Category: International

  • लाइव इंटरव्यू के बीच मंत्री को अचानक अंदर से खींच ले गए आए अफसर बोले-राष्ट्रपति इंतजार कर रहे हैं

    लाइव इंटरव्यू के बीच मंत्री को अचानक अंदर से खींच ले गए आए अफसर बोले-राष्ट्रपति इंतजार कर रहे हैं


    तेहरान। ईरान के साथ जारी संघर्ष के बीच पूरी दुनिया का निगाहें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अगले कदम पर टिकी हैं। इस बीच, अमेरिका में एक नाटकीय घटनाक्रम सामने आया है, जिसमें टीवी पर लाइव इंटरव्यू दे रहे एक मंत्री को बीच इंटरव्यू से खींचकर निकाल लिया गया। दरअसल, अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट स्काई न्यूज को एक इंटरव्यू दे रहे थे। एंकर उनसे सवार पूछ रहे थे, तभी अंदर एक अफसर आया और कहा कि राष्ट्रपति आपको बुला रहे हैं। इसके बाद मंत्री बेसेंट ने वहीं इंटरव्यू छोड़ दिया और वाइट हाउस के सिचुएशन रूम पहुंच गए।

    इंटरव्यू के बीच आया अचानक संदेश

    63 वर्षीय बेसेंट उस समय Sky News के पत्रकार विल्फर्ड फोर्स्ट के साथ “The Master Investor Podcast” के लिए इंटरव्यू दे रहे थे। यह बातचीत वाशिंगटन स्थित ट्रेजरी विभाग के ऐतिहासिक कैश रूम में चल रही थी।

    इंटरव्यू के अभी करीब 13 मिनट ही हुए थे कि अचानक एक सहयोगी कमरे में आया और बेसेंट से कहा, “राष्ट्रपति आपको तुरंत बुला रहे हैं।” इसके बाद बेसेंट ने इंटरव्यू बीच में ही छोड़ दिया। उनका माइक्रोफोन हटाया गया और वे सुबह लगभग 10:22 बजे व्हाइट हाउस के लिए रवाना हो गए।
    दो घंटे बाद लौटे मंत्री

    रिपोर्ट के अनुसार बेसेंट करीब दो घंटे बाद वापस लौटे। बाद में उन्होंने बताया कि बैठक में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई। उन्होंने कहा, “राष्ट्रपति बेहद सकारात्मक मूड में हैं और ईरान मिशन तय समय से पहले आगे बढ़ रहा है।” बता दें कि ईरान के साथ यह संघर्ष 28 फरवरी को शुरू हुआ था, जब अमेरिका ने Operation Epic Fury के तहत इज़रायल के साथ संयुक्त सैन्य अभियान चलाया।

    इस अभियान में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मौत हो गई थी। इसके बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई तेज कर दी और खाड़ी क्षेत्र में कई सैन्य व ऊर्जा ठिकानों को निशाना बनाया।
    वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर

    युद्ध के चलते वैश्विक बाजारों में भी हलचल देखी जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी डॉलर हाल के दिनों में मजबूत हुआ है, जबकि अन्य कई आर्थिक संकेतकों पर दबाव बढ़ा है। विशेषज्ञों का कहना है कि स्थिति और जटिल हो सकती है क्योंकि ईरान ने रणनीतिक समुद्री मार्ग होर्मुज स्ट्रेट पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है। यह मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक माना जाता है। विश्लेषकों के अनुसार यदि यह संघर्ष लंबा चलता है तो इसका असर ऊर्जा बाजार, वैश्विक व्यापार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर व्यापक रूप से पड़ सकता है। इसी कारण वॉशिंगटन में उच्चस्तरीय बैठकों का दौर लगातार जारी है।

  • ईरान युद्ध खत्म करने की घोषणा क्यों नहीं कर पा रहे ट्रंप? व्हाइट हाउस में मतभेद, फैसले पर बढ़ा दबाव

    ईरान युद्ध खत्म करने की घोषणा क्यों नहीं कर पा रहे ट्रंप? व्हाइट हाउस में मतभेद, फैसले पर बढ़ा दबाव

    वॉशिंगटन। ईरान के साथ जारी युद्ध को लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump के सामने बड़ी राजनीतिक और रणनीतिक चुनौती खड़ी हो गई है। व्हाइट हाउस के भीतर ही इस बात को लेकर अलग-अलग राय सामने आ रही है कि युद्ध को कब और किस तरह खत्म घोषित किया जाए।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक प्रशासन के भीतर कुछ अधिकारी मानते हैं कि संघर्ष लंबा खिंचने से वैश्विक तेल कीमतों में उछाल आ सकता है, जिसका असर अमेरिका की घरेलू राजनीति पर भी पड़ेगा। वहीं दूसरी ओर कुछ सख्त रुख वाले नेता ईरान पर सैन्य दबाव जारी रखने के पक्ष में हैं।

