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  • किसी के 100 तो किसी के 14 बच्चे: अरबपतियों की दुनिया में बड़े परिवारों का चलन, जानिए इसके पीछे की सोच

    किसी के 100 तो किसी के 14 बच्चे: अरबपतियों की दुनिया में बड़े परिवारों का चलन, जानिए इसके पीछे की सोच

    नई दिल्ली: दुनिया के अति-अमीर लोगों की जीवनशैली में कई ऐसी बातें देखने को मिलती हैं, जो आम लोगों की जिंदगी से काफी अलग हैं। इनमें बड़ी संख्या में बच्चे पैदा करना और उनकी देखभाल के लिए सहायकों की पूरी टीम रखना भी शामिल है। जहां बहुत से परिवारों के लिए एक बच्चे की परवरिश का खर्च और जिम्मेदारी बड़ी चुनौती होती है, वहीं कुछ अरबपति दर्जनों बच्चों के माता-पिता बन रहे हैं। इस चलन ने परिवार, संपत्ति, सामाजिक प्रतिष्ठा और बच्चों के पालन-पोषण को लेकर नई चर्चा शुरू की है। कुछ मामलों में बच्चों की संख्या इतनी अधिक है कि उनकी देखभाल के लिए कई नैनी और सहायक नियुक्त किए जाते हैं। ऐसे परिवारों में बच्चों की रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए अलग-अलग लोगों की जिम्मेदारी तय रहती है। इससे यह सवाल भी उठता है कि आर्थिक संपन्नता के बावजूद माता-पिता अपने बच्चों के साथ कितना समय बिता पाते हैं और उनके भावनात्मक विकास में उनकी व्यक्तिगत भागीदारी कितनी रहती है।

    कारोबारी और मनोरंजन जगत की चर्चित हस्ती किम कार्दशियन का उदाहरण इस व्यवस्था को समझने में मदद करता है। उनके पूर्व पति से चार बच्चे हैं और उनकी देखभाल के लिए पांच नैनी नियुक्त होने की जानकारी सामने आई है। बताया गया है कि इन सहायकों की ड्यूटी अलग-अलग पालियों में चलती है। एक समय में एक नैनी बच्चों की देखभाल करती है, जबकि अन्य अपनी निर्धारित पाली के अनुसार जिम्मेदारी संभालती हैं। इस तरह बच्चों की दिनचर्या, उनकी जरूरतों और देखभाल के लिए एक व्यवस्थित व्यवस्था बनाई गई है। आर्थिक रूप से संपन्न परिवारों में घरेलू सहायकों की मदद लेना असामान्य नहीं है। बच्चों की देखभाल के लिए प्रशिक्षित लोगों की सहायता से माता-पिता अपने काम और निजी जीवन के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर सकते हैं। लेकिन जब बच्चों की संख्या अधिक हो और उनकी देखभाल का बड़ा हिस्सा सहायकों के जिम्मे हो, तो माता-पिता की व्यक्तिगत भागीदारी को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।

    तकनीक क्षेत्र के कारोबारी पावेल दुरुव का मामला भी बड़ी संख्या में बच्चों को लेकर चर्चा में रहा है। रूस में जन्मे दुरुव के बारे में बताया गया है कि शुक्राणु दान के माध्यम से दुनिया के 12 देशों में उनके 100 से अधिक जैविक बच्चे हैं। इस मामले में बच्चों का जन्म पारंपरिक पारिवारिक व्यवस्था से अलग माध्यम के जरिए हुआ है। चीन के उद्योगपति शू बो के बारे में भी सरोगेसी के माध्यम से 100 से अधिक बच्चे होने का विवरण सामने आया है। इन उदाहरणों से पता चलता है कि प्रजनन तकनीकों और आर्थिक संसाधनों की उपलब्धता ने कुछ संपन्न लोगों के लिए परिवार बनाने के विकल्पों का दायरा बढ़ाया है। हालांकि, ऐसे मामलों में बच्चों की परवरिश, उनके साथ संबंध और पारिवारिक जिम्मेदारियों का स्वरूप व्यक्ति तथा परिवार की परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।

    अत्यधिक संपन्नता के बीच बड़े परिवारों का चलन सामाजिक प्रतिष्ठा से भी जोड़कर देखा जा रहा है। कुछ लोगों के लिए अधिक संतान होना परिवार की निरंतरता या व्यक्तिगत पसंद का विषय हो सकता है, जबकि अन्य मामलों में इसके पीछे अलग-अलग विचार और परिस्थितियां हो सकती हैं। हालांकि, केवल बच्चों की संख्या के आधार पर किसी व्यक्ति की मंशा तय नहीं की जा सकती। बड़ी संख्या में बच्चों की परवरिश के लिए आर्थिक संसाधनों के साथ समय, भावनात्मक सहयोग और नियमित देखभाल की भी जरूरत होती है। नैनी और दूसरे सहायकों की मदद से बच्चों की दैनिक जरूरतें पूरी की जा सकती हैं, लेकिन माता-पिता के साथ उनका व्यक्तिगत संबंध भी उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।

    बच्चों के मानसिक और भावनात्मक विकास पर परिवार के माहौल, देखभाल की निरंतरता और माता-पिता के साथ संबंधों का प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे में बड़ी संख्या में बच्चों वाले परिवारों के सामने यह चुनौती रहती है कि प्रत्येक बच्चे को पर्याप्त ध्यान और व्यक्तिगत समय कैसे दिया जाए। दूसरी ओर, यह भी महत्वपूर्ण है कि किसी परिवार की परिस्थितियों को समझे बिना बच्चों के विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने का निष्कर्ष नहीं निकाला जाए। हर बच्चे की जरूरतें और पारिवारिक अनुभव अलग हो सकते हैं। अंततः संपत्ति और सुविधाएं बच्चों के जीवन को आसान बनाने में मदद कर सकती हैं, लेकिन उनके पालन-पोषण में भावनात्मक जुड़ाव और जिम्मेदारी भी महत्वपूर्ण हैं। अरबपतियों के बड़े परिवारों के उदाहरण इसी व्यापक बहस को सामने लाते हैं कि आधुनिक समाज में परिवार का आकार, आर्थिक क्षमता और बच्चों की परवरिश के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

  • विश्व डाक दिवस: दूतों और घोड़ा डाक से ईमेल तक, हजारों साल में कैसे बदल गई संदेश पहुंचाने की दुनिया?

    विश्व डाक दिवस: दूतों और घोड़ा डाक से ईमेल तक, हजारों साल में कैसे बदल गई संदेश पहुंचाने की दुनिया?

