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  • पाकिस्तान में लश्कर-ए-तैयबा के कमांडर कारी सईद की संदिग्ध मौत, हाफिज सईद से तीन दशक पुराना था संबंध

    पाकिस्तान में लश्कर-ए-तैयबा के कमांडर कारी सईद की संदिग्ध मौत, हाफिज सईद से तीन दशक पुराना था संबंध

    नई दिल्ली । पाकिस्तान में आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े कमांडर कारी सईद उर्फ अब्दुल अजीज की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत की खबर सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, इस्लामाबाद स्थित लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ी एक मस्जिद में नमाज से पहले वह अचानक जमीन पर गिर गया। मौके पर मौजूद लोगों ने उसे संभालने और प्राथमिक उपचार देने की कोशिश की, लेकिन उसकी हालत में सुधार नहीं हुआ। बाद में उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया। उसकी मौत के कारणों को लेकर फिलहाल अलग-अलग तरह की चर्चाएं सामने आ रही हैं।

    कारी सईद को लश्कर-ए-तैयबा के पुराने और प्रभावशाली कमांडरों में गिना जाता था। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक वह संगठन के साथ लंबे समय से जुड़ा हुआ था और आतंकी सरगना हाफिज सईद के करीबी लोगों में शामिल था। बताया जाता है कि कारी सईद वर्ष 1990 से हाफिज सईद के साथ जुड़ा हुआ था। शुरुआती वर्षों में उसने संगठन के लिए सक्रिय भूमिका निभाई और आतंकियों की भर्ती जैसे कामों में भी उसकी जिम्मेदारी रही।

    रिपोर्ट के अनुसार, कारी सईद वर्ष 2017 तक लश्कर-ए-तैयबा की आतंकी गतिविधियों से जुड़े कामों में सक्रिय रहा। बाद के वर्षों में संगठन ने उसे प्रशासनिक जिम्मेदारियां सौंप दी थीं। वह दक्षिण पंजाब क्षेत्र में संगठन से जुड़े एक विभाग की जिम्मेदारी संभालता था। इस विभाग का काम भारत में मारे गए आतंकियों के परिवारों तक आर्थिक सहायता पहुंचाने और संगठन से जुड़े लोगों का रिकॉर्ड तैयार करने से संबंधित बताया जाता है।

    कारी सईद की मौत से जुड़ी घटनाओं का क्रम भी सामने आया है। बताया गया है कि वह इस्लामाबाद की मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिए पहुंचा था। वहां उसने अपना बैग एक साथी को सौंपा और वुजू किया। इसके बाद जब वह नमाज के लिए मुख्य हॉल की ओर बढ़ा और चप्पल उतारने के लिए बैठा, तभी अचानक जमीन पर गिर पड़ा। आसपास मौजूद लश्कर के अन्य सदस्यों ने उसे उठाया और मदद की कोशिश की। उसकी सांस रुकने के बाद कथित तौर पर सीपीआर भी दिया गया, लेकिन उसे होश नहीं आया।

    इसके बाद कारी सईद को अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। उसकी अचानक हुई मौत ने उसके संगठन से जुड़े लोगों के बीच भी सवाल खड़े किए हैं। हालांकि, मौत की वास्तविक वजह को लेकर आधिकारिक तौर पर विस्तृत जानकारी सामने नहीं आई है। ऐसे में इस घटना को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले आधिकारिक जांच और मेडिकल जानकारी का इंतजार करना जरूरी है।

    बताया जाता है कि सक्रिय आतंकी भूमिका से हटने के बाद कारी सईद को लश्कर-ए-तैयबा के प्रशासनिक नेटवर्क में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गई थीं। दक्षिण पंजाब के मुल्तान, बहावलपुर और डेरा गाजी खान जैसे क्षेत्रों से जुड़े आतंकियों के बारे में जानकारी जुटाना और उनके परिवारों तक आर्थिक सहायता पहुंचाना उसकी जिम्मेदारियों में शामिल था। उसकी मौत ऐसे समय में सामने आई है जब पाकिस्तान में आतंकी संगठनों से जुड़े कई पुराने चेहरों की गतिविधियों और उनके नेटवर्क को लेकर लगातार चर्चा होती रही है। कारी सईद की संदिग्ध मौत के कारण और उससे जुड़े अन्य पहलुओं पर आगे मिलने वाली जानकारी से स्थिति और स्पष्ट हो सकती है।

  • अमेरिकी सीनेट से रूस के तेल खरीदारों पर 100% टैरिफ का रास्ता साफ, भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता

    अमेरिकी सीनेट से रूस के तेल खरीदारों पर 100% टैरिफ का रास्ता साफ, भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता

    नई दिल्ली । अमेरिका और रूस के बीच जारी तनाव का असर अब भारत और चीन समेत उन देशों पर पड़ सकता है, जो रूस से बड़ी मात्रा में तेल और गैस खरीदते हैं। अमेरिकी सीनेट ने ऐसे विधेयक को भारी बहुमत से मंजूरी दी है, जिसके कानून बनने पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस के प्रमुख ऊर्जा खरीदार देशों से आने वाले सामान पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने की ताकत मिल सकती है।

    सीनेट में विधेयक के पक्ष में 86 वोट पड़े, जबकि 11 सांसदों ने इसका विरोध किया। प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य रूस की ऊर्जा आय से जुड़े आर्थिक संसाधनों पर दबाव बढ़ाना और यूक्रेन युद्ध के बीच रूस की आर्थिक क्षमता को कमजोर करना बताया गया है।

    प्रस्तावित व्यवस्था के तहत रूस से सबसे अधिक तेल और गैस खरीदने वाले पांच देशों को निशाने पर लिया जा सकता है। इनमें भारत और चीन के अलावा अजरबैजान, हंगरी और स्लोवाकिया शामिल हैं। हालांकि, सीनेट से विधेयक पारित होने का मतलब यह नहीं है कि इन देशों पर तत्काल 100 प्रतिशत टैरिफ लागू हो गया है।

