Category: International

  • मिलान में हिंसा की आशंका से लग्जरी स्टोर बंद, सुरक्षा के लिए 500 अतिरिक्त सैनिक तैनात करने की तैयारी

    मिलान में हिंसा की आशंका से लग्जरी स्टोर बंद, सुरक्षा के लिए 500 अतिरिक्त सैनिक तैनात करने की तैयारी

    नई दिल्ली । इटली के प्रमुख शहर मिलान में सप्ताहांत के दौरान हुए हिंसक प्रदर्शनों के बाद सुरक्षा व्यवस्था कड़ी करने की तैयारी की गई है। उप प्रधानमंत्री मातेओ साल्विनी ने शहर में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए 500 अतिरिक्त सैनिक तैनात करने की घोषणा की है। हिंसा दोबारा भड़कने की आशंका के बीच शहर के प्रमुख लग्जरी शॉपिंग क्षेत्रों में कई दुकानदारों ने अपने प्रतिष्ठान समय से पहले बंद कर दिए। कुछ दुकानों ने शोकेस से महंगे उत्पाद भी हटा लिए हैं।

    मिलान में शनिवार को शुरू हुआ प्रदर्शन शुरुआती दौर में शांतिपूर्ण था, लेकिन बाद में कई इलाकों में स्थिति बिगड़ गई। प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें हुईं। कुछ लोगों ने कूड़ेदानों में आग लगाई और पुलिसकर्मियों पर पथराव किया। इस दौरान दुकानों में लूटपाट और सार्वजनिक तथा निजी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं भी सामने आईं। इसके बाद प्रशासन ने संवेदनशील इलाकों में निगरानी और सुरक्षा बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए।

    साल्विनी ने सोमवार को अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती की जानकारी देते हुए कहा कि मिलान में सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए यह कदम उठाया जाएगा। मंगलवार को होने वाली कैबिनेट बैठक में सुरक्षा उपायों के व्यापक पैकेज के तहत इस प्रस्ताव को शामिल किए जाने की उम्मीद है। सरकार का उद्देश्य शहर में शांति बहाल करना और संभावित हिंसक घटनाओं को रोकना है।

    मिलान इटली का प्रमुख वित्तीय और फैशन केंद्र है। यहां के प्रसिद्ध वाया मोंटेनापोलियोने क्षेत्र में शैनल, टिफनी और दिओर जैसे अंतरराष्ट्रीय लग्जरी ब्रांडों के स्टोर स्थित हैं। सप्ताहांत की घटनाओं के बाद कारोबारियों में सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है। सोमवार को कई दुकानों ने सामान्य समय से पहले शटर गिरा दिए। कुछ प्रतिष्ठानों ने अपनी खिड़कियों को लकड़ी और गत्ते से ढक दिया, जबकि अन्य दुकानदारों ने महंगे सामान को शोकेस से निकालकर सुरक्षित स्थानों पर रख दिया।

    हिंसा के बाद पुलिस ने शहर के प्रमुख हिस्सों में गश्त बढ़ा दी है। रविवार को हुई कार्रवाई के दौरान 271 युवाओं को हिरासत में लिए जाने की जानकारी सामने आई। इनमें से 32 लोगों को गिरफ्तार किया गया। उपलब्ध विवरण के अनुसार, गिरफ्तार लोगों में 23 नाबालिग और 13 विदेशी नागरिक शामिल थे। इसके अतिरिक्त 28 लोगों के खिलाफ न्यायिक कार्रवाई के लिए रिपोर्ट दर्ज की गई। इन आंकड़ों के बीच गिरफ्तार लोगों की श्रेणियों में संभावित ओवरलैप को लेकर अलग-अलग संख्या को जोड़कर कुल संख्या निर्धारित नहीं की जा सकती।

    प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने हिंसा की निंदा की है। उन्होंने सोमवार को मंत्रियों और सुरक्षा अधिकारियों के साथ बैठक कर स्थिति पर चर्चा की। सरकार विशेष रूप से नाबालिगों से जुड़ी हिंसक गतिविधियों और युवा गिरोहों पर नियंत्रण के उपायों पर विचार कर रही है। मीडिया में सामने आई जानकारी के अनुसार, नाबालिगों को एहतियातन हिरासत में रखने की अवधि बढ़ाने के विकल्प पर भी चर्चा हो रही है। हालांकि, इन प्रस्तावों पर अंतिम निर्णय की जानकारी उपलब्ध नहीं है।

    मिलान के अलावा उत्तरी इटली के बोलोन्या, ब्रेसिया, बर्गामो और ट्यूरिन जैसे शहरों में भी प्रदर्शनों के दौरान झड़पें हुईं। शनिवार को हुई घटनाओं के सिलसिले में इन इलाकों में 28 प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी की जानकारी भी सामने आई थी। लगातार सामने आ रही घटनाओं के बाद सरकार सार्वजनिक सुरक्षा बनाए रखने और हिंसा पर अंकुश लगाने के लिए अतिरिक्त कदम उठाने की तैयारी कर रही है।

  • होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के लिए अमेरिका जिम्मेदार, ईरान के विदेश मंत्री अराघची ने कूटनीति पर दिया जोर

    होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के लिए अमेरिका जिम्मेदार, ईरान के विदेश मंत्री अराघची ने कूटनीति पर दिया जोर

    नई दिल्ली । होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव के बीच ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिका को क्षेत्रीय असुरक्षा के लिए जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय विवादों का समाधान सैन्य कार्रवाई के बजाय कूटनीति और राजनीतिक बातचीत के माध्यम से किया जाना चाहिए। तेहरान में सोमवार को रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के साथ संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में अराघची ने पड़ोसी देशों से क्षेत्र की सुरक्षा के लिए साझा व्यवस्था विकसित करने की अपील भी की।

    अराघची के मुताबिक, होर्मुज जलडमरूमध्य और आसपास के क्षेत्र में असुरक्षा की प्रमुख वजह अमेरिका की नीतियां और ईरान के खिलाफ जारी सैन्य तथा आर्थिक दबाव हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिका और इजरायल की सैन्य कार्रवाई ने क्षेत्रीय परिस्थितियों को और तनावपूर्ण बनाया है। ईरान का कहना है कि मौजूदा संकट को केवल सैन्य शक्ति के इस्तेमाल से हल नहीं किया जा सकता। इसके लिए संबंधित देशों के बीच संवाद और राजनीतिक प्रयास आवश्यक हैं।