    नई दिल्ली: एक समय था जब दूर रहने वाले किसी अपने का हाल जानने के लिए चिट्ठी का इंतजार करना पड़ता था। गांव की गलियों में डाकिया दिखाई देता तो लोगों की निगाहें उसके थैले पर टिक जाती थीं। किसी को नौकरी का नियुक्ति पत्र मिलता था, तो किसी के घर परीक्षा का परिणाम, मनी ऑर्डर या रिश्तेदारों की चिट्ठी पहुंचती थी। समय के साथ टेलीफोन, फैक्स, ईमेल, मोबाइल और इंटरनेट ने संदेश भेजने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया। अब तस्वीरें, वीडियो और जरूरी दस्तावेज कुछ सेकंड में दुनिया के दूसरे हिस्से तक पहुंच जाते हैं। हालांकि, संचार की इस आधुनिक व्यवस्था की शुरुआत हजारों साल पहले दूतों और संदेशवाहकों से हुई थी। विश्व डाक दिवस के अवसर पर संदेश पहुंचाने की इसी लंबी यात्रा को समझना महत्वपूर्ण है।

    प्राचीन समय में संदेश पहुंचाने के लिए आज की तरह डाकघर, डाक टिकट या नियमित डाक वितरण व्यवस्था नहीं थी। राजा-महाराजा और शासक अपने संदेश एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने के लिए पैदल दूतों और घुड़सवार संदेशवाहकों की मदद लेते थे। शासन व्यवस्था के विस्तार के साथ दूर-दराज के क्षेत्रों तक सूचनाएं पहुंचाने की जरूरत भी बढ़ती गई। भारत में दिल्ली सल्तनत के दौरान प्रशासनिक संदेशों के लिए डाक व्यवस्था का इस्तेमाल किया जाता था। अलाउद्दीन खिलजी के समय घोड़े और पैदल संदेशवाहकों के जरिए सूचनाएं पहुंचाने की व्यवस्था का उल्लेख मिलता है। बाद में शेरशाह सूरी ने सड़कों और सरायों के नेटवर्क के साथ घोड़ा डाक व्यवस्था को मजबूत किया। इन व्यवस्थाओं ने संदेश पहुंचाने के संगठित तरीकों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    अठारहवीं सदी में भारत में डाक व्यवस्था का स्वरूप अधिक व्यवस्थित होने लगा। ब्रिटिश शासन के दौरान प्रशासनिक जरूरतों के लिए डाक सेवाओं का विस्तार किया गया। वर्ष 1774 में कलकत्ता के जनरल पोस्ट ऑफिस की स्थापना को इस विकास का महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। इसके बाद मद्रास और बॉम्बे में भी जनरल पोस्ट ऑफिस स्थापित किए गए। वर्ष 1854 में भारतीय डाक व्यवस्था के विकास को नई दिशा मिली और डाक शुल्क, टिकट तथा वितरण प्रणाली को अधिक व्यवस्थित किया गया। इससे विभिन्न क्षेत्रों के बीच पत्र भेजना आसान हुआ। डाक टिकटों ने भी इस व्यवस्था को बदलने में बड़ी भूमिका निभाई। वर्ष 1852 में सिंध क्षेत्र में ‘सिंध डाक’ टिकट जारी किया गया, जिसे भारत के शुरुआती डाक टिकटों में गिना जाता है। वर्ष 1854 में ऐसे टिकट जारी किए गए जिनका इस्तेमाल व्यापक स्तर पर किया जा सकता था। इससे पहले वर्ष 1840 में ब्रिटेन का ‘पेनी ब्लैक’ जारी हो चुका था, जिसे दुनिया का पहला चिपकने वाला डाक टिकट माना जाता है।

    डाक व्यवस्था का विस्तार होने के साथ डाकिया आम लोगों के जीवन का अहम हिस्सा बन गया। मोबाइल और इंटरनेट के दौर से पहले चिट्ठियां दूर रहने वाले रिश्तेदारों और मित्रों से संपर्क बनाए रखने का प्रमुख माध्यम थीं। नौकरी के पत्र, सरकारी सूचनाएं, परीक्षा परिणाम और व्यक्तिगत संदेश डाक के जरिए पहुंचते थे। मनी ऑर्डर की सुविधा ने भी लोगों को दूर रहकर अपने परिवारों तक पैसे भेजने में मदद की। विशेष रूप से उन इलाकों में यह सुविधा उपयोगी थी, जहां बैंकिंग सेवाओं की पहुंच सीमित थी। पोस्टकार्ड ने कम खर्च में संदेश भेजना आसान बनाया, जबकि रेलवे मेल सर्विस ने लंबी दूरी तक डाक पहुंचाने की गति बढ़ाई। इस तरह सड़क और रेल के बाद हवाई परिवहन ने भी डाक व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव लाया।

    भारत में वर्ष 1911 में इलाहाबाद से नैनी के बीच पहली आधिकारिक हवाई डाक उड़ान हुई। यह उड़ान करीब 18 किलोमीटर की दूरी तक गई थी। उस समय डाक को हवाई मार्ग से पहुंचाना संचार व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण प्रयोग था। इसके बाद परिवहन के आधुनिक साधनों ने दूरस्थ स्थानों तक पत्र और जरूरी दस्तावेज पहुंचाने की क्षमता बढ़ाई। हर साल 9 अक्टूबर को विश्व डाक दिवस मनाया जाता है। इसी तारीख को वर्ष 1874 में यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन की स्थापना हुई थी। इसका उद्देश्य अलग-अलग देशों की डाक सेवाओं के बीच सहयोग बढ़ाना और अंतरराष्ट्रीय डाक व्यवस्था को बेहतर बनाना था।

    भारत की आजादी के बाद डाक सेवाओं का विस्तार ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों तक किया गया। समय के साथ डाकघरों ने चिट्ठियों के अलावा बचत, बीमा और अन्य सेवाएं भी उपलब्ध करानी शुरू कीं। वर्ष 1986 में स्पीड पोस्ट की शुरुआत ने जरूरी पत्रों और दस्तावेजों को तेजी से पहुंचाने का विकल्प दिया। इसके बाद टेलीफोन, फैक्स और ईमेल ने संचार की गति और बढ़ा दी। इंटरनेट के विस्तार के साथ नौकरी के आवेदन, व्यावसायिक पत्राचार और दस्तावेज इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भेजे जाने लगे। मोबाइल फोन, एसएमएस और इंस्टेंट मैसेजिंग ऐप ने इस बदलाव को और तेज कर दिया। अब संदेशों के साथ फोटो, वीडियो, ऑडियो और दस्तावेज भी तुरंत साझा किए जा सकते हैं।

    डिजिटल संचार के विस्तार के बावजूद डाक सेवा की उपयोगिता समाप्त नहीं हुई है। आज डाक विभाग पार्सल, लॉजिस्टिक्स, बैंकिंग, बीमा और कई सरकारी सेवाओं से भी जुड़ा है। भारत में 1.55 लाख से अधिक डाकघरों का नेटवर्क दूरदराज के क्षेत्रों तक सेवाएं पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। चिट्ठियों की संख्या में बदलाव आया है, लेकिन डाक व्यवस्था नए समय की जरूरतों के अनुसार अपना स्वरूप बदल रही है। वहीं, हाथ से लिखी चिट्ठियों का भावनात्मक महत्व भी बरकरार है। पुरानी चिट्ठियां लोगों को रिश्तों, यादों और बीते समय से जोड़ती हैं। दूतों से शुरू हुआ संदेश पहुंचाने का सफर आज डिजिटल मैसेजिंग तक पहुंच चुका है, लेकिन अपनों तक अपनी बात पहुंचाने की मानवीय जरूरत अब भी पहले जैसी है।

  • एलन मस्क ने राहुल गांधी को कहा थैंक्यू, स्टारलिंक लाइसेंस पर उठाए सवाल; भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवा को लेकर बढ़ी चर्चा

    एलन मस्क ने राहुल गांधी को कहा थैंक्यू, स्टारलिंक लाइसेंस पर उठाए सवाल; भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवा को लेकर बढ़ी चर्चा

