Category: International

  • ट्रंप का दावा: अमेरिकी हमलों में ईरान की नौसेना और वायु रक्षा प्रणाली पूरी तरह नष्ट, अभियान अभी जारी

    ट्रंप का दावा: अमेरिकी हमलों में ईरान की नौसेना और वायु रक्षा प्रणाली पूरी तरह नष्ट, अभियान अभी जारी


    नई दिल्ली । वाशिंगटन से रवाना होते समय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के खिलाफ जारी अमेरिकी सैन्य अभियान को लेकर बेहद चौंकाने वाला दावा किया। उन्होंने पत्रकारों को बताया कि अमेरिकी सेना ने ईरान के सैन्य ढांचे को इतनी भयंकर क्षति पहुँचाई है कि अब वहां कुछ भी सुरक्षित नहीं बचा है। ट्रंप ने जोर देकर कहा कि ईरान की नौसेना की पूरी क्षमता और उसकी वायु रक्षा प्रणाली अब पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी है।

    ट्रंप के अनुसार अमेरिकी हमलों ने ईरानी एयरबेस, नौसैनिक जहाजों और रडार सिस्टम को पूरी तरह नष्ट कर दिया है। इसके अलावा, उन्होंने दावा किया कि ईरान के कई शीर्ष सैन्य और राजनीतिक नेता भी इस अभियान में प्रभावित हुए हैं, जिससे नेतृत्व संकट उत्पन्न हो गया है। व्हाइट हाउस के बाहर पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने अमेरिकी सेना की ताकत और कार्यक्षमता की तारीफ करते हुए इसे विश्व की सबसे शक्तिशाली सेना बताया।

    दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप ने यह भी खुलासा किया कि अमेरिकी सेना ने कुछ महत्वपूर्ण ईरानी ठिकानों को जानबूझकर सुरक्षित छोड़ दिया है। उनके अनुसार, यदि अमेरिका चाहे तो केवल एक घंटे में उन बचे हुए ठिकानों को भी पूरी तरह से नष्ट कर सकता है। उन्होंने कहा कि इस तरह की कार्रवाई ईरान के लिए अपने देश को फिर से खड़ा करना लगभग असंभव बना देगी।

    ट्रंप ने यह साफ किया कि अमेरिकी हमले केवल जवाबी कार्रवाई नहीं थे, बल्कि ईरान की सैन्य क्षमता को जड़ से समाप्त करने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा थे। उनके अनुसार ईरान की नौसेना के अधिकांश जहाज अब समुद्र की गहराई में डूब चुके हैं और वायुसेना भी गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त है। इस बयान से स्पष्ट होता है कि अमेरिका ने ईरान को सैन्य रूप से पंगु बनाने की पूरी योजना बनाई है।

    पत्रकारों ने उनसे पूछा कि क्या अमेरिकी कार्रवाई अब रोक दी जाएगी। ट्रंप ने कड़ा जवाब देते हुए कहा कि अभियान अभी जारी है और सेना आगे की कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार है। उन्होंने कहा कि यह कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा संदेश है कि अमेरिका की सुरक्षा से खिलवाड़ भारी पड़ेगा। उन्होंने इसे एक ऐतिहासिक उपलब्धि बताया, जिसे अमेरिका ने पहले कभी नहीं देखा।

    विश्व के रक्षा विशेषज्ञ और राजनेता अब ट्रंप के इस दावे पर बहस कर रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति के बयान ने अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक और सैन्य पटल पर हलचल मचा दी है। पूरी दुनिया की नजरें अब इस बात पर हैं कि ईरान इस विनाशकारी दावे और सैन्य क्षति के बारे में क्या प्रतिक्रिया देता है।

  • वैश्विक तेल संकट के बीच बड़ा फैसला: IEA के 40 करोड़ बैरल आपात भंडार जारी करने के कदम का भारत ने किया स्वागत

    वैश्विक तेल संकट के बीच बड़ा फैसला: IEA के 40 करोड़ बैरल आपात भंडार जारी करने के कदम का भारत ने किया स्वागत


    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में जारी भीषण संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता और तेल की कीमतों में तेज उछाल की आशंका के बीच अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाया है। एजेंसी ने अपने सदस्य देशों के साथ मिलकर बाजार में 40 करोड़ बैरल आपातकालीन तेल भंडार जारी करने का फैसला किया है। इस निर्णय का भारत ने खुले तौर पर स्वागत करते हुए कहा है कि यह कदम वैश्विक तेल आपूर्ति को स्थिर बनाए रखने और कीमतों को बेकाबू होने से रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

    दरअसल पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष और क्षेत्रीय तनाव के कारण कच्चे तेल की वैश्विक आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है। इसी को ध्यान में रखते हुए अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के 32 सदस्य देशों ने समन्वित रूप से यह निर्णय लिया है कि वे अपने रणनीतिक तेल भंडार का एक बड़ा हिस्सा बाजार में जारी करेंगे। भारत, जो IEA का एक महत्वपूर्ण सहयोगी सदस्य है, ने इस फैसले का समर्थन करते हुए कहा है कि वह ऊर्जा बाजार की स्थिति और पश्चिम एशिया के घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए है।

