Category: Entertainment

  • साउथ सुपरस्टार चिरंजीवी की लाडली ने झेले जिंदगी के सबसे कड़े इम्तिहान: पहले पति की अचानक मौत और दूसरी शादी के टूटने की भावुक दास्तान

    साउथ सुपरस्टार चिरंजीवी की लाडली ने झेले जिंदगी के सबसे कड़े इम्तिहान: पहले पति की अचानक मौत और दूसरी शादी के टूटने की भावुक दास्तान

    नई दिल्ली । भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के सबसे प्रतिष्ठित और रसूखदार परिवारों में से एक, मेगास्टार चिरंजीवी के ‘कोनिडेला परिवार’ को हमेशा उनकी एकजुटता और सफलता के लिए जाना जाता है। हालांकि, इसी परिवार के मुख्य स्तंभ और ग्लोबल स्टार राम चरण की छोटी बहन श्रीजा कोनिडेला की व्यक्तिगत जिंदगी स्क्रीन पर दिखने वाली चमक-दमक से बिल्कुल उलट, भारी भावनात्मक संघर्षों और दुखों से भरी रही है। हाल ही में सोशल मीडिया पर सामने आए उनके कुछ भावुक बयानों के बाद, एक बार फिर उनकी जिंदगी के वे कड़वे पन्ने चर्चा में आ गए हैं, जिन्होंने उन्हें कम उम्र में ही गहरे मानसिक दर्द से गुजरने पर मजबूर कर दिया था।

    श्रीजा की जिंदगी का पहला बड़ा और विवादास्पद मोड़ तब आया जब वे महज 19 वर्ष की थीं। साल 2007 में उन्होंने अपने तत्कालीन बॉयफ्रेंड सिरीश भारद्वाज के साथ शादी करने के लिए अपने परिवार की मर्जी के खिलाफ जाकर घर से भागने का फैसला किया था। उस दौर में इस हाई-प्रोफाइल कदम ने पूरे दक्षिण भारतीय मीडिया और राजनीतिक गलियारों में भारी तहलका मचा दिया था। सुरक्षा कारणों से इस युवा जोड़े को कोर्ट का दरवाजा तक खटखटाना पड़ा था। इस शादी से श्रीजा ने एक बेटी को जन्म दिया, लेकिन कुछ ही वर्षों में उनके रिश्ते में कड़वाहट आ गई और उन्होंने सिरीश पर प्रताड़ना के गंभीर आरोप लगाते हुए कानूनी रूप से दूरी बना ली। बाद में, सिरीश भारद्वाज के अचानक हुए निधन ने श्रीजा को जिंदगी का पहला बड़ा झटका और दर्द दिया।

    इस दर्दनाक दौर से उबरने में उनके पिता चिरंजीवी और भाई राम चरण ने उनका पूरा साथ दिया और उन्हें वापस परिवार में ससम्मान शामिल किया। जीवन को एक नया मौका देने के उद्देश्य से, कोनिडेला परिवार ने साल 2016 में बेहद भव्य स्तर पर श्रीजा की दूसरी शादी का आयोजन किया। उनकी यह शादी उनके बचपन के दोस्त और बिजनेसमैन कल्याण देव के साथ हुई थी, जिसमें देश भर की बड़ी हस्तियों ने शिरकत की थी। शादी के बाद दोनों के घर एक बेटी का जन्म हुआ और कुछ समय तक सब कुछ बेहद सामान्य और खुशहाल नजर आ रहा था, जिससे प्रशंसकों को लगा कि श्रीजा की जिंदगी में अब स्थिरता आ चुकी है।

    हालांकि, किस्मत को कुछ और ही मंजूर था और श्रीजा की यह दूसरी शादी भी लंबे समय तक नहीं टिक सकी। शादी के कुछ साल बाद ही दोनों के बीच वैचारिक मतभेद इस कदर बढ़ गए कि उन्होंने एक-दूसरे से पूरी तरह दूरी बना ली। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से एक-दूसरे की तस्वीरें हटाने और उपनाम बदलने के बाद इस रिश्ते के टूटने की आधिकारिक पुष्टि भी हो गई। अपनी दूसरी शादी का भी इस तरह दर्दनाक और असमय अंत देखना श्रीजा के लिए एक बहुत बड़ा मानसिक आघात था, जिसने उन्हें भीतर तक झकझोर कर रख दिया था।

    मौजूदा समय में, दो शादियों के बेहद कड़वे और दर्दनाक अनुभवों से गुजरने के बाद श्रीजा पूरी तरह से एकांत में अपनी दोनों बेटियों की परवरिश कर रही हैं। एक सिंगल मदर के रूप में अपनी बेटियों के भविष्य को संवारने में जुटी श्रीजा ने हाल ही में अपने व्यक्तिगत दर्द को साझा करते हुए बताया था कि कैसे जीवन की इन कठिन परिस्थितियों ने उन्हें अंदर से मजबूत बनाया है। मुश्किल समय में उनका पूरा परिवार, विशेषकर उनके भाई राम चरण, एक मजबूत ढाल की तरह उनके साथ खड़े हैं, ताकि वे अपने जीवन के इस सबसे चुनौतीपूर्ण दौर से बाहर निकलकर एक नई और सकारात्मक शुरुआत कर सकें।

  • संगीतकारों की पहली और आखिरी उम्मीद थे स्वर कोकिला के हमसफर मोहम्मद रफी: जानिए कैसे बिना किसी पूर्व योजना के रच दिया था संगीत का नया इतिहास

    संगीतकारों की पहली और आखिरी उम्मीद थे स्वर कोकिला के हमसफर मोहम्मद रफी: जानिए कैसे बिना किसी पूर्व योजना के रच दिया था संगीत का नया इतिहास

