Category: International

  • पूर्व पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान की मौत की अटकलों पर विवाद बढ़ा, सैन्य प्रवक्ता के खंडन के बाद PTI का अलग दावा

    पूर्व पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान की मौत की अटकलों पर विवाद बढ़ा, सैन्य प्रवक्ता के खंडन के बाद PTI का अलग दावा

    नई दिल्ली । पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के संस्थापक इमरान खान की जेल में मौत की खबर सामने आने के बाद देश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। अमेरिका में रह रहे पत्रकार वजाहत एस. खान ने सैन्य सूत्रों के हवाले से इमरान खान की मौत को लेकर आशंका जताने का दावा किया। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनके सूत्रों ने इमरान खान को मृत अवस्था में नहीं देखा है।

    इमरान खान की मौत से जुड़े इस दावे के बाद पाकिस्तान में राजनीतिक और सार्वजनिक स्तर पर चर्चाएं तेज हो गईं। हालांकि, पाकिस्तान सेना के मीडिया विंग इंटर-सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस यानी ISPR ने इन खबरों को मनगढ़ंत और झूठा करार दिया है। इसलिए फिलहाल इमरान खान की मौत की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

    इमरान खान अगस्त 2023 से रावलपिंडी की अदियाला जेल में बंद हैं। उनकी गिरफ्तारी के बाद से उनकी पार्टी PTI और पाकिस्तान के सैन्य प्रतिष्ठान के बीच तनाव बना हुआ है। ऐसे में जेल में उनकी स्थिति को लेकर सामने आई किसी भी खबर का राजनीतिक असर काफी व्यापक माना जा रहा है।

    इस बीच PTI ने इमरान खान की स्थिति को लेकर अलग दावा किया है। पार्टी के अनुसार, उनके परिवार के सदस्यों ने जेल की CCTV लाइव फीड में इमरान खान को देखा है। पार्टी का यह दावा सेना की ओर से मौत की खबरों को झूठा बताए जाने के बाद सामने आया है।

    PTI लंबे समय से इमरान खान की स्वास्थ्य स्थिति और जेल में उनके परिवार, वकीलों तथा चिकित्सकों से मुलाकात को लेकर सवाल उठाती रही है। पार्टी का आरोप है कि इमरान खान से मिलने पर प्रतिबंधों के कारण उनके स्वास्थ्य की जानकारी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं हो पा रही है।

    इमरान खान की बहन डॉ. उजमा और पार्टी नेताओं ने भी उनकी सुरक्षा तथा स्वास्थ्य को लेकर चिंता व्यक्त की है। PTI की ओर से उनकी आंखों की रोशनी और इलाज से जुड़े मुद्दों को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। पार्टी का कहना है कि परिवार और चिकित्सकों को उनसे नियमित मुलाकात की अनुमति मिलनी चाहिए।

    इमरान खान की जेल में स्थिति को लेकर विवाद ऐसे समय सामने आया है जब पाकिस्तान में PTI समर्थक उनकी रिहाई की मांग लगातार उठाते रहे हैं। हाल के दिनों में उनकी रिहाई और राजनीतिक अधिकारों को लेकर समर्थकों की गतिविधियां भी चर्चा में रही हैं।

    इमरान खान की गिरफ्तारी के बाद पाकिस्तान की राजनीति में PTI और सैन्य प्रतिष्ठान के बीच टकराव लगातार बना हुआ है। ऐसे माहौल में उनकी मौत की अपुष्ट खबर ने राजनीतिक तनाव को और बढ़ा दिया है। हालांकि, किसी भी दावे की पुष्टि के लिए आधिकारिक जानकारी और विश्वसनीय प्रत्यक्ष प्रमाण जरूरी हैं।

    फिलहाल उपलब्ध जानकारी में इमरान खान की मौत की पुष्टि नहीं हुई है। पाकिस्तान सेना के मीडिया विंग ने मौत से जुड़ी खबरों को झूठा बताया है, जबकि PTI ने CCTV के आधार पर उनके जीवित होने का दावा किया है। इन विरोधाभासी दावों के बीच इमरान खान की वास्तविक स्थिति को लेकर आधिकारिक और स्वतंत्र रूप से सत्यापित जानकारी का इंतजार बना हुआ है।

    ऐसे में सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से सामने आ रही अपुष्ट खबरों को लेकर सावधानी बरतना जरूरी है। इमरान खान की स्थिति से जुड़ी कोई निर्णायक जानकारी सामने आने पर ही उनकी मौत या स्वास्थ्य को लेकर अंतिम निष्कर्ष निकाला जा सकता है।

  • रावलपिंडी में पाक सेना मुख्यालय के बाहर गोलीबारी, एक सैनिक की मौत, दो घायल

    रावलपिंडी में पाक सेना मुख्यालय के बाहर गोलीबारी, एक सैनिक की मौत, दो घायल

    इस्लामाबाद। पाकिस्तान के रावलपिंडी स्थित सेना मुख्यालय (GHQ) के बाहर सोमवार को एक हथियारबंद व्यक्ति ने गोलीबारी कर दी। सुरक्षा बलों की जवाबी कार्रवाई में हमलावर मारा गया। घटना में पाकिस्तान सेना का एक जवान भी मारा गया, जबकि दो सुरक्षाकर्मी घायल बताए गए हैं।

    स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार हथियारबंद व्यक्ति GHQ के मुख्य प्रवेश द्वार के निकट पहुंच गया था। इसके बाद उसने सुरक्षाकर्मियों पर गोलीबारी शुरू कर दी। सुरक्षा बलों ने तत्काल मोर्चा संभालते हुए जवाबी कार्रवाई की और हमलावर को मार गिराया। घायलों को उपचार के लिए अस्पताल पहुंचाया गया है।