    ईरानी विदेश मंत्री ने क्षेत्रीय देशों के नेतृत्व में सुरक्षा व्यवस्था बनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि ऐसी पहल का स्वागत किया जाना चाहिए, जिसके तहत विदेशी सेनाओं की मौजूदगी के बिना क्षेत्र के देश अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए मिलकर काम करें। उनके अनुसार, क्षेत्र की स्थिरता के लिए स्थानीय देशों की भागीदारी और आपसी सहयोग महत्वपूर्ण है। यह प्रस्ताव ऐसे समय आया है, जब होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बना हुआ है।

    होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ने वाला रणनीतिक समुद्री मार्ग है। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए इसका विशेष महत्व है। सामान्य परिस्थितियों में दुनिया के कुल तेल और अन्य हाइड्रोकार्बन परिवहन का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। इस कारण यहां जहाजों की आवाजाही में बाधा आने या सुरक्षा संकट बढ़ने से ऊर्जा बाजारों और अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति व्यवस्था पर असर पड़ सकता है।

    ईरान और अमेरिका के बीच जारी टकराव का प्रभाव इस समुद्री मार्ग की सुरक्षा पर भी दिखाई दे रहा है। ईरान इस जलमार्ग पर अपने नियंत्रण का दावा करता रहा है, जबकि अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों के आसपास नौसैनिक नाकेबंदी बनाए रखी है। दोनों देशों के बीच तनाव और समुद्री गतिविधियों को लेकर मतभेदों ने क्षेत्र में सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ाई हैं। ऐसे माहौल में अराघची ने कूटनीतिक समाधान और क्षेत्रीय सहयोग को प्राथमिकता देने की बात कही है।

    रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने भी ईरान के साथ बातचीत के दौरान क्षेत्रीय संकट का समाधान खोजने के लिए राजनीतिक प्रयासों का समर्थन किया। तेहरान की यात्रा के दौरान उन्होंने अराघची और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान से मुलाकात की। रूस ने ईरान के साथ अपने राजनीतिक और आर्थिक संबंध जारी रखने की प्रतिबद्धता जताई है। लावरोव ने कहा कि मॉस्को दोनों देशों के बीच सहयोग और विभिन्न परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए तैयार है।

    रूस और ईरान का कहना है कि क्षेत्रीय विवादों को बातचीत के जरिए सुलझाने के प्रयास जारी रहने चाहिए। दोनों देशों के बीच चर्चा में ऊर्जा, परिवहन और आर्थिक सहयोग से जुड़े विषय भी शामिल रहे। रूस ने क्षेत्रीय संकट को कम करने और राजनीतिक समाधान की संभावनाओं पर काम करने की इच्छा जताई है। हालांकि, अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में गतिरोध बने रहने के कारण तनाव कम करने की राह चुनौतीपूर्ण बनी हुई है।

    अराघची के बयान से स्पष्ट है कि ईरान क्षेत्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर विदेशी सैन्य मौजूदगी के बजाय पड़ोसी देशों की भागीदारी वाली व्यवस्था का समर्थन कर रहा है। वहीं, रूस भी कूटनीति और बातचीत के जरिए तनाव कम करने की बात कर रहा है। आने वाले समय में होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि संबंधित देश आपसी मतभेदों को बातचीत के माध्यम से सुलझाने के लिए किस तरह आगे बढ़ते हैं।

  • यमन में हूतियों का सैन्य शिविर पर मिसाइल हमला, 53 सैनिकों की मौत और 200 से अधिक घायल

    यमन में हूतियों का सैन्य शिविर पर मिसाइल हमला, 53 सैनिकों की मौत और 200 से अधिक घायल


    नई दिल्ली ।
    यमन में हूती विद्रोहियों और सरकार समर्थक बलों के बीच संघर्ष एक बार फिर तेज हो गया है। सोमवार को दक्षिणी यमन के शबवा प्रांत स्थित अल-अलम सैन्य शिविर पर बैलिस्टिक मिसाइलों से हमला किया गया। इस हमले में कम से कम 53 सैनिकों की मौत हो गई, जबकि 200 से अधिक जवान घायल बताए गए हैं। मृतकों में ज्यादातर नए भर्ती हुए सैनिक शामिल हैं। यह हमला ऐसे समय हुआ है, जब देश में लंबे समय से जारी गृहयुद्ध और क्षेत्रीय तनाव के कारण सुरक्षा स्थिति पहले से ही चुनौतीपूर्ण बनी हुई है।

    यमन की सेना के प्रवक्ता कर्नल माजेद अल-नजिली के अनुसार, ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने पुलिस और सुरक्षा बलों के प्रशिक्षण केंद्र को निशाना बनाते हुए तीन बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। हालांकि, उन्होंने हताहतों की संख्या की पुष्टि नहीं की। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यमन सरकार के दो सैन्य अधिकारियों ने हमले में कम से कम 53 सैनिकों की मौत और 200 से अधिक जवानों के घायल होने की जानकारी दी। हूती विद्रोहियों के नियंत्रण वाली समाचार एजेंसी ने भी हमले में कई लोगों के मारे जाने और घायल होने की बात कही, लेकिन मृतकों और घायलों की संख्या नहीं बताई।

    अल-अलम सैन्य शिविर शबवा प्रांत की राजधानी अटक के उत्तर में जर्दान जिले में स्थित है। पहले इस शिविर का इस्तेमाल संयुक्त अरब अमीरात के समर्थन वाले एक सशस्त्र समूह द्वारा किया जाता था। यह इलाका सरकार के नियंत्रण वाले मारीब प्रांत तक पहुंचने वाले मार्ग पर स्थित है। इस कारण सैन्य और जरूरी आपूर्ति को सरकारी बलों तक पहुंचाने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। एक सैन्य अधिकारी के मुताबिक, हमले में निशाना बनाए गए जवान रैपिड इंटरवेंशन नाम से गठित नई सुरक्षा इकाई का हिस्सा थे। इस इकाई को क्षेत्र की सुरक्षा और रक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

    यमन में संघर्ष बढ़ने के पीछे कई क्षेत्रीय और आंतरिक कारण बताए जा रहे हैं। हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब समर्थित सरकारी बलों के बीच पिछले कई महीनों से टकराव तेज हुआ है। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव का असर भी क्षेत्र की परिस्थितियों पर पड़ा है। वर्ष 2022 में हुआ संघर्षविराम यमन के गृहयुद्ध में लड़ाई को काफी हद तक रोकने में सफल रहा था, लेकिन हालिया घटनाओं के बीच उस व्यवस्था की प्रभावशीलता कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है।

