Category: International

  • भारत और एस्टोनिया के बीच डिजिटल सेवाओं और साइबर सुरक्षा में सहयोग बढ़ाने की बड़ी संभावनाएं, व्यापार समझौते पर भी नजरें

    भारत और एस्टोनिया के बीच डिजिटल सेवाओं और साइबर सुरक्षा में सहयोग बढ़ाने की बड़ी संभावनाएं, व्यापार समझौते पर भी नजरें

    नई दिल्ली । भारत और एस्टोनिया के बीच डिजिटल सेवाओं, तकनीक और साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं। भारत में एस्टोनिया की राजदूत क्रिस्टी कारेलसोहन ने 21 अक्टूबर 2026 को कहा कि दोनों देशों के बीच खासकर सेवा क्षेत्र में व्यावसायिक संबंधों को आगे बढ़ाया जा सकता है। उन्होंने यह भी उम्मीद जताई कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार समझौता इस साल के अंत तक लागू हो सकता है। उनके अनुसार, इस समझौते से कारोबार में आने वाली कई बाधाओं को कम करने में मदद मिल सकती है।

    कारेलसोहन ने कहा कि एस्टोनिया की कंपनियां भारतीय कंपनियों की तुलना में आकार में अपेक्षाकृत छोटी हैं। देश में बड़े पैमाने पर विनिर्माण भी सीमित है। ऐसे में भारत जैसे विशाल बाजार में बड़े स्तर पर वस्तुओं का व्यापार और निर्यात करना एस्टोनियाई कंपनियों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। एस्टोनिया का घरेलू बाजार भी छोटा है, इसलिए वहां की कंपनियों के लिए भारत में अपने कारोबार का विस्तार करने के लिए उपयुक्त क्षेत्रों पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है।

    राजदूत के मुताबिक, एस्टोनिया की कंपनियों की प्रमुख ताकत सेवाओं के क्षेत्र में है। डिजिटल सेवाओं, तकनीकी समाधान और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच साझेदारी की अच्छी संभावनाएं हैं। इन क्षेत्रों में भारतीय बाजार की जरूरतों के अनुरूप सेवाएं और समाधान उपलब्ध कराकर व्यावसायिक संबंधों को मजबूत किया जा सकता है। उन्होंने संकेत दिया कि एस्टोनिया की कंपनियां इन क्षेत्रों में आगे विकास और सहयोग की संभावनाएं तलाश रही हैं।

    वस्तुओं के व्यापार के संबंध में उन्होंने बताया कि एस्टोनिया की कुछ कंपनियां भारत में लकड़ी से बने उत्पाद, खाद्य पदार्थ, पेय पदार्थ और अन्य वस्तुओं की आपूर्ति करती हैं। देश में कुछ उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद भी तैयार किए जाते हैं, लेकिन उनकी कीमतें प्रतिस्पर्धी स्तर पर नहीं होतीं। इसके बावजूद गुणवत्ता को प्राथमिकता देने वाले ग्राहकों के बीच ऐसे उत्पादों की मांग हो सकती है। इस वजह से भारत में एस्टोनिया के उत्पादों के लिए सीमित लेकिन संभावित बाजार मौजूद है।

    भारत और यूरोपीय संघ के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को भी उन्होंने महत्वपूर्ण बताया। एस्टोनिया यूरोपीय संघ के 27 सदस्य देशों में शामिल है। कारेलसोहन ने उम्मीद जताई कि समझौता वर्ष 2026 के अंत तक लागू हो सकता है। उनके अनुसार, इससे मौजूदा सीमा शुल्क में कमी लाने के साथ-साथ गैर-शुल्क बाधाओं को दूर करने में भी मदद मिल सकती है। ऐसी बाधाएं विशेष रूप से छोटी कंपनियों के लिए दूसरे देशों के बाजारों में कारोबार करना कठिन बनाती हैं।

    राजदूत ने कहा कि भारत एस्टोनिया के लिए व्यापार के लिहाज से महत्वपूर्ण बाजार है। कई देशों की तरह एस्टोनिया की भी प्राथमिकता भारत के साथ व्यावसायिक संबंधों को मजबूत करना है। वह दोनों देशों के बीच व्यापारिक संपर्कों को और विकसित करना चाहती हैं। भारत का बड़ा बाजार एस्टोनियाई कंपनियों के लिए अपनी सेवाओं और उत्पादों की पहुंच बढ़ाने का अवसर प्रदान करता है।

    कुल मिलाकर, भारत और एस्टोनिया के बीच सहयोग की संभावनाएं केवल पारंपरिक वस्तु व्यापार तक सीमित नहीं हैं। डिजिटल सेवाएं, तकनीक और साइबर सुरक्षा ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें दोनों देशों के व्यावसायिक संबंध आगे बढ़ सकते हैं। प्रस्तावित भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौते से भी कारोबार की परिस्थितियों में बदलाव आने की उम्मीद है। हालांकि, समझौते के लागू होने और उसके वास्तविक प्रभाव का आकलन आगे होने वाले निर्णयों तथा व्यापारिक व्यवस्थाओं पर निर्भर करेगा।

  • मैक्रों का ट्रंप-नेतन्याहू पर हमला, बोले- फ्रांस की कीमत पर चला रहे सियासी अभियान; क्या है पूरा विवाद?

    मैक्रों का ट्रंप-नेतन्याहू पर हमला, बोले- फ्रांस की कीमत पर चला रहे सियासी अभियान; क्या है पूरा विवाद?


    दोहा।
    फ्रांस में हिंसा और लूटपाट की घटनाओं के बाद राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बयानों पर कड़ी नाराजगी जताई है। मैक्रों ने आरोप लगाया कि विदेशी नेता फ्रांस के हालात का इस्तेमाल अपने राजनीतिक हित साधने के लिए कर रहे हैं। उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) से तैयार फर्जी तस्वीरों के जरिए गलत सूचनाएं फैलाए जाने पर भी सवाल उठाए। दूसरी ओर, ट्रंप ने फ्रांस में हिंसा के लिए आव्रजन को जिम्मेदार ठहराया, जबकि नेतन्याहू ने इसे ‘चरमपंथी इस्लाम का आक्रमण’ बताते हुए फ्रांसीसी सरकार की आलोचना की। घटनाओं के बाद फ्रांस के कई इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई है और कुछ स्थानों पर कर्फ्यू भी लगाया गया है।

    मैक्रों ने विदेशी नेताओं को क्या कहा?