    GHQ परिसर के आसपास बढ़ाई गई सुरक्षा

    घटना के बाद रावलपिंडी कैंट क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई। GHQ के आसपास के मार्गों पर आवाजाही प्रतिबंधित करते हुए सुरक्षा बलों ने तलाशी अभियान शुरू किया। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि हमलावर किस उद्देश्य से सैन्य मुख्यालय के प्रवेश द्वार तक पहुंचा और उसके पीछे कौन लोग या संगठन थे।

    प्रारंभिक रिपोर्टों में हमलावर के पास विस्फोटक होने की बात भी सामने आई है, हालांकि इसकी स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। सुरक्षा एजेंसियां मौके से मिले हथियार और अन्य सामग्री की जांच कर रही हैं।

    हमले की जांच जारी

    घटना के बाद सैन्य प्रतिष्ठानों की सुरक्षा को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। जांच एजेंसियां हमलावर की पहचान, उसके संभावित सहयोगियों और घटना के पीछे की वजह का पता लगाने में जुटी हैं। फिलहाल किसी संगठन ने हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है।

    रावलपिंडी स्थित GHQ पाकिस्तान सेना का प्रमुख मुख्यालय है और यहां सेना के शीर्ष अधिकारी काम करते हैं। घटना के बाद आसपास के इलाके में सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ा दी गई है।

  • चीन के स्पेस मिशन को बड़ा झटका, लॉन्च के कुछ ही देर बाद रॉकेट में विस्फोट; संचार उपग्रह नष्ट

    चीन के स्पेस मिशन को बड़ा झटका, लॉन्च के कुछ ही देर बाद रॉकेट में विस्फोट; संचार उपग्रह नष्ट


    नई दिल्ली। चीन के महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष कार्यक्रम को सोमवार रात बड़ा झटका लगा जब लॉन्ग मार्च 7A रॉकेट लॉन्च के कुछ ही समय बाद हवा में विस्फोट का शिकार हो गया। रॉकेट अपने साथ झोंगशिंग 4B यानी चाइनासैट 4B संचार उपग्रह लेकर उड़ान भर रहा था लेकिन मिशन के शुरुआती चरण में ही रॉकेट में गंभीर तकनीकी असामान्यता सामने आई और करीब 85 सेकंड बाद वह आसमान में टूटकर आग के विशाल गोले में बदल गया। इस दुर्घटना के साथ ही रॉकेट में मौजूद संचार उपग्रह भी नष्ट हो गया और चीन का यह अंतरिक्ष मिशन पूरी तरह विफल हो गया।

    यह प्रक्षेपण चीन के हैनान द्वीप स्थित वेनचांग स्पेस लॉन्च सेंटर से किया गया था। लॉन्च के बाद शुरुआती कुछ सेकंड तक रॉकेट सामान्य तरीके से आगे बढ़ता दिखाई दिया लेकिन करीब डेढ़ मिनट से भी कम समय बाद उसमें गड़बड़ी सामने आ गई। घटना से जुड़े वीडियो में रॉकेट को उड़ान भरने के कुछ ही देर बाद बिखरते और तेज आग की लपटों के बीच नष्ट होते देखा जा सकता है। हादसे के बाद मिशन से जुड़े अधिकारियों के बीच भी हलचल बढ़ गई। चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने घटना के करीब तीन घंटे बाद मिशन की विफलता की पुष्टि करते हुए बताया कि उड़ान के दौरान रॉकेट में तकनीकी असामान्यता उत्पन्न हुई थी।

    इस मिशन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा चाइनासैट 4B संचार उपग्रह था। इसे पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया जाना था और इसके जरिए रेडियो टेलीविजन तथा अन्य संचार सेवाओं को मजबूत करने की योजना थी। लेकिन रॉकेट के दुर्घटनाग्रस्त होने के कारण उपग्रह भी मिशन के साथ नष्ट हो गया। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि रॉकेट में तकनीकी समस्या किस स्तर पर उत्पन्न हुई और आखिर ऐसी कौन सी गड़बड़ी थी जिसके कारण उड़ान के शुरुआती चरण में ही पूरा मिशन असफल हो गया।

    चीन ने हादसे के कारणों का पता लगाने के लिए जांच शुरू कर दी है। शुरुआती जानकारी में तकनीकी असामान्यता को दुर्घटना की वजह बताया गया है लेकिन विस्तृत जांच के बाद ही यह साफ हो सकेगा कि समस्या रॉकेट के इंजन ईंधन प्रणाली नियंत्रण प्रणाली या किसी अन्य महत्वपूर्ण हिस्से में थी। चीन के सरकारी मीडिया में हादसे को लेकर सीमित जानकारी सामने आई है। वहीं चीनी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामने आए कुछ वीडियो की उपलब्धता भी सीमित दिखाई दी। ऐसे में हादसे की वास्तविक परिस्थितियों को लेकर फिलहाल आधिकारिक जांच के नतीजों का इंतजार किया जा रहा है।

    लॉन्ग मार्च 7A को चीन के महत्वपूर्ण प्रक्षेपण वाहनों में गिना जाता है और इसे उसके अंतरिक्ष कार्यक्रम का वर्कहॉर्स भी कहा जाता है। इसका विकास चाइना एकेडमी ऑफ लॉन्च व्हीकल टेक्नोलॉजी ने किया है जो चाइना एयरोस्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी कॉरपोरेशन की सहायक इकाई है। यह लॉन्ग मार्च 7A का 18वां मिशन था। इससे पहले वर्ष 2020 में अपनी पहली उड़ान के दौरान इसे असफलता का सामना करना पड़ा था लेकिन उसके बाद रॉकेट ने कई सफल मिशन पूरे किए थे। ऐसे में ताजा दुर्घटना चीन के लिए तकनीकी रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

