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  • 50 राज्य और हजारों काउंटी, क्या अमेरिकी चुनाव में धांधली करना वाकई असंभव है, जानिए पेपर ट्रेल का सुरक्षा कवच

    50 राज्य और हजारों काउंटी, क्या अमेरिकी चुनाव में धांधली करना वाकई असंभव है, जानिए पेपर ट्रेल का सुरक्षा कवच


    नई दिल्ली। अमेरिका में आगामी मध्यावधि चुनावों को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों और चुनावी प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों के बीच निष्पक्ष मतदान और वोटों की सुरक्षा पर बहस छिड़ी हुई है। आशंकाएं जताई जा रही हैं कि क्या मौजूदा राजनीतिक माहौल में अमेरिकी चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष और सुरक्षित रह पाएंगे। इस सवाल पर द न्यूयॉर्क टाइम्स ने चुनाव कानून प्रशासन और राजनीतिक रणनीतियों से जुड़े आठ विशेषज्ञों से चर्चा की। विशेषज्ञों की राय के मुताबिक अमेरिकी चुनाव व्यवस्था में कई ऐसे सुरक्षा उपाय मौजूद हैं जो बड़े स्तर पर चुनावी धांधली करना बेहद कठिन बनाते हैं। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि चुनावी प्रक्रिया में किसी भी तरह की गड़बड़ी की आशंका पूरी तरह समाप्त हो जाती है।
    विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की चुनाव प्रणाली का विकेंद्रीकरण उसकी सबसे बड़ी ताकत है। वहां चुनाव कराने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से राज्यों और स्थानीय काउंटी प्रशासन के पास होती है। राष्ट्रपति या संघीय सरकार सीधे तौर पर पूरे देश की चुनाव प्रक्रिया को अपने नियंत्रण में नहीं ले सकती। अमेरिका के 50 राज्यों और हजारों स्थानीय प्रशासनिक इकाइयों में मतदान की व्यवस्था संचालित होती है। ऐसे में किसी एक केंद्रीय स्तर से पूरी चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करना आसान नहीं है। चुनाव अधिकारियों की भूमिका और स्थानीय स्तर पर निगरानी भी मतगणना की विश्वसनीयता बनाए रखने में महत्वपूर्ण मानी जाती है।
    चर्चा में शामिल विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि चुनावी व्यवस्था को लेकर राजनीतिक बयानबाजी और वास्तविक प्रशासनिक अधिकारों के बीच अंतर समझना जरूरी है। विशेषज्ञ बॉब बाउर के अनुसार राष्ट्रपति के अधिकारों को लेकर कई बार बढ़ा-चढ़ाकर दावे किए जाते हैं। वहीं बेन गिंसबर्ग का कहना है कि राष्ट्रपति के पास सीधे चुनाव संचालित करने की शक्ति नहीं है लेकिन उनके बयान जनता के बीच संदेह और अविश्वास जरूर पैदा कर सकते हैं। कानून के प्रोफेसर डेरेक मुलर के मुताबिक इतनी बड़ी और विकेंद्रीकृत व्यवस्था को एकतरफा तरीके से बदल पाना बेहद मुश्किल है। विशेषज्ञों ने इस बात पर भरोसा जताया कि चुनाव अधिकारी मतदाताओं के वोटों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
    अमेरिकी चुनावों में पेपर ट्रेल यानी मतदान का सत्यापन योग्य रिकॉर्ड भी सुरक्षा व्यवस्था का अहम हिस्सा है। जहां मतपत्रों का कागजी रिकॉर्ड उपलब्ध होता है वहां जरूरत पड़ने पर मशीनों से मिले नतीजों की दोबारा जांच की जा सकती है। ऑडिट और पुनर्गणना की प्रक्रिया से मतगणना में संभावित गलतियों का पता लगाने में मदद मिलती है। हालांकि अमेरिका में मतदान की तकनीक और नियम सभी राज्यों में एक जैसे नहीं हैं। इसलिए सुरक्षा उपायों की प्रकृति भी राज्य के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। कागजी रिकॉर्ड चुनाव परिणामों की जांच को अधिक पारदर्शी बनाने में मदद करता है।
    इसके बावजूद विशेषज्ञों ने कुछ गंभीर चुनौतियों की ओर ध्यान दिलाया है। बॉब बाउर के मुताबिक चुनाव अधिकारियों के खिलाफ मुकदमे की धमकियां और संघीय एजेंसियों की संभावित भूमिका को लेकर बयानबाजी माहौल को तनावपूर्ण बना सकती है। एडवर्ड फोली ने बेहद करीबी चुनाव परिणामों की स्थिति में लंबे कानूनी विवाद की आशंका जताई। ऐसी परिस्थितियों में मतगणना और नतीजों की आधिकारिक पुष्टि में देरी हो सकती है। वनीता गुप्ता ने चिंता जताई कि यदि मतदाता चुनाव प्रणाली पर भरोसा खो देते हैं तो वे मतदान करने से पीछे हट सकते हैं। इससे लोकतांत्रिक भागीदारी प्रभावित होने का खतरा रहता है।
    कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में डीपफेक वीडियो और भ्रामक सूचनाएं भी चुनावी प्रक्रिया के लिए चुनौती बन रही हैं। गलत जानकारी तेजी से फैलने से मतदाताओं के बीच भ्रम पैदा हो सकता है और चुनाव अधिकारियों पर भरोसा कमजोर पड़ सकता है। विशेषज्ञों की राय का सार यह है कि अमेरिकी चुनाव प्रणाली में सुरक्षा के कई स्तर मौजूद हैं लेकिन किसी भी लोकतंत्र में पारदर्शिता जवाबदेही और मतदाताओं का विश्वास बनाए रखना जरूरी है। पेपर ट्रेल और विकेंद्रीकृत व्यवस्था चुनावों की विश्वसनीयता मजबूत कर सकते हैं लेकिन भ्रामक सूचनाओं और राजनीतिक तनाव से निपटने के लिए प्रशासनिक सतर्कता भी उतनी ही आवश्यक है।
  • अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो 17 अक्टूबर को आएंगे भारत दौरे पर… ट्रेड डील पर बड़ी उम्मीद!

    अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो 17 अक्टूबर को आएंगे भारत दौरे पर… ट्रेड डील पर बड़ी उम्मीद!


