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  • चीन को लेकर अमेरिका में बढ़ी चिंता: संवेदनशील प्रयोगशालाओं तक पहुंच पर उठे गंभीर सवाल

    चीन को लेकर अमेरिका में बढ़ी चिंता: संवेदनशील प्रयोगशालाओं तक पहुंच पर उठे गंभीर सवाल


    नई दिल्ली ।अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच अब अमेरिकी राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं में चीनी नागरिकों की मौजूदगी एक नया राजनीतिक और सुरक्षा मुद्दा बन गई है। अमेरिका के दो वरिष्ठ रिपब्लिकन सीनेटरों ने ट्रंप प्रशासन से इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने और संवेदनशील शोध संस्थानों तक विदेशी नागरिकों की पहुंच की समीक्षा करने की मांग की है। उनका कहना है कि यह केवल वैज्ञानिक सहयोग का मामला नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और तकनीकी श्रेष्ठता से जुड़ा गंभीर प्रश्न है।

    अर्कांसस से रिपब्लिकन सीनेटर टॉम कॉटन और यूटा से सीनेटर माइक ली ने अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट को एक विस्तृत पत्र लिखकर अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं। दोनों सांसदों का कहना है कि अमेरिकी ऊर्जा विभाग की राष्ट्रीय प्रयोगशालाएं कृत्रिम बुद्धिमत्ता उन्नत कंप्यूटिंग ऊर्जा सुरक्षा सामग्री विज्ञान और परमाणु अनुसंधान जैसे अत्यंत संवेदनशील क्षेत्रों में काम करती हैं। ऐसे में बड़ी संख्या में चीनी नागरिकों की मौजूदगी और उनकी पहुंच राष्ट्रीय हितों के लिए जोखिम पैदा कर सकती है।

    पत्र में दोनों सीनेटरों ने ऊर्जा विभाग के आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया कि वित्त वर्ष 2025 के दौरान लगभग 1900 अल्पकालिक यात्राएं चीनी नागरिकों द्वारा की गईं। इसके अतिरिक्त करीब 1300 दीर्घकालिक शोध नियुक्तियां और लगभग 2100 औपचारिक रोजगार पदों पर भी चीनी नागरिक विभिन्न प्रयोगशालाओं से जुड़े रहे। इन आंकड़ों ने अमेरिकी राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है।

    सांसदों ने यह भी बताया कि इसी अवधि में चीनी नागरिकों ने राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं की सुविधाओं तक 5000 से अधिक बार प्रत्यक्ष अथवा दूरस्थ पहुंच हासिल की। उनके अनुसार यह स्थिति केवल सामान्य वैज्ञानिक आदान-प्रदान तक सीमित नहीं है बल्कि इससे संवेदनशील तकनीकों और अनुसंधान से जुड़ी जानकारियों के लीक होने की आशंका भी पैदा होती है।

    टॉम कॉटन और माइक ली का तर्क है कि चीन वर्तमान समय में उभरती तकनीकों की वैश्विक दौड़ में अमेरिका का सबसे बड़ा प्रतिस्पर्धी है। उन्होंने आरोप लगाया कि चीन लंबे समय से विदेशी तकनीक और बौद्धिक संपदा हासिल करने की रणनीति पर काम करता रहा है। ऐसे में अमेरिकी राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं तक व्यापक पहुंच देना राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से चिंताजनक है।

    पत्र में दोनों सांसदों ने ऊर्जा विभाग से कई महत्वपूर्ण सवाल भी पूछे हैं। उन्होंने जानना चाहा है कि विभाग अपनी सुरक्षा नीतियों में चीन के राष्ट्रीय खुफिया कानून को किस प्रकार ध्यान में रखता है। सीनेटरों का दावा है कि यह कानून चीनी नागरिकों को आवश्यक होने पर अपने देश की खुफिया एजेंसियों के साथ सहयोग करने के लिए बाध्य करता है। इसलिए अमेरिका को अतिरिक्त सतर्कता बरतने की आवश्यकता है।

    इसके अलावा सांसदों ने यह भी जानकारी मांगी है कि क्या चीनी नागरिकों को निर्यात नियंत्रण वाली तकनीकों नियंत्रित अनुसंधान परियोजनाओं या अन्य संवेदनशील वैज्ञानिक कार्यक्रमों तक पहुंच दी जा रही है। उन्होंने यह भी पूछा है कि रिमोट एक्सेस को सीमित करने और संभावित जोखिमों को कम करने के लिए विभाग कौन से कदम उठा रहा है।

    सीनेटरों ने अपने पत्र में स्पष्ट कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा और महत्वपूर्ण तकनीकी बढ़त को बनाए रखना ऊर्जा विभाग की प्राथमिक जिम्मेदारी है। उनका मानना है कि यदि हजारों विदेशी नागरिक विशेषकर चीन जैसे रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी देश के नागरिक इन प्रयोगशालाओं तक लगातार पहुंच बनाते रहेंगे तो अमेरिका की तकनीकी बढ़त और सुरक्षा दोनों प्रभावित हो सकती हैं।

    गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब इस मुद्दे को उठाया गया हो। जनवरी में भी टॉम कॉटन माइक ली और अन्य रिपब्लिकन सांसदों ने ऊर्जा विभाग से कार्रवाई की मांग की थी। इसके बाद मार्च 2025 में उन्होंने जीएटीई एक्ट नामक विधेयक पेश किया था जिसका उद्देश्य अमेरिकी राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं और संवेदनशील तकनीकों तक प्रतिद्वंद्वी देशों के नागरिकों की पहुंच को सीमित करना है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में अमेरिका और चीन के बीच तकनीकी प्रतिस्पर्धा और तेज होगी। ऐसे में वैज्ञानिक सहयोग और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना अमेरिकी प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

  • टैरिफ से बदलेगी अमेरिका की तस्वीर: ट्रंप बोले- फैक्ट्रियां लौट रहीं, बढ़ रही नौकरियां

