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  • ललित मोदी ने सुष्मिता सेन संग ब्रेकअप की असली वजह का किया खुलासा, बताया क्यों अलग हुए दोनों के रास्ते

    ललित मोदी ने सुष्मिता सेन संग ब्रेकअप की असली वजह का किया खुलासा, बताया क्यों अलग हुए दोनों के रास्ते

    नई दिल्ली । मशहूर बिजनेसमैन ललित मोदी ने बॉलीवुड अभिनेत्री और पूर्व मिस यूनिवर्स सुष्मिता सेन के साथ अपने चर्चित रिश्ते और फिर उसके बाद हुए अलगाव पर पहली बार खुलकर अपनी बात रखी है। एक हालिया इंटरव्यू में उन्होंने सोशल मीडिया पर सुष्मिता सेन के साथ साझा की गई तस्वीरों के पीछे की पूरी कहानी बयां की और साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि दोनों के बीच ब्रेकअप क्यों हुआ था। ललित मोदी ने अपने रिश्ते के दिनों को याद करते हुए सुष्मिता सेन की जमकर तारीफ की और उन तमाम आलोचकों को करारा जवाब दिया जो अभिनेत्री को सोशल मीडिया पर ट्रोल कर रहे थे। उन्होंने कहा कि सुष्मिता आज भी उनकी जिंदगी में एक बेहद खास स्थान रखती हैं और दोनों के बीच वर्तमान में भी एक बेहद खूबसूरत और प्यारी दोस्ती का रिश्ता कायम है।

    ललित मोदी ने ह्यूमन्स ऑफ बॉम्बे को दिए अपने विशेष इंटरव्यू में ब्रेकअप की मुख्य वजह भौगोलिक दूरियों को बताया। उन्होंने साझा किया कि सुष्मिता सेन उनके लिए हमेशा से बेहद खास रही हैं और उन्होंने सुष्मिता से अपने जीवन में बहुत कुछ सीखा है। जब उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर सुष्मिता के साथ अपनी तस्वीरें पोस्ट की थीं, तब वे दोनों एक गंभीर रिश्ते में थे और भविष्य में भी साथ रह सकते थे, लेकिन दोनों के काम और जीवन के ठिकाने अलग होने के कारण दूरियां बढ़ती चली गईं। सुष्मिता सेन का पूरा करियर और काम भारत में केंद्रित है, जबकि ललित मोदी का पूरा जीवन और व्यवसाय लंदन में स्थापित है। इस लंबी दूरी के कारण रिश्ते को आगे बढ़ाना मुश्किल हो गया था, हालांकि ललित मोदी का मानना है कि दूरियों के बावजूद सुष्मिता के साथ बिताया गया समय उनके जीवन का एक बेहद खूबसूरत अनुभव था, जिसकी यादें हमेशा उनके पास रहेंगी।

    इस इंटरव्यू के दौरान ललित मोदी ने उन लोगों को भी आड़े हाथों लिया जिन्होंने इस रिश्ते की घोषणा के बाद सुष्मिता सेन को सोशल मीडिया पर ‘गोल्ड डिगर’ यानी पैसों के लिए रिश्ता बनाने वाली महिला कहकर ट्रोल किया था। ललित मोदी ने मजाकिया और बेबाक अंदाज में इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि सुष्मिता बहुत स्वाभिमानी और बेहद अमीर महिला हैं, जिनके पास खुद के कमाए हुए ढेर सारे डायमंड्स हैं। उन्होंने बताया कि सुष्मिता का अपना डायमंड स्टोर भी है और उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत के दम पर यह मुकाम हासिल किया है। ललित मोदी ने एक दिलचस्प वाकया साझा करते हुए कहा कि जब भी वे दोनों बाहर जाते थे, तो सुष्मिता कभी उन्हें पैसे खर्च नहीं करने देती थीं और हर चीज का भुगतान खुद करती थीं। ऐसे में वे गोल्ड डिगर बिल्कुल नहीं थीं, बल्कि मजाक में कहा जाए तो वे खुद ‘डायमंड डिगर’ साबित हुए थे।

    साल 2022 में इंटरनेट पर तहलका मचाने वाली उस इंस्टाग्राम पोस्ट के पीछे की कहानी बताते हुए ललित मोदी ने कहा कि वह पोस्ट एक मजेदार बहस का नतीजा थी। दोनों के बीच किसी बात पर हल्की नोंकझोंक हो रही था और ललित मोदी ने मजाक में कहा कि वे इस रिश्ते को सार्वजनिक करने जा रहे हैं, जिस पर सुष्मिता हंस पड़ीं। इसके बाद जब ललित मोदी लंदन से सार्डिनिया की यात्रा पर थे, तब उन्होंने तस्वीरें पोस्ट कर दीं और सार्डिनिया पहुंचते-पहुंचते यह खबर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सबसे बड़ी सुर्खी बन चुकी थी। खास बात यह रही कि सुष्मिता ने कभी भी उनसे उस पोस्ट को हटाने के लिए नहीं कहा और न ही ललित मोदी ने कभी उसे डिलीट करने के बारे में सोचा। दोनों अपनी उस स्थिति को लेकर पूरी तरह सहज थे और उन्हें आज भी अपने उस फैसले पर कोई पछतावा नहीं है।

    इस पूरे घटनाक्रम से यह साफ होता है कि भले ही समय और परिस्थितियों के कारण ललित मोदी और सुष्मिता सेन का प्रेम संबंध आगे नहीं बढ़ सका, लेकिन दोनों के मन में एक-दूसरे के प्रति सम्मान आज भी बरकरार है। यह इंटरव्यू दर्शाता है कि आधुनिक दौर में परिपक्वता के साथ रिश्तों को कैसे निभाया और खत्म किया जा सकता है, जहां आपसी समझ और दोस्ती ब्रेकअप के बाद भी कायम रहती है।

  • कारगिल युद्ध के समय अटल बिहारी वाजपेयी ने क्यों कराई थी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की दिलीप कुमार से बात

    कारगिल युद्ध के समय अटल बिहारी वाजपेयी ने क्यों कराई थी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की दिलीप कुमार से बात