    वॉशिंगटन।
    भारत और अमेरिका (India and America) के बीच ट्रेड डील (Trade deal) को लेकर जारी बातचीत के बीच अमेरिकी विदेश मंत्री (US Secretary of State) मार्को रुबियो (Marco Rubio) 17 से 22 अक्टूबर तक भारत के दौरे पर आएंगे. इस दौरान वह मुंबई और जामनगर भी जाएंगे. अमेरिकी विदेश विभाग के मुताबिक, रुबियो की यात्रा का उद्देश्य दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करना और व्यापार, ऊर्जा तथा क्षेत्रीय व वैश्विक मुद्दों पर सहयोग बढ़ाना है।

    रुबियो की यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर बातचीत जारी है. भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने मंगलवार को संकेत दिया कि वार्ता किसी नतीजे के करीब पहुंच रही है. हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि समझौते को अंतिम रूप दे दिया गया है।

    नई दिल्ली में ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम के दौरान जयशंकर ने ट्रेड डील से संबंधित एक सवाल के जवाब में कहा कि उन्हें लगता है कि यह मुद्दा अब किसी निष्कर्ष की ओर बढ़ रहा है. जयशंकर के मुताबिक, अमेरिका अपनी घरेलू औद्योगिक क्षमता को फिर मजबूत करने और दूसरे देशों को अपने बाजार तक पहुंच देने की शर्तों में बदलाव करने की कोशिश कर रहा है. ऐसे में भारत को भी अमेरिका के साथ अपने आर्थिक संबंधों की शर्तों का नए सिरे से आकलन करना होगा. उन्होंने कहा कि अमेरिका ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है और दूसरे देशों को उसके साथ अपने रिश्तों का पुनर्मूल्यांकन करना पड़ रहा है।


    उज्बेकिस्तान के बाद भारत आएंगे रुबियो

    अमेरिकी विदेश विभाग की घोषणा के मुताबिक, रुबियो पहले उज्बेकिस्तान के समरकंद जाएंगे. वहां वह मध्य एशिया के पांच गणराज्यों के साथ होने वाली सी5+1 मंत्रिस्तरीय बैठक में हिस्सा लेंगे. इसके बाद वह भारत पहुंचेंगे. यह इस साल भारत की उनकी दूसरी आधिकारिक यात्रा होगी। भारत में रुबियो वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों से मुलाकात करेंगे. बातचीत में द्विपक्षीय रणनीतिक साझेदारी, क्षेत्रीय और वैश्विक घटनाक्रम तथा ऊर्जा सहयोग बढ़ाने पर चर्चा होगी. वह कारोबार जगत के प्रतिनिधियों से भी मिलेंगे, ताकि निवेश और आर्थिक संबंधों को आगे बढ़ाया जा सके.

    इससे पहले मार्को रुबियो इसी मई में चार दिवसीय भारत दौरे पर आए थे, जहां उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री जयशंकर से मुलाकात की थी. उस समय रुबियो ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से पीएम मोदी को व्हाइट हाउस आने का निमंत्रण भी दिया था. जयशंकर के साथ बैठक के दौरान रुबियो ने भरोसा जताया था कि दोनों देश टिकाऊ व्यापार समझौते तक पहुंच सकते हैं. उन्होंने कहा था कि बातचीत में अच्छी प्रगति हुई है और अमेरिका ऐसा समझौता करना चाहता है, जो दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद हो।

    मई की बातचीत में ऊर्जा स्रोतों में विविधता, परमाणु सहयोग, महत्वपूर्ण खनिज, प्रौद्योगिकी और भारतीय यात्रियों के वीजा से जुड़े मुद्दे भी उठे थे. रुबियो ने प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात के दौरान व्यापार और ऊर्जा सहयोग पर चर्चा की थी. वह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से मोदी को व्हाइट हाउस आने का निमंत्रण भी लेकर आए थे।


    टैरिफ और बाजार तक पहुंच अब भी बड़ी चुनौती

    मई में हुई बातचीत के बावजूद व्यापार वार्ता में अमेरिकी शुल्क नीति और बाजार तक पहुंच को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है. केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 5 अक्टूबर को कहा था कि बातचीत एक ठहराव पर पहुंच गई है और दोनों पक्षों के लिए आगे रियायत देना कठिन होता जा रहा है। अमेरिका अपने व्यापार असंतुलन को दूर करने और भारतीय बाजार में अधिक पहुंच हासिल करने की कोशिश कर रहा है. वहीं, भारत चाहता है कि समझौते की शर्तें घरेलू संवेदनशील क्षेत्रों के हितों की रक्षा करें और भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित न हो.

  • हूतियों के हमलों से दहला सऊदी… दुनिया की सबसे बड़ी ऑयल कंपनी अरामको पर दागी मिसाइल

    हूतियों के हमलों से दहला सऊदी… दुनिया की सबसे बड़ी ऑयल कंपनी अरामको पर दागी मिसाइल


    नई दिल्ली।
    सऊदी अरब (Saudi Arabia) और यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों (Houthi Rebels) के बीच छिड़ा संघर्ष अब खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है. मंगलवार देर रात सऊदी अरब के पूर्वी शहर धहरान (Dharan) में दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी ‘सऊदी अरामको’ (World’s Largest oil company, ‘Saudi Aramco’) के प्रशासनिक परिसर को बैलिस्टिक मिसाइल से निशाना बनाया गया. सऊदी सरकारी समाचार एजेंसी एसपीए ने बुधवार को ऊर्जा मंत्रालय के एक अधिकारी के हवाले से बताया कि हमले के बाद इमारत में आग लगी, लेकिन किसी के हताहत होने की खबर नहीं है।

    एक रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनी से जुड़े एक सूत्र ने बताया कि मिसाइल हमले में ऑफिस बिल्डिंग की ऊपरी तीन मंजिलों को नुकसान पहुंचा. सूत्र और मामले से परिचित दो अन्य लोगों ने इमारत में आग लगने की जानकारी दी. हालांकि, हमले की जिम्मेदारी को लेकर उपलब्ध रिपोर्ट में स्वतंत्र पुष्टि नहीं दी गई है।

    अरामको का यह परिसर कंपनी के एक प्रमुख संचालन केंद्र के रूप में काम करता है. दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनियों में शामिल अरामको सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था का अहम आधार है. इसके संचालन नेटवर्क में तेल के कुएं, पाइपलाइन, रिफाइनरी और निर्यात टर्मिनल शामिल हैं।


    रियाद समेत कई इलाकों में मिसाइल और ड्रोन नष्ट करने का दावा

    सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने बताया कि धहरान के ऊपर रोकी गई एक मिसाइल के टुकड़े आवासीय इलाके में गिरे. हालांकि, इससे हुए नुकसान के बारे में विस्तृत जानकारी नहीं दी गई. अधिकारियों ने रियाद और देश के दक्षिणी हिस्से में भी मिसाइलों तथा ड्रोन को रोककर नष्ट करने की जानकारी दी।

    इससे पहले मंगलवार को सऊदी अरब के युवराज मोहम्मद बिन सलमान की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में हूतियों को बार-बार हमले करने के गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी गई थी.

    रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले एक सप्ताह से हूती विद्रोही सऊदी अरब के अहम ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले कर रहे हैं. इनमें राजधानी रियाद का हवाई अड्डा भी शामिल है. शनिवार को रियाद हवाई अड्डे पर हुए बैलिस्टिक मिसाइल हमले में 13 लोगों की मौत की जानकारी दी गई थी. रिपोर्ट इसे पिछले एक दशक में सऊदी अरब पर हुआ सबसे घातक हमला बताती है. लगातार हमलों के कारण देश में उड़ान सेवाएं भी प्रभावित हुईं. यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया, जब सऊदी अरब में एक बड़े ऊर्जा सम्मेलन का आयोजन हो रहा था।


    हूतियों ने पहले ही अरामको को दी थी धमकी

    धहरान पर हमले से पहले हूती प्रवक्ता याह्या सरी ने यमन की राजधानी सना पर सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन के हमलों के जवाब में ‘कड़ी और दर्दनाक’ कार्रवाई की चेतावनी दी थी. उनके मुताबिक, संभावित निशानों में धहरान स्थित अरामको मुख्यालय और रियाद की एक तेल रिफाइनरी शामिल थे.हूतियों ने सऊदी अरब में तेल क्षेत्र के कर्मचारियों को भी उन ठिकानों से दूर रहने की चेतावनी दी थी, जिन्हें वे संभावित लक्ष्य मानते हैं।


    सना में तेल डिपो पर भी हमला

    हूती विद्रोहियों ने मंगलवार को आरोप लगाया कि सऊदी अरब सना पर हमले कर रहा है. दूसरी ओर, सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन की राजधानी के बाहरी इलाके में स्थित एक तेल डिपो से नागरिकों को दूर रहने की चेतावनी दी. हूती संचालित अल-मसीरा टेलीविजन ने बताया कि गठबंधन ने यमन पेट्रोलियम कंपनी के सबाह केंद्रीय स्टेशन को निशाना बनाया. यह ईंधन डिपो सना के बाहर स्थित है. गठबंधन ने स्टेशन और अन्य ठिकानों पर हमले की पुष्टि की. उसका कहना था कि कार्रवाई का उद्देश्य हूतियों की सऊदी अरब, यमन और अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों को खतरा पहुंचाने की क्षमता को कमजोर करना था।

  • तुर्किये-पाकिस्तान की बढ़ती सैन्य नजदीकी के बीच भारत की रणनीतिक तैयारी तेज, ग्रीस और साइप्रस के साथ रक्षा सहयोग का रोडमैप तैयार

    तुर्किये-पाकिस्तान की बढ़ती सैन्य नजदीकी के बीच भारत की रणनीतिक तैयारी तेज, ग्रीस और साइप्रस के साथ रक्षा सहयोग का रोडमैप तैयार

    नई दिल्ली ।तुर्किये और पाकिस्तान के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग के बीच भारत ने अपनी सामरिक तैयारियों को मजबूत करने की दिशा में कदम तेज किए हैं। इसके तहत भारत भूमध्यसागर क्षेत्र में अपनी पहुंच बढ़ाने और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को ध्यान में रखते हुए ग्रीस तथा साइप्रस के साथ रक्षा संबंधों का विस्तार कर रहा है। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की साइप्रस और ग्रीस की चार दिवसीय यात्रा को इसी व्यापक रणनीतिक प्रयास के संदर्भ में देखा जा रहा है। इस दौरे का मुख्य जोर समुद्री सुरक्षा और रक्षा सहयोग पर है।

    भारत और तुर्किये के संबंधों में पाकिस्तान का मुद्दा लंबे समय से संवेदनशील रहा है। दोनों देशों के बीच बढ़ती सैन्य साझेदारी भारत की सुरक्षा संबंधी चिंताओं को प्रभावित करती है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तुर्किये ने पाकिस्तान को बेयराक्तार ड्रोन दिए थे, जिनका पाकिस्तान ने सीमा पर इस्तेमाल किया। इसके अलावा तुर्किये पाकिस्तान के साथ मक्का रक्षा गठबंधन में भी शामिल है। अंकारा और इस्लामाबाद ने रक्षा उत्पादन तथा नौसैनिक सहयोग को भी बढ़ाया है। तुर्किये पाकिस्तान के लिए युद्धपोत निर्माण कार्यक्रम में भी भागीदारी कर रहा है।

    इस पृष्ठभूमि में भारत ने ग्रीस और साइप्रस के साथ अपने रक्षा संबंधों को मजबूत करने पर ध्यान दिया है। भारत और साइप्रस के बीच रक्षा सहयोग के लिए छह साल का विशेष रोडमैप तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच सामरिक सहयोग को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाना है। वहीं, ग्रीस के साथ भारत ने हाल ही में द्विपक्षीय सैन्य सहयोग योजना पर हस्ताक्षर किए हैं। रक्षा उद्योगों के बीच तालमेल बढ़ाने के लिए दोनों पक्षों ने एक साझा घोषणा पत्र का आदान-प्रदान भी किया है।

    ग्रीस की भौगोलिक स्थिति भारत के लिए रणनीतिक महत्व रखती है। यह यूरोप के पूर्वी प्रवेश द्वार के रूप में अहम भूमिका निभाता है और भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे के लिए भी महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है। यह आर्थिक गलियारा भारत को यूरोपीय बाजारों से जोड़ने की योजना का हिस्सा है। ऐसे में ग्रीस के साथ बढ़ते संबंध केवल रक्षा सहयोग तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनके व्यापक रणनीतिक और आर्थिक मायने भी हैं।

    आने वाले समय में भारत और ग्रीस सैन्य प्रशिक्षण, समुद्री निगरानी, रक्षा तकनीक तथा संयुक्त उत्पादन जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ेंगे। इन क्षेत्रों में तालमेल से दोनों देशों को अपनी क्षमताएं मजबूत करने और रक्षा उद्योगों के बीच साझेदारी को बढ़ावा देने का अवसर मिलेगा। समुद्री सुरक्षा पर सहयोग भी इस साझेदारी का महत्वपूर्ण हिस्सा है, क्योंकि भूमध्यसागर क्षेत्र में रणनीतिक गतिविधियां भारत के व्यापक अंतरराष्ट्रीय हितों से जुड़ी हुई हैं।