    इस बीच उत्तरी यमन के हूती नियंत्रित सादा प्रांत में रविवार को हवाई हमला हुआ। हूती प्रशासन के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, इस हमले में कम से कम नौ लोगों की मौत हुई, जिनमें पांच बच्चे और दो महिलाएं शामिल थीं। हूतियों ने हमले के लिए सऊदी अरब के नेतृत्व वाले बलों को जिम्मेदार ठहराया है। सप्ताहांत के दौरान हुए कई हमलों में 30 से अधिक लोगों के मारे जाने या घायल होने का दावा भी किया गया। हालांकि, सऊदी अरब की ओर से इन आरोपों पर तत्काल कोई टिप्पणी नहीं आई।

    सऊदी अरब और लाल सागर के आसपास भी तनाव बढ़ने की खबरें हैं। हूती विद्रोहियों ने हाल के हफ्तों में सऊदी अरब पर हमले दोबारा शुरू किए हैं। उनका आरोप है कि सऊदी अरब यमन की सरकार का समर्थन कर रहा है। इन हमलों में सऊदी हवाई अड्डों, तेल ठिकानों और सैन्य सुविधाओं को निशाना बनाए जाने की जानकारी दी गई है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, इन घटनाओं से हजारों उड़ानें प्रभावित हुई हैं और 19 लोगों की मौत हुई है। सऊदी तेल कंपनी अरामको के मुख्यालय पर भी हमला किए जाने की बात सामने आई है।

    लाल सागर के तट और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के आसपास हूतियों की गतिविधियां भी क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं। यह समुद्री मार्ग अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए अहम है और वैश्विक माल परिवहन में इसकी बड़ी भूमिका है। इस रणनीतिक क्षेत्र पर नियंत्रण को लेकर तनाव के बीच सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने इसी महीने सैन्य अभियान शुरू किया है। इसका उद्देश्य क्षेत्र से हूती विद्रोहियों को पीछे हटाना और वहां दोबारा नियंत्रण स्थापित करना बताया गया है। हालिया मिसाइल हमले ने यमन में संघर्ष के और गंभीर होने की आशंकाओं को बढ़ा दिया है।

  • सऊदी में बांग्लादेशी जोड़े की फांसी से मचा अंतरराष्ट्रीय विवाद, ढाका ने मांगा जवाब; सोशल मीडिया पर वायरल दावों की खुली सच्चाई

    सऊदी में बांग्लादेशी जोड़े की फांसी से मचा अंतरराष्ट्रीय विवाद, ढाका ने मांगा जवाब; सोशल मीडिया पर वायरल दावों की खुली सच्चाई


    नई दिल्ली। सऊदी अरब में बांग्लादेश के दो नागरिकों को मौत की सजा दिए जाने के मामले ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ दी है। मक्का क्षेत्र की एक मस्जिद में गंभीर अनैतिक कृत्य करने के आरोप में दोनों को मृत्युदंड दिया गया। इस कार्रवाई के बाद बांग्लादेश ने सऊदी अरब के सामने विरोध दर्ज कराया है और अपने नागरिकों को सजा दिए जाने के मामले में आधिकारिक स्पष्टीकरण मांगा है। दूसरी ओर सोशल मीडिया पर इस घटना को लेकर कई तरह के दावे किए जा रहे हैं। इनमें सबसे ज्यादा चर्चा उस दावे की है जिसमें कहा गया कि एक नवविवाहित जोड़े को मस्जिद में केवल माथा चूमने के कारण मौत की सजा दे दी गई। हालांकि सऊदी अधिकारियों ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा है कि मामला इससे कहीं अधिक गंभीर था।

    सऊदी प्रेस एजेंसी के अनुसार बांग्लादेशी नागरिक नजरुल इस्लाम अब्दुल बासिर और सीती अख्तर को 14 अक्टूबर को मौत की सजा दी गई। सऊदी गृह मंत्रालय के बयान में कहा गया कि दोनों मस्जिद के भीतर बेहद अनुचित और अश्लील गतिविधियों में शामिल पाए गए थे। अदालत ने इस कृत्य को मस्जिद की पवित्रता और मर्यादा के खिलाफ गंभीर अपराध माना। सऊदी अधिकारियों का कहना है कि इस मामले में गंभीर आरोपों के समर्थन में पर्याप्त सबूत मौजूद थे और कानूनी प्रक्रिया के बाद सजा दी गई। हालांकि इस मामले से जुड़े सभी न्यायिक दस्तावेज और विस्तृत साक्ष्य सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं होने के कारण स्वतंत्र रूप से पूरे घटनाक्रम की पुष्टि करना मुश्किल है।

    इस घटना के सामने आने के बाद बांग्लादेश सरकार ने भी प्रतिक्रिया दी है। बांग्लादेश की विदेश राज्य मंत्री शमा ओबैद इस्लाम ने सऊदी राजदूत से आधिकारिक तौर पर स्पष्टीकरण मांगा। ढाका ने इस बात पर आपत्ति जताई कि उसके नागरिकों को सजा दिए जाने से पहले बांग्लादेश को कोई पूर्व सूचना नहीं दी गई। इस घटनाक्रम ने दोनों देशों के बीच राजनयिक संवाद को भी महत्वपूर्ण बना दिया है। अब यह सवाल उठ रहा है कि सजा की जानकारी और उससे संबंधित कानूनी प्रक्रिया के बारे में बांग्लादेश को पहले से अवगत क्यों नहीं कराया गया।

    इस बीच सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो और उससे जुड़ी कहानी ने विवाद को और बढ़ा दिया। कुछ पोस्ट में दावा किया गया कि उमराह के लिए सऊदी अरब पहुंचे एक नवविवाहित जोड़े को एक पाकिस्तानी नागरिक ने मस्जिद में स्नेह जताते हुए रिकॉर्ड किया था और इसी वजह से दोनों को मौत की सजा दे दी गई। लेकिन सऊदी प्रेस एजेंसी ने इस कहानी को भ्रामक और असत्य बताया है। आधिकारिक बयान के मुताबिक दोनों नागरिक सऊदी अरब में रह रहे थे और यह मामला हनीमून पर आए उमराह यात्रियों से संबंधित नहीं था। इसलिए माथा चूमने के कारण मृत्युदंड दिए जाने की बात को प्रमाणित तथ्य के रूप में पेश करना उचित नहीं है।

