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  • US के नए व्यापारिक प्रतिबंधों के जवाब में चीन का बड़ा कदम…6 अमेरिकी कंपनियों को किया ब्लैकलिस्ट

    US के नए व्यापारिक प्रतिबंधों के जवाब में चीन का बड़ा कदम…6 अमेरिकी कंपनियों को किया ब्लैकलिस्ट


    बैंकॉक।
    अमेरिका (America) की ओर से लगाए गए नए व्यापारिक प्रतिबंधों (New trade restrictions) के जवाब में चीन (China) ने कई कड़े आर्थिक कदम उठाए हैं। चीन ने छह अमेरिकी कंपनियों को ब्लैकलिस्ट में डाल दिया है और अमेरिका को ड्रोन, उनके प्रमुख पुर्जों तथा संबंधित तकनीक के निर्यात पर कड़े नियंत्रण लागू कर दिए हैं। साथ ही आयातित प्रिंटर सॉफ्टवेयर और कार्यालय उपकरणों की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से जांच शुरू कर दी है।

    चीनी वाणिज्य मंत्रालय ने कहा, कार्रवाई अमेरिका की ओर से चीनी ड्रोन के आयात पर रोक लगाने, 43 चीनी कंपनियों को उइगर जबरन श्रम रोकथाम कानून की सूची में शामिल करने और नए टैरिफ लगाने के जवाब में की गई है। अमेरिका के कदम दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच बनी सहमति के खिलाफ हैं और चीन के वैध हितों को नुकसान पहुंचाते हैं। इसलिए जवाबी कार्रवाई करना जरूरी हो गया।

    तीन माह में ही रिश्तों में फिर आई तल्खी
    चीन ने ड्रोन, उनके प्रमुख पुर्जों और दोहरे उपयोग (नागरिक और सैन्य) वाली तकनीक के निर्यात को मामला-दर-मामला (केस बाई केस) मंजूरी के दायरे में ला दिया है। अब चीन की कोई भी संस्था या व्यक्ति इन कंपनियों के साथ व्यापार, सहयोग या अन्य गतिविधियों में हिस्सा नहीं ले सकेगा। मई में जिनपिंग-ट्रंप की मुलाकात के बाद रिश्तों में सुधार के संकेत मिले थे, लेकिन तीन माह बाद ही फिर से तनाव फिर बढ़ गया है।


    सेना से लेकर पुलिस तक चीनी ड्रोन पर निर्भर अमेरिका

    – अमेरिका का ड्रोन उद्योग, चीनी ड्रोन और उनके कलपुर्जों पर 70 से 90 फीसदी तक निर्भर है। अमेरिका में इस्तेमाल होने वाले लगभग 80 से 90 फीसदी व्यावसायिक ड्रोन चीनी कंपनियों (मुख्य रूप से डीजेआई-दा जियांग इनोवेशंस) द्वारा बनाए जाते हैं।
    – अमेरिकी पुलिस, फायर ब्रिगेड और स्थानीय सुरक्षा एजेंसियों के 90% से 92% ड्रोन चीनी निर्मित हैं। चीन एयरफ्रेम, मोटर, कैमरा, स्क्रीन और रेडियो सिस्टम सरीखे दुनिया के 90 फीसदी ड्रोन पार्ट्स नियंत्रित करता है।
    – ड्रोन में इस्तेमाल होने वाली बैटरियों के लिए आवश्यक रिफाइंड ग्रेफाइट का 70% और ड्रोन मोटर के चुंबकों का 90% हिस्सा अकेले चीन से आता है
    – अमेरिका में खेती (सटीक छिड़काव और फसल निगरानी), रियल एस्टेट मैपिंग, और कमर्शियल फोटोग्राफी के लिए चीनी ड्रोनों का बड़े पैमाने पर उपयोग होता है।
    – अमेरिका को अब हांगकांग या अन्य तीसरे देशों से पुर्जे मंगाने पड़ रहे हैं। इससे ड्रोन उत्पादन और पुर्जों की लागत में 25%-35% तक बढ़ेगी।

  • US: ट्रंप प्रशासन का भारतीयों पर एक और प्रहार…. F-1 छात्र वीजा में की भारी कटौती

    US: ट्रंप प्रशासन का भारतीयों पर एक और प्रहार…. F-1 छात्र वीजा में की भारी कटौती


    वाशिंगटन।
    ट्रंप प्रशासन (Trump Administration) ने बीते साल भारतीय और चीनी छात्रों को जारी किए जाने वाले एफ-1 छात्र वीजा (F-1 Student Visa) में भारी कटौती की है। सेंटर फॉर इमिग्रेशन स्टडीज (Center for Immigration Studies) की रिपोर्ट में ये खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका में 2025 में भारतीय और चीनी नागरिकों को जारी किए छात्र वीजा की संख्या में पिछले वर्षों की तुलना में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है।

    2024-25 शैक्षणिक सत्र में अमेरिका के उच्च शिक्षण संस्थानों में 11,77,766 विदेशी छात्र पढ़ रहे थे। इनमें भारत के 3,63,019 और चीन के 2,65,919 छात्र शामिल थे। दोनों देशों के छात्र मिलाकर कुल विदेशी छात्रों का 53 प्रतिशत हिस्सा थे।