    नई दिल्ली । भारतीय संगीत जगत के सुनहरे दौर में पार्श्वगायक मोहम्मद रफी एक ऐसे अनमोल रत्न थे, जिनकी आवाज का जादुई दायरा हर प्रकार के भावों और गीतों को खुद में समेटने की अद्भुत क्षमता रखता था। रफी साहब की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे जिस भी अभिनेता के लिए पर्दे पर पार्श्वगायन करते थे, उनकी आवाज हुबहू उस अभिनेता के हाव-भाव और अंदाज में ढल जाती थी। अस्सी और नब्बे के दशक से बहुत पहले, वर्ष 1964 में आई निर्देशक के. शंकर की कल्ट क्लासिक फिल्म ‘राजकुमार’ की रिकॉर्डिंग के दौरान रफी साहब ने अपनी गायकी का एक ऐसा ही अकल्पनीय करिश्मा दिखाया था, जिसने संगीत के इतिहास में एक नया पन्ना जोड़ दिया।

    इस ऐतिहासिक घटनाक्रम के बैकग्राउंड को समझें तो फिल्म ‘राजकुमार’ में शम्मी कपूर, साधना, पृथ्वीराज कपूर और प्राण जैसे दिग्गज कलाकार मुख्य भूमिकाओं में थे। फिल्म के संगीत निर्देशन की जिम्मेदारी उस दौर की सबसे सफल और कल्ट जोड़ी शंकर-जयकिशन के कंधों पर थी। इस फिल्म के गानों को सजाने के लिए मोहम्मद रफी के साथ लता मंगेशकर, आशा भोसले और सुमन कल्याणपुर जैसे महान गायकों को चुना गया था। शम्मी कपूर अपने गानों के फिल्मांकन और उनकी मेकिंग को लेकर हमेशा से बेहद गंभीर रहते थे, इसलिए वे अक्सर गानों की लाइव रिकॉर्डिंग के समय म्यूजिक स्टूडियो में खुद मौजूद रहा करते थे।

    इस फिल्म का एक विशेष और बेहद जोशीला गीत था— ‘दिलरुबा दिल पे तू सितम किए जाए’, जिसे मोहम्मद रफी और आशा भोसले को मिलकर गाना था। कहानी के दृश्य के अनुसार, रात के समय एक अस्तबल (तबेले) में कुछ लोग जश्न मना रहे थे और इसी पृष्ठभूमि के अनुरूप शंकर-जयकिशन ने गाने में बेहद अनूठे और भारी वाद्ययंत्रों का इस्तेमाल किया था। आशा भोसले ने अपने हिस्से की रिकॉर्डिंग पूरी सहजता से कर ली थी, जिसके बाद मोहम्मद रफी ने अपनी कड़क आवाज में ‘हम भी तो आग में जलते रहे’ पंक्ति के साथ गाने में शानदार एंट्री ली। गाना अपनी पूरी लय में आगे बढ़ रहा था कि तभी इसके अंतिम अंतरे में कुछ ऐसा हुआ जिसने सबको चौंका दिया।

    गीत की आखिरी पंक्तियों तक पहुंचते-पहुंचते मोहम्मद रफी ने संगीत की तय धुन से हटकर अचानक अपनी आवाज के स्केल और अंदाज को पूरी तरह से बदल दिया। उनके गले से निकली वह एकदम नई और अप्रत्याशित तान सुनकर रिकॉर्डिस्ट ने घबराकर संगीतकार शंकर-जयकिशन की तरफ देखा, लेकिन अनुभवी संगीतकारों ने तुरंत भांप लिया कि यह कोई गलती नहीं बल्कि एक महान कलाकार की रूहानी कला है और उन्होंने गाने को बिना रोके जारी रखने का इशारा किया। पास ही खड़ीं आशा भोसले भी रफी साहब के इस अचानक बदले और रौद्र-जोशीले अंदाज को देखकर पूरी तरह हैरान रह गईं।

    रिकॉर्डिंग का फाइनल कट पूरा होने के बाद स्टूडियो का माहौल पूरी तरह से बदल चुका था और वहां मौजूद हर व्यक्ति रफी साहब की इस अद्वितीय प्रतिभा की सराहना कर रहा था। तब सह-गायिका आशा भोसले ने राहत की सांस लेते हुए हल्के-फुल्के अंदाज में कहा था कि यह बेहद अच्छा हुआ कि रफी साहब ने यह चमत्कारी बदलाव उनके गाने के बाद किया, अन्यथा वे डरकर वहीं रुक जातीं। अमूमन माना जाता था कि रफी साहब तय धुनों में बहुत ज्यादा फेरबदल नहीं करते थे, लेकिन जब भी वे अपनी मर्जी से ऐसा करते थे, तो वह गाना मील का पत्थर बन जाता था। यही कारण था कि जब भी कोई कठिन गाना अन्य गायकों के वश का नहीं होता था, तब पूरी इंडस्ट्री आंख मूंदकर मोहम्मद रफी के पास ही पहुंचती थी।

  • जानिए क्यों आर माधवन के लिए आत्मघाती साबित हुआ था 'बी और सी' सेंटर्स को रिझाने का फॉर्मूला

    जानिए क्यों आर माधवन के लिए आत्मघाती साबित हुआ था 'बी और सी' सेंटर्स को रिझाने का फॉर्मूला

    नई दिल्ली । भारतीय सिनेमा जगत में अपनी बेहतरीन अदाकारी और चॉकलेटी बॉय की छवि से दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाने वाले अभिनेता आर माधवन आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। हाल ही में आई उनकी फिल्म ‘धुरंधर 2’ की शानदार व्यावसायिक सफलता और उसमें उनके अभिनय की चौतरफा तारीफ हो रही है। इस बड़ी कामयाबी के बीच, माधवन ने अपने करियर के उस शुरुआती और अंधकारमय दौर को याद किया है, जब उन्होंने दूसरों की सलाह मानकर फिल्म इंडस्ट्री के ‘थलाइवा’ यानी महानायक रजनीकांत के नक्शेकदम पर चलने की कोशिश की थी और उन्हें अपने जीवन के सबसे बड़े वित्तीय और व्यावसायिक संकट का सामना करना पड़ा था।