    तेल की कीमतों को लेकर चिंता

    अमेरिकी ट्रेजरी विभाग और नेशनल इकोनॉमिक काउंसिल के अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि युद्ध के कारण पेट्रोल की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं तो अमेरिका में इस अभियान के लिए जनसमर्थन कम हो सकता है।
    हालांकि कुछ रिपब्लिकन नेता और रणनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अमेरिका को ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से हर हाल में रोकना होगा और अमेरिकी सैनिकों या जहाजों पर हमले का कड़ा जवाब देना चाहिए।

    लंबी जंग से बचना चाहते हैं कई रणनीतिकार

    ट्रंप के कुछ करीबी सलाहकार और समर्थक यह भी चाहते हैं कि अमेरिका मध्यपूर्व में लंबे समय तक चलने वाले युद्ध में न फंसे। वे चाहते हैं कि मौजूदा संघर्ष को सीमित रखा जाए और जल्द कोई रास्ता निकाला जाए।

    ईरान की सरकार गिरने की संभावना कम

    अमेरिकी खुफिया एजेंसियों का मानना है कि फिलहाल ईरान की मौजूदा सरकार के जल्द गिरने की संभावना कम है। इसी कारण ट्रंप प्रशासन ने हाल के दिनों में तेहरान की सरकार को हटाने की बात भी कम कर दी है।

    युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता तलाश रहे ट्रंप

    सूत्रों के अनुसार ट्रंप प्रशासन अब इस संघर्ष से निकलने का रास्ता खोज रहा है। युद्ध शुरू होने के समय इसके कई लक्ष्य बताए गए थे—जैसे ईरान के हमलों को रोकना, उसके परमाणु कार्यक्रम को कमजोर करना और उसकी सैन्य क्षमता को सीमित करना।

    युद्ध रोकना भी आसान नहीं

    विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध शुरू करने के बाद उसे खत्म करना भी उतना ही मुश्किल होता है। अगर अमेरिका अचानक जीत का ऐलान कर सैन्य कार्रवाई रोक देता है और सैनिकों की वापसी शुरू कर देता है, तो अल्पकाल में वैश्विक बाजार शांत हो सकते हैं।
    लेकिन यदि ईरान की धार्मिक सरकार सत्ता में बनी रहती है और उसके पास परमाणु सामग्री, मिसाइल और ड्रोन मौजूद रहते हैं, तो इससे क्षेत्रीय सुरक्षा पर नए खतरे पैदा हो सकते हैं।

    ऊर्जा आपूर्ति पर बड़ा असर

    ईरान के पास अभी भी कई कम दूरी की मिसाइलें, ड्रोन और समुद्री बारूदी सुरंगें हैं। इनके जरिए वह तेल और गैस की आपूर्ति को प्रभावित कर सकता है, खासकर Strait of Hormuz के रास्ते। यह जलमार्ग दुनिया के सबसे अहम तेल परिवहन मार्गों में से एक माना जाता है।

    होर्मुज को खोलना भी चुनौती

    सैन्य विश्लेषकों का कहना है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह सुरक्षित करना हो तो ईरान के तटीय इलाकों में जमीनी सैन्य कार्रवाई करनी पड़ सकती है। ऐसा कदम युद्ध को और व्यापक बना सकता है और अमेरिकी सैनिकों के लिए बड़ा जोखिम पैदा कर सकता है।

    इसी वजह से विशेषज्ञ मानते हैं कि ट्रंप के लिए युद्ध शुरू करना जितना आसान था, उसे खत्म करना उतना ही कठिन साबित हो रहा है।

  • ईरान ने भारत से बुलाए 180 नौसैनिक, कोच्चि से उड़ान भरेंगे; अमेरिकी हमले में मृतकों के शव भी लौटाए जा रहे

    ईरान ने भारत से बुलाए 180 नौसैनिक, कोच्चि से उड़ान भरेंगे; अमेरिकी हमले में मृतकों के शव भी लौटाए जा रहे



    नई दिल्ली। मध्य पूर्व में ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के बीच भारत ने एक संवेदनशील कूटनीतिक मिशन अंजाम दिया है। ईरान ने अपने युद्धपोत IRIS Lavan के लगभग 180 गैर-जरूरी नौसैनिकों को भारत के कोच्चि से स्वदेश लौटाने की विशेष व्यवस्था की है। साथ ही, श्रीलंका के तट के पास अमेरिकी हमले में मारे गए नौसैनिकों के शव भी भारत के माध्यम से ईरान भेजे जा रहे हैं।