    भारत, ग्रीस और साइप्रस के बीच त्रिपक्षीय सामरिक सहयोग को तुर्किये-पाकिस्तान रक्षा साझेदारी के जवाब में एक महत्वपूर्ण विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। भारत के लिए इन दोनों देशों के साथ संबंध मजबूत करना अपनी रणनीतिक संभावनाओं का विस्तार करने का माध्यम है। रक्षा सचिव की यात्रा और हाल में हुए समझौतों से संकेत मिलता है कि भारत क्षेत्रीय समीकरणों पर नजर रखते हुए विभिन्न देशों के साथ सहयोग बढ़ा रहा है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में किसी प्रत्यक्ष सैन्य टकराव या नई सैन्य तैनाती की घोषणा नहीं की गई है। फिलहाल भारत का जोर रक्षा साझेदारी, सैन्य सहयोग और समुद्री सुरक्षा के जरिए अपने रणनीतिक विकल्प मजबूत करने पर है।

  • अमेरिका के जंगलों में महिलाओं के लिए खास गुस्सा शिविर, चीखने-चिल्लाने से भावनाएं जाहिर करने का मौका, फीस 51 हजार रुपये से शुरू

    अमेरिका के जंगलों में महिलाओं के लिए खास गुस्सा शिविर, चीखने-चिल्लाने से भावनाएं जाहिर करने का मौका, फीस 51 हजार रुपये से शुरू

    नई दिल्ली । रिश्तों में तनाव, निजी जीवन की परेशानियों और दुनिया की घटनाओं से पैदा होने वाला गुस्सा कई बार लोगों के लिए संभालना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में अमेरिका में महिलाओं के लिए विशेष शिविर आयोजित किए जा रहे हैं, जहां उन्हें बिना किसी डर या आलोचना के अपनी भावनाएं व्यक्त करने का अवसर मिलता है। इन शिविरों में महिलाएं जंगल के बीच एकत्र होती हैं और आवाज निकालने, चीखने-चिल्लाने तथा शारीरिक गतिविधियों के माध्यम से अपना गुस्सा जाहिर करती हैं। आयोजकों का कहना है कि इन कार्यक्रमों का उद्देश्य ऐसी जगह उपलब्ध कराना है, जहां महिलाएं अपनी भावनाओं को लेकर असहज महसूस न करें।

    पोर्टलैंड के पास ओरेगन के जंगलों में एमी आर्मस्ट्रांग के ‘होली रेज रिट्रीट’ में महिलाओं के छोटे समूह हिस्सा लेते हैं। यहां एक समूह में अधिकतम 10 महिलाओं को शामिल किया जाता है। कार्यक्रम के दौरान एक महिला को जोर से चीखते देखकर दूसरी महिलाओं को भी अपनी आवाज के जरिए भावनाएं व्यक्त करने का अवसर मिलता है। इसके बाद सामूहिक चर्चा होती है, जिसमें प्रतिभागी अपने अनुभव साझा करती हैं। शिविर के एक चरण में लिखे गए पत्रों को जलाया जाता है और अंत में गीत के साथ कार्यक्रम पूरा किया जाता है।

    आर्मस्ट्रांग ने अगस्त 2025 में इन शिविरों की शुरुआत की थी। आधे दिन के कार्यक्रम की शुरुआत ध्यान अभ्यास से होती है। वह इस अभ्यास को शरीर को कविता के रूप में महसूस करने की प्रक्रिया बताती हैं। इसके बाद प्रतिभागियों को आवाज निकालने और शारीरिक गतिविधियों के जरिए अपनी भावनाएं जाहिर करने का अवसर दिया जाता है। इसमें इच्छानुसार चीखना या गुर्राना भी शामिल है। आयोजक समूह का आकार छोटा रखती हैं, ताकि प्रत्येक महिला को पर्याप्त सहयोग मिल सके।

    इन शिविरों में भाग लेने के लिए अलग-अलग शुल्क निर्धारित हैं। आर्मस्ट्रांग साढ़े तीन घंटे के सत्र के लिए करीब 51 हजार रुपये लेती हैं। वहीं, बे एरिया सीबीटी सेंटर कई दिनों के कार्यक्रम आयोजित करता है। इसके पांच दिन के शिविर का शुल्क करीब 2 लाख 97 हजार 500 रुपये और सात दिन के कार्यक्रम का शुल्क लगभग 3 लाख 82 हजार 500 रुपये है। इन पैकेज में रहने, भोजन और थेरेपी सत्र शामिल हैं। लंबे कार्यक्रम में अतिरिक्त गतिविधियां और बाद में सहायता भी दी जाती है।

    एक अन्य विकल्प के तहत लेव की वेबसाइट पर एक से तीन दिन के शिविर के लिए करीब 2 लाख 12 हजार 500 रुपये का शुल्क बताया गया है। इसमें शामिल होने से पहले प्रतिभागियों को एक प्रश्नावली भरनी होती है। इसके जरिए उनकी पसंद, कार्यक्रम की अवधि, अनुभव की तीव्रता और उन विषयों के बारे में जानकारी ली जाती है, जिन पर वे काम करना चाहती हैं। लेव के अनुसार, केंद्र ने मई में 16 प्रतिभागियों के साथ अपना पहला गुस्सा शिविर आयोजित किया था। दूसरा शिविर अक्टूबर के अंत में आयोजित करने की योजना है। उन्होंने बताया कि इस तरह के कार्यक्रमों में महिलाओं की रुचि अधिक रही है और भविष्य में इन्हें विस्तार देने की उम्मीद है।

    आर्मस्ट्रांग के मुताबिक, शिविर में आने वाली महिलाओं की उम्र लगभग 20 से 50 वर्ष के बीच होती है। इनमें कई महिलाएं तलाक, बीमारी, रिश्ते टूटने या अपने धार्मिक विश्वासों पर दोबारा विचार करने जैसे जीवन के बदलावों से गुजर रही होती हैं। उन्होंने कहा कि लोग ऐसी जगह चाहते हैं, जहां उन्हें अपमानित महसूस किए बिना अपनी भावनाएं व्यक्त करने की आजादी मिले। प्रतिभागियों की पहले जांच भी की जाती है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भावनात्मक परेशानियों से निपटने के लिए उनके पास उचित सहायता उपलब्ध है। कार्यक्रम में फोटोग्राफी भी की जाती है, जिसे महिलाएं खुद को सामान्य सामाजिक छवि से अलग नजरिए से देखने के अवसर के रूप में अनुभव कर सकती हैं।

  • होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर टोल वसूलने का विरोध….एकजुट हुए 60 देश

    होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर टोल वसूलने का विरोध….एकजुट हुए 60 देश