    अमेरिका में ओपीटी योजना भी प्रभावित

    डिग्री पूरी करने के बाद ओपीटी कार्यक्रम के तहत विदेशी छात्रों को अमेरिका में काम करने की अनुमति मिलती है। वीजा कटौती से ये योजना भी प्रभावित हुई। आईआईई के आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 में 2,94,253 विदेशी छात्र ओपीटी के तहत काम कर रहे थे। इनमें भारत के 1,43,740 और चीन के 61,981 छात्र शामिल थे। 2024 में ओपीटी के तहत काम करने वाले 1,65,524 विदेशी छात्रों में से 68 प्रतिशत भारत और चीन के नागरिक थे। इनमें 79,331 भारतीय और 33,807 चीनी छात्र शामिल थे।

    सीआईएस का कहना है कि यदि भारत और चीन से आने वाले छात्रों की संख्या घटती है तो ओपीटी के माध्यम से अमेरिकी श्रम बाजार में आने वाले विदेशी पेशेवरों की संख्या भी प्रभावित हो सकती है।


    22 हजार भारतीयों को बीते वर्ष जारी हुआ वीजा

    रिपोर्ट की मानें तो बीते साल मई से अगस्त के बीच 22149 भारतीयों को एफ-1 छात्र वीजा जारी किए गए। साल 2024 में इसी अवधि के दौरान अमेरिकी प्रशासन द्वारा 58,694 वीजा जारी किए गए थे, यानी 62 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई थी। चीनी छात्रों की बात करें तो मई-अगस्त 2025 के दौरान चीनी छात्रों को 40,034 वीजा जारी किए गए। 2024 में ये संख्या 61,075 वीजा जारी हुए थे। इसमें 34 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।


    OPT पर बड़े प्रस्ताव की तैयारी

    खबर है कि अगर अब अगर कोई छात्र ग्रेजुएशन के बाद अमेरिका में ही रहकर काम करना चाहता है, तो उसे 1 लाख डॉलर की मोटी फीस सरकार को देनी होगी। हालांकि, इसे लेकर आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा गया है। वॉल स्ट्रीट जनरल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, शिक्षा के बाद काम की फीस के अलावा नए वीजा नियम भी जारी किए गए हैं। इसके तहत अंतरराष्ट्रीय छात्र पढ़ाई के बाद लंबे समय तक अमेरिका में नहीं रह सकेंगे। हालांकि, इस पर अब तक अंतिम मुहर नहीं लगाई गई है।

    OPT का मतलब एक अस्थायी नौकरी से है, जो F-1 वीजा पर अमेरिका पहुंचे छात्र के पढ़ाई के क्षेत्र से जुड़ी होती है। पात्र छात्र 12 महीने का ओपीटी काम हासिल कर सकते हैं।

    मौजूदा व्यवस्था है कि जब तक पढ़ाई चल रही है और वीजा के नियमों का पालन किया जा रहा है, तब तक छात्र अमेरिका में रह सकता है। अगर उसकी पढ़ाई लंबी चलती है, तो समय को नियमों का पालन कर बढ़ाया जाता है। अब यह व्यवस्था खत्म होने जा रही है।

  • PoK: विधानसभा चुनाव में विरोध के बीच नवाज शरीफ की पार्टी को बढ़त… सरकार बनाना लगभग तय

    PoK: विधानसभा चुनाव में विरोध के बीच नवाज शरीफ की पार्टी को बढ़त… सरकार बनाना लगभग तय


    इस्लामाबाद।
    पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) (Pakistan-occupied Kashmir – PoK) की विधानसभा के चुनाव (Legislative Assembly elections) में पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ (Former Prime Minister Nawaz Sharif) की पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) ने बड़ी बढ़त हासिल कर ली है। चुनाव आयोग के मुताबिक, अब तक दो चरणों की मतगणना पूरी हो चुकी है, जिसमें पार्टी ने 34 में से 24 सीटों पर जीत दर्ज की है। इसके साथ ही पीएमएल-एन का अगली क्षेत्रीय सरकार बनाना लगभग तय माना जा रहा है। हालांकि चुनाव से पहले कई सप्ताह तक विरोध प्रदर्शन हुए और प्रतिबंधित संगठन ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) ने लोगों से मतदान का बहिष्कार करने की अपील की थी। इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोगों ने वोट डाला।


    तीन चरणों में हो रहे हैं चुनाव

    क्षेत्रीय चुनाव आयोग के प्रवक्ता राजा शकील ने बताया कि सुरक्षा कारणों और भारी मानसूनी बारिश की वजह से चुनाव तीन चरणों में कराए जा रहे हैं। पहले दो चरणों में 34 सीटों पर मतदान और मतगणना पूरी हो चुकी है। बाकी 11 सीटों के लिए मतदान 10 अगस्त को होगा। राजा शकील के अनुसार, कई इलाकों में 50 प्रतिशत से अधिक मतदान हुआ, जबकि क्षेत्रीय राजधानी मुजफ्फराबाद में मतदान 56 प्रतिशत से ज्यादा रहा।


    10 साल बाद सत्ता में वापसी

    अब तक के नतीजों से साफ है कि पीएमएल-एन पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में करीब 10 साल बाद सत्ता में वापसी करने जा रही है। जीत के बाद नवाज शरीफ ने विजयी उम्मीदवारों को बधाई दी और इसे लोकतंत्र की जीत बताया।