    चीन इस समय अंतरिक्ष क्षेत्र में अपनी क्षमताओं को तेजी से बढ़ाने में जुटा है। अमेरिका के साथ पुनः प्रयोज्य रॉकेट तकनीक उपग्रह प्रक्षेपण चंद्र मिशन और अंतरिक्ष अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने वर्ष 2050 तक देश को अंतरिक्ष विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में वैश्विक अग्रणी शक्ति बनाने का लक्ष्य रखा है। ऐसे समय में एक महत्वपूर्ण रॉकेट और संचार उपग्रह का एक साथ नष्ट होना उसके अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए बड़ा झटका है। अब जांच के निष्कर्षों पर नजर रहेगी क्योंकि उनसे भविष्य के लॉन्ग मार्च मिशनों की सुरक्षा और विश्वसनीयता को लेकर महत्वपूर्ण संकेत मिल सकते हैं।

  • पुतिन के बड़े सैन्य प्लान से मचा हड़कंप, 5 लाख सैनिकों की तैयारी के बीच यूक्रेन युद्ध में परमाणु हमले का खतरा?

    पुतिन के बड़े सैन्य प्लान से मचा हड़कंप, 5 लाख सैनिकों की तैयारी के बीच यूक्रेन युद्ध में परमाणु हमले का खतरा?


    नई दिल्ली। यूक्रेन और रूस के बीच जारी युद्ध अब एक बार फिर बेहद खतरनाक मोड़ की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने खुफिया रिपोर्टों के हवाले से दावा किया है कि रूस बड़े पैमाने पर नए लड़ाकों को जुटाने की तैयारी कर रहा है। बताया जा रहा है कि आने वाले कुछ हफ्तों में करीब पांच लाख लोगों को सैन्य अभियान में शामिल करने की योजना बनाई जा सकती है। अगर यह दावा सही साबित होता है तो युद्ध की दिशा और उसकी तीव्रता दोनों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

    जेलेंस्की के मुताबिक रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन युद्ध रोकने की तैयारी में नहीं हैं बल्कि संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए बड़े स्तर पर मोबिलाइजेशन की योजना बना रहे हैं। यूक्रेनी खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट के अनुसार यह प्रक्रिया सितंबर में होने वाले रूसी संसदीय चुनावों के बाद शुरू की जा सकती है। जेलेंस्की का दावा है कि रूस इस बार खुले तौर पर बड़ी संख्या में लोगों की भर्ती करने से बच सकता है क्योंकि इससे रूसी समाज में असंतोष बढ़ने का खतरा है।

    यूक्रेनी राष्ट्रपति ने यह भी चेतावनी दी है कि इतनी बड़ी संख्या में लोगों को कम समय में पर्याप्त सैन्य प्रशिक्षण देना मुश्किल होगा। ऐसे में बड़ी संख्या में कम प्रशिक्षित सैनिकों को युद्ध के मैदान में भेजे जाने की आशंका है। इससे संघर्ष और ज्यादा खूनी हो सकता है और दोनों पक्षों में जनहानि बढ़ सकती है। जेलेंस्की के अनुसार रूस की ऐसी तैयारी इस बात का संकेत है कि मॉस्को फिलहाल युद्ध को समाप्त करने के बजाय सैन्य दबाव बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहा है।

    इसी बीच तुर्की के विदेश मंत्री हाकन फिदान ने भी यूक्रेन युद्ध को लेकर बेहद गंभीर चेतावनी दी है। उन्होंने आशंका जताई है कि अगर यूक्रेन रूसी क्षेत्र के भीतर लंबी दूरी के हमलों को और प्रभावी बनाता है और युद्ध की पारंपरिक सीमाएं लगातार टूटती जाती हैं तो रूस अपने सबसे खतरनाक विकल्पों पर विचार कर सकता है। फिदान ने परमाणु हथियारों की आशंका का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसी स्थिति बेहद खतरनाक हो सकती है।

    रूस और यूक्रेन के बीच हाल के दिनों में लंबी दूरी के ड्रोन और मिसाइल हमलों में भी तेजी देखी गई है। रूस के तातारस्तान क्षेत्र में हुए एक यूक्रेनी ड्रोन हमले में कई लोगों के मारे जाने की खबर सामने आई है। इसे रूस के भीतर हुए गंभीर हमलों में से एक माना जा रहा है। दूसरी ओर यूक्रेन के खार्किव क्षेत्र में रूसी हमले में भी लोगों की मौत की जानकारी सामने आई है।

    रूस और यूक्रेन दोनों ही एक दूसरे के इलाकों में लगातार ड्रोन हमले कर रहे हैं। रूसी रक्षा मंत्रालय ने बड़े पैमाने पर यूक्रेनी ड्रोन को मार गिराने का दावा किया है जबकि यूक्रेन ने भी रूस की ओर से बड़ी संख्या में ड्रोन दागे जाने की बात कही है। दोनों पक्षों के इन दावों के बीच जमीन से लेकर आसमान तक संघर्ष लगातार तेज होता जा रहा है।

    अगर रूस वास्तव में पांच लाख नए लड़ाकों को जुटाने की दिशा में आगे बढ़ता है तो इसका असर केवल यूक्रेन तक सीमित नहीं रहेगा। इससे यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है और पश्चिमी देशों की सैन्य रणनीति में भी बदलाव की जरूरत पड़ सकती है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि यदि युद्ध और ज्यादा गहरा हुआ तो परमाणु हथियारों की आशंका भी अंतरराष्ट्रीय तनाव को खतरनाक स्तर तक पहुंचा सकती है। फिलहाल पांच लाख सैनिकों की संभावित लामबंदी का दावा यूक्रेनी खुफिया रिपोर्टों पर आधारित है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है लेकिन इस खबर ने रूस यूक्रेन युद्ध को लेकर पूरी दुनिया की चिंता जरूर बढ़ा दी है।