    नई दिल्ली: अमेरिकी उद्योगपति एलन मस्क और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के बीच भारत में स्टारलिंक की सेवाओं को लेकर सोशल मीडिया पर बातचीत हुई है। राहुल गांधी के जवाब पर मस्क ने प्रतिक्रिया देते हुए उन्हें धन्यवाद कहा और मामले को चिंताजनक बताया। मस्क ने इससे पहले सवाल उठाया था कि उनकी कंपनी स्टारलिंक को 165 से अधिक देशों में लाइसेंस मिल चुका है और वह पिछले पांच वर्षों से भारत सरकार के कानूनों तथा आवश्यकताओं का पालन करने की बात कह रही है, इसके बावजूद भारत में उसे अब तक लाइसेंस क्यों नहीं मिला है। राहुल गांधी ने जवाब में लिखा था कि एलन मस्क का भारत में स्वागत है और दूसरे व्यक्ति से मिलने पर उन्हें इस मामले के बारे में और जानकारी मिलेगी। हालांकि, राहुल गांधी ने अपने संदेश में किसी व्यक्ति का नाम नहीं लिया। इस बातचीत के बाद भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं की शुरुआत और कंपनियों के लिए लागू नियमों को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

    मस्क ने राहुल गांधी के संदेश के जवाब में कहा कि यह स्थिति वास्तव में चिंताजनक है। इससे पहले भी वह भारत में स्टारलिंक की सेवाओं को लेकर सवाल उठा चुके हैं। उन्होंने आरोप लगाया था कि कुछ प्रभावशाली समूह भारतीय बाजार में अपनी एकाधिकार वाली स्थिति बनाए रखने के लिए उनकी कंपनी को रोक रहे हैं। मस्क ने इस कथित रोक को भारतीय लोगों के हितों के खिलाफ बताया था। हालांकि, भारत सरकार ने इन आरोपों पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि देश में दूरसंचार सेवाओं के लिए निष्पक्ष और बिना भेदभाव वाली नियामकीय व्यवस्था लागू है। स्टारलिंक, स्पेसएक्स की उपग्रह आधारित इंटरनेट सेवा है, जो सैटेलाइट के माध्यम से इंटरनेट उपलब्ध कराने की योजना पर काम कर रही है। कंपनी भारतीय बाजार में सेवाएं शुरू करने के लिए जरूरी प्रक्रियाएं पूरी कर रही है। इस बीच लाइसेंस, स्पेक्ट्रम आवंटन और सुरक्षा संबंधी मंजूरियों को लेकर अलग-अलग पक्षों के बयान सामने आए हैं।

    स्टारलिंक की ओर से भारतीय बाजार में प्रवेश की तैयारियों को लेकर भी जानकारी दी गई है। कंपनी की अधिकारी लॉरेन ड्रेयर ने कहा था कि भारत में सेवा शुरू करने के लिए जरूरी बुनियादी ढांचे की तैयारी में निवेश किया गया है। कंपनी भारत में अपनी उपग्रह आधारित इंटरनेट सेवा उपलब्ध कराने के लिए तैयार होने की बात कह चुकी है। हालांकि, सेवा शुरू करने के लिए केवल लाइसेंस मिलना पर्याप्त नहीं है। संबंधित कंपनियों को स्पेक्ट्रम आवंटन और सुरक्षा मंजूरी जैसी आवश्यक प्रक्रियाएं भी पूरी करनी होंगी। भारत में उपग्रह संचार सेवाओं के क्षेत्र में स्टारलिंक के अलावा जियो सैटकॉम और यूटेलसैट वनवेब भी मौजूद हैं। इन कंपनियों को देश में सेवाएं शुरू करने के लिए लाइसेंस दिए जा चुके हैं। इसके बावजूद व्यावसायिक स्तर पर सेवा शुरू करने से पहले निर्धारित नियामकीय और सुरक्षा शर्तों का पालन करना जरूरी है। इसी वजह से लाइसेंस मिलने और सेवाओं के वास्तविक संचालन के बीच अंतर बना हुआ है।

    भारत सरकार ने मस्क के आरोपों के जवाब में कहा है कि देश में सैटेलाइट संचार समेत सभी दूरसंचार सेवाओं के लिए निष्पक्ष व्यवस्था लागू है। सरकार के अनुसार, नियामकीय नियमों या उन्हें लागू करने की प्रक्रिया को अनुचित बताना सही नहीं है। दूरसंचार सेवाओं के लिए निर्धारित लाइसेंस शर्तों के तहत प्रत्येक उपग्रह संचार कंपनी को सुरक्षा संबंधी आवश्यकताओं के पालन की पुष्टि करनी होती है। इन शर्तों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सेवाएं निर्धारित नियमों के अनुसार संचालित हों। सरकार ने स्पष्ट किया है कि नियम किसी एक कंपनी को ध्यान में रखकर नहीं बनाए गए हैं, बल्कि सभी संबंधित कंपनियों पर लागू होते हैं।

    संचार राज्यमंत्री चंद्रशेखर पेम्मासानी ने भी इस मामले पर जानकारी देते हुए कहा कि सैटेलाइट संचार सेवाओं से जुड़े सुरक्षा मुद्दों पर गृह मंत्रालय विचार कर रहा है। आवश्यक मंजूरी मिलने के बाद कंपनियों को सेवाएं शुरू करने की अनुमति दी जाएगी। उन्होंने बताया कि दूरसंचार विभाग ने सैटेलाइट संचार कंपनियों को लाइसेंस देने के साथ अस्थायी स्पेक्ट्रम भी आवंटित किया है। उनके अनुसार, इस प्रक्रिया का संबंध किसी एक कंपनी से नहीं है। ऐसे में स्टारलिंक की भारत में शुरुआत का मामला कंपनी की तैयारियों के साथ सुरक्षा मंजूरी और अन्य नियामकीय आवश्यकताओं पर भी निर्भर करता है।

  • इमरान खान की बहनों की हिरासत पर बेटे कासिम का गंभीर आरोप, परिवार और वकीलों को नहीं मिल रही जानकारी

    इमरान खान की बहनों की हिरासत पर बेटे कासिम का गंभीर आरोप, परिवार और वकीलों को नहीं मिल रही जानकारी

    नई दिल्ली: पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) के संस्थापक इमरान खान के बेटे कासिम खान ने अपनी तीन मौसियों की हिरासत को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। कासिम का कहना है कि पाकिस्तानी अधिकारियों ने उनकी मौसियों अलीमा खान, नोरीन नियाजी और उजमा खान को अगवा कर लिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि परिवार और वकीलों को अब तक यह जानकारी नहीं दी गई है कि तीनों महिलाएं किस स्थिति में हैं, उन्हें कहां रखा गया है और उनकी हिरासत की वजह क्या है। कासिम ने अपने बयान में पिता इमरान खान की स्थिति को लेकर भी चिंता जताई और कहा कि छह महीने से अधिक समय से उनका और उनके भाई का पिता से कोई संपर्क नहीं हुआ है। ऐसे में उन्हें इमरान खान की सेहत के बारे में भी सही जानकारी नहीं मिल पा रही है।

    कासिम खान के अनुसार, उनकी मौसियों की स्थिति को लेकर परिवार अनिश्चितता का सामना कर रहा है। उन्होंने कहा कि न तो रिश्तेदारों को उनकी हालत के बारे में बताया जा रहा है और न ही कानूनी प्रतिनिधियों को उनसे मिलने की जानकारी या अनुमति मिल रही है। कासिम ने अपने बयान में इमरान खान की हिरासत पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि पाकिस्तान में हजारों लोग शांतिपूर्ण तरीके से सड़कों पर उतरकर इमरान खान की रिहाई की मांग कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके पिता को गैरकानूनी और राजनीतिक कारणों से जेल में रखा गया है। कासिम ने कहा कि लोगों की न्याय की मांग और लोकतांत्रिक अधिकारों को किसी भी प्रकार की रुकावट, धमकी या दबाव से नहीं दबाया जा सकता। उनके मुताबिक, जब तक लोगों की लोकतांत्रिक इच्छा का सम्मान नहीं होगा और उनका चुना हुआ नेता जेल में रहेगा, तब तक देश में स्थायी शांति और स्थिरता स्थापित करना मुश्किल होगा।