    सूत्रों के अनुसार, जहाज को 1 मार्च को तकनीकी खराबी के चलते आपातकालीन डॉकिंग की अनुमति मिली थी और यह 4 मार्च से कोच्चि में खड़ा है। जहाज पर कुल 183 चालक दल मौजूद थे, जिन्हें भारतीय नौसेना की सुविधाओं में रखा गया था। अब 180 गैर-जरूरी नाविकों को तुर्की एयरलाइन की उड़ान से पहले आर्मेनिया ले जाया जाएगा, और वहां से सड़क मार्ग के जरिए ईरान भेजा जाएगा। जबकि कुछ तकनीकी और आवश्यक कर्मचारी जहाज पर ही रहेंगे।

    यह घटनाक्रम उस समय सामने आया है जब श्रीलंका के तट के पास अमेरिकी पनडुब्बी ने ईरानी युद्धपोत IRIS Dena पर हमला किया था। इस हमले में कुल 130 नाविक सवार थे, जिनमें से 32 को बचा लिया गया, जबकि दर्जनों अभी भी लापता हैं।

    भारत इस समय गंभीर ऊर्जा संकट से जूझ रहा है। देश में रसोई गैस की कमी और जनजीवन पर असर पड़ रहा है। ऐसे में भारत ने अपने बंदरगाहों पर जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए ईरान के साथ लगातार कूटनीतिक संपर्क बनाए रखा। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ईरानी समकक्ष अब्बास अरागची से चार बार फोन पर बातचीत कर सुरक्षा और ऊर्जा जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा की।

    भारतीय नौसेना ने ईरान की विशेष परिवहन मांग को पूरा किया। कोच्चि से उड़ान भरने वाले नौसैनिक और शवों की सुरक्षित हवाई व सड़क मार्ग से वापसी क्षेत्रीय सुरक्षा और भारत-ईरान कूटनीति के लिहाज से अहम मानी जा रही है। यह मिशन मध्य पूर्व युद्ध और दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव के बीच बेहद संवेदनशील और रणनीतिक कदम माना जा रहा है।

  • होर्मुज के खतरे के बीच सुरक्षित निकला भारत का LPG जहाज ‘शिवालिक’, ट्रम्प का दावा,ईरान के खार्ग आइलैंड पर सैन्य ठिकाने तबाह

    होर्मुज के खतरे के बीच सुरक्षित निकला भारत का LPG जहाज ‘शिवालिक’, ट्रम्प का दावा,ईरान के खार्ग आइलैंड पर सैन्य ठिकाने तबाह


    नई दिल्ली । मिडिल ईस्ट में जारी अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच युद्ध का आज 15वां दिन है और हालात लगातार गंभीर होते जा रहे हैं। इसी तनावपूर्ण माहौल के बीच भारत के लिए एक राहत भरी खबर सामने आई है। भारत की सरकारी कंपनी शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया का एलपीजी टैंकर जहाज शिवालिक सुरक्षित रूप से होर्मुज स्ट्रेट पार कर गया है। जहाजों की गतिविधियों पर नजर रखने वाली वेबसाइट मरीनट्रैफिक के अनुसार यह जहाज 7 मार्च को कतर से अमेरिका के लिए रवाना हुआ था और शुक्रवार रात खतरनाक माने जाने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य से सुरक्षित निकल गया। इस जहाज की क्षमता करीब 55 हजार टन एलपीजी ढोने की है, इसलिए इसके सुरक्षित निकलने को भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    दूसरी ओर युद्ध के मोर्चे पर अमेरिका की ओर से बड़ा दावा किया गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है कि अमेरिकी सेना ने फारस की खाड़ी में स्थित ईरान के सबसे अहम तेल निर्यात केंद्र खार्ग आइलैंड पर मौजूद सैन्य ठिकानों को तबाह कर दिया है। ट्रम्प ने चेतावनी देते हुए यह भी कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो अमेरिका ईरान के तेल ढांचे को भी निशाना बना सकता है। खार्ग आइलैंड ईरान की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम है क्योंकि देश के करीब 80 से 90 प्रतिशत कच्चे तेल का निर्यात यहीं से होता है।

    इस बीच ईरान की राजनीति को लेकर भी चौंकाने वाले दावे सामने आए हैं। कई मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है कि ईरान के नए सुप्रीम लीडर मुजतबा खामेनेई गंभीर रूप से घायल हैं और फिलहाल कोमा में हैं। ब्रिटिश मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक 28 फरवरी को हुए अमेरिका-इजराइल हमले में वह बुरी तरह घायल हो गए थे और उन्हें तेहरान के सिना यूनिवर्सिटी अस्पताल में भर्ती कराया गया है। बताया जा रहा है कि चोट इतनी गंभीर थी कि डॉक्टरों को उनका एक पैर काटना पड़ा और उनके लिवर को भी काफी नुकसान पहुंचा है। अस्पताल के जिस हिस्से में उन्हें रखा गया है, वहां भारी सुरक्षा तैनात कर दी गई है और पूरे इलाके को सील कर दिया गया है।