    विरोध और झड़पों के बीच हुआ मतदान

    चुनाव प्रचार के दौरान जेएएसी ने लगातार प्रदर्शन किए और लोगों से मतदान न करने की अपील की। हाल ही में क्षेत्रीय सरकार ने इस संगठन पर सुरक्षा और कानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए प्रतिबंध लगा दिया था। मतदान से पहले संगठन के समर्थकों और पुलिस के बीच कई बार झड़पें भी हुईं। इसके बावजूद स्थानीय लोगों ने हिंसा की आशंका के बीच मतदान किया। विश्लेषकों का कहना है कि विरोध और हिंसा के बावजूद बड़ी संख्या में लोगों का मतदान करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर जनता के भरोसे को दर्शाता है।


    आरक्षित सीटों को लेकर विवाद

    चुनाव के दौरान सबसे बड़ा विवाद 12 आरक्षित सीटों को लेकर रहा। ये सीटें उन लोगों के लिए आरक्षित हैं, जो 1947 के बाद भारत प्रशासित कश्मीर से विस्थापित होकर पाकिस्तान में बस गए थे। जेएएसी का आरोप है कि इन सीटों की वजह से पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के बाहर रहने वाले लोगों को जरूरत से ज्यादा राजनीतिक प्रभाव मिलता है। संगठन इन सीटों को खत्म करने की मांग कर रहा है। हालांकि जून में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि ये सीटें संविधान से संरक्षित हैं और इन्हें खत्म करने के लिए संवैधानिक संशोधन जरूरी होगा।


    सरकार का क्या कहना है?

    पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की सरकार का कहना है कि उसने जेएएसी की 38 में से 36 मांगें मान ली हैं। केवल आरक्षित सीटों का मुद्दा विधानसभा और संवैधानिक प्रक्रिया के जरिए ही हल किया जा सकता है। सरकार ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ प्रदर्शनकारियों ने चुनाव में बाधा डालने की कोशिश की और विरोध प्रदर्शनों में पाकिस्तान तालिबान के सदस्यों की घुसपैठ की आशंका भी जताई। हालांकि जेएएसी ने इन आरोपों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।

  • विदेशी फंडिंग पर दुनिया भर में सख्ती, जानिए भारत के FCRA और अमेरिका-यूरोप के कानूनों में क्या है अंतर

    विदेशी फंडिंग पर दुनिया भर में सख्ती, जानिए भारत के FCRA और अमेरिका-यूरोप के कानूनों में क्या है अंतर


    नई दिल्ली। देश में विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम 2026 यानी एफसीआरए को लेकर राजनीतिक और कानूनी बहस तेज हो गई है। संसद में पेश किए गए इस विधेयक पर चर्चा जारी है और माना जा रहा है कि जल्द ही इस पर विस्तार से विचार किया जाएगा। हालांकि विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने वाला ऐसा कानून केवल भारत तक सीमित नहीं है। दुनिया के कई विकसित देशों में भी विदेशी धन के प्रवाह पर कड़ी निगरानी रखने के लिए सख्त कानूनी व्यवस्थाएं पहले से लागू हैं। इनका उद्देश्य पारदर्शिता बढ़ाना राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करना और विदेशी प्रभाव को सीमित करना है।

    भारत के प्रस्तावित एफसीआरए कानून का मकसद विदेशी स्रोतों से मिलने वाले आर्थिक सहयोग की पूरी जानकारी सरकार के पास उपलब्ध कराना है ताकि किसी भी संस्था या संगठन की वित्तीय गतिविधियों की पारदर्शी निगरानी की जा सके। सरकार का मानना है कि इससे विदेशी धन के दुरुपयोग पर रोक लगेगी और राष्ट्रीय हितों की बेहतर सुरक्षा हो सकेगी।

    अमेरिका में विदेशी फंडिंग को फॉरेन एजेंट्स रजिस्ट्रेशन एक्ट यानी एफएआरए के तहत नियंत्रित किया जाता है। इस कानून के अनुसार जो भी व्यक्ति या संस्था विदेशी सरकार या संगठन की ओर से अमेरिका में गतिविधियां संचालित करती है उसे न्याय विभाग के पास पंजीकरण कराना अनिवार्य होता है। इसके साथ वित्तीय लेनदेन गतिविधियों और विदेशी सहयोग से जुड़ी विस्तृत जानकारी सार्वजनिक करनी होती है। अमेरिकी व्यवस्था में भी पारदर्शिता और नियमित निगरानी को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है।

    यूरोप के कई देशों ने भी विदेशी फंडिंग को लेकर सख्त नियम बनाए हैं। उदाहरण के तौर पर स्लोवाकिया में उन गैर सरकारी संगठनों के लिए वार्षिक डोनर रिपोर्ट जमा करना अनिवार्य है जिन्हें तय सीमा से अधिक विदेशी आर्थिक सहायता प्राप्त होती है। सरकारी एजेंसियां ऐसे संगठनों के वित्तीय रिकॉर्ड की जांच कर सकती हैं और नियमों का पालन नहीं करने पर जुर्माना लगाने का अधिकार भी रखती हैं। इसका उद्देश्य विदेशी धन के स्रोत और उसके उपयोग को पूरी तरह पारदर्शी बनाए रखना है।