    इमरान खान की तीनों बहनों को पिछले महीने 30 दिनों की निवारक हिरासत में लिया गया था। यह कार्रवाई पीटीआई की ओर से 27 सितंबर को प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन और इस्लामाबाद तक मार्च की तैयारी के दौरान हुई। पार्टी इस प्रदर्शन के जरिए इमरान खान की सेहत के बारे में जानकारी देने और उन्हें अदियाला जेल से रिहा करने की मांग उठा रही थी। इमरान खान अगस्त 2023 से अदियाला जेल में बंद हैं। पीटीआई ने अपने समर्थकों से देशभर में प्रदर्शन करने और संविधान की सर्वोच्चता के लिए एकजुट होने का आह्वान किया था। पार्टी की मांगों में इमरान खान की रिहाई भी प्रमुख रही है। हिरासत की कार्रवाई के बाद से उनकी बहनों की स्थिति और परिवार से संपर्क को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

    इस मामले में परिवार की ओर से लाहौर हाई कोर्ट में पहले से लंबित याचिका के तहत दो अलग-अलग सिविल आवेदन भी दायर किए गए हैं। इन आवेदनों में अलीमा खान के बेटे शाह रेज खान और नोरीन नियाजी की बेटी सकीना नियाजी की ओर से तीनों महिलाओं से मुलाकात पर रोक और दवाइयों तक पहुंच नहीं दिए जाने को चुनौती दी गई है। परिवार का आरोप है कि हिरासत में रखी गई महिलाओं से न रिश्तेदारों को मिलने दिया जा रहा है और न ही उनके वकीलों को संपर्क करने की अनुमति मिल रही है। आवेदनों में कहा गया है कि महिलाओं को दवाइयां केवल एक बार उपलब्ध कराई गईं और इसके बाद किसी को उनसे मिलने नहीं दिया गया। परिवार ने उनकी सेहत को लेकर चिंता जताते हुए अदालत से अनुरोध किया है कि वकीलों और परिजनों को मुलाकात करने तथा जरूरी दवाइयां पहुंचाने की अनुमति दी जाए।

    इससे पहले 24 सितंबर को लाहौर हाई कोर्ट ने इमरान खान की बहनों की निवारक हिरासत से संबंधित आदेश को तत्काल निलंबित करने की मांग खारिज कर दी थी। इसके बाद भी परिवार की ओर से मुलाकात और दवाइयों की उपलब्धता को लेकर कानूनी राहत मांगी गई है। कासिम खान का ताजा बयान ऐसे समय आया है, जब परिवार इमरान खान से संपर्क नहीं होने और उनकी बहनों की हिरासत को लेकर चिंता जता रहा है। फिलहाल परिवार की प्रमुख मांग तीनों महिलाओं की स्थिति की जानकारी, उनसे मुलाकात की अनुमति और जरूरी दवाइयों तक पहुंच सुनिश्चित कराने की है।

  • ग्रीन कार्ड और H-1B वीजा पर अमेरिकी शिकंजा, माइक्रोसॉफ्ट ने आरोपों को नकारा, ट्रंप ने सत्या नडेला को किया सम्मानित

    ग्रीन कार्ड और H-1B वीजा पर अमेरिकी शिकंजा, माइक्रोसॉफ्ट ने आरोपों को नकारा, ट्रंप ने सत्या नडेला को किया सम्मानित


    नई दिल्ली। अमेरिका में आव्रजन नियमों को लेकर ट्रंप प्रशासन की सख्ती के बीच माइक्रोसॉफ्ट ने अपनी एच-1बी वीजा नीति का बचाव किया है। अमेरिकी सरकार की कार्रवाई के बाद कंपनी ने स्पष्ट किया कि उसके अमेरिकी कार्यबल में अधिकांश कर्मचारी अमेरिकी नागरिक हैं और विदेशी कर्मचारियों की नियुक्ति का उद्देश्य प्रतिभाशाली लोगों को अवसर देना है। इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने माइक्रोसॉफ्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सत्या नडेला को नेशनल मेडल ऑफ टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन से सम्मानित किया। एक तरफ कंपनी आव्रजन नीति को लेकर सरकारी कार्रवाई का सामना कर रही है तो दूसरी तरफ उसके प्रमुख को तकनीकी क्षेत्र में योगदान के लिए सम्मान मिलना चर्चा का विषय बन गया है।

    माइक्रोसॉफ्ट ने अपने बयान में बताया कि पिछले वित्तीय वर्ष के दौरान कंपनी की ओर से एच-1बी वीजा के लिए किए गए लगभग 6000 आवेदनों में से करीब 80 प्रतिशत मौजूदा कर्मचारियों की वीजा स्थिति बदलने या उसे आगे बढ़ाने से संबंधित थे। कंपनी के अनुसार नए कर्मचारियों के लिए किए गए शेष आवेदन उन लोगों से जुड़े थे जो पहले से ही अमेरिका में कानूनी रूप से रह रहे थे। माइक्रोसॉफ्ट ने यह भी कहा कि एच-1बी वीजा से जुड़े कर्मचारी उसके अमेरिकी कार्यबल का लगभग एक प्रतिशत थे। कंपनी ने उन आरोपों को भी खारिज किया जिनमें विदेशी कर्मचारियों को अमेरिकी कर्मचारियों की तुलना में कम वेतन देने की बात कही गई थी। उसका कहना है कि एच-1बी वीजा पर काम करने वाले कर्मचारियों को अन्य कर्मचारियों के समान वेतन दिया जाता है।

    यह विवाद उस समय बढ़ा जब अमेरिकी श्रम सचिव कीथ सोंडरलिंग ने माइक्रोसॉफ्ट को स्थायी श्रम प्रमाणन कार्यक्रम यानी पीईआरएम से निलंबित करने की घोषणा की। इस कार्रवाई के तहत कंपनी के नए और लंबित आवेदनों को स्वीकार नहीं किए जाने की बात कही गई। रिपोर्ट के अनुसार एडोब और कई बड़ी आईटी आउटसोर्सिंग कंपनियां भी इस कार्रवाई के दायरे में आई हैं। अमेरिकी प्रशासन ने इस फैसले के पीछे चल रही संघीय जांच का हवाला दिया है। पीईआरएम कार्यक्रम विदेशी कर्मचारियों को स्थायी रूप से अमेरिका में काम करने और ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया में आगे बढ़ने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

    अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने माइक्रोसॉफ्ट की भर्ती नीति पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि कंपनी ने लगभग 6000 अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से हटाया जबकि हजारों एच-1बी वीजा और ग्रीन कार्ड का इस्तेमाल किया। हालांकि माइक्रोसॉफ्ट ने अपनी वीजा नीति का बचाव करते हुए कहा कि उसके आंकड़ों को सही संदर्भ में देखा जाना चाहिए। इस विवाद ने अमेरिकी तकनीकी उद्योग में विदेशी कर्मचारियों की भूमिका और स्थानीय लोगों के रोजगार को लेकर बहस तेज कर दी है। भारतीय आईटी पेशेवरों के लिए भी यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण है क्योंकि बड़ी संख्या में भारतीय कर्मचारी अमेरिकी तकनीकी कंपनियों में एच-1बी वीजा के माध्यम से काम करते हैं।