  • मोजतबा खामेनेई को लेकर अटकलों के बीच बड़ा अपडेट, पेजेशकियन से मुलाकात में बनी आगे की रणनीति

    मोजतबा खामेनेई को लेकर अटकलों के बीच बड़ा अपडेट, पेजेशकियन से मुलाकात में बनी आगे की रणनीति


    नई दिल्ली। ईरान में जारी गंभीर संकट और बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई ने राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के साथ लंबी बैठक की है। यह मुलाकात ऐसे समय हुई है जब मोजतबा खामेनेई के सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आने को लेकर लगातार कई तरह की चर्चाएं चल रही थीं। राष्ट्रपति पेजेशकियन के मुताबिक दोनों नेताओं के बीच करीब सात घंटे तक बातचीत हुई और इस दौरान देश की आंतरिक स्थिति से लेकर आर्थिक चुनौतियों और अमेरिका के दबाव तक कई अहम मुद्दों पर चर्चा की गई।

    पेजेशकियन ने एक इंटरव्यू में बताया कि बैठक में सबसे ज्यादा जोर ईरान के भीतर एकता बनाए रखने पर रहा। उनका कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल बाहरी दबाव नहीं बल्कि आंतरिक मतभेद भी हैं। ईरानी नेतृत्व का मानना है कि विरोधी ताकतें देश में विभाजन पैदा करने की कोशिश कर सकती हैं और ऐसे समय में राजनीतिक नेतृत्व तथा जनता के बीच सहयोग बेहद जरूरी है।

    मोजतबा खामेनेई को मार्च में ईरान का नया सर्वोच्च नेता नियुक्त किया गया था। उनके पिता अयातुल्ला अली खामेनेई की अमेरिका और इजरायल से जुड़े हमले में मौत के बाद उन्हें यह जिम्मेदारी मिली थी। पद संभालने के बाद से मोजतबा की सार्वजनिक मौजूदगी बेहद सीमित रही है। इसी वजह से उनके स्वास्थ्य और सुरक्षा को लेकर कई तरह की अटकलें भी सामने आती रही हैं। राष्ट्रपति के साथ उनकी यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब ईरान अमेरिका के साथ बेहद तनावपूर्ण स्थिति से गुजर रहा है।

    बैठक में आम लोगों की रोजमर्रा की परेशानियों पर भी चर्चा हुई। पेजेशकियन के अनुसार बाजार की स्थिति रोजगार आवास और अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण पैदा हो रही आर्थिक दिक्कतें प्रमुख मुद्दों में शामिल रहीं। ईरानी नेतृत्व के सामने चुनौती यह है कि बाहरी दबाव के बीच देश की अर्थव्यवस्था और आम नागरिकों की जरूरतों को किस तरह संभाला जाए।

    अमेरिका के साथ विवाद में ईरान ने अपना रुख भी काफी सख्त रखा है। ईरान चाहता है कि उसके बंदरगाहों पर लगी नाकाबंदी खत्म की जाए। इसके अलावा युद्ध के दौरान हुए नुकसान का मुआवजा आर्थिक प्रतिबंध हटाने और विदेशों में जब्त की गई ईरानी संपत्तियों को जारी करने की मांग भी की गई है। ईरान ने स्पष्ट संकेत दिया है कि इन मुद्दों पर समाधान के बिना होर्मुज जलडमरूमध्य को स्थायी रूप से खोलने का फैसला आसान नहीं होगा।

    होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के लिए बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। सामान्य परिस्थितियों में वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। इसलिए इस क्षेत्र में जारी तनाव का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। ईरान ओमान के साथ भी जलमार्ग से जुड़ी आवाजाही को लेकर बातचीत कर रहा है।

    इसी बीच ईरान ने अपनी सुरक्षा व्यवस्था में भी महत्वपूर्ण बदलाव किया है। पूर्व रिवोल्यूशनरी गार्ड कमांडर मोहसेन रेजाई को सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल का प्रमुख बनाया गया है। लंबे समय तक रिवोल्यूशनरी गार्ड का नेतृत्व कर चुके रेजाई को सख्त रुख के लिए जाना जाता है। उन्होंने अमेरिका को चेतावनी भी दी है कि यदि ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी जारी रही तो अमेरिकी सैनिकों को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

    इस पूरे घटनाक्रम से साफ है कि मोजतबा खामेनेई के नेतृत्व में ईरान फिलहाल आंतरिक एकता आर्थिक स्थिरता और राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता दे रहा है। अमेरिका के साथ बातचीत की संभावना बनी हुई है लेकिन ईरान अपनी शर्तों पर समझौते की कोशिश करता दिखाई दे रहा है। आने वाले दिनों में मोजतबा खामेनेई की रणनीति और होर्मुज को लेकर ईरान का फैसला पूरे क्षेत्र की राजनीति और वैश्विक बाजार के लिए बेहद अहम साबित हो सकता है।

  • अमेरिका ईरान से क्यों मांग रहा मुआवजा? ट्रंप ने रखी लंबी सूची, शांति वार्ता पर भी डाला नया दबाव

    अमेरिका ईरान से क्यों मांग रहा मुआवजा? ट्रंप ने रखी लंबी सूची, शांति वार्ता पर भी डाला नया दबाव


    नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अब मुआवजे का मुद्दा उठाकर विवाद को एक नया मोड़ दे दिया है। ट्रंप ने कहा है कि यदि ईरान पिछले कुछ महीनों में हुए नुकसान के लिए मुआवजे की मांग कर सकता है तो अमेरिका भी उससे मुआवजा मांग सकता है। ट्रंप ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए साफ संकेत दिया कि भविष्य में अमेरिका और ईरान के बीच होने वाली बातचीत में यह मुद्दा प्रमुखता से उठाया जाएगा। उनके इस रुख से दोनों देशों के बीच पहले से जारी तनाव और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

    ट्रंप ने अपनी पोस्ट में कहा कि उन्हें यह विचार दिलचस्प लगा कि ईरान हालिया संघर्ष में हुए नुकसान की भरपाई की मांग कर रहा है। इसी आधार पर उन्होंने अमेरिका की ओर से भी ईरान से मुआवजा मांगने की बात कही। अमेरिकी राष्ट्रपति ने दावा किया कि ईरान से जुड़े संघर्षों में कई अमेरिकी नागरिकों और सैन्यकर्मियों की जान गई है जबकि बड़ी संख्या में लोग घायल भी हुए हैं। ट्रंप का कहना है कि ऐसे पीड़ित परिवारों को मुआवजा मिलना चाहिए।

    अपने बयान में ट्रंप ने पुराने हमलों का भी उल्लेख किया। उन्होंने यमन के बंदरगाह पर अमेरिकी नौसेना के युद्धपोत यूएसएस कोल पर हुए घातक हमले का हवाला दिया। अक्टूबर 2000 में हुए इस हमले में 17 अमेरिकी नाविकों की मौत हुई थी और कई अन्य घायल हुए थे। इस हमले की जिम्मेदारी अलकायदा पर डाली गई थी। ट्रंप ने इसके अलावा जनरल कासिम सुलेमानी से जुड़े घटनाक्रम और दूसरे संघर्षों में मारे गए लोगों का भी जिक्र किया।

    ट्रंप ने कहा कि पिछले कई दशकों के दौरान विरोध प्रदर्शनों और विभिन्न संघर्षों में मारे गए लोगों के परिवारों को भी मुआवजे की सूची में शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने पिछले पांच महीनों में मारे गए हजारों लोगों के परिजनों के लिए भी नुकसान की भरपाई की बात कही। हालांकि इन दावों और मुआवजे की संभावित प्रक्रिया को लेकर अभी विस्तृत आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।

    अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि उन्होंने अपने प्रतिनिधियों को इस मुद्दे को भविष्य की बातचीत में शामिल करने के निर्देश दे दिए हैं। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने और संभावित समझौते को लेकर बातचीत की कोशिशें चल रही हैं। ट्रंप ने इससे पहले संकेत दिया था कि वह सैन्य कार्रवाई बढ़ाने के बजाय ईरान पर आर्थिक दबाव बनाए रखने को प्राथमिकता दे सकते हैं।

    दूसरी ओर ईरान भी अमेरिका के सामने अपनी कई शर्तें रख रहा है। ईरान की ओर से खाड़ी क्षेत्र में जारी नाकाबंदी हटाने के साथ युद्ध के दौरान हुए नुकसान की भरपाई आर्थिक प्रतिबंधों में राहत और विदेशों में फंसी संपत्तियों को जारी करने जैसी मांगें उठाई गई हैं। ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर भी अपना रुख स्पष्ट रखा है और अमेरिका से क्षेत्रीय मामलों में हस्तक्षेप कम करने की मांग की है।

    ट्रंप ने यह भी संकेत दिया है कि अमेरिका फिलहाल ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ने का इंतजार कर रहा है। उनका मानना है कि महंगाई और कमजोर होती आर्थिक स्थिति ईरानी नेतृत्व को समझौते की दिशा में आगे बढ़ने के लिए मजबूर कर सकती है। ऐसे में दोनों देशों के बीच बातचीत भले ही जारी रहने के संकेत दे रही हो लेकिन मुआवजे युद्ध के नुकसान और होर्मुज जैसे मुद्दों ने समझौते की राह को और मुश्किल बना दिया है। आने वाले दिनों में ट्रंप का यह नया रुख अमेरिका ईरान संबंधों और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी असर डाल सकता है।

  • कोलंबिया में 7.4 तीव्रता का शक्तिशाली भूकंप, 77 लोगों की मौत, कई इमारतें क्षतिग्रस्त

    कोलंबिया में 7.4 तीव्रता का शक्तिशाली भूकंप, 77 लोगों की मौत, कई इमारतें क्षतिग्रस्त


    बोगोटा।
    दक्षिण अमेरिकी देश कोलंबिया में सोमवार सुबह आए शक्तिशाली भूकंप से भारी तबाही हुई है। रिक्टर पैमाने पर 7.4 तीव्रता के भूकंप के झटकों से पश्चिमी कोलंबिया के कई इलाकों में इमारतें क्षतिग्रस्त हो गईं और कई स्थानों पर लोग मलबे में फंस गए। अब तक कम से कम 77 लोगों की मौत की सूचना है। राहत एवं बचाव कार्य जारी रहने के कारण मृतकों की संख्या बढ़ने की आशंका है।

    भूकंप का केंद्र चोको प्रांत में सैन जोस डेल पालमार के निकट बताया गया है। भूकंप के झटके राजधानी बोगोटा सहित देश के कई हिस्सों में महसूस किए गए। रिसाराल्दा प्रांत में सबसे अधिक जनहानि की सूचना सामने आई है। पेरेइरा, काली, मनिजालेस और बुएनावेंचुरा समेत कई शहरों में इमारतों को नुकसान पहुंचा है। कुछ स्थानों पर इमारतें गिरने के कारण लोग मलबे में दब गए।