    टैरिफ से बदलेगी अमेरिका की तस्वीर: ट्रंप बोले- फैक्ट्रियां लौट रहीं, बढ़ रही नौकरियां


    नई दिल्ली ।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर अपनी टैरिफ आधारित व्यापार नीति को देश की आर्थिक मजबूती का आधार बताया है। पेंसिल्वेनिया के मैकुंगी स्थित मैक ट्रक्स फैक्ट्री में कर्मचारियों को संबोधित करते हुए ट्रंप ने कहा कि आयातित वस्तुओं पर लगाए गए टैरिफ न केवल अमेरिकी उद्योगों को नई ताकत दे रहे हैं बल्कि कंपनियों को अमेरिका में उत्पादन इकाइयां स्थापित करने के लिए भी प्रेरित कर रहे हैं। उनके मुताबिक यह नीति वर्षों से कमजोर पड़ रहे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को पुनर्जीवित करने और लाखों रोजगार सृजित करने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो रही है।

    अपने संबोधन में ट्रंप ने कहा कि लंबे समय तक अमेरिकी श्रमिकों को ऐसे हालात का सामना करना पड़ा जब वैश्विक व्यापार नीतियों के कारण फैक्ट्रियां बंद होती गईं और नौकरियां दूसरे देशों में स्थानांतरित होती रहीं। उन्होंने दावा किया कि उनकी सरकार ने इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए हैं और अब अमेरिकी हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है। ट्रंप ने कहा कि आज देश के श्रमिकों के पास ऐसा नेतृत्व है जो अमेरिका और अमेरिकी कामगारों के हितों को सबसे पहले रखता है।

    राष्ट्रपति ने विदेशी स्टील एल्यूमीनियम और कॉपर पर लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ का उल्लेख करते हुए कहा कि इसका उद्देश्य घरेलू उद्योगों को सस्ता विदेशी प्रतिस्पर्धी दबाव से बचाना है। उन्होंने यह भी बताया कि विदेशी कारों और मध्यम तथा भारी श्रेणी के ट्रकों पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया गया है ताकि अमेरिकी कंपनियां घरेलू बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकें। ट्रंप के अनुसार इस नीति का सीधा लाभ मैक ट्रक्स जैसी कंपनियों को मिला है जो अमेरिका में निर्माण कर रही हैं और हजारों लोगों को रोजगार दे रही हैं।

    ट्रंप ने दावा किया कि टैरिफ नीति के कारण कई वैश्विक कंपनियां अपना उत्पादन अमेरिका में स्थानांतरित कर रही हैं। उन्होंने कहा कि देश में पहले की तुलना में तीन गुना अधिक फैक्ट्रियों का निर्माण हो रहा है। इनमें ऑटोमोबाइल उत्पादन इकाइयों से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और हाईटेक मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ी फैक्ट्रियां शामिल हैं। उन्होंने कंपनियों को स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि यदि वे टैरिफ से बचना चाहती हैं तो उन्हें अमेरिका में फैक्ट्री लगानी होगी और अमेरिकी नागरिकों को रोजगार देना होगा।

    व्यापार संतुलन को लेकर भी ट्रंप ने अपनी सरकार की उपलब्धियों का उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि उनके कार्यकाल के दौरान चीन के साथ व्यापार घाटे में ऐतिहासिक कमी दर्ज की गई और अमेरिकी निर्यात में लगभग 150 अरब डॉलर की वृद्धि हुई। उनके अनुसार यह अमेरिका के व्यापार इतिहास में सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है और इससे घरेलू उद्योगों को नई ऊर्जा मिली है।

    मैक ट्रक्स के कर्मचारियों और प्रबंधन की सराहना करते हुए ट्रंप ने कंपनी को अमेरिकी औद्योगिक ताकत का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में अमेरिका की सड़कों पर अधिकतर ट्रक अमेरिकी फैक्ट्रियों में बने होंगे। कार्यक्रम के दौरान मरीन कॉर्प्स के पूर्व सैनिक और मैक ट्रक्स के तीसरी पीढ़ी के कर्मचारी पैट्रिक मैकह्यू ने भी कहा कि कंपनी अमेरिका में ही उत्पादन करने और देश की प्रगति में योगदान देने के लिए प्रतिबद्ध है।

    अपने संबोधन में ट्रंप ने पेंसिल्वेनिया में हो रहे नए निवेशों का भी जिक्र किया। उन्होंने फार्मास्युटिकल कंपनी एली लिली टेलीकॉम कंपनी नोकिया और मेडिकल टेक्नोलॉजी क्षेत्र की कंपनी बी ब्रॉन के निवेश प्रस्तावों को अमेरिकी अर्थव्यवस्था में बढ़ते विश्वास का प्रमाण बताया। ट्रंप के अनुसार ये निवेश दर्शाते हैं कि वैश्विक कंपनियां अमेरिका को भविष्य के विनिर्माण और नवाचार केंद्र के रूप में देख रही हैं।

    ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है जब उनकी टैरिफ नीति को लेकर अमेरिका और दुनिया भर में बहस जारी है। समर्थकों का मानना है कि इससे घरेलू उद्योग और रोजगार मजबूत होंगे जबकि आलोचक इसे वैश्विक व्यापार के लिए चुनौती मानते हैं। हालांकि ट्रंप का दावा है कि उनकी आर्थिक रणनीति का अंतिम लक्ष्य अमेरिकी उद्योगों को आत्मनिर्भर और प्रतिस्पर्धी बनाना है।

  • भारत बनेगा वैश्विक निवेश का अगला बड़ा केंद्र, तेजी से बढ़ता मध्यम वर्ग और टेक्नोलॉजी बना रहे मजबूत बाजार

    भारत बनेगा वैश्विक निवेश का अगला बड़ा केंद्र, तेजी से बढ़ता मध्यम वर्ग और टेक्नोलॉजी बना रहे मजबूत बाजार