    फ्रांस में हालिया हिंसा को लेकर ट्रंप और नेतन्याहू की टिप्पणियों के बीच मैक्रों ने विदेशी नेताओं की आलोचना की। बुधवार को कतर की राजधानी दोहा में पत्रकारों से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि कुछ नेता फ्रांस की कीमत पर अपना राजनीतिक अभियान चला रहे हैं।

    मैक्रों ने किसी का नाम लिए बिना कहा कि अटलांटिक के इस पार और उस पार, दोनों तरफ के नेता चुनावी अभियान की मुद्रा में हैं। उन्होंने कहा, “कुछ लोग फ्रांस की कीमत पर अपना अभियान चलाते हैं। इनमें ऐसे नेता भी हैं, जो यहां इस क्षेत्र में या अटलांटिक की दूसरी तरफ अपने राजनीतिक अभियान में जुटे हैं।”

    मैक्रों तीन दिवसीय कतर और खाड़ी क्षेत्र की यात्रा पर हैं। उनकी इस यात्रा का एक प्रमुख उद्देश्य फ्रांस में जीवनयापन की बढ़ती लागत के संकट के बीच देश की ऊर्जा आपूर्ति सुरक्षित करना भी है।

    ट्रंप ने फ्रांस के हालात के लिए किसे ठहराया जिम्मेदार?

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को फ्रांस में जारी विरोध प्रदर्शनों और हिंसा के लिए आव्रजन को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने दावा किया कि पेरिस जल्द ही एक मुस्लिम शहर बन जाएगा। ट्रंप ने फ्रांस की सीमाएं बंद नहीं करने को लेकर मैक्रों की आलोचना भी की।

    व्हाइट हाउस के बाहर पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि फ्रांस में जो कुछ हो रहा है, उसका संबंध स्कूलों या किसी दूसरी समस्या से नहीं, बल्कि आव्रजन से है। उन्होंने मैक्रों को अपना दोस्त बताते हुए कहा कि दुनिया भर से लोगों को फ्रांस में आने देने का फैसला गलत था।

    ट्रंप ने अमेरिकी मतदाताओं को चेतावनी देते हुए फ्रांस के हालात की तुलना अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी की संभावित जीत के परिणामों से भी की। उनके इन बयानों ने फ्रांस में आव्रजन और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया।

    एआई से बनी फर्जी तस्वीरों पर मैक्रों ने जताई नाराजगी

    मैक्रों ने कहा कि फ्रांस में हुई घटनाओं के पीछे विदेशी हस्तक्षेप के स्पष्ट संकेत नहीं हैं, लेकिन घटनाओं के बाद गलत सूचनाएं फैलाने के लिए विदेशी स्तर पर हेरफेर किया गया। उनके मुताबिक, इसके चलते कई विदेशी नेताओं की ओर से गलत और गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणियां सामने आईं।

    उन्होंने एआई की मदद से तैयार की गई उन तस्वीरों पर भी आपत्ति जताई, जिनमें फ्रांस में ऐसी घटनाएं दिखाई गईं, जो वास्तव में हुई ही नहीं थीं। मैक्रों ने कहा कि कुछ लोगों ने फ्रांस में प्रवासियों और इस्लामवादियों की भारी भीड़ के घुस आने के दावे किए।

    जब एक पत्रकार ने उनसे पूछा कि क्या उनकी टिप्पणी सीधे ट्रंप के लिए थी, तो मैक्रों ने जवाब दिया, “हां।” उन्होंने आगे कहा कि मौजूदा परिस्थितियां बताती हैं कि फ्रांस से कौन प्यार करता है और कौन नहीं। उनके अनुसार, जो लोग इस समय उनके देश के बारे में बुरा बोल रहे हैं, वे फ्रांस से प्यार नहीं करते।

    नेतन्याहू ने फ्रांस पर क्या आरोप लगाए?

    इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने मंगलवार को फ्रांस के हालात को ‘चरमपंथी इस्लाम का आक्रमण’ बताया। टाइम्स ऑफ इजरायल के मुताबिक, फ्रेंच भाषा के समाचार चैनल आई24न्यूज को दिए साक्षात्कार में नेतन्याहू ने फ्रांसीसी अधिकारियों पर स्थिति का पहले से आकलन करने में नाकाम रहने का आरोप लगाया।

    नेतन्याहू ने कहा, “उन्होंने समय रहते तैयारी नहीं की। उन्होंने बस हार मान ली। वे चरमपंथी इस्लाम के आक्रमण के आगे झुक गए।”

    फ्रांस को सलाह देने के सवाल पर नेतन्याहू ने कहा कि उसे चरमपंथियों के खिलाफ लड़ना चाहिए और तुष्टीकरण की नीति नहीं अपनानी चाहिए। उनके इस बयान ने फ्रांस में सुरक्षा, आव्रजन और धार्मिक चरमपंथ को लेकर चल रही बहस को अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक विवाद का रूप दे दिया।

    फ्रांस में कैसे हैं हालात?

    सप्ताहांत में फ्रांस के कई इलाकों में प्रदर्शन हुए। अधिकांश मार्च शांतिपूर्ण रहे, लेकिन शनिवार को लूटपाट और सुरक्षा बलों के साथ झड़पों के बाद स्थिति बिगड़ गई। इसके बाद अधिकारियों ने सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी और कुछ क्षेत्रों में कर्फ्यू लागू किया।

    बोर्दो शहर में अकेले बाहर निकलने वाले नाबालिगों के लिए एक सप्ताह का रात्रिकालीन कर्फ्यू लगाया गया है। गिरोंद और नोवेल-अकितेन की प्रीफेक्ट सोफी ब्रोका ने सोमवार को इस संबंध में आदेश घोषित किया था। यह आदेश मंगलवार से 26 अक्टूबर की सुबह तक प्रभावी रहेगा।

    आदेश के तहत 18 वर्ष से कम उम्र के नाबालिग रात 10 बजे से सुबह सात बजे तक माता-पिता या कानूनी अभिभावक के बिना सार्वजनिक स्थानों पर नहीं रह सकेंगे।

    फ्रांस की घटनाओं को लेकर अब केवल कानून-व्यवस्था ही नहीं, बल्कि आव्रजन, धार्मिक चरमपंथ, सोशल मीडिया पर गलत सूचना और विदेशी नेताओं की राजनीतिक बयानबाजी भी विवाद के केंद्र में है। मैक्रों ने जहां फ्रांस के आंतरिक मामलों पर विदेशी नेताओं की टिप्पणियों को राजनीतिक अभियान का हिस्सा बताया है, वहीं ट्रंप और नेतन्याहू ने फ्रांसीसी सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए हैं।

  • सऊदी अरब के एयरपोर्ट पर हमला, 1 की मौत और 8 घायल, कई फ्लाइट्स के रूट बदले

    सऊदी अरब के एयरपोर्ट पर हमला, 1 की मौत और 8 घायल, कई फ्लाइट्स के रूट बदले


    नई दिल्ली। सऊदी अरब के पूर्वी हिस्से में स्थित किंग फहद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर बुधवार देर रात हुए हमले में एक सऊदी नागरिक की मौत हो गई, जबकि आठ लोग घायल हो गए। सऊदी सिविल एविएशन अथॉरिटी ने गुरुवार सुबह इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि हमले में एयरपोर्ट को भी नुकसान पहुंचा है। वैश्विक फ्लाइट ट्रैकिंग सेवा Flightradar24 के मुताबिक, घटना के बाद रात में कई उड़ानों के रूट डायवर्ट किए गए।