    एक मशहूर मीडिया प्लेटफॉर्म को दिए इंटरव्यू में अपने पुराने दिनों को याद करते हुए आर माधवन ने बताया कि जब वे साउथ फिल्म इंडस्ट्री में पैर जमाने की कोशिश कर रहे थे, तब कई कथित विशेषज्ञों और शुभचिंतकों ने उन्हें करियर को लेकर एक विशेष सलाह दी थी। उन लोगों का कहना था कि यदि माधवन को दक्षिण भारत का असली सुपरस्टार बनना है, तो उन्हें केवल शहरी दर्शकों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। सलाहकारों के मुताबिक, जब तक कोई अभिनेता ‘बी और सी’ सेंटर्स यानी ग्रामीण इलाकों और छोटे कस्बों के दर्शकों के बीच अपनी पैठ नहीं बनाता और वहां के लोग उसे स्वीकार नहीं करते, तब तक वह रजनीकांत जैसा बड़ा मुकाम हासिल नहीं कर सकता।

    इस तरह के आंकड़ों और सलाहों के दबाव में आकर माधवन ने अपनी स्वाभाविक शैली के विपरीत जाकर एक ऐसी फिल्म साइन कर ली, जो पूरी तरह ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित थी। इस फिल्म में उन्होंने एक ऐसे अनपढ़, बेहद गरीब और कमजोर ग्रामीण युवक की भूमिका निभाई थी जिसके पास खाने के भी लाले थे, लेकिन वह एक पेशेवर क्रिकेटर बनने का सपना देखता था। माधवन के करियर का यह प्रयोग बॉक्स ऑफिस पर इतनी बुरी तरह से पिटा कि फिल्म अपनी लागत निकालना तो दूर, इतिहास की सबसे बड़ी फ्लॉप फिल्मों में शुमार हो गई। इस फिल्म के डूबने का खामियाजा इतना बड़ा था कि फिल्म का निर्माण करने वाले पूरे प्रोडक्शन स्टूडियो को हमेशा के लिए अपना ताला बंद करना पड़ गया था।

    इस बेहद दर्दनाक और अप्रत्याशित विफलता पर बात करते हुए माधवन ने बेहद ईमानदारी से स्वीकार किया कि वह उनके जीवन की सबसे बड़ी भूल थी। उन्होंने कहा कि फिल्म के इस महाडिजास्टर ने उनके चेहरे पर एक जोरदार थप्पड़ की तरह काम किया, जिसने उन्हें गहरे अवसाद से निकालकर हकीकत का आईना दिखाया। माधवन के अनुसार, उन्हें यह अच्छी तरह समझ आ गया था कि उन्हें किसी दूसरे सुपरस्टार की नकल करने के बजाय अपनी खुद की मौलिकता और पहचान पर भरोसा करना चाहिए था। उन्होंने कहा कि सलाह देने वाले लोग अपने नजरिए से सही हो सकते थे, लेकिन उनकी गलती यह थी कि उन्होंने बिना सोचे-समझे उस फॉर्मूले को हूबहू अपने ऊपर लागू कर लिया था।

    इस बड़े झटके के बाद माधवन ने सबक लिया और दूसरों की तरह बनने की अंधी दौड़ से खुद को पूरी तरह बाहर कर लिया। उन्होंने इसके बाद अपनी खुद की अनूठी शैली विकसित की और ‘बी और सी’ सेंटर्स के लिए भी ऐसी फिल्मों का चयन किया जो उनके अपने व्यक्तित्व को सूट करती थीं। इस साक्षात्कार में माधवन ने अपनी व्यक्तिगत जिंदगी पर भी खुलकर बात की और मजाकिया अंदाज में बताया कि कैसे वे अपनी पत्नी सरिता के साथ पिछले 27 वर्षों से एक खुशहाल वैवाहिक जीवन जी रहे हैं। उन्होंने हंसते हुए कहा कि वे एक सीधे-साधे मिडिल क्लास मद्रासी आदमी हैं और उनकी पत्नी के पास उनके फोन से लेकर ईमेल और बैंक खातों तक का पूरा एक्सेस रहता है, इसलिए उनसे कुछ भी छिपा पाना नामुमकिन है।

  • मेगास्टार राम चरण संग इंटीमेट सीन को लेकर चर्चा में आईं जाह्नवी कपूर: दक्षिण भारतीय सिनेमा के इस बड़े प्रोजेक्ट के लीक वीडियो ने इंटरनेट पर मचाया तहलका

    मेगास्टार राम चरण संग इंटीमेट सीन को लेकर चर्चा में आईं जाह्नवी कपूर: दक्षिण भारतीय सिनेमा के इस बड़े प्रोजेक्ट के लीक वीडियो ने इंटरनेट पर मचाया तहलका

    नई दिल्ली । दक्षिण भारतीय और हिंदी सिनेमा के बीच बढ़ते तालमेल के इस दौर में बड़ी पैन-इंडिया फिल्मों को लेकर दर्शकों में भारी उत्साह रहता है, लेकिन कई बार ये फिल्में अपनी रिलीज से पहले ही विवादों में भी घिर जाती हैं। ऐसा ही कुछ सुपरस्टार राम चरण और बॉलीवुड अभिनेत्री जाह्नवी कपूर की आगामी बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘पेद्दी’ के साथ होता हुआ नजर आ रहा है। इस फिल्म के सेट से एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील रोमांटिक दृश्य का वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर लीक हो गया है, जिसने इंटरनेट जगत में आते ही तहलका मचा दिया है और फिल्म को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है।

    लीक हुए इस वीडियो क्लिप में फिल्म के मुख्य कलाकार राम चरण और जाह्नवी कपूर के बीच एक बेहद इंटीमेट और लिपलॉक सीन फिल्माया गया है। जैसे ही यह क्लिप विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर वायरल हुई, वैसे ही दर्शकों और फिल्म समीक्षकों की इस पर तीखी प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गईं। इस दृश्य के वायरल होने के बाद सबसे ज्यादा चर्चा दोनों कलाकारों के बीच वास्तविक जीवन में मौजूद उम्र के बड़े फासले को लेकर हो रही है, जिसने सिनेप्रेमियों को दो अलग-अलग धड़ों में बांट दिया है।

