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  • Nobel Prize 2026 में Anne Carson के नाम बड़ी उपलब्धि, ग्रीक-रोमन साहित्य को आधुनिक नजरिए से पेश करने के लिए मिला नोबेल

    Nobel Prize 2026 में Anne Carson के नाम बड़ी उपलब्धि, ग्रीक-रोमन साहित्य को आधुनिक नजरिए से पेश करने के लिए मिला नोबेल


    नई दिल्ली। कनाडा की चर्चित लेखिका Anne Carson को 2026 का साहित्य का नोबेल पुरस्कार दिए जाने की घोषणा की गई है। साहित्य के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाने वाली Carson को यह सम्मान उनकी उन रचनाओं के लिए मिला है जिनमें प्राचीन ग्रीक और रोमन साहित्यिक परंपराओं को आधुनिक दुनिया के संदर्भ में नए अंदाज से प्रस्तुत किया गया है। उनकी लेखन शैली में कविता और गद्य के साथ प्राचीन साहित्य की गहरी समझ का अनोखा मेल दिखाई देता है। उनकी रचनाओं ने पुराने साहित्यिक विचारों को समकालीन पाठकों तक नए रूप में पहुंचाने का काम किया है।

    Anne Carson की साहित्यिक पहचान केवल कविता तक सीमित नहीं है। उन्होंने कविता गद्य अनुवाद और प्राचीन साहित्य से जुड़े विषयों पर लंबे समय तक काम किया है। उनकी रचनाओं में इतिहास और मिथक के साथ आधुनिक जीवन के अनुभवों को जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है। इसी विशेष शैली ने उन्हें साहित्य की दुनिया में अलग स्थान दिलाया। उनकी चर्चित किताब The Beauty of the Husband को भी उनके महत्वपूर्ण साहित्यिक कार्यों में गिना जाता है।

    साहित्य का नोबेल पुरस्कार दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित साहित्यिक सम्मानों में शामिल है। हर वर्ष Swedish Academy की ओर से साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले लेखक का चयन किया जाता है। पुरस्कार के तहत विजेता को मेडल और डिप्लोमा के साथ पुरस्कार राशि दी जाती है। इस वर्ष पुरस्कार राशि करीब 1.2 करोड़ Swedish Krona बताई गई है जो भारतीय मुद्रा में लगभग 11.5 करोड़ रुपए के आसपास होती है।

    सभी नोबेल पुरस्कार विजेताओं को दिसंबर में Stockholm Sweden में आयोजित समारोह में सम्मानित किया जाएगा। इस दौरान विजेताओं को आधिकारिक रूप से मेडल और डिप्लोमा प्रदान किया जाता है। पुरस्कार समारोह नोबेल पुरस्कार की परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है और दुनिया भर की नजरें इस आयोजन पर रहती हैं।

    साहित्य के नोबेल में महिलाओं की भागीदारी भी लगातार चर्चा का विषय रही है। पिछले दस वर्षों में साहित्य का नोबेल पुरस्कार पाने वाले दस लेखकों में चार महिलाएं शामिल हैं। इनमें 2024 की नोबेल विजेता Han Kang का नाम भी शामिल है। दक्षिण कोरिया की Han Kang ने अपनी रचनाओं के जरिए अंतरराष्ट्रीय साहित्य जगत में खास पहचान बनाई है।

    साहित्य का नोबेल विजेता चुनने की प्रक्रिया भी काफी लंबी और गोपनीय होती है। Swedish Academy हर वर्ष संभावित उम्मीदवारों के नाम आमंत्रित करती है। अकादमी के सदस्य साहित्य और भाषा के प्रोफेसर पूर्व नोबेल विजेता और लेखक संगठनों से जुड़े प्रमुख लोग नामांकन भेज सकते हैं। लेखक स्वयं को नामांकित नहीं कर सकते।

    नामांकन के बाद Swedish Academy की प्रक्रिया कई चरणों में आगे बढ़ती है। शुरुआती दौर में बड़ी संख्या में नामों में से लगभग 15 से 20 नामों की सूची तैयार की जाती है। इसके बाद मई तक संभावित उम्मीदवारों की संख्या घटाकर पांच तक कर दी जाती है। अंतिम चरण में Swedish Academy के 18 सदस्य मतदान के जरिए विजेता का चयन करते हैं।

