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  • वेनेजुएला में तबाही के बीच भारत का मानवीय संदेश, पीएम मोदी के समर्थन पर राष्ट्रपति रोड्रिगेज ने कहा धन्यवाद

    वेनेजुएला में तबाही के बीच भारत का मानवीय संदेश, पीएम मोदी के समर्थन पर राष्ट्रपति रोड्रिगेज ने कहा धन्यवाद


    नई दिल्ली । वेनेजुएला में आए विनाशकारी भूकंप के बाद उत्पन्न मानवीय संकट के बीच भारत ने एक बार फिर वैश्विक मानवीय सहयोग की अपनी प्रतिबद्धता को मजबूत करते हुए मदद का हाथ बढ़ाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा वेनेजुएला की जनता के प्रति व्यक्त की गई संवेदनाओं और राहत कार्यों में हरसंभव सहयोग के आश्वासन का वहां की कार्यवाहक राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज ने स्वागत किया है। उन्होंने भारत सरकार और प्रधानमंत्री मोदी के प्रति आभार जताते हुए कहा कि इस कठिन समय में भारत का समर्थन वेनेजुएला के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

    सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संदेश का जवाब देते हुए डेल्सी रोड्रिगेज ने कहा कि वे भारत की ओर से व्यक्त संवेदनाओं और सहायता की इच्छा का दिल से स्वागत करती हैं। उन्होंने कहा कि भूकंप से प्रभावित लोगों के लिए भारत का सहयोग और समर्थन दोनों देशों के बीच मजबूत मित्रता और मानवीय संबंधों का प्रतीक है। वेनेजुएला की कार्यवाहक राष्ट्रपति ने इस कठिन घड़ी में भारत के साथ खड़े होने के लिए विशेष धन्यवाद भी दिया।

    इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वेनेजुएला में आए भीषण भूकंप पर गहरा दुख व्यक्त किया था। उन्होंने कहा कि इस प्राकृतिक आपदा से हुई जनहानि और व्यापक तबाही की खबर बेहद पीड़ादायक है। प्रधानमंत्री ने भारत के लोगों की ओर से उन परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त की जिन्होंने अपने प्रियजनों को खो दिया है। साथ ही घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करते हुए कहा कि भारत इस कठिन समय में वेनेजुएला के लोगों के साथ खड़ा है और हरसंभव सहायता देने के लिए तैयार है।

    वेनेजुएला सरकार लगातार राहत और बचाव कार्यों की निगरानी कर रही है। कार्यवाहक राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज के अनुसार अब तक कम से कम 32 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है जबकि बड़ी संख्या में लोग घायल हुए हैं। कई इलाकों में इमारतों के ढहने और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचने की खबरें सामने आई हैं। राहत एजेंसियां प्रभावित क्षेत्रों में पहुंचकर बचाव कार्यों को तेज करने में जुटी हैं।

    इस बीच यूनाइटेड स्टेट्स जियोलॉजिकल सर्वे ने चेतावनी दी है कि आपदा का वास्तविक असर आने वाले दिनों में और स्पष्ट हो सकता है। एजेंसी ने आशंका जताई है कि मृतकों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां प्रभावित क्षेत्रों में हालात का आकलन कर रही हैं। सोशल मीडिया और विभिन्न समाचार स्रोतों से सामने आई तस्वीरों में काराकस सहित कई शहरों में इमारतों और घरों को भारी नुकसान पहुंचा दिखाई दे रहा है।

    जानकारी के अनुसार बुधवार शाम सबसे पहले 7.1 तीव्रता का शक्तिशाली भूकंप दर्ज किया गया। इसके महज एक मिनट बाद 7.5 तीव्रता का दूसरा और अधिक शक्तिशाली झटका महसूस किया गया। दोनों भूकंप समुद्र तटीय क्षेत्र मोरोन के पास और राजधानी काराकस से लगभग 160 किलोमीटर पश्चिम में आए। भूकंप की गहराई केवल 10 किलोमीटर होने के कारण इसका प्रभाव अधिक विनाशकारी साबित हुआ।

    वेनेजुएला के गृह, न्याय और शांति मंत्री डियोसडाडो कैबेलो ने बताया कि देश के कई हिस्सों में इमारतों और सार्वजनिक ढांचों को नुकसान पहुंचा है। प्रशासन ने लोगों से सतर्क रहने और आफ्टरशॉक्स की आशंका को देखते हुए सुरक्षा निर्देशों का पालन करने की अपील की है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी इस आपदा पर नजर बनाए हुए है और कई देशों ने वेनेजुएला को सहायता देने की पेशकश की है।

  • वेनेजुएला में मौत और तबाही का मंजर, पीएम मोदी ने जताई संवेदना, ट्रंप ने जारी किया अलर्ट

    वेनेजुएला में मौत और तबाही का मंजर, पीएम मोदी ने जताई संवेदना, ट्रंप ने जारी किया अलर्ट

    काराकस। दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला में आए लगातार दो शक्तिशाली भूकंपों ने भारी तबाही मचा दी है। देश के कई शहरों में इमारतें क्षतिग्रस्त हो गई हैं और जानमाल के बड़े नुकसान की आशंका जताई जा रही है। भूकंप के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ गई है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस आपदा पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए प्रभावित लोगों के प्रति संवेदना प्रकट की है।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर जारी संदेश में कहा कि वेनेजुएला में आए विनाशकारी भूकंप से हुई तबाही की खबर बेहद दुखद है। उन्होंने भारत की जनता की ओर से वेनेजुएला की सरकार और वहां के नागरिकों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया है उनके दुख में पूरा भारत सहभागी है। प्रधानमंत्री ने घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करते हुए कहा कि भारत इस कठिन समय में वेनेजुएला के साथ खड़ा है और हर संभव सहायता उपलब्ध कराने के लिए तैयार है।

    वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी भूकंप से हुई तबाही पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि वेनेजुएला में आए दोनों भूकंप अत्यंत शक्तिशाली थे और शुरुआती रिपोर्टें अच्छे संकेत नहीं दे रही हैं। ट्रंप के अनुसार बड़ी संख्या में लोगों के प्रभावित होने और भारी जनहानि की आशंका है। उन्होंने कहा कि अमेरिका सहायता के लिए पूरी तरह तैयार है और सभी संबंधित एजेंसियों को राहत एवं बचाव कार्यों के लिए सतर्क रहने के निर्देश दे दिए गए हैं।

    संयुक्त राज्य भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के अनुसार पहला भूकंप बुधवार देर शाम 7.1 तीव्रता का दर्ज किया गया। इसके ठीक एक मिनट बाद 7.5 तीव्रता का दूसरा और अधिक शक्तिशाली झटका महसूस किया गया। दोनों भूकंपों का केंद्र राजधानी काराकस से लगभग 160 किलोमीटर पश्चिम स्थित तटीय क्षेत्र मोरोन के आसपास था। भूकंप की गहराई केवल 10 किलोमीटर होने के कारण इसका प्रभाव और अधिक विनाशकारी माना जा रहा है।

    भूकंप के झटके इतने तेज थे कि राजधानी काराकस सहित कई शहरों में लोग दहशत में घरों और दफ्तरों से बाहर निकल आए। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार कई इमारतों में दरारें आ गईं जबकि कुछ भवन पूरी तरह ढह गए। स्थानीय मीडिया और सोशल मीडिया पर सामने आई तस्वीरों में सड़कों पर मलबा और क्षतिग्रस्त मकान दिखाई दे रहे हैं।

    वेनेजुएला के गृह, न्याय और शांति मंत्री डियोसडाडो कैबेलो ने पुष्टि की कि देश के विभिन्न हिस्सों में नुकसान की खबरें मिली हैं। उन्होंने नागरिकों से अपील की कि वे फिलहाल इमारतों के अंदर जाने से बचें क्योंकि आफ्टरशॉक यानी भूकंप के बाद आने वाले झटकों का खतरा बना हुआ है। प्रशासन ने राहत और बचाव कार्य तेज कर दिए हैं तथा प्रभावित इलाकों में आपातकालीन टीमें तैनात कर दी गई हैं।

    भूकंप का असर पड़ोसी देश कोलंबिया तक भी महसूस किया गया। वहां के कई शहरों में लोगों ने तेज झटकों की सूचना दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि नुकसान का वास्तविक आकलन आने वाले दिनों में ही हो पाएगा। अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं और राहत कार्यों में सहयोग के लिए तैयार हैं।

    वेनेजुएला इस समय अपने हालिया इतिहास की सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदाओं में से एक का सामना कर रहा है। पूरी दुनिया की नजर अब राहत और बचाव कार्यों पर टिकी हुई है, जबकि प्रभावित परिवारों के लिए वैश्विक स्तर पर संवेदनाएं और सहायता के संदेश लगातार सामने आ रहे हैं। दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला में आए लगातार दो शक्तिशाली भूकंपों ने भारी तबाही मचा दी है। देश के कई शहरों में इमारतें क्षतिग्रस्त हो गई हैं और जानमाल के बड़े नुकसान की आशंका जताई जा रही है। भूकंप के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ गई है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस आपदा पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए प्रभावित लोगों के प्रति संवेदना प्रकट की है।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर जारी संदेश में कहा कि वेनेजुएला में आए विनाशकारी भूकंप से हुई तबाही की खबर बेहद दुखद है। उन्होंने भारत की जनता की ओर से वेनेजुएला की सरकार और वहां के नागरिकों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया है उनके दुख में पूरा भारत सहभागी है। प्रधानमंत्री ने घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करते हुए कहा कि भारत इस कठिन समय में वेनेजुएला के साथ खड़ा है और हर संभव सहायता उपलब्ध कराने के लिए तैयार है।

    वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी भूकंप से हुई तबाही पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि वेनेजुएला में आए दोनों भूकंप अत्यंत शक्तिशाली थे और शुरुआती रिपोर्टें अच्छे संकेत नहीं दे रही हैं। ट्रंप के अनुसार बड़ी संख्या में लोगों के प्रभावित होने और भारी जनहानि की आशंका है। उन्होंने कहा कि अमेरिका सहायता के लिए पूरी तरह तैयार है और सभी संबंधित एजेंसियों को राहत एवं बचाव कार्यों के लिए सतर्क रहने के निर्देश दे दिए गए हैं।

    संयुक्त राज्य भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के अनुसार पहला भूकंप बुधवार देर शाम 7.1 तीव्रता का दर्ज किया गया। इसके ठीक एक मिनट बाद 7.5 तीव्रता का दूसरा और अधिक शक्तिशाली झटका महसूस किया गया। दोनों भूकंपों का केंद्र राजधानी काराकस से लगभग 160 किलोमीटर पश्चिम स्थित तटीय क्षेत्र मोरोन के आसपास था। भूकंप की गहराई केवल 10 किलोमीटर होने के कारण इसका प्रभाव और अधिक विनाशकारी माना जा रहा है।

    भूकंप के झटके इतने तेज थे कि राजधानी काराकस सहित कई शहरों में लोग दहशत में घरों और दफ्तरों से बाहर निकल आए। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार कई इमारतों में दरारें आ गईं जबकि कुछ भवन पूरी तरह ढह गए। स्थानीय मीडिया और सोशल मीडिया पर सामने आई तस्वीरों में सड़कों पर मलबा और क्षतिग्रस्त मकान दिखाई दे रहे हैं।

    वेनेजुएला के गृह, न्याय और शांति मंत्री डियोसडाडो कैबेलो ने पुष्टि की कि देश के विभिन्न हिस्सों में नुकसान की खबरें मिली हैं। उन्होंने नागरिकों से अपील की कि वे फिलहाल इमारतों के अंदर जाने से बचें क्योंकि आफ्टरशॉक यानी भूकंप के बाद आने वाले झटकों का खतरा बना हुआ है। प्रशासन ने राहत और बचाव कार्य तेज कर दिए हैं तथा प्रभावित इलाकों में आपातकालीन टीमें तैनात कर दी गई हैं।