    दरअसल, विधेयक को अभी अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की मंजूरी मिलना बाकी है। इसके बाद राष्ट्रपति की स्वीकृति की प्रक्रिया होगी। इन सभी चरणों के पूरा होने के बाद ही यह कानून का रूप ले सकेगा। इसलिए फिलहाल भारत पर इस प्रस्ताव के तहत कोई नया 100 प्रतिशत शुल्क लागू नहीं हुआ है।

    इस प्रस्ताव को लेकर एक महत्वपूर्ण पहलू इसकी अधिकतम टैरिफ सीमा है। पिछले वर्ष पेश किए गए शुरुआती प्रस्ताव में रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की बात कही गई थी। इस पहल को रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम और डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने आगे बढ़ाया था।

    बाद में प्रस्ताव में बदलाव किया गया और 500 प्रतिशत वाले प्रावधान को हटाकर रूस के पांच सबसे बड़े तेल और गैस खरीदार देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का विकल्प रखा गया। इससे यह साफ होता है कि प्रस्तावित कानून में अधिकतम सीमा तय की गई है, लेकिन हर देश पर अनिवार्य रूप से इतनी ही दर लागू करना जरूरी नहीं होगा।

    कानून बनने की स्थिति में ट्रंप को टैरिफ की दर तय करने में महत्वपूर्ण अधिकार मिल सकते हैं। राष्ट्रीय हित, कूटनीतिक परिस्थितियों और दूसरे देशों के साथ अमेरिका के संबंधों को ध्यान में रखते हुए वह शुल्क में बदलाव या कुछ मामलों में राहत देने का निर्णय कर सकते हैं।

    भारत के लिए यह मुद्दा इसलिए अहम है क्योंकि रूस से कच्चे तेल की खरीद पिछले कुछ वर्षों में उसकी ऊर्जा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। रूस से मिलने वाले तेल ने भारतीय रिफाइनिंग और ऊर्जा जरूरतों के लिहाज से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ऐसे में अमेरिकी शुल्क नीति में बड़ा बदलाव भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर भी असर डाल सकता है।

    प्रस्ताव में रूस के अलावा ईरान को लेकर भी सख्ती का प्रावधान है। ईरान के ऊर्जा क्षेत्र में निवेश करने वाली कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने से जुड़े कानून की अवधि बढ़ाने का प्रस्ताव रखा गया है। इसके साथ ही रूस के वरिष्ठ अधिकारियों, कारोबारियों और वित्तीय संस्थानों पर प्रतिबंध लगाने की व्यवस्था भी प्रस्तावित है।

    अब सबकी नजर अमेरिकी प्रतिनिधि सभा पर है, जिसका नया सत्र 31 अगस्त से शुरू होना है। वहां विधेयक पर चर्चा और मतदान के बाद इसकी आगे की दिशा तय होगी। फिलहाल भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि सीनेट की मंजूरी अंतिम टैरिफ फैसला नहीं है। आने वाले चरणों में अमेरिकी संसद और राष्ट्रपति के निर्णय से ही स्पष्ट होगा कि भारत पर वास्तविक शुल्क कितना पड़ सकता है और इसका द्विपक्षीय व्यापार पर कितना असर होगा।

  • भारत-चीन सीमा वार्ता में LAC पर शांति के साथ नदी जल डेटा साझा करने और अपस्ट्रीम परियोजनाओं में पारदर्शिता पर जोर

    भारत-चीन सीमा वार्ता में LAC पर शांति के साथ नदी जल डेटा साझा करने और अपस्ट्रीम परियोजनाओं में पारदर्शिता पर जोर


    नई दिल्ली ।
    भारत और चीन के बीच सीमा मामलों को लेकर बातचीत का एक और महत्वपूर्ण दौर हुआ, जिसमें वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC की मौजूदा स्थिति, लंबित सीमा मुद्दों, सीमा प्रबंधन और दोनों देशों के बीच नदी सहयोग से जुड़े विषयों पर चर्चा की गई। बातचीत के दौरान भारत ने स्पष्ट किया कि सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता दोनों देशों के संबंधों को सामान्य दिशा में आगे बढ़ाने के लिए बेहद जरूरी है। इसके साथ ही भारत ने चीन की अपस्ट्रीम नदी परियोजनाओं से जुड़ी गतिविधियों में पारदर्शिता बढ़ाने और निचले बहाव वाले देशों के हितों का ध्यान रखने की आवश्यकता पर जोर दिया।

    भारत की ओर से सीमा पार नदियों से जुड़े सहयोग को दोबारा सक्रिय करने का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया। भारत ने 2006 में स्थापित एक्सपर्ट लेवल मैकेनिज्म ऑन ट्रांस-बॉर्डर रिवर्स की अगली बैठक जल्द आयोजित करने की जरूरत बताई। इस तंत्र के माध्यम से दोनों देशों के बीच सीमा पार बहने वाली नदियों से जुड़े तकनीकी और जल संसाधन संबंधी विषयों पर बातचीत होती रही है। भारत ने अपस्ट्रीम परियोजनाओं से संबंधित तकनीकी सूचनाओं को साझा करने को भी महत्वपूर्ण बताया है, ताकि नदियों के प्रवाह और संभावित प्रभावों को लेकर बेहतर समन्वय कायम किया जा सके।

    यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि चीन की ओर से बड़े बांध और जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर गतिविधियां बढ़ी हैं। भारत लगातार इस बात पर जोर देता रहा है कि ऊपरी बहाव में बनने वाली बड़ी जल परियोजनाओं का असर निचले बहाव वाले देशों के हितों पर नहीं पड़ना चाहिए। भारत ने चीन के समक्ष अपनी चिंताओं को रखते हुए कहा है कि अपस्ट्रीम गतिविधियों के संबंध में पर्याप्त पारदर्शिता और समय पर जानकारी साझा करना जरूरी है।

