पाद विकसित करने, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस क्षमताओं में निवेश करने और नए कारोबारी क्षेत्रों का विस्तार करने पर खर्च निकट भविष्य में मुनाफे पर दबाव बनाए रख सकता है। ऐसे निवेश कंपनी की दीर्घकालिक वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनके कारण तत्काल लाभ में सुधार सीमित रह सकता है।

    शिपरॉकेट की एक अन्य महत्वपूर्ण निर्भरता तीसरे पक्ष के सेवा प्रदाताओं पर है। वित्त वर्ष 2025-26 में मर्चेंट सॉल्यूशन लागत कंपनी के कुल खर्च का लगभग 69.4 प्रतिशत रही। इस खर्च में शीर्ष 10 विक्रेताओं की हिस्सेदारी 55 प्रतिशत से अधिक थी। इससे कुछ प्रमुख सेवा प्रदाताओं पर कंपनी की निर्भरता का जोखिम सामने आता है।

    कंपनी ने यह भी बताया है कि उसके अधिकांश लॉजिस्टिक्स साझेदारों के साथ विशेष समझौते नहीं हैं। ऐसी स्थिति में किसी साझेदार के साथ कारोबारी संबंध प्रभावित होने पर सेवा व्यवस्था, लागत और परिचालन क्षमता पर असर पड़ सकता है। बढ़ती परिचालन लागत और प्रतिस्पर्धी प्लेटफॉर्मों द्वारा बेहतर शर्तें दिए जाने की स्थिति भी कंपनी के लिए चुनौती बन सकती है।

    ई-कॉमर्स लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में शिपरॉकेट को मार्केटप्लेस, लॉजिस्टिक्स कंपनियों और तकनीकी एग्रीगेटर्स से प्रतिस्पर्धा मिलती है। कंपनी घरेलू बाजार के साथ क्रॉस-बॉर्डर ई-कॉमर्स कारोबार का विस्तार करना चाहती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में अवसर अधिक हैं, लेकिन वहां नियामकीय आवश्यकताओं, लागत, संचालन और प्रतिस्पर्धा से जुड़े अतिरिक्त जोखिम भी मौजूद हैं।

    ऐसे में प्रस्तावित आईपीओ से पहले निवेशकों के लिए कंपनी की बढ़ती आय के साथ उसके घाटे, लंबित कानूनी मामलों, सेवा प्रदाताओं पर निर्भरता और विस्तार संबंधी खर्चों को समझना महत्वपूर्ण होगा। कंपनी की आगे की रणनीति का मुख्य लक्ष्य कारोबार बढ़ाने के साथ लाभप्रदता और परिचालन स्थिरता हासिल करना रहेगा।

  • स्वतंत्र माइक्रोफिन के 3000 करोड़ रुपये IPO से पहले सामने आए जोखिम, असुरक्षित कर्ज और नकदी बहिर्वाह ने बढ़ाई चिंता

    स्वतंत्र माइक्रोफिन के 3000 करोड़ रुपये IPO से पहले सामने आए जोखिम, असुरक्षित कर्ज और नकदी बहिर्वाह ने बढ़ाई चिंता

    नई दिल्ली ।अनन्या बिरला और एंटीमैटर मीडिया प्राइवेट लिमिटेड द्वारा प्रमोटेड स्वतंत्र माइक्रोफिन लिमिटेड ने 3000 करोड़ रुपये के प्रस्तावित आरंभिक सार्वजनिक निर्गम के लिए मसौदा दस्तावेज दाखिल किया है। कंपनी के ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस में कारोबार और संचालन से जुड़े कई जोखिमों का उल्लेख किया गया है, जिन पर संभावित निवेशकों की नजर रह सकती है।

    कंपनी के सामने सबसे प्रमुख जोखिमों में असुरक्षित माइक्रोफाइनेंस ऋणों पर अत्यधिक निर्भरता शामिल है। 31 मार्च 2026 तक स्वतंत्र माइक्रोफिन की कुल प्रबंधित परिसंपत्तियों में 88.56 प्रतिशत हिस्सा असुरक्षित माइक्रोफाइनेंस ऋणों का था। ऐसे ऋणों में किसी प्रकार की आर्थिक कमजोरी आने पर वसूली से जुड़ी चुनौती बढ़ सकती है।

    स्वतंत्र माइक्रोफिन मुख्य रूप से ऐसे परिवारों को ऋण उपलब्ध कराती है, जिनकी वार्षिक आय तीन लाख रुपये तक है। कंपनी के अनुसार, इस आय वर्ग के ग्राहक रोजगार में बदलाव, आय में कमी और आर्थिक परिस्थितियों से अपेक्षाकृत अधिक प्रभावित हो सकते हैं। इससे ऋण भुगतान और वसूली पर असर पड़ने का जोखिम बना रहता है।

    कंपनी के कारोबार में नकद संग्रह भी एक महत्वपूर्ण पहलू है। डिजिटल माध्यमों को बढ़ावा देने के बावजूद वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी के कुल संग्रह का 79.22 प्रतिशत हिस्सा नकद भुगतान से आया। कंपनी ने स्वयं माना है कि नकद लेनदेन में धोखाधड़ी, चोरी, नकदी प्रबंधन की गलतियों और धन के दुरुपयोग जैसे जोखिम हो सकते हैं।

    नकदी प्रवाह से जुड़ा आंकड़ा भी कंपनी के लिए महत्वपूर्ण है। वित्त वर्ष 2025-26 में परिचालन गतिविधियों में इस्तेमाल हुई शुद्ध नकदी 5392.6 करोड़ रुपये रही, जबकि इससे पिछले वित्त वर्ष में यह 427 करोड़ रुपये थी। इस तरह परिचालन नकदी बहिर्वाह में करीब 1160 प्रतिशत की तेज वृद्धि दर्ज हुई।