    भूकंप का असर पड़ोसी देश कोलंबिया तक भी महसूस किया गया। वहां के कई शहरों में लोगों ने तेज झटकों की सूचना दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि नुकसान का वास्तविक आकलन आने वाले दिनों में ही हो पाएगा। अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं और राहत कार्यों में सहयोग के लिए तैयार हैं।

    वेनेजुएला इस समय अपने हालिया इतिहास की सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदाओं में से एक का सामना कर रहा है। पूरी दुनिया की नजर अब राहत और बचाव कार्यों पर टिकी हुई है, जबकि प्रभावित परिवारों के लिए वैश्विक स्तर पर संवेदनाएं और सहायता के संदेश लगातार सामने आ रहे हैं।

  • भविष्य की तकनीकों पर भारत-अमेरिका का बड़ा दांव, AI और सेमीकंडक्टर सेक्टर में बढ़ेगी साझेदारी

    भविष्य की तकनीकों पर भारत-अमेरिका का बड़ा दांव, AI और सेमीकंडक्टर सेक्टर में बढ़ेगी साझेदारी

    नई दिल्ली। भारत और अमेरिका ने भविष्य की तकनीकों और रणनीतिक क्षेत्रों में सहयोग को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। वाशिंगटन में आयोजित उच्चस्तरीय वार्ता के दौरान दोनों देशों ने सेमीकंडक्टर निर्माण, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मजबूत आपूर्ति श्रृंखलाओं और क्रिटिकल मिनरल्स जैसे अहम क्षेत्रों में साझेदारी को और गहरा करने पर व्यापक चर्चा की। यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब दुनिया तकनीकी प्रतिस्पर्धा के नए दौर में प्रवेश कर रही है और वैश्विक अर्थव्यवस्था में उभरती तकनीकों की भूमिका लगातार बढ़ रही है।

    भारतीय दूतावास द्वारा जारी जानकारी के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव एस. कृष्णन ने अमेरिकी विदेश विभाग के अंडर सेक्रेटरी ऑफ स्टेट जैकब एस. हेलबर्ग से मुलाकात कर द्विपक्षीय तकनीकी सहयोग को मजबूत बनाने के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की। बैठक का मुख्य उद्देश्य उन क्षेत्रों की पहचान करना था जहां दोनों देश मिलकर दीर्घकालिक और भरोसेमंद साझेदारी विकसित कर सकते हैं।

    वार्ता के दौरान सेमीकंडक्टर निर्माण को विशेष प्राथमिकता दी गई। दोनों पक्षों ने इस बात पर सहमति जताई कि वैश्विक सप्लाई चेन को अधिक सुरक्षित और विविधतापूर्ण बनाने के लिए सेमीकंडक्टर उत्पादन क्षमता बढ़ाना आवश्यक है। हाल के वर्षों में चिप्स की वैश्विक कमी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि तकनीकी उद्योगों की स्थिरता के लिए मजबूत और विश्वसनीय उत्पादन नेटवर्क बेहद जरूरी हैं।

    आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर भी दोनों देशों के बीच व्यापक चर्चा हुई। भारत और अमेरिका ने एआई तकनीक के विकास, उसके सुरक्षित उपयोग और विभिन्न क्षेत्रों में उसके प्रभावी अनुप्रयोग को बढ़ावा देने पर विचार साझा किए। माना जा रहा है कि आने वाले वर्षों में एआई स्वास्थ्य, शिक्षा, विनिर्माण, रक्षा और वित्तीय सेवाओं सहित अनेक क्षेत्रों में बड़े बदलाव ला सकता है।

    बैठक में क्रिटिकल मिनरल्स की उपलब्धता और आपूर्ति को लेकर भी महत्वपूर्ण बातचीत हुई। ये खनिज उन्नत विनिर्माण, स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों, इलेक्ट्रिक वाहनों, बैटरी उत्पादन और रक्षा उद्योगों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। दोनों देशों ने इस क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने और दीर्घकालिक आपूर्ति सुनिश्चित करने के उपायों पर चर्चा की।

    भारत और अमेरिका के बीच यह संवाद ऐसे समय में हो रहा है जब दोनों देश रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता बढ़ाने और किसी एक स्रोत पर निर्भरता कम करने की दिशा में काम कर रहे हैं। तकनीकी सहयोग को लेकर दोनों देशों की बढ़ती नजदीकियां वैश्विक स्तर पर भी महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं।

    इस बीच केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने हाल ही में कहा था कि वैश्विक सेमीकंडक्टर उद्योग तेजी से विस्तार कर रहा है और इसमें कुशल पेशेवरों की भारी मांग पैदा हो रही है। उनके अनुसार वर्तमान में लगभग 800 अरब डॉलर मूल्य की यह इंडस्ट्री जल्द ही 1 ट्रिलियन डॉलर के आंकड़े को पार कर सकती है।

    वैष्णव ने यह भी बताया कि वर्ष 2032 तक दुनिया भर में सेमीकंडक्टर क्षेत्र में लगभग 10 लाख नई नौकरियां पैदा होने की संभावना है। वहीं उद्योग को लगभग 10 लाख कुशल पेशेवरों की कमी का भी सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में भारत के पास वैश्विक तकनीकी प्रतिभा केंद्र के रूप में उभरने और दुनिया को प्रशिक्षित मानव संसाधन उपलब्ध कराने का सुनहरा अवसर है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और अमेरिका के बीच बढ़ता यह तकनीकी सहयोग न केवल दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत करेगा बल्कि वैश्विक तकनीकी परिदृश्य में भी नई दिशा तय कर सकता है।

  • ट्रंप का दावा- अमेरिका के दबाव में ईरान, बातचीत सफल नहीं हुई तो फिर होगा एक्शन

    ट्रंप का दावा- अमेरिका के दबाव में ईरान, बातचीत सफल नहीं हुई तो फिर होगा एक्शन

    वाशिंगटन। अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बड़ा दावा करते हुए कहा है कि ईरान बातचीत के दौरान लगातार बड़ी रियायतें दे रहा है और अमेरिका की लगभग हर मांग को स्वीकार कर रहा है। ट्रंप ने विश्वास जताया कि दोनों देशों के बीच कूटनीतिक प्रयास सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि यदि परिस्थितियां बदलीं तो सैन्य कार्रवाई का विकल्प अब भी पूरी तरह खुला है।