    भारत सरकार का मानना है कि इस तरह का समन्वित अंतरराष्ट्रीय कदम मौजूदा संकट की स्थिति में बेहद आवश्यक है। सरकार ने कहा है कि वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा को बनाए रखने के लिए भारत अंतरराष्ट्रीय समुदाय और सहयोगी देशों के साथ मिलकर काम करने के लिए प्रतिबद्ध है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बाजार में अचानक आपूर्ति कम हो जाती है तो तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर पड़ सकता है।

    इस संकट की सबसे बड़ी वजह रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य में आई भारी बाधा है। 28 फरवरी से शुरू हुए संघर्ष के बाद इस मार्ग से होने वाला तेल निर्यात बुरी तरह प्रभावित हुआ है और अब यह पहले की तुलना में लगभग 10 प्रतिशत तक ही रह गया है। यह जलडमरूमध्य वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा संभालता है, इसलिए यहां की स्थिति पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार को सीधे प्रभावित करती है।

    साल 2025 के आंकड़ों के अनुसार रोजाना करीब 2 करोड़ बैरल तेल इसी मार्ग से होकर गुजरता था, लेकिन युद्ध और अस्थिरता के कारण यह आपूर्ति गंभीर संकट में फंस गई है। अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार इस मार्ग का कोई प्रभावी वैकल्पिक रास्ता नहीं है, जिसके कारण ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंता और बढ़ गई है।

    IEA का यह कदम इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि 1974 में एजेंसी के गठन के बाद यह केवल छठा मौका है जब सदस्य देशों ने मिलकर इस तरह का समन्वित आपातकालीन तेल भंडार जारी करने का निर्णय लिया है। इससे पहले 1991 के खाड़ी युद्ध, 2005 के ऊर्जा संकट, 2011 के लीबिया संकट और 2022 के वैश्विक ऊर्जा संकट के दौरान भी ऐसे कदम उठाए गए थे।

    फिलहाल IEA सदस्य देशों के पास कुल मिलाकर 1.2 अरब बैरल से अधिक का रणनीतिक तेल भंडार सुरक्षित है, जिसे केवल आपातकालीन परिस्थितियों में ही बाजार में उतारा जाता है। इसके अलावा उद्योगों के पास भी लगभग 60 करोड़ बैरल का अतिरिक्त स्टॉक मौजूद है, जिसे सरकारी नियमों के तहत सुरक्षित रखना अनिवार्य होता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह भंडार धीरे-धीरे बाजार में उतारा जाता है तो इससे वैश्विक तेल कीमतों को स्थिर रखने में मदद मिल सकती है। भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि तेल की कीमतों में तेजी सीधे तौर पर महंगाई, परिवहन लागत और आम जनता की जेब पर असर डालती है। उम्मीद की जा रही है कि आने वाले दिनों में इस कदम से वैश्विक ऊर्जा बाजार में कुछ हद तक स्थिरता लौट सकेगी।

  • कूटनीति की जीत: जयशंकर अराघची वार्ता के बाद ईरान ने भारतीय टैंकरों को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से सुरक्षित गुजरने दी मंजूरी

    कूटनीति की जीत: जयशंकर अराघची वार्ता के बाद ईरान ने भारतीय टैंकरों को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से सुरक्षित गुजरने दी मंजूरी


    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और समुद्री हमलों के बीच भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक राहत सामने आई है। भारत और ईरान के बीच उच्च स्तरीय बातचीत के बाद ईरान ने भारतीय झंडाधारी तेल टैंकरों को रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण जलमार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य से सुरक्षित गुजरने की अनुमति दे दी है। यह फैसला उस समय आया है जब इस क्षेत्र में अमेरिका यूरोप और इज़राइल से जुड़े जहाजों को लगातार खतरे और प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा है।

    इस महत्वपूर्ण फैसले की पृष्ठभूमि में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर और ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची के बीच हुई फोन वार्ता को निर्णायक माना जा रहा है। दोनों नेताओं के बीच हुई बातचीत के बाद ईरान ने भारत के प्रति सकारात्मक रुख दिखाते हुए भारतीय टैंकरों को इस संवेदनशील जलडमरूमध्य से गुजरने की विशेष अनुमति प्रदान की। कूटनीतिक सहमति के तुरंत बाद दो भारतीय तेल टैंकर पुष्पक’ और ‘परिमल को सुरक्षित रूप से होर्मुज से गुजरते हुए देखा गया जो इस समझौते के तुरंत प्रभाव में आने का स्पष्ट संकेत देता है।

    दरअसल हाल के दिनों में होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास हमलों की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। कई विदेशी जहाजों पर ड्रोन और मिसाइल हमले हुए हैं जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला पर गंभीर असर पड़ने की आशंका पैदा हो गई है। दुनिया के कुल समुद्री तेल परिवहन का बड़ा हिस्सा इसी जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है इसलिए यहां की अस्थिरता सीधे तौर पर वैश्विक तेल बाजार और ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित करती है।