    नई दिल्ली।
    दुनिया के अहम समुद्री रास्तों (Sea routes) से जहाजों (Ships) की आवाजाही पर शुल्क लगाने के खिलाफ 60 देश एक साथ आए हैं. यूरोपीय संघ (European Union) के पहल के बाद इन देशों ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) से गुजरने वाले जहाजों पर गैरकानूनी टोल (Illegal Toll) लगाने और उनकी आवाजाही रोकने वाली पाबंदियों का विरोध किया गया है. 12 अक्टूबर को सामने आई इस घोषणा में यूरोपीय संघ के सदस्य देशों के अलावा ऑस्ट्रेलिया, जापान और ब्रिटेन समेत कई देशों ने समर्थन दिया है।

    इन देशों ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री रास्तों से सुरक्षित और बिना रुकावट आवाजाही बनाए रखने के लिए मिलकर काम किया जाना चाहिए. घोषणा में साफ कहा गया है कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री रास्तों से कानूनी रूप से गुजरने वाले जहाजों पर ऐसे शुल्क नहीं लगाए जाने चाहिए, जो उनकी आवाजाही में बाधा डालें।

    देशों ने गैरकानूनी फीस, भेदभावपूर्ण पाबंदियों और पहले से अनुमति लेने जैसी शर्तों का विरोध किया है. यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख काजा कलास ने इस पहल की घोषणा की. इसका मकसद समुद्री रास्तों को अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत खुला रखना और किसी देश की एकतरफा कार्रवाई से जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से रोकना है।


    होर्मुज जलडमरूमध्य पर क्यों है दुनिया की नजर?

    होर्मुज जलडमरूमध्य ईरान और ओमान के बीच स्थित एक अहम समुद्री रास्ता है. यहां से खाड़ी क्षेत्र का तेल और प्राकृतिक गैस दुनिया के अलग-अलग देशों तक पहुंचता है. युद्ध शुरू होने से पहले दुनिया की करीब पांचवीं हिस्सेदारी वाला तेल और लिक्विफाइज नैचुरल गैस (LNG) इसी रास्ते से गुजरते थे।

    ईरान ने होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों से नेविगेशन, सुरक्षा और अन्य सेवाओं के नाम पर शुल्क लेने की योजना आगे बढ़ाई थी. इस प्रस्ताव ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार और जहाजों की आवाजाही को लेकर चिंता बढ़ाई है।


    असर सिर्फ जहाजों तक सीमित नहीं

    समुद्री रास्तों पर पाबंदियां या अतिरिक्त शुल्क लगने से माल ढुलाई महंगी हो सकती है. इसका असर तेल और गैस की आपूर्ति, कारोबार और सामान की कीमतों पर भी पड़ सकता है. इसी वजह से 60 देशों ने समुद्री रास्तों को खुला रखने और अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करने पर जोर दिया है. अब देखना यह होगा कि समुद्री रास्तों पर आवाजाही बनाए रखने के लिए देश इस साझा घोषणा को किस तरह अमल में लाते हैं।

  • इशाक डार की अफगानिस्तान को चेतावनी…. बोले- अपनी धरती से पाक में होने आतंकी हमलों की रोके

    इशाक डार की अफगानिस्तान को चेतावनी…. बोले- अपनी धरती से पाक में होने आतंकी हमलों की रोके


    इस्लामाबाद।
    पाकिस्तान (Pakistan) ने सोमवार को अफगानिस्तान (Afghanistan) की तालिबान सरकार से आग्रह किया कि वह अपनी धरती से पाकिस्तान के अंदर होने वाले आतंकी हमलों (Terrorist attacks) को रोके। पाकिस्तान ने चेतावनी दोहराई कि यही सशस्त्र समूह अंततः तालिबान के अपने शासन के लिए भी खतरा बन सकते हैं। पड़ोसी देशों के बीच सीमा पर बार-बार झड़पों और पाकिस्तानी हवाई हमलों के कारण तनाव बढ़ गया है। इससे आतंकी गतिविधियों को लेकर लंबे समय से चला आ रहा विवाद गहरा गया है।

    सितंबर में संयुक्त राष्ट्र मिशन इन अफगानिस्तान ने बताया था कि इस साल अफगानिस्तान में सीमा पार हिंसा से 1,100 से अधिक नागरिकों की मौतें और चोटें दर्ज की गई हैं। पाकिस्तानी टेलीविजन पर प्रसारित एक थिंक टैंक में अपने भाषण में विदेश मंत्री इशाक डार ने कहा कि उन्होंने जुलाई 2025 में काबुल यात्रा के दौरान अफगान प्रधान मंत्री मुल्ला मोहम्मद हसन अखुंद को एक बार चेतावनी दी थी।

    डार ने कहा, “मैंने उन्हें विनम्रता से याद दिलाया कि यदि अफगान अधिकारी अपने क्षेत्र से संचालित होने वाले आतंकवादी समूहों के खिलाफ उचित कार्रवाई करने में विफल रहते हैं, तो वह दिन आएगा जब यही समूह उनकी सरकार को भी धमकी देंगे।” उन्होंने अफगानिस्तान की प्रतिक्रिया का कोई विवरण नहीं दिया।


    क्या हैं अफगानिस्तान के आरोप और पाकिस्तान की प्रतिक्रिया?

    अफगान सरकार के प्रवक्ता जाबिहुल्लाह मुजाहिद ने एक्स पर एक पोस्ट में पाकिस्तान के आरोपों को खारिज कर दिया। उन्होंने पाकिस्तानी अधिकारियों पर बातचीत को कमजोर करने और समाधानों पर प्रचार को प्राथमिकता देने का आरोप लगाया।

    मुजाहिद ने लिखा, “पाकिस्तानी अधिकारियों द्वारा अपनी विफलताओं के लिए अफगानिस्तान को दोषी ठहराना किसी भी समस्या का समाधान नहीं है।” पाकिस्तान के सूचना मंत्रालय ने मुजाहिद की टिप्पणियों को खारिज कर दिया।

    मंत्रालय ने एक्स पर कहा कि इस्लामाबाद बातचीत के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन प्रगति के लिए काबुल को अपनी आतंकवाद विरोधी प्रतिबद्धताओं को पूरा करना होगा। साथ ही, आतंकी ठिकानों और समर्थन नेटवर्क के खिलाफ सत्यापन योग्य कार्रवाई करनी होगी।


    पाकिस्तान किन आतंकी समूहों पर लगाता है आरोप?