    दूसरी ओर राष्ट्रपति ट्रंप ने सत्या नडेला के नेतृत्व की प्रशंसा की और माइक्रोसॉफ्ट को बदलने में उनकी भूमिका को सराहा। उन्होंने क्लाउड कंप्यूटिंग और सुपरइंटेलिजेंस जैसे तकनीकी क्षेत्रों में नडेला के योगदान का उल्लेख किया। इसके साथ ही अमेरिकी श्रम विभाग ने नौ प्रमुख विश्वविद्यालयों में जे-1 वीजा से जुड़े संभावित उल्लंघनों की ऐतिहासिक जांच की घोषणा भी की है। एफ-1 छात्र वीजा पर आने वाले विद्यार्थियों के वैकल्पिक व्यावहारिक प्रशिक्षण कार्यक्रम यानी ओपीटी के आवेदनों पर नए शुल्क लगाने का प्रस्ताव भी सामने आया है। कुल मिलाकर अमेरिका में आव्रजन नियमों को सख्त बनाने की कोशिशों का असर तकनीकी कंपनियों विदेशी पेशेवरों और अंतरराष्ट्रीय छात्रों पर पड़ सकता है। हालांकि प्रस्तावित शुल्क और प्रशासनिक फैसलों के अंतिम प्रभाव को समझने के लिए आधिकारिक अधिसूचनाओं और आगे के घटनाक्रम पर नजर रखना जरूरी होगा।

  • ट्रंप का बड़ा ऐलान… बोले- 3 नवंबर के मध्यावधि चुनाव से पहले ईरान पर नहीं करेंगे हमला

    ट्रंप का बड़ा ऐलान… बोले- 3 नवंबर के मध्यावधि चुनाव से पहले ईरान पर नहीं करेंगे हमला


    वाशिंगटन।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने गुरुवार को ऐलान किया तीन नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनाव (Mid-term Election) से पहले अमेरिका (America) ईरान (Iran) पर फिर से हमला नहीं करेगा। रिपब्लिकन उम्मीदवारों के लिए इस सप्ताह प्रचार करते हुए ट्रंप ने संकेत दिया था कि उन्हें भरोसा है कि युद्ध का निर्णायक दौर चुनाव से पहले या उसके तत्काल बाद खत्म हो सकता है।

    उन्होंने यह भी संकेत दिया था कि उन्होंने ईरान के खिलाफ बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान फिर शुरू करने के विकल्प को खुला रखा है। हालांकि, ट्रंप ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा कि अमेरिका तीन नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनाव से पहले ईरान पर हमला नहीं करेगा।

    इससे पहले, व्हाइट हाउस ने अमेरिकी रक्षा विभाग को मध्यावधि कांग्रेसी चुनावों से पहले ईरान पर हमले के विकल्प तैयार करने का निर्देश दिया था। ‘द अटलांटिक’ ने प्रशासन के दो अधिकारियों के हवाले से बुधवार को एक रिपोर्ट में यह जानकारी दी थी। ट्रंप ने मंगलवार को कहा था कि अमेरिका को ईरान के साथ चल रहे टकराव को “अच्छे तरीके से या बुरे तरीके से” खत्म करना होगा।

    रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी केन्द्रीय कमान (सेंटकॉम) इन योजनाओं को तैयार कर रहा है और संभावित हमलों के दायरे और उद्देश्यों पर चर्चा अभी भी जारी है। रिपोर्टों के मुताबिक यह कदम मध्यावधि चुनावों से पहले पेट्रोल की कीमतें कम करने और टकराव के मामले में प्रगति हासिल करने की ट्रंप की इच्छा को दर्शाता है।

    ईरान ने परमाणु उद्योग की गतिविधियां नहीं रोकी
    वहीं, ईरान ने अपने परमाणु उद्योग की गतिविधियां बंद नहीं की हैं। ईरान के उपराष्ट्रपति और परमाणु ऊर्जा संगठन (एईओआई) के प्रमुख मोहम्मद इस्लामी ने बुधवार को यह बात कही। एईओआई के अनुसार, इस्लामी ने तेहरान में बाल कैंसर के निदान एवं उपचार केंद्र के उद्घाटन के अवसर पर कहा, “ईरान के परमाणु उद्योग पर दबाव, प्रतिबंध, धमकियां और हमले किए जा रहे हैं, लेकिन ईरान अपने विकास को बनाए रखने में सफल रहा है।”

    उन्होंने कहा कि एईओआई में स्वास्थ्य सेवा और खाद्य सुरक्षा को ईरान के विकास के लिए रणनीतिक प्राथमिकताओं के रूप में देखा जाता है। तमाम दबावों और प्रतिबंधों के बावजूद संगठन अपने विकास कार्यों को जारी रखे हुए है। इस्लामी ने कहा कि दबाव के साथ-साथ ईरान के खिलाफ आरोप भी लगाए जा रहे हैं। आरोप लगाने वाले भी जानते हैं कि ये वास्तविकता को प्रतिबिंबित नहीं करते। इसके बावजूद ईरान के परमाणु उद्योग के कर्मचारी अपने दायित्वों का उचित तरीके से निर्वहन कर रहे हैं।

  • रूस के भीषण मिसाइल हमलों से यूक्रेन में मची तबाही…. 33 लोगों की मौत

    रूस के भीषण मिसाइल हमलों से यूक्रेन में मची तबाही…. 33 लोगों की मौत


    कीव।
    रूस- यूक्रन (Russia-Ukraine War) के बीच जंग जारी है। दोनों देश एक दूसरे पर ताबड़तोड़ हमले कर रहे हैं। इस बीच पूर्वी यूक्रेन (Ukraine) में रूस (Russia) की ओर से किए गए हवाई हमलों में 33 लोगों की मौत हो गई। बताया जा रहा है कि इस घटना 18 अन्य घायल हो गए। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की (President Volodymyr Zelenskyy) ने सोशल मीडिया पर यह जानकारी दी। गुरुवार सुबह क्रामाटोर्स्क शहर में एक सामान्य सार्वजनिक बस स्टॉप को निशाना बनाया गया, जिसमें 12 लोगों की जान चली गयी। बता दें कि रूस ने सर्दियों की शुरुआत से पहले यूक्रेन पर हमले तेज कर दिए हैं, जिससे राजधानी कीव में बिजली संकट गहरा गया है।

    क्षेत्रीय सैन्य प्रशासन के प्रमुख वादिम फिलाश्किन ने कहा कि दोनेत्स्क क्षेत्र के क्रामातोर्स्क और स्लोवियांस्क में सुरक्षा की स्थिति में तेजी से आई गिरावट के कारण सार्वजनिक परिवहन रोक दिया गया है। फिलाश्किन ने रूस पर नागरिकों को जानबूझकर निशाना बनाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि ऐसे हालात में हमें यात्रियों और चालकों की जान जोखिम में डालने का कोई अधिकार नहीं है। क्रामातोर्स्क और स्लोवियांस्क के निवासियों की सुरक्षा सबसे अहम है।

    बता दें कि रूस ने इससे एक दिन पहले पूर्वी यूक्रेन के प्राइलुकी में मिसाइल हमले किए थे, जिनमें पांच बच्चों समेत 22 लोगों की मौत हो गई थी और 54 अन्य घायल हो गए थे। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने कहा कि जैसे-जैसे सर्दी नजदीक आ रही है, रूस की ओर से रोजाना किए जाने वाले मिसाइल और ड्रोन हमले बढ़ सकते हैं। उन्होंने उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (NATO) के सदस्य देशों से अतिरिक्त रक्षा सहायता की अपील की।