    किंग फहद इंटरनेशनल एयरपोर्ट फारस की खाड़ी के पास दम्माम में स्थित है। यह बहरीन और कतर के नजदीक है। इससे पहले भी सऊदी अरब के प्रमुख एयरपोर्ट्स पर मिसाइल और प्रोजेक्टाइल हमलों के दौरान इस एयरपोर्ट को निशाना बनाया जा चुका है। ताजा हमले पर ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों की ओर से कोई टिप्पणी नहीं आई है। वहीं, सऊदी गठबंधन ने बताया कि उसने देश के पूर्वी क्षेत्र में ड्रोन से किए गए चार हमलों को नाकाम कर दिया।

    तेल क्षेत्र में ड्रोन का मलबा गिरने से 2 की मौत
    एयरपोर्ट पर हमले से पहले दक्षिण-पूर्वी सऊदी अरब में अरामको के संचालन वाले शायबह तेल क्षेत्र में एक इंटरसेप्ट किए गए ड्रोन का मलबा गिरने से दो लोगों की मौत हो गई थी, जबकि दो अन्य घायल हुए थे।

    सऊदी ऊर्जा मंत्रालय के मुताबिक, मृतकों में नेपाल और फिलीपींस के नागरिक शामिल थे। घायलों में पाकिस्तान और भारत के नागरिक थे। मंत्रालय ने बताया कि ड्रोन का मलबा गिरने से तेल क्षेत्र में एक ठेकेदार के वाहन में आग भी लग गई।

    सऊदी तेल ठिकानों पर लगातार हमले
    सऊदी अरब में हाल के दिनों में तेल प्रतिष्ठानों और अन्य अहम ठिकानों के आसपास ड्रोन हमलों की घटनाएं सामने आई हैं। पिछले महीने इंटरसेप्ट किए गए हूती ड्रोन का मलबा गिरने से सऊदी अरब में रह रहे एक यमनी नागरिक की मौत हो गई थी। हूतियों की ओर से सऊदी शिपिंग और तेल ठिकानों को निशाना बनाकर हमले बढ़ाए जाने के बीच इसे नागरिक की पहली मौत बताया गया था।

    इस महीने की शुरुआत में भी सऊदी अरब के पूर्वी प्रांत में हुए हमले के बाद दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनियों में शामिल अरामको की एक प्रशासनिक इमारत में मामूली आग लग गई थी।

    ताजा घटनाओं ने सऊदी अरब के हवाई और ऊर्जा प्रतिष्ठानों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। किंग फहद एयरपोर्ट पर हुई मौत और घायलों के अलावा तेल क्षेत्र में हुए नुकसान से क्षेत्र में जारी सुरक्षा चुनौतियां एक बार फिर सामने आई हैं।

  • मिडटर्म चुनाव के बाद ईरान पर हमले की तैयारी में अमेरिका-इजरायल! परमाणु ठिकाने और मिसाइल भंडार निशाने पर

    मिडटर्म चुनाव के बाद ईरान पर हमले की तैयारी में अमेरिका-इजरायल! परमाणु ठिकाने और मिसाइल भंडार निशाने पर


    नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में एक बार फिर बड़े सैन्य टकराव का खतरा मंडराने लगा है। अमेरिकी मिडटर्म चुनाव के बाद अमेरिका और इजरायल ईरान के खिलाफ नई सैन्य कार्रवाई की तैयारी कर रहे हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, संभावित हमलों के निशाने पर ईरान के परमाणु केंद्र, मिसाइल और ड्रोन भंडार के साथ ऊर्जा ढांचा भी हो सकता है। हालांकि, अब तक किसी भी हमले की योजना को अंतिम मंजूरी नहीं मिली है।

    रिपोर्ट के अनुसार, प्रस्तावित सैन्य अभियान छोटा, लेकिन बेहद तीव्र हो सकता है। अमेरिका और इजरायल की योजना कथित तौर पर तीन दिनों तक हमले कर ईरान की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने और उसे परमाणु कार्यक्रम पर समझौते के लिए मजबूर करने की है। संभावित लक्ष्यों में परमाणु ठिकानों के अलावा इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) के कमांड सेंटर भी शामिल हैं।

    पिकैक्स माउंटेन पर हमले की भी चर्चा
    ईरान के पहाड़ों के नीचे स्थित परमाणु केंद्र ‘पिकैक्स माउंटेन’ भी संभावित निशाने पर हो सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले सप्ताह इस ठिकाने के खिलाफ 22,000 पाउंड वजनी GBU-43/B बम के इस्तेमाल पर विचार करने की बात कही थी। इसे MOAB यानी ‘मदर ऑफ ऑल बम्स’ भी कहा जाता है।

    हालांकि, ऊर्जा ढांचे पर हमले को लेकर अमेरिकी अधिकारियों के बीच मतभेद की स्थिति बताई जा रही है। कुछ अधिकारियों का मानना है कि तेल रिफाइनरियों और ऊर्जा प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने से बचना चाहिए। ऐसा करने से अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार प्रभावित हो सकता है और अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें बढ़ सकती हैं। इसी वजह से ऊर्जा प्रतिष्ठानों को संभावित लक्ष्यों में शामिल करने को लेकर असमंजस बना हुआ है।

    ईरान की चेतावनी- जवाब सीमित नहीं रहेगा
    दूसरी ओर, ईरान ने चेतावनी दी है कि उस पर नया हमला हुआ तो उसकी जवाबी कार्रवाई सीमित नहीं रहेगी। तेहरान ने संकेत दिया है कि संभावित जवाबी हमलों में सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों, डेटा सेंटरों और समुद्र के नीचे बिछी इंटरनेट केबलों को भी निशाना बनाया जा सकता है।

    ईरानी अधिकारियों के रुख से संकेत मिलता है कि किसी नए संघर्ष की स्थिति में युद्ध को सीमित रखना आसान नहीं होगा। इससे पूरे क्षेत्र में तनाव बढ़ने और संघर्ष के दूसरे देशों तक फैलने की आशंका भी गहरा सकती है।

    ईरान की सीमा के पास इजरायल का बड़ा हवाई अभ्यास
    इस बीच, इजरायल ने सोमवार को ईरान की सीमा के नजदीक एक बड़ा वायुसेना अभ्यास किया। रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायली वायुसेना के दर्जनों लड़ाकू और हवा में ईंधन भरने वाले विमान इजरायल से 800 मील से अधिक दूर तक गए। विमानों ने सीरिया और इराक के हवाई क्षेत्र से गुजरते हुए ईरान की सीमा के पास उड़ान भरी और फिर लौट आए।