    कंपनी ने इस बढ़ोतरी का प्रमुख कारण ऋण वितरण में तेजी और लोन बुक के विस्तार को बताया है। साथ ही, भविष्य में कारोबार और ऋण पोर्टफोलियो बढ़ने के साथ परिचालन स्तर पर नकारात्मक नकदी प्रवाह जारी रहने की संभावना से भी दस्तावेज में अवगत कराया गया है।

    भौगोलिक एकाग्रता भी कंपनी के लिए जोखिम का विषय है। कुल प्रबंधित परिसंपत्तियों का करीब 68 प्रतिशत हिस्सा बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और मध्य प्रदेश जैसे पांच राज्यों में केंद्रित है। इन क्षेत्रों में आर्थिक, राजनीतिक या प्राकृतिक परिस्थितियों में प्रतिकूल बदलाव आने पर कंपनी के कारोबार और ऋण वसूली पर असर पड़ सकता है।

    कानूनी मोर्चे पर भी कंपनी से जुड़ी चुनौती सामने आई है। रत्नाफिन कैपिटल और रत्नाफिन एंटरप्राइज ने दिल्ली हाईकोर्ट में ट्रेडमार्क और लोगो से जुड़े कथित उल्लंघन को लेकर स्वतंत्र माइक्रोफिन के खिलाफ दीवानी मुकदमा दायर किया है। याचिकाकर्ताओं ने रोक लगाने के साथ दो करोड़ रुपये के हर्जाने की मांग की है।

    कॉरपोरेट गवर्नेंस से जुड़े जोखिम भी मसौदा दस्तावेज में दर्ज हैं। कंपनी ने बताया है कि उसके कॉरपोरेट प्रमोटर एंटीमैटर मीडिया प्राइवेट लिमिटेड के पास माइक्रोफाइनेंस कारोबार का पर्याप्त अनुभव नहीं है। यह पहलू निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है क्योंकि इस क्षेत्र में ऋण जोखिम, वसूली और संचालन की निगरानी अहम होती है।

    कर्मचारियों के पलायन की दर भी ऊंची बनी हुई है। वित्त वर्ष 2025-26 में पूर्णकालिक कर्मचारियों की एट्रिशन दर 39.22 प्रतिशत रही, हालांकि यह पिछले वित्त वर्ष के 41.47 प्रतिशत से कम है। लगातार ऊंची एट्रिशन दर कंपनी के श्रम-प्रधान कारोबारी मॉडल के सामने मानव संसाधन से जुड़ी चुनौती को दर्शाती है।

    प्रस्तावित आईपीओ में 1500 करोड़ रुपये के नए इक्विटी शेयर जारी किए जाएंगे, जबकि मौजूदा शेयरधारक 1500 करोड़ रुपये तक के शेयर ऑफर फॉर सेल के माध्यम से पेश करेंगे। कंपनी 300 करोड़ रुपये तक का प्री-आईपीओ प्लेसमेंट भी कर सकती है। यदि यह प्लेसमेंट होता है तो नए शेयरों के निर्गम का आकार उसी अनुपात में घटाया जा सकता है।

  • जुलाई में थोक महंगाई दर घटकर 9.78 प्रतिशत हुई, ईंधन कीमतों में नरमी के बावजूद खाद्य और विनिर्माण दबाव बढ़ा

    जुलाई में थोक महंगाई दर घटकर 9.78 प्रतिशत हुई, ईंधन कीमतों में नरमी के बावजूद खाद्य और विनिर्माण दबाव बढ़ा

    नई दिल्ली ।भारत में थोक स्तर पर वस्तुओं की कीमतों में जुलाई 2026 के दौरान मामूली नरमी देखने को मिली। जुलाई में थोक मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई दर 9.78 प्रतिशत रही, जबकि जून में यह 9.87 प्रतिशत दर्ज की गई थी। इस तरह मासिक आधार पर थोक महंगाई में हल्की कमी आई है, हालांकि कीमतों का दबाव अभी भी ऊंचे स्तर पर बना हुआ है।

    2022-23 को आधार वर्ष मानकर जारी अनंतिम आंकड़ों के अनुसार जुलाई में सभी वस्तुओं का थोक मूल्य सूचकांक 110.0 रहा। जून में यह सूचकांक 110.2 दर्ज किया गया था। समग्र सूचकांक में मामूली गिरावट के बावजूद अलग-अलग श्रेणियों में कीमतों का रुझान एक जैसा नहीं रहा।

    प्राथमिक वस्तुओं की महंगाई दर जुलाई में बढ़कर 8.52 प्रतिशत हो गई, जबकि जून में यह 7.00 प्रतिशत थी। इसका मतलब है कि इस श्रेणी की वस्तुओं की कीमतों में पिछले महीने की तुलना में अधिक दबाव रहा। प्राथमिक वस्तुओं का सूचकांक भी जून के 116.1 से बढ़कर जुलाई में 117.2 हो गया।

    विनिर्मित उत्पादों की कीमतों में भी तेजी देखने को मिली। जुलाई में इस श्रेणी की महंगाई दर 8.29 प्रतिशत रही, जबकि जून में यह 7.48 प्रतिशत थी। विनिर्मित उत्पादों का सूचकांक जून के 107.8 से बढ़कर जुलाई में 108.4 हो गया। इससे उत्पादन क्षेत्र में लागत और कीमतों से जुड़ा दबाव बने रहने का संकेत मिलता है।

    इसके विपरीत ईंधन और ऊर्जा क्षेत्र में महंगाई दर में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई। जून में 27.41 प्रतिशत रही यह दर जुलाई में घटकर 20.05 प्रतिशत पर आ गई। हालांकि गिरावट के बावजूद इस श्रेणी में महंगाई अभी भी काफी ऊंची बनी हुई है। ईंधन और ऊर्जा का सूचकांक जून के 111.1 से घटकर जुलाई में 105.4 हो गया।