    व्हाइट हाउस में नाटो महासचिव मार्क रूटे के साथ हुई बैठक के दौरान ट्रंप ने मीडिया से बातचीत में कहा कि ईरान के साथ वार्ता बेहद सकारात्मक माहौल में चल रही है। उन्होंने दावा किया कि तेहरान अब पहले की तुलना में कहीं अधिक लचीला रुख अपना रहा है और अमेरिका की शर्तों को स्वीकार करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ट्रंप के अनुसार वर्तमान हालात अमेरिका के पक्ष में हैं और बातचीत के नतीजे भी उत्साहजनक दिखाई दे रहे हैं।

    रिपब्लिकन सांसदों के साथ बैठक से पहले ट्रंप ने कहा कि अमेरिका मजबूत स्थिति में है और ईरान लगातार समझौते की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में स्थिति और स्पष्ट होगी, लेकिन फिलहाल वार्ता का माहौल बेहद सकारात्मक है। बैठक के बाद भी उन्होंने दोहराया कि ईरान अमेरिकी अपेक्षाओं के अनुरूप व्यवहार कर रहा है और उसे यह समझ आ चुका है कि अंतरराष्ट्रीय दबावों को नजरअंदाज करना आसान नहीं है।

    हालांकि ट्रंप ने बातचीत के साथ-साथ सैन्य विकल्प को भी पूरी तरह खारिज नहीं किया। उन्होंने संकेत दिया कि यदि अमेरिका की सुरक्षा या उसके हितों को कोई खतरा पैदा हुआ तो वाशिंगटन निर्णायक कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा। उनका कहना था कि अमेरिका अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए हर संभव विकल्प का उपयोग करने में सक्षम है।

    इस दौरान ट्रंप ने होर्मुज स्ट्रेट को लेकर भी कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने साफ कहा कि ऐसा कोई समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा जिसके तहत ईरान अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी पर किसी प्रकार का शुल्क या नियंत्रण स्थापित कर सके। ट्रंप के अनुसार दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में शामिल होर्मुज स्ट्रेट पर किसी एक देश का दबदबा वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है।

    नाटो महासचिव मार्क रूटे ने भी ट्रंप की ईरान नीति का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना पूरी दुनिया की सुरक्षा के लिए आवश्यक है। रूटे के अनुसार यदि ईरान परमाणु क्षमता हासिल कर लेता है तो इसका खतरा केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यूरोप और दुनिया के अन्य हिस्सों की सुरक्षा भी प्रभावित होगी।

    रूटे ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि ईरान परमाणु हथियार विकसित न कर सके। उन्होंने अमेरिका की रणनीति को वैश्विक सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि वर्तमान प्रयास केवल क्षेत्रीय स्थिरता ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय शांति बनाए रखने के लिए भी जरूरी हैं।

    अमेरिका और ईरान के बीच जारी यह कूटनीतिक दौर आने वाले दिनों में वैश्विक राजनीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है। दुनिया की नजर अब इस बात पर टिकी है कि बातचीत का यह सिलसिला किसी स्थायी समझौते तक पहुंचता है या फिर तनाव एक बार फिर नए मोड़ पर पहुंचता है।

  • ट्रंप ने जताई नाराजगी, बोले- अमेरिका को पैसों से ज्यादा वफादारी की जरूरत

    ट्रंप ने जताई नाराजगी, बोले- अमेरिका को पैसों से ज्यादा वफादारी की जरूरत


    वॉशिंगटन। नाटो शिखर सम्मेलन से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सहयोगी देशों को लेकर बड़ा बयान दिया है। व्हाइट हाउस में नाटो महासचिव मार्क रूटे के साथ हुई मुलाकात के दौरान ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ बढ़े तनाव और संघर्ष के दौरान कई नाटो सहयोगी देशों ने अमेरिका को निराश किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अमेरिका को किसी सैन्य सहायता की जरूरत नहीं थी लेकिन सहयोगी देशों से जिस तरह के समर्थन और एकजुटता की उम्मीद थी वह देखने को नहीं मिली।

    ट्रंप ने कहा कि अमेरिका ने ईरान के खिलाफ अपनी रणनीति और ताकत के दम पर हालात को नियंत्रित किया और किसी बाहरी मदद की आवश्यकता नहीं पड़ी। इसके बावजूद उन्होंने माना कि अगर सहयोगी देश खुलकर समर्थन जताते तो यह अमेरिका के लिए सकारात्मक संदेश होता। उन्होंने इटली ब्रिटेन जर्मनी और फ्रांस जैसे प्रमुख सहयोगी देशों का नाम लेते हुए कहा कि उनके रवैये से वे खासे निराश हुए हैं।

    नाटो महासचिव मार्क रूटे ने हालांकि यूरोपीय देशों का बचाव करते हुए कहा कि कई देशों ने अमेरिका को महत्वपूर्ण लॉजिस्टिक और रणनीतिक सहयोग प्रदान किया। रूटे ने बताया कि संघर्ष के दौरान यूरोप स्थित सैन्य अड्डों से हजारों अमेरिकी विमानों ने उड़ान भरी और अमेरिका को आवश्यक सैन्य सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं। उन्होंने कहा कि यूरोपीय सहयोग के बिना ऐसे बड़े अभियान को अंजाम देना आसान नहीं होता।

    बैठक के दौरान ट्रंप ने एक बार फिर नाटो सदस्य देशों पर रक्षा बजट बढ़ाने का दबाव बनाया। उन्होंने कहा कि कई देशों ने अपनी जीडीपी का पांच प्रतिशत रक्षा और सुरक्षा क्षेत्र पर खर्च करने का वादा किया था लेकिन अधिकांश देश अब तक इस लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाए हैं। ट्रंप का कहना था कि अमेरिका लंबे समय से नाटो का सबसे बड़ा वित्तीय और सैन्य योगदानकर्ता रहा है जबकि अन्य देशों को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए।