    यदि दोनों कलाकारों की उम्र के समीकरण पर नजर डालें, तो वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना चुके अभिनेता राम चरण की उम्र इस समय जाह्नवी कपूर से लगभग 12 साल अधिक है। सोशल मीडिया पर ट्रोलर्स और आलोचकों ने इसी आयु अंतराल को मुद्दा बनाते हुए फिल्म के निर्देशक प्रशांत नील और मेकर्स को अपने निशाने पर लिया है। कई यूजर्स का मानना है कि इतनी कम उम्र की अभिनेत्री के साथ स्क्रीन पर इस तरह के अत्यधिक रोमांटिक और इंटीमेट दृश्य फिल्माना कहानी की मांग से ज्यादा व्यावसायिक लाभ उठाने का एक प्रयास प्रतीत होता है।

    दूसरी तरफ, राम चरण और जाह्नवी कपूर के वफादार प्रशंसकों का एक बड़ा वर्ग इस आलोचना के खिलाफ आकर अपने पसंदीदा सितारों के समर्थन में खड़ा हो गया है। प्रशंसकों का तर्क है कि सिनेमा एक रचनात्मक माध्यम है जहां कलाकार केवल अपने किरदारों को पर्दे पर जीवंत करते हैं, इसलिए अभिनय के क्षेत्र में उम्र के अंतर को कोई बाधा या मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए। कई प्रशंसकों ने इस बात पर भी जोर दिया है कि लीक हुए दृश्यों में दोनों कलाकारों के बीच की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री बेहद शानदार और प्रभावशाली नजर आ रही है, जो फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।

    इस पूरे विवाद के बीच, फिल्म ‘पेद्दी’ के निर्माताओं और तकनीकी टीम के लिए शूटिंग सेट से इस तरह का मुख्य और गोपनीय दृश्य लीक होना एक बड़ी सुरक्षा चूक और चिंता का सबब बन गया है। प्रशांत नील के निर्देशन में बन रही इस बड़े बजट की पैन-इंडिया एक्शन-ड्रामा फिल्म से मेकर्स को भारी व्यावसायिक उम्मीदें हैं। इस लीक वीडियो और उसके बाद पैदा हुए विवाद को देखते हुए प्रोडक्शन हाउस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से उस कॉपीराइटेड वीडियो क्लिप को हटाने की कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी है, ताकि फिल्म के सस्पेंस और दर्शकों के उत्साह को बरकरार रखा जा सके।

  • काहिरा हवाई अड्डे पर जब उमड़ा था 'महानायक' के प्रशंसकों का जनसैलाब: खुद अमिताभ बच्चन ने 1991 के उस दौर को बताया था 'राष्ट्रीय संकट'

    काहिरा हवाई अड्डे पर जब उमड़ा था 'महानायक' के प्रशंसकों का जनसैलाब: खुद अमिताभ बच्चन ने 1991 के उस दौर को बताया था 'राष्ट्रीय संकट'

    नई दिल्ली । बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन की लोकप्रियता केवल भारत की सीमाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उनके प्रशंसकों की संख्या करोड़ों में है। अस्सी के दशक में जब इंटरनेट और सोशल मीडिया का नामोनिशान नहीं था, तब भी सात समंदर पार मिडिल ईस्ट के देशों में उनकी दीवानगी चरम पर थी। विशेष रूप से मिस्र यानी इजिप्ट में अमिताभ बच्चन को लेकर ऐसा असाधारण क्रेज देखा गया कि वहां की तात्कालिक सरकार के लिए यह चिंता का विषय बन गया था और अंततः उन्हें एक बड़ा प्रशासनिक कदम उठाना पड़ा था।

    साल 1980 के दौर में मिस्र के सिनेमाघरों में जब भी अमिताभ बच्चन की कोई फिल्म लगती थी, तो टिकट खिड़कियों पर मील लंबी लाइनें लग जाती थीं। इस अभूतपूर्व दीवानगी का सीधा नुकसान मिस्र के स्थानीय फिल्म उद्योग को उठाना पड़ रहा था क्योंकि वहां के क्षेत्रीय सिनेमाघरों में दर्शकों की भारी कमी हो गई थी और सन्नाटा पसरने लगा था। अपनी घरेलू फिल्म इंडस्ट्री को मंदी से उबारने और उसे संरक्षण देने के उद्देश्य से मिस्र की सरकार ने एक कड़ा आर्थिक और सांस्कृतिक फैसला लेते हुए अमिताभ बच्चन की फिल्मों के प्रदर्शन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया था।

    इस सरकारी प्रतिबंध के बावजूद वहां के आम नागरिकों के दिलों से अमिताभ बच्चन का जादू कम नहीं किया जा सका। मिस्र के लोग उनकी फिल्में देखने के लिए नए-नए रास्ते निकालने लगे और वहां के छोटे-छोटे निजी थिएटरों व बंद कमरों में चोरी-छिपे इन फिल्मों का प्रदर्शन किया जाने लगा। उस दौर में जिन लोगों के पास फिल्में देखने के साधन या टेप रिकॉर्डर उपलब्ध नहीं थे, वे हर गुरुवार को स्थानीय कैफे में बड़ी संख्या में एकत्र होते थे और केवल अमिताभ बच्चन की फिल्मों के ऑडियो गाने सुनकर ही अपनी दीवानगी पूरी किया करते थे। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि मिस्र की एक स्थानीय फिल्म में अमिताभ बच्चन की सुपरहिट फिल्म ‘गिरफ्तार’ के एक मुख्य दृश्य को हूबहू कॉपी किया गया था।

    मिस्र में अमिताभ बच्चन के इस दबदबे का सबसे बड़ा नजारा साल 1991 में देखने को मिला जब वे काहिरा इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में हिस्सा लेने के लिए अफ्रीकी महाद्वीप पहुंचे थे। काहिरा हवाई अड्डे पर उनके स्वागत और एक झलक पाने के लिए इतनी विशाल और बेकाबू भीड़ उमड़ पड़ी कि वहां की सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो गई थी। हवाई अड्डे से लेकर शहर की सड़कों तक हालात इस कदर बेकाबू हो गए थे कि खुद अमिताभ बच्चन ने बाद में अपने एक साक्षात्कार में उस माहौल को एक ‘राष्ट्रीय संकट’ जैसी स्थिति के रूप में याद किया था।