    जॉर्जिया ने भी विदेशी प्रभाव पारदर्शिता कानून लागू किया है। इसके तहत जिन गैर सरकारी संगठनों या मीडिया संस्थानों की 20 प्रतिशत से अधिक फंडिंग विदेश से आती है उन्हें विदेशी वित्त पोषित संस्था के रूप में पंजीकरण कराना पड़ता है। साथ ही उनकी वित्तीय जानकारी सार्वजनिक करना नियमित ऑडिट कराना और सरकारी जांच में सहयोग देना भी अनिवार्य है। नियमों के उल्लंघन पर आर्थिक दंड का प्रावधान भी रखा गया है।

    रूस में भी विदेशी फंडिंग पर बेहद सख्त नियंत्रण है। वहां विदेशी आर्थिक सहायता प्राप्त करने वाले संगठनों को अनिवार्य रूप से पंजीकरण कराना होता है और उनकी वित्तीय गतिविधियों की विस्तृत जानकारी सार्वजनिक रखनी पड़ती है। सरकारी एजेंसियों को बिना पूर्व सूचना के ऑडिट करने लाइसेंस निलंबित करने या रद्द करने तथा विदेशी फंड से बनाई गई संपत्तियों पर नियामकीय नियंत्रण स्थापित करने का अधिकार प्राप्त है। समय समय पर लाइसेंस का नवीनीकरण भी आवश्यक होता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का प्रस्तावित एफसीआरए कानून वैश्विक व्यवस्था से अलग नहीं बल्कि उसी दिशा में उठाया गया कदम है जहां विदेशी धन के स्रोत उपयोग और प्रभाव की पारदर्शिता सुनिश्चित करने पर जोर दिया जा रहा है। हालांकि अलग अलग देशों में कानूनों की प्रकृति और दायरा अलग हो सकता है लेकिन अधिकांश लोकतांत्रिक देशों का साझा उद्देश्य यही है कि विदेशी वित्तीय सहायता का उपयोग राष्ट्रीय हितों और कानूनी मानकों के अनुरूप हो तथा किसी भी प्रकार के छिपे हुए विदेशी प्रभाव को रोका जा सके।

    English Tags:
    FCRA Bill, Foreign Funding, FARA, NGOs, Global Laws

  • मिशिगन में अब्दुल अल-सईद बने डेमोक्रेटिक उम्मीदवार, ट्रंप ने इजरायल और यहूदियों पर रुख को लेकर साधा निशाना

    मिशिगन में अब्दुल अल-सईद बने डेमोक्रेटिक उम्मीदवार, ट्रंप ने इजरायल और यहूदियों पर रुख को लेकर साधा निशाना


    नई दिल्ली। अमेरिका में 2026 के मिडटर्म चुनाव से पहले मिशिगन सीनेट सीट की डेमोक्रेटिक प्राइमरी में अब्दुल अल-सईद की जीत के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। रिपब्लिकन नेता और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अल-सईद पर तीखा हमला करते हुए उनके इजरायल संबंधी रुख की आलोचना की, जबकि अल-सईद ने अपने ऊपर लगाए गए यहूदी-विरोधी आरोपों को सिरे से खारिज किया।

    लास वेगास में एक कार्यक्रम के दौरान ट्रंप ने कहा कि अल-सईद इजरायल और यहूदियों के प्रति नकारात्मक सोच रखते हैं। उन्होंने उन पर तीखी टिप्पणी करते हुए उन्हें “नफरत से भरा व्यक्ति” बताया और दावा किया कि नवंबर में होने वाले चुनाव में रिपब्लिकन उम्मीदवार माइक रोजर्स उन्हें पराजित करेंगे।

    डेमोक्रेटिक उम्मीदवार बने अब्दुल अल-सईद
    अब्दुल अल-सईद ने मिशिगन की डेमोक्रेटिक प्राइमरी में हेली स्टीवंस को करीबी मुकाबले में हराकर सीनेट उम्मीदवार बनने का अधिकार हासिल किया। अब नवंबर में उनका मुकाबला रिपब्लिकन उम्मीदवार माइक रोजर्स से होगा।

    क्या हैं अल-सईद के प्रमुख मुद्दे?
    अब्दुल अल-सईद स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार, ‘मेडिकेयर फॉर ऑल’, महंगाई पर नियंत्रण और राजनीति में कॉरपोरेट प्रभाव कम करने जैसे मुद्दों के समर्थक रहे हैं। विदेश नीति के मोर्चे पर वह अमेरिका द्वारा इजरायल को बिना शर्त दी जाने वाली सैन्य सहायता की आलोचना करते रहे हैं और इसमें बदलाव की मांग कर चुके हैं। अल-सईद मिस्र से अमेरिका आए प्रवासी परिवार से हैं। उनके पिता मोहम्मद मिस्र से अमेरिका आकर बसे थे।

    यहूदी-विरोध के आरोपों का दिया जवाब
    प्राइमरी जीत के बाद अल-सईद ने कहा कि वह यहूदी समुदाय की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे हर प्रकार के यहूदी-विरोध (Anti-Semitism) और इस्लामोफोबिया का विरोध करते हैं तथा सभी समुदायों की सुरक्षा और समानता के पक्षधर हैं।