    भूकंप के झटके महसूस होते ही लोगों में अफरा-तफरी मच गई। बड़ी संख्या में लोग अपने घरों और इमारतों से बाहर निकलकर खुले स्थानों पर पहुंच गए। प्रशासन और आपातकालीन सेवाओं की टीमें प्रभावित क्षेत्रों में राहत एवं बचाव अभियान चला रही हैं। मलबे में फंसे लोगों को निकालने के प्रयास किए जा रहे हैं।

    आफ्टरशॉक्स का खतरा

    मुख्य भूकंप के बाद संभावित आफ्टरशॉक्स को लेकर भी प्रशासन सतर्क है। प्रभावित क्षेत्रों में इमारतों की सुरक्षा जांच की जा रही है। नागरिकों से क्षतिग्रस्त इमारतों से दूर रहने और प्रशासन की ओर से जारी सुरक्षा निर्देशों का पालन करने की अपील की गई है।

    भूकंप के झटके कोलंबिया के अलावा पड़ोसी इक्वाडोर में भी महसूस किए गए। हालांकि शुरुआती जानकारी में वहां बड़े पैमाने पर नुकसान की पुष्टि नहीं हुई है। अधिकारियों ने प्रभावित इलाकों में स्थिति पर नजर बनाए रखी है।

    राहत एजेंसियां लगातार नुकसान का आकलन कर रही हैं। मलबे में लोगों के दबे होने की आशंका के चलते बचाव अभियान को प्राथमिकता दी जा रही है। प्रशासन ने जरूरत पड़ने पर राजधानी बोगोटा और मेडेलिन से अतिरिक्त राहत एवं बचाव दल भेजने की तैयारी भी की है।

  • भारत से तनाव के बीच बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और पीओके की चुनौतियां पाकिस्तान की सुरक्षा रणनीति पर भारी

    भारत से तनाव के बीच बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और पीओके की चुनौतियां पाकिस्तान की सुरक्षा रणनीति पर भारी

    नई दिल्ली । पाकिस्तान इस समय कई स्तरों पर सुरक्षा और रणनीतिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। भारत के साथ जारी तनाव के अलावा बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और अफगानिस्तान से जुड़े मुद्दे उसकी आंतरिक और बाहरी सुरक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बने हुए हैं। इसी बीच ईरान और उसके समर्थक समूहों से जुड़ी संभावित परिस्थितियां भी पाकिस्तान के सामने अतिरिक्त दबाव पैदा कर रही हैं।

    हाल ही में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच मक्का रक्षा समझौते ने क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण को लेकर चर्चा बढ़ा दी है। इस समझौते को व्यापक इस्लामी सुरक्षा ढांचे की दिशा में महत्वपूर्ण कदम के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि पाकिस्तान के लिए इसकी वास्तविक उपयोगिता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह अपने मौजूदा सुरक्षा संकटों से किस तरह निपटता है।

    पाकिस्तान के सामने सबसे प्रमुख चुनौती भारत से जुड़ा सुरक्षा तनाव है। पिछले वर्ष मई में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सैन्य कार्रवाई में पाकिस्तान के कई सैन्य और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाए जाने का दावा किया गया था। इसके बाद पाकिस्तान के रक्षा ढांचे और एयरबेस की क्षमता को लेकर भी सवाल उठे।

    पाकिस्तान के भीतर बलूचिस्तान लंबे समय से सुरक्षा संकट का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। अलगाववादी गतिविधियों और हिंसक घटनाओं ने इस क्षेत्र में सरकार के नियंत्रण को चुनौती दी है। खैबर पख्तूनख्वा में भी आतंकवादी गतिविधियां पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियों के लिए लगातार परेशानी का कारण बनी हुई हैं।

    पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर भी राजनीतिक और सामाजिक असंतोष से जूझ रहा है। दूसरी ओर अफगानिस्तान के साथ सीमा और सुरक्षा संबंधी तनाव पाकिस्तान के लिए अलग चुनौती पेश करता है। इन परिस्थितियों के बीच ईरान के साथ क्षेत्रीय समीकरण भी महत्वपूर्ण हो गए हैं, खासकर तब जब मध्य पूर्व में तनाव का प्रभाव आसपास के देशों पर पड़ रहा है।

    तुर्की और सऊदी अरब के साथ रक्षा सहयोग पाकिस्तान को राजनीतिक और रणनीतिक समर्थन दे सकता है, लेकिन इससे उसकी सभी आंतरिक समस्याओं का समाधान अपने आप नहीं हो जाता। तुर्की नाटो का सदस्य है और उसकी अपनी मजबूत सैन्य क्षमता है। सऊदी अरब के लिए भी ईरान और हूती गतिविधियों से जुड़ी सुरक्षा चुनौतियां लंबे समय से महत्वपूर्ण रही हैं।

    भारत ने भी क्षेत्रीय स्तर पर अपने रक्षा और रणनीतिक संबंधों को मजबूत किया है। ग्रीस, साइप्रस और आर्मेनिया के साथ भारत के संबंधों में रक्षा सहयोग का महत्व बढ़ा है। इजरायल के साथ भारत की सैन्य और तकनीकी साझेदारी भी लंबे समय से महत्वपूर्ण मानी जाती है।

    ऐसे में मक्का रक्षा समझौता पाकिस्तान को एक व्यापक सुरक्षा ढांचे से जोड़ने की कोशिश जरूर है, लेकिन उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती उसके अपने घरेलू हालात हैं। यदि बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और पीओके जैसे क्षेत्रों में अस्थिरता बनी रहती है, तो बाहरी रक्षा सहयोग के बावजूद पाकिस्तान पर सुरक्षा और आर्थिक दबाव बढ़ सकता है।