    इस पुरस्कार से जुड़े नामांकन की जानकारी लंबे समय तक सार्वजनिक नहीं की जाती। नोबेल के नियमों के अनुसार नामांकन से जुड़ी जानकारी 50 वर्षों तक गोपनीय रहती है। इसका मतलब है कि 2026 के साहित्य नोबेल के लिए नामांकित लेखकों की पूरी जानकारी सार्वजनिक होने में अभी कई दशक लगेंगे।

    नोबेल के रिकॉर्ड में कई भारतीय साहित्यकारों के नाम भी नामांकन से जुड़े रहे हैं। Sarvepalli Radhakrishnan Sri Aurobindo Tarashankar Bandyopadhyay और R K Narayan जैसे भारतीय लेखकों को अलग अलग वर्षों में साहित्य के नोबेल के लिए नामांकित किया गया था। Anne Carson को मिला 2026 का सम्मान एक बार फिर यह दिखाता है कि साहित्य की सीमाएं भाषा और समय से आगे जाकर पुरानी परंपराओं को नए संदर्भों में जीवित रख सकती हैं।

  • आंध्र प्रदेश में 46.62 लाख हटाए गए वोटरों का फिर होगा सत्यापन, घर-घर पहुंचेंगे BLO

    आंध्र प्रदेश में 46.62 लाख हटाए गए वोटरों का फिर होगा सत्यापन, घर-घर पहुंचेंगे BLO


    अमरावती।
    आंध्र प्रदेश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चुनाव आयोग ने बड़ा कदम उठाया है। आयोग 8 अक्टूबर से 46,62,583 हटाए गए मतदाताओं के नाम और उनकी स्थिति का दोबारा सत्यापन कराएगा। बूथ लेवल अधिकारी (BLO) घर-घर जाकर इन मतदाताओं की स्थिति की जांच करेंगे। अभियान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी पात्र मतदाता गलती से मतदाता सूची से बाहर न रह जाए।

    46.62 लाख नामों की होगी दोबारा जांच

    आंध्र प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी विवेक यादव के मुताबिक, BLO अपने-अपने मतदान केंद्रों से संबंधित 46,62,583 हटाए गए नामों की सूची लेकर घर-घर जाएंगे। विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान 15 जून से 24 जुलाई तक हुई गणना में 44,89,512 मतदाता अपने दर्ज पते पर नहीं मिले थे। इनमें मृत, स्थायी रूप से दूसरी जगह जा चुके, एक से अधिक स्थानों पर पंजीकृत और अन्य कारणों से सत्यापन में नहीं मिले मतदाता शामिल थे।

    यदि दोबारा सत्यापन में यह सामने आता है कि किसी पात्र मतदाता का नाम गलती से हटा दिया गया है, तो BLO उसे फॉर्म-6 भरने में मदद करेंगे। आवश्यक जांच पूरी होने के बाद उसका नाम निरंतर अपडेट प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची में शामिल किया जा सकेगा।

    ड्राफ्ट सूची के बाद 1.73 लाख और नाम अपात्र

    31 जुलाई को ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी होने के बाद भी नामों की जांच जारी रही। नोटिस प्रक्रिया के दौरान 6 अक्टूबर तक 1,73,071 और मतदाताओं को अंतिम सूची में शामिल किए जाने के लिए अपात्र पाया गया। इस तरह दोबारा सत्यापन के दायरे में कुल 46,62,583 नाम आए हैं।

    SIR से पहले आंध्र प्रदेश में कुल मतदाताओं की संख्या 4.16 करोड़ से अधिक थी। 31 जुलाई को जारी ड्राफ्ट मतदाता सूची में 3,71,38,182 मतदाता दर्ज थे।

    16 अक्टूबर को जारी होगी अंतिम मतदाता सूची

    आंध्र प्रदेश में SIR-2026 की अंतिम मतदाता सूची 16 अक्टूबर को प्रकाशित की जाएगी। चुनाव आयोग ने दावा और आपत्ति की प्रक्रिया की अवधि भी 10 अक्टूबर तक बढ़ाई है।

    मुख्य निर्वाचन अधिकारी विवेक यादव ने कहा है कि आयोग का लक्ष्य पात्र मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में शामिल करना और अपात्र नामों को बाहर रखना है। अंतिम सूची जारी होने के बाद भी जिन पात्र लोगों का नाम छूट जाता है, वे निर्धारित अर्हता तिथियों के आधार पर फॉर्म-6 के जरिए निरंतर अपडेट प्रक्रिया में नाम दर्ज करा सकते हैं।

    चुनाव आयोग ने इस पुनः सत्यापन प्रक्रिया को दस्तावेज करने के भी निर्देश दिए हैं। BLO की गतिविधियों और मतदाता सत्यापन की प्रक्रिया की फोटो-वीडियो रिकॉर्डिंग कर पारदर्शिता सुनिश्चित करने की व्यवस्था की गई है।

  • अमेरिका में विदेशी छात्रों को बड़ा झटका…. पढ़ते हुए नौकरी करना पड़ेगा महंगा!