    जोहरान ममदानी ने दी बधाई
    न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी ने अल-सईद की जीत का स्वागत करते हुए कहा कि उन्होंने स्वास्थ्य सेवा, महंगाई और आम कामकाजी लोगों के मुद्दों पर चुनाव लड़ा। ममदानी ने उन्हें “मिनी ममदानी” कहे जाने से असहमति जताई और कहा कि अल-सईद ने अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाई है।

    मिशिगन का आगामी सीनेट चुनाव डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन दोनों दलों के लिए अहम माना जा रहा है। अल-सईद की जीत को डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रोग्रेसिव धड़े के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है, जबकि रिपब्लिकन खेमा उनके इजरायल संबंधी विचारों को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहा है।

  • कहां हैं शेख हसीना? बेटा साजिब वाजेद सामने आया, पूर्व PM ने दिया संदेश लेकिन नहीं दिखाया चेहरा

    कहां हैं शेख हसीना? बेटा साजिब वाजेद सामने आया, पूर्व PM ने दिया संदेश लेकिन नहीं दिखाया चेहरा


    नई दिल्ली।
    बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना लंबे समय बाद एक सार्वजनिक कार्यक्रम में वर्चुअली नजर आईं। हालांकि उन्होंने इस दौरान अपना चेहरा कैमरे पर नहीं दिखाया। नई दिल्ली स्थित फॉरेन कॉरेस्पोंडेंट्स क्लब ऑफ साउथ एशिया की एक विशेष प्रेस कॉन्फ्रेंस में शेख हसीना ऑनलाइन जुड़ीं, जबकि उनके बेटे साजिब वाजेद भी कार्यक्रम में मौजूद रहे।

    यह घटनाक्रम इसलिए भी अहम है क्योंकि 5 अगस्त 2024 को बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन और हिंसक प्रदर्शनों के बीच शेख हसीना ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दिया था और देश छोड़कर भारत आ गई थीं। इसके करीब दो साल बाद उन्होंने किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपनी बात रखी है।

    जुलाई-अगस्त 2024 की हिंसा को याद कर भावुक हुईं हसीना

    लाइव संबोधन के दौरान शेख हसीना ने 2024 के जुलाई-अगस्त आंदोलन और उसके बाद हुई हिंसा को याद किया। अपनी बात रखते हुए वह कई बार भावुक हुईं और उनका गला भर आया।

    हसीना ने दावा किया कि शुरुआत में छात्रों का आंदोलन शांतिपूर्ण था और उनकी सरकार प्रदर्शनकारी छात्रों के साथ बातचीत करना चाहती थी। उनके मुताबिक, बाद में कुछ संगठित समूहों ने आंदोलन का इस्तेमाल हिंसा फैलाने के लिए किया।

    उन्होंने आरोप लगाया कि 15 जुलाई 2024 के बाद आंदोलन का स्वरूप बदल गया और हिंसा तेज हो गई। हसीना ने यह भी दावा किया कि मोहम्मद यूनुस ने भी शुरुआत में आंदोलन को योजनाबद्ध और पहले से तैयार बताया था।

    ‘मेरी हत्या की 19 बार कोशिश हुई’

    अपने संबोधन में शेख हसीना ने अपने निजी संघर्ष का भी जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि उनकी हत्या की 19 बार कोशिश की जा चुकी है। उन्होंने कहा कि उनका बेटा जेल में पैदा हुआ था और तमाम मुश्किलों के बावजूद वह बांग्लादेश वापस लौटेंगी।

    हसीना ने कहा कि उन्हें हिरासत में लिया जा सकता है या जेल भेजा जा सकता है, लेकिन वह अपने लोगों के बीच वापस जाएंगी।

    साजिब वाजेद ने लगाए राजनीतिक हत्याओं के आरोप

    कार्यक्रम में शेख हसीना के बेटे साजिब वाजेद ने भी बांग्लादेश की मौजूदा स्थिति को लेकर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि देश में अब भी आवामी लीग के नेताओं और कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया जा रहा है।

    वाजेद के मुताबिक, पुलिस हिरासत में भी पार्टी कार्यकर्ताओं की मौत हो रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार इन घटनाओं पर कार्रवाई करने के बजाय कथित तौर पर दोषियों को संरक्षण दे रही है।

    उन्होंने कहा कि अंतरिम सरकार के दौर के बाद अब मौजूदा सरकार के दौरान भी राजनीतिक हिंसा जारी है। उनके अनुसार, कुछ ऐसे कानून और अध्यादेश लाए गए हैं जिनका इस्तेमाल कथित तौर पर हत्यारों को बचाने के लिए किया जा रहा है।

    मानवाधिकार और कट्टरपंथ को लेकर भी जताई चिंता

    साजिब वाजेद ने बांग्लादेश में मानवाधिकारों की स्थिति पर भी सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि देश तेजी से असफल राष्ट्र की दिशा में बढ़ रहा है।

    वाजेद ने कट्टरपंथी संगठनों से जुड़े लोगों की रिहाई का आरोप लगाते हुए भविष्य में बांग्लादेश से आतंकवाद का खतरा बढ़ने की आशंका भी जताई।

    हालांकि, ये सभी आरोप शेख हसीना और साजिब वाजेद की ओर से लगाए गए हैं और इन्हें स्वतंत्र रूप से प्रमाणित तथ्यों के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।

    आखिर कहां हैं शेख हसीना?