    यूक्रेनी नेतृत्व ने रूसी अपराधों के खिलाफ आवाज उठाने वाले अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों का आभार व्यक्त किया है। यह भी कहा गया कि केवल शाब्दिक समर्थन काफी नहीं है और इसे तत्काल नये सैन्य रक्षा पैकेजों के रूप में जमीनी स्तर पर लागू किया जाना चाहिए। एंटी-बैलिस्टिक क्षमताओं की आपूर्ति, लड़ाकू विमानों के लिए गोला-बारूद और इंटरसेप्टर तकनीक में निवेश प्रतिदिन निर्दोष नागरिकों की जान बचाने में सीधे तौर पर मददगार साबित हो रहा है।

  • आइवरी कोस्ट के राष्ट्रपति से मिले विदेश मंत्री जयशंकर, रक्षा और कृषि में सहयोग बढ़ाने पर हुई चर्चा

    आइवरी कोस्ट के राष्ट्रपति से मिले विदेश मंत्री जयशंकर, रक्षा और कृषि में सहयोग बढ़ाने पर हुई चर्चा


    अबिदजान।
    विदेश मंत्री एस जयशंकर (External Affairs Minister S. Jaishankar) ने कहा कि भारत (India) और आइवरी कोस्ट (Ivory Coast) की साझेदारी आपसी सम्मान पर आधारित है। दोनों देशों की विकास और समृद्धि के लिए साझा प्रतिबद्धता है। जयशंकर ने पश्चिम अफ्रीकी देश की अपनी यात्रा के दौरान राष्ट्रपति अलासाने औटारा (President Alassane Ouattara) से मुलाकात की। वह तीन अफ्रीकी देशों की यात्रा पर हैं। इसमें घाना, आइवरी कोस्ट और इथियोपिया शामिल हैं।

    जयशंकर बुधवार को घाना से आइवरी कोस्ट पहुंचे थे। यह उनकी तीन देशों की यात्रा का दूसरा पड़ाव है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, आइवरी कोसट के राष्ट्रपति अलासाने औटारा से मुलाकात कर सम्मानित महसूस किया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत शुभकामनाएं उन्हें दीं।

    विदेश मंत्री ने कहा, भारत-आइवरी कोस्ट साझेदारी आपसी सम्मान और विकास तथा समृद्धि के लिए साझा प्रतिबद्धता पर आधारित है। उन्होंने राष्ट्रपति औटारा को ‘मजबूत, लंबे समय तक चलने वाली और दोनों के लिए फायदेमंद साझेदारी के अपने दृष्टिकोण को साझा करने’ के लिए धन्यवाद दिया।


    रक्षा सहयोग पर क्या हुई बात?

    बुधवार को जयशंकर ने अबिदजान में आइवरी कोस्ट के उप प्रधानमंत्री तेने बिराहिमा औटारा से भी मुलाकात की। दोनों ने दोनों देशों के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग पर चर्चा की। बैठक के बाद जयशंकर ने सोशल मीडिया पर लिखा, हमने आपसी भरोसे, क्षमता निर्माण और साझा हितों पर आधारित अपने बढ़ते रक्षा सहयोग पर बात की।

    उन्होंने कहा, हमने रक्षा और आतंकवाद विरोधी सहयोग को और बढ़ाने के अवसरों पर विचार साझा किए। इसमें प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण और संस्थागत स्तर पर बढ़े हुए आदान-प्रदान के जरिए सहयोग शामिल है।

    औटारा आइवरी कोस्ट के रक्षा मंत्री भी हैं। उन्होंने कहा कि जयशंकर के साथ बातचीत आइवरी कोस्ट और भारत के बीच सहयोग मजबूत करने पर केंद्रित रही। औटारा ने सोशल मीडिया पर लिखा, यह बैठक शांति, सुरक्षा और विकास के लिए रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने की हमारी साझा प्रतिबद्धता को दोहराती है।


    व्यापार और स्वास्थ्य पर भी चर्चा

    जयशंकर ने आइवरी कोस्ट की विदेश मामलों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की राज्य मंत्री नियाले काबा से भी बातचीत की। इसमें दोनों देशों के संबंधों को मजबूत करने पर चर्चा हुई। इसमें व्यापार, बुनियादी ढांचा, कृषि और स्वास्थ्य सेवा पर खास ध्यान रहा। जयशंकर ने कहा कि काबा के साथ भारत-आइवरी कोस्ट साझेदारी को आगे बढ़ाने पर ‘व्यापक चर्चा’ हुई। इसमें व्यापार, निवेश, बुनियादी ढांचा, कृषि, स्वास्थ्य सेवा और दोनों देशों के लोगों के बीच संबंध शामिल हैं।

    उन्होंने बुधवार को सोशल मीडिया पर कहा, मैंने इस बात पर जोर दिया कि लोगों को केंद्र में रखकर होने वाला हमारा सहयोग कोट द’आइवोर की प्राथमिकताओं के अनुसार आगे बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों ने बहुपक्षीय मंचों पर अपने सहयोग को और गहरा करने पर भी चर्चा की।


    अफ्रीका में क्षमता निर्माण पर जोर

    जयशंकर ने बुधवार को आइवरी कोस्ट में भारतीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग यानी आईटीईसी के पूर्व छात्रों से भी बातचीत की। उन्होंने कहा कि भारत की विकास साझेदारी हमेशा से अफ्रीका के साथ उसके संबंधों का अहम हिस्सा रही है। उन्होंने कहा कि भारत का सहयोग उसके अफ्रीकी साझेदारों की जरूरतों और प्राथमिकताओं के अनुसार होना चाहिए।

    उन्होंने कहा कि भारतीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग यानी आईटीईसी कार्यक्रम 1964 में शुरू हुआ था। यह दूसरे देशों के साथ क्षमता निर्माण और सहयोग के लिए भारत के सबसे महत्वपूर्ण मंचों में से एक बन गया है। जयशंकर ने आइवरी कोस्ट में भारतीय समुदाय के सदस्यों से भी बातचीत की।

    उनकी यह यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब भारत अफ्रीकी देशों के साथ अपनी साझेदारी को और मजबूत करना चाहता है। भारत वैश्विक दक्षिण के साथ सहयोग बढ़ाना चाहता है। साथ ही व्यापार और निवेश से लेकर क्षमता निर्माण, रक्षा और स्वास्थ्य सेवा तक कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

  • फ्लाईदुबई की उड़ान में 174 यात्रियों की जान बचाने वाले भारतीय पायलट को इस्राइल देगा राष्ट्रपति पुरस्कार

    फ्लाईदुबई की उड़ान में 174 यात्रियों की जान बचाने वाले भारतीय पायलट को इस्राइल देगा राष्ट्रपति पुरस्कार


    तेल अवीव। फ्लाईदुबई की उड़ान में कथित अपहरण की कोशिश को नाकाम करने और बड़ी विमानन दुर्घटना टालने में अहम भूमिका निभाने वाले भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छार को इस्राइल नागरिक वीरता के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित करेगा। राष्ट्रपति आइजैक हर्जोग ने गुरुवार को इसकी घोषणा की। घटना के दौरान गंभीर रूप से घायल हुए कैप्टन मच्छार फिलहाल अबू धाबी के अस्पताल में स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं। इस्राइल ने विमान में सवार छह यात्रियों को भी उनकी बहादुरी के लिए सम्मानित किया है।