    जिस देश की सरकार ने कभी अपनी स्थानीय फिल्म इंडस्ट्री के अस्तित्व को बचाने के लिए अमिताभ बच्चन की फिल्मों को प्रतिबंधित कर दिया था, उसी देश को आखिरकार वैश्विक कला और उनके अभिनय के सामने नतमस्तक होना पड़ा। इस ऐतिहासिक दीवानगी और सांस्कृतिक प्रभाव को स्वीकार करते हुए मिस्र सरकार ने साल 2001 में अमिताभ बच्चन को आधिकारिक तौर पर आमंत्रित किया। वहां उन्हें सिनेमा जगत के सर्वोच्च सम्मानों में से एक ‘एक्टर ऑफ द सेंचुरी’ के खिताब से नवाजा गया, जो यह साबित करता है कि कला को किसी भी देश की भौगोलिक और प्रशासनिक सीमाओं में कैद नहीं किया जा सकता।

  • बॉक्स ऑफिस पर जब 'पार्टनर' ने मचाया था कोहराम: 28 करोड़ के बजट में 100 करोड़ कमाकर सलमान और गोविंदा के डूबते करियर को मिला था नया जीवन

    बॉक्स ऑफिस पर जब 'पार्टनर' ने मचाया था कोहराम: 28 करोड़ के बजट में 100 करोड़ कमाकर सलमान और गोविंदा के डूबते करियर को मिला था नया जीवन

    नई दिल्ली । भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो न सिर्फ बॉक्स ऑफिस के समीकरण बदलती हैं, बल्कि डूबते हुए सितारों के करियर को भी एक नया जीवनदान दे देती हैं। वर्ष 2007 में रिलीज हुई निर्देशक डेविड धवन की फिल्म ‘पार्टनर’ को आज भी एक ऐसी ही कल्ट कॉमेडी फिल्म के रूप में याद किया जाता है। इस फिल्म ने न केवल दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया, बल्कि उस दौर में बॉक्स ऑफिस पर संघर्ष कर रहे बॉलीवुड के दो दिग्गज अभिनेताओं, सलमान खान और गोविंदा के स्टारडम को फिल्म इंडस्ट्री में दोबारा मजबूती से स्थापित किया।

    यदि उस दौर के परिदृश्य पर नजर डालें तो नब्बे के दशक में सिनेमाई पर्दे पर राज करने वाले गोविंदा का करियर बेहद चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा था। सक्रिय राजनीति में कदम रखने के कारण उनका अभिनय से ध्यान भटक गया था और उनकी लगातार कई फिल्में बॉक्स ऑफिस पर असफल साबित हुई थीं। फिल्म इंडस्ट्री उन्हें लगभग बिसरा चुकी थी। दूसरी तरफ, सलमान खान की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं थी। इस फिल्म के प्रदर्शन से ठीक पहले आई उनकी बड़े बजट की फिल्में जैसे ‘सलाम-ए-इश्क’, ‘जान-ए-मन’, ‘सांवरिया’ और ‘मैरीगोल्ड’ दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचने में नाकाम रही थीं। ऐसे नाजुक मोड़ पर दोनों ही कलाकारों को एक बड़ी व्यावसायिक सफलता की सख्त दरकार थी।

    निर्देशक डेविड धवन ने इस भांपते हुए महज 28 करोड़ रुपये के सीमित बजट में ‘पार्टनर’ का निर्माण किया। फिल्म ने सिनेमाघरों में आते ही बॉक्स ऑफिस पर ऐसा तहलका मचाया कि पहले ही सप्ताह में घरेलू बाजार में 30 करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर लिया। यह उस समय के भारतीय सिनेमाई इतिहास की दूसरी सबसे बड़ी डोमेस्टिक ओपनिंग दर्ज कराने वाली फिल्म बनी। दुनिया भर के बॉक्स ऑफिस पर इस फिल्म ने कुल 103 करोड़ रुपये से अधिक की शानदार कमाई की। इस ऐतिहासिक सफलता के लिए सलमान खान को जहां 15 करोड़ रुपये की भारी-भरकम फीस दी गई थी, वहीं उनके जोड़ीदार बने गोविंदा को 4 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया था।

    व्यावसायिक सफलता के बीच इस फिल्म की कहानी को लेकर एक बड़ा विवाद भी खड़ा हुआ था। दरअसल, ‘पार्टनर’ की पूरी पटकथा वर्ष 2005 में आई हॉलीवुड की सुपरहिट फिल्म ‘हिच’ से प्रेरित थी, जिसमें विल स्मिथ ने एक लव गुरु की भूमिका निभाई थी। चूंकि भारतीय निर्माताओं ने हॉलीवुड फिल्म के आधिकारिक रीमेक राइट्स नहीं खरीदे थे, इसलिए ‘हिच’ की निर्माता कंपनी सोनी पिक्चर्स एंटरटेनमेंट ने ‘पार्टनर’ के मेकर्स पर 30 मिलियन डॉलर का कानूनी मुकदमा ठोकने की तैयारी कर ली थी। इस बड़े अंतरराष्ट्रीय कानूनी विवाद को कोर्ट पहुंचने से पहले ही आपसी सहमति से सुलझा लिया गया, जिसके तहत सोनी पिक्चर्स को इस फिल्म के वर्ल्डवाइड एक्सक्लूसिव सैटेलाइट ब्रॉडकास्टिंग राइट्स हमेशा के लिए सौंप दिए गए।

    फिल्म की सफलता में इसके संगीत का भी बहुत बड़ा योगदान था, जिसे संगीतकार जोड़ी साजिद-वाजिद ने तैयार किया था। फिल्म का मुख्य गीत ‘सोनी दी नखरे’ आज भी विवाह समारोहों और पार्टियों की मुख्य पसंद बना हुआ है। बेहद दिलचस्प बात यह है कि यह गाना वर्ष 1989 के मशहूर विदेशी ट्रैक ‘पंप अप द जैम’ से प्रेरित था। गोविंदा नब्बे के दशक में अपने अंतरराष्ट्रीय दौरों और स्टेज शोज के दौरान अक्सर इसी मूल अंग्रेजी गाने पर नृत्य किया करते थे। सालों बाद उन्हें उसी धुन के हिंदी रूपांतरण पर बड़े पर्दे पर थिरकने का मौका मिला, जिसने उनके इस कमबैक को भारतीय दर्शकों के लिए हमेशा-कहा के लिए यादगार बना दिया।