    5 अगस्त 2024 को बांग्लादेश में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन और हिंसा के बीच शेख हसीना ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दिया था। इसके बाद वह भारत आ गई थीं।

    सुरक्षा कारणों से भारत सरकार ने उनके सटीक ठिकाने की आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक नहीं की है। हालांकि उपलब्ध जानकारी के अनुसार, शेख हसीना दिल्ली के सुरक्षित क्षेत्र में रह रही हैं।

    अब करीब दो साल बाद उनका वर्चुअल कार्यक्रम में शामिल होना और बांग्लादेश के मौजूदा हालात पर खुलकर अपनी बात रखना क्षेत्रीय राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है।

  • मार्क जुकरबर्ग ने भारत सरकार से मांगी माफी, सीएसएएम, डीपफेक और सिस्टम एरर को लेकर जताया खेद

    मार्क जुकरबर्ग ने भारत सरकार से मांगी माफी, सीएसएएम, डीपफेक और सिस्टम एरर को लेकर जताया खेद

    नई दिल्ली । मेटा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मार्क जुकरबर्ग ने बाल यौन शोषण सामग्री (सीएसएएम), डीपफेक कंटेंट और ऑपरेटिंग सिस्टम से जुड़ी तकनीकी त्रुटियों को लेकर भारत सरकार से माफी मांगी है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, कंपनी ने कुछ मामलों में हुई चूक पर खेद व्यक्त करते हुए भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाने का भरोसा दिया है। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही और भारतीय कानूनों के पालन को लेकर सरकार लगातार सख्त रुख अपनाए हुए है।

    जानकारी के अनुसार, भारत सरकार ने मेटा को स्पष्ट किया कि डिजिटल प्लेटफॉर्म की भूमिका केवल तकनीकी माध्यम तक सीमित नहीं मानी जा सकती। सरकार का कहना है कि यदि कोई मंच सामग्री के प्रसार और दृश्यता को प्रभावित करता है, तो उस पर भारतीय कानूनों के अनुरूप आवश्यक जिम्मेदारियां भी लागू होती हैं। इसी संदर्भ में कंपनी के प्रतिनिधियों के साथ विस्तृत चर्चा की गई और स्थानीय नियमों के पूर्ण अनुपालन पर जोर दिया गया।

    सरकारी सूत्रों के मुताबिक, बैठक के दौरान मेटा की ओर से सीएसएएम और डीपफेक जैसे संवेदनशील विषयों पर विशेष चिंता व्यक्त की गई। कंपनी ने स्वीकार किया कि इन चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए अपने तकनीकी तंत्र और निगरानी प्रणाली को लगातार मजबूत बनाने की आवश्यकता है। साथ ही ऑपरेटिंग सिस्टम से जुड़ी कुछ तकनीकी त्रुटियों पर भी खेद जताते हुए उन्हें दूर करने की प्रक्रिया तेज करने की बात कही गई।

    यह मामला उस विवाद के बाद और अधिक चर्चा में आया, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वीडियो कुछ समय के लिए फेसबुक पर उपलब्ध नहीं रहा। इस घटना को गंभीरता से लेते हुए संबंधित संसदीय समिति ने मेटा से जवाब मांगा था और निर्धारित समय के भीतर बिना शर्त माफी की मांग की थी। समिति ने यह भी संकेत दिया था कि यदि कंपनी संतोषजनक जवाब देने में विफल रहती है तो नियामकीय स्तर पर आगे की कार्रवाई पर विचार किया जा सकता है।

    इसी क्रम में मेटा के एक वरिष्ठ प्रतिनिधिमंडल ने नई दिल्ली में इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात की। बैठक के दौरान डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सामग्री प्रबंधन, पारदर्शिता, जवाबदेही और भारतीय कानूनों के पालन से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि भारत में संचालित सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को देश के लागू नियमों और कानूनी प्रावधानों का पूर्ण पालन करना होगा।

    मेटा और अन्य सोशल मीडिया कंपनियों के प्रतिनिधियों ने बैठक में कहा कि उनके प्लेटफॉर्म पर पहले से ही कंटेंट मॉडरेशन, फैक्ट-चेकिंग और सुरक्षा संबंधी कई आंतरिक व्यवस्थाएं लागू हैं। उन्होंने यह भी दोहराया कि प्लेटफॉर्म का दुरुपयोग रोकने और आपत्तिजनक सामग्री के खिलाफ कार्रवाई को और प्रभावी बनाने के लिए लगातार तकनीकी सुधार किए जा रहे हैं। सरकार और डिजिटल प्लेटफॉर्म के बीच हुई यह बातचीत भविष्य में ऑनलाइन सुरक्षा, पारदर्शिता और डिजिटल जवाबदेही को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

  • ऑपरेशन सिंदूर पर पूर्व CDS का बड़ा खुलासा, पाकिस्तान ने मांगा युद्धविराम, भारत ने रणनीति के तहत कराया इंतजार

    ऑपरेशन सिंदूर पर पूर्व CDS का बड़ा खुलासा, पाकिस्तान ने मांगा युद्धविराम, भारत ने रणनीति के तहत कराया इंतजार