    इस मामले ने मानवाधिकार और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े सवालों को भी चर्चा में ला दिया है। मानवाधिकार संगठनों की ओर से सऊदी अरब में मृत्युदंड के इस्तेमाल की आलोचना होती रही है। सोशल मीडिया पर कुछ लोग यह सवाल भी उठा रहे हैं कि दूसरे अंतरराष्ट्रीय विवादों पर जोरदार प्रदर्शन करने वाले समूह इस मामले में उतनी मुखर प्रतिक्रिया क्यों नहीं दे रहे। हालांकि किसी देश में विरोध प्रदर्शन होना या न होना अपने आप में आरोपों की सच्चाई या न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता का प्रमाण नहीं है।

    फिलहाल इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम सवाल यही है कि दोनों नागरिकों के खिलाफ लगाए गए आरोपों और सुनाई गई सजा से जुड़ी पूरी जानकारी कितनी पारदर्शिता के साथ सामने आती है। बांग्लादेश की आपत्ति और सऊदी अधिकारियों के बयान के बीच यह मामला अब कानूनी प्रक्रिया मानवाधिकार और राजनयिक संबंधों के नजरिए से देखा जा रहा है।

  • गल्फ ऑफ अमेरिका के बाद अब न्यू मैक्सिको का नाम बदलने की तैयारी, ट्रंप बोले- ‘न्यू अमेरिका’ कर देना चाहिए

    गल्फ ऑफ अमेरिका के बाद अब न्यू मैक्सिको का नाम बदलने की तैयारी, ट्रंप बोले- ‘न्यू अमेरिका’ कर देना चाहिए


    नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर जगहों के नाम बदलने को लेकर चर्चा में हैं। इस बार उन्होंने अमेरिकी राज्य न्यू मैक्सिको का नाम बदलकर ‘न्यू अमेरिका’ करने की मांग की है। ट्रंप ने सोमवार को अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करते हुए कहा कि राज्य का नाम तुरंत बदल देना चाहिए। उन्होंने लिखा कि अमेरिका, मैक्सिको नहीं, बल्कि संयुक्त राज्य अमेरिका है।

    ट्रंप का तर्क है कि नाम बदलने से न्यू मैक्सिको की पहचान और प्रतिष्ठा बढ़ेगी। उन्होंने यह दावा भी किया कि इससे राज्य के लोगों के घरों की कीमत और उनकी आमदनी में इजाफा हो सकता है। अपने पोस्ट में उन्होंने न्यू मैक्सिको के चुनावों पर भी तंज कसा और कहा कि नाम बदलने से शायद वहां के चुनाव भी ईमानदार हो जाएं। हालांकि, नाम बदलने से संपत्ति की कीमतों या आय में बढ़ोतरी होने के उनके दावे के समर्थन में कोई प्रमाण नहीं दिया गया है।

    सितंबर में भी उठाई थी मांग
    ट्रंप इससे पहले सितंबर में भी न्यू मैक्सिको का नाम ‘न्यू अमेरिका’ करने की बात कह चुके हैं। उस समय उन्होंने सोशल मीडिया पर एक ऐसा नक्शा साझा किया था, जिसमें राज्य का नाम बदला हुआ दिखाया गया था। उन्होंने एक वीडियो में भी ‘न्यू अमेरिका’ नाम का इस्तेमाल किया था।

    हालांकि, ट्रंप के इस प्रस्ताव को राज्य की गवर्नर मिशेल लुजान ग्रिशम का समर्थन नहीं मिला। उन्होंने इसका विरोध करते हुए कहा था कि न्यू मैक्सिको का नाम उसके इतिहास से जुड़ा है और इस मुद्दे पर बहस नहीं होनी चाहिए।

    क्या राष्ट्रपति अकेले बदल सकते हैं राज्य का नाम?
    ट्रंप की मांग के बावजूद न्यू मैक्सिको का आधिकारिक नाम बदलना उनके अकेले के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। इसके लिए राज्य की संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करना होगा। इसमें राज्य की विधायिका की मंजूरी और मतदाताओं की सहमति की आवश्यकता हो सकती है।

    अमेरिकी राष्ट्रपति संघीय सरकारी विभागों को किसी राज्य के लिए नया नाम इस्तेमाल करने का निर्देश दे सकते हैं, लेकिन ऐसा करने भर से राज्य का आधिकारिक नाम नहीं बदल जाता। इसलिए ‘न्यू अमेरिका’ नाम फिलहाल ट्रंप का प्रस्ताव है, आधिकारिक बदलाव नहीं।

    गल्फ ऑफ अमेरिका से माउंट मैकिनले तक नाम बदलने की पहल
    ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल में कई भौगोलिक नामों को बदलने की पहल कर चुके हैं। जनवरी 2025 में उन्होंने गल्फ ऑफ मेक्सिको का नाम अमेरिकी सरकारी इस्तेमाल के लिए ‘गल्फ ऑफ अमेरिका’ करने का आदेश दिया था। इसी दौरान अलास्का की प्रमुख चोटी डेनाली का नाम बदलकर फिर से ‘माउंट मैकिनले’ कर दिया गया।

    अगस्त 2026 में लेक ओंटारियो का नाम अमेरिकी सरकारी इस्तेमाल के लिए ‘लेक अमेरिका’ करने का आदेश दिए जाने की बात भी सामने आई। इसके अलावा ट्रंप अटलांटिक या प्रशांत महासागर का नाम बदलने का विचार भी जता चुके हैं। उन्होंने प्रशांत महासागर के लिए ‘ट्रंप ओशन’ या ‘ओशन ऑफ द अमेरिकाज’ जैसे नाम सुझाए थे।

    न्यू मैक्सिको का नाम बदलने की नई मांग भी इसी सिलसिले की अगली कड़ी है। हालांकि, इस प्रस्ताव का भविष्य राज्य की संवैधानिक प्रक्रिया और वहां के राजनीतिक समर्थन पर निर्भर करेगा।

  • ‘पेरिस जल्द मुस्लिम शहर बन जाएगा’, ट्रंप का मैक्रों पर तंज, फ्रांस की इमिग्रेशन नीति को ठहराया हिंसा के लिए जिम्मेदार

    ‘पेरिस जल्द मुस्लिम शहर बन जाएगा’, ट्रंप का मैक्रों पर तंज, फ्रांस की इमिग्रेशन नीति को ठहराया हिंसा के लिए जिम्मेदार


    नई दिल्ली। फ्रांस में प्रदर्शन, आगजनी और लूटपाट की घटनाओं के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की इमिग्रेशन यानी आव्रजन नीति पर सवाल उठाए हैं। व्हाइट हाउस के बाहर पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने दावा किया कि पेरिस जल्द मुस्लिम शहर बन जाएगा। उन्होंने कहा कि मैक्रों उनके दोस्त हैं, लेकिन उन्होंने कई साल पहले ही फ्रांसीसी राष्ट्रपति को चेतावनी दी थी कि दूसरे देशों से बड़ी संख्या में लोगों को फ्रांस में आने देना गलत फैसला होगा।