  • 100 करोड़ के क्लब में शामिल होने वाले देश के टॉप-7 फिल्म निर्देशकों की सूची आई सामने, जादुई आंकड़े से बदली फिल्म इंडस्ट्री की दशा

    100 करोड़ के क्लब में शामिल होने वाले देश के टॉप-7 फिल्म निर्देशकों की सूची आई सामने, जादुई आंकड़े से बदली फिल्म इंडस्ट्री की दशा

    नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा के बदलते स्वरूप और बढ़ती पहुंच के बीच बॉक्स ऑफिस पर कमाई के नए रिकॉर्ड स्थापित हो रहे हैं। बॉलीवुड से लेकर साउथ सिनेमा तक, आज के दौर में फिल्मों की सफलता का सबसे बड़ा पैमाना 100 करोड़ रुपये के क्लब में शामिल होना बन चुका है। इस जादुई और प्रतिष्ठित आंकड़े को सबसे ज्यादा बार छूने का महा-रिकॉर्ड एक्शन फिल्मों के बेताज बादशाह कहे जाने वाले निर्देशक रोहित शेट्टी के नाम दर्ज हो चुका है। रोहित शेट्टी ने अपनी बैक-टू-बैक सुपरहिट कमर्शियल फिल्मों के दम पर एसएस राजामौली और राजकुमार हिरानी जैसे धुरंधर निर्देशकों को भी संख्या के मामले में पीछे छोड़ दिया है।

    फिल्म निर्देशन की दुनिया में रोहित शेट्टी की शैली को सबसे सुरक्षित और बॉक्स ऑफिस फ्रेंडली माना जाता है। अपनी खास एक्शन और कॉमेडी फिल्मों के लिए मशहूर रोहित शेट्टी के करियर में अब तक 10 से ज्यादा ऐसी फिल्में आ चुकी हैं, जिन्होंने घरेलू बाजार में 100 करोड़ रुपये से अधिक की शानदार कमाई की है। उनके इस अनूठे रिकॉर्ड के आसपास फिलहाल इंडस्ट्री का कोई दूसरा निर्देशक नजर नहीं आता है, जो यह दर्शाता है कि दर्शकों की नब्ज पर उनकी पकड़ कितनी मजबूत है।

    इस सूची में दूसरे पायदान पर गंभीर विषयों को बेहद हल्के-फुल्के और मनोरंजक अंदाज में पेश करने वाले निर्देशक राजकुमार हिरानी का नाम आता है। ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’, ‘3 इडियट्स’, ‘पीके’ और ‘संजू’ जैसी कालजयी फिल्में देने वाले राजकुमार हिरानी ने अब तक 5 फिल्में ऐसी दी हैं, जिन्होंने 100 करोड़ रुपये के आंकड़े को पार किया है। हिरानी की फिल्मों की खासियत यह है कि वे न केवल कमाई के रिकॉर्ड तोड़ती हैं, बल्कि समाज को एक बड़ा संदेश भी देती हैं।

    कमाई के इस हाई-प्रोफाइल मुकाबले में तीसरे नंबर पर एक्शन और स्पाई थ्रिलर फिल्मों के विशेषज्ञ सिद्धार्थ आनंद का कब्जा है। ‘वॉर’, ‘पठान’ और ‘किंग’ जैसी मेगा-बजट और भव्य स्तर की एक्शन फिल्में बनाने वाले सिद्धार्थ आनंद के खाते में भी 4 से 5 ऐसी फिल्में शामिल हैं, जिन्होंने बॉक्स ऑफिस पर 100 करोड़ रुपये से कहीं ज्यादा का कलेक्शन दर्ज कराया है। उनके बाद चौथे नंबर पर निर्देशक आदित्य धर का नाम आता है, जिन्होंने हिंदी सिनेमा में देशप्रेम और युद्ध पर आधारित दमदार फिल्में बनाकर इतिहास रचा है और उनके खाते में भी 5 से अधिक 100 करोड़ क्लब की फिल्में दर्ज हैं।

    इस सूची में साउथ सिनेमा के दिग्गज निर्देशक सुकुमार भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराते हैं, जिनकी ‘आर्या’ और वैश्विक स्तर पर तहलका मचाने वाली ‘पुष्पा’ जैसी फिल्मों ने 100 करोड़ रुपये का कलेक्शन आसानी से पार किया है। वहीं हिंदी सिनेमा के हॉरर-कॉमेडी जॉनर को नया जीवन देने वाले निर्देशक अमर कौशिक भी ‘भेड़िया’ और ‘स्त्री 2’ जैसी सुपरहिट फिल्मों के साथ इस एलीट क्लब का हिस्सा बने हुए हैं। सूची के अंतिम छोर पर वैश्विक स्तर पर भारत का नाम चमकाने वाले निर्देशक एसएस राजामौली का नाम है, जिन्होंने ‘बाहुबली’ और ‘आरआरआर’ जैसी कल्ट फिल्मों के जरिए न केवल 100 करोड़ बल्कि हजारों करोड़ की कमाई का नया इतिहास रचा है।

  • फिल्म 'तीसरी कसम' के सदाबहार गीत 'चलत मुसाफिर' का गहरा दर्शन, मौज-मस्ती के पीछे छिपी है एक कलावंती की बेबसी

    फिल्म 'तीसरी कसम' के सदाबहार गीत 'चलत मुसाफिर' का गहरा दर्शन, मौज-मस्ती के पीछे छिपी है एक कलावंती की बेबसी

    नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ गीतों को उनके मूल संदर्भ से अलग केवल मनोरंजन के दृष्टिकोण से देखा जाता रहा है, जबकि उनके पीछे गहरे सामाजिक सरोकार छिपे होते हैं। ऐसा ही एक कालजयी उदाहरण वर्ष 1966 में प्रदर्शित निर्देशक बासु भट्टाचार्य की फिल्म ‘तीसरी कसम’ का लोकगीत ‘चलत मुसाफिर मोह लिया रे’ है। रेडियो के जमाने से लेकर आधुनिक रीमिक्स और रील्स के दौर तक इस गीत की धुन पर लोग झूमते आ रहे हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस हंसते-गाते ट्रैक के पीछे एक स्त्री की बेबसी और सामाजिक विडंबना का मर्मस्पर्शी ताना-बाना बुना गया है।