    नई दिल्ली । भारतीय सेना के ऑपरेशन सिंदूर को लेकर पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है। उनके अनुसार, सैन्य अभियान के दौरान पाकिस्तान की ओर से युद्धविराम की मांग की गई थी, लेकिन भारत ने अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए तत्काल सहमति नहीं दी। उन्होंने बताया कि भारतीय पक्ष ने पहले अपने निर्धारित सैन्य उद्देश्यों को पूरा करने पर ध्यान केंद्रित किया और उसके बाद ही युद्धविराम की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। इस खुलासे के बाद ऑपरेशन सिंदूर की रणनीति को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं।

    जनरल अनिल चौहान के अनुसार 10 मई 2025 की सुबह पाकिस्तान ने डीजीएमओ हॉटलाइन के माध्यम से भारत से संपर्क किया और तत्काल संघर्ष विराम की इच्छा जताई। उन्होंने बताया कि भारतीय पक्ष ने तत्काल प्रतिक्रिया देने के बजाय कुछ समय तक इंतजार कराया, क्योंकि उस समय तक अभियान के सभी निर्धारित सैन्य लक्ष्य पूरे नहीं हुए थे। उनका कहना था कि सैन्य कार्रवाई तब तक जारी रखी गई जब तक निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति सुनिश्चित नहीं हो गई।

    उन्होंने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर की शुरुआत 7 मई 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद की गई थी। इस हमले में कई निर्दोष पर्यटकों की जान गई थी, जिसके बाद भारतीय सुरक्षा बलों ने आतंकवादी ढांचे को निशाना बनाते हुए सीमापार अभियान चलाया। अभियान के पहले चरण में आतंकवादी संगठनों से जुड़े कई ठिकानों पर सटीक कार्रवाई की गई। इसके बाद सीमा पार से ड्रोन और मिसाइलों के माध्यम से जवाबी प्रयास किए गए, जिनका भारतीय वायु एवं रक्षा प्रणालियों ने प्रभावी ढंग से मुकाबला किया।

    पूर्व सीडीएस के अनुसार अभियान के अगले चरण में पाकिस्तान के कई सैन्य प्रतिष्ठानों और एयरबेस को भी निशाना बनाया गया। इन कार्रवाइयों में सैन्य ढांचे, रडार प्रणाली और अन्य रणनीतिक संसाधनों को नुकसान पहुंचाने का दावा किया गया। उन्होंने कहा कि यह पूरी कार्रवाई सैन्य योजना के अनुरूप चरणबद्ध तरीके से संचालित की गई थी और प्रत्येक कदम पहले से तय रणनीति के आधार पर उठाया गया।

    जनरल चौहान ने बताया कि पाकिस्तान की ओर से युद्धविराम का अनुरोध आने के बाद भी भारतीय सेना ने अपनी निर्धारित कार्रवाई जारी रखी। उनके अनुसार अंतिम सैन्य कार्रवाई दोपहर के समय पूरी की गई, जिसके बाद दोनों पक्षों के बीच संघर्ष विराम पर सहमति बनी। उन्होंने कहा कि किसी भी सैन्य अभियान में राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व के बीच समन्वय के साथ-साथ स्पष्ट रणनीतिक लक्ष्य अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं और ऑपरेशन सिंदूर में भी इसी सिद्धांत का पालन किया गया।

    इस खुलासे ने एक बार फिर सीमापार आतंकवाद के खिलाफ भारत की सुरक्षा नीति और सैन्य रणनीति पर चर्चा तेज कर दी है। रक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि आधुनिक सैन्य अभियानों में समय, रणनीति, तकनीक और समन्वय की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। ऑपरेशन सिंदूर से जुड़े इस नए विवरण ने अभियान की योजना, निर्णय प्रक्रिया और सैन्य संचालन के कई पहलुओं को समझने का अवसर प्रदान किया है। हालांकि अभियान से जुड़े कई परिचालन संबंधी विवरण सुरक्षा कारणों से सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।

  • भारतीय कार्गो शिप पर समुद्र में बड़ा हमला, रेस्क्यू ऑपरेशन से बचाए गए सभी नाविक, भारत ने जताई कड़ी आपत्ति

    भारतीय कार्गो शिप पर समुद्र में बड़ा हमला, रेस्क्यू ऑपरेशन से बचाए गए सभी नाविक, भारत ने जताई कड़ी आपत्ति

    नई दिल्ली । यमन के तटीय क्षेत्र के पास भारतीय मालवाहक जहाज पर हुए हमले ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं खड़ी कर दी हैं। भारतीय मालवाहक पोत ‘फैज नूरे औलिया’ अज्ञात दिशा से आए एक प्रोजेक्टाइल की चपेट में आने के बाद गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गया। टक्कर के प्रभाव से जहाज का संतुलन बिगड़ गया और उसमें तेजी से पानी भरने लगा। कुछ ही समय बाद जहाज समुद्र में पलटकर डूब गया। राहत की बात यह रही कि जहाज पर सवार सभी 14 चालक दल के सदस्यों को समय रहते सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया और किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है।

    घटना के तुरंत बाद यमन के तटरक्षक बलों ने बड़े स्तर पर बचाव अभियान शुरू किया। समुद्र में फंसे चालक दल के सदस्यों को सुरक्षित निकालने के लिए कई बचाव इकाइयों को तैनात किया गया। अभियान के दौरान 13 भारतीय नागरिकों सहित सभी 14 नाविकों को सुरक्षित रेस्क्यू कर लिया गया। इसके बाद उन्हें मोखा बंदरगाह पहुंचाया गया, जहां उनकी आवश्यक चिकित्सा जांच और अन्य जरूरी व्यवस्थाएं की गईं। अधिकारियों ने बताया कि सभी नाविक सुरक्षित हैं और उनकी स्थिति सामान्य बनी हुई है।