    नई दिल्ली ।चीन के डालियान में आयोजित विश्व आर्थिक मंच की वार्षिक बैठक ‘न्यू चैंपियंस’ यानी समर दावोस के दौरान भारत की आर्थिक संभावनाओं को लेकर एक बार फिर वैश्विक स्तर पर सकारात्मक संदेश सामने आया है। नॉर्वे की प्रमुख बायोटेक्नोलॉजी कंपनी एकर बायोमरीन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मैट्स जोहानसन ने भारत को दुनिया के सबसे मजबूत और आकर्षक दीर्घकालिक बाजारों में से एक बताते हुए कहा कि देश की विशाल आबादी, तेजी से बढ़ता मध्यम वर्ग और नई तकनीकों को तेजी से अपनाने की क्षमता भविष्य की आर्थिक सफलता का मजबूत आधार तैयार कर रही है।

    आईएएनएस से बातचीत में जोहानसन ने कहा कि भारत उन देशों में शामिल है जहां दीर्घकालिक निवेश और कारोबारी विस्तार की अपार संभावनाएं मौजूद हैं। उनके अनुसार भारत केवल एक बड़ा उपभोक्ता बाजार ही नहीं है बल्कि नवाचार और तकनीकी बदलावों को स्वीकार करने की असाधारण क्षमता भी रखता है। यही वजह है कि वैश्विक कंपनियां भारत को भविष्य के विकास इंजन के रूप में देख रही हैं।

    उन्होंने कहा कि भारत में बड़ी आबादी और लगातार बढ़ती क्रय शक्ति वाला मध्यम वर्ग आर्थिक गतिविधियों को नई दिशा दे रहा है। इसके साथ ही डिजिटल तकनीक और नवाचार को अपनाने की रफ्तार भी दुनिया के कई देशों से बेहतर है। इन सभी कारकों के कारण भारत आने वाले वर्षों में भी वैश्विक निवेशकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण बाजार बना रहेगा।

    भारत के प्रति अपनी कंपनी की प्रतिबद्धता को दोहराते हुए जोहानसन ने बताया कि एकर बायोमरीन देश में अपनी मौजूदगी को और मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है। कंपनी मुंबई में नया कार्यालय खोलने की तैयारी कर रही है ताकि भारतीय बाजार में अपनी गतिविधियों का विस्तार किया जा सके। उन्होंने कहा कि भारत पहले से ही कंपनी के लिए एक महत्वपूर्ण बाजार है और आने वाले समय में इसकी भूमिका और अधिक बढ़ने वाली है।

    उन्होंने बताया कि एकर बायोमरीन लंबे समय से भारतीय झींगा पालन उद्योग को आवश्यक सामग्री उपलब्ध करा रही है। भारत का श्रिम्प फार्मिंग सेक्टर दुनिया के प्रमुख एक्वाकल्चर बाजारों में शामिल है और इस क्षेत्र में कंपनी की मजबूत भागीदारी रही है। अब कंपनी केवल जलीय कृषि तक सीमित नहीं रहना चाहती बल्कि खाद्य उत्पादों और मानव स्वास्थ्य से जुड़े पोषण सप्लीमेंट्स के क्षेत्र में भी भारतीय बाजार में अपनी उपस्थिति बढ़ाने की योजना बना रही है।

    मैट्स जोहानसन ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बढ़ती भूमिका पर भी विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में एआई वैश्विक अर्थव्यवस्था और उद्योगों की उत्पादकता बढ़ाने वाला सबसे बड़ा कारक बन सकता है। उनके मुताबिक एआई का उपयोग केवल उत्पादन इकाइयों तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि बिक्री, विपणन, वित्तीय प्रबंधन और आपूर्ति श्रृंखला जैसे क्षेत्रों में भी बड़े बदलाव लाएगा।

    उन्होंने कहा कि उनकी कंपनी एआई को अपनी पूरी वैल्यू चेन में शामिल करने की दिशा में तेजी से काम कर रही है। इससे न केवल दक्षता बढ़ेगी बल्कि लागत में कमी और बेहतर निर्णय लेने में भी मदद मिलेगी। जोहानसन का मानना है कि एआई वैश्विक आर्थिक विकास का नया इंजन बनने जा रहा है और जो कंपनियां इसे तेजी से अपनाएंगी वे भविष्य में प्रतिस्पर्धा में आगे रहेंगी।

    गौरतलब है कि 23 जून से शुरू हुआ समर दावोस सम्मेलन 25 जून तक चलेगा। इस वैश्विक मंच पर दुनिया भर के उद्योग जगत के दिग्गज, नीति निर्माता, शिक्षाविद और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधि नवाचार, उद्यमिता, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आर्थिक विकास के भविष्य पर मंथन कर रहे हैं। भारत को लेकर व्यक्त किए गए सकारात्मक विचार एक बार फिर यह संकेत देते हैं कि वैश्विक निवेशकों की नजर में देश की आर्थिक संभावनाएं लगातार मजबूत होती जा रही हैं।

  • ब्रिटेन की अदालत से नीरव मोदी को बड़ा झटका, बैंक फ्रॉड मामले में 100 करोड़ रुपये से अधिक चुकाने का आदेश

    ब्रिटेन की अदालत से नीरव मोदी को बड़ा झटका, बैंक फ्रॉड मामले में 100 करोड़ रुपये से अधिक चुकाने का आदेश

    नई दिल्ली। भगोड़े हीरा कारोबारी नीरव मोदी को ब्रिटेन की हाईकोर्ट से बड़ा कानूनी झटका लगा है। अदालत ने बैंक धोखाधड़ी से जुड़े एक मामले में उन्हें व्यक्तिगत गारंटी के आधार पर देनदार मानते हुए बकाया राशि और ब्याज का भुगतान करने का आदेश दिया है। इस फैसले के बाद नीरव मोदी पर 100 करोड़ रुपये से अधिक की देनदारी आ सकती है।