    हाइड्रोलॉजिकल डेटा यानी नदियों के जल प्रवाह और जल स्तर से संबंधित आंकड़ों को साझा करना भी दोनों देशों के बीच सहयोग का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। भारत का मानना है कि नियमित और विश्वसनीय आंकड़ों की उपलब्धता से बाढ़ जैसी परिस्थितियों से निपटने, जल संसाधन प्रबंधन बेहतर करने और सीमा पार नदियों से जुड़े संभावित जोखिमों को समझने में मदद मिल सकती है। इसी वजह से भारत ने सीमा पार नदी सहयोग को फिर से मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया है।

    भारत-चीन सीमा मामलों पर बातचीत के लिए गठित वर्किंग मैकेनिज्म फॉर कंसल्टेशन एंड कोऑर्डिनेशन यानी WMCC की 36वीं बैठक में इन मुद्दों के साथ LAC से जुड़े लंबित विषयों पर भी विस्तार से चर्चा हुई। दोनों पक्षों ने गलतफहमी और तनाव की स्थिति से बचने के लिए उपलब्ध कूटनीतिक और सैन्य माध्यमों का इस्तेमाल जारी रखने पर सहमति जताई। सीमा क्षेत्रों में स्थिरता बनाए रखना दोनों देशों के बीच व्यापक संबंधों में सुधार के लिए महत्वपूर्ण माना गया।

    बैठक में सीमा निर्धारण और बॉर्डर मैनेजमेंट से जुड़े विषयों पर भी चर्चा हुई। पिछले वर्ष हुई स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव स्तर की 24वीं वार्ता के परिणामों को आगे बढ़ाने पर दोनों पक्षों ने विचार किया। इसी प्रक्रिया के तहत सीमा निर्धारण से जुड़े कुछ मुद्दों पर शुरुआती प्रगति की संभावनाओं का अध्ययन करने के लिए WMCC के तहत विशेषज्ञ समूह गठित करने की दिशा में भी काम आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया है।

    भारत और चीन के बीच सीमा विवाद लंबे समय से दोनों देशों के संबंधों के लिए संवेदनशील मुद्दा रहा है। ऐसे में LAC पर शांति बनाए रखने के साथ नदी जल और सीमा पार सहयोग जैसे विषयों पर नियमित संवाद दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण है। ताजा बातचीत से संकेत मिलता है कि दोनों पक्ष विवादित मुद्दों के साथ-साथ व्यावहारिक सहयोग के क्षेत्रों में भी संवाद बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। आने वाले समय में सीमा वार्ता और नदी सहयोग से जुड़े तंत्र की अगली बैठकों से यह स्पष्ट होगा कि इन मुद्दों पर जमीनी स्तर पर कितना आगे बढ़ा जा सकता है।

  • पेजेशकियान ने 48 घंटे में ईरान पर कब्जे की कथित योजना का किया खुलासा, मुस्लिम देशों से एकजुट होने की अपील

    पेजेशकियान ने 48 घंटे में ईरान पर कब्जे की कथित योजना का किया खुलासा, मुस्लिम देशों से एकजुट होने की अपील

    नई दिल्ली । ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने अमेरिका और इजरायल के साथ जारी तनाव और सैन्य संघर्ष को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने दावा किया कि ईरान ने यह लड़ाई शुरू नहीं की थी, बल्कि उसके खिलाफ पहले सैन्य कार्रवाई की गई। पेजेशकियान के अनुसार, ईरान पर लगातार दबाव बनाया गया और उसे कमजोर करने की कोशिश की गई, लेकिन इसके बावजूद देश अपनी स्थिति पर मजबूती से कायम है। उन्होंने कहा कि ईरानी नेतृत्व ने संकट के बीच देश की एकता और मजबूती बनाए रखने पर जोर दिया है।

    पेजेशकियान ने बताया कि संघर्ष शुरू होने से पहले उनकी सरकार बातचीत के जरिए समाधान निकालना चाहती थी। उनका कहना है कि ईरान युद्ध नहीं चाहता था और तनाव को कूटनीतिक माध्यमों से कम करने की कोशिश की जा रही थी। हालांकि, उनके मुताबिक दूसरी ओर से सैन्य कार्रवाई की गई, जिसके बाद हालात तेजी से बदल गए। राष्ट्रपति ने कहा कि ईरान पर सैन्य और राजनीतिक दबाव के बावजूद देश ने अपने फैसलों से पीछे हटने के बजाय राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी है। उनके बयान में ईरान की ओर से संघर्ष को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश दिखाई देती है।

    ईरानी राष्ट्रपति ने विरोधियों की कथित रणनीति का जिक्र करते हुए कहा कि यह अनुमान लगाया गया था कि ईरान ज्यादा समय तक दबाव का सामना नहीं कर पाएगा। उनके अनुसार, सीरिया जैसे हालात पैदा करके 48 घंटे के भीतर ईरान पर कब्जा करने या उसे कमजोर करने की योजना बनाई गई थी। पेजेशकियान ने दावा किया कि यह आकलन गलत साबित हुआ। उन्होंने कहा कि मुश्किल परिस्थितियों के दौरान ईरान ने अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया और देश को टूटने नहीं दिया। राष्ट्रपति ने भरोसा जताया कि ईरान आने वाले समय में भी अपने फैसलों और राष्ट्रीय हितों पर कायम रहेगा।

    पेजेशकियान ने मुस्लिम देशों से एकजुट होने की अपील भी की। उन्होंने कहा कि अगर मुस्लिम देश एक साथ खड़े होते हैं तो बाहरी दबाव और चुनौतियों का सामना करना कम मुश्किल हो सकता है। उनके इस आह्वान को मौजूदा क्षेत्रीय संकट के बीच समर्थन जुटाने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। ईरान का मानना है कि क्षेत्रीय देशों की एकजुटता से बाहरी दबाव का प्रभाव कम किया जा सकता है। ऐसे में पेजेशकियान का संदेश केवल घरेलू जनता तक सीमित नहीं है, बल्कि मुस्लिम देशों के लिए भी राजनीतिक संकेत देता है।

    ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई को लेकर भी पेजेशकियान ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में उनसे संपर्क करना आसान नहीं है। हालांकि, इसके बावजूद उन्होंने खामेनेई की मौजूदगी को देश के लिए बेहद महत्वपूर्ण बताया। राष्ट्रपति की यह टिप्पणी ईरान के मौजूदा नेतृत्व और संकट के दौरान निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण मानी जा रही है। खामेनेई की भूमिका को लेकर ईरानी नेतृत्व की प्राथमिकता भी इस बयान में दिखाई देती है।

    पेजेशकियान के बयान ऐसे समय में सामने आए हैं जब ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच तनाव क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बना हुआ है। ईरानी राष्ट्रपति एक तरफ बातचीत की कोशिशों और युद्ध शुरू नहीं करने का दावा कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ किसी भी दबाव के सामने मजबूती से खड़े रहने का संदेश दे रहे हैं। आने वाले समय में सैन्य गतिविधियों के साथ कूटनीतिक प्रयास भी महत्वपूर्ण होंगे। यदि बातचीत का रास्ता खुलता है तो तनाव कम करने की संभावना बन सकती है, लेकिन सैन्य टकराव बढ़ने की स्थिति में इसका असर पूरे क्षेत्र पर पड़ सकता है।

  • बांग्लादेशी राजनीति में नया बवाल, बीएनपी सांसद ने शेख हसीना की अवामी लीग के विलय का किया समर्थन।

    बांग्लादेशी राजनीति में नया बवाल, बीएनपी सांसद ने शेख हसीना की अवामी लीग के विलय का किया समर्थन।

    नई दिल्ली ।बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के भारत से दिए गए बयान और दिसंबर में स्वदेश वापसी की घोषणा के बीच देश की राजनीति में एक नया विवाद गहरा गया है। सत्तारूढ़ बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के सांसद नासिर उद्दीन चौधरी ने पूर्व प्रधानमंत्री की पार्टी अवामी लीग को अपना राजनीतिक सहयोगी बताते हुए दोनों दलों के भविष्य में विलय का सुझाव दिया है। प्रधानमंत्री तारिक रहमान के नेतृत्व वाली पार्टी के सांसद के इस अप्रत्याशित बयान के बाद देश के राजनीतिक गलियारों में भारी हलचल मच गई है, क्योंकि दोनों दलों के बीच ऐतिहासिक रूप से गहरा राजनीतिक विरोध रहा है।

    सुनामगंज-2 संसदीय क्षेत्र से सांसद नासिर उद्दीन चौधरी ने एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि अवामी लीग को दुश्मन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि वे एक सहयोगी की भूमिका में हैं। उन्होंने 1971 के मुक्ति संग्राम के साझा इतिहास का हवाला देते हुए दावा किया कि आने वाले समय में अवामी लीग का विलय बीएनपी में हो सकता है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश की अंतरिम व्यवस्था और वर्तमान सरकार शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग कर रही है तथा अवामी लीग की राजनीतिक गतिविधियों पर कड़े प्रतिबंध लागू हैं।

    सांसद के इस बयान के तुरंत बाद बीएनपी के शीर्ष नेतृत्व और सरकारी प्रवक्ताओं ने स्पष्ट किया है कि यह विचार पूरी तरह से व्यक्तिगत है और इसका पार्टी की आधिकारिक नीति से कोई संबंध नहीं है। पार्टी नेतृत्व का कहना है कि पूर्ववर्ती शासन के दौरान हुए घटनाक्रमों और राजनीतिक दमन के कारण दोनों दलों के बीच किसी भी प्रकार के तालमेल या विलय का प्रश्न ही नहीं उठता। सरकारी प्रतिनिधियों ने शेख हसीना के हालिया बयानों पर भी आपत्ति जताते हुए इसे देश के लोकतांत्रिक ढांचे और राजनीतिक स्थिरता के प्रतिकूल बताया है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वर्ष 2024 के घटनाक्रमों के बाद से बांग्लादेश की राजनीति अत्यंत संवेदनशील दौर से गुजर रही है। एक तरफ जहां सरकार पूर्व प्रधानमंत्री को वापस लाने और उन पर कानूनी प्रक्रिया चलाने के प्रयास में जुटी है, वहीं पार्टी के भीतर से आने वाले इस तरह के बयानों से संगठन की आंतरिक एकजुटता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। सांसद के इस विवादित बयान से आम जनता और राजनीतिक हलकों में बहस छिड़ गई है कि आगामी चुनावों से पहले देश के राजनीतिक समीकरण क्या मोड़ लेंगे।

  • तुर्किए और पाकिस्तान के साथ सऊदी अरब के रक्षा समझौते पर भड़का ईरान, बताया कागजी समझौता।

    तुर्किए और पाकिस्तान के साथ सऊदी अरब के रक्षा समझौते पर भड़का ईरान, बताया कागजी समझौता।

    नई दिल्ली ।पश्चिम एशिया के कूटनीतिक और सामरिक परिदृश्य में उस समय नया मोड़ आ गया जब सऊदी अरब, तुर्किए और पाकिस्तान ने मक्का में एक ऐतिहासिक संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस त्रिपक्षीय समझौते के मुख्य प्रावधान के अनुसार, तीनों में से किसी भी एक देश पर होने वाले किसी भी सैन्य हमले को तीनों देशों पर सामूहिक हमला माना जाएगा। इस उच्चस्तरीय बैठक में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्किए के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ शामिल हुए। हालांकि, इस समझौते के सामने आते ही पड़ोसी देश ईरान की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की गई है।

    ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति आयोग के वरिष्ठ सदस्य इब्राहिम रजाई ने इस समझौते पर तीखा हमला बोलते हुए इसे बेअसर करार दिया। उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से कहा कि तुर्किए और पाकिस्तान के साथ केवल कागजी समझौते कर लेने से सऊदी अरब को वास्तविक सुरक्षा हासिल नहीं हो सकती। उन्होंने अतीत का हवाला देते हुए टिप्पणी की कि जिस प्रकार दशकों तक पश्चिमी देशों पर निर्भर रहने के बाद भी स्थायी सुरक्षा नहीं मिल सकी, उसी प्रकार यह समझौता भी निष्प्रभावी साबित होगा। ईरान ने सुझाव दिया कि सुरक्षा की तलाश करने के बजाय अपनी क्षेत्रीय नीतियों में बुनियादी बदलाव लाने की आवश्यकता है।

    दूसरी ओर, समझौते में शामिल तीनों देशों ने इस रक्षा तंत्र को पूरी तरह से रक्षात्मक और संतुलित बताया है। सऊदी अरब के अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि यह कदम किसी विशेष सैन्य गुट या सांप्रदायिक समूह के निर्माण के उद्देश्य से नहीं उठाया गया है और न ही यह उनके अन्य अंतरराष्ट्रीय संबंधों को प्रभावित करेगा। तुर्किए के प्रतिनिधियों का कहना है कि यह समझौता किसी एक देश के खिलाफ केंद्रित नहीं है और भविष्य में अन्य क्षेत्रीय देशों के शामिल होने का मार्ग भी खुला रखा गया है।

    सामरिक विश्लेषकों का मानना है कि यह समझौता तीनों देशों की अलग-अलग क्षमताओं के एकत्रीकरण का परिणाम है। इसमें पाकिस्तान का विशाल सैन्य अनुभव, सऊदी अरब की मजबूत आर्थिक क्षमता और तुर्किए की आधुनिक रक्षा तकनीक शामिल है। जहां एक तरफ यह गठबंधन तीनों देशों के बीच दशकों पुराने संबंधों को संस्थागत रूप देने का प्रयास है, वहीं ईरान की तीखी आपत्ति से स्पष्ट है कि इस रक्षा सौदे ने खाड़ी और दक्षिण एशियाई क्षेत्र की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

  • टोल-टैक्स में राहत नहीं तो तेल सप्लाई पर पड़ेगा असर, पाकिस्तान में ट्रांसपोर्टरों की हड़ताल से बढ़ी चिंता

    टोल-टैक्स में राहत नहीं तो तेल सप्लाई पर पड़ेगा असर, पाकिस्तान में ट्रांसपोर्टरों की हड़ताल से बढ़ी चिंता


    नई दिल्ली। पाकिस्तान पहले से आर्थिक परेशानियों से जूझ रहा है और अब देशव्यापी ट्रांसपोर्ट हड़ताल ने सरकार
    की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। सरकार के साथ बातचीत विफल होने के बाद गुड्स ट्रांसपोर्टर्स और ऑयल टैंकर ऑपरेटरों ने अनिश्चितकालीन चक्का जाम शुरू कर दिया है। शनिवार से शुरू हुई इस हड़ताल के कारण देशभर में मालवाहक ट्रकों और टैंकरों की आवाजाही प्रभावित हुई है। इसका सीधा असर जरूरी सामान खाद्य पदार्थों और पेट्रोलियम उत्पादों की सप्लाई पर पड़ने की आशंका है।

    मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक शुक्रवार रात ऑल पाकिस्तान गुड्स ट्रांसपोर्ट इत्तेहाद के प्रतिनिधियों और संघीय संचार मंत्री अलीम खान के बीच लंबी बातचीत हुई लेकिन दोनों पक्षों के बीच किसी ठोस समाधान पर सहमति नहीं बन सकी। बातचीत बेनतीजा रहने के बाद ट्रांसपोर्टरों ने अपनी सेवाएं बंद करने का फैसला किया और बड़ी संख्या में कमर्शियल मालवाहक वाहनों को सड़कों से हटाकर निर्धारित पार्किंग स्थानों पर खड़ा कर दिया गया।

    ट्रांसपोर्टरों का कहना है कि वे लंबे समय से सरकार के सामने अपनी समस्याएं रखते आ रहे हैं लेकिन उनकी मांगों पर पर्याप्त कार्रवाई नहीं हुई। ऑल पाकिस्तान गुड्स ट्रांसपोर्ट ओनर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष मोहम्मद ओवैस चौधरी ने कहा कि सरकार के सामने सभी जायज समस्याएं रखी गईं लेकिन बातचीत से कोई ठोस समाधान नहीं निकला। उनका कहना है कि जब तक मांगों को स्वीकार नहीं किया जाता तब तक देशव्यापी विरोध जारी रहेगा।

    इस हड़ताल में सिर्फ सामान्य मालवाहक वाहन ही शामिल नहीं हैं बल्कि खाद्य तेल के टैंकर पेट्रोलियम टैंकर भारी ट्रक ट्रेलर और अन्य इंटरसिटी कमर्शियल मालवाहक वाहन भी शामिल हैं। ऐसे में हड़ताल लंबी खिंचती है तो पाकिस्तान की सप्लाई चेन पर गंभीर असर पड़ सकता है।

    ट्रांसपोर्टरों की सबसे प्रमुख मांगों में एक्सल लोड और वाहन क्षमता से जुड़े नियमों में एकरूपता शामिल है। उनका कहना है कि पूरे देश में एक्सल लोड नियम समान रूप से लागू किए जाएं और 10 पहियों वाले वाहनों को 35 टन तक माल ले जाने की अनुमति दी जाए। इसके अलावा डीजल की बढ़ती कीमतों में राहत मोटरवे टोल टैक्स कम करने और ट्रांसपोर्ट सेक्टर को विदहोल्डिंग टैक्स में राहत देने की मांग भी की गई है।