    हालांकि ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका की पहली अपेक्षा आर्थिक सहयोग नहीं है। उन्होंने कहा कि अमेरिका के पास दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना है और उसे किसी के पैसों की जरूरत नहीं है। अमेरिका को अपने सहयोगियों से केवल वफादारी और भरोसेमंद साझेदारी चाहिए।

    ईरान को लेकर ट्रंप ने कहा कि तेहरान के साथ बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है और कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर प्रगति देखने को मिल रही है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि ईरान कुछ बड़ी रियायतें देने को तैयार है। हालांकि ट्रंप ने साफ कर दिया कि किसी भी स्थिति में ईरान को होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों पर शुल्क लगाने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

    तुर्किए के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन को लेकर भी ट्रंप ने सकारात्मक टिप्पणी की और उन्हें अपना मित्र बताया। वहीं एफ-35 लड़ाकू विमान कार्यक्रम में तुर्किए की संभावित वापसी को लेकर अमेरिकी प्रशासन कानूनी प्रक्रियाओं की समीक्षा कर रहा है।

    यूक्रेन संकट पर पूछे गए सवाल के जवाब में ट्रंप ने राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की की सराहना की और उन्हें साहसी नेता बताया। उन्होंने कहा कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद जेलेंस्की मजबूती से डटे हुए हैं।

    अब 7 और 8 जुलाई को होने वाले नाटो शिखर सम्मेलन पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं जहां रक्षा खर्च बढ़ाने यूक्रेन को समर्थन जारी रखने और ईरान के परमाणु कार्यक्रम जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है।

  • 2004 की सुनामी से लेकर चिली तक, दुनिया के सबसे शक्तिशाली भूकंपों की कहानी

    2004 की सुनामी से लेकर चिली तक, दुनिया के सबसे शक्तिशाली भूकंपों की कहानी


    नई दिल्ली । प्रकृति की सबसे विनाशकारी घटनाओं में भूकंप का नाम सबसे ऊपर आता है। कुछ सेकंड या मिनट तक आने वाले ये झटके शहरों को मलबे में बदल सकते हैं और लाखों लोगों की जिंदगी पर स्थायी असर छोड़ सकते हैं। हाल ही में वेनेजुएला में आए शक्तिशाली भूकंपों ने एक बार फिर दुनिया को याद दिलाया है कि प्रकृति के सामने इंसानी तकनीक और विकास कितने सीमित हैं।

    हालांकि वेनेजुएला में आए 7.2 और 7.5 तीव्रता के भूकंप बेहद शक्तिशाली थे, लेकिन इतिहास में दर्ज सबसे बड़े भूकंपों की सूची में इनका स्थान नहीं है। आइए जानते हैं दुनिया के कुछ सबसे शक्तिशाली और विनाशकारी भूकंपों के बारे में

    1960 का ग्रेट चिली भूकंप: अब तक का सबसे शक्तिशाली झटका
    दुनिया का सबसे शक्तिशाली दर्ज भूकंप 22 मई 1960 को चिली के बायोबियो क्षेत्र में आया था। इसकी तीव्रता 9.5 मापी गई थी। “ग्रेट चिली अर्थक्वेक” के नाम से प्रसिद्ध इस आपदा ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई। भूकंप के साथ आई सुनामी ने प्रशांत महासागर के कई देशों को प्रभावित किया और करीब 1,655 लोगों की मौत हुई।

    1964 का अलास्का भूकंप

    27 मार्च 1964 को अमेरिका के अलास्का में 9.2 तीव्रता का भूकंप आया, जो लगभग चार मिनट तक महसूस किया गया। यह उत्तरी अमेरिका के इतिहास का सबसे शक्तिशाली भूकंप माना जाता है। भूकंप और उसके बाद आई सुनामी से करीब 130 लोगों की जान चली गई।

    2004 की सुनामी: 2.8 लाख से ज्यादा मौतें

    26 दिसंबर 2004 को इंडोनेशिया के सुमात्रा तट के पास समुद्र के भीतर 9.1 तीव्रता का भूकंप आया। इसके बाद उत्पन्न सुनामी ने भारत, श्रीलंका, थाईलैंड और इंडोनेशिया समेत कई देशों के तटीय इलाकों में भारी तबाही मचाई। यह आधुनिक इतिहास की सबसे घातक प्राकृतिक आपदाओं में से एक थी, जिसमें 2.8 लाख से अधिक लोगों की मौत हुई।

    जापान का तोहोकू भूकंप
    11 मार्च 2011 को जापान के तोहोकू क्षेत्र में 9.1 तीव्रता का भूकंप आया। इसके बाद आई विशाल सुनामी ने जापान के पूर्वी तट को बुरी तरह प्रभावित किया। इस आपदा में 15 हजार से अधिक लोगों की जान गई और फुकुशिमा परमाणु संयंत्र दुर्घटना जैसी गंभीर स्थिति भी पैदा हुई।

    रूस का कामचटका क्षेत्र
    रूस के कामचटका क्षेत्र में 1952 में 9.0 तीव्रता का शक्तिशाली भूकंप दर्ज किया गया था। इस आपदा में हजारों लोगों के प्रभावित होने की खबरें सामने आईं। वहीं हाल के वर्षों में भी इस क्षेत्र में बड़े भूकंप दर्ज किए गए हैं, जो इसे दुनिया के सबसे सक्रिय भूकंपीय क्षेत्रों में शामिल करते हैं।

    भारत का सबसे बड़ा भूकंप
    भारत में दर्ज सबसे शक्तिशाली भूकंप 15 अगस्त 1950 को अरुणाचल प्रदेश और असम क्षेत्र में आया था। इसकी तीव्रता 8.6 मापी गई थी। इस भूकंप ने पूर्वोत्तर भारत में भारी तबाही मचाई और सैकड़ों लोगों की जान चली गई।

    अन्य बड़े भूकंप

    1906 में इक्वाडोर के एस्मेराल्डास क्षेत्र में 8.8 तीव्रता का भूकंप, लगभग 1,500 मौतें।

    2010 में चिली के बायोबियो क्षेत्र में 8.8 तीव्रता का भूकंप, 500 से अधिक लोगों की मौत।

    1965 में अलास्का में 8.7 तीव्रता का भूकंप, हालांकि इसमें बड़े पैमाने पर जनहानि नहीं हुई।

    क्यों आते हैं इतने बड़े भूकंप?