    हाईकोर्ट के न्यायाधीश साइमन टिंकलर ने अपने आदेश में कहा कि नीरव मोदी द्वारा दी गई व्यक्तिगत गारंटी वैध और लागू करने योग्य है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उन पर 4.1 मिलियन डॉलर (करीब 38.9 करोड़ रुपये) की मूल राशि बकाया है, जिस पर ब्याज भी जोड़ा जाएगा।

    अदालत में नहीं दे सके ठोस जवाब

    सुनवाई के दौरान नीरव मोदी या उनकी कानूनी टीम की ओर से कोई ठोस स्पष्टीकरण पेश नहीं किया गया। अपने बचाव में नीरव ने यह तर्क दिया था कि संबंधित गारंटी लागू नहीं की जा सकती और उन्हें बैंक की ओर से भेजी गई वैध मांगें प्राप्त नहीं हुई थीं।

    मामला वर्ष 2012 का है, जब बैंक ऑफ इंडिया ने नीरव मोदी की दुबई स्थित कंपनी फायरस्टार डायमंड एफजेडई को ऋण उपलब्ध कराया था। बाद में 3 अगस्त 2013 को नीरव मोदी ने इस ऋण के लिए व्यक्तिगत गारंटी दी थी।

    पीएनबी घोटाले के बाद शुरू हुई वसूली प्रक्रिया

    वर्ष 2018 में पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) से जुड़े कथित धोखाधड़ी मामले के सामने आने के बाद बैंक ऑफ इंडिया ने बकाया ऋण की वसूली की प्रक्रिया शुरू की। मार्च और अप्रैल 2018 में कंपनी और नीरव मोदी को नोटिस भेजे गए, लेकिन उनका कोई जवाब नहीं मिला।

    इसके बाद 8 मार्च 2024 को बैंक को 4.1 मिलियन डॉलर की मूल राशि और उस पर लागू ब्याज की वसूली के लिए सारांश निर्णय प्राप्त हुआ। बैंक ने अक्टूबर 2025 में नीरव मोदी को एक और मांग नोटिस भी भेजा था।

    कोर्ट ने गारंटी को माना वैध
    फैसले में न्यायाधीश टिंकलर ने उल्लेख किया कि 17 फरवरी 2018 को नीरव मोदी ने बैंक को भेजे गए एक ईमेल में मीडिया में चल रही खबरों के कारण कारोबारी गतिविधियां प्रभावित होने की बात स्वीकार की थी। उन्होंने यह भी कहा था कि समूह की कंपनियां बैंकों का बकाया चुकाने में असमर्थ हैं।

    हालांकि नीरव मोदी ने अदालत में दावा किया कि उन्हें अप्रैल 2018 और अक्टूबर 2025 के नोटिस नहीं मिले, लेकिन न्यायाधीश ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर माना कि दोनों मांग पत्र उन्हें प्राप्त हुए थे। इसी आधार पर अदालत ने व्यक्तिगत गारंटी को पूरी तरह वैध और लागू करने योग्य माना।

  • कैलिफोर्निया में बढ़ा जंगल की आग का खतरा, रिकॉर्ड वाइल्डफायर से अलर्ट पर प्रशासन

    कैलिफोर्निया में बढ़ा जंगल की आग का खतरा, रिकॉर्ड वाइल्डफायर से अलर्ट पर प्रशासन


    नई दिल्ली ।अमेरिका के कैलिफोर्निया राज्य में जंगल की आग यानी वाइल्डफायर का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। बढ़ते तापमान, लंबे सूखे और तेजी से सूखती वनस्पतियों ने राज्य को आग के प्रति बेहद संवेदनशील बना दिया है। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि अब अधिकारी पारंपरिक “फायर सीजन” की अवधारणा को छोड़कर पूरे साल आग के खतरे की बात करने लगे हैं। इस वर्ष अभी जंगल की आग का चरम मौसम शुरू भी नहीं हुआ है, लेकिन दमकल विभाग पहले ही 2,580 से अधिक वाइल्डफायर घटनाओं का सामना कर चुका है।

    कैलिफोर्निया वन एवं अग्नि सुरक्षा विभाग के अनुसार इस साल अब तक राज्य में 2,584 जंगल की आग की घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिनमें 79,690 एकड़ से अधिक क्षेत्र जलकर राख हो गया है। इन आगजनी की घटनाओं में 25 इमारतें भी नष्ट हुई हैं। हालांकि राहत की बात यह है कि अब तक किसी की मौत की पुष्टि नहीं हुई है।

    सोमवार को भी रिवरसाइड, केर्न और सैन डिएगो समेत कई इलाकों में जंगलों में आग जलती रही। दमकल अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि आने वाले महीनों में तापमान और बढ़ने तथा मौसम के और अधिक शुष्क होने के कारण आग लगने की घटनाएं सामान्य से कहीं ज्यादा हो सकती हैं।

    सीएएल फायर के बटालियन चीफ डेविड एक्यूना ने कहा कि अब “फायर सीजन” शब्द पुराना हो चुका है। उनके मुताबिक जंगलों में आग लगने का खतरा केवल गर्मियों और पतझड़ तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि यह पूरे साल बना रहता है। इसी वजह से विभाग अब “पीक फायर ईयर” जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन इस संकट को और गंभीर बना रहा है। पिछले कुछ वर्षों में अच्छी बारिश के कारण बड़ी मात्रा में वनस्पति उगी थी। अब वही वनस्पति गर्म और सूखे मौसम में सूखकर आग के लिए ईंधन का काम कर रही है। इससे आग तेजी से फैलने और बड़े क्षेत्र को अपनी चपेट में लेने की आशंका बढ़ गई है।

    सीएएल फायर के बटालियन प्रमुख ब्रेंट पास्कुआ ने कहा कि सभी प्रेडिक्टिव मॉडल संकेत दे रहे हैं कि इस साल औसत से अधिक खतरनाक वाइल्डफायर सीजन देखने को मिल सकता है। वहीं वैज्ञानिकों ने भी चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन के कारण कैलिफोर्निया में आग का मौसम पहले की तुलना में जल्दी शुरू हो रहा है और अधिक समय तक बना रहता है।

    यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया लॉस एंजिल्स की एक स्टडी में पाया गया कि मानवजनित जलवायु परिवर्तन के कारण 1992 से 2020 के बीच कैलिफोर्निया में आग का मौसम छह से 46 दिन पहले शुरू होने लगा है। अध्ययन के अनुसार घास, झाड़ियों और पेड़ों में नमी की कमी आग लगने के समय और उसकी तीव्रता को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा कारक है।

    कैलिफोर्निया के गवर्नर गेविन न्यूसम ने भी हाल ही में चेतावनी दी थी कि जलवायु परिवर्तन मौसम को और अधिक खतरनाक बना रहा है। उन्होंने कहा कि अब जंगल की आग का कोई ऑफ-सीजन नहीं बचा है और एक छोटी सी चिंगारी भी बड़ी तबाही में बदल सकती है।

    राज्य सरकार ने इस खतरे से निपटने के लिए पिछले कुछ वर्षों में फायर ब्रिगेड के बजट को लगभग दोगुना कर दिया है। साथ ही दमकल कर्मियों की संख्या बढ़ाई गई है और दुनिया के सबसे बड़े एरियल फायरफाइटिंग बेड़ों में से एक का निर्माण किया गया है। अधिकारियों ने नागरिकों से भी अपील की है कि वे अपने घरों के आसपास सुरक्षा क्षेत्र बनाएं, आपातकालीन किट तैयार रखें और स्थानीय अलर्ट सिस्टम से जुड़े रहें।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में कैलिफोर्निया के लिए चुनौती और बढ़ सकती है। ऐसे में प्रशासन और नागरिकों दोनों को सतर्क रहकर तैयारी करनी होगी ताकि किसी भी संभावित आपदा से नुकसान को कम किया जा सके।

  • भारत की विकास यात्रा को मिलेगी नई रफ्तार: कृषि और टेक्नोलॉजी बनेंगे अर्थव्यवस्था के सबसे बड़े इंजन

    भारत की विकास यात्रा को मिलेगी नई रफ्तार: कृषि और टेक्नोलॉजी बनेंगे अर्थव्यवस्था के सबसे बड़े इंजन


    नई दिल्ली । दुनिया की सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल भारत आने वाले वर्षों में भी अपनी विकास गति बनाए रखेगा। चीन के डालियान शहर में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की एनुअल न्यू चैंपियंस मीटिंग यानी समर दावोस में वैश्विक विशेषज्ञों ने भारत की आर्थिक क्षमता पर भरोसा जताते हुए कहा कि देश के विकास को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में कृषि और टेक्नोलॉजी की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत न केवल वैश्विक विकास दर में महत्वपूर्ण योगदान देगा बल्कि नवाचार और डिजिटल परिवर्तन के जरिए नई आर्थिक संभावनाओं का केंद्र भी बनेगा।

    वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के मैनेजिंग डायरेक्टर मिरेक डुसेक ने भारत को दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक बताते हुए कहा कि आने वाले वर्षों में भी भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत गति से आगे बढ़ती रहेगी। उनके अनुसार भारत वैश्विक आर्थिक वृद्धि का एक प्रमुख आधार बन चुका है और इसकी विकास यात्रा दुनिया भर के निवेशकों और नीति निर्माताओं का ध्यान आकर्षित कर रही है।

    डुसेक ने कहा कि समर दावोस का उद्देश्य दुनिया भर के इनोवेटर्स, टेक्नोलॉजी विशेषज्ञों, नीति निर्माताओं और उद्योग जगत के नेताओं को एक मंच पर लाकर वैश्विक चुनौतियों के समाधान तलाशना है। उन्होंने बताया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग और डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसी उभरती तकनीकें न केवल उत्पादकता बढ़ाने में मदद करेंगी बल्कि वैश्विक आर्थिक विकास को भी नई दिशा देंगी।

    वहीं पद्मश्री से सम्मानित और ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी में मृदा विज्ञान के प्रतिष्ठित प्रोफेसर रतन लाल ने भारत की कृषि क्षमता को देश की आर्थिक ताकत का महत्वपूर्ण आधार बताया। उन्होंने कहा कि भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है और इस लक्ष्य को हासिल करने में कृषि क्षेत्र की बड़ी भूमिका होगी।

    प्रोफेसर रतन लाल ने कहा कि खेती की उत्पादकता बढ़ाने के लिए मिट्टी की सेहत सुधारना और भूमि के टिकाऊ प्रबंधन को प्राथमिकता देना बेहद जरूरी है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कृषि क्षेत्र में वैज्ञानिक तकनीकों और आधुनिक संसाधनों का उपयोग किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ खाद्य सुरक्षा को भी मजबूत करेगा।

    उन्होंने यह भी कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल तकनीकें भारतीय कृषि में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती हैं। इन तकनीकों की मदद से मिट्टी की जांच पहले की तुलना में अधिक तेज, सस्ती और सटीक हो सकेगी। इससे किसानों को अपनी जमीन और फसल की जरूरतों के अनुरूप सही निर्णय लेने में मदद मिलेगी, जिससे उत्पादन बढ़ेगा और लागत कम होगी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की युवा आबादी, तेजी से बढ़ता डिजिटल ढांचा, तकनीकी नवाचार और मजबूत कृषि आधार देश को वैश्विक आर्थिक शक्ति बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। समर दावोस में हुई चर्चाओं से यह स्पष्ट संकेत मिला कि भविष्य की भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार केवल उद्योग और सेवाएं नहीं बल्कि आधुनिक तकनीक से सशक्त कृषि भी होगी। यही संयोजन भारत को आने वाले दशक में वैश्विक विकास का सबसे बड़ा केंद्र बना सकता है।