    नई दिल्ली । भारत और पाकिस्तान के बीच साल 1999 में लड़ा गया कारगिल युद्ध न केवल सैन्य शौर्य बल्कि कूटनीतिक रणनीतियों के लिए भी जाना जाता है। इस युद्ध के दौरान पर्दे के पीछे का एक ऐसा ऐतिहासिक और बेहद चौंकाने वाला किस्सा सामने आया था, जब हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता दिलीप कुमार ने देश के प्रति अपनी वफादारी निभाते हुए पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को फोन पर खरी-खरी सुना दी थी।
    पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद कसूरी ने अपनी किताब ‘नाइदर ए हॉक नॉर ए डव’ में इस पूरे घटनाक्रम का विस्तार से जिक्र किया है। यह वाकया उस समय का है जब पाकिस्तानी सेना ने नियंत्रण रेखा पार कर भारतीय चौकियों पर चुपके से कब्जा कर लिया था और भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पाकिस्तान के इस धोखे से बेहद आहत थे, क्योंकि कुछ ही समय पहले वे शांति का पैगाम लेकर खुद बस से लाहौर गए थे।

    किताब के अनुसार, एक दिन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ अपने कार्यालय में बैठे थे, तभी उनके एडीसी ने आकर सूचना दी कि भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी उनसे बेहद जरूरी बात करना चाहते हैं।

    फोन लाइन कनेक्ट होते ही वाजपेयी जी ने बेहद तल्ख और निराश आवाज में नवाज शरीफ से सीधे सवाल किया कि मियाां साहब, एक तरफ आप लाहौर में मुझसे गर्मजोशी से गले मिल रहे थे और दूसरी तरफ आपकी सेना ने हमारे कारगिल पर कब्जा कर लिया, यह कैसी दोस्ती है। इस अचानक हुए सीधे हमले से नवाज शरीफ पूरी तरह सकपका गए और उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि उन्हें कारगिल की इस सैन्य कार्रवाई के बारे में पहले से कोई जानकारी नहीं थी और यह सब उनकी मर्जी के बिना हुआ है।

    अटल बिहारी वाजपेयी ने नवाज शरीफ की इस सफाई पर पूरी तरह भरोसा नहीं किया और अपनी कूटनीतिक रणनीति के तहत उनसे कहा कि अगर आपको मेरी बात पर यकीन नहीं हो रहा है, तो जरा उस शख्स से बात कीजिए जो इस वक्त मेरे पास ही बैठा है। इसके बाद वाजपेयी जी ने फोन की कमान बॉलीवुड के ‘ट्रैजेडी किंग’ कहे जाने वाले अभिनेता दिलीप कुमार के हाथों में सौंप दी।

    जैसे ही फोन के दूसरी तरफ से दिलीप कुमार की आवाज गूंजी, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ पूरी तरह दंग रह गए। चूंकि दिलीप कुमार का जन्म विभाजन से पहले पेशावर में हुआ था, इसलिए पाकिस्तान की आवाम और वहां के हुक्मरानों के बीच भी उनके प्रति बेहद सम्मान और गहरी दीवानगी थी।

    फोन हाथ में लेते ही दिलीप कुमार ने बिना किसी संकोच के नवाज शरीफ को एक कड़ा और भावुक संदेश दिया। उन्होंने कहा कि मियाां साहब, हमें आपसे इस तरह के कदम की उम्मीद बिल्कुल नहीं थी क्योंकि आपने हमेशा भारत और पाकिस्तान के बीच शांति व्यवस्था बनाए रखने का दावा किया है।

    उन्होंने आगे एक हिंदुस्तानी मुस्लिम के दर्द को बयां करते हुए कहा कि जब भी दोनों देशों के बीच सरहद पर तनाव बढ़ता है, तो भारत के मुस्लिम खुद को असुरक्षित महसूस करने लगते हैं और उनके लिए घरों से बाहर निकलना तक मुश्किल हो जाता है। दिलीप कुमार ने नवाज शरीफ से खुदा के वास्ते इस गंभीर स्थिति को संभालने और तुरंत कुछ ठोस कदम उठाने की अपील की।

    हालांकि, इस ऐतिहासिक फोन कॉल के तुरंत बाद जमीनी स्तर पर युद्ध पूरी तरह तो नहीं रुका, लेकिन माना जाता है कि इससे कुछ समय के लिए कूटनीतिक गलियारों में हलचल तेज हुई और सीमा पर तनाव को समझने में मदद मिली। यह युद्ध पूरे तीन महीने तक जारी रहा, जिसमें भारतीय सेना ने अपने वीर जवानों की शहादत और अदम्य साहस की बदौलत कारगिल की चोटियों से दुश्मनों को खदेड़कर दोबारा तिरंगा फहराया था।

    देश के प्रति दिलीप कुमार का यह जज्बा हमेशा से अटूट था, जिसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि साल 1947 में विभाजन के समय जब उनके परिवार को किसी ने पाकिस्तान लौटने की सलाह दी थी, तो उन्होंने दोटूक जवाब दिया था कि उनका वतन हिंदुस्तान ही है और वे यहीं जिएंगे और यहीं मरेंगे।
  • राजेंद्र कुमार की आंखों में आ गए थे आंसू, जब बेटी की विदाई में गूंजा नील कमल फिल्म का यह सदाबहार गाना

    राजेंद्र कुमार की आंखों में आ गए थे आंसू, जब बेटी की विदाई में गूंजा नील कमल फिल्म का यह सदाबहार गाना


    नई दिल्ली।
    भारतीय सिनेमा के इतिहास में साठ का दशक संगीत और अभिनय के लिहाज से स्वर्णिम युग माना जाता है। इस दौर में जहां एक तरफ राजेश खन्ना और राजेंद्र कुमार जैसे दिग्गज अभिनेताओं ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए, वहीं दूसरी ओर संगीत की दुनिया में भी कई ऐसे अमर गीतों का निर्माण हुआ जो आज भी लोगों के दिलों को छू जाते हैं। ऐसा ही एक बेहद भावुक और यादगार किस्सा साठ के दशक के आखिरी सालों से जुड़ा हुआ है, जब फिल्म ‘नील कमल’ का एक प्रसिद्ध गाना अभी रिलीज भी नहीं हुआ था और उसने एक शादी समारोह में मौजूद सभी लोगों की आंखों को नम कर दिया था। इस गाने के बोल इतने मार्मिक थे कि हिंदी सिनेमा के जाने-माने अभिनेता राजेंद्र कुमार खुद को रोने से रोक नहीं पाए थे और उन्होंने बेहद भावुक होकर संगीतकार से इस फिल्म और गाने के बारे में पूछताछ की थी।

    यह पूरा घटनाक्रम फिल्म नील कमल के निर्माण के समय का है, जिसमें बलराज साहनी, राजकुमार और मनोज कुमार जैसे बड़े कलाकार मुख्य भूमिकाओं में नजर आने वाले थे। फिल्म के लिए एक विशेष विदाई गीत की आवश्यकता थी, जिसे संगीतकार रवि तैयार कर रहे थे। रवि ने इस खास गीत के लिए मशहूर गीतकार साहिर लुधियानवी से संपर्क किया, जिन्होंने अपनी कलम से बेहद दर्द भरे और दिल को छू लेने वाले बोल लिखे। इसके बाद इस गाने को अमर बनाने की जिम्मेदारी महान गायक मोहम्मद रफी को सौंपी गई, जिन्होंने ‘बाबुल की दुआएं लेती जा’ नामक इस विदाई गीत को अपनी जादुई आवाज से सजाया। गाना पूरी तरह से रिकॉर्ड हो चुका था, लेकिन फिल्म की रिलीज में अभी काफी समय बाकी था, जिसके कारण आम जनता और फिल्म इंडस्ट्री के कई लोग इस शानदार रचना से पूरी तरह अनजान थे।

    इसी दौरान फिल्म इंडस्ट्री के मशहूर गीतकार राजेंद्र कृष्णन की बेटी की शादी का आयोजन हुआ, जिसमें बॉलीवुड के तमाम दिग्गज कलाकारों और संगीतकारों को आमंत्रित किया गया था। इस भव्य शादी समारोह में अभिनेता राजेंद्र कुमार भी शामिल हुए थे। शादी की रस्मों के बीच राजेंद्र कृष्णन ने संगीतकार रवि से अनुरोध किया कि वे अपनी सुरीली आवाज में महफिल में कोई गाना गाएं। रवि ने इस अनुरोध को स्वीकार तो कर लिया, लेकिन उन्होंने एक अनूठी शर्त रखी कि वे यह गाना केवल बेटी की विदाई के समय ही गाएंगे। जैसे ही विदाई की रस्म शुरू हुई और माहौल में उदासी छाने लगी, रवि ने हाथ में माइक संभाला और पूरी शिद्दत व गहरे भावों के साथ अपनी ही धुन पर तैयार किया हुआ अनरिलीज्ड गाना ‘बाबुल की दुआएं लेती जा’ गाना शुरू कर दिया।

    रवि की मखमली और भावुक आवाज में इस गाने के बोल जैसे ही गूंजे, वहां मौजूद हर शख्स की आंखें भर आईं। बेटी की विदाई का वह दृश्य इस गाने के प्रभाव से इतना गमगीन हो गया कि शादी में मौजूद राजेंद्र कुमार अपने आंसुओं पर काबू नहीं रख सके और फूट-फूट कर रोने लगे। गाना खत्म होने के बाद राजेंद्र कुमार तुरंत संगीतकार रवि के पास पहुंचे और अत्यंत भावुक होकर उनसे पूछा कि आखिर यह दिल को झकझोर देने वाला गाना किस फिल्म का है। चूंकि उस समय तक फिल्म नील कमल सिनेमाघरों में नहीं आई थी, इसलिए रवि ने उन्हें विस्तार से बताया कि यह उनकी आगामी फिल्म का एक विशेष विदाई गीत है, जिसे मोहम्मद रफी ने गाया है।

    इस कालजयी गाने से जुड़ा एक और बेहद दिलचस्प और भावनात्मक पहलू गायक मोहम्मद रफी से भी जुड़ा हुआ है। जब रफी साहब स्टूडियो में इस गाने की रिकॉर्डिंग कर रहे थे, तब वे खुद भी अपने आंसुओं को रोक नहीं पाए थे। दरअसल, उन दिनों रफी साहब ने अपनी खुद की बेटी की सगाई की थी, और रिकॉर्डिंग के समय उनके जेहन में अपनी बेटी की विदाई का ख्याल आ गया था। इस वजह से गाते-गाते उनकी आवाज भारी हो गई और वे रो पड़े। संगीतकार रवि ने मोहम्मद रफी की उस भारी और दर्द भरी आवाज को तकनीकी रूप से सुधारने के बजाय वैसे ही रहने दिया, क्योंकि उन्हें लगा कि एक पिता का यह वास्तविक दर्द गाने की आत्मा को और अधिक गहरा और जीवंत बना देगा, जो आज भी इस गाने में साफ महसूस होता है।

    इस प्रकार, यह गाना न केवल फिल्म नील कमल की पहचान बना, बल्कि भारतीय शादियों में बेटी की विदाई का एक अनिवार्य हिस्सा भी बन गया। इतने दशक बीत जाने के बाद भी जब यह गाना कहीं बजता है, तो आज भी लोगों की आंखें नम हो जाती हैं। यह गीत इस बात का जीवंत प्रमाण है कि जब सच्चे भाव, बेहतरीन लेखन और बेहतरीन संगीत का मिलन होता है, तो ऐसी अमर कलाकृतियों का जन्म होता है जो पीढ़ियों तक इंसानी भावनाओं को झकझोरती रहती हैं।

  • ‘बाबुल की दुआएं लेती जा’ की भावुक कहानी: Neel Kamal का अमर विदाई गीत और Rajendra Kumar का यादगार किस्सा

    ‘बाबुल की दुआएं लेती जा’ की भावुक कहानी: Neel Kamal का अमर विदाई गीत और Rajendra Kumar का यादगार किस्सा

    नई दिल्ली । हिंदी फिल्म संगीत के इतिहास में कुछ गीत ऐसे हैं जो सिर्फ धुन या बोल तक सीमित नहीं रहते, बल्कि समय के साथ भावनाओं की विरासत बन जाते हैं। वर्ष 1968 में रिलीज हुई फिल्म ‘नील कमल’ का विदाई गीत ‘बाबुल की दुआएं लेती जा’ भी उन्हीं चुनिंदा गीतों में शामिल किया जाता है, जिसने भारतीय समाज में पिता-बेटी के रिश्ते की संवेदनशीलता को एक अलग पहचान दी। इस गीत को संगीतकार रवि के संगीत, गीतकार साहिर लुधियानवी के शब्दों और मोहम्मद रफी की भावपूर्ण आवाज ने कालजयी बना दिया।

    कहा जाता है कि इस गीत की लोकप्रियता केवल फिल्म रिलीज़ के बाद नहीं बढ़ी, बल्कि उससे पहले ही इसकी भावनात्मक शक्ति लोगों तक पहुंचने लगी थी। एक चर्चित किस्से के अनुसार, गीतकार राजेंद्र कृष्ण की बेटी की शादी के अवसर पर फिल्म इंडस्ट्री की कई हस्तियां मौजूद थीं। इसी समारोह में संगीतकार रवि से अनुरोध किया गया कि वे कोई विशेष प्रस्तुति दें। रवि ने इस गीत को विदाई के समय प्रस्तुत करने का निर्णय लिया, ताकि उसकी भावनात्मक गहराई पूरी तरह महसूस की जा सके।

    जैसे ही विदाई की रस्म शुरू हुई, माहौल बेहद भावुक हो गया। परिवार के सदस्य पहले से ही भावनाओं में डूबे हुए थे और उसी क्षण ‘बाबुल की दुआएं लेती जा’ की धुन ने पूरे वातावरण को और भारी कर दिया। गीत के बोल जैसे-जैसे आगे बढ़े, वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम हो गईं। कहा जाता है कि यह केवल एक संगीत प्रस्तुति नहीं थी, बल्कि एक ऐसा अनुभव था जिसने वहां मौजूद लोगों के दिलों को गहराई से छू लिया।

    इस घटना से जुड़ा सबसे चर्चित पहलू अभिनेता राजेंद्र कुमार का बताया जाता है। कहा जाता है कि गीत समाप्त होने के बाद वे इतने भावुक हो गए कि सीधे संगीतकार रवि के पास पहुंचे और पूछ बैठे कि यह गीत किस फिल्म का हिस्सा है, क्योंकि उस समय तक ‘नील कमल’ रिलीज नहीं हुई थी। यह घटना इस बात का उदाहरण मानी जाती है कि कभी-कभी कला अपनी आधिकारिक प्रस्तुति से पहले ही लोगों के दिलों तक पहुंच जाती है और अमर हो जाती है।

    गीत से जुड़ी एक और भावनात्मक कथा मोहम्मद रफी से संबंधित बताई जाती है। कहा जाता है कि रिकॉर्डिंग के दौरान वे अपने निजी जीवन के अनुभवों से भावुक हो गए थे, जिससे उनकी आवाज में एक विशेष कंपन और दर्द झलक आया। संगीतकार रवि ने उस प्राकृतिक भाव को गीत में बनाए रखने का निर्णय लिया, क्योंकि उन्हें लगा कि यही वास्तविकता गीत को और अधिक प्रभावशाली बनाती है। यही कारण है कि यह गीत आज भी विदाई समारोहों में विशेष स्थान रखता है।

    समय के साथ यह गीत केवल एक फिल्मी प्रस्तुति नहीं रहा, बल्कि भारतीय पारिवारिक भावनाओं का प्रतीक बन गया। विवाह समारोहों में विदाई के क्षणों में इसकी मौजूदगी आज भी उतनी ही प्रभावशाली महसूस की जाती है जितनी दशकों पहले थी।

    यह गीत आने वाली पीढ़ियों के लिए भी हिंदी सिनेमा की उस विरासत का हिस्सा बना रहेगा, जिसमें संगीत केवल मनोरंजन नहीं बल्कि भावनाओं की गहराई को व्यक्त करने का माध्यम बनता है। इसकी लोकप्रियता यह साबित करती है कि सच्ची कला समय की सीमाओं से परे जाकर हमेशा जीवित रहती है।

    आज भी जब यह गीत गूंजता है, तो हर श्रोता के मन में विदाई का वही पुराना भाव और अपनापन लौट आता है, जो इसे अमर बनाता है।

  • ‘किसी को बैन करने का अधिकार नहीं’, प्रोड्यूसर ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया

    ‘किसी को बैन करने का अधिकार नहीं’, प्रोड्यूसर ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया


    नई दिल्ली । अभिनेता Ranveer Singh और फिल्म Don 3 को लेकर चल रहा विवाद अब अदालत तक पहुंच गया है। वरिष्ठ फिल्म निर्माता T.P. Aggarwal ने Federation of Western India Cine Employees द्वारा रणवीर सिंह के खिलाफ घोषित गैर-सहयोग (नॉन-कोऑपरेशन) के फैसले को चुनौती देते हुए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

    क्या है मामला?
    रिपोर्ट्स के अनुसार, रणवीर सिंह के डॉन 3 से अलग होने के बाद FWICE ने उनके खिलाफ नॉन-कोऑपरेशन की घोषणा की थी। संगठन का कहना था कि मामला सुलझने तक उससे जुड़े सदस्य अभिनेता के साथ काम नहीं करेंगे।

    टीपी अग्रवाल ने क्या कहा?
    पूर्व Film Federation of India अध्यक्ष टीपी अग्रवाल ने मुंबई की दिंडोशी सिविल कोर्ट में FWICE और Indian Motion Picture Producers Association के खिलाफ याचिका दायर की है।

    उनका तर्क है कि किसी भी फिल्म संगठन या ट्रेड बॉडी को किसी कलाकार को काम करने से रोकने का कानूनी अधिकार नहीं है। उनके अनुसार, ऐसे फैसले कलाकारों की आजीविका, काम करने की स्वतंत्रता और रचनात्मक अभिव्यक्ति पर सीधा असर डालते हैं।

    विवाद की जड़
    साल 2023 में रणवीर सिंह को डॉन 3 में नए डॉन के रूप में कास्ट किया गया था। फिल्म के निर्देशक Farhan Akhtar ने इसका टीजर भी जारी किया था, जिसे दर्शकों का अच्छा रिस्पॉन्स मिला था। बाद में खबरें आईं कि रचनात्मक मतभेदों के चलते रणवीर इस प्रोजेक्ट से दूर हो गए।

    अब आगे क्या?
    मामला अब अदालत में पहुंच चुका है, इसलिए यह देखना दिलचस्प होगा कि कोर्ट फिल्म संगठनों की शक्तियों और कलाकारों के काम करने के अधिकार को लेकर क्या रुख अपनाती है। इस फैसले का असर भविष्य में फिल्म इंडस्ट्री में कलाकारों और संगठनों के बीच होने वाले विवादों पर भी पड़ सकता है।

    यह मामला केवल रणवीर सिंह तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि फिल्म उद्योग में ट्रेड बॉडी की भूमिका और उनके अधिकारों पर भी एक बड़ी बहस छेड़ सकता है।

  • 11 साल बाद शिल्पा शिंदे का बड़ा बयान, केस पर किया चौंकाने वाला खुलासा

    11 साल बाद शिल्पा शिंदे का बड़ा बयान, केस पर किया चौंकाने वाला खुलासा


    नई दिल्ली । टीवी एक्ट्रेस शिल्पा शिंदे ने ‘भाबीजी घर पर हैं’ छोड़ने और उस दौरान हुए विवाद पर 11 साल बाद अपनी बात रखते हुए कई बड़े दावे किए हैं। भारती सिंह और हर्ष लिंबाचिया के पॉडकास्ट में बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि उस समय प्रोड्यूसर के खिलाफ लगाया गया सेक्शुअल हैरेसमेंट का केस उन्होंने “मजबूरी में” किया था और अब वे मानती हैं कि वह आरोप पूरी तरह सच नहीं था।

    क्या कहा शिल्पा शिंदे ने?
    शिल्पा शिंदे ने बातचीत में बताया कि शो छोड़ने के बाद उनके और प्रोडक्शन हाउस के बीच तनाव बढ़ गया था। उनके अनुसार, उन पर एक्सक्लूसिव कॉन्ट्रैक्ट साइन करने का दबाव बनाया जा रहा था, जिससे वे दूसरे प्रोजेक्ट्स में काम न कर सकें। जब उन्होंने इनकार किया, तो उनके मुताबिक उन्हें काम से हटाने और करियर खत्म करने जैसी स्थिति बनाई गई। उन्होंने यह भी दावा किया कि अचानक उन्हें शो से हटा दिया गया, शूटिंग रोक दी गई और मीडिया में उनके बाहर होने की खबरें चलने लगीं।

    लीगल विवाद और दबाव के आरोप
    शिल्पा ने कहा कि विवाद के दौरान उन्हें भारी-भरकम लीगल नोटिस (12 से 20 करोड़ रुपये तक) मिले, जिससे वे मानसिक दबाव में आ गई थीं। उनके अनुसार, उस समय उन्हें लगा कि उनके पास कोई विकल्प नहीं बचा था।

    “झूठा था केस” वाला बयान
    सबसे बड़ा खुलासा यही रहा कि उन्होंने कहा- उन्होंने प्रोड्यूसर पर जो सेक्शुअल हैरेसमेंट का केस किया था, वह “पूरी तरह सच नहीं था” और उन्होंने वह कदम उस समय की परिस्थितियों और दबाव में उठाया था। यह बयान सामने आने के बाद यह मामला फिर चर्चा में आ गया है, क्योंकि उस समय यह टीवी इंडस्ट्री के सबसे बड़े विवादों में से एक माना गया था।

    आगे क्या कहा?
    शिल्पा शिंदे ने यह भी कहा कि उस पूरे विवाद के बाद दोनों पक्षों के बीच बाद में समझौता हो गया और अब उनके रिश्ते सामान्य हैं। उन्होंने इसे अपने करियर का सबसे मुश्किल दौर बताया।

  • रणवीर सिंह की ‘धुरंधर’ पर फिर गरमाया मामला: कराची के पूर्व मेयर के दावे ने आलोचकों को दिया करारा जवाब

    रणवीर सिंह की ‘धुरंधर’ पर फिर गरमाया मामला: कराची के पूर्व मेयर के दावे ने आलोचकों को दिया करारा जवाब

    नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा जगत की ब्लॉकबस्टर एक्शन-थ्रिलर फिल्म ‘धुरंधर’ और उसके सीक्वल को लेकर चल रहा वैचारिक विवाद अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। अभिनेता रणवीर सिंह और निर्देशक आदित्य धर की इस बेहद चर्चित फिल्म को लेकर जहां भारत के भीतर ही कुछ बुद्धिजीवियों, समीक्षकों और सोशल मीडिया विश्लेषकों द्वारा इसे एक ‘प्रोपेगैंडा फिल्म’ करार दिया जा रहा था, वहीं अब इस पूरे मामले में सरहद पार से आए एक बड़े बयान ने आलोचकों को पूरी तरह से बैकफुट पर धकेल दिया है। पाकिस्तान के कराची शहर के पूर्व मेयर और वरिष्ठ पत्रकार आरिफ अजाकिया ने फिल्म के समर्थन में खुलकर अपनी बात रखी है।

    उन्होंने एक प्रतिष्ठित वैश्विक पत्रकारिता कार्यक्रम ‘टॉक जर्नलिज्म’ के दौरान यह सनसनीखेज दावा किया कि फिल्म में दिखाई गई पाकिस्तान के ल्यारी इलाके की जमीनी हकीकत और आतंकी नेटवर्क को खत्म करने की जो कहानी पर्दे पर उतारी गई है, वह पूरी तरह से सच पर आधारित है। इस बयान का वीडियो सामने आने के बाद से ही फिल्म की आलोचना करने वाले धड़ों के बीच सन्नाटा पसर गया है।

    आरिफ अजाकिया ने अपने व्यक्तिगत अनुभवों और अपनी पुरानी राजनीतिक पृष्ठभूमि का हवाला देते हुए कहा कि जिस दौर की घटनाओं और मिशन को फिल्म ‘धुरंधर’ में फिल्माया गया है, उस समय वह स्वयं कराची के उस विशेष प्रशासनिक क्षेत्र के मेयर के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे। उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि उनका जन्म और पालन-पोषण कराची के उसी विवादित ल्यारी इलाके में हुआ है, जहां बलूच गैंग और विभिन्न आतंकी संगठनों का एक समय पर भारी वर्चस्व हुआ करता था।

    पूर्व मेयर के अनुसार, वह उस दौर के सुरक्षा हालातों और पर्दे के पीछे चलने वाली गतिविधियों के प्रत्यक्षदर्शी रहे हैं, इसलिए वह पूरी जिम्मेदारी के साथ यह स्वीकार करते हैं कि फिल्म के भीतर जो कुछ भी दिखाया गया है, उसमें रत्ती भर भी झूठ नहीं है। इसके साथ ही उन्होंने मंच से अपनी जड़ों के बारे में बात करते हुए यह भी स्वीकार किया कि भले ही उनका जन्म कराची में हुआ हो, लेकिन उनके माता-पिता अविभाजित भारत के जूनागढ़, गुजरात से ताल्लुक रखते थे, इसलिए वह स्वयं को पाकिस्तानी मानने की बजाय भारतीय मूल का नागरिक कहलाना अधिक पसंद करते हैं।

    मध्य प्रदेश सहित देशभर के सिनेमाघरों में धूम मचाने वाली इस फिल्म की कहानी की बात करें तो ‘धुरंधर’ और इसका हालिया सीक्वल दर्शकों को एक बेहद संजीदा और खतरनाक खुफिया मिशन पर ले जाता है। फिल्म की पटकथा में दिखाया गया है कि किस प्रकार भारतीय खुफिया एजेंसी का एक जांबाज अधिकारी जसकीरत, विषम परिस्थितियों के बीच अपना नाम और पहचान बदलकर हमजा बन जाता है और पाकिस्तान के सबसे संवेदनशील इलाके ल्यारी के एक खतरनाक बलूच गैंग में सफलतापूर्वक घुसपैठ करता है।

    वहां रहते हुए वह न केवल स्थानीय अपराधियों के तंत्र को ध्वस्त करता है बल्कि एक बड़े अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठन के मंसूबों को भी नेस्तनाबूद कर देता है। रणवीर सिंह के दमदार अभिनय से सजी इस फिल्म में सारा अर्जुन, अर्जुन रामपाल और आर. माधवन जैसे स्थापित कलाकारों ने भी महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं। जहाँ एक तरफ इस फिल्म की आलोचना करने वाले इसे केवल एक काल्पनिक और अतिशयोक्तिपूर्ण कहानी बता रहे थे, वहीं अब खुद कराची की कमान संभाल चुके एक पूर्व प्रशासनिक अधिकारी द्वारा इसे सच का आईना बताए जाने के बाद इस फिल्म की प्रामाणिकता पर उठ रहे तमाम सवालों पर पूरी तरह से विराम लग गया है।

  • पर्दे पर रहे विरोधी, असल जिंदगी में निकले बेहद करीबी रिश्तेदार: जानिए रेखा और अभिनेता तेज सप्रू का अनोखा फैमिली कनेक्शन

    पर्दे पर रहे विरोधी, असल जिंदगी में निकले बेहद करीबी रिश्तेदार: जानिए रेखा और अभिनेता तेज सप्रू का अनोखा फैमिली कनेक्शन

    नई दिल्ली। बॉलीवुड फिल्म इंडस्ट्री की सबसे रहस्यमयी और सदाबहार अभिनेत्रियां में शुमार रेखा के पेशेवर जीवन और उनकी व्यक्तिगत प्रेम कहानी से तो दुनिया भली-भांति वाकिफ है, परंतु उनके पारिवारिक ताने-बाने को लेकर आज भी कई ऐसे अनसुने पहलू हैं जिनसे आम जनमानस पूरी तरह अनजान है। साठ के दशक से सिल्वर स्क्रीन पर राज करने वाली रेखा का हिंदी सिनेमा के एक बेहद लोकप्रिय और खूंखार विलेन का किरदार निभाने वाले अभिनेता तेज सप्रू के साथ बेहद करीबी और सगा पारिवारिक संबंध है।
    गुजरे जमाने के इस मशहूर खलनायक और रेखा के बीच का यह रिश्ता बेहद गहरा और आत्मीय है, जिसके चलते असल जिंदगी में ये दोनों एक-दूसरे के बेहद खास रिश्तेदार माने जाते हैं। पर्दे पर एक-दूसरे के विपरीत भूमिकाओं में नजर आने वाले इन दोनों उम्दा कलाकारों के बीच जीजा और साली का एक मजबूत पारिवारिक पवित्र रिश्ता है, जिसकी जड़ें रेखा की माता के वैवाहिक जीवन के इतिहास से सीधे तौर पर जुड़ी हुई हैं।

    इस पारिवारिक जुड़ाव की पेचीदगियों को समझने के लिए रेखा की माता पुष्पावली के जीवन चक्र को जानना बेहद आवश्यक है। अपने दौर की प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय अभिनेत्री पुष्पावली ने चालीस और पचास के दशक में कई फिल्मों में काम कर अपने बच्चों का भरण-पोषण किया था। वर्ष 1940 में आई. वी. रंगाचारी से विवाह के बाद वर्ष 1946 में उनका अलगाव हो गया, जिसके बाद उनकी नजदीकियां तमिल सिनेमा के दिग्गज अभिनेता जेमिनी गणेशन के साथ बढ़ीं। इस गहरे रिश्ते के चलते रेखा और उनकी बहन राधा का जन्म हुआ, हालांकि जेमिनी गणेशन ने सार्वजनिक तौर पर कभी इस रिश्ते को पूर्ण स्वीकृति नहीं दी।

    जेमिनी गणेशन से अलग होने के पश्चात पुष्पावली ने अकेले ही अपनी बेटियों की परवरिश की जिम्मेदारी उठाई और इसी संघर्षपूर्ण दौर में उनकी जिंदगी में विख्यात सिनेमेटोग्राफर के. प्रकाश की एंट्री हुई। के. प्रकाश और पुष्पावली के विवाह के बाद उनके घर दो बच्चों का जन्म हुआ, जिनमें एक बेटा सेशू और एक बेटी धनलक्ष्मी शामिल थीं। रेखा अपनी सभी बहनों और भाई के साथ एक ही छत के नीचे बड़ी हुईं और अपनी सौतेली बहन धनलक्ष्मी के साथ भी उनका बेहद गहरा और अटूट स्नेह रहा है।

    देशभर के सिनेमा प्रेमियों के लिए यह बेहद दिलचस्प तथ्य है कि रेखा की यही छोटी सौतेली बहन धनलक्ष्मी आगे चलकर मशहूर अभिनेता तेज सप्रू की जीवनसंगिनी बनीं। धनलक्ष्मी और तेज सप्रू के इस विवाह के बाद से ही तकनीकी और पारिवारिक रूप से तेज सप्रू रिश्ते में रेखा के सगे जीजा बन गए।
    रेखा और तेज सप्रू के इस बेहद करीबी पारिवारिक रिश्ते के बारे में फिल्म इंडस्ट्री और प्रशंसकों के बीच बहुत ही सीमित लोगों को जानकारी है। इन दोनों कलाकारों ने न केवल पारिवारिक स्तर पर बल्कि पेशेवर मोर्चे पर भी एक-दूसरे का साथ निभाया है और ‘जाल’ तथा ‘इंसाफ का तराजू’ जैसी करीब तीन सुपरहिट फिल्मों में सह-कलाकार के रूप में एक साथ स्क्रीन भी साझा की है।
    रेखा अपने सभी भाई-बहनों में सबसे बड़ी हैं और आज भी अपनी बहनों के बेहद करीब मानी जाती हैं, जहां उनकी सगी बहन राधा विवाह के बाद अमेरिका में बस चुकी हैं, वहीं सौतेली बहन धनलक्ष्मी और जीजा तेज सप्रू के साथ उन्हें अक्सर पारिवारिक समारोहों में बेहद आत्मीयता के साथ वक्त बिताते हुए देखा जाता है।
  • तमिलनाडु की राजनीति में भूचाल: 'बिग बॉस' फेम तमिल अभिनेत्री का बड़ा दावा, मुख्यमंत्री विजय समर्थकों की ट्रोलिंग से हुआ मिसकैरेज

    तमिलनाडु की राजनीति में भूचाल: 'बिग बॉस' फेम तमिल अभिनेत्री का बड़ा दावा, मुख्यमंत्री विजय समर्थकों की ट्रोलिंग से हुआ मिसकैरेज

    नई दिल्ली। दक्षिण भारतीय सिनेमा और तमिलनाडु के राजनीतिक गलियारों में एक बेहद चौंकाने वाला और संवेदनशील मामला सामने आया है, जिसने पूरी इंडस्ट्री में सनसनी फैला दी है। ‘बिग बॉस तमिल’ से राष्ट्रव्यापी लोकप्रियता हासिल करने वाली अभिनेत्री जूली, जिन्हें मारिया जूलियाना के नाम से भी जाना जाता है, ने तमिलनाडु के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री और तमिल सिनेमा के सुपरस्टार थलपति जोसेफ विजय पर बेहद संगीन और गंभीर आरोप लगाए हैं।

    चेन्नई में आयोजित एक भावुक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अभिनेत्री ने फूट-फूटकर रोते हुए दावा किया कि उन्होंने मुख्यमंत्री थलपति विजय की पार्टी के समर्थकों द्वारा किए गए अनवरत मानसिक उत्पीड़न और सोशल मीडिया ट्रोलिंग के कारण अपने होने वाले पहले बच्चे को खो दिया है।

    अभिनेत्री का आरोप है कि उन्हें इंटरनेट मीडिया पर इस कदर निशाना बनाया गया और उनके चरित्र पर कीचड़ उछाला गया कि वह अत्यधिक मानसिक तनाव का शिकार हो गईं, जिसके परिणामस्वरूप उनका गर्भपात यानी मिसकैरेज हो गया। इस बयान के सामने आने के बाद से ही राज्य की राजनीति और सिनेमाई हलकों में आरोपों-प्रत्यारोपों का दौर तेज हो गया है।

    अभिनेत्री जूली ने अपनी आपबीती साझा करते हुए बताया कि इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब उन्होंने राजनीतिक रूप से थलपति विजय की पार्टी ‘तमिलगा वेत्री कझगम’ के खिलाफ अपनी आवाज उठाई। उन्होंने बताया कि इस वर्ष मार्च महीने में उन्होंने अपने खिलाफ हो रहे लगातार ऑनलाइन उत्पीड़न को लेकर चेन्नई पुलिस में एक औपचारिक शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें कुल आठ लोगों को नामजद किया गया था। हालांकि, बाद में उन्हें पुलिस विभाग की ओर से एक नोटिस प्राप्त हुआ, जिसमें इस मामले को आपराधिक श्रेणी में न रखकर दीवानी मानहानि के अंतर्गत दर्शाया गया था।

    जूली ने आरोप लगाया कि राज्य की सत्ता में हुए परिवर्तन के बाद इस मामले को जानबूझकर कमजोर करने का प्रयास किया गया। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी दावा किया कि उनके द्वारा आवाज उठाने के बाद उनके ऊपर पंद्रह लाख रुपए के एक फर्जी किडनी घोटाले में शामिल होने के मनगढ़ंत आरोप मढ़ दिए गए। अभिनेत्री का सीधा आरोप है कि इस पूरी साजिश के पीछे मुख्यमंत्री की पार्टी के कुछ कट्टर समर्थक और एक कानूनी सलाहकार शामिल हैं, जिन्होंने उनके और उनके पति के खिलाफ बेहद भद्दी और अपमानजनक बातें सोशल मीडिया पर फैलाई हैं।

    प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जब मीडिया कर्मियों ने उनसे यह सवाल पूछा कि वह इन गुमनाम सोशल मीडिया अकाउंट्स द्वारा किए जा रहे उत्पीड़न को सीधे तौर पर मुख्यमंत्री से कैसे जोड़ सकती हैं, तो उन्होंने बेहद तीखा जवाब दिया। जूली ने स्पष्ट किया कि वह इस दर्दनाक घटना का इस्तेमाल किसी भी तरह की जन-सहानुभूति बटोरने के लिए नहीं कर रही हैं, बल्कि वह उस कड़वे सच को सामने ला रही हैं जिससे कई महिलाएं गुजर रही हैं। उन्होंने सीधे तौर पर मुख्यमंत्री को संबोधित करते हुए कहा कि केवल सोशल मीडिया की लोकप्रियता के दम पर सत्ता के शीर्ष तक पहुंच जाना काफी नहीं है, बल्कि एक मुख्यमंत्री के रूप में जनता के प्रति उनकी बड़ी जिम्मेदारी बनती है।

    जूली ने कहा कि भले ही मुख्यमंत्री ने प्रत्यक्ष रूप से उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचाया हो, लेकिन जब उनकी पार्टी के लोग एक महिला का नाम बिना किसी संकोच के खराब कर रहे थे, तब उन्होंने अपने समर्थकों को पीछे हटने के लिए एक शब्द भी नहीं कहा। मुख्यमंत्री की इस चुप्पी को ही उन्होंने अपनी इस व्यक्तिगत क्षति का सबसे बड़ा कारण माना है। इस बेहद संवेदनशील और विवादित बयान के बाद जहां थलपति विजय के प्रशंसक और पार्टी कार्यकर्ता सोशल मीडिया पर अभिनेत्री के दावों का कड़ा विरोध कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इस घटना ने तमिलनाडु की नई सरकार के सामने एक बड़ी प्रशासनिक और राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है।

  • भोजपुरी सिनेमा के महामुकाबले में फिर गरमाया पुराना विवाद, मनोज तिवारी ने रवि किशन की पुरानी फीस को लेकर कसा तीखा तंज

    भोजपुरी सिनेमा के महामुकाबले में फिर गरमाया पुराना विवाद, मनोज तिवारी ने रवि किशन की पुरानी फीस को लेकर कसा तीखा तंज

    नई दिल्ली। क्षेत्रीय सिनेमा के इतिहास में अपनी एक अलग पहचान रखने वाले भोजपुरी फिल्म जगत के दो सबसे बड़े सूरमाओं के बीच की पुरानी अदावत एक बार फिर से खुलकर सार्वजनिक मंच पर आ गई है। लंबे समय तक एक-दूसरे के धुर विरोधी रहे मनोज तिवारी और रवि किशन के बीच की खाई राजनीतिक रूप से भले ही पट गई हो, लेकिन अतीत के व्यावसायिक मतभेद आज भी पूरी तरह शांत नहीं हुए हैं।

    हाल ही में दिए गए एक बेबाक साक्षात्कार के दौरान मनोज तिवारी ने भोजपुरी सिनेमा के उत्थान और उसकी वैश्विक लोकप्रियता को लेकर कई ऐसे दावे किए हैं, जिससे दोनों कलाकारों के प्रशंसकों के बीच एक नया विवाद खड़ा हो गया है। इस बातचीत के दौरान जब उनसे यह पूछा गया कि इस फिल्म जगत को पुनर्जीवित करने और एक-दूसरे को मुख्यधारा में लाने का असल श्रेय किसे जाता है, तो मनोज तिवारी ने बिना किसी हिचकिचाहट के खुद को भोजपुरी के तीसरे दौर का मार्गदर्शक घोषित कर दिया।

    उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि उनके आने से पहले रवि किशन सहित कई अन्य कलाकार इस फिल्म जगत में सक्रिय तो थे, लेकिन वे कोई खास प्रभाव छोड़ने या इस सिनेमा को एक मुनाफे वाले उद्योग में बदलने में पूरी तरह से असफल साबित हो रहे थे।

    इस वैचारिक जंग में अपने पक्ष को मजबूती से रखने के लिए मनोज तिवारी ने अपनी ऐतिहासिक फिल्म के बॉक्स ऑफिस आंकड़ों का भी खुलकर हवाला दिया। उन्होंने बताया कि उनकी बेहद चर्चित फिल्म ने मात्र तीस लाख रुपए के अत्यंत सीमित बजट में बनकर रिकॉर्ड तोड़ कमाई का इतिहास रचा था, जिसने न केवल पूरे देश का ध्यान इस क्षेत्रीय सिनेमा की तरफ आकर्षित किया बल्कि इसी एकलौती फिल्म की ऐतिहासिक सफलता के बाद से भोजपुरी में लगभग दो हजार नई फिल्मों के निर्माण का रास्ता साफ हुआ। अपनी बात को और अधिक आक्रामक मोड़ देते हुए उन्होंने समकालीन कलाकारों की उस दौर की आर्थिक स्थिति पर भी टिप्पणी की।

    उन्होंने दावा किया कि जब वे सफलता के शिखर पर थे और बतौर मुख्य अभिनेता फिल्मों के लिए प्रतिदिन के हिसाब से एक से डेढ़ लाख रुपए तक की भारी-भरकम फीस ले रहे थे, उस दौर में रवि किशन को पूरी फिल्म के काम के एवज में केवल पच्चीस हजार रुपए ही मिलते थे। उन्होंने कटाक्ष करते हुए यह भी कहा कि उन्होंने ही इन सभी कलाकारों को यह सिखाया कि किस प्रकार फिल्म उद्योग में अपनी कड़ी मेहनत के लिए सही और बड़ा पारिश्रमिक मांगा जाता है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हो सके।

    हालांकि, वर्तमान परिदृश्य की बात करते हुए मनोज तिवारी ने यह भी साफ किया कि समय के साथ अब उनके आपसी संबंधों में काफी बदलाव आ चुका है। वर्तमान में दोनों ही दिग्गज कलाकार भारतीय जनता पार्टी के बैनर तले सक्रिय राजनीति का हिस्सा हैं और एक ही दल में होने के कारण अब उनके बीच पहले जैसी सीधे तौर पर कोई व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता नहीं बची है। वे दोनों अब अच्छे मित्र के रूप में एक-दूसरे के साथ खड़े दिखाई देते हैं और राजनीतिक रैलियों तथा सार्वजनिक कार्यक्रमों में एक मंच भी साझा करते हैं।

    परंतु, जब बात भोजपुरी सिनेमा को देश-दुनिया में असली पहचान दिलाने और उसकी रीढ़ बनने की आती है, तो दोनों के बीच की यह वैचारिक जंग और खुद को श्रेष्ठ साबित करने की होड़ आज भी वैसी ही बनी हुई है जैसी सालों पहले फिल्मों के बॉक्स ऑफिस क्लैश के दौरान हुआ करती थी। इस ताजा बयानबाजी ने यह साफ कर दिया है कि भले ही समय बदल गया हो और दोनों के रास्ते राजनीति में आकर मिल गए हों, लेकिन भोजपुरी सिनेमा के इतिहास में अपना नाम सबसे ऊपर दर्ज कराने की यह लड़ाई इतनी जल्दी शांत होने वाली नहीं है।