    घटना की जानकारी मिलते ही भारत सरकार ने इस हमले पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। जहाजरानी और जलमार्ग मंत्रालय ने इसे बिना किसी उकसावे के किया गया हमला बताया और समुद्री व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा पर गंभीर चिंता व्यक्त की। सरकार का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों पर इस प्रकार की घटनाएं वैश्विक व्यापार और नौवहन व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन सकती हैं। भारत ने स्पष्ट किया कि ऐसे हमलों को किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

    सरकार की ओर से महानिदेशक समुद्री प्रशासन को तत्काल आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए गए हैं। संबंधित एजेंसियों के साथ समन्वय स्थापित कर पूरे मामले की निगरानी करने, प्रभावित चालक दल को हरसंभव सहायता उपलब्ध कराने तथा क्षेत्र में मौजूद अन्य भारतीय जहाजों और नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने को प्राथमिकता दी गई है। साथ ही स्थिति पर लगातार नजर रखने और भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए आवश्यक उपायों पर भी जोर दिया गया है।

    भारत ने इस कठिन परिस्थिति में त्वरित बचाव अभियान चलाने वाले यमन के अधिकारियों और तटरक्षक बलों के प्रति आभार भी व्यक्त किया है। सरकार का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग के कारण ही सभी नाविकों की जान बचाई जा सकी। इस बीच समुद्री मार्गों पर व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा को लेकर वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ गई है। भारत ने सुरक्षित समुद्री आवाजाही, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और जहाजों की निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए सभी संबंधित पक्षों से प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता पर बल दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की घटनाएं वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और समुद्री व्यापार पर भी व्यापक प्रभाव डाल सकती हैं, इसलिए संवेदनशील समुद्री क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करना समय की आवश्यकता बन गई है।

  • ऑपरेशन त्रिशूल के तहत 7 सालों में भारत लाए गए 274 भगोड़े, 17 हजार करोड़ से अधिक की संपत्ति जब्त

    ऑपरेशन त्रिशूल के तहत 7 सालों में भारत लाए गए 274 भगोड़े, 17 हजार करोड़ से अधिक की संपत्ति जब्त

    नई दिल्ली । केंद्र सरकार ने विदेशों में छिपे भगोड़े अपराधियों के विरुद्ध चलाए जा रहे ऑपरेशन त्रिशूल के तहत बड़ी सफलता प्राप्त करने का दावा किया है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार बीते सात वर्षों में 36 विभिन्न देशों से कुल 274 वांछित अपराधियों को भारत वापस लाया जा चुका है। इन भगोड़ों में आतंकवाद, वित्तीय धोखाधड़ी, मादक पदार्थों की तस्करी, संगठित अपराध, हत्या और पोक्सो जैसे अति गंभीर मामलों के आरोपी शामिल हैं।

    गृह मंत्रालय के अनुसार विदेशों में पहचान बदलकर रह रहे अपराधियों को खोजने के लिए डिजिटल फुटप्रिंट, सैटेलाइट इनपुट और जियो-लोकेशन जैसी अत्याधुनिक तकनीकों का प्रयोग किया जा रहा है। सरकार की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक वर्ष 2025 में रिकॉर्ड 70 भगोड़ों का प्रत्यर्पण कराया गया, जबकि वर्ष 2026 में जुलाई महीने तक 45 अन्य अपराधियों को भारत वापस लाने में सफलता मिली है।

    आर्थिक अपराधों पर लगाम लगाने के लिए चलाए गए इस अभियान के तहत धन शोधन निवारण अधिनियम के अंतर्गत भगोड़ों की 17,874 करोड़ रुपये की अवैध संपत्तियां जब्त की गई हैं। इसके अलावा लगभग 18,762 करोड़ रुपये की राशि भी रिकवर की जा चुकी है। सरकार का मुख्य उद्देश्य अपराध से अर्जित अवैध कमाई को पूरी तरह से कुर्क कर अपराधियों के आर्थिक नेटवर्क को ध्वस्त करना है।

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपराधियों को घेरने के लिए इंटरपोल के माध्यम से रेड कॉर्नर नोटिस जारी करने की दर में भी अप्रत्याशित तेजी आई है। अकेले वर्ष 2026 में अब तक 182 रेड कॉर्नर नोटिस जारी किए जा चुके हैं, जबकि पिछले तीन सालों में यह संख्या 401 तक पहुंच गई है। वैश्विक पुलिस संस्थाओं के साथ बेहतर तालमेल के कारण भगोड़ों की गिरफ्तारी अब पहले से काफी सुगम हो गई है।

    अभियान को और अधिक धार देने के लिए जनवरी 2026 में एक विशेष खुफिया समन्वय समूह का गठन किया गया था, जो विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय स्थापित कर प्राथमिकता वाले मामलों पर काम कर रहा है। इसके साथ ही देश में लागू नए और संशोधित आपराधिक कानूनों ने आरोपी की गैर-मौजूदगी में भी अदालती प्रक्रिया चलाकर न्याय सुनिश्चित करने का रास्ता साफ कर दिया है।