    पाकिस्तान के लिए आने वाला समय इस लिहाज से महत्वपूर्ण रहेगा कि वह इन अलग-अलग मोर्चों पर एक साथ बढ़ते दबाव को किस तरह नियंत्रित करता है। सऊदी अरब और तुर्की का समर्थन उसके लिए रणनीतिक सहारा हो सकता है, लेकिन दीर्घकालिक स्थिरता के लिए आंतरिक सुरक्षा, राजनीतिक स्थिरता और आर्थिक क्षमता को मजबूत करना भी उतना ही जरूरी होगा।

  • रूस ने भारत तक रेल कनेक्शन की संभावना जताई, पाकिस्तान और ईरान के रास्ते व्यापारिक संपर्क बढ़ाने की तैयारी पर चर्चा

    रूस ने भारत तक रेल कनेक्शन की संभावना जताई, पाकिस्तान और ईरान के रास्ते व्यापारिक संपर्क बढ़ाने की तैयारी पर चर्चा

    नई दिल्ली । रूस और भारत के बीच व्यापारिक संपर्क को मजबूत करने के लिए एक नए जमीनी परिवहन मार्ग की संभावना पर चर्चा शुरू हुई है। रूस ने भारत तक पहुंचने वाले संभावित वैकल्पिक रास्तों पर विचार करने की बात कही है। प्रस्तावित मार्ग रूस से शुरू होकर तुर्कमेनिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के रास्ते हिंद महासागर तक पहुंच सकता है। हालांकि, अभी यह केवल प्रारंभिक प्रस्ताव है और किसी औपचारिक रेल परियोजना को मंजूरी नहीं मिली है।

    यह पहल ऐसे समय सामने आई है जब पश्चिम एशिया में तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े जोखिमों के कारण समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा को लेकर चिंता बनी हुई है। भारत और रूस के बीच बड़े पैमाने पर व्यापार वर्तमान में समुद्री मार्गों पर निर्भर है। ऐसे में किसी महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग में व्यवधान आने पर वैकल्पिक जमीनी नेटवर्क दोनों देशों के बीच माल ढुलाई के लिए अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध करा सकता है।

    रूस के उप प्रधानमंत्री मरात खुसनुलिन ने भारत तक पहुंचने वाले हर संभावित मार्ग पर विचार करने की जरूरत बताई है। उन्होंने बोस्फोरस और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े जोखिमों के मद्देनजर वैकल्पिक संपर्क मार्ग विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। प्रस्ताव का उद्देश्य केवल रेल संपर्क तक सीमित नहीं है, बल्कि रूस और भारत के बीच व्यापार को अधिक सुरक्षित और विविध परिवहन नेटवर्क उपलब्ध कराने से भी जुड़ा है।

    भारत के लिए ऐसा मार्ग ऊर्जा और व्यापार दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकता है। समुद्री मार्गों में किसी तरह की बाधा या शिपिंग लागत में वृद्धि की स्थिति में जमीनी परिवहन अतिरिक्त विकल्प दे सकता है। रूस से भारत आने वाले कच्चे तेल, उर्वरक और अन्य महत्वपूर्ण सामानों की आपूर्ति के लिए भी वैकल्पिक परिवहन नेटवर्क उपयोगी हो सकता है।

    दूसरी ओर, भारत से रूस को भेजे जाने वाले कृषि उत्पाद, दवाएं और मशीनरी जैसे सामानों के लिए भी जमीनी संपर्क समय और परिवहन लागत को प्रभावित कर सकता है। दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध बढ़ने के साथ परिवहन के नए विकल्पों की जरूरत भी बढ़ी है। ऐसे में प्रस्तावित मार्ग को व्यापक यूरेशियाई व्यापार नेटवर्क के संदर्भ में देखा जा रहा है।

    भारत पहले से ही अंतरराष्ट्रीय उत्तर दक्षिण परिवहन गलियारे के जरिए रूस और मध्य एशिया तक संपर्क बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। ईरान के चाबहार बंदरगाह के माध्यम से क्षेत्रीय संपर्क मजबूत करने की भारत की नीति भी इस प्रस्ताव से जुड़ सकती है। हालांकि, प्रस्तावित नए मार्ग में कई जटिल चुनौतियां मौजूद हैं।

    सबसे बड़ी चुनौती पाकिस्तान से जुड़ी है। प्रस्तावित मार्ग पाकिस्तान से होकर गुजरता है, जबकि भारत और पाकिस्तान के बीच जमीनी व्यापार लंबे समय से गंभीर प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। भारत के माल को पाकिस्तान से होकर गुजरने की अनुमति और ट्रांजिट अधिकार देना इस योजना के लिए महत्वपूर्ण कूटनीतिक प्रश्न होगा।

    अफगानिस्तान की सुरक्षा और बुनियादी ढांचे की स्थिति भी इस मार्ग के संचालन में बड़ी चुनौती बन सकती है। इसके अलावा अलग-अलग देशों में रेल गेज, सीमा शुल्क व्यवस्था, सीमा पार प्रक्रियाएं और नए बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए बड़े निवेश की आवश्यकता होगी।

    फिलहाल रूस का यह प्रस्ताव शुरुआती विचार के स्तर पर है। इसे वास्तविक रेल परियोजना में बदलने के लिए भारत समेत संबंधित देशों के बीच राजनीतिक सहमति, सुरक्षा व्यवस्था, तकनीकी समन्वय और आर्थिक व्यवहार्यता का आकलन जरूरी होगा। यदि भविष्य में इन बाधाओं का समाधान होता है, तो यह मार्ग भारत और रूस के बीच व्यापार के लिए समुद्री परिवहन के अलावा एक अतिरिक्त विकल्प बन सकता है।

  • PoK में विरोध के बीच तीसरे चरण का मतदान टला, PML-N ने 24 सीटें जीतीं और सरकार बनाने की स्थिति में पहुंची.