    अधिकारियों के अनुसार, विमानों का यह मार्ग ईरान पर संभावित हमले के लिए इस्तेमाल किए जा सकने वाले रास्ते जैसा था। हालांकि, इजरायल ने इसे प्रशिक्षण अभ्यास बताते हुए कहा कि इसका उद्देश्य ईरान को कड़ा संदेश देना था। इजरायल ने इस अभियान की जानकारी अमेरिका को पहले ही दे दी थी।

    रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ अमेरिकी अधिकारियों को आशंका थी कि यदि ईरान ने अभ्यास में शामिल इजरायली विमानों पर हमला किया तो इजरायल को बड़े सैन्य अभियान का बहाना मिल सकता है। इससे अमेरिकी मिडटर्म चुनाव से पहले ट्रंप प्रशासन की मुश्किलें बढ़ सकती थीं।

    ट्रंप के सामने तीन बड़ी चुनौतियां
    पिछले अनुभवों को देखते हुए ट्रंप फिलहाल ईरान पर नए हमले का आदेश देने से बचते नजर आ रहे हैं। हालांकि, जब तक ईरान परमाणु वार्ता की मेज पर लौटकर समझौते की दिशा में आगे नहीं बढ़ता, तब तक सैन्य कार्रवाई की आशंका बनी रह सकती है।

    अमेरिका के सामने नई जंग शुरू करने के रास्ते में तीन बड़ी चुनौतियां हैं। पहली, हमले की स्थिति में तेल की कीमतों में तेज उछाल का खतरा। दूसरी, संघर्ष का पूरे मिडिल ईस्ट में फैल जाना। तीसरी, अमेरिकी सेना के पास मिसाइलों को रोकने वाले इंटरसेप्टर की संभावित कमी।

    ऐसे में सैन्य योजनाएं तैयार होने की खबरों के बावजूद यह स्पष्ट नहीं है कि ट्रंप प्रशासन हमले को मंजूरी देगा या कूटनीतिक रास्ते को प्राथमिकता देगा। फिलहाल, ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के बीच पूरे क्षेत्र की निगाहें वॉशिंगटन के अगले कदम पर टिकी हैं।

  • इस्राइल में चुनाव से पहले युवाओं की सोच में दिख रहा बदलाव… बढ़ रहा दक्षिणपंथ का आकर्षण?

    इस्राइल में चुनाव से पहले युवाओं की सोच में दिख रहा बदलाव… बढ़ रहा दक्षिणपंथ का आकर्षण?


    तेलअबीव।
    इस्राइल (Israel) में नई पीढ़ी के बीच दक्षिणपंथी राजनीति का आकर्षण बढ़ता दिखाई दे रहा है। कभी अपने कट्टर विचारों के कारण राजनीतिक मुख्यधारा से दूर रहे नेता इतामार बेन-ग्विर (Leader Itamar Ben-Gvir) आज सरकार के शक्तिशाली मंत्रियों में शामिल हैं। चुनाव प्रचार के दौरान उनके आसपास बड़ी संख्या में युवा समर्थक नजर आ रहे हैं। यह बदलाव केवल किसी एक नेता की लोकप्रियता की कहानी नहीं है, बल्कि उस पीढ़ी की सोच को भी सामने लाता है, जिसने युद्ध, हिंसा और सुरक्षा के सवालों के बीच आंखें खोली हैं। सवाल है कि इस्राइल के युवा मतदाता (Young Voters) दक्षिणपंथ की ओर क्यों आकर्षित हो रहे हैं और इसका देश की राजनीति पर क्या असर पड़ सकता है?


    पहले सेना ने ठुकराया, अब युवाओं के बीच लोकप्रिय

    एक संवाददाता लूसी विलियमसन की रिपोर्ट के मुताबिक बेन-ग्विर को युवावस्था में उनके राजनीतिक विचारों के अत्यधिक कट्टर होने के कारण इस्राइली सेना में शामिल होने के लिए अनुपयुक्त माना गया था। करीब तीन दशक बाद वही नेता राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री के पद पर हैं और चुनावी राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभा रहे हैं।रामले शहर के एक बाजार में चुनाव प्रचार के दौरान उनके समर्थकों में बड़ी संख्या में युवा शामिल थे। 20 वर्षीय मोर्दखाई का मानना है कि बेन-ग्विर उन्हें सुरक्षा का भरोसा देते हैं। वहीं, 18 वर्षीय नदाव का कहना है कि यह नेता दुनिया को दिखाना चाहते हैं कि इस्राइल एक मजबूत देश है और उसे अपनी विचारधारा व्यक्त करने में संकोच नहीं करना चाहिए।इन बयानों से युवाओं की प्राथमिकताओं का संकेत मिलता है। उनके लिए केवल आर्थिक मुद्दे या रोजगार ही चुनावी पसंद तय नहीं कर रहे, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, देश की ताकत और भविष्य को लेकर भरोसा भी महत्वपूर्ण बन गया है।


    पहली बार वोट डालने वाले युवा बन सकते हैं निर्णायक

    रिपोर्ट के अनुसार आगामी चुनाव में पांच लाख से अधिक मतदाता पहली बार अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे। ये युवा ऐसे समय में मतदान करने जा रहे हैं, जब इस्राइल की सुरक्षा, राष्ट्रीय पहचान और भविष्य की दिशा पर बहस तेज है।रिपोर्ट में उद्धृत एक सर्वेक्षण के मुताबिक, पहली बार मतदान करने वाले 16 प्रतिशत से अधिक युवा बेन-ग्विर की यहूदी शक्ति पार्टी या उनके सहयोगी बेजालेल स्मोट्रिच की धार्मिक जायनिज्म पार्टी का समर्थन करने की योजना बना रहे हैं। एक अन्य सर्वेक्षण में करीब तीन-चौथाई युवा मतदाताओं ने खुद को दक्षिणपंथी या मध्य-दक्षिणपंथी विचारधारा के करीब बताया।हालांकि, इन आंकड़ों का अर्थ यह नहीं है कि सभी युवा दक्षिणपंथी हो गए हैं। ये सर्वेक्षणों में सामने आए रुझान हैं। फिर भी, चुनावी मुकाबले में इन नए मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है, खासकर तब, जब सरकार समर्थक और विपक्षी खेमों के बीच मुकाबला कड़ा हो।