    वहीं ईरान ने भारत को लेकर एक नरम रुख भी दिखाया है। न्यूज एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार ईरान ने दो भारतीय एलपीजी टैंकरों को होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने की अनुमति दे दी है। इन टैंकरों के जल्द भारत की ओर रवाना होने की उम्मीद है। अगर ऐसा होता है तो भारत में रसोई गैस की सप्लाई पर पड़ रहे दबाव को काफी हद तक कम किया जा सकेगा। इसके अलावा सऊदी अरब से कच्चा तेल लेकर आने वाला एक टैंकर भी मार्च की शुरुआत में होर्मुज पार कर चुका है और शनिवार तक भारत पहुंच सकता है।

    हालांकि अमेरिका और इजराइल की लगातार दो हफ्तों से चल रही एयरस्ट्राइक के बावजूद ईरान की सरकार फिलहाल मजबूत नजर आ रही है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट के अनुसार मौजूदा हालात में ईरान की सत्ता के गिरने की संभावना बेहद कम है और सरकार अभी भी देश की जनता पर नियंत्रण बनाए हुए है।

    युद्ध के कारण दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक होर्मुज स्ट्रेट पर जहाजों की आवाजाही भी काफी कम हो गई है। लॉयड्स लिस्ट इंटेलिजेंस के मुताबिक इस महीने अब तक केवल 77 जहाज ही इस रास्ते से गुजर पाए हैं। गौरतलब है कि दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल की आपूर्ति इसी समुद्री रास्ते से होकर गुजरती है, इसलिए यहां पैदा हुआ संकट पूरी दुनिया की ऊर्जा और अर्थव्यवस्था पर असर डाल सकता है।

  • ईरान के भूमिगत ठिकानों पर हमले की तैयारी? ब्रिटेन के एयरबेस पर अमेरिकी B-1B लांसर तैनात

    ईरान के भूमिगत ठिकानों पर हमले की तैयारी? ब्रिटेन के एयरबेस पर अमेरिकी B-1B लांसर तैनात

    वाशिंगटन। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच United States ने Iran के खिलाफ अपने सैन्य अभियान की तैयारी तेज कर दी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका ने पहली बार United Kingdom के एक एयरबेस से ईरान पर हमले की योजना बनाई है। इसके लिए अमेरिकी वायुसेना के तीन रणनीतिक बमवर्षक विमान Rockwell B‑1B Lancer को ब्रिटेन के RAF Fairford एयरबेस पर तैनात किया गया है।

    माना जा रहा है कि यह ब्रिटिश ठिकाने से ईरान पर संभावित अमेरिकी हमलों का पहला बड़ा मिशन हो सकता है। B-1B लांसर लंबी दूरी तक उड़ान भरने वाला भारी बमवर्षक विमान है, जो बड़ी मात्रा में पारंपरिक बम ले जाने में सक्षम है।

    बंकर-बस्टर बमों की तैयारी

    रिपोर्ट के अनुसार एयरबेस पर ग्राउंड क्रू को बमवर्षक विमानों में GPS-गाइडेड हथियार लोड करते देखा गया है। इन हथियारों में Joint Direct Attack Munition (JDAM) किट से लैस बम शामिल हैं, जो सामान्य बमों को सटीक लक्ष्य भेदने वाले हथियार में बदल देते हैं।

    ये किट 500 पाउंड के Mk‑82 bomb, 1,000 पाउंड के Mk‑83 bomb और 2,000 पाउंड के Mk‑84 bomb जैसे बमों पर लगाए जा सकते हैं। इसके अलावा इन्हें BLU‑109 जैसे पेनिट्रेटर बमों के साथ भी इस्तेमाल किया जा सकता है, जो भूमिगत सैन्य ठिकानों को नष्ट करने के लिए बनाए गए हैं।

    क्या होता है बंकर-बस्टर?

    बंकर-बस्टर बम विशेष रूप से जमीन के नीचे बने कंक्रीट बंकर, सुरंगों और सैन्य ठिकानों को नष्ट करने के लिए डिजाइन किए जाते हैं। इनका मजबूत स्टील आवरण विस्फोट से पहले जमीन के भीतर गहराई तक प्रवेश कर जाता है।

    अमेरिका का शक्तिशाली बंकर-बस्टर GBU‑57 Massive Ordnance Penetrator लगभग 200 फीट (करीब 60 मीटर) गहराई तक प्रवेश करने में सक्षम माना जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि B-1B लांसर जैसे भारी बमवर्षक विमानों को ऐसे हथियारों से लैस किया जाए तो वे भूमिगत मिसाइल ठिकानों और सैन्य भंडारों को भी निशाना बना सकते हैं।