    जुलाई में थोक महंगाई को प्रभावित करने वाले प्रमुख क्षेत्रों में खनिज तेल और पेट्रोलियम उत्पाद, खाद्य वस्तुएं, बेसिक मेटल्स, गैर-खाद्य प्राथमिक उत्पाद, खाद्य उत्पादों का विनिर्माण तथा रसायन और रासायनिक उत्पाद शामिल रहे। इन क्षेत्रों में कीमतों की बढ़ोतरी का असर कुल थोक महंगाई के आंकड़े पर पड़ा।

    खाद्य क्षेत्र में भी कीमतों का दबाव बढ़ा है। जुलाई में डब्ल्यूपीआई फूड इंडेक्स आधारित महंगाई दर 6.65 प्रतिशत रही, जो जून के 6.14 प्रतिशत से अधिक है। खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी का असर थोक बाजार के साथ आगे चलकर अन्य कीमतों पर भी दिखाई दे सकता है।

    इस बीच मई 2026 के थोक महंगाई आंकड़ों में भी संशोधन किया गया है। मई का अंतिम थोक मूल्य सूचकांक 109.9 के प्रारंभिक अनुमान से संशोधित होकर 110.1 हो गया। इसके साथ मई की थोक महंगाई दर भी 9.68 प्रतिशत के प्रारंभिक आंकड़े से संशोधित होकर 9.88 प्रतिशत हो गई।

    मई के अंतिम आंकड़े 98.14 प्रतिशत वेटेड रिस्पॉन्स रेट के आधार पर तैयार किए गए हैं। इसके अलावा आउटपुट प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स का मई का अंतिम आंकड़ा 109.6 के प्रारंभिक अनुमान से बढ़कर 109.9 हो गया है।

    विनिर्माण क्षेत्र के ऑल इंडिया ट्रायल इनपुट प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स की बात करें तो जुलाई में यह 105.9 दर्ज किया गया। मई के इनपुट पीपीआई के अंतिम आंकड़े में भी संशोधन हुआ और यह शुरुआती 104.9 से बढ़कर 106.5 हो गया।

    कुल मिलाकर जुलाई में थोक महंगाई दर में मामूली राहत जरूर मिली, लेकिन प्राथमिक वस्तुओं, खाद्य पदार्थों और विनिर्मित उत्पादों में बढ़ता मूल्य दबाव अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण संकेत है। वहीं ईंधन और ऊर्जा क्षेत्र में आई नरमी ने समग्र महंगाई दर को नीचे लाने में मदद की है।

  • E20 पेट्रोल पर नया विवाद: कार कंपनियों की ईमेल बातचीत में सामने आई चिंता तो SIAM ने क्यों वापस लिया पत्र?

    E20 पेट्रोल पर नया विवाद: कार कंपनियों की ईमेल बातचीत में सामने आई चिंता तो SIAM ने क्यों वापस लिया पत्र?


    नई दिल्ली। देशभर में E20 पेट्रोल को लेकर चल रही बहस के बीच एक नई रिपोर्ट ने ऑटो सेक्टर में हलचल बढ़ा दी है। पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल ब्लेंडिंग को लेकर पहले से ही वाहन मालिकों के बीच कई तरह की चिंताएं सामने आती रही हैं। अब Reuters की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि Tata Motors Maruti Suzuki और Mahindra जैसी बड़ी ऑटो कंपनियों के अधिकारी भी E20 फ्यूल की गुणवत्ता को लेकर आपस में चर्चा कर रहे थे। कंपनियों के बीच हुई ईमेल बातचीत में पेट्रोल में क्लोराइड और नमी की मात्रा को लेकर चिंता सामने आने की बात कही गई है।

    भारत में E20 फ्यूल को पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करने और प्रदूषण घटाने के उद्देश्य से बढ़ावा दिया गया है। सरकार की इथेनॉल ब्लेंडिंग नीति के तहत देशभर में E20 पेट्रोल का इस्तेमाल बढ़ाया गया है। लेकिन इसके साथ ही वाहन मालिकों की चिंता भी बढ़ी है कि लंबे समय तक ऐसे ईंधन के इस्तेमाल का गाड़ियों पर क्या असर पड़ेगा। इसी बीच ऑटो कंपनियों से जुड़े कुछ आंतरिक डेटा ने इस बहस को और गंभीर बना दिया है।

    रिपोर्ट के मुताबिक कई ऑटोमेकर्स ने करीब एक साल की अवधि में 21 राज्यों के 250 से ज्यादा पेट्रोल पंपों से ईंधन के सैंपल इकट्ठा कर उनकी जांच की थी। दावा है कि 18 राज्यों के कई सैंपल में क्लोराइड की मात्रा और नमी का स्तर ज्यादा पाया गया। कंपनियों से जुड़े अधिकारियों के बीच हुई बातचीत में इन तत्वों की वजह से वाहनों के कुछ हिस्सों में संभावित समस्याओं को लेकर चिंता जताई गई थी।

    हालांकि इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि ऑटो कंपनियां सार्वजनिक तौर पर E20 फ्यूल का विरोध नहीं कर रही हैं। बल्कि उद्योग संगठन SIAM ने भी बाद में सरकार को भेजे गए अपने पत्र को वापस ले लिया था। 28 जुलाई को भेजी गई शिकायत में E20 पेट्रोल में संभावित मिलावट और गुणवत्ता को लेकर चिंता जताई गई थी लेकिन बाद में SIAM ने कहा कि पत्र में इस्तेमाल किए गए कुछ आंकड़ों की और जांच तथा वैलिडेशन की जरूरत है।

    SIAM के मुताबिक यह डेटा आंतरिक चर्चा और वैलिडेशन के लिए जुटाया गया था। संगठन का कहना है कि टेस्टिंग का आधार और सैंपल साइज किसी अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए पर्याप्त नहीं था। इसी वजह से सरकार को भेजे गए पत्र को वापस लेने का फैसला किया गया। साथ ही SIAM इस विषय पर ज्यादा व्यापक और वैज्ञानिक अध्ययन कराने की योजना बना रहा है।