    प्रसिद्ध गीतकार और इस फिल्म के निर्माता शैलेंद्र द्वारा रचित यह गीत फणीश्वरनाथ रेणु की कालजयी कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ पर आधारित फिल्म का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है। बॉक्स ऑफिस पर असफल रहने के बावजूद इस फिल्म के गानों को आज भी संगीत की धरोहर माना जाता है। इस विशेष गीत में प्रयुक्त ‘पिंजड़े वाली मुनिया’ का सीधा संबंध फिल्म की मुख्य नायिका हीराबाई के जीवन से है, जिसका किरदार अभिनेत्री वहीदा रहमान ने निभाया था। हीराबाई एक नौटंकी कलाकार है, जिसकी कला पर पूरा समाज फिदा है, लेकिन जब उसे अपनाने की बात आती है, तो वही समाज पीछे हट जाता है।

    फिल्म की कहानी के अनुसार, राज कपूर द्वारा अभिनीत हीरामन नाम का एक सीधा-सादा बैलगाड़ी चालक अनजाने में एक नौटंकी डांसर को अपनी गाड़ी में बिठा लेता है। यात्रा के दौरान दोनों के बीच एक गहरा आत्मीय रिश्ता पनपने लगता है, लेकिन मेले में पहुंचने पर जब हीरामन को हीराबाई के पेशे की असलियत और समाज द्वारा उसे वेश्या जैसी नजरों से देखने का पता चलता है, तो वह टूट जाता है। वह हीराबाई को यह काम छोड़ने की सलाह देता है, परंतु अपनी मजबूरियों के चलते वह ऐसा नहीं कर पाती, जिसके बाद हीरामन जीवन की ‘तीसरी कसम’ खाता है कि वह कभी किसी नौटंकी वाली को अपनी गाड़ी में नहीं बिठाएगा।

    इसी पृष्ठभूमि में ‘पिंजड़े वाली मुनिया’ शब्द उस नाचने वाली महिला का प्रतीक बनकर उभरता है, जो अपनी कला से हर राहगीर और मुसाफिर का मन तो मोह लेती है, लेकिन खुद एक अदृश्य पिंजरे में कैद रहने को अभिशप्त है। गीत के अंतर्निहित अर्थ में समाज के दोहरे मापदंडों पर तीखा प्रहार किया गया है। गीत के बोलों में बताया गया है कि वह मुनिया जब हलवाई की दुकान पर जाती है या पनवाड़ी के पास जाती है, तो हर कोई उसके रस और आकर्षण में डूब जाना चाहता है। हर वर्ग का पुरुष उसके मोहपाश में बंधने को तैयार है, लेकिन उसे अपनी गृहस्थी या सम्मानजनक जीवन का हिस्सा बनाने का साहस किसी में नहीं होता।

    शैलेंद्र ने बेहद चतुराई से एक बेहद चुलबुली लोकधुन का सहारा लेकर उस दौर की कलावंती और नौटंकी महिलाओं की उस नियति को उजागर किया था, जो जिंदगी भर दर्शकों की तालियों के पिंजरे में घुटती रहती थीं। आज के दौर में जब इस गाने की तर्ज पर नए रीमिक्स बनाए जा रहे हैं, तब इस गाने के वास्तविक साहित्यिक और सामाजिक अर्थ को समझना सिनेमा और समाज के अंतर्संबंधों को देखने का एक नया नजरिया प्रदान करता है। यह गीत केवल नाचने-गाने का जरिया नहीं, बल्कि एक मूक विलाप है जिसे उत्सव की तरह गाया जाता रहा है।

  • सरहद पार के संगीत का डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर जलवा, यूट्यूब और स्पॉटिफाई पर करोड़ों व्यूज बटोर रहे इंडिपेंडेंट सिंगल्स

    सरहद पार के संगीत का डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर जलवा, यूट्यूब और स्पॉटिफाई पर करोड़ों व्यूज बटोर रहे इंडिपेंडेंट सिंगल्स

    नई दिल्ली। सोशल मीडिया के इस दौर में संगीत की कोई सीमा नहीं रह गई है और यही वजह है कि इंस्टाग्राम रील्स पर रोजाना जिन गानों पर करोड़ों लोग शॉर्ट वीडियो बना रहे हैं, उनमें से अधिकांश गानों का कनेक्शन सरहद पार से है। भारतीय यूजर्स अक्सर जिन भावुक या रोमांटिक धुनों को देश का समझकर अपनी रील्स में इस्तेमाल करते हैं, वे असल में पाकिस्तान के उभरते हुए इंडी-पॉप कलाकारों की रचनाएं हैं। आज के समय में इंटरनेट और म्यूजिक स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स ने दोनों देशों के संगीत प्रेमियों को एक अनूठे धागे में पिरो दिया है।

    डिजिटल दुनिया में इस वक्त शेहरयार रेहान और जोहा वसीम का गाना ‘मजबूर’ यानी ‘आपका ही कहना बनता’ जबरदस्त तरीके से ट्रेंड कर रहा है। यूट्यूब पर 65 मिलियन से अधिक व्यूज बटोर चुका यह एक स्वतंत्र सिंगल ट्रैक है, जो दिल टूटने और बेबसी के अहसास को बेहद खूबसूरती से बयां करता है। इस गाने के बोल और इसकी धीमी धुन ने भारतीय रील्स क्रिएटर्स को अपनी ओर आकर्षित किया है, जिसके चलते लोग इसे भारतीय संगीत उद्योग का हिस्सा मान बैठते हैं।