    ट्रांसपोर्टर कस्टम कानूनों के तहत वाहनों की जब्ती के नियमों में बदलाव और हाईवे पर लगाए जाने वाले भारी जुर्माने को खत्म करने की मांग भी कर रहे हैं। इसके साथ ही पंजाब हाईवे पेट्रोल को कमर्शियल वाहनों के चालान काटने का अधिकार दिए जाने का भी विरोध किया जा रहा है। भारी वाहन लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया को आसान बनाने की मांग भी उनकी प्रमुख मांगों में शामिल है।

    सरकार की ओर से बातचीत दोबारा शुरू करने की बात कही गई है। संचार मंत्री अलीम खान के अनुसार सोमवार को ट्रांसपोर्टरों के साथ बातचीत का एक और दौर हो सकता है। हालांकि ट्रांसपोर्टर मांगें पूरी होने तक हड़ताल खत्म करने के मूड में नहीं हैं।

    अगर यह चक्का जाम लंबे समय तक जारी रहता है तो पाकिस्तान के बड़े शहरों में रोजमर्रा की जरूरी चीजों की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। लाहौर कराची इस्लामाबाद और पेशावर जैसे शहरों में खाद्य पदार्थों के साथ पेट्रोल और डीजल की उपलब्धता पर भी दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती ट्रांसपोर्टरों की मांगों और आर्थिक दबाव के बीच ऐसा रास्ता निकालना है जिससे देश की सप्लाई चेन को पूरी तरह चरमराने से बचाया जा सके।

  • भारत ने Su-57 से बनाई दूरी, राफेल पर बढ़ा भरोसा, रूस के लिए बड़ा रणनीतिक झटका माना जा रहा फैसला

    भारत ने Su-57 से बनाई दूरी, राफेल पर बढ़ा भरोसा, रूस के लिए बड़ा रणनीतिक झटका माना जा रहा फैसला

    नई दिल्ली । भारत की रक्षा रणनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। रूस के पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान सुखोई Su-57 को लेकर फिलहाल भारत की ओर से कोई खरीद योजना आगे बढ़ती नजर नहीं आ रही है। इसके बजाय भारतीय वायुसेना की जरूरतों को पूरा करने के लिए मौजूदा लड़ाकू विमानों के आधुनिकीकरण, अतिरिक्त राफेल विमानों की खरीद और स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान कार्यक्रम पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। इस फैसले को रूस के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि मॉस्को लंबे समय से भारत को Su-57 लड़ाकू विमान की पेशकश करता रहा है।

    रूस ने भारत को Su-57 विमान खरीदने के लिए कई आकर्षक प्रस्ताव दिए थे। इनमें विमान निर्माण में सहयोग, तकनीक हस्तांतरण और भारतीय जरूरतों के अनुसार बदलाव की पेशकश भी शामिल थी। रूस की कोशिश थी कि भारत पांचवीं पीढ़ी के इस अत्याधुनिक लड़ाकू विमान को अपने बेड़े में शामिल करे। इससे पहले ऐसी संभावनाएं जताई जा रही थीं कि भारत करीब 36 से 40 Su-57 विमानों की खरीद पर विचार कर सकता है। हालांकि, अब भारत की प्राथमिकताएं अलग दिखाई दे रही हैं।

    भारतीय रक्षा मंत्रालय की ओर से संकेत दिया गया है कि फिलहाल Su-57 को लेकर कोई सक्रिय खरीद योजना नहीं है। भारत अपने मौजूदा Su-30MKI लड़ाकू विमानों को और अधिक आधुनिक बनाने पर ध्यान दे रहा है। Su-30MKI भारत और रूस के बीच लंबे समय से चले आ रहे रक्षा सहयोग का प्रमुख हिस्सा रहा है। इन विमानों की क्षमता बढ़ाने के लिए कई तकनीकी सुधार और अपग्रेड की योजनाएं बनाई जा रही हैं।

    इसके साथ ही भारत फ्रांस से राफेल लड़ाकू विमानों की संख्या बढ़ाने की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है। राफेल पहले से ही भारतीय वायुसेना के बेड़े में शामिल है और इसकी क्षमता को देखते हुए भारत इसे एक भरोसेमंद विकल्प मान रहा है। राफेल अपनी आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली, लंबी दूरी के हथियारों और बहुउद्देश्यीय क्षमता के लिए जाना जाता है। इससे वायुसेना को अलग-अलग परिस्थितियों में बेहतर ऑपरेशनल क्षमता मिलती है।

    हालांकि राफेल और Su-57 अलग-अलग श्रेणी के लड़ाकू विमान हैं। राफेल को 4.5 पीढ़ी का अत्याधुनिक विमान माना जाता है, जबकि Su-57 पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर जेट है। Su-57 की सबसे बड़ी विशेषता इसकी कम रडार पहचान क्षमता और आंतरिक हथियार भंडारण प्रणाली है। इसमें लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों को शामिल किया जा सकता है, जिससे यह बड़े रणनीतिक लक्ष्यों को निशाना बनाने में सक्षम है।

    भारत की रक्षा योजना में अब स्वदेशी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी AMCA परियोजना को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया जा रहा है। यह भारत का अपना पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य भविष्य में विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम करना है। विशेषज्ञों के अनुसार भारत लंबे समय में अपने स्वदेशी लड़ाकू विमान विकास कार्यक्रम को मजबूत करना चाहता है।

    रक्षा क्षेत्र में बदलती जरूरतों और रणनीतिक प्राथमिकताओं के बीच भारत का ध्यान अब संतुलित विकल्पों पर है। एक ओर जहां राफेल जैसे आधुनिक और युद्ध में परखे गए विमानों को शामिल करने की योजना है, वहीं दूसरी ओर Su-30MKI अपग्रेड और AMCA जैसे स्वदेशी कार्यक्रमों को आगे बढ़ाया जा रहा है। ऐसे में Su-57 की खरीद पर फिलहाल विराम लगना भारत की बदलती रक्षा नीति का संकेत माना जा रहा है।

  • रूस ने चली क्रिप्टो वाली चाल, डॉलर के दबदबे को चुनौती; क्या ट्रंप की आर्थिक धमकियों का निकलेगा तोड़?