    ईरान ने इस पूरे घटनाक्रम के बीच स्पष्ट संकेत दिया है कि वह इस जलमार्ग को एक रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर सकता है। ईरान की ओर से यह बयान भी सामने आया कि वह अमेरिका और उसके सहयोगियों के हितों से जुड़े तेल को होर्मुज से गुजरने नहीं देगा। ईरानी नेतृत्व का कहना है कि क्षेत्रीय संघर्ष और दबाव की स्थिति में वह अपने भू-राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल करने से पीछे नहीं हटेगा।

    ऐसे तनावपूर्ण माहौल में भारत ने संतुलित और व्यावहारिक कूटनीति का परिचय देते हुए ईरान के साथ संवाद बनाए रखा। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे ऊर्जा और रणनीतिक संबंधों ने इस फैसले को संभव बनाया। यही कारण है कि जब कई देशों के जहाजों के सामने जोखिम बना हुआ है तब भारत के तेल टैंकरों को सुरक्षित मार्ग मिलना एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक सफलता के रूप में देखा जा रहा है।

    फिलहाल स्थिति यह है कि जहां अमेरिका यूरोप और इज़राइल से जुड़े जहाजों को होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने में प्रतिबंधों और हमलों का खतरा बना हुआ है वहीं भारत को मिली यह विशेष छूट वैश्विक कूटनीति में उसके संतुलित रुख और बढ़ते प्रभाव का संकेत देती है। यह घटनाक्रम इस बात का भी उदाहरण है कि अंतरराष्ट्रीय संकट के दौर में संवाद और कूटनीति कितनी निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

  • भारत पर नया टैरिफ लगा सकता है, अमेरिका…कई देशों की व्यापारिक नीतियों की जांच शुरू

    भारत पर नया टैरिफ लगा सकता है, अमेरिका…कई देशों की व्यापारिक नीतियों की जांच शुरू


    वाशिंगटन।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) की सरकार ने 16 प्रमुख व्यापारिक साझेदार देशों की उन व्यापारिक नीतियों और प्रथाओं के खिलाफ नई जांच शुरू की है, जिन्हें अमेरिका (America) ‘अनुचित’ मानता है। इस कदम से भारत (India) सहित कई देशों पर अतिरिक्त टैरिफ (Additional Tariff.) और अन्य जुर्माने लगने का रास्ता साफ हो सकता है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) द्वारा ट्रंप की ओर से पहले लगाए गए टैरिफ को खारिज कर दिया गया था, जिसके बाद वह अब नए विकल्पों की तलाश कर रहे हैं।


    जांच के दायरे में भारत और अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं

    औद्योगिक क्षमता से अधिक उत्पादन को लेकर की जा रही इस जांच के निशाने पर मुख्य रूप से भारत के साथ-साथ यूरोपीय संघ (EU), चीन, जापान और कई अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं। अमेरिका के इस कड़े कदम से इन प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के साथ उसके संबंधों में तनाव बढ़ने की पूरी संभावना है।


    अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि का कड़ा रुख

    न्यूज एजेंसी एएफपी (AFP) के हवाले से, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) जैमीसन ग्रीर ने बताया कि ट्रंप प्रशासन दो अलग-अलग जांचें शुरू कर रहा है। पहली जांच जरूरत से ज्यादा उत्पादन पर केंद्रित है, जबकि दूसरी जांच जबरन मजदूरी से बने सामानों के आयात को लेकर है। उन्होंने कहा कि इस गर्मियों तक चीन, यूरोपीय संघ, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और मैक्सिको के खिलाफ नए टैरिफ लगाए जा सकते हैं। इस सूची में ताइवान, वियतनाम, थाइलैंड, मलेशिया, कंबोडिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, स्विट्जरलैंड और नॉर्वे भी शामिल हैं। अमेरिका के दूसरे सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार कनाडा को इस जांच से बाहर रखा गया है।

    अपने रुख को स्पष्ट करते हुए ग्रीर ने कहा- हमें अमेरिकी नौकरियों की रक्षा करनी है और हमें यह सुनिश्चित करने की सख्त जरूरत है कि हमारे व्यापारिक साझेदारों के साथ हमारा व्यापार पूरी तरह से निष्पक्ष हो। उन्होंने सीधे तौर पर चेतावनी देते हुए कहा- अगर इस समस्या को हल करने के लिए हमें टैरिफ लगाने की जरूरत पड़ी, तो हम ऐसा जरूर करेंगे। हालांकि, ग्रीर ने अभी यह स्पष्ट नहीं किया है कि भविष्य में लगाए जाने वाले संभावित जुर्माने या टैरिफ अलग-अलग देशों के लिए अलग-अलग होंगे या एक समान।

    ग्रीर के अनुसार, चीन की इलेक्ट्रिक वाहन (EV) उत्पादन क्षमता उसकी घरेलू मांग से कहीं अधिक है। फिर भी, वहां की शीर्ष ईवी निर्माता कंपनी BYD आक्रामक रूप से उज्बेकिस्तान, थाइलैंड, ब्राजील, हंगरी और तुर्की में अपने कारखाने स्थापित कर रही है और यूरोप में भी विस्तार करने की योजना बना रही है।

    जर्मनी और आयरलैंड के बड़े व्यापार अधिशेष को यूरोपीय संघ की अतिरिक्त क्षमता का सबूत माना गया है। इसके अलावा, अमेरिका के साथ व्यापार घाटे के बावजूद सिंगापुर में सेमीकंडक्टर की अतिरिक्त वैश्विक क्षमता है, और नॉर्वे में ईंधन व समुद्री भोजन के भारी निर्यात को इसका सबूत माना गया है।


    60 देशों पर पड़ेगा असर

    जबरन मजदूरी को लेकर जो दूसरी जांच की जा रही है, उसके बारे में ग्रीर ने बताया कि यह जांच कल दोपहर के बाद किसी भी समय शुरू हो सकती है। इस जांच की जद में लगभग 60 व्यापारिक साझेदार देश आएंगे, जिससे ग्लोबल सप्लाई चैन पर व्यापक असर पड़ सकता है।

    अमेरिका ने पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन द्वारा हस्ताक्षरित ‘उइगर फोर्स्ड लेबर प्रोटेक्शन एक्ट’ के तहत पहले ही चीन के शिनजियांग क्षेत्र से आने वाले सोलर पैनल और अन्य सामानों पर कार्रवाई की है। अमेरिका का आरोप है कि चीन ने उइगर और अन्य मुस्लिम अल्पसंख्यकों के लिए लेबर कैंप बनाए हैं (हालांकि चीन इन आरोपों से इनकार करता है)। अब इस जांच का दायरा अन्य देशों तक भी बढ़ाया जा सकता है।


    ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात से ठीक पहले उठाया गया कदम

    ट्रंप प्रशासन का यह ताजा व्यापारिक कदम रणनीतिक रूप से भी काफी अहम है। यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है, जब अप्रैल महीने में बीजिंग में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच एक महत्वपूर्ण बैठक प्रस्तावित है। इस नई जांच का असर दोनों नेताओं की आगामी बातचीत पर भी देखने को मिल सकता है।

  • West Asia में जारी संघर्ष के बीच EU ने 19 ईरानी अधिकारियों पर लगाए नए प्रतिबंध

    West Asia में जारी संघर्ष के बीच EU ने 19 ईरानी अधिकारियों पर लगाए नए प्रतिबंध


    तेहरान।
    पश्चिम एशिया (West Asia) में जारी संघर्ष के बीच यूरोपीय संघ (European Union) ने ईरान (Iran) पर दबाव बढ़ाते हुए 19 ईरानी अधिकारियों और संस्थाओं पर नए प्रतिबंधों को मंजूरी दी है। इन पर गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन और घरेलू दमन में शामिल होने के आरोप हैं। यूरोपीय संघ की विदेश मामलों और सुरक्षा नीति की उच्च प्रतिनिधि काजा कल्लास ने बुधवार को इसकी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि यूरोपीय संघ के सदस्य देशों के राजदूतों द्वारा लिया गया यह निर्णय तेहरान को जवाबदेह ठहराने के लिए ब्लॉक की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

    कल्लास ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा कि यूरोपीय संघ ईरान को जवाबदेह ठहराना जारी रखेगा। आज सदस्य देशों के राजदूतों ने मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन के लिए जिम्मेदार 19 अधिकारियों और संस्थाओं को लक्षित करते हुए नए प्रतिबंधों को मंजूरी दी है। उन्होंने कहा कि ये प्रतिबंध उन व्यक्तियों और संगठनों पर केंद्रित हैं जिन पर ईरान में घरेलू दमन और मानवाधिकार हनन के आरोप हैं। हालांकि, इन प्रतिबंधों को लागू होने से पहले यूरोपीय संघ परिषद की औपचारिक मंजूरी अभी आवश्यक है।

    कल्लास की यह घोषणा ऐसे समय में आई है जब 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया है। इसके बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए कई खाड़ी देशों और इजरायल में अमेरिकी और इजरायली ठिकानों को निशाना बनाया, जिससे समुद्री मार्ग प्रभावित हुए और वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर असर पड़ा।


    ईरान का पलटवार

    इससे पहले मंगलवार को ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बगाई ने यूरोपीय नेताओं की कड़ी आलोचना करते हुए उन पर ‘पाखंड और दोहरे मापदंड’ अपनाने का आरोप लगाया था। बगाई की यह टिप्पणी यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और काजा कल्लास के बयानों के जवाब में आई। उन्होंने एक्स पर पोस्ट करते हुए वॉन डेर लेयेन पर आरोप लगाया कि वह हमेशा ‘इतिहास के गलत पक्ष’ में खड़ी रही हैं।

    ईरानी प्रवक्ता ने कहा कि यूरोपीय नेताओं को पाखंड बंद करना चाहिए और आरोप लगाया कि वे अमेरिका और इजरायल की कार्रवाइयों को वैध ठहराने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने मीनाब शहर में कथित अमेरिकी हमलों के कारण बच्चों की मौत का भी जिक्र किया और इस पर यूरोपीय संघ की प्रतिक्रिया पर सवाल उठाए।


    लेबनान को लेकर बयानबाजी तेज

    यूरोपीय संघ के राजदूतों की बैठक में उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने कहा था कि ईरान के लोग स्वतंत्रता, गरिमा और अपने भविष्य का फैसला करने के अधिकार के हकदार हैं। उन्होंने चेतावनी दी थी कि मौजूदा युद्ध व्यापक क्षेत्रीय अस्थिरता का कारण बन सकता है। वहीं काजा कल्लास ने कहा कि लेबनान ईरान से जुड़े संघर्ष का नया मोर्चा बनने के खतरे में है। उन्होंने कहा कि ईरान समर्थित हिज्बुल्लाह द्वारा इजरायल पर हमले पूरे क्षेत्र को और अधिक अस्थिर कर सकते हैं।