    इस बीच पेट्रोलियम मंत्रालय की तरफ से इस रिपोर्ट पर कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि SIAM का पत्र मिलने से करीब दो सप्ताह पहले ही सरकारी तेल कंपनियां पेट्रोल पंपों पर ईंधन की गुणवत्ता और संभावित मिलावट की जांच शुरू कर चुकी थीं। उनके मुताबिक जांच में केवल चार मामले ही इस तरह की समस्या से जुड़े मिले।

    सरकारी तेल कंपनियों ने भी रैंडम और वैज्ञानिक परीक्षणों के आधार पर E20 पेट्रोल की गुणवत्ता को लेकर बड़ी चिंता की बात को खारिज किया है। उनका कहना है कि किए गए परीक्षणों में ईंधन में ऐसी कोई व्यापक समस्या सामने नहीं आई जिससे वाहन मालिकों को घबराने की जरूरत हो।

    वहीं Mahindra ने Reuters की रिपोर्ट में ईमेल के आधार पर निकाले गए निष्कर्षों को पूरी तरह गलत बताया है। कंपनी का कहना है कि उपलब्ध जानकारी के आधार पर निकाले गए परिणाम सही नहीं हैं। दूसरी तरफ Maruti Suzuki और Tata Motors की ओर से इस मामले में कोई विस्तृत जवाब नहीं दिया गया है।

    पूरे विवाद का सबसे अहम पहलू यही है कि एक तरफ सरकारी तेल कंपनियां E20 पेट्रोल की गुणवत्ता को लेकर आश्वस्त कर रही हैं और दूसरी तरफ ऑटो इंडस्ट्री के भीतर हुए परीक्षणों तथा बातचीत को लेकर रिपोर्ट में अलग तस्वीर सामने आई है। ऐसे में अभी यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा कि E20 पेट्रोल सभी वाहनों के लिए नुकसानदायक है। फिलहाल सबसे जरूरी है कि ईंधन की गुणवत्ता और संभावित क्लोराइड तथा नमी की समस्या को लेकर व्यापक वैज्ञानिक जांच हो और उसके निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाएं। इससे वाहन मालिकों के बीच बनी आशंकाओं को भी स्पष्ट जवाब मिल सकेगा।

  • Cab Tip Rules: अब राइड पूरी होने के बाद ही दे सकेंगे टिप, बुकिंग से पहले अतिरिक्त भुगतान पर सरकार की सख्ती

    Cab Tip Rules: अब राइड पूरी होने के बाद ही दे सकेंगे टिप, बुकिंग से पहले अतिरिक्त भुगतान पर सरकार की सख्ती

    नई दिल्ली । कैब बुकिंग के दौरान यात्रियों को राइड जल्दी कन्फर्म कराने के लिए अतिरिक्त रकम या एडवांस टिप देने के लिए प्रेरित करने वाले विकल्प अब उपलब्ध नहीं होंगे। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने Ola, Uber, Rapido समेत कैब एग्रीगेटर्स को ऐसे सभी फीचर, मैसेज और पेमेंट विकल्प हटाने के निर्देश दिए हैं, जिनसे यात्रियों को सामान्य किराये के अलावा अतिरिक्त भुगतान करने पर जल्दी राइड मिलने का संकेत मिलता है।

    मंत्रालय की ताजा एडवाइजरी के बाद कैब बुकिंग से जुड़े डिजिटल इंटरफेस की समीक्षा करने को कहा गया है। एग्रीगेटर्स को ऐसे फीचर तत्काल हटाने या उनमें बदलाव करने होंगे, जो अतिरिक्त भुगतान को राइड की पुष्टि, ड्राइवर द्वारा ट्रिप स्वीकार करने या कम इंतजार के समय से जोड़ते हैं।

    कैब बुकिंग के दौरान कुछ प्लेटफॉर्म पर Advance Tip, Choose an Add-on या बेहतर और जल्दी राइड कन्फर्म होने की संभावना बढ़ाने जैसे विकल्प दिखाई देने की शिकायतें सामने आई थीं। ऐसे विकल्पों से यात्रियों को यह धारणा बन सकती थी कि सामान्य किराये से अधिक भुगतान करने पर उनकी राइड को प्राथमिकता मिल सकती है।

    सरकार ने इसी व्यवस्था पर आपत्ति जताई है। निर्देश के अनुसार यात्री को यह महसूस नहीं होना चाहिए कि अतिरिक्त रकम देने से उसे बेहतर या तेज सेवा मिल सकती है। राइड की बुकिंग सामान्य किराये के आधार पर होनी चाहिए और अतिरिक्त भुगतान को सेवा की प्राथमिकता से नहीं जोड़ा जा सकता।

    Motor Vehicle Aggregator Guidelines, 2025 के Clause 14.15 के तहत ड्राइवर को दी जाने वाली टिप पूरी तरह स्वैच्छिक रखी गई है। इसका विकल्प यात्रा पूरी होने के बाद ही उपलब्ध कराया जा सकता है। बुकिंग के समय, यात्रा शुरू होने से पहले या यात्रा के दौरान टिप देने के लिए प्रेरित करने वाला विकल्प नहीं होना चाहिए।

    नियमों के मुताबिक यात्री द्वारा दी गई पूरी टिप राशि ड्राइवर को ही मिलनी चाहिए। एग्रीगेटर इसमें किसी प्रकार की कटौती नहीं कर सकता। साथ ही टिप से जुड़ा इंटरफेस ऐसा नहीं होना चाहिए, जिससे यात्री पर अतिरिक्त भुगतान करने का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दबाव बने।

    सरकार ने इससे पहले दिसंबर 2025 में एग्रीगेटर गाइडलाइंस में बदलाव करते हुए टिप को यात्रा पूरी होने के बाद तक सीमित किया था। इसके बावजूद कुछ प्लेटफॉर्म पर एडवांस टिप से जुड़े विकल्प दिखाई देने की शिकायतों के बाद अब मंत्रालय ने दोबारा सख्ती दिखाई है।