    छह इस्राइली यात्रियों को भी मिलेगा नागरिक वीरता पदक
    राष्ट्रपति हर्जोग ने पिछले सप्ताह फ्लाइट FZ1073 को दुर्घटनाग्रस्त करने की कथित कोशिश को विफल करने में मदद करने वाले छह इस्राइली यात्रियों को नागरिक वीरता के लिए राष्ट्रपति पदक प्रदान किया। जेरूसलम पोस्ट और टाइम्स ऑफ इस्राइल की रिपोर्ट के मुताबिक, सम्मानित होने वालों में ताली मानेस, ज्विका मानेस, यानिव हयौन, डॉ. शोता मुसायेव, आसफ राजुआन और ओर पारडिलोव शामिल हैं। इन सभी ने कथित अपहरण के प्रयास को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

    यात्रियों की सूझबूझ से टली बड़ी विमानन दुर्घटना
    घटना के दौरान ताली मानेस ने सबसे पहले खतरे को भांपकर चेतावनी दी। इसके बाद यानिव हयौन, ज्विका मानेस, ओर पारडिलोव और आसफ राजुआन ने मिलकर सह-पायलट को काबू करने में मदद की। पेशे से चिकित्सक डॉ. शोता मुसायेव ने घायल पायलट को तत्काल चिकित्सा सहायता दी।

    राष्ट्रपति हर्जोग ने यरुशलम में इन यात्रियों की सराहना करते हुए कहा कि सामान्य नागरिकों ने असाधारण साहस दिखाकर खुद को सच्चा नायक साबित किया। उनके मुताबिक, साहस, दृढ़ संकल्प और सूझबूझ से इन लोगों ने एक विनाशकारी विमानन हादसे को टालने में मदद की। ऐसी घटना से पूरी दुनिया हिल सकती थी, लेकिन यात्रियों की तत्परता से 174 लोगों की जान बचाने में मदद मिली।

    वैकल्पिक पायलटों और अन्य यात्रियों का भी जताया आभार
    इस्राइली राष्ट्रपति ने विमान को संभालने वाले वैकल्पिक पायलटों और आपात स्थिति के दौरान मदद करने वाले अन्य यात्रियों के प्रति भी आभार जताया। उन्होंने कहा कि संकट के समय सभी के सहयोग से बड़ी त्रासदी को टालना संभव हुआ।

    हालांकि, हर्जोग ने यह भी स्पष्ट किया कि यात्रियों की बहादुरी और सूझबूझ घटना की पूरी जांच की जरूरत को खत्म नहीं करती। उन्होंने कहा कि इस घटना से जुड़े सभी सवालों के जवाब हासिल करना जरूरी है। नागरिकों के साहस और तत्परता के बावजूद जांच की जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता।

    पीएम नेतन्याहू ने भी कैप्टन स्मित की बहादुरी को सराहा
    इस घटना के बाद इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अस्पताल में भर्ती भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छार से फोन पर बातचीत की थी। बातचीत के दौरान नेतन्याहू ने उनकी बहादुरी और विपरीत परिस्थितियों में शांत रहने की क्षमता की प्रशंसा की।

    नेतन्याहू ने कहा था कि कैप्टन मच्छार ने कई लोगों की जान बचाई और दुनिया में मानवता की भावना को मजबूत किया। उन्होंने भारतीय पायलट को भारत और इस्राइल के लोगों के साथ-साथ पूरी दुनिया का हीरो बताया।

    नेतन्याहू ने इस्राइल आने का दिया न्योता
    प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने कैप्टन मच्छार से स्वस्थ होने के बाद इस्राइल आने का आग्रह किया और कहा कि देश उनके साहस के लिए आभारी है। सूत्रों के मुताबिक, नेतन्याहू ने कैप्टन मच्छार और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस्राइल के स्वतंत्रता दिवस समारोह में मशाल जलाने के लिए आमंत्रित किया है। इस्राइल का स्वतंत्रता दिवस 14 मई को मनाया जाता है।

    अबू धाबी के अस्पताल में चल रहा इलाज
    कैप्टन मच्छार फिलहाल अबू धाबी के एक अस्पताल में अपनी चोटों से उबर रहे हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, उड़ान के कॉकपिट में सह-पायलट के कथित हमले के दौरान उन्हें गंभीर चोटें आई थीं। इसके बावजूद संकट की स्थिति में उनकी भूमिका विमान और उसमें सवार यात्रियों की सुरक्षा के लिहाज से अहम रही।

    इस्राइल की ओर से राष्ट्रपति पुरस्कार देने की घोषणा को कैप्टन मच्छार के साहस और कर्तव्यनिष्ठा की अंतरराष्ट्रीय पहचान के रूप में देखा जा रहा है। इस सम्मान के जरिए उस घटना में जोखिम उठाकर लोगों की जान बचाने में योगदान देने वालों के प्रयासों को भी मान्यता दी जाएगी। घटना में सह-पायलट की भूमिका और कथित अपहरण की कोशिश से जुड़े सभी पहलुओं की जांच के नतीजे सामने आना भी महत्वपूर्ण होगा।

  • पाकिस्तान के नक्शे में बड़े बदलाव की चर्चा, 12 से 15 प्रांत बनाने की योजना, विवाद बढ़ा

    पाकिस्तान के नक्शे में बड़े बदलाव की चर्चा, 12 से 15 प्रांत बनाने की योजना, विवाद बढ़ा


    इस्लामाबाद। पाकिस्तान में चार बड़े प्रांतों को छोटे प्रशासनिक हिस्सों में बांटने की चर्चा ने राजनीतिक विवाद बढ़ा दिया है। मीडिया रिपोर्टों में सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर को इस विचार का समर्थक बताया गया है, जबकि पाकिस्तान के योजना मंत्री अहसान इकबाल भी 12 से 15 नए प्रांत बनाने या 160 सशक्त जिला प्रशासनिक इकाइयां गठित करने का विकल्प सामने रख चुके हैं। हालांकि, इस दिशा में अंतिम फैसला होने की पुष्टि नहीं है और प्रस्ताव को लेकर राजनीतिक सहमति भी नहीं बनी है।

    पाकिस्तान में इस बहस के केंद्र में केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि राजनीतिक शक्ति का बंटवारा भी है। पंजाब और सिंध जैसे प्रभावशाली प्रांतों के छोटे हिस्सों में बंटने से चुनावी समीकरण बदल सकते हैं। दूसरी ओर, समर्थकों का तर्क है कि छोटे प्रशासनिक क्षेत्र बनने से आम लोगों तक सरकारी सेवाएं पहुंचाना आसान हो सकता है।

    चार प्रांतों की जगह 12 से 15 बनाने का विचार
    पाकिस्तान फिलहाल चार प्रांतों—पंजाब, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान—में बंटा है। इनकी आबादी, क्षेत्रफल और राजनीतिक प्रभाव में काफी अंतर है। द इकोनॉमिस्ट की रिपोर्ट के हवाले से आई खबरों में इन प्रांतों को छोटे हिस्सों में बांटने की संभावना जताई गई है। एक विकल्प में 12 से 15 नए प्रांत बनाने, जबकि दूसरे में 160 छोटे प्रशासनिक क्षेत्र तैयार करने की बात है।

    योजना मंत्री अहसान इकबाल ने भी सितंबर में प्रशासनिक ढांचे में बदलाव की जरूरत बताते हुए इन विकल्पों पर राष्ट्रीय और राजनीतिक चर्चा कराने की बात कही थी। उनके मुताबिक, करीब 26 करोड़ की आबादी वाले देश में मौजूदा व्यवस्था पर दबाव बढ़ा है और प्रांतीय स्तर पर सत्ता के केंद्रीकरण से स्वास्थ्य, शिक्षा तथा अन्य सेवाओं की डिलीवरी प्रभावित हुई है।