    7 अक्तूबर के हमलों ने बदली सोच

    युवाओं की राजनीतिक पसंद को समझने के लिए 7 अक्तूबर 2023 के हमलों और उसके बाद शुरू हुए गाजा युद्ध को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हमास के नेतृत्व में हुए हमलों ने इस्राइल में सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता पैदा की। युद्ध और हिंसा के अनुभवों ने कई युवाओं के लिए राजनीति को व्यक्तिगत सवाल बना दिया है।23 वर्षीय अति-रूढ़िवादी यहूदी युवक मेइर श्राइबर, जो लंदन में पले-बढ़े हैं, कहते हैं कि 7 अक्तूबर की घटनाओं ने उन्हें इस नतीजे पर पहुंचाया कि शांति हासिल करना आसान नहीं है। उनके अनुसार कम उम्र में देखी गई घटनाएं व्यक्ति की सोच और व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित करती हैं।हालांकि, इस सोच से सभी इस्राइली युवा सहमत नहीं हैं। कुछ लोग मौजूदा सरकार की नीतियों और सुरक्षा संबंधी फैसलों पर सवाल भी उठाते हैं। इसलिए युवाओं में दक्षिणपंथ की ओर झुकाव को एक समान विचारधारा का परिणाम मानने के बजाय युद्ध के अनुभवों और भविष्य को लेकर अलग-अलग आशंकाओं के संदर्भ में देखना जरूरी है।


    कठोर नीतियां भी बन रहीं बहस का विषय

    बेन-ग्विर की राजनीति विवादों से घिरी रही है। वे कब्जे वाले पश्चिमी तट के विलय, गाजा में यहूदी बस्तियां बसाने और फलस्तीनियों के तथाकथित स्वैच्छिक पलायन जैसे विचारों का समर्थन करते रहे हैं। उदारवादी इस्राइली इन नीतियों और उनके बयानों की आलोचना करते हैं। कई पश्चिमी देशों ने बेन-ग्विर और स्मोट्रिच के खिलाफ फलस्तीनियों के प्रति भड़काऊ बयानों के मामले में प्रतिबंध या यात्रा संबंधी पाबंदियां भी लगाई हैं।राजनीतिक विश्लेषक डाहलिया शाइनडलिन के अनुसार, इस्राइल के युवा यहूदी मतदाता लगभग दो दशक से औसतन पुरानी पीढ़ी की तुलना में अधिक दक्षिणपंथी रुझान दिखाते रहे हैं। उनके मुताबिक इन युवाओं ने कई युद्धों के बीच जीवन बिताया है और शांति की कोशिशों का उन्हें व्यक्तिगत अनुभव कम मिला है। इससे राजनीतिक बहस में कठोर विचारों को स्वीकार्यता मिलने की पृष्ठभूमि बनी है।


    टिकटॉक और इंस्टाग्राम भी बन रहे चुनावी हथियार

    इस बदलाव में सोशल मीडिया की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। युवा मतदाता पारंपरिक समाचार चैनलों और अखबारों के बजाय टिकटॉक और इंस्टाग्राम से अधिक जानकारी हासिल कर रहे हैं। ऐसे में राजनीतिक नेताओं के छोटे वीडियो, सीधे संवाद और आकर्षक प्रचार सामग्री मतदाताओं तक पहुंचने का प्रभावी माध्यम बन गए हैं।

    विपक्षी दल भी अब इस चुनौती को समझ रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट (Former Prime Minister Naftali Bennett) के नेतृत्व वाले विपक्षी दल के युवा उम्मीदवार योनातन शालेव का कहना है कि बेन-ग्विर ने दूसरे नेताओं की तुलना में सोशल मीडिया की ताकत को पहले पहचान लिया। अब विपक्ष भी युवा मतदाताओं तक पहुंचने के लिए डिजिटल प्रचार का सहारा ले रहा है। इस्राइल की राजनीति में नई पीढ़ी का यह रुझान बताता है कि चुनाव केवल पुराने राजनीतिक समीकरणों से तय नहीं होंगे। सुरक्षा की चिंता, युद्ध की स्मृतियां और डिजिटल माध्यमों से बनने वाली राजनीतिक छवि युवा मतदाताओं के फैसलों को प्रभावित कर सकती हैं। लेकिन इस्राइल के युवा पूरी तरह एक खेमे में बंटे नहीं हैं। असली सवाल यही है कि मतदान के दिन सुरक्षा और कठोर नेतृत्व का संदेश अधिक प्रभावी होगा या बदलाव और जवाबदेही की मांग।

  • US-Iran शांति प्रस्ताव पर बन सकती है सहमति…. 6 अरब डॉलर के फंड में रियायत के आसार!

    US-Iran शांति प्रस्ताव पर बन सकती है सहमति…. 6 अरब डॉलर के फंड में रियायत के आसार!


    वाशिंगटन।
    ईरान-अमेरिका (Iran-America) के बीच शांति प्रस्ताव (Peace Proposal) पर इस हफ्ते सहमति बनने की संभावना है। दरअसल, कतर-पाकिस्तान (Qatar-Pakistan) की मध्यस्थता वाले नए समझौते के प्रस्ताव पर अमेरिका व ईरान दोनों ने कथित तौर पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। कतर के सरकारी न्यूज चैनल अल अरबी अल जादीद ने मंगलवार को मध्यस्थता के प्रयासों से जुड़े सूत्रों के हवाले से बताया कि इस प्रस्ताव में फ्रीज किए गए 6 अरब डॉलर के ईरानी फंड ($6 Billion Iranian funds) में आंशिक रियायत और ईरान के परमाणु संयंत्रों के गोपनीय निरीक्षण की बात शामिल है।

    सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने तेहरान की यात्रा के दौरान यह प्रस्ताव ईरानी अधिकारियों के सामने रखा। प्रस्ताव को पहले ही अमेरिकी मंजूरी मिल चुकी है।

    होर्मुज के पास दो तेल टैंकर बारूदी सुरंगों से टकराए : होर्मुज में दो तेल टैंकर बारूदी सुरंगों की चपेट में आने के बाद आग की लपटों में घिर गए और रुक गए। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि ये किस समय हुआ।


    ईरान में अभी काम अधूरा, ट्रंप के साथ मिलकर करेंगे पूरा : नेतन्याहू

    दुबई। इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (Prime Minister Benjamin Netanyahu) ने संकेत दिया है कि उनका देश और अमेरिका ईरान पर नए हमले कर सकते हैं। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) के साथ वीडियो कॉल का एक वीडियो साझा किया, जिसमें उन्होंने कहा कि ईरान में उनका काम अभी अधूरा है और इसे दोनों देश मिलकर पूरा करेंगे। नेतन्याहू ने इस्राइल के राष्ट्रीय चुनाव में समर्थन के लिए ट्रंप का आभार जताया। उन्होंने कहा, ट्रंप हमारे पास एक काम अधूरा है। आपने यह बात कही थी और हम इसे साथ मिलकर पूरा करेंगे। इसे पूरा करेंगे और कोई दूसरा ऐसा नहीं करेगा।