    PoK में विरोध के बीच तीसरे चरण का मतदान टला, PML-N ने 24 सीटें जीतीं और सरकार बनाने की स्थिति में पहुंची.

    नई दिल्ली । पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर यानी PoK में लगातार जारी विरोध प्रदर्शनों के बीच 10 अगस्त को होने वाले विधानसभा चुनाव के तीसरे चरण का मतदान अनिश्चितकाल के लिए टाल दिया गया है। तीसरे चरण में 11 सीटों पर मतदान होना था। चुनाव टलने से पहले दो चरणों में पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज यानी PML-N ने कुल 24 सीटों पर जीत दर्ज की थी। इन नतीजों के बाद पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में पहुंच गई थी, लेकिन तीसरे चरण की प्रक्रिया रुकने से चुनावी घटनाक्रम फिलहाल प्रभावित हुआ है।

    PoK विधानसभा में कुल 45 सीटें हैं। पहले दो चरणों में PML-N के पक्ष में आए नतीजों ने पार्टी को मजबूत स्थिति में पहुंचा दिया। हालांकि, तीसरे चरण के मतदान से पहले क्षेत्र में लगातार विरोध प्रदर्शन और तनाव की स्थिति बनी हुई थी। इसी कारण सोमवार को होने वाला मतदान टालने का फैसला लिया गया।

    चुनावी प्रक्रिया के दौरान हिंसा की घटनाएं भी सामने आई थीं। पहले चरण के चुनाव के दौरान अलग-अलग घटनाओं में कम से कम 19 लोगों की मौत होने की जानकारी सामने आई। कई स्थानों पर मतदान केंद्रों के आसपास झड़पों और विरोध प्रदर्शन की खबरें आईं। प्रदर्शनकारियों की ओर से चुनावी प्रक्रिया में धांधली के आरोप भी लगाए गए।

    जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी यानी JAAC इस आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभा रहा है। संगठन के समर्थकों ने सरकार की नीतियों और चुनावी व्यवस्था को लेकर विरोध दर्ज कराया है। संगठन की ओर से यह आरोप भी लगाया गया कि रावलकोट में प्रदर्शन के दौरान पाकिस्तानी सुरक्षा बलों की गोलीबारी में लोगों की मौत हुई। हालांकि, इन आरोपों को संबंधित घटनाक्रम के संदर्भ में जांच और स्वतंत्र पुष्टि की जरूरत है।

    JAAC की मांगें केवल महंगाई और स्थानीय सुविधाओं से जुड़े मुद्दों तक सीमित नहीं हैं। संगठन अब PoK को अधिक स्वायत्तता और राजनीतिक अधिकार देने की मांग भी उठा रहा है। उसकी प्रमुख मांग विधानसभा की 45 सीटों में से 12 आरक्षित सीटों को समाप्त करने की है।

    ये 12 सीटें उन कश्मीरी शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं, जो पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों में रहते हैं। JAAC का तर्क है कि PoK से बाहर रहने वाले लोगों को क्षेत्र की सरकार चुनने की प्रक्रिया में इस तरह की भूमिका नहीं मिलनी चाहिए। संगठन का मानना है कि आरक्षित सीटों के कारण स्थानीय मतदाताओं के राजनीतिक प्रभाव में कमी आती है।

    भारत ने PoK में चल रही चुनावी प्रक्रिया को मान्यता देने से इनकार किया है। भारत का आधिकारिक रुख है कि पाकिस्तान के पास उस क्षेत्र में राजनीतिक प्रक्रिया संचालित करने का अधिकार नहीं है, जिसे भारत अपना अभिन्न हिस्सा मानता है। भारत ने PoK में होने वाले चुनावों को पाकिस्तान के कब्जे को वैध दिखाने की कोशिश के तौर पर खारिज किया है।

    इस बीच पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और PML-N अध्यक्ष नवाज शरीफ का बयान भी चर्चा में रहा। उन्होंने कहा था कि यदि उनकी पार्टी PoK में जीत हासिल करती है तो वह शहबाज शरीफ से उन्हें PoK का प्रधानमंत्री बनाने के लिए कहेंगे। हालांकि, PoK के मौजूदा संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार प्रधानमंत्री का चुनाव विधानसभा के मुस्लिम सदस्यों में से होता है।

    PoK विधानसभा का सदस्य बनने के लिए संबंधित व्यक्ति का स्थायी निवासी होना और मतदाता सूची में नाम होना आवश्यक है। नवाज शरीफ इस चुनाव में किसी विधानसभा सीट से उम्मीदवार नहीं हैं। ऐसे में केवल PML-N अध्यक्ष होने या पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सहमति से वह सीधे PoK के प्रधानमंत्री नहीं बन सकते।

    फिलहाल तीसरे चरण के मतदान के स्थगित होने से चुनावी प्रक्रिया की अगली तारीख स्पष्ट नहीं है। विरोध प्रदर्शनों, सुरक्षा स्थिति और राजनीतिक मांगों के बीच चुनाव आयोग तथा संबंधित प्रशासन के सामने मतदान प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की चुनौती बनी हुई है। वहीं PML-N पहले दो चरणों के परिणामों के आधार पर मजबूत स्थिति में है, लेकिन अंतिम चुनावी तस्वीर तीसरे चरण की 11 सीटों पर मतदान के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट होगी।