    इसी तरह अन्नुरल खालिद और मानू का दर्द भरा गाना ‘झोल’ यूट्यूब पर 571 मिलियन से भी ज्यादा व्यूज हासिल कर चुका है। पाकिस्तान की मशहूर आर-एंड-बी सिंगर अन्नुरल और रैपर मानू का यह नॉन-फिल्मी गाना युवाओं के बीच इस कदर लोकप्रिय है कि इसकी पंक्तियां हर दूसरी रील में सुनाई दे जाती हैं। इसके साथ ही अली सूमरो और अफ्यूजिक का गाना ‘पल पल जीना मुहाल’ भी इंटरनेट पर छाया हुआ है। इस गाने को लेकर भारतीय श्रोताओं में अक्सर यह भ्रम रहता है कि इसे गायक तलविंदर ने गाया है, जबकि इसके मूल निर्माता पाकिस्तान के नए जमाने के कलाकार हैं।

    अब्दुल हन्नान और रोवालियो का गाना ‘इरादे’ भी इस सूची में एक कल्ट हिट बनकर उभरा है, जिसने 125 मिलियन से अधिक व्यूज हासिल किए हैं। सिंपल अकॉस्टिक संगीत और मखमली आवाज के कॉम्बिनेशन वाले इस गाने का इस्तेमाल लोग अपने प्यार का इजहार करने के लिए धड़ल्ले से कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, एक अनोखे क्रॉस-बॉर्डर कोलैबोरेशन के तहत हसन रहीम, उमेर और भारत के तलविंदर का हिप-हॉप ट्रैक ‘विशेस’ भी 134 मिलियन से ज्यादा व्यूज के साथ रील्स पर तहलका मचा रहा है।

    इसके अलावा, पाकिस्तानी टेलीविजन सीरियल्स के टाइटल ट्रैक्स और वहां के पॉप स्टार्स का जादू भी भारतीय दर्शकों के सिर चढ़कर बोल रहा है। असीम अजहर का गाया हुआ ‘कैसी दिल लगी है तू’ का स्लो इंटरनेट वर्जन, जिसे विजार्डो ने रीमिक्स किया है, इन दिनों काफी सुना जा रहा है। साथ ही असीम अजहर का ही भावुक सिंगल ट्रैक ‘जो तू ना मिला’, जिसे भारतीय म्यूजिक लेबल के तहत रिलीज किया गया था, वह भी एकतरफा प्यार के दर्द को दर्शाने के कारण रील्स का एक पसंदीदा ट्रैक बना हुआ है। यह ट्रेंड साफ दिखाता है कि मौजूदा दौर में फिल्मों से इतर इंडिपेंडेंट सिंगल्स का चलन काफी बढ़ गया है।

  • एक फिल्म, 9 किरदार और चौंकाने वाली भविष्यवाणी! बॉलीवुड स्टार की कहानी है बेहद दिलचस्प

    एक फिल्म, 9 किरदार और चौंकाने वाली भविष्यवाणी! बॉलीवुड स्टार की कहानी है बेहद दिलचस्प



    नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा के इतिहास में कई ऐसे कलाकार हुए हैं जिन्होंने अपनी प्रतिभा से अभिनय की परिभाषा बदल दी। उनमें से एक नाम है Sanjeev Kumar। संजीव कुमार सिर्फ एक अभिनेता नहीं थे, बल्कि वे अभिनय की ऐसी पाठशाला थे, जिनके किरदार आज भी दर्शकों के दिलों में जीवित हैं। चाहे फिल्म ‘शोले’ में ठाकुर बलदेव सिंह का किरदार हो या फिर गंभीर और भावनात्मक भूमिकाएं, उन्होंने हर बार अपने अभिनय से दर्शकों को प्रभावित किया।

    बॉलीवुड में डबल और ट्रिपल रोल निभाने वाले कलाकारों की लंबी सूची रही है। कई सितारों ने एक ही फिल्म में दो या तीन किरदार निभाकर दर्शकों का मनोरंजन किया है। लेकिन संजीव कुमार ने वह कर दिखाया जो उनके दौर में किसी अन्य अभिनेता ने नहीं किया था। वर्ष 1974 में रिलीज हुई Naya Din Nai Raat में उन्होंने पूरे नौ अलग-अलग किरदार निभाए और अभिनय की नई मिसाल कायम कर दी।

    इस फिल्म में उनके साथ Jaya Bhaduri मुख्य भूमिका में थीं। फिल्म की कहानी एक युवती सुषमा के इर्द-गिर्द घूमती है, जो शादी से बचने के लिए घर छोड़ देती है। इसके बाद उसकी जिंदगी में अलग-अलग तरह के लोगों का सामना होता है। इन सभी किरदारों को संजीव कुमार ने निभाया था। खास बात यह थी कि उनके नौ किरदार जीवन के नौ रसों का प्रतीक माने गए थे।

    फिल्म में संजीव कुमार कभी डॉक्टर के रूप में नजर आए, तो कभी डाकू, साधु, पंडित और अन्य विविध व्यक्तित्वों के रूप में दिखाई दिए। हर किरदार का हावभाव, बोलने का अंदाज, शारीरिक भाषा और व्यक्तित्व अलग था। यही वजह थी कि दर्शकों को ऐसा महसूस ही नहीं हुआ कि पर्दे पर एक ही अभिनेता कई भूमिकाएं निभा रहा है। उनके अभिनय की यही ताकत उन्हें अपने समय के सबसे सम्मानित कलाकारों में शामिल करती है।

    फिल्म का निर्देशन ए. भीमसिंह ने किया था। यह दक्षिण भारतीय अभिनेता Sivaji Ganesan की तमिल फिल्म Navarathri का हिंदी रीमेक थी। हालांकि हिंदी संस्करण में संजीव कुमार ने अपनी अदाकारी से किरदारों को नई पहचान दी और फिल्म को यादगार बना दिया।

    संजीव कुमार का जीवन भी उतना ही चर्चित रहा जितना उनका करियर। उनके बारे में अक्सर यह कहा जाता है कि उन्होंने अपनी कम उम्र में मृत्यु की आशंका जताई थी। हालांकि इस तरह की बातें वर्षों से चर्चा का विषय रही हैं, लेकिन उनकी असली पहचान उनकी अद्भुत अभिनय क्षमता और सिनेमा को दिए गए अमूल्य योगदान से है।

    आज भी जब हिंदी सिनेमा के महानतम अभिनेताओं की बात होती है, तो संजीव कुमार का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। एक ही फिल्म में नौ किरदार निभाने का उनका रिकॉर्ड भारतीय सिनेमा के इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा।