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  • ट्रंप और जिनपिंग के साथ बैठक करेंगे पुतिन….त्रिपक्षीय शिखर सम्मेलन का रखा प्रस्ताव

    ट्रंप और जिनपिंग के साथ बैठक करेंगे पुतिन….त्रिपक्षीय शिखर सम्मेलन का रखा प्रस्ताव


    मास्को।
    रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (Russian President Vladimir Putin) ने अगले महीने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Chinese President Xi Jinping) के साथ एक त्रिपक्षीय शिखर सम्मेलन का प्रस्ताव रखा है। इस सम्मेलन में यूक्रेन संघर्ष पर चर्चा होगी। इसका उद्देश्य एक ऐसा शांति समझौता करना है जो मॉस्को के पक्ष में हो। यह जानकारी ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ (WSJ) की रिपोर्ट के अनुसार है।

    रिपोर्ट के अनुसार, यह प्रस्ताव राष्ट्रपति ट्रंप के साथ बेहतर होते संबंधों का फायदा उठाने की पुतिन की कोशिश को दिखाता है। इस कदम ने यूक्रेन और वाशिंगटन के यूरोपीय सहयोगियों के बीच चिंताएं पैदा कर दी हैं, खासकर इसलिए क्योंकि इसमें यूक्रेन का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है।


    पुतिन ने बातचीत का प्रस्ताव कब रखा?

    इस मामले की जानकारी रखने वाले रूस के एक पूर्व खुफिया अधिकारी का हवाला देते हुए, डब्लूएसजे ने बताया कि पुतिन ने सबसे पहले 9 अक्तूबर को ट्रंप के साथ फोन पर बातचीत के दौरान एक त्रिपक्षीय बैठक का विचार रखा था। इसी बातचीत के दौरान एक समझौता भी हुआ, जिसके तहत अमेरिका को रूस से डीजल खरीदने और उसे वैश्विक बाजारों में वितरित करने की अनुमति मिल गई।


    क्रेमलिन के प्रवक्ता ने क्या कहा?

    क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने डब्लूएसजे को पुष्टि की कि एक संभावित बैठक को लेकर बातचीत चल रही है। पेस्कोव ने डब्लूएसजे से कहा, ‘बैठक या इसके संभावित एजेंडे को लेकर अभी तक कोई स्पष्ट सहमति नहीं बनी है, हालांकि तीनों पक्ष इस बात को मानते हैं कि ऐसी बैठक होने की एक संभावना हो सकती है।’


    अमेरिका के एक वरिष्ठ अधिकारी ने क्या कहा?

    वहीं, अमेरिका के एक वरिष्ठ अधिकारी ने ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ को बताया कि ट्रंप ने इस शिखर सम्मेलन के लिए औपचारिक रूप से सहमति नहीं दी है, लेकिन अधिकारी ने संकेत दिया कि युद्ध को सुलझाने की अपनी कोशिशों को देखते हुए, अमेरिकी राष्ट्रपति इस प्रस्ताव पर विचार कर सकते हैं।


    कब हो सकती है बैठक?

    बातचीत से जुड़े सूत्रों ने ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ को बताया कि क्रेमलिन ने सुझाव दिया है कि यह त्रिपक्षीय वार्ता आगामी ‘एशिया-पैसिफिक इकोनॉमिक कोऑपरेशन’ (APEC) शिखर सम्मेलन के साथ आयोजित की जा सकती है। यह सम्मेलन 18 और 19 नवंबर को दक्षिणी चीन के टेक हब, शेन्जेन में होने वाला है।

    मॉस्को और बीजिंग के बीच हाल ही में हुई बातचीत से जुड़े सूत्रों ने ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ को बताया कि रूसी राजनयिकों ने चीनी अधिकारियों के सामने एक प्रस्ताव रखा। चीनी अधिकारियों ने संकेत दिया कि अगर ट्रंप इसमें शामिल होने के लिए सहमत हो जाते हैं, तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी।


    ट्रंप ने जेलेंस्की पर क्या आरोप लगाया?

    रविवार को ट्रंप ने दावा किया कि रूस-यूक्रेन संघर्ष को खत्म करने के लिए चल रही बातचीत में काफी प्रगति हो रही है। उन्होंने मॉस्को के प्रति अपने प्रशासन के राजनयिक रुख का बचाव किया और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की पर आरोप लगाया कि वे दो साल पहले एक बेहतर समझौता करने में विफल रहे थे।

    इसके साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस और रूसी ऊर्जा खरीदने वाले बड़े देशों पर नए कड़े प्रतिबंधों और टैरिफ को फिलहाल लागू न करने के अपने फैसले का बचाव किया है। उनका कहना है कि वह यूक्रेन युद्ध को खत्म करने के लिए चल रही शांति वार्ता को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहते। ट्रंप ने कहा कि उनकी सरकार युद्ध को खत्म करने के लिए बातचीत में प्रगति कर रही है। उनके मुताबिक, अगर इस समय रूस पर नए आर्थिक दबाव डाले गए, तो वह बातचीत की मेज छोड़ सकता है।

  • रोजगार संकट की ओर बढ़ रही दुनिया….विश्व बैंक के अध्यक्ष बोले- 10 साल में 80 करोड़ युवा होंगे बेरोजगार

    रोजगार संकट की ओर बढ़ रही दुनिया….विश्व बैंक के अध्यक्ष बोले- 10 साल में 80 करोड़ युवा होंगे बेरोजगार


    बैंकॉक।
    विश्व बैंक के अध्यक्ष अजय बंगा (World Bank President Ajay Banga) ने भविष्य के रोजगार संकट (Employment Crisis) को लेकर चौंकाने वाली चेतावनी जारी की है। बंगा ने अनुमान जताया है कि अगले 10-15 वर्षों में दुनिया भर के लगभग 120 करोड़ कुशल (स्किल्ड) युवा रोजगार बाजार में प्रवेश करेंगे लेकिन रोजगार 40 करोड़ को ही मिल पाएगा।

    बैंकॉक में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) International Monetary Fund – IMF) और विश्व बैंक समूह की वार्षिक बैठकों के पूर्ण सत्र को संबोधित करते हुए बंगा ने कहा कि आने वाले समय में लगभग 80 करोड़ युवाओं के सामने बेरोजगारी का बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। विश्व बैंक अध्यक्ष ने चेतावनी दी कि विकासशील देश इस समय दोहरी मार झेल रहे हैं। एक तरफ उन पर विदेशी कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है, तो दूसरी तरफ विकास कार्यों के लिए मिलने वाली अंतरराष्ट्रीय सहायता में भारी कमी आई है। इसके साथ ही दुनिया भर में चल रहे लगातार युद्ध और तनाव के कारण वैश्विक विकास भी प्रभावित हो रहा है। सरकारों के पास विकास योजनाओं और रोजगार सृजन के लिए बजट की भारी कमी है। बंगा ने वैश्विक नेताओं और नीति निर्माताओं से अपील की है कि वे भविष्य को देखते हुए अपनी आर्थिक नीतियों में तत्काल सुधार करें।


    भारतीय उपमहाद्वीप के युवाओं पर दोहरा असर

    भारतीय उपमहाद्वीप (भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, नेपाल) दुनिया के सबसे युवा क्षेत्रों में से है, जहां अकेले भारत के श्रम बाजार में हर साल लगभग 1.2 करोड़ (12 मिलियन) युवा प्रवेश करते हैं। नीतियों के क्रियान्वयन के आधार पर युवाओं पर इसके दोहरे प्रभाव पड़ सकते हैं। यदि विश्व बैंक के मॉडल के अनुसार निजी क्षेत्र और बुनियादी ढांचे में निवेश बढ़ता है, तो बड़े पैमाने पर गुणवत्तापूर्ण नौकरियां पैदा होंगी। इससे युवाओं को वित्तीय स्वतंत्रता और बेहतर जीवन स्तर मिलेगा।

    जहां विकसित देशों की आबादी बूढ़ी हो रही है, वहीं भारतीय उपमहाद्वीप के युवा यदि कौशल के मामले में अपग्रेड हो जाते हैं, तो वे वैश्विक नौकरी बाजार की जरूरतों को पूरा कर सकेंगे। विश्व बैंक के कार्यक्रमों (जैसे भारत में आईटीआई का आधुनिकीकरण) में कम से कम 25% से 30% महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की जा रही है, जिससे युवा महिलाओं को उच्च वेतन वाली नौकरियों में आने का अवसर मिलेगा।


    सार्वजनिक वित्त, निजी निवेश का मॉडल सुझाया

    इस संकट से निपटने के लिए विश्व बैंक के अध्यक्ष ने सार्वजनिक वित्त, निजी निवेश, तकनीक और परोपकार को एक साथ जोड़ने वाला नया विकास मॉडल सुझाया है। विश्व बैंक के अनुसार, 90% नौकरियां निजी क्षेत्र से आती हैं। इसलिए, सरकारों को व्यापार-अनुकूल नियामक सुधार करने चाहिए और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों को आसानी से ऋण उपलब्ध कराना चाहिए ताकि वे बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित कर सकें।

    विश्व बैंक ने पांच प्रमुख क्षेत्रों की पहचान की है जो सबसे ज्यादा नौकरियां दे सकते हैं। इसमें बुनियादी ढांचा, मूल्यवर्धित विनिर्माण, तकनीक-संचालित कृषि, स्वास्थ्य सेवा और पर्यटन शामिल है। विश्व बैंक ने पारंपरिक शिक्षा के बजाय युवाओं को डिजिटल तकनीक, एआई और उद्योगों की बदलती मांगों के अनुसार प्रशिक्षित करने पर जोर दिया है। इसके साथ ही दक्षिण एशिया के कार्यबल के लिए पर्यावरण के अनुकूल या ‘ग्रीन जॉब्स’ के लिए मौजूदा कौशलों को थोड़ा अपग्रेड या अनुकूलित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया है।


    रोजगार अंतर नहीं पाटा गया तो नकारात्मक प्रभाव भी

    दक्षिण एशिया में पहले से ही रोजगार की कमी के चलते युवाओं में असंतोष देखा गया है। यदि इस 80 करोड़ के वैश्विक रोजगार अंतर को पाटने में विफलता मिलती है, तो उपमहाद्वीप में सामाजिक अस्थिरता और विरोध प्रदर्शन बढ़ सकते हैं। स्थानीय स्तर पर सम्मानजनक नौकरियां न मिलने पर युवाओं में विदेशों की ओर पलायन करने (अवैध प्रवासन सहित) का दबाव काफी ज्यादा बढ़ जाएगा। साथ ही डिग्री होने के बावजूद सही हुनर न होने से युवा ‘बेरोजगार’ या ‘अंडर-एम्प्लॉयड’ (योग्यता से कम स्तर का काम करने वाले) रह जाएंगे, जिससे गरीबी का दुष्चक्र बना रहेगा।

  • इक्वाडोर के चर्च में लाइव प्रार्थना के दौरान पादरी पर गिरा ईसा मसीह का भारी क्रॉस, सिर में गंभीर चोट से मौत

    इक्वाडोर के चर्च में लाइव प्रार्थना के दौरान पादरी पर गिरा ईसा मसीह का भारी क्रॉस, सिर में गंभीर चोट से मौत

    नई दिल्ली । दक्षिण अमेरिकी देश इक्वाडोर के गुआयाक्विल शहर में चर्च के भीतर एक दर्दनाक हादसा हुआ। यहां प्रार्थना सभा के लाइव प्रसारण के दौरान कैथोलिक पादरी पैट्रिक अल्फ्रेडो सांचेज मोलिनारी के ऊपर अचानक ईसा मसीह का भारी लकड़ी का क्रॉस गिर गया। इस हादसे में पादरी के सिर पर गंभीर चोट लगी, जिसके कारण उनकी मौत हो गई। घटना 17 अक्टूबर की बताई गई है। जिस समय यह दुर्घटना हुई, उस वक्त चर्च में प्रार्थना सेवा चल रही थी और उसका सोशल मीडिया पर सीधा प्रसारण किया जा रहा था। हादसे का दृश्य कैमरे में रिकॉर्ड हो गया, जिसके बाद इसका वीडियो तेजी से फैलने लगा।

    यह घटना गुआयाक्विल स्थित न्यूस्ट्रा सेनोरा डेल परपेटुआ सोकोरो चर्च में हुई। जानकारी के मुताबिक, पादरी सांचेज मोलिनारी चर्च में मंच के पास खड़े होकर धार्मिक अनुष्ठान कर रहे थे और लोगों को संबोधित कर रहे थे। इसी दौरान दीवार पर लगा भारी लकड़ी का क्रूसीफिक्स अचानक अपनी जगह से उखड़ गया और सीधे उनके सिर पर आ गिरा। क्रूसीफिक्स ईसा मसीह को क्रॉस पर दर्शाने वाला धार्मिक प्रतीक होता है। अचानक हुए इस हादसे से वहां मौजूद लोगों में अफरा-तफरी मच गई। पादरी को गंभीर चोट लगने के कारण उनकी जान नहीं बचाई जा सकी।

    इस पूरी घटना का प्रसारण इंटरनेट पर लाइव हो रहा था। बताया गया कि हजारों लोग उस समय प्रार्थना सभा को देख रहे थे। इसी वजह से हादसे का दृश्य बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच गया। वीडियो में पादरी को चर्च के भीतर खड़े होकर श्रद्धालुओं को संबोधित करते देखा जा सकता है। कुछ ही क्षणों बाद उनके ऊपर क्रॉस गिर जाता है और वह नीचे गिर पड़ते हैं। घटना की अचानक हुई प्रकृति और धार्मिक सभा के दौरान हुई इस दुर्घटना ने लोगों को स्तब्ध कर दिया।

    पादरी की मौत की पुष्टि कैथोलिक प्रशासन ने रविवार को की। उनके निधन के बाद धार्मिक समुदाय की ओर से शोक व्यक्त किया गया। पादरी सांचेज मोलिनारी के लिए साझा किए गए एक भावुक संदेश में कहा गया कि वह ईश्वर के पास चले गए हैं। संदेश में उनके लिए शाश्वत शांति की प्रार्थना की गई और उनकी आत्मा को शांति मिलने की कामना की गई। उनके निधन से जुड़े इस संदेश के सामने आने के बाद श्रद्धालुओं और घटना के बारे में जानने वाले लोगों ने दुख जताया।

    इस हादसे को लेकर एक और बात चर्चा में है। बताया जा रहा है कि क्रॉस गिरने से कुछ ही समय पहले पादरी मृत्यु के विषय पर लोगों को संबोधित कर रहे थे। वह श्रद्धालुओं को जीवन की नश्वरता और ईश्वर के साथ बिताए समय के महत्व के बारे में समझा रहे थे। उनके कथित अंतिम संबोधन में कहा गया था कि एक दिन यहां मौजूद सभी लोगों को मृत्यु का सामना करना पड़ेगा। उन्होंने यह भी कहा था कि दूसरी गतिविधियों में समय बिताने की तुलना में ईश्वर, भाई-बहनों और परिवार के साथ बिताया गया समय अधिक महत्वपूर्ण होता है।

    पादरी के कथित अंतिम शब्दों को लेकर इंटरनेट पर कई तरह की चर्चाएं हो रही हैं। हालांकि, इन शब्दों की स्वतंत्र पुष्टि की जानकारी उपलब्ध नहीं है। इसलिए इन्हें उनके प्रमाणित अंतिम शब्द मानने के बजाय घटना से जुड़े दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए।चर्च में हुई इस दुर्घटना ने धार्मिक कार्यक्रमों के लाइव प्रसारण के दौरान सामने आए एक अप्रत्याशित हादसे की ओर लोगों का ध्यान खींचा है। फिलहाल उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पादरी की मौत भारी लकड़ी का क्रूसीफिक्स सिर पर गिरने से लगी गंभीर चोट के कारण हुई। प्रार्थना सभा के दौरान हुई इस घटना का वीडियो सामने आने के बाद मामला व्यापक चर्चा में आ गया है।

  • फ्रांस में हिंसक प्रदर्शन से बिगड़े हालात, ट्रंप ने मैक्रों से सीमाएं बंद करने को कहा, वेंस ने भी उठाए सवाल

    फ्रांस में हिंसक प्रदर्शन से बिगड़े हालात, ट्रंप ने मैक्रों से सीमाएं बंद करने को कहा, वेंस ने भी उठाए सवाल

    नई दिल्ली । फ्रांस में महंगाई, शिक्षा व्यवस्था और सरकारी सेवाओं की स्थिति को लेकर शुरू हुए विरोध प्रदर्शन हिंसक घटनाओं में बदल गए हैं। 17 अक्टूबर को हुए प्रदर्शनों के बाद 18 अक्टूबर को देश के कई हिस्सों में तोड़फोड़, दुकानों में लूटपाट और आगजनी की घटनाएं सामने आईं। इन घटनाओं के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस की स्थिति पर प्रतिक्रिया देते हुए फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से देश की सीमाएं बंद करने की अपील की। ट्रंप ने चेतावनी दी कि यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो हालात और बिगड़ सकते हैं। वहीं, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी फ्रांस में हुई हिंसा को लेकर वहां की सरकारों की नीतियों और विविधता से जुड़े मुद्दों पर सवाल उठाए हैं।

    ट्रंप ने फ्रांस में हो रही घटनाओं को लेकर कहा कि देश में बाहर से आने वाले ऐसे लोगों की वजह से हालात बिगड़ रहे हैं, जिनके दिलों में नफरत है। उन्होंने फ्रांस को एक महान देश बताते हुए कहा कि इस तरह की परिस्थितियां देश को कमजोर कर सकती हैं। ट्रंप ने मैक्रों से आग्रह किया कि बहुत देर होने से पहले सीमाओं को बंद कर नियंत्रण स्थापित किया जाए। उनके बयान के बाद फ्रांस में विरोध प्रदर्शनों और आव्रजन नीतियों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है।

    इससे पहले ट्रंप ने फ्रांस की क्रांति से जुड़े ऐतिहासिक संदर्भ का उल्लेख करते हुए मजाकिया अंदाज में कहा था कि फ्रांस क्रांति के लिए प्रसिद्ध है और लोग वहां जाकर क्रांति में शामिल हो सकते हैं। हालांकि, हिंसक घटनाओं के बाद उनका रुख अधिक सख्त नजर आया। उन्होंने मौजूदा स्थिति को फ्रांस के लिए गंभीर बताते हुए सीमाओं पर नियंत्रण को जरूरी बताया।

    अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी फ्रांस में हुई हिंसा पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों की उदारवादी सरकारों ने दया और विविधता के नाम पर तीसरी दुनिया के लोगों को फ्रांस सहित दूसरे देशों में आने दिया, लेकिन उनके समाज में घुलने-मिलने और अनुकूलता से जुड़े बुनियादी सवालों को नजरअंदाज किया गया। वेंस के अनुसार, सरकारों को पहले ही संभावित समस्याओं को लेकर चेतावनी दी गई थी, लेकिन समय रहते आवश्यक कदम नहीं उठाए गए।

    लिमोजेस शहर के ऐतिहासिक सिटी हॉल में आग लगने की घटना का उल्लेख करते हुए वेंस ने चिंता जताई। यह इमारत करीब 143 साल पुरानी है और आग के कारण इसका कुछ हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया। वेंस ने उम्मीद जताई कि फ्रांस इस स्थिति पर काबू पाएगा और अपनी ऐतिहासिक इमारतों को आगे होने वाले नुकसान से बचा सकेगा। उन्होंने अमेरिकी नागरिकों से भी फ्रांस में हो रही घटनाओं पर ध्यान देने की अपील की।

    फ्रांस में विरोध प्रदर्शनों का मुख्य कारण महंगाई, शिक्षा व्यवस्था की समस्याएं और सरकारी सेवाओं की खराब स्थिति बताई गई है। इन मुद्दों को लेकर छात्र, ट्रेड यूनियन और अन्य समूह सड़कों पर उतरे थे। फ्रांस के गृह मंत्रालय के अनुसार, 17 अक्टूबर को हुए प्रदर्शनों में करीब 5 लाख 50 हजार लोग शामिल हुए। वहीं, आयोजकों ने प्रदर्शनकारियों की संख्या लगभग 8 लाख बताई। इस तरह प्रदर्शनों में शामिल लोगों की संख्या को लेकर सरकारी आंकड़ों और आयोजकों के दावों में अंतर सामने आया।

    प्रदर्शन शुरुआत में आर्थिक परेशानियों और सार्वजनिक सुविधाओं से जुड़ी शिकायतों को लेकर किए गए थे, लेकिन बाद में कई जगहों पर स्थिति हिंसक हो गई। कुछ समूहों की पुलिस के साथ झड़प हुई, दुकानों में लूटपाट की गई और कई शहरों में इमारतों को आग के हवाले कर दिया गया। अधिकारियों के मुताबिक, घटनाओं के बाद करीब 1800 लोगों को गिरफ्तार किया गया। हिंसा के दौरान सैकड़ों पुलिसकर्मी और आपातकालीन सेवाओं से जुड़े कर्मचारी भी घायल हुए।

    लिमोजेस में ऐतिहासिक सिटी हॉल को नुकसान पहुंचने की घटना ने स्थिति की गंभीरता को और स्पष्ट किया है। विरोध प्रदर्शनों के पीछे आर्थिक और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़ी शिकायतें हैं, जबकि अमेरिकी नेतृत्व ने आव्रजन और विविधता की नीतियों को लेकर अलग दृष्टिकोण सामने रखा है। फिलहाल फ्रांस में हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं और हिंसक घटनाओं के बाद स्थिति को नियंत्रित करना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती है।

  • खुद IMF से मांग रहा मदद, अब दुनिया को कर्ज संभालना सिखाएगा पाकिस्तान, बॉरोअर्स प्लेटफॉर्म की मिली कमान

    खुद IMF से मांग रहा मदद, अब दुनिया को कर्ज संभालना सिखाएगा पाकिस्तान, बॉरोअर्स प्लेटफॉर्म की मिली कमान


    नई दिल्ली। खुद अरबों डॉलर के विदेशी कर्ज के बोझ तले दबा पाकिस्तान अब दूसरे विकासशील देशों को कर्ज प्रबंधन के गुर सिखाने और उनकी आर्थिक चिंताओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने की जिम्मेदारी निभाएगा। संयुक्त राष्ट्र के समर्थन वाले ‘बॉरोअर्स प्लेटफॉर्म’ यानी कर्ज लेने वाले देशों के मंच की अध्यक्षता पाकिस्तान को मिली है। पाकिस्तान के वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगजेब ने 12 अक्टूबर को बैंकॉक में मंच की गवर्निंग काउंसिल के अध्यक्ष का पद संभाला।

    पाकिस्तान की इस नियुक्ति पर इसलिए चर्चा हो रही है, क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था लंबे समय से बाहरी वित्तीय मदद पर निर्भर है। हालांकि, इस मंच की अगुवाई करने से पाकिस्तान का अपना कर्ज कम नहीं होगा। न ही उसे कर्ज चुकाने की शर्तों में किसी तरह की विशेष राहत मिलेगी। इस मंच का उद्देश्य विकासशील देशों को कर्ज प्रबंधन के अनुभव साझा करने, आर्थिक सुधारों पर चर्चा करने और विकास के लिए वित्त जुटाने के बेहतर विकल्प तलाशने का अवसर देना है।

    IMF से फिर मदद की उम्मीद, पहले भी मिल चुके हैं राहत पैकेज

    पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वह लगातार अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से वित्तीय सहायता मांगता रहा है। 7 अक्टूबर को पाकिस्तान और IMF के बीच एक समझौते पर सहमति बनी थी। इसके तहत पाकिस्तान को करीब 1.21 अरब डॉलर की मदद मिल सकती है। हालांकि, इस सहायता के लिए IMF के कार्यकारी बोर्ड की मंजूरी जरूरी है।

    इससे पहले 2023 में पाकिस्तान को 3 अरब डॉलर का IMF राहत पैकेज मिला था, जिसने उसे संप्रभु डिफॉल्ट यानी कर्ज चुकाने में पूरी तरह नाकाम होने की स्थिति से बचने में मदद की। इसके बाद 2024 में देश के लिए 7 अरब डॉलर का एक और कार्यक्रम मंजूर किया गया। जलवायु से जुड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए पाकिस्तान ने IMF से 1.3 अरब डॉलर का अलग ऋण भी हासिल किया।

    स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान के आंकड़ों के मुताबिक, मार्च 2026 के अंत तक देश का कुल बाहरी कर्ज और देनदारियां 137.55 अरब डॉलर थीं। ऐसे में कर्ज प्रबंधन से जुड़े मंच की अध्यक्षता मिलना पाकिस्तान के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक अहम जिम्मेदारी है, लेकिन इससे उसकी आर्थिक चुनौतियां अपने आप दूर नहीं होंगी।

    क्या है बॉरोअर्स प्लेटफॉर्म?

    बॉरोअर्स प्लेटफॉर्म विकासशील देशों के लिए बनाया गया ऐसा मंच है, जहां कर्ज लेने वाले देश अपनी समस्याओं, अनुभवों और आर्थिक सुधारों से जुड़े उपायों पर चर्चा कर सकते हैं। इसका उद्देश्य कर्ज के बेहतर प्रबंधन, विकास के लिए वित्त जुटाने और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था में कर्जदार देशों की चिंताओं को मजबूती से सामने लाने के लिए स्थायी व्यवस्था तैयार करना है।

    इस मंच को संयुक्त राष्ट्र की संस्था UNCTAD यानी व्यापार और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन का सचिवालय सहयोग देता है। इसका विचार जुलाई 2025 में स्पेन के सेविले में आयोजित विकास वित्त सम्मेलन के दौरान सामने आया था। इसके बाद 15 अप्रैल 2026 को वॉशिंगटन में इसे औपचारिक रूप से शुरू किया गया।

    अब तक कर्ज देने वाले देशों के बीच समन्वय के लिए कई व्यवस्थाएं मौजूद रही हैं, लेकिन कर्ज लेने वाले देशों के पास आपसी सहयोग के लिए ऐसा स्थायी मंच नहीं था। बॉरोअर्स प्लेटफॉर्म इसी कमी को दूर करने की कोशिश है।

    UNCTAD में कर्ज और विकास से जुड़े मामलों की प्रमुख पेनेलोप हॉकिन्स ने अप्रैल में मंच की शुरुआत के दौरान कहा था कि कर्ज देने वाले देशों के समूह ‘पेरिस क्लब’ को इस तरह के समन्वय का करीब 70 साल का अनुभव है।

    पाकिस्तान पहले से रहा है मंच की तैयारी में शामिल

    पाकिस्तान इस मंच को तैयार करने की प्रक्रिया में पहले से भागीदारी कर रहा था। वह मिस्र की अगुवाई वाले कार्य समूह का उपाध्यक्ष था। इस समूह में कोलंबिया, होंडुरास, मालदीव, नेपाल और जाम्बिया भी शामिल थे। समूह ने मंच के कामकाज, सदस्यता और संचालन से जुड़े नियम तैयार करने में योगदान दिया।

    UNCTAD के अनुसार, मंच के सदस्य हर साल अपना अध्यक्ष चुनते हैं। इसकी गवर्निंग काउंसिल में वित्त मंत्री, केंद्रीय बैंक के गवर्नर और अन्य वरिष्ठ अधिकारी शामिल होते हैं, जो मंच की प्राथमिकताएं तय करते हैं। वहीं, संचालन समिति तकनीकी और व्यावहारिक कामकाज संभालती है।

    कर्ज प्रबंधन और आर्थिक सुधारों पर रहेगा जोर

    पाकिस्तान के वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगजेब ने कहा है कि उनका देश कर्ज प्रबंधन को बेहतर बनाने, आर्थिक सुधारों के अनुभव साझा करने और विकास के लिए वित्त जुटाने के नए तरीके तलाशने पर ध्यान देगा। उन्होंने योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करने और उनके नतीजों का आकलन करने की जरूरत पर भी जोर दिया है।

    हालांकि, अध्यक्ष के रूप में पाकिस्तान को दूसरे देशों के कर्ज की शर्तों पर बातचीत करने या अपने लिए भुगतान में राहत हासिल करने का अधिकार नहीं मिलेगा। UNCTAD के मुताबिक, यह मंच अपने सदस्यों की ओर से कर्ज की शर्तों या भुगतान को लेकर बातचीत नहीं करेगा। इसके बजाय यह कर्ज से जुड़ी मौजूदा व्यवस्थाओं के साथ मिलकर काम करेगा।

    कुल मिलाकर, पाकिस्तान की भूमिका कर्ज से परेशान विकासशील देशों को एक साझा मंच उपलब्ध कराने, उनके अनुभवों का आदान-प्रदान बढ़ाने और उनकी समस्याओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने की होगी। मंच की अध्यक्षता से उसे कूटनीतिक भूमिका निभाने का अवसर जरूर मिलेगा, लेकिन अपने विदेशी कर्ज और उसे चुकाने की जिम्मेदारी से उसे कोई छूट नहीं मिलेगी।

  • भारत-चीन पर रूस से तेल खरीदने के लिए प्रतिबंध चाहता था अमेरिका, यूरोप ने किया इनकार, ऐसी खुली पोल

    भारत-चीन पर रूस से तेल खरीदने के लिए प्रतिबंध चाहता था अमेरिका, यूरोप ने किया इनकार, ऐसी खुली पोल


    नई दिल्ली। रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर भारत और चीन के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंधों की रणनीति को लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन का रुख चर्चा में है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा है कि अमेरिका चाहता था कि यूरोपीय देश रूसी तेल खरीदने के लिए भारत और चीन पर सेकेंडरी प्रतिबंध लगाएं, लेकिन उसके सहयोगियों ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। बेसेंट ने इस मुद्दे पर यूरोपीय देशों की नीति की आलोचना करते हुए कहा कि अमेरिका अकेले प्रतिबंधों का बोझ क्यों उठाए।

    अमेरिकी टीवी चैनल NBC के कार्यक्रम ‘मीट द प्रेस’ में बातचीत के दौरान बेसेंट ने कहा कि यूरोपीय देश एक ओर रूस के खिलाफ कार्रवाई की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर रूसी ऊर्जा का आयात भी जारी रखते हैं। उनके मुताबिक, इस तरह के आयात से रूस को यूक्रेन के खिलाफ युद्ध जारी रखने के लिए आर्थिक मदद मिलती है।

    ‘अकेला अमेरिका ही प्रतिबंधों का बोझ क्यों उठाए?’

    बेसेंट ने कहा कि अमेरिका ने यूरोपीय सहयोगियों से भारत और चीन पर प्रतिबंध लगाने का आग्रह किया था, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया। उन्होंने सवाल उठाया कि जब यूरोपीय देश खुद रूसी ऊर्जा खरीद रहे हैं, तो अमेरिका ही इस दिशा में अकेले कदम क्यों उठाए।

    अमेरिकी वित्त मंत्री ने यूरोप के ऊर्जा आयात को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि यूरोपीय देशों ने यूक्रेन की तुलना में रूस और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को अधिक पैसा दिया है। बेसेंट के अनुसार, अमेरिका करीब 4 अरब डॉलर के रूसी उत्पादों का आयात करता है, जिसमें लगभग 1.8 अरब डॉलर का उर्वरक शामिल है। उन्होंने दावा किया कि यूरोपीय देशों का रूसी उत्पादों का आयात अमेरिका के मुकाबले करीब दस गुना है।

    प्रतिबंधों और टैरिफ पर 60 दिनों की अस्थायी छूट

    अमेरिकी प्रशासन के मुताबिक, रूस पर प्रतिबंधों और भारत समेत अन्य देशों पर टैरिफ से जुड़ी छूट को 60 दिनों के लिए अस्थायी रूप से दिया गया है। इसका उद्देश्य इन उपायों के आर्थिक प्रभाव का आकलन करना है।

    वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट और विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि ‘लिंडसे ओ’ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट’ के तहत राष्ट्रपति को परिस्थितियों का आकलन करने की छूट है। बेसेंट के मुताबिक, शुक्रवार को राष्ट्रपति ट्रंप के कार्यकारी आदेश के जरिए 60 दिनों की छूट दी गई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसे स्थायी रूप से प्रतिबंध हटाने के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।

    विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भारत और उज्बेकिस्तान की छह दिवसीय यात्रा पर रवाना होने से पहले पत्रकारों से बातचीत में कहा कि राष्ट्रपति इन 60 दिनों का इस्तेमाल यह समझने के लिए करना चाहते हैं कि प्रतिबंधों और टैरिफ का वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ता है।

    रुबियो ने इस दौरान ईरान युद्ध के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर बढ़ते दबाव, सऊदी अरब में हूती हमलों और रूस-यूक्रेन युद्ध का भी उल्लेख किया।

    ट्रंप ने फैसले को बताया था अमेरिका और दुनिया के लिए अच्छा

    शुक्रवार को मियामी के पास मार-ए-लागो रिसॉर्ट में राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने फैसले का बचाव किया था। उन्होंने इसे अमेरिका और दुनिया, दोनों के लिए अच्छा निर्णय बताया। हालांकि, इस कदम को लेकर अमेरिकी राजनीति में विरोध भी सामने आया है। रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टी के कुछ सांसदों ने फैसले पर सवाल उठाए हैं।

    भारतीय-अमेरिकी सांसद अमी बेरा ने सोशल मीडिया पर कहा कि ट्रंप का कदम रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को राहत देने और यूक्रेन को पीछे छोड़ने जैसा है। वहीं, सांसद सुहास सुब्रमण्यम ने भी ट्रंप प्रशासन के रुख की आलोचना करते हुए कहा कि सहयोगियों की ढिलाई की कीमत अमेरिका और उसके साझेदारों को चुकानी पड़ रही है।

    रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर भारत और चीन के खिलाफ प्रतिबंधों को लेकर अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच मतभेद ऐसे समय सामने आए हैं, जब यूक्रेन युद्ध और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर अंतरराष्ट्रीय दबाव बना हुआ है। फिलहाल 60 दिनों की अस्थायी छूट के बाद अमेरिकी प्रशासन की अगली रणनीति पर नजर रहेगी।

  • यूरोप में महंगाई और कम वेतन के खिलाफ सड़कों पर उतरे लाखों लोग, फ्रांस में हिंसा और आगजनी के बाद हजार से ज्यादा गिरफ्तार

    यूरोप में महंगाई और कम वेतन के खिलाफ सड़कों पर उतरे लाखों लोग, फ्रांस में हिंसा और आगजनी के बाद हजार से ज्यादा गिरफ्तार


    नई दिल्ली ।
    यूरोप के कई देशों में बढ़ती महंगाई, कम वेतन, महंगे मकानों और सार्वजनिक सेवाओं की खराब स्थिति के खिलाफ 17 अक्टूबर को बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। फ्रांस, बेल्जियम, इटली और पुर्तगाल में हजारों से लेकर बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरे। प्रदर्शनकारियों ने जीवनयापन की बढ़ती लागत और आम लोगों की आर्थिक परेशानियों को लेकर नाराजगी जताई। फ्रांस में कई जगह प्रदर्शन के दौरान हिंसा, आगजनी, तोड़फोड़ और दुकानों में लूटपाट की घटनाएं सामने आईं। पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आंसू गैस और बल प्रयोग किया। फ्रांस में अधिकारियों के अनुसार, प्रदर्शनों में 5.5 लाख से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया, जबकि आयोजकों के अनुमान इससे ज्यादा बताए गए।

    फ्रांस में प्रदर्शन की शुरुआत स्कूलों की स्थिति और शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी चिंताओं के साथ हुई थी। बाद में आंदोलन का दायरा बढ़ा और इसमें ईंधन की बढ़ती कीमतों, महंगाई, कम वेतन तथा जीवनयापन की लागत जैसे मुद्दे भी शामिल हो गए। पेरिस, मार्सेई, नीस, नांत, बोर्डो, लिमोज, लिली, टूलूज और स्ट्रासबर्ग समेत कई शहरों में प्रदर्शन हुए। कुछ स्थानों पर प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें हुईं। कई दुकानों और सार्वजनिक प्रतिष्ठानों में तोड़फोड़ तथा लूटपाट की घटनाएं भी दर्ज की गईं।

    लिमोज शहर में 143 साल पुराने ऐतिहासिक टाउन हॉल में आग लगा दी गई। इस घटना में इमारत को भारी नुकसान पहुंचा। स्थानीय अधिकारियों के अनुसार, आग के कारण उसकी छत नीचे की मंजिलों पर गिर गई। शुरुआती जानकारी में इमारत के बाहरी हिस्से का करीब दो-तिहाई भाग नष्ट होने की बात कही गई। अधिकारियों ने इसे शहर की ऐतिहासिक विरासत के लिए बड़ा नुकसान बताया। हिंसा के दौरान कई अन्य स्थानों पर भी आगजनी और सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं सामने आईं। हालांकि, बड़ी संख्या में लोगों ने शांतिपूर्ण मार्च में भी हिस्सा लिया।

    फ्रांस में हिंसा के बाद गिरफ्तारियों का आंकड़ा एक हजार से अधिक पहुंच गया। अलग-अलग समय पर जारी रिपोर्टों में गिरफ्तारी की संख्या में अंतर रहा। प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठे। कुछ रिपोर्टों में प्रदर्शनकारियों के घायल होने और नाबालिगों के साथ पुलिस के व्यवहार पर विवाद का उल्लेख किया गया। इन मामलों में अंतिम स्थिति संबंधित जांच और आधिकारिक जानकारी पर निर्भर करेगी।

    फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन और हिंसक गतिविधियों के बीच अंतर करते हुए सार्वजनिक इमारतों, दुकानों और पुलिस पर हमला करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की बात कही। सरकार ने स्पष्ट किया कि आगजनी, तोड़फोड़ और लूटपाट में शामिल लोगों को कानून के तहत जवाबदेह बनाया जाएगा।

    बेल्जियम में भी विरोध प्रदर्शनों के दौरान तनाव देखने को मिला। राजधानी ब्रसेल्स में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें हुईं। पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आंसू गैस और पानी की बौछारों का इस्तेमाल किया। अधिकारियों के अनुसार, कुछ प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर वस्तुएं फेंकीं और आगजनी की घटनाएं भी हुईं। लीज शहर में भी पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए पानी की बौछारों का इस्तेमाल किया। वहां शिक्षा की बढ़ती लागत और उच्च शिक्षा तक पहुंच को लेकर चिंताएं भी विरोध के प्रमुख मुद्दों में शामिल रहीं।

    पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन समेत कई शहरों में हजारों लोगों ने महंगाई, कम वेतन और आवास संकट के खिलाफ प्रदर्शन किया। लोगों ने बेहतर वेतन, पेंशन और सार्वजनिक सेवाओं की मांग उठाई। मकानों की कीमतों और किराये में लगातार बढ़ोतरी से आम लोगों के लिए घर खरीदना या किराये पर लेना मुश्किल हो रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2017 के बाद से वहां मकानों की कीमतें दोगुने से अधिक हो चुकी हैं। नए किरायेदारी समझौतों में भी किराये में तेज वृद्धि दर्ज की गई है। सरकार के संसदीय मामलों के मंत्री कार्लोस अब्रू अमोरिम ने कहा था कि सरकार सड़कों पर उठने वाले नारों के दबाव में नहीं झुकेगी। प्रदर्शनकारियों ने राजनीतिक नेतृत्व पर आम लोगों की समस्याओं से दूर रहने का आरोप लगाया।

    इटली के मिलान और बोलोन्या में भी जीवनयापन की बढ़ती लागत के खिलाफ प्रदर्शन हुए। कुछ जगहों पर प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर पत्थर फेंके और अधिकारियों के साथ झड़प की, जबकि अन्य स्थानों पर मार्च शांतिपूर्ण रहे। अलग-अलग देशों में विरोध के स्थानीय मुद्दे भले ही अलग थे, लेकिन महंगाई, आवास की बढ़ती लागत, कम वेतन और सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति को लेकर असंतोष प्रमुख रहा। इन प्रदर्शनों ने यूरोपीय सरकारों पर आर्थिक और सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए दबाव बढ़ाया है।

  • रूसी तेल खरीदने वाले भारत समेत पांच देशों को ट्रंप ने टैरिफ से दी छूट, अमेरिकी राष्ट्रपति ने फैसले की बताई वजह

    रूसी तेल खरीदने वाले भारत समेत पांच देशों को ट्रंप ने टैरिफ से दी छूट, अमेरिकी राष्ट्रपति ने फैसले की बताई वजह

    नई दिल्ली । अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से तेल और गैस खरीदने वाले भारत समेत पांच देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने से जुड़े प्रावधानों को लागू नहीं किया है। इस फैसले के बाद अमेरिकी राजनीति में बहस शुरू हो गई है। रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टी के कई नेताओं ने इस निर्णय पर सवाल उठाए हैं। वहीं, ट्रंप ने अपने कदम का बचाव करते हुए कहा कि यह अमेरिका के हित में है और इससे दुनिया को भी फायदा हो सकता है। उन्होंने कहा कि अभी कई लोगों को उनके फैसले का वास्तविक अर्थ समझ नहीं आया है।

    जिन पांच देशों को इस टैरिफ से छूट मिली है, उनमें भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान शामिल हैं। ये देश रूस से तेल और गैस खरीदते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति के फैसले के तहत इन देशों पर प्रस्तावित 100 प्रतिशत टैरिफ फिलहाल लागू नहीं होगा। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है, जब रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने और उसकी ऊर्जा खरीद से जुड़े व्यापारिक संबंधों को लेकर अमेरिका में चर्चा जारी है।

    ट्रंप ने रविवार को मियामी में मीडिया से बातचीत के दौरान अपने निर्णय का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि बहुत से लोगों को अभी यह जानकारी नहीं है कि उनके फैसले का वास्तविक मतलब क्या है। उनके मुताबिक, समय के साथ इस निर्णय के पीछे का उद्देश्य समझ में आएगा। उन्होंने यह भी कहा कि उनका कदम अमेरिका के हित में होगा और वैश्विक स्तर पर भी इसका लाभ देखने को मिल सकता है। हालांकि, उन्होंने अपने बयान में इस फैसले से होने वाले संभावित लाभों का विस्तृत विवरण नहीं दिया।

    इससे पहले शुक्रवार को ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए थे। इसके तहत रूस से संबंधित नए प्रतिबंध कानून के कुछ प्रावधानों को लागू करने से छूट दी गई। अमेरिकी कांग्रेस ने सितंबर में इस कानून को पारित किया था। इसमें रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने का प्रावधान शामिल था। भारत और चीन समेत पांच देशों को इस कार्रवाई से फिलहाल राहत मिलने के बाद कानून के क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

    आदेश के अनुसार, यह छूट तब तक लागू रहेगी, जब तक राष्ट्रपति या विदेश मंत्री और वित्त मंत्री यह तय नहीं कर लेते कि आगे क्या कार्रवाई आवश्यक है। इस व्यवस्था के कारण संबंधित देशों पर टैरिफ लगाने का निर्णय तत्काल लागू नहीं हुआ है। हालांकि, इससे भविष्य में टैरिफ लगाने की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं होती। आगे की कार्रवाई अमेरिकी प्रशासन के निर्णय पर निर्भर करेगी।

    ट्रंप के इस कदम की आलोचना उनकी अपनी रिपब्लिकन पार्टी के साथ-साथ डेमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं ने भी की है। दोनों दलों के नेताओं ने पिछले महीने इस कानून को भारी बहुमत से पारित किया था। ऐसे में राष्ट्रपति के फैसले को लेकर अमेरिकी राजनीतिक हलकों में मतभेद सामने आए हैं। आलोचकों का मानना है कि रूस पर आर्थिक दबाव बनाने के लिए इस कानून का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

    दक्षिण कैरोलिना की रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने भी फैसले पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि वह रूस पर दबाव बनाने का विकल्प चुनतीं, ताकि युद्ध समाप्त करने की दिशा में कदम उठाया जा सके और गैस की कीमतें कम हों। उन्होंने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर भरोसा नहीं होने की बात भी कही। इस कानून का नाम ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट’ रखा गया है। यह घटनाक्रम दिखाता है कि रूस से ऊर्जा खरीद और उस पर प्रतिबंधों को लेकर अमेरिकी प्रशासन तथा कांग्रेस के कुछ नेताओं के बीच मतभेद बने हुए हैं।

  • US: ट्रंप के रूख से भारत को बड़ी राहत…. 100% टैरिफ लगाने वाला फैसला फिलहाला टाला

    US: ट्रंप के रूख से भारत को बड़ी राहत…. 100% टैरिफ लगाने वाला फैसला फिलहाला टाला


    वाशिंगटन।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने भारत (India) पर 100 फीसदी टैरिफ (100% Tariff) के इरादे को टाल दिया है। ‘लिंडसे ग्राहम कानून’ (‘Lindsey Graham Law’) के तहत रूस से तेल और गैस खरीदने वाले भारत समेत पांच देशों पर कड़े प्रतिबंध लगने थे, जिसे ट्रंप ने 18 अक्तूबर की समयसीमा से पहले रोक दिया। ट्रंप के इस रुख से भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखने और अमेरिकी बाजार में अपने निर्यात को सुरक्षित रखने की दोहरी संजीवनी मिल गई है।

    ट्रंप ने शुक्रवार रात एग्जीक्यूटिव ऑर्डर में लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट के तहत निर्धारित प्रतिबंधों, पाबंदियों और शुल्कों को लागू करने से छूट दे दी। यह कदम रूस के साथ अमेरिका और वैश्विक बाजारों के लिए डीजल की सप्लाई के संबंध में समझौता होने के कुछ दिन बाद उठाया गया है। वहीं, ट्रंप ने अपने आदेश में कहा कि इस समय यह छूट देना अमेरिका के राष्ट्रीय हित में है। हालांकि, अमेरिकी सांसद रिचर्ड ब्लूमेंथल ने इस कदम की आलोचना करते हुए कहा, इन छूटों का मकसद व्लादिमीर पुतिन को खुश करना है।


    रुबियो की भारत यात्रा से ठीक पहले फैसला

    अमेरिकी कांग्रेस ने 16 सितंबर को ग्राहम अधिनियम पारित किया था। इस कानून के तहत ट्रंप को रूस से कच्चा तेल या गैस आयात करने वाले पांच सबसे बड़े देशों भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान से आने वाली वस्तुओं पर 100 प्रतिशत तक शुल्क लगाने का अधिकार मिला था।

    अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की 17 से 22 अक्टूबर के बीच भारत यात्रा प्रस्तावित है। अब दोनों देशों के बीच व्यापार, रक्षा और ऊर्जा साझेदारी पर बातचीत सकारात्मक माहौल में होगी। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने बीते महीने न्यूयॉर्क में रुबियो से मुलाकात में अधिनियम पर चिंता जताई थी।


    भारत को क्या होगा फायदा?

    सस्ते तेल की बेरोकटोक खरीद: भारत रूस से तेल खरीद जारी रख सकेगा। अगस्त में भारतीय तेल आयात में रूस का हिस्सा 44% था। यह छूट घरेलू बाजार में कीमतें स्थिर रखने में अहम है।

    नुकसान से बचाव:

    कानून लागू होता तो अमेरिका जाने वाले भारतीय सामानों पर 100% तक दंडात्मक टैरिफ लग सकता था। फैसले ने भारतीय निर्यातकों को संभावित नुकसान से बचा लिया है। प्रतिबंध टलने से भारत और अमेरिका के बीच जारी द्विपक्षीय व्यापार वार्ताओं के पटरी से उतरने का जोखिम भी खत्म हो गया है।


    ट्रंप की भी मजबूरी:

    अमेरिका में मध्यावधि चुनाव से पहले डीजल की बढ़ती कीमतों ने ट्रंप प्रशासन पर दबाव बना दिया था। खुद अमेरिका ने रूस से डीजल खरीद का समझौता किया है। ऐसे में वह भारत को कैसे रोक सकता था।


    ट्रंप की छूट से भारत को अस्थायी राहत

    थिंक टैंक जीटीआरआई ने शनिवार को कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से ‘ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट’ (SRIA) के तहत प्रतिबंधों, पाबंदियों और शुल्कों से दी गई छूट भारत को केवल अस्थायी राहत दे सकती है, लेकिन इससे कोई स्थायी निश्चितता नहीं मिलेगी। थिंक टैंक ने कहा कि ऐसे में नई दिल्ली को अपनी ऊर्जा सुरक्षा की रक्षा करनी चाहिए और वाणिज्यिक शर्तों पर तेल खरीदना जारी रखना चाहिए।

    जीटीआरआई ने कहा कि इस कानून में वाशिंगटन ने टैरिफ को फिर से लागू करने के अधिकार को अभी भी सुरक्षित रखा है। उनके मुताबिक, इस छूट की कोई निश्चित समाप्ति तारीख नहीं है और इसे कभी भी वापस लिया जा सकता है। उनके मुताबिक, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि रूसी ऊर्जा की खरीद पर नजर रखना जारी रखेंगे। इससे अमेरिकी प्रशासन को इस छूट की समीक्षा करने और जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त टैरिफ को फिर से लागू करने का मौका मिल सकता है।

  • असमानता…. दुनिया में 82.6 करोड़ लोग 3 डॉलर से कम पर गुजारा करने को मजबूर… 10% के पास 75% संपत्ति

    असमानता…. दुनिया में 82.6 करोड़ लोग 3 डॉलर से कम पर गुजारा करने को मजबूर… 10% के पास 75% संपत्ति


    नई दिल्ली।
    दुनिया में संपत्ति बढ़ रही है, लेकिन करोड़ों लोगों के जीवन में बुनियादी जरूरतें अब भी पूरी नहीं हो पा रही हैं। वैश्विक गरीबी (Global Poverty) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 82.6 करोड़ से अधिक लोग प्रतिदिन तीन डॉलर से कम पर गुजारा करने को मजबूर हैं। करीब 280 करोड़ लोगों के पास सुरक्षित, सुलभ और पर्याप्त आवास नहीं है, जबकि लगभग 380 करोड़ बीमारी, बेरोजगारी और वृद्धावस्था में सामाजिक सुरक्षा के अभाव से जूझ रहे हैं। वर्ल्ड इनइक्वैलिटी लैब (World Inequality Lab) की रिपोर्टों के अनुसार दुनिया के 10% सबसे अमीरों (10 Percent Richest) के 75% संपत्ति (75 Percent Wealth ) है, जबकि आधी आबादी के पास महज 2% संपत्ति है।


    वैश्विक आय में सिर्फ 10% हिस्सा

    रिपोर्ट के मुताबिक, आय का वितरण बेहद असमान है। दुनिया की शीर्ष 10% आबादी को कुल वैश्विक आय का आधे से अधिक हिस्सा मिलता है, जबकि निचली आधी आबादी की हिस्सेदारी 10 फीसदी से भी कम है। सबसे धनी 0.001 फीसदी यानी 60 हजार से भी कम लोग वैश्विक संपत्ति के छह फीसदी से अधिक हिस्से पर नियंत्रण रखते हैं।


    भारत की तस्वीर भी अच्छी नहीं

    भारत के शीर्ष 1% लोगों के पास राष्ट्रीय संपत्ति का करीब 40% और शीर्ष 10% के पास करीब 65% हिस्सा है। हालांकि, अलग-अलग रिपोर्टों में संपत्ति की परिभाषा, आकलन पद्धति के कारण तस्वीर एकदम स्पष्ट नहीं कही जा सकती।

    अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के आंकड़ों के अनुसार, 2025 में 28.4 करोड़ कामगार अत्यंत गरीबी में जी रहे थे। यह रोजगार प्राप्त लोगों का लगभग 7.9 फीसदी था। इससे पता चलता है कि केवल काम मिल जाना गरीबी से बाहर निकलने की गारंटी नहीं है।