    11 अगस्त 2026 को जारी एडवाइजरी में कैब एग्रीगेटर्स को अपने मोबाइल ऐप और डिजिटल प्लेटफॉर्म की तत्काल समीक्षा करने को कहा गया है। नियमों के अनुरूप नहीं पाए जाने वाले इंटरफेस, संदेश, पेमेंट विकल्प और ऐड-ऑन को हटाने या संशोधित करने के निर्देश दिए गए हैं।

    एडवांस टिप को लेकर उपभोक्ता संरक्षण से जुड़ी चिंताएं पहले भी सामने आती रही हैं। केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण ने भी राइड-हेलिंग प्लेटफॉर्म पर बुकिंग से पहले टिप मांगने की व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए थे। मुख्य चिंता यह थी कि अतिरिक्त भुगतान करने वाले यात्रियों को सामान्य बुकिंग प्रक्रिया में अनुचित प्राथमिकता मिलने का संकेत न जाए।

    नए निर्देशों के बाद यात्रियों के लिए कैब बुकिंग प्रक्रिया अधिक स्पष्ट रहने की उम्मीद है। अब बुकिंग के समय अतिरिक्त टिप देकर राइड जल्दी हासिल करने का विकल्प नहीं दिया जा सकेगा। यात्री सामान्य किराये पर राइड बुक करेंगे और यात्रा पूरी होने के बाद, यदि वे ड्राइवर की सेवा से संतुष्ट हैं, तो अपनी इच्छा के अनुसार टिप दे सकेंगे।

    इस व्यवस्था का उद्देश्य कैब बुकिंग में अतिरिक्त भुगतान और राइड की प्राथमिकता के बीच किसी भी तरह के संबंध को खत्म करना है। एग्रीगेटर्स को अपने ऐप के इंटरफेस और भुगतान व्यवस्था को निर्धारित नियमों के अनुरूप रखना होगा, ताकि यात्रियों को सेवा पाने के लिए अतिरिक्त भुगतान करने का दबाव महसूस न हो।

  • वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत का रत्न एवं आभूषण निर्यात 9.17 अरब डॉलर पहुंचा, अमेरिका सहित प्रमुख बाजारों से मिला सहारा

    वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत का रत्न एवं आभूषण निर्यात 9.17 अरब डॉलर पहुंचा, अमेरिका सहित प्रमुख बाजारों से मिला सहारा

    नई दिल्ली ।वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में मांग से जुड़ी चुनौतियों के बावजूद भारत के रत्न एवं आभूषण उद्योग ने चालू वित्त वर्ष के शुरुआती चार महीनों में बेहतर प्रदर्शन किया है। अप्रैल से जुलाई 2026 के दौरान देश का कुल रत्न एवं आभूषण निर्यात 2.44 प्रतिशत बढ़कर 9.17 अरब डॉलर पर पहुंच गया। भारतीय मुद्रा में यह निर्यात 13.58 प्रतिशत बढ़कर 87,078.01 करोड़ रुपये रहा।

    निर्यात क्षेत्र में सबसे उल्लेखनीय वृद्धि वैल्यू-एडेड आभूषणों की श्रेणी में दर्ज की गई। जड़े हुए सोने के आभूषणों का निर्यात अप्रैल-जुलाई अवधि में 21.09 प्रतिशत बढ़कर 2.24 अरब डॉलर हो गया। वहीं चांदी के आभूषणों ने और मजबूत प्रदर्शन करते हुए 72.19 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की और इनका निर्यात 508.18 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया।

    प्लैटिनम आभूषणों के निर्यात में भी सकारात्मक वृद्धि देखने को मिली। इस श्रेणी का निर्यात 17.20 प्रतिशत बढ़कर 77.82 मिलियन डॉलर रहा। इसी अवधि में पॉलिश्ड लैब-ग्रोन डायमंड्स का निर्यात 7.47 प्रतिशत बढ़कर 408.50 मिलियन डॉलर हो गया। साधारण और जड़े हुए आभूषणों को मिलाकर कुल सोने के आभूषणों का निर्यात 5.87 प्रतिशत बढ़कर 4.03 अरब डॉलर रहा।

    उद्योग के प्रदर्शन को अमेरिका, सिंगापुर, हांगकांग और ब्रिटेन जैसे प्रमुख अंतरराष्ट्रीय बाजारों से मिलने वाली मांग का भी समर्थन मिला। इन बाजारों में भारतीय आभूषणों और खासकर वैल्यू-एडेड उत्पादों की मांग बढ़ने से निर्यातकों को लाभ हुआ है। इससे संकेत मिलता है कि भारतीय कंपनियां बदलते वैश्विक बाजार में उत्पादों के मूल्यवर्धन के जरिए अपनी स्थिति मजबूत कर रही हैं।

    हालांकि, सभी उत्पाद श्रेणियों में वृद्धि नहीं रही। कट एंड पॉलिश्ड डायमंड्स का निर्यात 8 प्रतिशत घटकर 3.60 अरब डॉलर रह गया। साधारण सोने के आभूषणों के निर्यात में भी 8.46 प्रतिशत की कमी आई और यह 1.80 अरब डॉलर रहा। वैश्विक उपभोक्ता मांग में बदलाव और कुछ प्रमुख बाजारों में आर्थिक दबाव को इस गिरावट से जोड़कर देखा जा रहा है।

    रत्न एवं आभूषण क्षेत्र के अनुसार, मौजूदा परिस्थितियों में वैल्यू-एडेड उत्पाद उद्योग के लिए महत्वपूर्ण सहारा बनकर उभरे हैं। क्षेत्र के नेतृत्व का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में हालिया नरमी प्रमुख उपभोक्ता बाजारों में मांग को बढ़ावा दे सकती है।