    पाकिस्तान अक्सर काबुल पर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) को पनाह देने का आरोप लगाता है। इसके अलावा, प्रतिबंधित बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) और अल-कायदा इन द इंडियन सबकॉन्टिनेंट को भी पनाह देने का आरोप है। टीटीपी अफगानिस्तान के सत्तारूढ़ तालिबान से अलग है, लेकिन उससे घनिष्ठ रूप से संबद्ध है।

    अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने पाकिस्तान को निशाना बनाने वाले आतंकियों को सुरक्षित पनाहगाह देने से बार-बार इन्कार किया है। डार ने कहा कि काबुल के प्रति पाकिस्तान के राजनयिक और आर्थिक प्रयासों से उसकी केंद्रीय सुरक्षा मांग पर कोई सार्थक प्रगति नहीं हुई है। यह मांग अफगान धरती से संचालित होने वाले आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई की है।


    सीमा पार से हमलों का क्या है पैमाना?

    डार ने कहा कि पाकिस्तान एक स्थिर और समृद्ध अफगानिस्तान चाहता है, लेकिन सीमा पार से लगातार आतंकी खतरे को अब और नजरअंदाज नहीं कर सकता। उन्होंने कहा, “पाकिस्तान के अंदर हमले सीमा पार से नियोजित, निर्देशित और शुरू किए जाते हैं।”

    डार ने बताया कि पाकिस्तान की सेना ने अफगानिस्तान के साथ 2,600 किलोमीटर से अधिक लंबी सीमा पर बाड़ का लगभग 95 फीसदी काम पूरा कर लिया है। यह बाड़ 2017 में आतंकियों के सीमा पार हमलों के बाद शुरू की गई थी। डार ने टीटीपी को पाकिस्तान के सबसे गंभीर सुरक्षा खतरों में से एक बताया। उन्होंने स्कूलों, मस्जिदों, बाजारों और सुरक्षा प्रतिष्ठानों पर हमलों का हवाला दिया।

    पाकिस्तान का कहना है कि जनवरी से 2,800 से अधिक आतंकी हमलों में लगभग 3,000 लोग मारे गए या घायल हुए हैं। सूचना मंत्री अत्ताउल्लाह तरार ने हिंसा में वृद्धि के लिए अफगानिस्तान स्थित आतंकियों, विशेषकर टीटीपी को जिम्मेदार ठहराया।

    तरार ने संयुक्त राष्ट्र और स्वतंत्र आकलन का हवाला देते हुए कहा कि अफगानिस्तान में 6,000 से अधिक टीटीपी लड़ाके और कुल मिलाकर 20,000 से अधिक आतंकी मौजूद हैं। उन्होंने टीटीपी पर 2021 में अफगान तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद से पाकिस्तान पर हमले करने के लिए अफगान क्षेत्र का उपयोग करने का आरोप लगाया।

  • भारत में स्टारलिंक को लेकर विवाद, अमेरिका में 36.6 करोड़ डॉलर के चुनावी चंदे पर घिरे एलन मस्क

    भारत में स्टारलिंक को लेकर विवाद, अमेरिका में 36.6 करोड़ डॉलर के चुनावी चंदे पर घिरे एलन मस्क


    नई दिल्‍ली । दुनिया के सबसे अमीर कारोबारियों में शामिल एलन मस्क भारत के सैटेलाइट इंटरनेट बाजार में अपनी कंपनी स्टारलिंक की जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इसी बीच अमेरिका में उनके भारी राजनीतिक चंदे को लेकर बहस तेज हो गई है। अमेरिकी सीनेटर बर्नी सैंडर्स ने आरोप लगाया है कि मस्क रिपब्लिकन पार्टी को चुनावी बढ़त दिलाने के लिए करोड़ों डॉलर खर्च कर रहे हैं, जिससे राजनीति में अरबपतियों के बढ़ते प्रभाव पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

    एक रिपोर्ट के मुताबिक, मस्क ने 2026 के अमेरिकी चुनाव चक्र में करीब 36.6 करोड़ डॉलर का राजनीतिक चंदा दिया है। इसमें जुलाई के बाद से कम से कम 27.6 करोड़ डॉलर शामिल हैं। सैंडर्स का आरोप है कि इतनी बड़ी रकम खर्च करके मस्क रिपब्लिकन पार्टी को कांग्रेस में अपना नियंत्रण बनाए रखने में मदद करना चाहते हैं।

    ट्रंप की जीत के लिए 29 करोड़ डॉलर खर्च करने का दावा

    बर्नी सैंडर्स के मुताबिक, एलन मस्क ने 2024 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की जीत के लिए करीब 29 करोड़ डॉलर खर्च किए थे। सैंडर्स ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर दावा किया कि ट्रंप की जीत के बाद मस्क की संपत्ति में 696 अरब डॉलर का इजाफा हुआ। उन्होंने यह भी कहा कि मस्क अब दुनिया के पहले खरबपति बन गए हैं।

    हालांकि, ये आंकड़े और संपत्ति में बढ़ोतरी को लेकर सैंडर्स के दावे हैं। उनकी आलोचना का मुख्य आधार यह है कि बेहद अमीर कारोबारी चुनावी अभियानों में भारी रकम लगाकर राजनीतिक व्यवस्था पर असाधारण प्रभाव हासिल कर सकते हैं।

    सैंडर्स ने आरोप लगाया कि मस्क 3 नवंबर को होने वाले 2026 के मध्यावधि चुनाव में भी रिपब्लिकन उम्मीदवारों की मदद के लिए बड़ी रकम खर्च कर रहे हैं। उन्होंने अपनी पोस्ट में नारा दिया, ‘मस्क को रोको, कुलीनतंत्र को रोको।’ उनका कहना है कि लोकतंत्र में राजनीतिक फैसलों पर कुछ अमीर लोगों का प्रभाव बढ़ना चिंता का विषय है।

    रिपब्लिकन उम्मीदवारों के समर्थन में कहां खर्च हुआ पैसा?