    अमेरिका में विदेशी छात्रों को बड़ा झटका…. पढ़ते हुए नौकरी करना पड़ेगा महंगा!


    वाशिंगटन।
    अमेरिका (America) में पढ़ाई कर रहे विदेशी छात्रों (Foreign Students) के लिए साथ में नौकरी करना अब महंगा हो सकता है. ट्रंप प्रशासन ने अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (Optional Practical Training- OPT) कार्यक्रम में शामिल होने पर भारी भरकम फीस लगाने का प्रस्ताव दिया है। हालांकि, यह रकम छात्रों से सीधे नहीं, बल्कि संबंधित कॉलेज या यूनिवर्सिटी से ली जाएगी।

    दरअसल, होमलैंड सिक्योरिटी विभाग ने विदेशी छात्रों के लिए ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (OPT) कार्यक्रम में शुरुआती आवेदन पर 70,000 डॉलर (भारतीय ₹67.72 लाख रुपये) की भारी भरकम फीस लगाने का प्रस्ताव दिया है. हर नए छात्र के OPT कार्यक्रम में शुरुआती आवेदन के लिए स्कूल को 70,000 डॉलर देने होंगे. वहीं, कार्यक्रम को आगे बढ़ाने या नवीनीकरण के लिए 30,000 डॉलर फीस प्रस्तावित है।


    क्या है OPT कार्यक्रम?

    OPT के तहत विदेशी छात्रों को अपनी पढ़ाई से जुड़े क्षेत्र में अमेरिका में काम करने का मौका मिलता है. आम तौर पर छात्र ग्रेजुएशन के बाद एक साल तक काम कर सकते हैं. वहीं, साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथ्स यानी STEM विषयों के छात्रों को अतिरिक्त दो साल तक काम करने का मौका मिल सकता है.

    इस प्रस्ताव से अमेरिकी कॉलेज और यूनिवर्सिटी प्रभावित हो सकते हैं, क्योंकि वे बड़ी संख्या में विदेशी छात्रों को दाखिला देते हैं. विदेशी छात्र इन संस्थानों के लिए फीस के एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं. इसके अलावा टेक कंपनियों और उन दूसरे उद्योगों पर भी असर पड़ सकता है, जहां विदेशी छात्रों की बड़ी संख्या में भर्ती होती है।


    सरकार ने क्यों लिया यह फैसला?

    होमलैंड सिक्योरिटी विभाग ने इस शुल्क को वीजा कार्यक्रम में कथित धोखाधड़ी और दुरुपयोग रोकने की कोशिश बताया है. विभाग ने OPT को सस्ते विदेशी श्रम के लिए इस्तेमाल होने वाला माध्यम बताया है. वहीं, अंतरराष्ट्रीय शिक्षा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन NAFSA ने इस प्रस्ताव का विरोध किया है. संगठन की CEO फांटा अव ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय छात्रों को अमेरिका से दूर करने से अमेरिकी नवाचार, आर्थिक विकास, रोजगार और वैश्विक नेतृत्व पर असर पड़ सकता है।


    प्रस्ताव पर 60 दिन तक मांगी जाएगी राय

    यह अभी अंतिम फैसला नहीं है. प्रस्ताव पर जनता को 60 दिनों तक अपनी राय और आपत्तियां दर्ज कराने का मौका मिलेगा. इसके बाद DHS इसे अंतिम रूप देकर लागू कर सकता है. हालांकि, उच्च शिक्षा संस्थानों और कारोबारी संगठनों की ओर से इस प्रस्ताव को अदालत में चुनौती दिए जाने की संभावना भी है. ऐसी कानूनी कार्रवाई से इसके लागू होने में देरी हो सकती है।

  • एक जैसे दिखते हैं फिर भी शरीर पर अलग असर, कागान और सोआई की खोज ने समझाया अणुओं का अनोखा खेल