    उद्योग के लिए आईआईजेएस भारत प्रीमियर 2026 प्रदर्शनी को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसमें 61,000 से अधिक आगंतुक पहुंचे, जबकि 80 देशों से 5,000 से अधिक अंतरराष्ट्रीय खरीदार और प्रतिनिधि शामिल हुए। प्रदर्शनी के दौरान हुए कारोबारी समझौतों के आगामी महीनों में वास्तविक निर्यात ऑर्डर में बदलने की उम्मीद है।

    इस बीच टैक्सेशन एंड अदर लॉज (संशोधन) विधेयक, 2026 को भी उद्योग के लिए अहम कदम माना जा रहा है। विशेष अधिसूचित क्षेत्रों के माध्यम से रफ डायमंड कारोबार करने वाली विदेशी कंपनियों को 15 वर्ष की आयकर छूट मिलने का प्रावधान भारत को वैश्विक हीरा व्यापार केंद्र के रूप में विकसित करने में मदद कर सकता है। इससे देश की भूमिका केवल हीरा प्रसंस्करण तक सीमित न रहकर अंतरराष्ट्रीय व्यापार के बड़े केंद्र के रूप में मजबूत होने की संभावना है।

    कुल मिलाकर, शुरुआती चार महीनों के आंकड़े बताते हैं कि वैश्विक दबाव के बीच भारतीय रत्न एवं आभूषण उद्योग ने निर्यात में सकारात्मक वृद्धि बनाए रखी है। हालांकि डायमंड और साधारण सोने के आभूषणों में गिरावट के कारण चुनौतियां कायम हैं, लेकिन वैल्यू-एडेड उत्पादों और प्रमुख विदेशी बाजारों से मिली मांग ने कुल निर्यात को बढ़त में बनाए रखा है।

  • मेघालय और ओडिशा की तीन खाद्य कंपनियों पर कार्रवाई, निरीक्षण में स्वच्छता मानकों और खाद्य सुरक्षा नियमों की गंभीर अनदेखी

    मेघालय और ओडिशा की तीन खाद्य कंपनियों पर कार्रवाई, निरीक्षण में स्वच्छता मानकों और खाद्य सुरक्षा नियमों की गंभीर अनदेखी

    नई दिल्ली ।भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण ने उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए तीन खाद्य व्यवसाय संचालकों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की है। नियामक ने मेघालय की ए.बी. एंटरप्राइज तथा ओडिशा की जाइका ऑर्गेनिक्स और नारायणी फूड्स एंड बेवरेजेज के खाद्य कारोबार लाइसेंस तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिए हैं।

    नियामक के अनुसार इन कंपनियों के खिलाफ निरीक्षण के दौरान खाद्य सुरक्षा नियमों के गंभीर उल्लंघन सामने आए। इनमें भ्रामक स्वास्थ्य संबंधी दावे, खराब स्वच्छता व्यवस्था, अनुचित भंडारण, कीट नियंत्रण की कमियां और खाद्य सुरक्षा प्रबंधन से जुड़ी आवश्यक प्रक्रियाओं का पालन नहीं करना शामिल है।

    ए.बी. एंटरप्राइज के मामले में उत्पादों के लेबल और प्रचार सामग्री पर स्वास्थ्य लाभ से जुड़े ऐसे दावे पाए गए, जिन्हें खाद्य सुरक्षा एवं मानक विज्ञापन और दावे संबंधी नियमों का उल्लंघन माना गया। जांच में यह भी पाया गया कि कंपनी आवश्यक विनिर्माण स्वीकृति के बिना खाद्य उत्पादों का कारोबार कर रही थी।

    कंपनी को सुधार नोटिस जारी करने के साथ अपना पक्ष रखने के लिए व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर भी दिया गया था। हालांकि, नियामक के मुताबिक कंपनी की ओर से कोई जवाब या स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। इसके बाद खाद्य कारोबार से जुड़ी सभी गतिविधियों को अगले आदेश तक रोकने का निर्देश दिया गया।

    ओडिशा स्थित जाइका ऑर्गेनिक्स के संयंत्र में निरीक्षण के दौरान स्वच्छता और सैनिटेशन से संबंधित कई गंभीर कमियां सामने आईं। खाद्य पदार्थों के निर्माण, पैकेजिंग और भंडारण की परिस्थितियों को निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं पाया गया।

    निरीक्षण में खराब हाउसकीपिंग, कीट नियंत्रण की समस्याएं, जंग लगे उपकरण, कच्चे माल और तैयार उत्पादों का अनुचित भंडारण तथा उत्पादन प्रक्रिया में आवश्यक नियंत्रण की कमी पाई गई। कुछ उत्पादों और सामग्रियों पर निर्माण तिथि, बैच नंबर और उपयोग की अंतिम तिथि जैसी महत्वपूर्ण जानकारियां भी अंकित नहीं थीं।

    अनुपालन मूल्यांकन में जाइका ऑर्गेनिक्स को 90 में से केवल 10 अंक मिले। 12 प्रतिशत के इस स्कोर के आधार पर कंपनी को गैर-अनुपालन श्रेणी में रखा गया। नियामक ने कहा कि ऐसी परिस्थितियां खाद्य पदार्थों में भौतिक, रासायनिक और जैविक जोखिम पैदा कर सकती हैं।

    नारायणी फूड्स एंड बेवरेजेज के उत्पादन परिसर में भी स्वच्छता और खाद्य सुरक्षा प्रबंधन व्यवस्था में गंभीर कमियां पाई गईं। निरीक्षण के दौरान प्रसंस्करण और भंडारण क्षेत्रों में मक्खियां, मकड़ी के जाले, कीटों के प्रवेश के रास्ते और जल स्रोतों के आसपास शैवाल की मौजूदगी दर्ज की गई।

    इसके अलावा जंग लगे उपकरण, खाद्य सामग्री के पास कचरे का जमाव और तैयार उत्पादों के अनुचित भंडारण जैसी कमियां भी सामने आईं। कंपनी के रिकॉर्ड में खाद्य सुरक्षा प्रशिक्षण और नियंत्रण नमूनों से संबंधित आवश्यक दस्तावेजों का भी अभाव पाया गया।