    ट्रंप ने फ्रांस में बिगड़े हालात के लिए मैक्रों की आव्रजन नीति को जिम्मेदार ठहराया और यूरोप की इमिग्रेशन नीतियों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि मैक्रों ने उनकी सलाह पर ध्यान नहीं दिया। हालांकि, फ्रांस में हाल में शुरू हुए प्रदर्शनों की प्रमुख वजह महंगाई, बढ़ते खर्च और सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति को लेकर लोगों की नाराजगी बताई गई है। इन प्रदर्शनों के दौरान कई जगह हिंसा और लूटपाट की घटनाएं भी हुईं।

    ‘मैक्रों को पहले ही चेताया था’

    ट्रंप के मुताबिक, उन्होंने मैक्रों से काफी पहले कहा था कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से बड़ी संख्या में लोगों को फ्रांस में प्रवेश देने की नीति सही नहीं है। उनका दावा है कि इस नीति के कारण पेरिस का स्वरूप बदल रहा है। ट्रंप ने इसी संदर्भ में फ्रांस को अपनी सीमाओं पर सख्ती बरतने की जरूरत बताई।

    उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब फ्रांस के कई शहरों में सप्ताहांत के दौरान हुए प्रदर्शनों के बाद आगजनी, तोड़फोड़ और लूटपाट की घटनाएं सामने आईं। राजधानी पेरिस के अलावा लिली, नीस और अन्य शहरों में भी सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई है। कुछ इलाकों में सार्वजनिक सभाओं पर रोक लगाई गई और रात के समय पाबंदियां लागू की गईं।

    पेरिस के कुछ इलाकों में कर्फ्यू, इमरजेंसी पर भी चर्चा

    फ्रांस के प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकोर्नू ने कहा कि फिलहाल पूरे पेरिस में कर्फ्यू लगाने के बजाय संवेदनशील इलाकों में पाबंदियां लगाना अधिक उचित है। उन्होंने जरूरत पड़ने पर आपातकाल घोषित करने की संभावना से भी इनकार नहीं किया।

    पेरिस पुलिस ने कुछ क्षेत्रों में प्रदर्शनों पर रोक लगाई। प्लास दे ला रिपब्लिक और ले आल इलाके में रात 11 बजे से सुबह 6 बजे तक कर्फ्यू लगाया गया। प्रशासन का जोर हिंसा को रोकने और सार्वजनिक संपत्तियों तथा कारोबार को नुकसान से बचाने पर है।

    फ्रांस के गृह मंत्रालय के मुताबिक, हिंसा के बाद करीब 2,400 लोगों को गिरफ्तार किया गया और लगभग 1,000 पुलिसकर्मी घायल हुए। वहीं, व्यापार और खुदरा कारोबार से जुड़े संगठनों के अनुसार, हिंसा से करीब 3,000 दुकानें प्रभावित हुईं।

    मैक्रों ने हिंसा की निंदा की, आर्थिक चिंताओं को माना जायज

    फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने रविवार को टेलीविजन पर देश को संबोधित करते हुए हिंसा और तोड़फोड़ की निंदा की थी। उन्होंने कहा कि किसी भी वजह से ऐसी घटनाओं को सही नहीं ठहराया जा सकता। मैक्रों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों की मांगों को हिंसा में शामिल लोगों की गतिविधियों से अलग रखने पर जोर दिया।

    उन्होंने यह भी माना कि महंगाई, आर्थिक परेशानियों और सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति को लेकर लोगों की चिंताओं को समझना जरूरी है। सरकार के सामने एक ओर प्रदर्शनकारियों की समस्याओं का समाधान तलाशने और दूसरी ओर हिंसा पर नियंत्रण करने की चुनौती है।

    स्कूलों की समस्याओं से शुरू हुआ आंदोलन, बाद में बढ़ा दायरा

    फ्रांस में प्रदर्शनों की शुरुआत स्कूलों में शिक्षकों की कमी और खराब व्यवस्थाओं को लेकर छात्रों के आंदोलन से हुई थी। बाद में महंगाई, बढ़ते खर्च और सरकारी सेवाओं से जुड़ी समस्याओं को लेकर व्यापक असंतोष भी इसमें शामिल हो गया।

    फिलहाल फ्रांस सरकार सुरक्षा व्यवस्था बहाल करने, हिंसा से प्रभावित कारोबारियों की मदद करने और सार्वजनिक सेवाओं को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब देने की कोशिश कर रही है। इसी बीच ट्रंप ने इन घटनाओं को मैक्रों की आव्रजन नीति से जोड़ते हुए अपनी पुरानी चेतावनी का हवाला दिया है। हालांकि, प्रदर्शन शुरू होने के पीछे बताए गए आर्थिक और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़े मुद्दे आव्रजन नीति से अलग हैं।

  • मंगल के चंद्रमा फोबोस से मिट्टी लाएगा जापान का मिशन, 20 अक्टूबर को एच3 रॉकेट से होगी ऐतिहासिक अंतरिक्ष यात्रा की शुरुआत

    मंगल के चंद्रमा फोबोस से मिट्टी लाएगा जापान का मिशन, 20 अक्टूबर को एच3 रॉकेट से होगी ऐतिहासिक अंतरिक्ष यात्रा की शुरुआत

    नई दिल्ली । जापान मंगल ग्रह और उसके चंद्रमाओं से जुड़े रहस्यों को समझने के लिए एक महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष मिशन लॉन्च करने की तैयारी कर रहा है। मार्शियन मून्स एक्सप्लोरेशन (एमएमएक्स) नाम के इस मिशन का मुख्य उद्देश्य मंगल के चंद्रमा फोबोस की सतह से मिट्टी के नमूने एकत्र करना और उन्हें पृथ्वी पर वापस लाना है। इसके लिए जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी का एच3 रॉकेट 20 अक्टूबर को तानेगाशिमा स्पेस सेंटर से उड़ान भरने वाला है। इस मिशन को मंगल के आसपास के क्षेत्र से नमूने लाने के प्रयासों में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। योजना के अनुसार, अंतरिक्ष यान मंगल तक पहुंचने के बाद फोबोस की परिक्रमा करेगा और वहां से नमूने एकत्र करके पृथ्वी की ओर लौटेगा।