  • यूरोप पर गर्मी का कहर: फ्रांस में 18 मौतें, ब्रिटेन में रेड अलर्ट, कई देशों में आपात हालात

    यूरोप पर गर्मी का कहर: फ्रांस में 18 मौतें, ब्रिटेन में रेड अलर्ट, कई देशों में आपात हालात


    नई दिल्ली । यूरोप इन दिनों भीषण गर्मी की चपेट में है और हालात लगातार गंभीर होते जा रहे हैं। फ्रांस, ब्रिटेन, स्पेन, इटली, जर्मनी और बेल्जियम समेत कई देशों में तापमान सामान्य से कहीं अधिक दर्ज किया जा रहा है। गर्मी का असर केवल लोगों की सेहत तक सीमित नहीं है बल्कि परिवहन व्यवस्था, ऊर्जा आपूर्ति, शिक्षा व्यवस्था और दैनिक जीवन भी बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण इस तरह की चरम मौसमीय घटनाएं पहले की तुलना में अधिक खतरनाक और बार-बार देखने को मिल रही हैं।

    फ्रांस में स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक बनी हुई है। देश के आधे से अधिक हिस्सों में रेड अलर्ट जारी कर दिया गया है और लगभग 3.9 करोड़ लोग इसकी जद में हैं। भीषण गर्मी के कारण अब तक 18 लोगों की मौत हो चुकी है जिनमें दो छोटे बच्चे भी शामिल हैं। बताया गया है कि दोनों बच्चों को एक कार के अंदर बेहोश अवस्था में पाया गया था। हालात की गंभीरता को देखते हुए फ्रांस सरकार ने आपात समीक्षा बैठक बुलाने का फैसला किया है। देशभर में 1,350 से अधिक स्कूल बंद कर दिए गए हैं ताकि बच्चों को गर्मी के दुष्प्रभाव से बचाया जा सके।

    ब्रिटेन में भी गर्मी ने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। यूके हेल्थ सिक्योरिटी एजेंसी ने इंग्लैंड के छह क्षेत्रों में रेड हेल्थ वार्निंग जारी की है। यह चेतावनी बताती है कि अत्यधिक गर्मी स्वस्थ लोगों के लिए भी जानलेवा साबित हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार इंग्लैंड और वेल्स में तापमान 38 से 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। इससे वर्ष 1976 का जून माह का तापमान रिकॉर्ड भी टूटने की संभावना जताई जा रही है। वैज्ञानिकों ने इसके पीछे “हीट डोम” को जिम्मेदार बताया है जो पश्चिमी यूरोप के ऊपर गर्म हवा को फंसा देता है और तापमान को लगातार बढ़ाता रहता है।

    स्पेन में भी हालात असामान्य बने हुए हैं। आमतौर पर अपेक्षाकृत ठंडा माना जाने वाला सान सेबेस्टियन क्षेत्र भी 40 डिग्री सेल्सियस तापमान झेल रहा है। मौसम विभाग के अनुसार देश के कई हिस्सों में तापमान सामान्य से 5 से 10 डिग्री अधिक दर्ज किया जा रहा है। वहीं उत्तरी क्षेत्रों में यह अंतर 10 डिग्री से भी ज्यादा हो सकता है।

    इटली ने 12 शहरों में रेड हीट अलर्ट जारी किया है जबकि दक्षिण-पश्चिम फ्रांस में एक परमाणु संयंत्र को नदी के पानी के अत्यधिक गर्म होने के कारण अपना एक रिएक्टर बंद करना पड़ा। जर्मनी में सप्ताहांत के दौरान गर्मी से जुड़े हादसों में पांच लोगों की मौत हुई है। फ्रैंकफर्ट एयरपोर्ट पर भी यात्रियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा जहां विमान लंबे समय तक रनवे पर खड़े रहने के कारण लोग गर्मी से बेहाल हो गए।

    बेल्जियम के मौसम विभाग ने भी चेतावनी दी है कि यह हीटवेव एक सप्ताह तक जारी रह सकती है और तापमान नए रिकॉर्ड बना सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले दिनों में यूरोप के कई देशों में स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव और बढ़ सकता है। बढ़ती गर्मी ने एक बार फिर जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौती को दुनिया के सामने ला खड़ा किया है।

  • संयुक्त राष्ट्र में भारत का बड़ा संदेश 2030 तक एड्स को खत्म करने के वैश्विक संकल्प का समर्थन

    संयुक्त राष्ट्र में भारत का बड़ा संदेश 2030 तक एड्स को खत्म करने के वैश्विक संकल्प का समर्थन


    नई दिल्ली । संयुक्त राष्ट्र में आयोजित एचआईवी और एड्स पर उच्चस्तरीय बैठक में भारत ने वैश्विक एकजुटता और सहयोग की आवश्यकता पर जोर देते हुए वर्ष 2030 तक एड्स को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरे के रूप में समाप्त करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी हरीश ने इस अवसर पर भारत का पक्ष रखते हुए कहा कि वैश्विक स्तर पर एचआईवी और एड्स के खिलाफ लड़ाई निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है और इस दिशा में सामूहिक प्रयासों को और मजबूत करने की जरूरत है।

    भारत ने बैठक में प्रस्तुत राजनीतिक घोषणा पत्र में व्यक्त वैश्विक एकजुटता की भावना का समर्थन करते हुए कहा कि पिछले दो दशकों में एचआईवी संक्रमण और एड्स से होने वाली मौतों को कम करने में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। हालांकि अभी भी असमानताओं, वित्तीय संसाधनों की कमी और नई वैश्विक चुनौतियों के कारण इस दिशा में हासिल उपलब्धियों पर खतरा बना हुआ है।