    कल्लास ने यह भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत इजरायल को आत्मरक्षा का अधिकार है, लेकिन तनाव बढ़ने से लेबनान में संघर्ष और गहरा सकता है। इसके जवाब में इस्माइल बगाई ने कहा कि यह ‘दोहरे मापदंड का चरम उदाहरण’ है। उन्होंने आरोप लगाया कि जब इजरायल गाजा और लेबनान में सैन्य कार्रवाई कर रहा था, तब यूरोपीय संघ ने उदासीन रुख अपनाया और उसके कुछ सदस्य देशों ने इजरायल को हथियार भी उपलब्ध कराए।

  • बैंक पर हमले पर भड़का ईरान, मुस्लिम देशों को दी चेतावनी, सिटी बैंक ने दुबई में अपनी कई शाखाएं कीं बंद

    बैंक पर हमले पर भड़का ईरान, मुस्लिम देशों को दी चेतावनी, सिटी बैंक ने दुबई में अपनी कई शाखाएं कीं बंद



    नई दिल्ली। ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने गुरुवार को देश के सबसे पुराने बैंक की शाखा पर हुए बम हमले की निंदा की और जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी। इससे पहले ईरान की संयुक्त सैन्य कमान ने मिडिल ईस्ट में बैंक और वित्तीय संस्थानों को निशाना बनाने की योजना का ऐलान किया था। इस खतरे को देखते हुए सिटी बैंक ने संयुक्त अरब अमीरात में केवल एक शाखा को छोड़कर अपनी सभी शाखाएं बंद रखने का निर्णय लिया। सुरक्षा चिंताओं के चलते अन्य कई अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों ने भी अपने कर्मचारियों को घर से काम करने की सलाह दी है।
    अराघची ने जताया दुख
    ईरान के विदेश मंत्री ने कहा कि देश के सबसे पुराने बैंक की शाखा पर हमला उस समय हुआ, जब यह कर्मचारियों से भरी हुई थी। ये कर्मचारी ईरानी नए साल से पहले लोगों की मदद में लगे हुए थे। अराघची ने कड़े शब्दों में कहा कि ईरान के सशस्त्र बल इस अपराध का प्रतिशोध जरूर लेंगे। उनका यह बयान खाड़ी क्षेत्र में काम कर रहे विदेशी बैंकों के बीच डर का माहौल पैदा कर गया।

    घटना तेहरान के बैंक सेपाह की एक इमारत या डेटा सेंटर पर कथित इजरायली-अमेरिकी हमले के बाद सामने आई। ईरानी मीडिया के अनुसार, यह हमला रात में हुआ और बैंक उस समय सैन्य कर्मचारियों के वेतन भुगतान की प्रक्रिया में काम कर रहा था।

    ज्वाइंट सैन्य कमान का ऐलान
    ईरान की ज्वाइंट सैन्य कमान खतम अल-अनबिया हेडक्वाटर ने बुधवार को बयान जारी कर कहा कि अब मिडिल ईस्ट में बैंक और वित्तीय संस्थान उनके निशाने पर होंगे। कमान ने मुस्लिम देशों को चेतावनी दी कि अब उनके निशाने पर मिडिल ईस्ट के बैंक और वित्तीय संस्थान हैं, और इनके लिए आवश्यक तैयारी कर ली गई है। स्थानीय लोगों को सलाह दी गई कि वे बैंकों से एक किलोमीटर की दूरी बनाए रखें।

    सिटी बैंक ने शाखाएं बंद कीं
    बदलते हालात को देखते हुए सिटी बैंक ने यूएई में अपनी अधिकांश शाखाओं को बंद करने का निर्णय लिया।

    बैंक ने कहा कि देश में बदलती स्थिति के कारण यह कदम उठाया गया है, हालांकि विस्तार से जानकारी नहीं दी गई।

    अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों पर असर
    ईरान की धमकी ने खासकर दुबई, सऊदी अरब और बहरीन के आर्थिक हितों को जोखिम में डाल दिया है। दुबई, जो कई वैश्विक वित्तीय संस्थानों का केंद्र है, वहां सुरक्षा कड़ी कर दी गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि वित्तीय संस्थानों को युद्ध के दायरे में लाने से वैश्विक बैंकिंग क्षेत्र पर गंभीर असर पड़ सकता है।

  • ओमान के सलालाह पोर्ट पर ड्रोन हमला: तेल स्टोरेज टैंकों में लगी आग, सुल्तान ने ईरानी राष्ट्रपति से जताई नाराजगी, मिडिल-ईस्ट में तनाव बढ़ा

    ओमान के सलालाह पोर्ट पर ड्रोन हमला: तेल स्टोरेज टैंकों में लगी आग, सुल्तान ने ईरानी राष्ट्रपति से जताई नाराजगी, मिडिल-ईस्ट में तनाव बढ़ा

     
     
     
    नई दिल्ली। ओमान के दक्षिणी शहर सलालाह के पोर्ट पर तेल स्टोरेज टैंकों को निशाना बनाते हुए ड्रोन हमले की सूचना मिली है। ओमानी सरकारी मीडिया के अनुसार, ड्रोन हमले के बाद पोर्ट के फ्यूल स्टोरेज टैंकों में आग भड़क गई, लेकिन किसी के हताहत होने की खबर नहीं है। समुद्री सुरक्षा कंपनी एम्ब्रे ने पुष्टि की कि पोर्ट पर मौजूद किसी व्यापारी जहाज को नुकसान नहीं पहुंचा।
    घटना के बाद ओमान के सुल्तान हैथम बिन तारिक अल-सईद ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजशकियान को फोन कर इस हमले पर अपनी गहरी नाराजगी जताई। सुल्तान ने कहा कि ओमान मौजूदा संघर्ष में तटस्थ है और अपनी सुरक्षा व क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएगा।
    तुर्किये के राष्ट्रपति रेचप तैयप एर्दोआन ने मिडिल-ईस्ट में बढ़ते तनाव पर चिंता जताते हुए कहा कि ईरान में जारी युद्ध को तुरंत रोकना होगा, वरना पूरा क्षेत्र आग की चपेट में आ सकता है। एर्दोआन ने कहा कि कूटनीति के माध्यम से ही इस संकट का समाधान संभव है और तुर्किये अभी भी दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता की कोशिश कर रहा है।
    इजराइल के रक्षा मंत्री इजराइल काट्ज ने बताया कि अमेरिका के सहयोग से चल रहा अभियान तब तक जारी रहेगा जब तक सभी लक्ष्य हासिल नहीं हो जाते, और इस ऑपरेशन की कोई निश्चित समयसीमा नहीं है।
    इस बीच, अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने युद्ध के कारण खाड़ी क्षेत्र में तेल आपूर्ति पर असर को देखते हुए घोषणा की कि उसके 32 सदस्य देश आपातकालीन भंडार से 40 करोड़ बैरल कच्चा तेल बाजार में उतारेंगे। IEA के कार्यकारी निदेशक फातिह बिरोल ने बताया कि यह एजेंसी के इतिहास में सबसे बड़ा तेल रिलीज होगा। उन्होंने कहा कि यह कदम युद्ध के कारण तेल आपूर्ति में आई बाधा को दूर करने के लिए उठाया गया है।
    28 फरवरी से होर्मुज स्ट्रेट के जरिए तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात युद्ध से पहले के स्तर से केवल 10% तक ही पहुंच पाया है। IEA ने कहा कि आपातकालीन भंडार से तेल सदस्य देशों की परिस्थितियों के अनुसार चरणबद्ध तरीके से बाजार में उतारा जाएगा।
    1974 में स्थापित IEA के इतिहास में यह छठी बार है जब सदस्य देश मिलकर रणनीतिक भंडार से तेल जारी कर रहे हैं। इससे पहले 1991 के खाड़ी युद्ध, 2005 के हरिकेन कैटरीना, 2011 के लीबिया युद्ध और 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान ऐसा कदम उठाया गया था। IEA के 32 सदस्य देशों में अमेरिका, जापान, जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, कनाडा और दक्षिण कोरिया शामिल हैं। भारत इस एजेंसी का सदस्य नहीं है, लेकिन 2017 से यह IEA का एसोसिएट देश है।
    ओमान के सलालाह पोर्ट पर ड्रोन हमला, सुल्तान की नाराजगी, मध्यस्थता के प्रयास और 32 देशों द्वारा 40 करोड़ बैरल तेल बाजार में उतारने की योजना के बीच, मिडिल-ईस्ट में तनाव और ऊर्जा संकट गहराता दिखाई दे रहा है।

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  • ट्रम्प का दावा- ईरान की कमर तोड़ी, जंग जल्द खत्म होगी: हमलों से तबाह हुए सैन्य ठिकाने, तेल संकट से दुनिया में मचा हड़कंप

    ट्रम्प का दावा- ईरान की कमर तोड़ी, जंग जल्द खत्म होगी: हमलों से तबाह हुए सैन्य ठिकाने, तेल संकट से दुनिया में मचा हड़कंप



    नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव और सैन्य संघर्ष को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि ईरान के खिलाफ चल रहा सैन्य अभियान उम्मीद से ज्यादा सफल रहा है और यह युद्ध जल्द खत्म हो सकता है। एक इंटरव्यू में ट्रम्प ने दावा किया कि अमेरिकी हमलों के बाद ईरान में कई अहम सैन्य और रणनीतिक ठिकाने तबाह हो चुके हैं और अब वहां हमला करने के लिए लगभग कुछ भी नहीं बचा है। ट्रम्प के मुताबिक शुरुआती सैन्य योजना करीब छह हफ्तों की थी, लेकिन अमेरिकी सेना ने तय समय से पहले ही कई बड़े लक्ष्य हासिल कर लिए हैं।

    इधर युद्ध के असर से वैश्विक ऊर्जा बाजार भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी International Energy Agency (IEA) ने घोषणा की है कि उसके 32 सदस्य देश अपने आपातकालीन भंडार से करीब 40 करोड़ बैरल कच्चा तेल बाजार में जारी करेंगे। एजेंसी के कार्यकारी निदेशक Fatih Birol के अनुसार यह फैसला तेल आपूर्ति में आई भारी बाधा को कम करने के लिए लिया गया है। 28 फरवरी से शुरू हुए संघर्ष के बाद फारस की खाड़ी का अहम समुद्री मार्ग Strait of Hormuz बुरी तरह प्रभावित हुआ है, जहां से दुनिया के बड़े हिस्से में तेल की आपूर्ति होती है। बताया जा रहा है कि युद्ध के बाद इस मार्ग से तेल निर्यात पहले के मुकाबले 10 प्रतिशत से भी कम रह गया है।

    दूसरी ओर ईरान ने भी युद्ध के गंभीर मानवीय नुकसान का दावा किया है। ईरान के शिक्षा मंत्री Alireza Kazemi ने कहा कि अमेरिका और इजराइल के हमलों में अब तक 206 छात्र और शिक्षक मारे गए हैं और 161 लोग घायल हुए हैं। वहीं मीनाब शहर के एक गर्ल्स स्कूल पर हुए मिसाइल हमले को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिंता जताई गई है। इटली की प्रधानमंत्री Giorgia Meloni ने इस हमले की कड़ी निंदा करते हुए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।

    युद्ध के कारण तेल बाजार में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें 21 महीनों के उच्च स्तर पर पहुंच गई हैं। रिपोर्ट के अनुसार पेट्रोल की औसत कीमत 3.58 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई है, जबकि डीजल भी तेजी से महंगा हुआ है।

    इस बीच ईरान ने चेतावनी दी है कि अगर संघर्ष जारी रहा तो कच्चे तेल की कीमत 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है। ईरान के सैन्य अधिकारियों का कहना है कि जरूरत पड़ने पर वे Strait of Hormuz को बंद भी कर सकते हैं, जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर बड़ा असर पड़ेगा।

    मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच कई देशों में सुरक्षा और कूटनीतिक गतिविधियां भी तेज हो गई हैं। स्पेन ने इजराइल से अपना राजदूत वापस बुला लिया है, जबकि क्षेत्र में मिसाइल और ड्रोन हमलों की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। कुल मिलाकर यह संघर्ष अब केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक असर वाला संकट बनता जा रहा है।

  • व्हाइट हाउस: अमेरिका होर्मुज स्ट्रेट को खुला रखने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध

    व्हाइट हाउस: अमेरिका होर्मुज स्ट्रेट को खुला रखने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध


    वाशिंगटन । वाशिंगटन: ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच व्हाइट हाउस ने साफ कर दिया है कि अमेरिका होर्मुज स्ट्रेट को खुला रखने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने बताया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को बाधित नहीं होने देंगे और इस रणनीति का एक मुख्य हिस्सा ईरान के खिलाफ चलाए जा रहे अमेरिकी सैन्य अभियान ऑपरेशन एपिक फ्यूरी में शामिल है।

    दैनिक प्रेस ब्रीफिंग में लेविट ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप ने दोहराया है कि होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते तेल की आपूर्ति लगातार जारी रहनी चाहिए ताकि अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को उनकी ऊर्जा जरूरतें मिलती रहें। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर ईरान इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग को बंद करने का प्रयास करता है तो उसे कड़ी सैन्य कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा।

    लेविट ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी सेना दुनिया की सबसे ताकतवर है और होर्मुज स्ट्रेट में किसी भी तरह की रुकावट को रोकने के लिए अब तक से भी सख्त कदम उठाए जाएंगे। उन्होंने कहा होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे ज़रूरी एनर्जी चेकपॉइंट्स में से एक है जहां से वैश्विक तेल शिपमेंट का बड़ा हिस्सा गुजरता है। कोई भी रुकावट तेल की कीमतों को तेजी से बढ़ा सकती है और अंतरराष्ट्रीय बाजार को अस्थिर कर सकती है।

    व्हाइट हाउस ने बताया कि ईरान संघर्ष के दौरान ऊर्जा बाजारों को प्रभावित करने की संभावना को पहले से भांपा गया था। इसी वजह से प्रशासन ने खाड़ी क्षेत्र में काम कर रहे तेल टैंकरों की सुरक्षा के लिए कदम उठाए हैं। अब तक ट्रंप प्रशासन ने टैंकरों को राजनीतिक जोखिम बीमा और अस्थायी राहत प्रदान की है।

    सुरक्षा उपायों में अमेरिकी नौसेना की संभावित भूमिका भी शामिल है। जरूरत पड़ने पर नौसेना तेल टैंकरों को होर्मुज स्ट्रेट से सुरक्षित निकालने के लिए उनके साथ चल सकती है। व्हाइट हाउस ने कहा कि प्रशासन इस महत्वपूर्ण जलमार्ग की सुरक्षा और वैश्विक ऊर्जा बाजार की स्थिरता बनाए रखने के लिए आगे के कदमों पर लगातार विचार कर रहा है।

    लेविट ने यह भी बताया कि राष्ट्रपति ट्रंप और उनकी ऊर्जा टीम बाजार की स्थिति पर लगातार नजर रखे हुए हैं और उद्योग जगत के नेताओं से बातचीत कर रहे हैं। अमेरिकी सेना को निर्देश दिए गए हैं कि होर्मुज स्ट्रेट को खुला रखने के लिए अतिरिक्त विकल्प तैयार किए जाएं।

    बढ़ती ईंधन कीमतों को लेकर चिंतित अमेरिकी नागरिकों को भरोसा दिलाते हुए लेविट ने कहा कि हाल की बढ़ोतरी अस्थायी है और ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के सफल होने से लंबी अवधि में तेल और गैस की कीमतों में गिरावट आएगी। उन्होंने कहा एक बार जब ऑपरेशन के नेशनल सिक्योरिटी मकसद पूरे होंगे तो अमेरिकी तेल और गैस की कीमतें तेजी से गिरेंगी।

    व्हाइट हाउस के अनुसार ऑपरेशन एपिक फ्यूरी का उद्देश्य ईरान की मिसाइल क्षमताओं को कमजोर करना उसकी नेवी फोर्स को सीमित करना और उसे न्यूक्लियर हथियार हासिल करने से रोकना है। होर्मुज स्ट्रेट फारस की खाड़ी को अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों से जोड़ता है और दुनिया के बड़े ऊर्जा उपभोक्ताओं जैसे भारत चीन जापान और यूरोप की अर्थव्यवस्थाओं की भी सुरक्षा पर नजर है।

  • भारत ने दुनिया में तेल की कीमतें स्थिर रखने में अमेरिका के लिए निभाई अहम भूमिका: राजदूत सर्जियो गोर

    भारत ने दुनिया में तेल की कीमतें स्थिर रखने में अमेरिका के लिए निभाई अहम भूमिका: राजदूत सर्जियो गोर


    नई दिल्ली । अमेरिका के भारत में राजदूत सर्जियो गोर ने हाल ही में भारत की वैश्विक ऊर्जा बाजार में भूमिका को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि भारत दुनिया में तेल की कीमतें स्थिर रखने में अमेरिका का बहुत बड़ा साथी रहा है। गोर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर यह बात साझा करते हुए विशेष रूप से भारत की रूस से लगातार तेल खरीद को वैश्विक ऊर्जा स्थिरता के लिए जरूरी बताया।

    राजदूत गोर ने लिखा भारत तेल के सबसे बड़े कंज्यूमर और रिफाइनर में से एक है। अमेरिका और भारत के लिए मार्केट में स्थिरता लाने के लिए मिलकर काम करना बेहद जरूरी है। उनके अनुसार भारत की नीति न केवल घरेलू स्तर पर बल्कि अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर भी गहरा असर डालती है।

    यह बयान ऐसे समय आया है जब वैश्विक तेल बाजार में ईरान संकट के चलते भारी अस्थिरता देखी जा रही है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में संभावित बंदी की वजह से तेल आपूर्ति पर खतरा मंडरा रहा है और कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका जताई जा रही है। ऐसे में भारत की सक्रिय भूमिका और रूस से तेल खरीद की नीति को अमेरिका ने विशेष महत्व दिया है।

    व्हाइट हाउस ने पहले ही प्रेस बयान में कहा था कि डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने भारत को रूस से तेल खरीदने के लिए तत्कालीन छूट दी थी। प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने स्पष्ट किया कि यह फैसला राष्ट्रपति ट्रेजरी विभाग और नेशनल सिक्योरिटी टीम के संयुक्त विचार-विमर्श के बाद लिया गया। लेविट के अनुसार भारत में हमारे सहयोगी अच्छे रहे हैं और वैश्विक ऊर्जा बाजार की स्थिरता बनाए रखने के लिए यह कदम उठाया गया।

    उन्होंने बताया कि ईरान संकट के कारण दुनिया भर में तेल सप्लाई में पैदा हुए अस्थायी अंतर को कम करने के मकसद से यह तत्कालीन उपाय किया गया। छूट मिलने से पहले ही भारत को शिपमेंट भेज दिए गए थे। व्हाइट हाउस का मानना है कि इस व्यवस्था से मास्को को आर्थिक रूप से कोई खास लाभ नहीं होगा।

    विश्लेषकों का कहना है कि भारत का यह कदम न केवल घरेलू ऊर्जा जरूरतों को पूरा करता है बल्कि वैश्विक तेल बाजार में स्थिरता लाने में भी मददगार साबित होता है। भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा तेल कंज्यूमर और रिफाइनर है। ऐसे में देश की नीति और तेल खरीद की रणनीति वैश्विक स्तर पर भावनाओं और कीमतों को प्रभावित करती है।

    इस पूरे परिप्रेक्ष्य में अमेरिका और भारत के बीच ऊर्जा सहयोग की नई चुनौतियों और अवसरों का संकेत मिलता है। वैश्विक तेल बाजार की अस्थिरता और ईरान-संबंधी संकट के बीच भारत की भूमिका और रणनीतिक महत्व बढ़ गया है। राजदूत गोर के बयान से यह भी साफ होता है कि अमेरिका भारत को एक भरोसेमंद और सक्रिय साझेदार के रूप में देखता है जो अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा स्थिरता में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।