    ब्रिटेन की भूमिका पर उठे सवाल

    इस संभावित सैन्य अभियान में ब्रिटेन की भूमिका को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। शुरुआती दौर में ब्रिटिश प्रधानमंत्री Keir Starmer की सरकार ने कहा था कि ब्रिटिश ठिकानों का इस्तेमाल सीधे हमलों के लिए नहीं होने दिया जाएगा।

    हालांकि बाद में लंदन ने अमेरिकी अनुरोध को मंजूरी दे दी और कहा कि इसका उद्देश्य “रक्षा के लिए मिसाइल खतरों को स्रोत पर ही नष्ट करना” है। यह फैसला उस समय लिया गया जब Cyprus में स्थित एक ब्रिटिश सैन्य अड्डे पर ड्रोन हमला हुआ था।

    मध्य-पूर्व में बढ़ी सैन्य गतिविधि

    युद्ध की शुरुआत के बाद ब्रिटेन ने पूर्वी भूमध्यसागर में अतिरिक्त सैन्य संसाधन तैनात किए हैं और ईरानी मिसाइल तथा ड्रोन हमलों को रोकने के लिए सहयोगी देशों के साथ ऑपरेशन चला रहा है।

    हालांकि ब्रिटेन में इस युद्ध को लेकर जनमत बंटा हुआ है। सर्वे एजेंसी YouGov के एक सर्वे के मुताबिक केवल 10% लोगों ने ही ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का जोरदार समर्थन किया, जबकि 37% लोगों ने इसका विरोध जताया।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका वास्तव में ब्रिटिश एयरबेस से हमले करता है, तो इससे पश्चिम एशिया में तनाव और भी बढ़ सकता है।

  • ईरानी मीडिया का दावा: खामेनेई की पत्नी मंसूरेह बघेरजादेह जिंदा, मौत की खबरें अफवाह

    ईरानी मीडिया का दावा: खामेनेई की पत्नी मंसूरेह बघेरजादेह जिंदा, मौत की खबरें अफवाह

    ईरानी मीडिया का दावा: खामेनेई की पत्नी मंसूरेह बघेरजादेह जिंदा, मौत की खबरें अफवाह
    दुबई। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता (Ali Khamenei) की पत्नी को लेकर फैली मौत की खबरों को ईरानी मीडिया ने खारिज कर दिया है। रिपोर्टों में कहा गया है कि Mansoureh Khojasteh Bagherzadeh पूरी तरह सुरक्षित हैं और उनके निधन की खबरें अफवाह हैं।

    ईरान की सरकारी मीडिया और एक समाचार एजेंसी ने गुरुवार को स्पष्ट किया कि सोशल मीडिया और कुछ अंतरराष्ट्रीय प्लेटफॉर्म पर जो दावे किए जा रहे थे, वे गलत हैं। हाल के दिनों में पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष के दौरान यह खबर फैल गई थी कि अमेरिका और Israel के हमले में अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के साथ उनकी पत्नी भी मारी गईं।

    मोजतबा के बयान के बाद स्पष्टता

    हालांकि बाद में ईरानी मीडिया ने इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया। बताया गया कि ईरान के नए सर्वोच्च नेता Mojtaba Khamenei ने गुरुवार को अपना पहला आधिकारिक बयान जारी किया, जिसमें अपनी मां के निधन का कोई जिक्र नहीं था। इसके बाद सरकारी सूत्रों ने पुष्टि की कि उनकी मौत की खबरें गलत हैं।

    युद्ध के माहौल में फैल रही अपुष्ट खबरें

    पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के बीच कई तरह की अपुष्ट खबरें तेजी से फैल रही हैं। ऐसे माहौल में सोशल मीडिया पर अफवाहें भी तेजी से वायरल हो रही हैं। ईरान की सरकारी एजेंसियों ने लोगों से अपील की है कि वे केवल आधिकारिक स्रोतों से जारी जानकारी पर ही भरोसा करें।

    हमलों के बाद बढ़ा तनाव

    गौरतलब है कि हाल ही में United States और Israel के संयुक्त सैन्य हमलों में ईरान के कई शीर्ष नेताओं के मारे जाने की खबरें सामने आई थीं। इसके बाद Iran ने जवाबी कार्रवाई करते हुए क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी ठिकानों और इजरायल से जुड़े लक्ष्यों पर हमले किए, जिससे पूरे पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ गया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि संघर्ष के दौर में जानकारी की पुष्टि करना और आधिकारिक स्रोतों पर भरोसा करना पहले से कहीं अधिक जरूरी हो जाता है।