    पी हरीश ने कहा कि भारत वर्ष 2030 तक एड्स को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरे के रूप में समाप्त करने और उसके बाद भी इस क्षेत्र में प्रगति बनाए रखने के संकल्प के साथ पूरी मजबूती से खड़ा है। उन्होंने बताया कि भारत इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए राष्ट्रीय एड्स एवं यौन संचारित रोग नियंत्रण कार्यक्रम के माध्यम से व्यापक स्तर पर कार्य कर रहा है। यह कार्यक्रम वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित योजना, सामुदायिक सहभागिता और एकीकृत स्वास्थ्य सेवाओं पर आधारित है।

    भारत ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि लगातार घरेलू निवेश और योजनाबद्ध प्रयासों की बदौलत देश में नए एचआईवी संक्रमण और एड्स से संबंधित मौतों में उल्लेखनीय कमी आई है। साथ ही रोकथाम, जांच, उपचार, देखभाल और परामर्श सेवाओं तक लोगों की पहुंच भी पहले की तुलना में काफी बढ़ी है।

    बैठक में भारत ने देश-आधारित रणनीतियों और टिकाऊ वित्तपोषण के महत्व को भी रेखांकित किया। भारतीय प्रतिनिधि ने कहा कि प्रत्येक देश को अपनी स्थानीय परिस्थितियों और महामारी की प्रकृति के अनुरूप रणनीति तैयार करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। इसके साथ ही मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था और पूर्वानुमेय वित्तीय सहायता भी सुनिश्चित की जानी चाहिए ताकि लंबे समय तक सकारात्मक परिणाम प्राप्त किए जा सकें।

    भारत ने गर्भवती महिलाओं और नवजात बच्चों को संक्रमण से बचाने के लिए अपनाई जा रही अपनी ट्रिपल एलिमिनेशन रणनीति का भी उल्लेख किया। इस पहल के तहत गर्भवती महिलाओं में एचआईवी, सिफलिस और हेपेटाइटिस-बी की सार्वभौमिक जांच, समय पर उपचार और संक्रमित बच्चों की नियमित निगरानी सुनिश्चित की जा रही है। भारत ने बच्चों में एड्स को समाप्त करने और संक्रमण के मातृ-शिशु प्रसार को रोकने के वैश्विक प्रयासों का भी समर्थन किया।

    इसके अलावा भारत ने एचआईवी, तपेदिक, वायरल हेपेटाइटिस और अन्य सह-संक्रमणों के खिलाफ एकीकृत स्वास्थ्य रणनीति अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। भारत का मानना है कि ऐसी समेकित व्यवस्था स्वास्थ्य परिणामों को बेहतर बनाने के साथ-साथ संसाधनों के प्रभावी उपयोग में भी मदद करती है।

    भारत ने बैठक में सस्ती दवाओं, जांच सुविधाओं और नई चिकित्सा तकनीकों तक समान पहुंच सुनिश्चित करने की आवश्यकता को भी प्रमुखता से उठाया। भारतीय प्रतिनिधि ने कहा कि विश्व व्यापार संगठन के टीआरआईपीएस समझौते के अंतर्गत उपलब्ध लचीले प्रावधानों का उपयोग विशेष रूप से विकासशील देशों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, ताकि जीवनरक्षक दवाओं और स्वास्थ्य उत्पादों तक आम लोगों की पहुंच सुनिश्चित की जा सके।

    संयुक्त राष्ट्र में भारत की यह पहल वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा, समान स्वास्थ्य सेवाओं और एड्स मुक्त भविष्य के लिए उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है। भारत ने स्पष्ट किया कि वह आने वाले वर्षों में भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ मिलकर एचआईवी और एड्स के खिलाफ इस लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाता रहेगा।

  • भारत-मंगोलिया दोस्ती को नई मजबूती विदेश मंत्री जयशंकर ने रिफाइनरी प्रोजेक्ट की प्रगति परखी

    भारत-मंगोलिया दोस्ती को नई मजबूती विदेश मंत्री जयशंकर ने रिफाइनरी प्रोजेक्ट की प्रगति परखी


    नई दिल्ली । भारत और मंगोलिया के बीच रणनीतिक साझेदारी को नई मजबूती देने की दिशा में विदेश मंत्री एस. जयशंकर का मंगोलिया दौरा महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस यात्रा के दौरान उन्होंने भारत की सहायता से विकसित की जा रही बहुप्रतीक्षित मंगोल तेल रिफाइनरी परियोजना के निर्माण स्थल का दौरा कर वहां चल रहे कार्यों की प्रगति का जायजा लिया। उनके साथ मंगोलिया की विदेश मंत्री बत्त्सेत्सेग बटमुंख और उद्योग एवं खनन मंत्री गोंगोर दमदिन्न्यम भी मौजूद रहे।

    निर्माण स्थल के दौरे के दौरान विदेश मंत्री ने परियोजना से जुड़े अधिकारियों और इंजीनियरों के साथ विस्तृत चर्चा की तथा विभिन्न चरणों में चल रहे कार्यों की समीक्षा की। उन्होंने इस परियोजना को भारत और मंगोलिया की मित्रता का प्रतीक बताते हुए कहा कि यह दोनों देशों के सहयोग का एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण उदाहरण है।

    एस. जयशंकर ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि मंगोल रिफाइनरी परियोजना भारत-मंगोलिया मित्रता का एक प्रमुख प्रतीक है और इसका निर्माण कार्य लगातार आगे बढ़ रहा है। उन्होंने परियोजना में शामिल विभिन्न टीमों के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बावजूद सभी कर्मचारी पूरी प्रतिबद्धता के साथ काम कर रहे हैं।

    दौरे के दौरान विदेश मंत्री ने परियोजना स्थल पर कार्यरत भारतीय और मंगोलियाई कर्मचारियों से भी मुलाकात की। उन्होंने कठिन भौगोलिक और मौसम संबंधी परिस्थितियों में कार्य कर रहे श्रमिकों, इंजीनियरों और तकनीकी विशेषज्ञों के समर्पण की प्रशंसा की तथा परियोजना को समय पर पूरा करने के उनके प्रयासों के लिए धन्यवाद दिया।