    भूकंप पृथ्वी की टेक्टोनिक प्लेटों की गतिविधियों के कारण आते हैं। जब ये प्लेटें आपस में टकराती, खिसकती या दबाव बनाती हैं, तब ऊर्जा अचानक मुक्त होती है और धरती कांप उठती है। प्रशांत महासागर के आसपास स्थित “रिंग ऑफ फायर” दुनिया का सबसे सक्रिय भूकंपीय क्षेत्र माना जाता है, जहां अधिकांश बड़े भूकंप आते हैं।
  • जब धरती ने दिखाई अपनी सबसे भयावह ताकत, दुनिया के महाविनाशकारी भूकंपों ने लाखों जिंदगियां निगलीं और बदल दिया इतिहास

    जब धरती ने दिखाई अपनी सबसे भयावह ताकत, दुनिया के महाविनाशकारी भूकंपों ने लाखों जिंदगियां निगलीं और बदल दिया इतिहास

    नई दिल्ली । वेनेजुएला में हाल ही में आए शक्तिशाली भूकंपों ने एक बार फिर पूरी दुनिया का ध्यान प्राकृतिक आपदाओं की भयावहता की ओर आकर्षित किया है। 7.2 और 7.5 तीव्रता के झटकों ने यह याद दिलाया कि आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक प्रगति के बावजूद प्रकृति की शक्ति के सामने मानव सभ्यता अब भी सीमित है। हालांकि वेनेजुएला में आए ये भूकंप गंभीर माने जा रहे हैं, लेकिन विश्व इतिहास में दर्ज सबसे शक्तिशाली भूकंपों की सूची इससे कहीं अधिक विनाशकारी घटनाओं से भरी हुई है।

    दुनिया के इतिहास में अब तक दर्ज सबसे शक्तिशाली भूकंप वर्ष 1960 में दक्षिण अमेरिकी देश चिली में आया था। बायोबियो क्षेत्र में दर्ज इस भूकंप की तीव्रता 9.5 मापी गई थी। इसे ग्रेट चिली अर्थक्वेक के नाम से जाना जाता है। इस आपदा ने हजारों इमारतों को क्षतिग्रस्त कर दिया और व्यापक तबाही मचाई। बड़ी संख्या में लोग बेघर हो गए तथा कई क्षेत्रों में सामान्य जीवन लंबे समय तक प्रभावित रहा।

    इसके बाद वर्ष 1964 में अमेरिका के अलास्का क्षेत्र में 9.2 तीव्रता का भूकंप आया। यह भूकंप कई मिनट तक महसूस किया गया और इसके प्रभाव ने विशाल भूभाग को प्रभावित किया। भूकंप के साथ भूस्खलन और समुद्री उथल-पुथल ने भी नुकसान को बढ़ा दिया। इसे उत्तरी अमेरिका के इतिहास की सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदाओं में गिना जाता है।

    वर्ष 2004 में इंडोनेशिया के सुमात्रा तट के निकट समुद्र के भीतर आया 9.1 तीव्रता का भूकंप आधुनिक इतिहास की सबसे घातक प्राकृतिक त्रासदियों में शामिल है। इस भूकंप के बाद उत्पन्न सुनामी ने हिंद महासागर से जुड़े अनेक देशों को अपनी चपेट में ले लिया। भारत, श्रीलंका, थाईलैंड और इंडोनेशिया समेत कई देशों के तटीय क्षेत्रों में भारी तबाही हुई। लाखों लोग प्रभावित हुए और दो लाख से अधिक लोगों की जान चली गई। इस घटना ने वैश्विक स्तर पर सुनामी चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करने की आवश्यकता को भी रेखांकित किया।

    वर्ष 2011 में जापान के तोहोकू क्षेत्र में आए 9.1 तीव्रता के भूकंप ने दुनिया को एक और बड़ा झटका दिया। अत्याधुनिक तकनीक और मजबूत आपदा प्रबंधन व्यवस्था होने के बावजूद जापान को भारी नुकसान झेलना पड़ा। भूकंप के बाद आई विशाल सुनामी ने कई शहरों को प्रभावित किया और हजारों लोगों की मौत हुई। इस आपदा का असर ऊर्जा और परमाणु सुरक्षा से जुड़े क्षेत्रों तक भी पहुंचा।

    रूस का कामचटका क्षेत्र भी दुनिया के सबसे शक्तिशाली भूकंपों का साक्षी रहा है। वर्ष 1952 में यहां 9.0 तीव्रता का भूकंप आया था, जिसने व्यापक विनाश फैलाया। वहीं हाल के वर्षों में इसी क्षेत्र में एक और शक्तिशाली भूकंप दर्ज किया गया, जिसने वैज्ञानिकों का ध्यान पृथ्वी की सक्रिय विवर्तनिक गतिविधियों की ओर आकर्षित किया।

    भारत भी इस सूची से अछूता नहीं रहा है। वर्ष 1950 में पूर्वोत्तर क्षेत्र, विशेष रूप से अरुणाचल प्रदेश और आसपास के इलाकों में आए 8.6 तीव्रता के भूकंप ने बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाया था। यह स्वतंत्र भारत के शुरुआती वर्षों की सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदाओं में गिना जाता है। इसके अतिरिक्त इक्वाडोर, चिली और अलास्का जैसे क्षेत्रों में भी समय-समय पर आए शक्तिशाली भूकंपों ने हजारों लोगों की जान ली और भूगर्भीय इतिहास में अपनी अलग पहचान बनाई।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भूकंपों को रोका नहीं जा सकता, लेकिन वैज्ञानिक निगरानी, मजबूत निर्माण मानकों और प्रभावी आपदा प्रबंधन के माध्यम से इनके नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। वेनेजुएला की हालिया घटना एक बार फिर यही संदेश देती है कि प्राकृतिक आपदाओं के प्रति सतर्कता और तैयारी ही सबसे बड़ा बचाव है।