    मिशन की योजना के मुताबिक, अंतरिक्ष यान को मंगल तक पहुंचने में लगभग एक वर्ष लगेगा। इसके बाद यह करीब तीन साल तक फोबोस की परिक्रमा करेगा और उसकी सतह का अध्ययन करेगा। अभियान के दौरान कम से कम 10 ग्राम मिट्टी एकत्र करने का लक्ष्य रखा गया है। नमूनों को लेकर अंतरिक्ष यान के 2031 में पृथ्वी पर लौटने की योजना है। यदि यह अभियान निर्धारित योजना के अनुसार सफल होता है, तो वैज्ञानिकों को मंगल के चंद्रमाओं की संरचना और उनकी उत्पत्ति के बारे में प्रत्यक्ष जानकारी प्राप्त हो सकेगी।

    इस अभियान में आईडेफिक्स नाम का एक रोवर भी शामिल है। इसका नाम प्रसिद्ध फ्रांसीसी कॉमिक पात्र एस्टेरिक्स के कुत्ते के नाम पर रखा गया है। रोवर का काम फोबोस की सतह का निरीक्षण करना और लैंडिंग के लिए उपयुक्त स्थान का आकलन करने में मदद करना है। फोबोस पर गुरुत्वाकर्षण बेहद कमजोर है, इसलिए वहां सुरक्षित उतरना और सतह से नमूने एकत्र करना तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण है। इसी वजह से अंतरिक्ष यान के उतरने वाले पैरों और सतह पर स्थिर रहने की व्यवस्था विकसित करना इस मिशन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।

    एमएमएक्स का उद्देश्य केवल मिट्टी के नमूने पृथ्वी पर लाना नहीं है। इस अभियान से वैज्ञानिक यह भी समझना चाहते हैं कि मंगल और उसके दोनों चंद्रमा फोबोस तथा डीमोस कैसे बने। अंतरिक्ष यान पृथ्वी की ओर लौटने से पहले डीमोस का भी निरीक्षण करेगा, लेकिन वहां उतरने की योजना नहीं है। दोनों चंद्रमाओं की बनावट, संरचना और विशेषताओं का अध्ययन मंगल के आसपास के क्षेत्र के इतिहास को समझने में मदद कर सकता है।

    मंगल के चंद्रमाओं की उत्पत्ति को लेकर वैज्ञानिकों के बीच प्रमुख रूप से दो परिकल्पनाएं चर्चा में हैं। पहली विशाल टकराव परिकल्पना के अनुसार, किसी बड़े खगोलीय पिंड के मंगल से टकराने के बाद निकले पदार्थ से उसके चंद्रमाओं का निर्माण हुआ हो सकता है। दूसरी परिकल्पना के मुताबिक, फोबोस और डीमोस मूल रूप से क्षुद्रग्रह थे, जिन्हें मंगल के गुरुत्वाकर्षण ने अपनी कक्षा में खींच लिया। फोबोस से प्राप्त मिट्टी के नमूनों का विश्लेषण इन दोनों संभावनाओं को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

    इस शोध का महत्व सौरमंडल के दूसरे हिस्सों तक भी फैला हुआ है। बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल जैसे चट्टानी ग्रहों के निर्माण और विकास को समझने से वैज्ञानिक यह जानने की कोशिश कर सकते हैं कि ग्रहों पर जीवन के अनुकूल वातावरण किन परिस्थितियों में विकसित हुआ। फोबोस की मिट्टी में मौजूद पदार्थों और खनिजों का अध्ययन इस दिशा में उपयोगी जानकारी दे सकता है।

    यह मिशन अंतरराष्ट्रीय सहयोग का भी उदाहरण है। इसमें फ्रांस के राष्ट्रीय अंतरिक्ष अध्ययन केंद्र, जर्मन एयरोस्पेस सेंटर, अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी और लगभग 20 विश्वविद्यालयों तथा तकनीकी कंपनियों का सहयोग शामिल है। इस अभियान से भविष्य में मंगल की खोज और वहां मानव अभियानों की तैयारी के लिए जरूरी तकनीकों को समझने में भी मदद मिल सकती है।

    जापान इससे पहले चंद्रमा पर उतरने के लिए स्मार्ट लैंडर फॉर इन्वेस्टिगेटिंग मून यानी स्लिम मिशन भेज चुका है। इसे मून स्नाइपर भी कहा जाता है। वर्ष 2024 में चंद्रमा की सतह पर उतरने के बाद यह पलट गया था, लेकिन इसके बावजूद इसने डेटा भेजना जारी रखा और चंद्रमा की कई लंबी रातों के दौरान भी सक्रिय रहा। अब एमएमएक्स मिशन के जरिए जापान मंगल के चंद्रमाओं से नमूने लाने और ग्रहों की उत्पत्ति से जुड़े सवालों के उत्तर खोजने की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है।

  • फ्रांस अकेले बनाएगा राफेल से भी उन्नत छठी पीढ़ी का लड़ाकू विमान, जर्मनी से अलग होने के बाद भारत से सहयोग की उम्मीद

    फ्रांस अकेले बनाएगा राफेल से भी उन्नत छठी पीढ़ी का लड़ाकू विमान, जर्मनी से अलग होने के बाद भारत से सहयोग की उम्मीद

    नई दिल्ली । फ्रांस अब छठी पीढ़ी का अत्याधुनिक लड़ाकू विमान बनाने की तैयारी अपने दम पर आगे बढ़ा रहा है। जर्मनी और स्पेन के साथ मिलकर विकसित किए जा रहे भविष्य के लड़ाकू विमान कार्यक्रम में मतभेदों के बाद फ्रांस ने अपनी रणनीति बदल दी है। इस नई योजना के तहत वह ऐसा विमान विकसित करना चाहता है, जो तकनीक और युद्धक क्षमताओं के मामले में मौजूदा राफेल लड़ाकू विमान से अधिक उन्नत हो। फ्रांस की सशस्त्र बल मंत्री कैथरीन वौत्रिन ने संसदीय सुनवाई के दौरान पुष्टि की कि जुलाई 2026 में परियोजना को राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया था। अब फ्रांस तकनीकी विकास और उत्पादन पर अपना नियंत्रण बनाए रखते हुए इस महत्वाकांक्षी योजना को पूरा करना चाहता है।

    इस नई परियोजना का नाम अवियन डी कॉम्बैट डू फ्यूचर (ACF) रखा गया है, जिसका अर्थ भविष्य का लड़ाकू विमान है। इससे पहले यह कार्यक्रम फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम (FCAS) के नाम से जाना जाता था। जर्मनी और स्पेन के साथ संयुक्त रूप से आगे बढ़ने की योजना में मतभेद सामने आने के बाद फ्रांस ने अलग रास्ता चुना। फ्रांसीसी वायुसेना प्रमुख जनरल जेरोम बेलेंजर के मुताबिक, अब इस कार्यक्रम को राष्ट्रीय स्तर पर विकसित करने की दिशा में काम किया जा रहा है। इसका उद्देश्य विमान के विकास से जुड़े अहम फैसलों और तकनीकी क्षमताओं पर फ्रांस का नियंत्रण बनाए रखना है।