    मंगोलिया की विदेश मंत्री बत्त्सेत्सेग बटमुंख के साथ हुई बैठक के बाद मीडिया को संबोधित करते हुए एस. जयशंकर ने कहा कि भारत और मंगोलिया के संबंध केवल कूटनीतिक स्तर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि दोनों देशों के बीच गहरे सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और ऐतिहासिक संबंध मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और विकास की समान आकांक्षाओं ने दोनों देशों के रिश्तों को और मजबूत बनाया है।

    विदेश मंत्री ने बताया कि उनकी यात्रा का एक प्रमुख उद्देश्य पिछले वर्ष भारत दौरे पर आए मंगोलिया के राष्ट्रपति उखनागिन खुरेलसुख और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुई चर्चाओं के परिणामों की समीक्षा करना भी है। दोनों देशों ने हाल के वर्षों में आर्थिक, ऊर्जा, शिक्षा और विकास साझेदारी के क्षेत्रों में सहयोग को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है।

    तेल रिफाइनरी परियोजना को भारत-मंगोलिया सहयोग की सबसे महत्वपूर्ण विकास परियोजनाओं में से एक माना जा रहा है। मंगोलिया के डोर्नोगोवी प्रांत के अल्तानशिरी क्षेत्र में निर्माणाधीन इस रिफाइनरी के लिए भारत सरकार ने 1.7 अरब अमेरिकी डॉलर की सॉफ्ट लाइन ऑफ क्रेडिट उपलब्ध कराई है। यह भारत सरकार द्वारा विदेशों में वित्तपोषित सबसे बड़ी सॉफ्ट लाइन ऑफ क्रेडिट परियोजनाओं में शामिल है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि परियोजना पूरी होने के बाद मंगोलिया की ऊर्जा आत्मनिर्भरता को बड़ा बल मिलेगा और उसे पेट्रोलियम उत्पादों के आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी। साथ ही यह परियोजना दोनों देशों के आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को और अधिक मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। भारत और मंगोलिया के बीच बढ़ता सहयोग यह दर्शाता है कि दोनों देश भविष्य में भी विकास, ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय साझेदारी के नए आयाम स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

  • चीन का अनोखा प्रयोग: बनाया 20 मंजिला एयर प्यूरीफायर टावर, जानिए कितनी हवा कर सकता है साफ

    चीन का अनोखा प्रयोग: बनाया 20 मंजिला एयर प्यूरीफायर टावर, जानिए कितनी हवा कर सकता है साफ

    नई दिल्ली। वायु प्रदूषण से निपटने के लिए चीन ने एक बेहद अनोखा और विशाल प्रयोग किया है। देश के शान्शी प्रांत के शिआन शहर में दुनिया का सबसे बड़ा एयर प्यूरीफायर टॉवर बनाया गया है, जिसकी ऊंचाई 100 मीटर से अधिक है। यह लगभग 20 मंजिला इमारत के बराबर माना जाता है।

    इस परियोजना को चीनी विज्ञान अकादमी के इंस्टीट्यूट ऑफ अर्थ एनवायरनमेंट ने विकसित किया है। वैज्ञानिकों का दावा है कि यह टॉवर प्रतिदिन करीब 1 करोड़ घन मीटर (10 मिलियन क्यूबिक मीटर) तक शुद्ध हवा उत्पन्न करने में सक्षम है, जिससे आसपास के बड़े क्षेत्र की वायु गुणवत्ता में सुधार दर्ज किया गया है।

    सौर ऊर्जा आधारित अनोखी तकनीक

    यह एयर प्यूरीफायर पारंपरिक बिजली आधारित सिस्टम पर पूरी तरह निर्भर नहीं है। इसके आधार क्षेत्र में बड़े कांच के ग्रीनहाउस बनाए गए हैं। प्रदूषित हवा इन संरचनाओं में प्रवेश करती है, जहां सूर्य की गर्मी से यह गर्म होकर ऊपर उठती है।

    इसके बाद यह हवा टॉवर के भीतर लगे कई फिल्टर सिस्टम से गुजरती है, जो धूल, धुआं और अन्य हानिकारक कणों को छान लेते हैं। सौर ऊर्जा पर आधारित होने के कारण इसे दिन के समय बहुत कम अतिरिक्त ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

    PM2.5 स्तर में आई कमी

    अध्ययन के दौरान टॉवर के आसपास लगभग 10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में निगरानी के लिए कई स्टेशन लगाए गए थे। आंकड़ों के अनुसार, भारी प्रदूषण वाले दिनों में PM2.5 जैसे खतरनाक कणों में औसतन 15 प्रतिशत तक की कमी दर्ज की गई।

    वैज्ञानिकों के मुताबिक, कई मौकों पर यह प्रणाली गंभीर स्मॉग को मध्यम स्तर तक लाने में भी सफल रही। हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह शुरुआती परिणाम हैं और दीर्घकालिक अध्ययन के बाद ही अंतिम निष्कर्ष सामने आएंगे।

    भविष्य में और बड़े प्रोजेक्ट की योजना

    इस परियोजना को चीन के लंबे समय से चले आ रहे स्मॉग संकट से निपटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयोग माना जा रहा है। वैज्ञानिक अब इससे भी बड़ा मॉडल विकसित करने की योजना पर काम कर रहे हैं, जिसकी ऊंचाई लगभग 500 मीटर और व्यास 200 मीटर तक हो सकता है।

    ऐसी प्रस्तावित प्रणाली के साथ विशाल ग्रीनहाउस जोड़े जाने की योजना है, जिससे किसी छोटे शहर की हवा को भी साफ करने की क्षमता विकसित की जा सके। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि वायु प्रदूषण का स्थायी समाधान केवल ऐसी तकनीकों से नहीं, बल्कि उत्सर्जन में कमी और स्वच्छ ऊर्जा के व्यापक उपयोग से ही संभव होगा।