  • PoK में संकट गहराया, भोजन, दवा और ईंधन की भारी कमी, विरोध दबाने के आरोपों के बीच हालात तनावपूर्ण

    PoK में संकट गहराया, भोजन, दवा और ईंधन की भारी कमी, विरोध दबाने के आरोपों के बीच हालात तनावपूर्ण

    इस्लामाबाद। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में जारी सरकार-विरोधी प्रदर्शनों के बीच हालात गंभीर हो गए हैं। स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, इस्लामाबाद पर आरोप है कि उसने विरोध प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के लिए क्षेत्र में भोजन, राशन, दवाओं और ईंधन की आपूर्ति पर रोक जैसी स्थिति पैदा कर दी है, जिससे कई इलाकों में मानवीय संकट गहरा गया है।

    रिपोर्टों के मुताबिक मुजफ्फरनगर, पुंछ, रावलाकोट, बाग और नीलम घाटी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में खाद्यान्न और आवश्यक वस्तुओं की भारी कमी देखी जा रही है। स्थानीय लोगों, ट्रक ड्राइवरों और विपक्षी नेताओं का कहना है कि आवश्यक सामान ले जाने वाले वाहनों को सीमा चौकियों पर रोका जा रहा है, जिससे स्थिति और बिगड़ गई है।

    जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के नेतृत्व में चल रहे शटडाउन और विरोध प्रदर्शनों के कारण पहले से ही आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित थी, लेकिन अब इसे और गंभीर बताया जा रहा है। हालांकि, पाकिस्तानी अधिकारियों ने किसी भी प्रकार की नाकेबंदी से इनकार किया है, जबकि BBC उर्दू और डॉन जैसी मीडिया रिपोर्टों में हालात को चिंताजनक बताया गया है।

    सीमा चौकियों पर वाहनों की आवाजाही प्रभावित

    स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, पीओके में खाद्यान्न और दवाओं की कमी के बाद लोग खैबर पख्तूनख्वा, रावलपिंडी और इस्लामाबाद से सामान लाने को मजबूर हैं, लेकिन उन्हें सीमा चौकियों पर रोका जा रहा है। आजाद पट्टन और फगवारी क्षेत्रों में तैनात पुलिस द्वारा व्यावसायिक और निजी वाहनों की जांच की जा रही है, जिससे कई वाहन लंबे समय से रुके हुए हैं और खराब होने वाला सामान नष्ट हो रहा है।

    स्थानीय लोगों की परेशानियां बढ़ीं

    स्थानीय नागरिकों के अनुसार स्थिति बेहद कठिन हो गई है। एक निवासी नवीद ने बताया कि उन्हें रावलपिंडी से लाया गया भोजन और दवाएं ले जाने से रोका गया और कथित तौर पर सामान फेंकने के बाद ही आगे बढ़ने की अनुमति देने की बात कही गई।

    नीलम घाटी के निवासी अलिफ दीन के अनुसार, शटडाउन और आपूर्ति बाधित होने के कारण पिछले कई दिनों से राशन उपलब्ध नहीं है। सरकारी डिपो पर भुगतान के बावजूद लोगों को आटा नहीं मिल पा रहा है और खुले बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं।

    दवा और ईंधन की गंभीर कमी

    मुजफ्फरनगर के 64 वर्षीय मोहम्मद मकीन ने बताया कि क्षेत्र में दवाओं की भारी कमी है और सभी बड़े मेडिकल स्टोर पिछले दो सप्ताह से बंद पड़े हैं। वहीं पुंछ और मुजफ्फरनगर में पेट्रोल पंप बंद होने से लोग ब्लैक मार्केट से महंगा ईंधन खरीदने को मजबूर हैं।

    आरोप और राजनीतिक बयानबाजी

    पाकिस्तानी अधिकारियों ने नाकेबंदी के आरोपों से इनकार किया है, जबकि मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि सरकार बिना सीधे बल प्रयोग के प्रदर्शन समाप्त करने के लिए आपूर्ति लाइन बाधित करने की रणनीति अपना रही है।

    पीओके में जारी विरोध का मुख्य कारण जम्मू-कश्मीर शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 विधानसभा सीटें बताई जा रही हैं। स्थानीय समूहों का आरोप है कि इन सीटों के माध्यम से चुनावी प्रक्रिया प्रभावित की जाती है। इसी मुद्दे पर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी के नेतृत्व में आंदोलन जारी है, जिसके दौरान इंटरनेट सेवाएं भी बाधित की गई हैं। रिपोर्टों के अनुसार, झड़पों में अब तक कम से कम 58 लोगों की मौत का दावा किया गया है।

    पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) की पीओके इकाई ने सोशल मीडिया पर इस कार्रवाई की आलोचना करते हुए इसे गंभीर दमन बताया है।

    बड़ा आंदोलन जारी

    रिपोर्टों के अनुसार, रावलाकोट के ईदगाह मैदान में चल रहे धरने में पिछले दो हफ्तों में 70,000 से अधिक लोग शामिल हुए हैं। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी ने चेतावनी दी है कि यदि मांगें पूरी नहीं की गईं तो मुजफ्फरनगर तक 1,00,000 लोगों का बड़ा मार्च निकाला जा सकता है।

  • इस्लामिक नाटो’ में शामिल होगा ईरान? राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने मुस्लिम देशों से की एकजुट होने की अपील

    इस्लामिक नाटो’ में शामिल होगा ईरान? राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने मुस्लिम देशों से की एकजुट होने की अपील


    नई दिल्ली। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बीते तनाव और संघर्ष के बाद पश्चिम एशिया की राजनीति में बड़े समझौतों की चर्चा तेज हो गई है। इसी बीच ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने मुस्लिम देशों से एकजुट होने और आपसी सहयोग बढ़ाने की अपील की है। उनके इस बयान को क्षेत्रीय स्तर पर एक मजबूत मुस्लिम गठबंधन बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।

    पाकिस्तान दौरे पर पहुंचे पेजेशकियन ने प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और सेना प्रमुख असीम मुनीर से मुलाकात की। इस दौरान दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों, क्षेत्रीय सुरक्षा और वैश्विक घटनाओं पर विस्तृत चर्चा हुई।

    संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में ईरानी राष्ट्रपति ने कहा कि पश्चिम एशिया और फारस की खाड़ी क्षेत्र में स्थायी शांति, स्थिरता और विकास तभी संभव है जब क्षेत्रीय देश आपसी सम्मान, संवाद और सहयोग की भावना से आगे बढ़ें। उन्होंने जोर देकर कहा कि मुस्लिम देशों को अपने साझा हितों और जबड़े के प्रति एकजुट होकर काम करना चाहिए।

    पेजेशकियन ने कहा, “मेरा मानना ​​है कि मुस्लिम अपने समुदायों के खिलाफ एकजुट होकर खड़े होंगे।” उनके इस बयान के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि ईरान भविष्य में उस सैन्य-सहयोगी मंच के करीब आ सकता है जिसे मीडिया में अक्सर ‘इस्लामिक नाटो’ कहा जाता है।

    हालांकि यह ध्यान देने योग्य है कि ‘इस्लामिक नाटो’ कोई औपचारिक नाटो जैसी संस्था नहीं है, बल्कि इस्लामिक मिलिट्री काउंटर टेररिज्म कोएलिशन नामक एक बहुराष्ट्रीय सुरक्षा गठबंधन है, जिसे हासिल सऊदी अरब करता है और जिसमें पाकिस्तान सहित कई मुस्लिम देश शामिल हैं। ईरान वर्तमान में इस गठबंधन का सदस्य नहीं है।

    विश्लेषणों का मानना ​​है कि यदि ईरान और पाकिस्तान के बीच राजनयिक सहयोग बढ़ता है और क्षेत्रीय स्वायत्त अनुकूल रहते हैं, तो मुस्लिम देशों के बीच सुरक्षा और राजनीतिक सहयोग का नया ढांचा विकसित हो सकता है। हालांकि ईरान के किसी औपचारिक सैन्य गठबंधन में शामिल होने की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। स्विट्जरलैंड में अमेरिका के साथ वार्ता के बाद पाकिस्तान पहुंचे पेजेशकियां के इस दौरे को क्षेत्रीय आतंकवाद और मुस्लिम देशों के बीच सहयोग बढ़ाने के प्रयासों के रूप में देखा जा रहा है।

  • भारतीय आमों की मिठास से मजबूत होंगे वैश्विक रिश्ते, नितिन नवीन ने 82 देशों के राजनयिकों को भेजे खास उपहार

    भारतीय आमों की मिठास से मजबूत होंगे वैश्विक रिश्ते, नितिन नवीन ने 82 देशों के राजनयिकों को भेजे खास उपहार


    नई दिल्ली। भारतीय आमों की एसोसिएशन अब अंतरराष्ट्रीय संबंधों में भी नई गर्माहट पैदा हो रही है। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने नई दिल्ली में 82 देशों के विशेषज्ञों को भारतीय आमों के विशेष प्रीमियम उपहार बॉक्स वितरित किए हैं। इसका पहला उद्देश्य भारत की समृद्ध कृषि विरासत, सांस्कृतिक पहचान और मेहमाननवाजी की परंपरा को वैश्विक मंच पर और मजबूत बनाना है।

    विशेष रूप से तैयार किए गए इन बॉक्स में देश के चार प्रसिद्ध आम बादाम-केसर आम, दशहरी आम, बंगनपल्ली आम और लंगड़ा आम-शामिल की टोकरी। ये सभी सॉसेज अपने विशिष्ट स्वाद, सुगंध और क्षेत्रीय पहचान के लिए देश-दुनिया में प्रसिद्ध हैं।

    आम के साथ भेजे गए अपने व्यक्तिगत संदेश में नितिन नवीन ने भारतीय संस्कृति में आम के महत्व का उल्लेख करते हुए इसमें मित्रता, भाईचारा, मित्रतावादी और समृद्ध कृषि परंपरा का प्रतीक बताया। उन्होंने आशा व्यक्त की कि यह छोटा-सा भारत और विभिन्न देशों के बीच सहयोग और मजबूत बनाने में योगदान देगा।

    सांस्कृतिक अन्वेषण का अनोखा उदाहरण

    विशेषज्ञ इस पहल को ‘कल्चरल डिप्लोमेसी’ यानी सांस्कृतिक पोर्टफोलियो का प्रभावशाली उदाहरण मान रहे हैं। भारत लंबे समय से योग, आयुर्वेद, संविधान और सांस्कृतिक विरासत के माध्यम से दुनिया से जुड़ा हुआ है। अब हम भी वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय भारतीय फल के माध्यम से सहयोग और सहयोग का संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं।

    भारतीय आमों की खास पहचान

    गिर केसर (गुजरात)
    गिर केसर आम अपने शानदार केसरिया गूदे, स्वादिष्ट स्वाद और अनोखे स्वाद के लिए प्रसिद्ध है। साल इसे 2011 में जीआई टैग मिला था।

    मलिहाबादी दशहरी (उत्तर प्रदेश)

    मलिहाबादी दशहरी आम की सब्जी, बिना रेशम वाले गुड़े और शहद जैसी मिठास के लिए जाना जाता है। इसे 2009 में जीआई टैग प्राप्त हुआ था।

    बंगानगर (आंध्र प्रदेश)

    बंगनापल्ली आम के आकार में बड़ा, गाजर के रंग का और बिना रेशों वाला आम है। इसे 2017 में जीआई टैग मिला।

    बनारसी लंगड़ा (वाराणसी)

    बनारसी लंगड़ा आम का रस बाहर भी हरा रहता है, जबकि अंदर का गूदा रसदार और स्वाद में मीठा-खट्टा होता है। इसे 2023 में जीआई टैग से सम्मानित किया गया। भारत दुनिया के सबसे बड़े आम उत्पादकों में शामिल है और इसके कई साझेदार अंतरराष्ट्रीय बाजार में विशेष पहचान रखते हैं। सबसे पहले भारतीय आमों की वैश्विक ब्रांडिंग के साथ-साथ भारत की कृषि शक्ति और सांस्कृतिक विरासत को भी नई पहचान की उम्मीद है।