    नारायणी फूड्स एंड बेवरेजेज को अनुपालन मूल्यांकन में 80 में से 20 अंक मिले, यानी कंपनी का स्कोर 25 प्रतिशत रहा। इसे भी गैर-अनुपालन श्रेणी में रखा गया और लाइसेंस तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया।

    खाद्य नियामक ने स्पष्ट किया कि उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा से किसी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। नियमों का उल्लंघन करने वाले खाद्य कारोबारियों के खिलाफ निरीक्षण और नियामकीय कार्रवाई आगे भी जारी रहेगी।

  • भारतीय शेयर बाजार सीमित दायरे में बंद, सेंसेक्स 113 अंक फिसला लेकिन 78 हजार के स्तर के ऊपर रहा

    भारतीय शेयर बाजार सीमित दायरे में बंद, सेंसेक्स 113 अंक फिसला लेकिन 78 हजार के स्तर के ऊपर रहा


    नई दिल्ली ।भारतीय शेयर बाजार में गुरुवार को पूरे कारोबारी सत्र के दौरान सीमित दायरे में कारोबार देखने को मिला। वैश्विक संकेतों, महंगाई के आंकड़ों और कच्चे तेल की कीमतों से जुड़े जोखिमों के बीच निवेशकों ने सतर्क रुख अपनाया। कारोबार समाप्त होने पर सेंसेक्स 113.61 अंक यानी 0.15 प्रतिशत की गिरावट के साथ 78,079.96 पर बंद हुआ। वहीं निफ्टी 40.10 अंक यानी 0.16 प्रतिशत टूटकर 24,395.85 पर बंद हुआ।

    बाजार में शुरुआती उतार-चढ़ाव के बाद कारोबार का रुख अपेक्षाकृत सीमित रहा। प्रमुख सूचकांकों में मामूली गिरावट के बावजूद मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में खरीदारी का रुझान दिखाई दिया। निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स 97.15 अंक यानी 0.15 प्रतिशत की बढ़त के साथ 64,121.55 पर बंद हुआ। वहीं निफ्टी स्मॉलकैप 100 इंडेक्स 53.45 अंक यानी 0.27 प्रतिशत बढ़कर 19,875 पर पहुंच गया।

    क्षेत्रीय सूचकांकों में निफ्टी इंडिया डिफेंस सबसे मजबूत प्रदर्शन करने वाले इंडेक्स में रहा और इसमें 1.55 प्रतिशत की बढ़त दर्ज हुई। निफ्टी रियल्टी में भी 0.97 प्रतिशत की तेजी रही। इसके अलावा एफएमसीजी, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, आईटी, कंजम्पशन, मीडिया, पीएसई और ऑटो से जुड़े शेयरों में भी सकारात्मक रुख देखने को मिला।

    दूसरी ओर निफ्टी मेटल, प्राइवेट बैंक, कमोडिटीज, ऑयल एंड गैस, फाइनेंशियल सर्विसेज और पीएसयू बैंक सूचकांकों में कमजोरी रही। इससे बाजार में अलग-अलग क्षेत्रों के बीच प्रदर्शन में अंतर दिखाई दिया और व्यापक स्तर पर निवेशकों का रुख पूरी तरह एकतरफा नहीं रहा।

    सेंसेक्स के प्रमुख शेयरों में इंडिगो, एनटीपीसी, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, एलएंडटी, हिंदुस्तान यूनिलीवर, इटरनल, टेक महिंद्रा, बजाज फिनसर्व, एशियन पेंट्स, ट्रेंट, एचसीएल टेक, आईटीसी, टीसीएस, बजाज फाइनेंस, कोटक महिंद्रा बैंक, सन फार्मा और एमएंडएम में बढ़त रही।

    इसके विपरीत आईसीआईसीआई बैंक, टाइटन, अल्ट्राटेक सीमेंट्स, इंफोसिस, टाटा स्टील, एचडीएफसी बैंक, मारुति सुजुकी और एक्सिस बैंक दबाव में रहे। इन शेयरों में कमजोरी का असर प्रमुख सूचकांकों पर भी दिखाई दिया।

    बाजार की धारणा को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में भारत और अमेरिका के महंगाई आंकड़े भी शामिल रहे। बाजार जानकारों के अनुसार, दोनों देशों में महंगाई के आंकड़े अपेक्षाओं से कम रहने के कारण निवेशकों को कुछ राहत मिली। इससे यह उम्मीद मजबूत हुई कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व और भारतीय रिजर्व बैंक निकट अवधि में मौद्रिक नीति को लेकर सतर्क और संयमित रुख अपना सकते हैं।

    हालांकि, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें भारतीय बाजार के लिए अभी भी महत्वपूर्ण जोखिम बनी हुई हैं। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है, इसलिए तेल कीमतों में लंबे समय तक तेजी का असर मुद्रास्फीति, व्यापार संतुलन और कंपनियों की लागत पर पड़ सकता है।

    मध्य पूर्व में जारी भू-राजनीतिक अनिश्चितता भी निवेशकों को जोखिम लेने से रोक रही है। इसके बावजूद कंपनियों के तिमाही नतीजों से घरेलू मांग और कॉरपोरेट प्रदर्शन को लेकर कुछ सकारात्मक संकेत मिले हैं। मजबूत कंपनियों के नतीजों ने बाहरी दबावों के प्रभाव को सीमित करने में मदद की है।

    आने वाले कारोबारी सत्रों में बाजार की दिशा कच्चे तेल की कीमतों, वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाक्रम, विदेशी निवेश के प्रवाह और केंद्रीय बैंकों की नीतिगत संकेतों से प्रभावित हो सकती है। फिलहाल प्रमुख सूचकांकों में सीमित गिरावट और मिडकैप-स्मॉलकैप में मजबूती यह संकेत देती है कि निवेशकों का रुख सतर्क होने के बावजूद पूरी तरह नकारात्मक नहीं है।