  • 6 साल बाद फिर बीजिंग से प्योंगयांग के लिए पहली ट्रेन रवाना

    6 साल बाद फिर बीजिंग से प्योंगयांग के लिए पहली ट्रेन रवाना


    बीजिंग। करीब छह साल के लंबे अंतराल के बाद चीन और उत्तर कोरिया के बीच यात्री ट्रेन सेवा एक बार फिर शुरू हो गई है। गुरुवार को बीजिंग रेलवे स्टेशन से दोनों देशों की राजधानियों को जोड़ने वाली पहली ट्रेन रवाना हुई। इससे चीन और उत्तर कोरिया के बीच लोगों के आवागमन और संपर्क बढ़ाने की दिशा में नया कदम माना जा रहा है।

    चीनी रेलवे प्राधिकरण के अनुसार ट्रेन K27 शुक्रवार शाम 6:07 बजे उत्तर कोरिया की राजधानी Pyongyang पहुंचेगी। यह ट्रेन लगभग 24 घंटे 41 मिनट का सफर तय करेगी और रास्ते में चीन के सीमावर्ती शहर Dandong में ठहरेगी, जो China और North Korea के बीच प्रमुख सीमा शहर है।

    चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि दोनों देश “मैत्रीपूर्ण पड़ोसी” हैं और सीमा पार यात्री ट्रेन सेवा फिर से शुरू होने से लोगों के बीच संपर्क और आदान-प्रदान को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने यह भी कहा कि चीन दोनों देशों के बीच यात्रा और संवाद को आसान बनाने के लिए मजबूत सहयोग का समर्थन करता है।

    हालांकि ट्रैवल एजेंसियों के मुताबिक उत्तर कोरिया अभी भी विदेशी पर्यटकों के लिए लगभग बंद है। कुछ सीमित अपवादों में रूस के पर्यटन समूहों को विशेष व्यवस्थाओं के तहत प्रवेश दिया जा रहा है।

    रेलवे प्राधिकरण के नोटिस के अनुसार बीजिंग और प्योंगयांग के बीच चलने वाली यह ट्रेन सप्ताह में चार दिन—सोमवार, बुधवार, गुरुवार और शनिवार दोनों दिशाओं में संचालित होगी। बीजिंग की एक ट्रैवल एजेंसी ने बताया कि गुरुवार की यात्रा के लिए टिकट पूरी तरह बिक चुके थे और फिलहाल ये केवल बिजनेस वीजा धारकों के लिए उपलब्ध थे, जबकि 18 मार्च की यात्रा के लिए टिकट अभी भी मिल रहे हैं।

    चीनी सरकारी समाचार एजेंसी Xinhua News Agency के मुताबिक छोटा मार्ग डैंडोंग-प्योंगयांग भी दोनों दिशाओं में रोजाना संचालित होगा। इस रूट की पहली ट्रेन गुरुवार सुबह 10 बजे डैंडोंग से रवाना हुई और शाम 6:07 बजे प्योंगयांग पहुंचने का कार्यक्रम है।

    इससे पहले उत्तर कोरिया की सरकारी एयरलाइन Air Koryo ने 2023 में चीन के लिए अपनी उड़ानें फिर से शुरू की थीं। एयरलाइन फिलहाल Beijing और प्योंगयांग के बीच मंगलवार और शनिवार को सप्ताह में दो बार सेवाएं संचालित कर रही है।

    ट्रेन सेवा की बहाली को दोनों देशों के बीच परिवहन संपर्क और संबंधों में धीरे-धीरे बढ़ती सक्रियता के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

  • क्या होते हैं ‘श्याओकांग’ गांव? LAC के पास चीन ने बसाए सैकड़ों गांव, भारत ने भी बढ़ाई सीमा पर तैयारी

    क्या होते हैं ‘श्याओकांग’ गांव? LAC के पास चीन ने बसाए सैकड़ों गांव, भारत ने भी बढ़ाई सीमा पर तैयारी

    बीजिंग। भारत-चीन सीमा पर बुनियादी ढांचे की होड़ तेज होती जा रही है। चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के पास सैकड़ों नए गांव बसाए हैं, जिनमें बड़ी संख्या Arunachal Pradesh की सीमा के सामने स्थित है। भारतीय सेना के उपप्रमुख (रणनीति) Rajiv Ghai ने जानकारी दी कि चीन ने LAC के आसपास 600 से अधिक गांव बसाए हैं, जिनमें से करीब 72% उत्तर-पूर्वी सीमा के पास हैं। इनमें लगभग 450 गांव सीधे अरुणाचल प्रदेश की सीमा के सामने बनाए गए हैं।

    क्या हैं ‘श्याओकांग’ गांव?