    रूस ने चली क्रिप्टो वाली चाल, डॉलर के दबदबे को चुनौती; क्या ट्रंप की आर्थिक धमकियों का निकलेगा तोड़?


    नई दिल्ली।
    दुनिया की आर्थिक ताकत सिर्फ हथियारों और सैन्य क्षमता से तय नहीं होती, बल्कि वैश्विक कारोबार में किस मुद्रा का दबदबा है, यह भी किसी देश की ताकत को तय करता है। पिछले कई दशकों से अमेरिकी डॉलर अंतरराष्ट्रीय व्यापार और भुगतान व्यवस्था का सबसे बड़ा आधार रहा है। तेल-गैस की खरीद से लेकर देशों के बीच बड़े कारोबारी लेनदेन तक, डॉलर की भूमिका बेहद अहम रही है। इसी वजह से अमेरिका को आर्थिक प्रतिबंधों के जरिए दूसरे देशों पर दबाव बनाने की ताकत भी मिलती है।

    अब रूस ने इसी व्यवस्था से अपनी निर्भरता कम करने की दिशा में एक और कदम बढ़ाया है। रूस ने विदेशी व्यापार में क्रिप्टोकरेंसी के इस्तेमाल को कानूनी दायरे में लाने का रास्ता खोल दिया है। रूस का यह कदम पश्चिमी प्रतिबंधों और डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था के विकल्प तलाशने की उसकी लंबे समय से चल रही कोशिश का हिस्सा माना जा रहा है।

    विदेशी व्यापार में क्रिप्टो का रास्ता खुला

    नए प्रावधानों के तहत रूसी कंपनियों को कुछ अंतरराष्ट्रीय लेनदेन में डिजिटल करेंसी के इस्तेमाल की अनुमति मिल सकती है। यानी रूस और किसी दूसरे देश की कंपनी आपसी सहमति से कुछ भुगतान डॉलर के बजाय क्रिप्टो के माध्यम से कर सकती हैं।

    रूस के लिए इसका महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और यूरोपीय देशों ने उस पर कई तरह के आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं। पश्चिमी बैंकिंग व्यवस्था और डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए रूस लगातार वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों की तलाश करता रहा है।

    डॉलर की ताकत सिर्फ मुद्रा नहीं, पूरा सिस्टम है

    अमेरिका की आर्थिक ताकत केवल डॉलर की वैश्विक मांग से नहीं आती। इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग और भुगतान व्यवस्था का भी बड़ा योगदान है। यदि किसी देश की इस व्यवस्था तक पहुंच सीमित कर दी जाए तो उसके लिए विदेशों से पैसा भेजना और प्राप्त करना मुश्किल हो सकता है।

    रूस पिछले कुछ वर्षों में इसी चुनौती का सामना कर रहा है। ऐसे में डिजिटल करेंसी उसके लिए एक वैकल्पिक भुगतान माध्यम बन सकती है। क्रिप्टो आधारित लेनदेन में पारंपरिक बैंकिंग चैनलों पर निर्भरता कुछ मामलों में कम हो सकती है।

    क्या इससे अमेरिका के आर्थिक दबदबे को चुनौती मिलेगी?

    अगर आने वाले समय में अधिक देश डॉलर के अलावा स्थानीय मुद्राओं, डिजिटल करेंसी या क्रिप्टो के जरिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार करने लगते हैं तो डॉलर की वैश्विक मांग पर असर पड़ सकता है। रूस के साथ चीन, ईरान और दूसरे देश भी वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं।

    हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि डॉलर का दबदबा तुरंत खत्म हो जाएगा। आज भी वैश्विक व्यापार और वित्तीय व्यवस्था में अमेरिकी मुद्रा की भूमिका बेहद मजबूत है। इसलिए क्रिप्टो या स्थानीय मुद्राओं के बढ़ते इस्तेमाल को डॉलर के लिए तत्काल खतरे के बजाय लंबी अवधि में उभरते विकल्प के तौर पर देखना ज्यादा सही होगा।

    भारत के लिए क्या बदल सकता है?

    भारत भी कई देशों के साथ स्थानीय मुद्राओं में कारोबार बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। रूस के साथ रुपये और रूबल में व्यापार की व्यवस्था को लेकर भी प्रयास किए गए हैं।

    अगर भविष्य में डिजिटल करेंसी और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा स्वीकार्य होती हैं, तो भारत के लिए भी डॉलर पर निर्भरता कम करने के कुछ नए रास्ते खुल सकते हैं। इससे कुछ लेनदेन में मुद्रा बदलने की लागत और भुगतान में लगने वाला समय कम करने की संभावना बन सकती है।

    लेकिन भारत की नीति निजी क्रिप्टोकरेंसी के बजाय अपने सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी यानी ई-रुपये पर ज्यादा केंद्रित है। भारत में क्रिप्टो को आधिकारिक मुद्रा का दर्जा नहीं मिला है और इसके इस्तेमाल पर कड़े टैक्स नियम लागू हैं।

    क्रिप्टो के साथ जोखिम भी कम नहीं

    क्रिप्टोकरेंसी को अंतरराष्ट्रीय व्यापार का बड़ा माध्यम बनाने में सबसे बड़ी चुनौतियों में इसकी कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव भी शामिल है। बिटकॉइन जैसी क्रिप्टोकरेंसी की कीमत कम समय में काफी ऊपर-नीचे हो सकती है। ऐसे में अरबों डॉलर के व्यापार के लिए इसका इस्तेमाल जोखिम भरा हो सकता है।

    इसी वजह से भविष्य में स्टेबलकॉइन या सरकार समर्थित डिजिटल करेंसी ज्यादा व्यावहारिक विकल्प बन सकती हैं। इसके लिए सिर्फ कानूनी मंजूरी पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय नियम, भरोसा, सुरक्षा और मजबूत तकनीकी ढांचा भी जरूरी होगा।

    दुनिया को रूस का क्या संदेश?