  • जियो फाइनेंशियल की बड़ी वैश्विक साझेदारी…. बैंक ऑफ अमेरिका से हुई ₹1,8000 करोड़ की डील

    जियो फाइनेंशियल की बड़ी वैश्विक साझेदारी…. बैंक ऑफ अमेरिका से हुई ₹1,8000 करोड़ की डील


    मुम्बई।
    मुकेश अंबानी (Mukesh Ambani) की जियो फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड (Jio Financial Services Limited) ने वित्तीय सेवा कारोबार को विस्तार देने के लिए बैंक ऑफ अमेरिका (Bank of America) के साथ बड़ी डील किया है। 12 अगस्त 2026 को हुए ज्वाइंट वेंचर एग्रीमेंट के तहत बैंक ऑफ अमेरिका की सहायक कंपनी NB Holdings, जियो क्रेडिट लिमिटेड में कुल 49.9 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल करेगी। इसके लिए बैंक ऑफ अमेरिका करीब 1.9 अरब डॉलर यानी लगभग ₹18,168 करोड़ का निवेश करेगा।इस डील से जियो क्रेडिट का वैल्यूएशन उसकी नेटवर्थ के करीब 2.5 गुना पर होता है। खास बात यह है कि जियो क्रेडिट को शुरू हुए अभी करीब दो साल ही हुए हैं।


    मुकेश अंबानी ने क्या कहा?

    मुकेश अंबानी ने कहा कि भारत को 2047 तक विकसित अर्थव्यवस्था बनाने के लिए ऐसा वित्तीय तंत्र जरूरी है, जो बड़े पैमाने पर काम करने के साथ भरोसेमंद और समावेशी हो। उन्होंने कहा कि जियो फाइनेंशियल तकनीक और बेहतर गवर्नेंस के जरिए भारतीयों के लिए वित्तीय सेवाओं को आसान बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। उनके मुताबिक बैंक ऑफ अमेरिका की वैश्विक विशेषज्ञता और जियो की डिजिटल पहुंच का मेल भारत में क्रेडिट की पहुंच बढ़ाने में मदद करेगा।


    पहले 26.5% हिस्सेदारी, फिर 49.9% तक पहुंच जाएगा निवेश

    समझौते के तहत एनबी होल्डिंग्स पहले प्रेफरेंशियल इश्यू के जरिए जियो क्रेडिट के 4.29 करोड़ इक्विटी शेयर खरीदेगी। इसके लिए करीब ₹6,613 करोड़ का भुगतान किया जाएगा। इससे बैंक ऑफ अमेरिका को शुरुआती तौर पर 26.50 प्रतिशत हिस्सेदारी मिलेगी।

    इसके बाद एनबी होल्डिंग्स 7.56 करोड़ वारंट के लिए करीब ₹11,655 करोड़ का निवेश करेगी। इन वारंट को 18 महीने के भीतर इक्विटी शेयरों में बदला जा सकेगा। वारंट के कन्वर्जन के बाद बैंक ऑफ अमेरिका की हिस्सेदारी बढ़कर 49.90 प्रतिशत हो जाएगी।


    महज 2 साल में खड़ा हो गया बहुत बड़ा कारोबार

    जियो क्रेडिट, जियो फाइनेंशियल सर्विसेज की NBFC कंपनी है। यह ग्राहकों को अलग-अलग तरह के कर्ज उपलब्ध कराती है। कंपनी ने बहुत कम समय में बड़ा कारोबार खड़ा किया है। करीब दो साल में इसका एसेट अंडर मैनेजमेंट ₹30,667 करोड़, यानी लगभग 3.2 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। कंपनी का फोकस डिजिटल तरीके से कर्ज उपलब्ध कराने और भारत में क्रेडिट की पहुंच बढ़ाने पर है।


    क्या रंग लाएगी यह साझेदारी

    इस साझेदारी का मकसद जियो फाइनेंशियल की भारत में मजबूत डिजिटल पहुंच और स्थानीय बाजार की समझ को बैंक ऑफ अमेरिका की वैश्विक वित्तीय विशेषज्ञता के साथ जोड़ना है। दोनों कंपनियां डिजिटल वित्तीय सेवाओं, नए क्रेडिट उत्पादों, रिस्कक मैनेजमेंट और ग्राहकों तक कर्ज की पहुंच बढ़ाने पर काम करेंगी।


    बोर्ड में दोनों कंपनियों की बराबर हिस्सेदारी
    डील के बाद जियो क्रेडिट के बोर्ड में जियो फाइनेंशियल सर्विसेज और बैंक ऑफ अमेरिका को बराबर प्रतिनिधित्व मिलेगा। हालांकि कंपनी की मौजूदा मैनेजमेंट टीम ही इसके रोजमर्रा के संचालन और रणनीति को आगे बढ़ाएगी। जियो क्रेडिट, जियो फाइनेंशियल सर्विसेज की वित्तीय रिपोर्टिंग में सहायक कंपनी के रूप में बनी रहेगी।


    बैंक ऑफ अमेरिका भी भारत को लेकर उत्साहित

    बैंक ऑफ अमेरिका के चेयरमैन और सीईओ ब्रायन मोयनिहान ने भारत को दुनिया के महत्वपूर्ण विकासशील बाजारों में से एक बताया। उन्होंने कहा कि जियो फाइनेंशियल ने सिर्फ दो वर्षों में उल्लेखनीय पैमाना हासिल किया है। बैंक ऑफ अमेरिका की वैश्विक पहुंच और डिजिटल विशेषज्ञता को जियो फाइनेंशियल के मार्केट पर पकड़ और ग्राहक आधार से जोड़ने से भारत में वित्तीय सेवाओं की पहुंच बढ़ाने में मदद मिल सकती है।