    चीन इन सीमावर्ती बस्तियों को ‘श्याओकांग’ गांव कहता है। चीनी भाषा में ‘श्याओकांग’ का अर्थ समृद्ध या खुशहाल गांव होता है। इन गांवों का निर्माण मुख्य रूप से Tibet Autonomous Region से लगने वाली भारतीय सीमा के पास पिछले करीब पांच वर्षों से किया जा रहा है।

    इन बस्तियों में आम तौर पर दो मंजिला आधुनिक मकान, चौड़ी सड़कें और अन्य बुनियादी सुविधाएं विकसित की गई हैं। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इन गांवों का इस्तेमाल दोहरे उद्देश्य से किया जा सकता है—एक ओर नागरिक आबादी को बसाने के लिए और दूसरी ओर किसी सैन्य तनाव की स्थिति में सैनिकों की तैनाती, रसद और निगरानी के लिए। इसे चीन द्वारा विवादित क्षेत्रों पर अपना दावा मजबूत करने की रणनीति के रूप में भी देखा जा रहा है।

    पहले खाली रहे, अब बसने लगी आबादी

    चीन ने 2019 के बाद इन गांवों का निर्माण तेज कर दिया था, लेकिन शुरुआत में कई गांव खाली पड़े रहे। रिपोर्टों के मुताबिक 2023 से चीनी नागरिकों ने इन बस्तियों में बसना शुरू किया है।

    खास तौर पर अरुणाचल प्रदेश के लोहित घाटी और Tawang सेक्टर के सामने वाले इलाकों में आबादी बढ़ने लगी है।

    बताया जाता है कि चीन ने इसी तरह के कुछ गांव Bhutan के क्षेत्रों के पास भी बनाए हैं।

    सीमा कानून से बढ़ी रणनीति

    चीन ने 1 जनवरी 2022 से नया थल सीमा कानून लागू किया, जिसका उद्देश्य सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक विकास को बढ़ावा देना बताया गया। इस कानून के तहत सरकार लोगों को सीमा क्षेत्रों में बसने और काम करने के लिए प्रोत्साहित करती है, जिससे वहां नागरिक मौजूदगी बढ़े और निगरानी तंत्र मजबूत हो सके।

    भारत भी दे रहा जवाब

    चीन की इस रणनीति के जवाब में भारत सरकार ने 2022 में ‘वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम’ शुरू किया। इस योजना के तहत सीमा के पास स्थित 663 गांवों को बुनियादी सुविधाओं, सड़क, संचार और पर्यटन विकास से जोड़ा जा रहा है ताकि वहां से पलायन रोका जा सके।

    इस कार्यक्रम के लिए कई गांवों को प्राथमिकता दी गई है, जिनमें Kibithu, Tuting, Taksing, Chayang Tajo और Zemithang शामिल हैं।

    सीमा पर तेज हुआ इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण

    चीन तवांग और सियांग घाटी के आसपास नई सड़कें, पुल और हवाई पट्टियां भी विकसित कर रहा है। इसके जवाब में भारत ने भी LAC के पास फॉरवर्ड कनेक्टिविटी मजबूत की है। नए हेलीपैड, अंतर-घाटी सड़कें और वैकल्पिक मार्ग बनाए जा रहे हैं, जिससे भारतीय सेना की तैनाती और मूवमेंट पहले से कहीं अधिक तेज हो सके।

    लेफ्टिनेंट जनरल घई के अनुसार सीमावर्ती क्षेत्रों में तेजी से उभरती ये बस्तियां भारत के लिए रणनीतिक चुनौती जरूर हैं, लेकिन साथ ही सीमा पर मजबूत बुनियादी ढांचा और स्थानीय आबादी को वहां बनाए रखना अब भारत की सुरक्षा रणनीति का अहम हिस्सा बन गया है।

  • मिडिल ईस्ट में बढ़ा राजनीतिक टकराव, Benjamin Netanyahu ने Mojtaba Khamenei को आईआरजीसी की कठपुतली बताया

    मिडिल ईस्ट में बढ़ा राजनीतिक टकराव, Benjamin Netanyahu ने Mojtaba Khamenei को आईआरजीसी की कठपुतली बताया


    नई दिल्ली। ईरान के खिलाफ 28 फरवरी को हुए अमेरिका-इजरायल हमलों के बाद इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने पहली बार प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इस दौरान उन्होंने ईरान की मौजूदा स्थिति और संभावित राजनीतिक बदलाव पर बयान दिया। नेतन्याहू ने कहा कि उन्हें यह निश्चित नहीं था कि हमलों के बाद ईरान की जनता इस्लामिक रिपब्लिक के खिलाफ खड़ी हो जाएगी या नहीं।

    मोजतबा खामेनेई पर आरोप
    नेतन्याहू ने ईरान के नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई को इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजी) की कठपुतली बताई। उनका कहना था कि खामेनेई सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आते और असल ताकत आईआरजी के पास है। उन्होंने यह भी कहा कि युद्ध शुरू होने के बाद से मोजतबा खामेनेई जनता रूप से नजर नहीं आए हैं, जिससे उनके बारे में कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं।