    ईरान-रूस के रिश्ते हुए मजबूत : अराघची

    तेहरान। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि ईरान और रूस के संबंध इतिहास में कभी इतने करीबी नहीं रहे, जितने आज हैं। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के साथ तेहरान में हुई बातचीत के बाद मंगलवार को अराघची ने सोशल मीडिया पर यह टिप्पणी की। अराघची ने बताया कि दोनों नेताओं के बीच यूरोप से लेकर पश्चिम एशिया तक के घटनाक्रम पर चर्चा हुई। दोनों पक्षों ने आर्थिक और परमाणु सहयोग के विस्तार पर भी जोर दिया। अराघची ने कहा कि क्षेत्रीय समस्याओं का समाधान सैन्य कार्रवाई के बजाय कूटनीतिक और राजनीतिक तरीकों से किया जाना चाहिए।

  • अमेरिकी विदेश मंत्री बोले- परमाणु हथियार के चलते पाकिस्तान से संबंध रखना जरूरी

    अमेरिकी विदेश मंत्री बोले- परमाणु हथियार के चलते पाकिस्तान से संबंध रखना जरूरी


    वाशिंगटन।
    अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने पाकिस्तान के साथ अमेरिका के संबंधों को लेकर अपनी नीति स्पष्ट करते हुए कहा है कि कई मतभेदों के बावजूद अमेरिका को पाकिस्तान के साथ संवाद बनाए रखना पड़ता है। उन्होंने इसके पीछे पाकिस्तान के परमाणु हथियारों और उसकी भौगोलिक स्थिति को प्रमुख कारण बताया। रुबियो ने स्पष्ट किया कि अमेरिका दुनिया में कहीं भी आतंकवाद को बढ़ावा देने वालों के खिलाफ है।

    सीएनएन-न्यूज18 को दिए एक साक्षात्कार में रुबियो ने कहा, “हम उन सभी के खिलाफ हैं, जो आतंकवाद को बढ़ावा देते हैं।” पाकिस्तान के साथ संबंधों पर उन्होंने कहा कि अमेरिकी विदेश मंत्री के रूप में उनकी जिम्मेदारी देश की विदेश नीति को संभालना है। इसके लिए अमेरिका को कई देशों के साथ संबंध बनाए रखने पड़ते हैं, भले ही उनके साथ कुछ मुद्दों पर मतभेद हों।

    उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के मामले में भी यही स्थिति है। यह एक ऐसा देश है, जिसके पास परमाणु हथियार हैं। साथ ही, उसकी भौगोलिक स्थिति भी ऐसी है कि अमेरिका को उसके साथ बातचीत करने की जरूरत पड़ती है। रुबियो ने इसकी तुलना भारत के ईरान के साथ संबंधों से करते हुए कहा कि भारत सरकार भी ईरान के नेताओं के साथ संपर्क और संवाद बनाए रखती है।

    पाकिस्तान से बातचीत क्यों जरूरी?

    पांच महीने में दूसरी बार भारत यात्रा पर आए रुबियो ने कहा कि विभिन्न हितों और मतभेदों के बीच संतुलन बनाना मुश्किल है, लेकिन विदेश नीति के तहत ऐसा करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के साथ संवाद बनाए रखना सकारात्मक परिणाम भी दे सकता है।

    रुबियो के मुताबिक, यदि अमेरिका के पाकिस्तान के साथ संबंध बने रहते हैं और दोनों पक्षों के बीच बातचीत होती है, तो इससे उन गतिविधियों को रोकने में मदद मिल सकती है, जिनको लेकर भारत चिंतित है। उनके इस बयान को पाकिस्तान के साथ अमेरिकी कूटनीतिक संबंधों और भारत की सुरक्षा चिंताओं के बीच संतुलन बनाने की नीति के तौर पर देखा जा रहा है।

    भारत-अमेरिका व्यापार समझौता जल्द होने की उम्मीद

    मुंबई पहुंचे अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ बैठक में भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के जल्द होने की उम्मीद जताई। बैठक में दोनों देशों के संबंधों के विभिन्न पहलुओं की समीक्षा की गई और वैश्विक रणनीतिक साझेदारी को मजबूत बनाने पर जोर दिया गया।

    विदेश मंत्रालय के अनुसार, रुबियो की यात्रा दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय वार्ता की गति को दर्शाती है। मंत्रालय ने कहा कि दोनों पक्ष 21वीं सदी के लिए भारत-अमेरिका सहयोग को आगे बढ़ाने को महत्व देते हैं।

    भारत को बताया तेल रिफाइनरी क्षेत्र की महाशक्ति

    जयशंकर के साथ बैठक के बाद रुबियो ने भारत की तेल रिफाइनिंग क्षमता की सराहना करते हुए उसे इस क्षेत्र की महाशक्ति बताया। रूस से भारत की कच्चे तेल की खरीद पर उन्होंने कहा कि भारत ने बार-बार अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की इच्छा जताई है और इस दिशा में प्रगति हो रही है।

    उन्होंने कहा कि अमेरिका भी भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए एक अच्छा स्रोत बन सकता है। बैठक में दोनों देशों के बीच ऊर्जा और रक्षा क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा हुई। रुबियो ने भारत से ऊर्जा क्षेत्र में साझेदारी मजबूत करने और अमेरिकी तकनीक का उपयोग बढ़ाने की अपील भी की।

    वेनेजुएला में तेल उत्पादन पर रिलायंस से चर्चा करेगा अमेरिकी दल

    रुबियो ने बुधवार को गुजरात के जामनगर स्थित रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड की रिफाइनरी के प्रस्तावित दौरे को लेकर मीडिया के सवालों का जवाब भी दिया। उन्होंने कहा कि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल वेनेजुएला में तेल उत्पादन से जुड़े मुद्दों पर रिलायंस के साथ चर्चा करेगा। इस संभावित बातचीत को ऊर्जा क्षेत्र में भारत-अमेरिका सहयोग के व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है।

  • अल्बानिया में PM एडी रामा के इस्तीफे की मांग को लेकर बवाल, प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर फेंके पेट्रोल बम

    अल्बानिया में PM एडी रामा के इस्तीफे की मांग को लेकर बवाल, प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर फेंके पेट्रोल बम


    नई दिल्ली। अल्बानिया की राजधानी तिराना में प्रधानमंत्री एडी रामा के इस्तीफे की मांग को लेकर जारी प्रदर्शन हिंसक हो गया है। मंगलवार रात प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प हुई। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर पेट्रोल बम फेंके, जिसके जवाब में पुलिस ने पानी की बौछार करने वाली गाड़ियों (वाटर कैनन) का इस्तेमाल किया। प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर चल रहा आंदोलन आठवें दिन में पहुंच गया है। राजधानी के अलावा देश के अन्य शहरों में भी विरोध प्रदर्शन फैलने की खबर है।

    रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार में कथित भ्रष्टाचार, रोजगार के सीमित अवसरों और शिक्षा के खराब स्तर को लेकर लोगों में नाराजगी है। प्रदर्शनकारियों ने सरकारी इमारतों और बैंकों में आग लगाने, दुकानों के शीशे तोड़ने और सड़कों से पत्थर उखाड़कर पुलिस पर फेंकने जैसी घटनाओं को अंजाम दिया।

    13 अक्टूबर से शुरू हुई हिंसा, 17 अक्टूबर को प्रदर्शन तेज
    रिपोर्ट के अनुसार, हिंसा की शुरुआत 13 अक्टूबर को हुई थी। इसके बाद 17 अक्टूबर को विरोध प्रदर्शन और उग्र हो गया। उस दिन हजारों लोग शिक्षा मंत्रालय के बाहर जमा हुए और दंगा रोधी पुलिस पर पत्थर फेंके। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस, पानी की बौछार और रबर की गोलियों का इस्तेमाल किया।

    मंगलवार रात भी तिराना में प्रदर्शनकारियों ने पुलिस को निशाना बनाते हुए पेट्रोल बम फेंके। पुलिस ने वाटर कैनन के जरिए भीड़ को तितर-बितर करने की कोशिश की। लगातार जारी हिंसा ने सरकार के सामने कानून-व्यवस्था की चुनौती बढ़ा दी है।

    2013 से सत्ता में हैं एडी रामा, चौथी बार संभाली सरकार
    प्रधानमंत्री एडी रामा के इस्तीफे की मांग को लेकर हो रहा यह आंदोलन उनके राजनीतिक कार्यकाल की बड़ी चुनौतियों में से एक बन गया है। रामा वर्ष 2013 से सत्ता में हैं और पिछले साल उन्होंने चौथी बार प्रधानमंत्री पद संभाला था।

    प्रदर्शनकारियों की नाराजगी का प्रमुख कारण सरकार में कथित भ्रष्टाचार के अलावा रोजगार और शिक्षा से जुड़े मुद्दे हैं। आंदोलन अब राजधानी से बाहर दूसरे शहरों तक फैलने के कारण सरकार पर दबाव बढ़ रहा है।

    गर्मियों में भी हुए थे सरकार के खिलाफ प्रदर्शन
    अल्बानिया में मौजूदा अशांति की पृष्ठभूमि में गर्मियों के दौरान हुए कई महीनों के विरोध प्रदर्शन भी शामिल हैं। उस समय ज्यादातर प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे थे। उनका मुख्य विरोध एक महंगी तटीय विकास परियोजना को लेकर था, जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर का समर्थन प्राप्त है।

    अब प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग, भ्रष्टाचार के आरोप और सामाजिक-आर्थिक समस्याओं को लेकर विरोध तेज हो गया है। तिराना समेत कई शहरों में जारी प्रदर्शनों के बीच पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव से स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है।

  • ईरान की अमेरिका को दो टूक: 'यूरेनियम का एक ग्राम भी बाहर नहीं भेजेंगे', आसिम मुनीर कर रहे मध्यस्थता

    ईरान की अमेरिका को दो टूक: 'यूरेनियम का एक ग्राम भी बाहर नहीं भेजेंगे', आसिम मुनीर कर रहे मध्यस्थता


    नई दिल्ली। अमेरिका के साथ परमाणु समझौते को लेकर ईरान ने अपना रुख सख्त कर दिया है। तेहरान ने साफ कहा है कि वह अपने यूरेनियम का एक ग्राम भी देश से बाहर नहीं भेजेगा। ईरान ने यह भी स्पष्ट किया है कि अमेरिका के साथ बातचीत तभी आगे बढ़ेगी, जब वॉशिंगटन भरोसा बहाल करने के लिए ठोस कदम उठाएगा और उसकी सभी शर्तें पूरी करने की दिशा में कार्रवाई करेगा। पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की ईरान यात्रा के बीच आया यह बयान दोनों देशों के बीच जारी कूटनीतिक प्रयासों के लिहाज से अहम माना जा रहा है।

    ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव मोहसेन रेजाई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर कहा कि ईरान से यूरेनियम का एक ग्राम भी बाहर नहीं भेजा जाएगा। उन्होंने कहा कि अमेरिका को पहले विश्वास बहाली के लिए कदम उठाने होंगे। बातचीत की प्रक्रिया ईरान की सभी शर्तों को पूरी तरह पूरा करने से शुरू होनी चाहिए।

    रेजाई ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर के साथ बैठक में भी तेहरान का यही रुख दोहराया। मुनीर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने तथा बातचीत का रास्ता निकालने के प्रयासों के तहत ईरान पहुंचे हैं।

    राष्ट्रपति पेजेश्कियन और संसद स्पीकर से मिले मुनीर
    ईरानी मीडिया के मुताबिक, मंगलवार को राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने तेहरान में आसिम मुनीर के साथ बैठक की। इस दौरान क्षेत्रीय घटनाक्रम और अमेरिका-ईरान के बीच मध्यस्थता की कोशिशों पर चर्चा हुई।

    नूरन्यूज के अनुसार, मुनीर ने ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाकेर कलीबाफ से भी मुलाकात की। इन बैठकों में क्षेत्रीय तनाव कम करने और दोनों पक्षों के बीच बातचीत की संभावनाओं पर चर्चा हुई।

    अमेरिका से बातचीत के लिए ईरान ने रखीं सात शर्तें
    ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाकेर कलीबाफ ने कहा कि अमेरिका ईरान का भरोसा तब तक नहीं जीत सकता, जब तक वह पिछले महीने तेहरान की ओर से रखी गई सात शर्तों को पूरा नहीं करता।

    इन शर्तों का संबंध स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलने से भी है। प्रमुख मांगों में ईरानी बंदरगाहों पर अमेरिकी नाकाबंदी खत्म करना, ईरान के तेल निर्यात पर लगे प्रतिबंध हटाना और क्षेत्र के सभी मोर्चों पर शत्रुता रोकना शामिल है।

    रेजाई ने यह भी कहा कि ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई के रुख के मुताबिक, हथियार बनाने के स्तर के करीब पहुंच चुके यूरेनियम को देश से बाहर नहीं भेजा जाएगा।

    परमाणु कार्यक्रम पर अटका समझौता
    ईरान का परमाणु कार्यक्रम अमेरिका के साथ किसी संभावित समझौते की राह में प्रमुख बाधा बना हुआ है। अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इस महीने की शुरुआत में कहा था कि युद्ध समाप्त करने और समझौते की दिशा में आगे बढ़ने के लिए ईरान को अपनी यूरेनियम संवर्धन क्षमता में महत्वपूर्ण कमी करनी होगी।

    अमेरिका, इजरायल और कई अन्य पश्चिमी देश लंबे समय से ईरान पर परमाणु हथियार बनाने की कोशिश करने का आरोप लगाते रहे हैं। इसकी प्रमुख वजह ईरान की ओर से यूरेनियम का 60 प्रतिशत तक संवर्धन करना है। यह स्तर आम नागरिक परमाणु उपयोग के लिए जरूरी संवर्धन स्तर से काफी अधिक है और लगभग 90 प्रतिशत संवर्धन वाले हथियार-ग्रेड यूरेनियम के स्तर के करीब है।