    मस्क के राजनीतिक चंदे का बड़ा हिस्सा उन संगठनों को मिला है, जो अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों में रिपब्लिकन उम्मीदवारों का समर्थन करते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, उनके योगदान का ब्योरा इस प्रकार है।

    सीनेट लीडरशिप फंड: रिपब्लिकन सीनेट उम्मीदवारों के समर्थन में काम करने वाले इस संगठन को करीब 15.8 करोड़ डॉलर दिए गए।
    अमेरिका पीएसी: मस्क के अपने राजनीतिक संगठन को लगभग 7.6 करोड़ डॉलर का योगदान मिला।
    कांग्रेसनल लीडरशिप फंड: प्रतिनिधि सभा के चुनावों में रिपब्लिकन उम्मीदवारों का समर्थन करने वाले इस संगठन को करीब 2 करोड़ डॉलर दिए गए।

    इन संगठनों के माध्यम से राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को चुनाव प्रचार, विज्ञापन तथा मतदाताओं तक पहुंच बनाने में मदद मिलती है। बड़ी रकम के योगदान से चुनावी अभियानों को संसाधन मिलते हैं, हालांकि इससे किसी उम्मीदवार की जीत सुनिश्चित नहीं होती।

    मध्यावधि चुनाव में ट्रंप के प्रभाव की परीक्षा

    अमेरिका में 3 नवंबर 2026 को होने वाले मध्यावधि चुनाव राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के राजनीतिक प्रभाव के लिहाज से अहम माने जा रहे हैं। इन चुनावों में प्रतिनिधि सभा और सीनेट की सीटों के लिए मुकाबला होगा। रिपब्लिकन पार्टी कांग्रेस में अपना बहुमत बनाए रखने की कोशिश करेगी, जबकि डेमोक्रेटिक पार्टी दोनों सदनों में नियंत्रण हासिल करना चाहती है।

    ऐसे में मस्क की ओर से रिपब्लिकन समर्थक संगठनों को दिए गए बड़े चंदे पर बहस तेज हो गई है। आलोचकों का तर्क है कि चुनावी अभियानों में अरबपतियों की बड़ी वित्तीय हिस्सेदारी से राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और नीतिगत फैसलों पर उनके प्रभाव को लेकर असमानता बढ़ सकती है।

    क्या है कुलीनतंत्र, जिस पर सैंडर्स ने उठाए सवाल?

    कुलीनतंत्र यानी ओलिगार्की ऐसी व्यवस्था को कहा जाता है, जिसमें राजनीतिक शक्ति कुछ चुनिंदा अमीर या प्रभावशाली लोगों के हाथों में केंद्रित हो जाती है। बर्नी सैंडर्स लंबे समय से इस विचार की आलोचना करते रहे हैं कि अरबपतियों की विशाल संपत्ति उन्हें चुनावों और सरकारी नीतियों को प्रभावित करने की असाधारण क्षमता देती है।

    चुनावी अभियानों में बड़ी रकम खर्च करने वाले दानदाता विज्ञापन, प्रचार और मतदाताओं तक पहुंच बनाने के प्रयासों को वित्तीय मदद दे सकते हैं। इससे उनके समर्थन वाले उम्मीदवारों और मुद्दों को अधिक दृश्यता मिल सकती है। हालांकि, राजनीतिक चंदा देना अपने आप में किसी उम्मीदवार या दल पर नियंत्रण साबित नहीं करता।

    भारत में स्टारलिंक की एंट्री को लेकर भी चर्चा

    अमेरिका में राजनीतिक चंदे पर उठे सवालों के बीच भारत में एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक की कारोबारी योजनाएं भी चर्चा में हैं। कंपनी भारतीय सैटेलाइट इंटरनेट बाजार में सेवाएं शुरू करना चाहती है और इसके लिए जरूरी नियामकीय प्रक्रियाओं से गुजर रही है।

    भारत में दूरसंचार और सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा, नियमों और बाजार में कंपनियों की भूमिका को लेकर बहस होती रही है। वहीं, अमेरिका में मस्क के राजनीतिक योगदान को लेकर सैंडर्स की आलोचना ने अरबपतियों के चुनावी प्रभाव पर नई चर्चा छेड़ दी है।

    दोनों मामलों का संदर्भ अलग है, लेकिन इनके केंद्र में बड़ी कंपनियों और अत्यधिक संपत्ति वाले कारोबारियों की भूमिका है। जहां भारत में स्टारलिंक की कारोबारी योजनाओं के लिए नियामकीय मंजूरी अहम है, वहीं अमेरिका में मस्क के चुनावी चंदे ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बड़े दानदाताओं के प्रभाव को लेकर सवाल खड़े किए हैं।

  • इल्हान उमर के घर संघीय एजेंसियों की छापेमारी, ट्रंप ने बताया ‘बेईमान’, इमिग्रेशन फ्रॉड की जांच का दावा

    इल्हान उमर के घर संघीय एजेंसियों की छापेमारी, ट्रंप ने बताया ‘बेईमान’, इमिग्रेशन फ्रॉड की जांच का दावा


    नई दिल्‍ली । अमेरिका में सांसद इल्हान उमर के वाशिंगटन स्थित घर पर संघीय एजेंसियों की कार्रवाई के बाद राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उमर को ‘बेईमान’ और ‘बुरा इंसान’ बताते हुए कहा कि न्याय विभाग उनके मामले को देख रहा है। वहीं, उमर ने इस कार्रवाई को राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने और संघीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों का दुरुपयोग करने की कोशिश बताया है।

    अमेरिकी न्याय विभाग के अनुसार, होमलैंड सिक्योरिटी इन्वेस्टिगेशंस (HSI) के एजेंटों ने अदालत से जारी वारंट के आधार पर यह कार्रवाई की। मामले से जुड़े एक व्यक्ति के मुताबिक, छापेमारी कथित इमिग्रेशन धोखाधड़ी की जांच का हिस्सा है। हालांकि, जांच के आरोपों को लेकर अभी कोई अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है।

    ट्रंप पहले भी लगा चुके हैं आरोप

    राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले भी इल्हान उमर को लेकर तीखी टिप्पणियां कर चुके हैं। वह आरोप लगाते रहे हैं कि उमर अमेरिका में अवैध तरीके से आई थीं और देश में प्रवेश पाने के लिए उन्होंने अपने भाई से शादी की थी। इन आरोपों को लेकर ट्रंप कई बार उन पर तंज कस चुके हैं।

    अब घर पर संघीय एजेंसियों की कार्रवाई के बाद ट्रंप ने उमर को पूरी तरह बेईमान और बुरा इंसान बताया। उन्होंने कहा कि न्याय विभाग इस मामले को देख रहा है। हालांकि, ट्रंप की टिप्पणियां अपने आप में जांच के आरोपों को साबित नहीं करतीं।

    अदालत के वारंट पर हुई कार्रवाई

    अमेरिकी न्याय विभाग के प्रवक्ता ने पुष्टि की कि वाशिंगटन डीसी में विभाग की ओर से सुरक्षित किए गए अदालत के वारंट के तहत कार्रवाई की गई। इसे जारी संघीय जांच का हिस्सा बताया गया है।