    योजना के अनुसार, फ्रांस 2027 में नए विमान के प्रदर्शनकारी मॉडल यानी एयरक्राफ्ट डेमोंस्ट्रेटर पर काम शुरू करने की तैयारी कर रहा है। इस परियोजना में पहले से विकसित तकनीकों और राफेल के प्रस्तावित F5 संस्करण से मिलने वाली क्षमताओं का उपयोग किए जाने की योजना है। हालांकि, नए विमान के विकास के लिए विस्तृत तकनीकी कार्य और अन्य तैयारियां भी जरूरी होंगी। परियोजना का लक्ष्य 2040 के शुरुआती वर्षों तक इस छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान को तैयार करना है। यदि तय समयसीमा के अनुसार काम आगे बढ़ता है, तो यह फ्रांस की वायुसेना के लिए भविष्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

    नए विमान की योजना केवल एक लड़ाकू जेट तैयार करने तक सीमित नहीं है। इसमें ड्रोन, निर्देशित हथियारों और कॉम्बैट क्लाउड जैसी तकनीकों पर भी काम जारी रखने की बात कही गई है। कॉम्बैट क्लाउड का उद्देश्य युद्ध के दौरान विमान, ड्रोन और अन्य सैन्य प्रणालियों के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान और समन्वय को बेहतर बनाना है। इस तरह की तकनीकें भविष्य के हवाई अभियानों में महत्वपूर्ण हो सकती हैं। हालांकि, इन सभी क्षमताओं के अंतिम स्वरूप और नए विमान में उनके इस्तेमाल से संबंधित विस्तृत जानकारी अभी स्पष्ट नहीं है।

    फ्रांस के सामने इस परियोजना की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक इसका भारी वित्तीय खर्च है। देश के पास लड़ाकू विमान बनाने से जुड़ी महत्वपूर्ण तकनीकी क्षमताएं हैं, लेकिन छठी पीढ़ी के विमान को अकेले विकसित करने के लिए बड़े निवेश की आवश्यकता होगी। फ्रांस आर्थिक चुनौतियों का भी सामना कर रहा है। ऐसे में परियोजना को तय समय पर पूरा करने और विकास का खर्च उठाने के लिए उसे अतिरिक्त वित्तीय सहयोग की जरूरत पड़ सकती है।

    इसी वजह से फ्रांस अब केवल तकनीकी साझेदारों के बजाय वित्तीय निवेशकों की तलाश कर रहा है। इस संदर्भ में भारत का नाम महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत पहले ही फ्रांस के साथ इस परियोजना में जुड़ने की इच्छा जता चुका है। दोनों देशों के बीच रक्षा क्षेत्र में सहयोग की संभावनाओं को देखते हुए भारत की भागीदारी पर चर्चा की गुंजाइश बनी हुई है। हालांकि, भारत की भूमिका किस रूप में होगी, कितना निवेश किया जाएगा और दोनों देशों के बीच किस तरह की व्यवस्था बनेगी, इसे लेकर अभी कोई अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है।

    स्वीडन के साथ भी संभावित सहयोग को लेकर चर्चा होने की जानकारी दी गई है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि फ्रांस अपनी नई रणनीति के तहत किन देशों को वित्तीय या अन्य सहयोग के लिए अपने साथ जोड़ता है। फिलहाल उसका प्रमुख लक्ष्य छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान को 2040 के शुरुआती वर्षों तक तैयार करना है। जर्मनी और स्पेन के साथ संयुक्त परियोजना से अलग होने के बाद फ्रांस की यह नई योजना उसकी रक्षा नीति और भविष्य की सैन्य विमानन क्षमताओं के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

  • PAK: ऐतिहासिक राम लीला मंदिर को तोड़कर कमर्शियल प्लाजा बनाने की साजिश! विरोध के बाद प्रशासन ने जड़ा ताला

    PAK: ऐतिहासिक राम लीला मंदिर को तोड़कर कमर्शियल प्लाजा बनाने की साजिश! विरोध के बाद प्रशासन ने जड़ा ताला


    इस्लामाबाद।
    पाकिस्तान (Pakistan) के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत (Pakistan) स्थित डेरा इस्माइल खान (Dera Ismail Khan) के रहीम बाजार में स्थित ऐतिहासिक ‘राम लीला मंदिर’ (Historic ‘Ram Leela Mandir’) को स्थानीय प्रशासन ने शनिवार को ताला लगाकर पूरी तरह सील कर दिया है। मंदिर की ऐतिहासिक इमारत को ध्वस्त कर वहां कमर्शियल प्लाजा बनाने की कथित साजिश के सामने आने के बाद नागरिक समाज और अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय के कड़े विरोध के बाद प्रशासन को यह कदम उठाना पड़ा है।

    ACP हामिद सिद्दीकी के नेतृत्व में हुई इस कार्रवाई के बाद मंदिर परिसर में जारी हर तरह के निर्माण और तोड़फोड़ गतिविधियों पर रोक लगा दी गई है।


    तोड़फोड़ और कमर्शियल प्लाजा के खिलाफ नागरिक समाज का विरोध

    मंदिर को ध्वस्त कर व्यापारिक परिसर में बदलने की कोशिशों की खबर मिलने के बाद स्थानीय नागरिक समाज के प्रतिनिधियों और हिंदू समुदाय के नेताओं की एक आपातकालीन संयुक्त बैठक सुहैल अहमद आजमी (स्थानीय नागरिक समाज संगठन के अध्यक्ष) के कार्यालय में की गई। इस बैठक में पूर्व प्रांतीय असेंबली सदस्य (MPA) और हिंदू समुदाय के प्रतिनिधि किशोर कुमार, सामाजिक कार्यकर्ता मोहम्मद नौमान सहित नागरिक समाज के कई नेता शामिल हुए।

    बैठक में शामिल नेताओं ने मंदिर की जमीन को अवैध तरीके से कमर्शियल प्लाजा के लिए आवंटित किए जाने पर कड़ी आपत्ति जताई और पाकिस्तानी सांसदों से इस मामले को पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में उठाने की अपील की।