    हालांकि, ईरान लगातार परमाणु हथियार बनाने की कोशिश करने के आरोपों से इनकार करता रहा है। यूरेनियम संवर्धन की सीमा और संवर्धित यूरेनियम के भंडार का भविष्य दोनों देशों के बीच बातचीत के अहम मुद्दे बने हुए हैं।

    पाकिस्तान फिर करा रहा बातचीत की कोशिश
    अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम कराने के लिए पाकिस्तान मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। इससे पहले पाकिस्तान की मध्यस्थता के प्रयासों के बाद जून में अंतरिम शांति समझौता हुआ था। हालांकि, कुछ ही हफ्तों बाद दोनों देशों के बीच लड़ाई दोबारा शुरू होने से यह समझौता टूट गया।

    आसिम मुनीर की मौजूदा ईरान यात्रा ऐसे समय में हो रही है, जब दोनों देशों के बीच मतभेद दूर करने और बातचीत दोबारा शुरू कराने के प्रयास जारी हैं। ईरान ने यूरेनियम को देश से बाहर नहीं भेजने और बातचीत से पहले अपनी शर्तें पूरी करने की मांग दोहराकर स्पष्ट कर दिया है कि परमाणु कार्यक्रम पर किसी समझौते तक पहुंचना आसान नहीं होगा।

  • इटली में सख्त कानून: नाबालिगों की लूटपाट पर माता-पिता भरेंगे हर्जाना, हिंसक प्रदर्शन में 5 साल तक जेल

    इटली में सख्त कानून: नाबालिगों की लूटपाट पर माता-पिता भरेंगे हर्जाना, हिंसक प्रदर्शन में 5 साल तक जेल


    नई दिल्ली। इटली में हिंसक प्रदर्शनों और तोड़फोड़ की घटनाओं पर लगाम लगाने के लिए प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी की सरकार ने सुरक्षा से जुड़े कई कड़े प्रावधानों को मंजूरी दी है। नए कानून के तहत प्रदर्शन के दौरान हिंसा करने वालों को पांच साल तक की जेल और 20 हजार यूरो तक का जुर्माना हो सकता है। वहीं, तोड़फोड़ और लूटपाट में शामिल नाबालिगों के माता-पिता को भी नुकसान की भरपाई करनी पड़ सकती है।

    रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तरी इटली के कई शहरों में हुई हिंसा के बाद सरकार ने ये कदम उठाए हैं। इनमें देश की आर्थिक राजधानी मिलान भी शामिल है। यहां युवाओं के समूहों ने दुकानों के शीशे तोड़े, सामान लूटा और पुलिस पर हमले किए। प्रधानमंत्री मेलोनी ने सोशल मीडिया पर नए कानून की जानकारी देते हुए कहा कि तोड़फोड़ और चोरी कोई क्रांतिकारी काम नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि तोड़फोड़ और चोरी प्रदर्शन नहीं, बल्कि अपराध हैं।

    पांच साल तक जेल और 20 हजार यूरो जुर्माने का प्रावधान
    नए प्रावधान तत्काल प्रभाव से लागू हो गए हैं। इनके तहत पांच या उससे अधिक लोगों के समूह में प्रदर्शन के दौरान सार्वजनिक सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करने वाले व्यक्ति को पांच साल तक की जेल हो सकती है। इसके अलावा अधिकतम 20 हजार यूरो का जुर्माना भी लगाया जा सकता है।

    यदि प्रदर्शन के दौरान किसी व्यक्ति ने अपना चेहरा ढका हो या किसी अन्य व्यक्ति को चोट पहुंची हो, तो सजा और बढ़ सकती है। नए नियमों के तहत अधिकारियों को सार्वजनिक संपत्ति या अन्य स्थानों को हुए नुकसान की भरपाई तत्काल सुनिश्चित करने के आदेश देने का अधिकार भी दिया गया है।

    नाबालिगों की तोड़फोड़ पर माता-पिता की भी जवाबदेही
    सरकार ने नाबालिगों की ओर से की जाने वाली तोड़फोड़ और लूटपाट को लेकर भी सख्ती बढ़ाई है। यदि ऐसी घटनाओं में नाबालिग शामिल पाए जाते हैं, तो उनके माता-पिता को नुकसान की भरपाई के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

    इसके अलावा पुलिस को 14 से 17 साल की उम्र के उन किशोरों को हिरासत में लेने की अनुमति भी दी गई है, जिन्होंने कोई अपराध नहीं किया है, लेकिन उनके खतरनाक होने के सबूत मौजूद हैं। इससे पहले यह अधिकार केवल वयस्कों के मामले में लागू होता था।

    मिलान में पुलिस के साथ तैनात होंगे 500 सैनिक
    सरकार को शनिवार को होने वाले प्रदर्शनों के दौरान फिर से हिंसा भड़कने की आशंका है। इसे देखते हुए मिलान में 2026 के अंत तक पुलिस की मदद के लिए 500 सैनिक तैनात किए जाएंगे।

    रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, सेना महत्वपूर्ण स्थानों की सुरक्षा, संवेदनशील इलाकों की निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने में पुलिस की मदद करेगी।

    2022 से सुरक्षा के मुद्दे पर सख्त कदम उठा रही सरकार
    प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी की सरकार वर्ष 2022 में सत्ता में आने के बाद से सुरक्षा के मुद्दे पर कई सख्त फैसले ले चुकी है। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि ऐसे कदम अपराध और हिंसा की मूल वजहों को दूर करने में पर्याप्त साबित नहीं होते। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले चार वर्षों में इटली की जेलों में कैदियों की संख्या 17 प्रतिशत से अधिक बढ़ी है।

    महंगाई और डीजल की कीमतों पर ट्रक ड्राइवरों का प्रदर्शन
    इटली के दक्षिणी हिस्से में बढ़ती महंगाई और डीजल की कीमतों को लेकर ट्रक ड्राइवरों के प्रदर्शन भी जारी हैं। सड़कें जाम किए जाने से सप्लाई चेन प्रभावित हुई है। कुछ पास्ता कंपनियों को उत्पादन रोकना पड़ा है, जबकि कृषि संगठनों ने फल और सब्जियों के खराब होने की आशंका जताई है।

    सरकार ने ट्रांसपोर्ट कंपनियों को नई सहायता देने का भरोसा दिया है। ऐसे में एक ओर सरकार हिंसक प्रदर्शनों पर सख्ती बढ़ा रही है, वहीं दूसरी ओर महंगाई और परिवहन से जुड़े विरोध प्रदर्शनों से भी निपटने की चुनौती बनी हुई है।