    रिपोर्ट के मुताबिक, सोमवार को इल्हान उमर के घर के बाहर होमलैंड सिक्योरिटी इन्वेस्टिगेशंस की जैकेट पहने कई एजेंट दिखाई दिए। जांच से जुड़े एक व्यक्ति ने इसे कथित इमिग्रेशन फ्रॉड से संबंधित बताया है। फिलहाल उपलब्ध जानकारी में जांच के निष्कर्ष या आरोपों की पुष्टि नहीं हुई है।

    इल्हान उमर बोलीं- राजनीतिक विरोधियों को बनाया जा रहा निशाना

    इल्हान उमर ने कार्रवाई के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर कहा कि वह ठीक हैं। उन्होंने ट्रंप प्रशासन पर राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने और संघीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करने का आरोप लगाया।

    उमर ने कहा कि पिछले दस वर्षों से ट्रंप उन्हें कथित तौर पर बेबुनियाद आरोपों और बदनाम करने वाले अभियानों के जरिए निशाना बनाते रहे हैं। उनके मुताबिक, घर पर हुई कार्रवाई राजनीतिक डराने-धमकाने की उसी कोशिश का नया कदम है। उन्होंने यह भी कहा कि वह चुप नहीं रहेंगी।

    इस घटनाक्रम ने अमेरिका में राजनीतिक टकराव को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। एक ओर न्याय विभाग ने कार्रवाई को जारी संघीय जांच का हिस्सा बताया है, वहीं उमर इसे राजनीतिक प्रतिशोध करार दे रही हैं। जांच के नतीजों से ही स्पष्ट हो सकेगा कि मामले में लगाए जा रहे आरोपों के समर्थन में क्या तथ्य सामने आते हैं।

  • दक्षिण कोरिया ने 6,174 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक रफ्तार वाले हाइपरसोनिक ग्लाइड वाहन का पहला सफल परीक्षण किया

    दक्षिण कोरिया ने 6,174 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक रफ्तार वाले हाइपरसोनिक ग्लाइड वाहन का पहला सफल परीक्षण किया

    नई दिल्ली ।दक्षिण कोरिया ने अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में हाइपरसोनिक ग्लाइड वाहन (एचजीवी) का पहला सफल परीक्षण किया है। देश में विकसित इस मिसाइल ने परीक्षण के दौरान 6,174 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक की गति से उड़ान भरी और रास्ते में अपनी दिशा बदलते हुए समुद्र में निर्धारित लक्ष्य को सटीक निशाना बनाया। इस परीक्षण को दक्षिण कोरिया की तकनीकी प्रगति और स्वदेशी रक्षा तकनीक विकसित करने के प्रयासों में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। हालांकि, इसके साथ ही पूर्वी एशिया में मिसाइल तकनीक को लेकर प्रतिस्पर्धा बढ़ने की आशंका भी जताई गई है।

    इस परीक्षण को दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे म्युंग ने भी देखा। उन्होंने हाइपरसोनिक ग्लाइड वाहन को कोरियाई प्रायद्वीप में महत्वपूर्ण लक्ष्यों पर अचानक और सटीक हमला करने में सक्षम रणनीतिक संपत्ति बताया। राष्ट्रपति की इस टिप्पणी से इस हथियार की रणनीतिक भूमिका का संकेत मिलता है। दक्षिण कोरिया अब इस तकनीक को और विकसित करने की तैयारी कर रहा है, ताकि अपनी रक्षा क्षमता को मजबूत बनाया जा सके।

    परीक्षण के दौरान हाइपरसोनिक ग्लाइड वाहन ने बूस्टर से अलग होने के बाद निर्धारित उड़ान मार्ग पूरा किया। इसके बाद यह ऊंचाई से नीचे उतरा और उड़ान के दौरान क्षैतिज तथा ऊर्ध्वाधर दिशाओं में बदलाव करते हुए लक्ष्य तक पहुंचा। इस तरह की उड़ान प्रक्रिया में तेज गति के साथ दिशा बदलने की क्षमता का परीक्षण किया जाता है। मिसाइल ने निर्धारित लक्ष्य पर सटीक निशाना लगाकर अपनी उड़ान और नियंत्रण प्रणालियों के प्रदर्शन को प्रदर्शित किया।

    इस परीक्षण का उद्देश्य केवल मिसाइल की गति और लक्ष्य तक पहुंचने की क्षमता जांचना नहीं था। इसके जरिए उच्च तापमान सहन करने वाली सामग्री, मार्गदर्शन प्रणाली और नियंत्रण तकनीक का भी परीक्षण किया गया। हाइपरसोनिक गति पर उड़ने वाले हथियारों के विकास में इन तकनीकों की अहम भूमिका होती है। दक्षिण कोरिया की ओर से स्वदेशी स्तर पर इस प्रणाली को विकसित करना उसकी रक्षा संबंधी तकनीकी क्षमता को आगे बढ़ाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।

    हाइपरसोनिक ग्लाइड वाहन पारंपरिक बैलिस्टिक मिसाइलों से अलग तरीके से उड़ान भरते हैं। ये उड़ान के दौरान अपनी दिशा बदल सकते हैं और अपेक्षाकृत कम ऊंचाई पर तेज गति से आगे बढ़ सकते हैं। इनके मार्ग में बदलाव करने की क्षमता के कारण इन्हें रोकना अधिक कठिन हो सकता है। यही विशेषताएं इन्हें आधुनिक सैन्य रणनीति में महत्वपूर्ण बनाती हैं। हालांकि, किसी हथियार को रोकने की वास्तविक क्षमता उसकी तकनीकी विशेषताओं और संबंधित रक्षा प्रणालियों पर भी निर्भर करती है।

    दक्षिण कोरिया इस मिसाइल परीक्षण को अपनी किल चेन और प्रतिरोधक रणनीति का हिस्सा मान रहा है। किल चेन उसकी ऐसी रणनीतिक व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य संभावित खतरे की पहचान कर महत्वपूर्ण लक्ष्यों के खिलाफ कार्रवाई करने की क्षमता विकसित करना है। इस दिशा में हाइपरसोनिक तकनीक का विकास देश की स्वतंत्र रक्षा क्षमता को मजबूत करने के प्रयासों से जुड़ा है।

    यह परीक्षण उत्तर कोरिया की बढ़ती सैन्य क्षमताओं के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। दोनों देशों के बीच हाइपरसोनिक मिसाइल तकनीक को लेकर प्रतिस्पर्धा क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन को प्रभावित कर सकती है। दक्षिण कोरिया का सफल परीक्षण पूर्वी एशिया में हथियारों की प्रतिस्पर्धा को और तेज करने की आशंका पैदा करता है। ऐसे में इस तकनीक का आगे होने वाला विकास और उसका रणनीतिक इस्तेमाल क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति के लिहाज से महत्वपूर्ण रहेगा।