    हालांकि, दोनों विकल्पों में बुनियादी अंतर है। नए प्रांत बनाने से देश की संघीय संरचना और प्रांतीय सीमाओं में बदलाव होगा, जबकि सशक्त जिला प्रशासन की व्यवस्था में मौजूदा प्रांतों को बनाए रखते हुए स्थानीय स्तर पर अधिकार और संसाधन बढ़ाए जा सकते हैं।

    पंजाब की आबादी, बलूचिस्तान का क्षेत्रफल
    पाकिस्तान में नए प्रांत बनाने के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क प्रशासनिक असमानता का दिया जा रहा है। पंजाब देश का सबसे अधिक आबादी वाला प्रांत है। वहीं, बलूचिस्तान क्षेत्रफल के लिहाज से सबसे बड़ा है, लेकिन उसकी आबादी पंजाब की तुलना में काफी कम है।

    इतने बड़े और विविध क्षेत्रों का प्रशासन चलाना चुनौतीपूर्ण माना जाता है। दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों को सरकारी सेवाओं तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ सकती है। इस लिहाज से छोटे प्रांतों या सशक्त जिला प्रशासन को सेवाओं की पहुंच बेहतर करने के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।

    लेकिन प्रशासनिक सीमाएं बदलना अपने आप में आर्थिक समस्याओं का समाधान नहीं है। नए प्रांत बनाने पर अलग प्रशासनिक ढांचा, सरकारी संस्थान और अन्य व्यवस्थाएं खड़ी करनी पड़ेंगी। इससे खर्च बढ़ सकता है। पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति को देखते हुए यह सवाल भी अहम है कि सरकार इतने बड़े पुनर्गठन का खर्च कैसे उठाएगी।

    असीम मुनीर की बढ़ती ताकत के बीच क्यों उठे सवाल?
    पाकिस्तान में सेना लंबे समय से राजनीति और शासन व्यवस्था में प्रभावशाली भूमिका निभाती रही है। ऐसे में प्रांतों के पुनर्गठन की चर्चा को केवल प्रशासनिक सुधार के रूप में नहीं देखा जा रहा। इसके संभावित राजनीतिक नतीजों पर भी सवाल उठ रहे हैं।

    द इकोनॉमिस्ट की रिपोर्ट पर आधारित विश्लेषणों में आशंका जताई गई है कि बड़े प्रांतों को छोटे हिस्सों में बांटने से केंद्र के सामने मौजूद क्षेत्रीय राजनीतिक शक्ति कमजोर हो सकती है। छोटे प्रांतों की सरकारें संसाधनों और प्रशासनिक फैसलों के लिए केंद्र पर अधिक निर्भर हो सकती हैं। ऐसी स्थिति में केंद्र और सैन्य प्रतिष्ठान का प्रभाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। हालांकि, यह प्रस्ताव के संभावित राजनीतिक असर का विश्लेषण है, न कि इसके घोषित उद्देश्य का प्रमाण।

    पंजाब और सिंध का बंटवारा सबसे संवेदनशील
    पंजाब और सिंध पाकिस्तान की राजनीति में अहम स्थान रखते हैं। पंजाब को पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) का मजबूत आधार माना जाता है, जबकि सिंध में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) का प्रभाव रहा है।

    इन प्रांतों की बड़ी आबादी और चुनावी ताकत उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण बनाती है। यदि इनके क्षेत्रीय और प्रशासनिक ढांचे में बदलाव होता है, तो राजनीतिक दलों के प्रभाव और चुनावी समीकरणों पर भी असर पड़ सकता है।

    सिंध में इस मुद्दे पर विरोध खुलकर सामने आ चुका है। सितंबर 2026 में सिंध विधानसभा ने प्रांत को बांटने या उसकी क्षेत्रीय सीमाएं बदलने के प्रस्तावों के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया था। मुख्यमंत्री मुराद अली शाह ने भी सिंध की भौगोलिक एकता से समझौता नहीं करने की बात कही। इससे स्पष्ट है कि नए प्रांतों का विचार केवल प्रशासनिक सुधार तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रांतीय पहचान और राजनीतिक अधिकारों से भी जुड़ा है।

    इमरान खान की पार्टी वाले प्रांत में भी तनाव
    पाकिस्तान में प्रांतों के पुनर्गठन की बहस ऐसे समय चल रही है, जब केंद्र और खैबर पख्तूनख्वा की सरकार के बीच राजनीतिक तनाव बना हुआ है। यह प्रांत पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के शासन में है।

    इमरान खान जेल में हैं और उनकी पार्टी के समर्थक उनकी रिहाई की मांग करते रहे हैं। इस बीच PTI और केंद्र के बीच टकराव ने संघीय राजनीति को और जटिल बनाया है। खैबर पख्तूनख्वा उग्रवादी हिंसा की समस्या से भी जूझ रहा है।

    ऐसे माहौल में प्रांतीय सीमाओं में बदलाव की किसी भी योजना को राजनीतिक नजरिए से देखा जाना स्वाभाविक है। यदि नए प्रांत बनाने की प्रक्रिया आगे बढ़ती है, तो यह तय करना भी चुनौती होगा कि उनकी सीमाएं कैसे तय होंगी और स्थानीय राजनीतिक प्रतिनिधित्व किस तरह सुनिश्चित किया जाएगा।

    बलूचिस्तान में संसाधन और स्थानीय अधिकार भी मुद्दा
    बलूचिस्तान में लंबे समय से अलगाववादी हिंसा और केंद्र के साथ संसाधनों के बंटवारे को लेकर विवाद रहे हैं। ऐसे में प्रांत का पुनर्गठन जमीन, प्राकृतिक संसाधनों और स्थानीय राजनीतिक अधिकारों से जुड़े सवाल खड़े कर सकता है।

    पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में भी शासन व्यवस्था, महंगाई, करों और आर्थिक परिस्थितियों को लेकर असंतोष सामने आता रहा है। इन परिस्थितियों में देश के प्रशासनिक नक्शे में बड़े बदलाव के लिए केवल सरकारी निर्णय पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए संवैधानिक प्रक्रिया, राजनीतिक सहमति और संबंधित क्षेत्रों की चिंताओं पर विचार करना भी जरूरी होगा।

    क्या वास्तव में बदल जाएगा पाकिस्तान का नक्शा?
    फिलहाल नए प्रांतों की चर्चा को अंतिम सरकारी निर्णय मानना जल्दबाजी होगी। पाकिस्तान में इस विषय पर राजनीतिक बहस चल रही है, लेकिन सितंबर में आई रिपोर्टों के मुताबिक, अतिरिक्त प्रांतों या प्रशासनिक इकाइयों के गठन पर कोई औपचारिक प्रस्ताव संघीय कैबिनेट के सामने नहीं रखा गया था।

    छोटे प्रांतों के समर्थक इसे बेहतर प्रशासन और सरकारी सेवाओं की पहुंच बढ़ाने का रास्ता मानते हैं। विरोध करने वालों की चिंता प्रांतीय पहचान, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सत्ता के केंद्रीकरण को लेकर है। इसलिए पाकिस्तान के सामने असली चुनौती केवल प्रांतों की संख्या बढ़ाने की नहीं, बल्कि यह तय करने की है कि बदलाव से अधिकार और संसाधन आम लोगों तक पहुंचेंगे या केंद्र की शक्ति और मजबूत होगी।