    रूस का कदम वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ते बदलाव की ओर इशारा करता है। चीन अपनी मुद्रा युआन के अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल को बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। ब्रिक्स देशों के बीच भी वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों और स्थानीय मुद्राओं में कारोबार को लेकर चर्चा होती रही है।

    ऐसे में क्रिप्टोकरेंसी, डिजिटल करेंसी और नई भुगतान तकनीकें आने वाले वर्षों में वैश्विक आर्थिक राजनीति का अहम हिस्सा बन सकती हैं। हालांकि, सिर्फ क्रिप्टो के इस्तेमाल से अमेरिकी आर्थिक दबदबा खत्म हो जाएगा, यह दावा फिलहाल जल्दबाजी होगा। लेकिन रूस का कदम यह जरूर दिखाता है कि दुनिया एक ऐसी वित्तीय व्यवस्था की ओर बढ़ने की कोशिश कर रही है, जिसमें किसी एक देश की मुद्रा और भुगतान प्रणाली पर निर्भरता कम हो।

  • ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों पर नियंत्रण के लिए बिल का ड्राफ्ट पेश किया, नियम तोड़ने पर भारी जुर्माने का प्रावधान

    ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों पर नियंत्रण के लिए बिल का ड्राफ्ट पेश किया, नियम तोड़ने पर भारी जुर्माने का प्रावधान

    नई दिल्ली । ईरान ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री यातायात को नियंत्रित करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। ईरानी सांसदों ने इस जलमार्ग से गुजरने वाले जहाजों के लिए नए नियमों से जुड़े एक विधेयक का ड्राफ्ट तैयार किया है। इस प्रस्ताव में कुछ जहाजों की आवाजाही पर रोक लगाने और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर आर्थिक जुर्माना लगाने का प्रावधान शामिल किया गया है।

    यह बिल फिलहाल ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग की समीक्षा में है। प्रस्तावित कानून का उद्देश्य होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले समुद्री यातायात को नियंत्रित करना और ईरान के अनुसार सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना बताया जा रहा है। हालांकि, इस कदम को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता भी बढ़ सकती है, क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग माना जाता है।

    प्रस्तावित ड्राफ्ट में इजरायल से जुड़े जहाजों और कुछ अन्य देशों या कंपनियों से जुड़े सैन्य तथा नागरिक कार्गो पर प्रतिबंध लगाने की बात कही गई है। इसमें कहा गया है कि ऐसे जहाजों को मुआवजा मिलने तक ट्रांजिट की अनुमति नहीं दी जाएगी। इसके अलावा नियमों का उल्लंघन करने वाले जहाजों पर उनके कार्गो मूल्य का 20 प्रतिशत तक जुर्माना लगाने का प्रावधान भी प्रस्ताव में शामिल किया गया है।

    ईरान की योजना के अनुसार, जिन जहाजों को होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने की अनुमति दी जाएगी, उनसे नौवहन सेवाओं के खर्च को पूरा करने के लिए शुल्क लिया जा सकता है। यह शुल्क ईरानी मुद्रा में जमा करना होगा। ईरान का कहना है कि यह व्यवस्था समुद्री सुरक्षा और सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है।

    होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। यहां से बड़ी मात्रा में तेल और गैस का परिवहन होता है। किसी भी तरह की बाधा या नियंत्रण व्यवस्था का असर अंतरराष्ट्रीय बाजारों, ऊर्जा कीमतों और वैश्विक व्यापार पर पड़ सकता है। इसी कारण ईरान के इस कदम पर कई देशों की नजर बनी हुई है।

    इससे पहले भी ईरान की ओर से होर्मुज स्ट्रेट को लेकर कानून बनाने की कोशिश की गई थी। शुरुआती प्रस्तावों में केवल उन देशों के जहाजों को निशाना बनाने की बात कही गई थी, जिन्हें ईरान अपना विरोधी मानता है। नए ड्राफ्ट में प्रतिबंधों का दायरा बढ़ाते हुए अधिक जहाजों और कार्गो को शामिल किया गया है।

    इसी बीच ईरान और ओमान के बीच होर्मुज स्ट्रेट से जुड़े समुद्री मार्गों को लेकर बातचीत भी जारी है। ईरानी अधिकारियों के अनुसार, दोनों देशों के बीच नौवहन मार्ग के भौगोलिक निर्देशांकों को लेकर सहमति बन चुकी है और संयुक्त बयान की प्रक्रिया अंतिम चरण में है। हालांकि, इस समझौते को लेकर ओमान की ओर से अभी सार्वजनिक पुष्टि नहीं की गई है।

    प्रस्तावित व्यवस्था के तहत ईरान अपने नियंत्रण वाले समुद्री मार्गों से गुजरने वाले जहाजों की निगरानी करेगा। ईरान का कहना है कि वह समुद्री सुरक्षा और नौवहन व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी कदम उठाने का अधिकार रखेगा। इस व्यवस्था को लेकर क्षेत्रीय देशों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण होगी।

    होर्मुज स्ट्रेट को लेकर ईरान के नए कदम ऐसे समय सामने आए हैं जब मध्य पूर्व में पहले से ही राजनीतिक और सैन्य तनाव बना हुआ है। समुद्री मार्गों पर किसी भी तरह का अतिरिक्त नियंत्रण या प्रतिबंध वैश्विक व्यापार के लिए नई चुनौती पैदा कर सकता है। आने वाले दिनों में इस बिल की समीक्षा और क्षेत्रीय देशों की प्रतिक्रिया पर दुनिया की नजर रहेगी।