    ईरान में सत्ता परिवर्तन पर बयान
    इजरायली प्रधानमंत्री ने कहा कि बाहरी ताकतें बना सकती हैं, लेकिन किसी देश में सत्ता परिवर्तन अंततः उसी देश के लोगों द्वारा ही संभव होता है। उन्होंने कहा, “आप किसी को पानी तक ले जा सकते हैं, लेकिन उसे पीने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। नेतन्याहू के अनुसार इजरायल के हवाई हमले और सैन्य कार्रवाई का उद्देश्य ऐसे हालात बनाना है, जिससे ईरान की जनता को विरोध के लिए जगह मिल सके।

    आईआर जेब और बासिज पर हमले का दावा
    नेतन्याहू ने कहा कि इजरायल की सेना ईरान की सैन्य ताकतों को घुमा रही है, जिनमें इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स और उनके सहयोगी मिलिशिया बासिज शामिल हैं। उन्होंने दावा किया कि इन संगठनों के ठिकानों और चेकपॉइंट्स पर लगातार हमले किए जा रहे हैं।

    परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंता
    नेतन्याहू ने कहा कि इजरायल की कार्रवाई का मुख्य उद्देश्य ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना है। उनके अनुसार ईरान ने हाल के महीनों में अपने परमाणु कार्यक्रम और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को फिर से तेज किया था। उन्होंने यह भी दावा किया कि इजरायल ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को घुमाया है और एक महत्वपूर्ण परमाणु वैज्ञानिक को भी मार गिराया है।

    मोजतबा पर हमले के सवाल पर प्रतिक्रिया
    जब पत्रकारों ने पूछा कि क्या इजरायली मोजतबा खामेनेई को भी घुमाया जा सकता है, तो नेतन्याहू ने कहा कि वह “किसी भी आतंकवादी संगठन के नेता के लिए जीवन बीमा नीतियां नहीं लेंगे।

  • पीएम मोदी की नेतृत्व शैली की तारीफ, Tony Abbott बोले- उन्होंने सत्ता का घमंड खुद से दूर रखा

    पीएम मोदी की नेतृत्व शैली की तारीफ, Tony Abbott बोले- उन्होंने सत्ता का घमंड खुद से दूर रखा


    नई दिल्ली। ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी एबॉट ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की तारीफ करते हुए कहा कि दस साल से ज़्यादा समय तक सत्ता में रहने के बावजूद उन्होंने खुद को “सत्ता के अहंकार” से दूर रखा है। एबॉट ने यह टिप्पणी भारत में आयोजित मनमोहन सिंह सम्मेलन रायसीना डायलॉग के 11वें संस्करण के संदर्भ में की। उन्होंने कहा कि यह मंच आज वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण संवाद का केंद्र बन चुका है।

    रायसीना डायलॉग की बढ़ती वैश्विक अहमियत
    टोनी एबॉट ने कहा कि 2016 से हर साल मार्च में नई दिल्ली में रायसीना डायलॉग आयोजित किया जाता है। यह विचार भारत के विदेश मंत्री सुब्रह्मण्यम जयशंकर से बताया गया, जो लंबे समय तक भारत के विदेश मंत्री रहे हैं।

    उन्होंने कहा कि यह कॉन्फ्रेंस राजनीतिक नेताओं, सैन्य अधिकारियों, उद्योगपतियों, पत्रकारों और थिंक टैंक के कार्यकर्ताओं को वैश्विक मुद्दों पर चर्चा के लिए एक मंच प्रदान करता है। एबॉट के अनुसार इस कॉन्फ्रेंस में कई वजहों से वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की सालाना मीटिंग से भी अलग है, क्योंकि यह केवल होस्ट सरकार की तारीफ तक सीमित नहीं रहता, बल्कि खुली चर्चा को बढ़ावा देता है।

    मोदी के नेतृत्व की शैली की तारीफ
    एबॉट ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी दुनिया के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक हैं, लेकिन इसके बावजूद वे दूसरों की बात सुनने की क्षमता रखते हैं। उन्होंने बताया कि रायसीना डायलॉग के उद्घाटन सत्र में प्रधानमंत्री मोदी अक्सर मुख्य अतिथि को सुनते हैं और खुद भाषण देने से भी परहेज करते हैं। यह नेतृत्व की विनम्र शैली का उदाहरण है।

    लोकतंत्र को लेकर आलोचनाओं को गलत बताया
    टोनी एबॉट ने उन अंतरराष्ट्रीय आलोचनाओं को भी खारिज किया जिनमें कहा जाता है कि भारत में लोकतंत्र कमजोर हो रहा है। उन्होंने कहा कि जिस देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव, स्वतंत्र मीडिया और मजबूत न्यायपालिका हो, वहां तानाशाही का खतरा नहीं हो सकता। एबॉट ने यह भी कहा कि रायसीना डायलॉग जैसे मंच इस बात का प्रमाण हैं कि भारत में खुली बहस और विचारों का हेरफेर-तत्व संभव है।