    400 सांस्कृतिक विरासत इमारतों में शामिल है राम लीला मंदिर

    बैठक में वक्ताओं ने राम लीला मंदिर के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व पर जोर देते हुए बताया कि यह ऐतिहासिक मंदिर डेरा इस्माइल खान की उन लगभग 400 ऐतिहासिक इमारतों में शामिल है, जिन्हें ‘इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड’ की ओर से सांस्कृतिक विरासत संपत्ति के रूप में शामिल किया गया है।

    नागरिक समाज ने चेतावनी दी कि ऐतिहासिक धरोहरों को ध्वस्त कर व्यापारिक परिसरों में तब्दील करने से शहर की सदियों पुरानी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान पूरी तरह मिट जाएगी। नागरिक समाज, व्यापारिक समुदाय, साहित्यिक हलकों और विरासत संगठनों के प्रतिनिधियों ने एकजुट होकर ऐतिहासिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने की किसी भी कोशिश का पुरजोर विरोध करने का संकल्प लिया।


    अधिकारियों की शक्तियों और कानूनी वैधता पर सवाल

    नागरिक समाज और हिंदू नेताओं ने सवाल उठाया कि संबंधित अधिकारियों ने कानूनी प्रक्रिया को दरकिनार कर मंदिर की जमीन पर कमर्शियल प्लाजा निर्माण की अनुमति कैसे दे दी। प्रतिभागियों ने मांग की है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ जिला प्रशासन, नेशनल असेंबली के अध्यक्ष, पुरातत्व विभाग और अन्य संबंधित अधिकारियों के सामने शिकायत दर्ज कराई जाएगी।

  • ट्रंप और जिनपिंग के साथ बैठक करेंगे पुतिन….त्रिपक्षीय शिखर सम्मेलन का रखा प्रस्ताव

    ट्रंप और जिनपिंग के साथ बैठक करेंगे पुतिन….त्रिपक्षीय शिखर सम्मेलन का रखा प्रस्ताव


    मास्को।
    रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (Russian President Vladimir Putin) ने अगले महीने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Chinese President Xi Jinping) के साथ एक त्रिपक्षीय शिखर सम्मेलन का प्रस्ताव रखा है। इस सम्मेलन में यूक्रेन संघर्ष पर चर्चा होगी। इसका उद्देश्य एक ऐसा शांति समझौता करना है जो मॉस्को के पक्ष में हो। यह जानकारी ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ (WSJ) की रिपोर्ट के अनुसार है।

    रिपोर्ट के अनुसार, यह प्रस्ताव राष्ट्रपति ट्रंप के साथ बेहतर होते संबंधों का फायदा उठाने की पुतिन की कोशिश को दिखाता है। इस कदम ने यूक्रेन और वाशिंगटन के यूरोपीय सहयोगियों के बीच चिंताएं पैदा कर दी हैं, खासकर इसलिए क्योंकि इसमें यूक्रेन का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है।


    पुतिन ने बातचीत का प्रस्ताव कब रखा?

    इस मामले की जानकारी रखने वाले रूस के एक पूर्व खुफिया अधिकारी का हवाला देते हुए, डब्लूएसजे ने बताया कि पुतिन ने सबसे पहले 9 अक्तूबर को ट्रंप के साथ फोन पर बातचीत के दौरान एक त्रिपक्षीय बैठक का विचार रखा था। इसी बातचीत के दौरान एक समझौता भी हुआ, जिसके तहत अमेरिका को रूस से डीजल खरीदने और उसे वैश्विक बाजारों में वितरित करने की अनुमति मिल गई।


    क्रेमलिन के प्रवक्ता ने क्या कहा?

    क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने डब्लूएसजे को पुष्टि की कि एक संभावित बैठक को लेकर बातचीत चल रही है। पेस्कोव ने डब्लूएसजे से कहा, ‘बैठक या इसके संभावित एजेंडे को लेकर अभी तक कोई स्पष्ट सहमति नहीं बनी है, हालांकि तीनों पक्ष इस बात को मानते हैं कि ऐसी बैठक होने की एक संभावना हो सकती है।’


    अमेरिका के एक वरिष्ठ अधिकारी ने क्या कहा?

    वहीं, अमेरिका के एक वरिष्ठ अधिकारी ने ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ को बताया कि ट्रंप ने इस शिखर सम्मेलन के लिए औपचारिक रूप से सहमति नहीं दी है, लेकिन अधिकारी ने संकेत दिया कि युद्ध को सुलझाने की अपनी कोशिशों को देखते हुए, अमेरिकी राष्ट्रपति इस प्रस्ताव पर विचार कर सकते हैं।


    कब हो सकती है बैठक?

    बातचीत से जुड़े सूत्रों ने ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ को बताया कि क्रेमलिन ने सुझाव दिया है कि यह त्रिपक्षीय वार्ता आगामी ‘एशिया-पैसिफिक इकोनॉमिक कोऑपरेशन’ (APEC) शिखर सम्मेलन के साथ आयोजित की जा सकती है। यह सम्मेलन 18 और 19 नवंबर को दक्षिणी चीन के टेक हब, शेन्जेन में होने वाला है।

    मॉस्को और बीजिंग के बीच हाल ही में हुई बातचीत से जुड़े सूत्रों ने ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ को बताया कि रूसी राजनयिकों ने चीनी अधिकारियों के सामने एक प्रस्ताव रखा। चीनी अधिकारियों ने संकेत दिया कि अगर ट्रंप इसमें शामिल होने के लिए सहमत हो जाते हैं, तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी।


    ट्रंप ने जेलेंस्की पर क्या आरोप लगाया?

    रविवार को ट्रंप ने दावा किया कि रूस-यूक्रेन संघर्ष को खत्म करने के लिए चल रही बातचीत में काफी प्रगति हो रही है। उन्होंने मॉस्को के प्रति अपने प्रशासन के राजनयिक रुख का बचाव किया और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की पर आरोप लगाया कि वे दो साल पहले एक बेहतर समझौता करने में विफल रहे थे।

    इसके साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस और रूसी ऊर्जा खरीदने वाले बड़े देशों पर नए कड़े प्रतिबंधों और टैरिफ को फिलहाल लागू न करने के अपने फैसले का बचाव किया है। उनका कहना है कि वह यूक्रेन युद्ध को खत्म करने के लिए चल रही शांति वार्ता को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहते। ट्रंप ने कहा कि उनकी सरकार युद्ध को खत्म करने के लिए बातचीत में प्रगति कर रही है। उनके मुताबिक, अगर इस समय रूस पर नए आर्थिक दबाव डाले गए, तो वह बातचीत की मेज छोड़ सकता है।