    एक जैसे दिखते हैं फिर भी शरीर पर अलग असर, कागान और सोआई की खोज ने समझाया अणुओं का अनोखा खेल


    नई दिल्ली। रसायन विज्ञान के क्षेत्र में 2026 का नोबेल पुरस्कार ऐसी वैज्ञानिक खोज के लिए दिया गया है जिसने एक बेहद पेचीदा सवाल को समझने की नई राह दिखाई है। सवाल यह है कि देखने में लगभग एक जैसे लगने वाले कुछ मॉलिक्यूल्स आखिर एक दूसरे से इतने अलग कैसे हो सकते हैं और शुरुआत में मौजूद बेहद छोटा अंतर समय के साथ इतना बड़ा कैसे बन सकता है। हेनरी बी कागान और केन्सो सोआई के काम ने इसी गुत्थी को समझने में अहम भूमिका निभाई है। उनके शोध का संबंध असिमेट्रिक ऑर्गेनिक सिंथेसिस में नॉन लीनियर इफेक्ट्स और ऑटोकैटेलिसिस से है।

    इस खोज को समझने के लिए सबसे आसान उदाहरण हमारे बाएं और दाएं हाथ का है। दोनों हाथ देखने में लगभग एक जैसे होते हैं लेकिन एक को दूसरे के ऊपर रखने पर वे पूरी तरह मेल नहीं खाते। रसायन विज्ञान में भी कुछ मॉलिक्यूल्स इसी तरह व्यवहार करते हैं। इन्हें काइरल मॉलिक्यूल कहा जाता है और इनके दो मिरर इमेज रूपों को एनैंटियोमर्स कहा जाता है। दोनों रूपों की बनावट एक दूसरे की आईने में दिखाई देने वाली तस्वीर जैसी होती है लेकिन उनका व्यवहार अलग हो सकता है।

    इस अंतर का महत्व दवाओं के निर्माण में बेहद ज्यादा है। शरीर इन दोनों रूपों को अलग अलग तरीके से पहचान सकता है। किसी दवा में एक मिरर इमेज शरीर के लिए जरूरी प्रभाव पैदा कर सकती है जबकि दूसरा रूप कम असरदार या कुछ परिस्थितियों में नुकसानदायक भी हो सकता है। इसी वजह से वैज्ञानिक ऐसी तकनीक विकसित करना चाहते हैं जिससे जरूरत वाले मॉलिक्यूल का सही रूप अधिक मात्रा में तैयार किया जा सके। थैलिडोमाइड का मामला इस विषय की गंभीरता को सामने ला चुका है।

    यह रहस्य केवल दवाओं तक सीमित नहीं है बल्कि जीवन की रसायन विज्ञान से भी जुड़ा है। जीवित दुनिया में कई मॉलिक्यूल्स के दो मिरर इमेज रूप संभव होते हैं लेकिन जीवन में अक्सर इनमें से केवल एक रूप का इस्तेमाल होता है। इसे होमोकाइरैलिटी कहा जाता है। उदाहरण के तौर पर प्रोटीन बनाने वाले अमीनो एसिड्स के दो संभावित रूप हो सकते हैं लेकिन जीवित शरीर प्रोटीन निर्माण के लिए इनमें से केवल एक रूप का इस्तेमाल करता है। वैज्ञानिक लंबे समय से यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि ऐसा क्यों हुआ।

    इस कहानी में लुई पाश्चर का काम भी महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने टार्टरिक एसिड के अध्ययन के दौरान ऐसे क्रिस्टल देखे जो दो अलग रूपों में मौजूद थे और एक दूसरे की मिरर इमेज थे। बाद में उन्होंने पाया कि बैक्टीरिया टार्टरिक एसिड के एक रूप को इस्तेमाल करते हैं लेकिन उसके मिरर इमेज रूप को नहीं। इससे यह संकेत मिला कि जीवित चीजें मॉलिक्यूल्स के इन दोनों रूपों में अंतर कर सकती हैं।

    इसके बाद विली मार्कवाल्ड ने ऐसी रासायनिक प्रक्रिया की दिशा में काम किया जिसमें दोनों मिरर इमेज बराबर मात्रा में बनने के बजाय एक रूप अधिक बन सकता था। 1953 में चार्ल्स फ्रैंक ने यह समझाने के लिए एक मॉडल दिया कि अगर किसी प्रतिक्रिया में एक मिरर इमेज को शुरुआत में थोड़ी सी बढ़त मिल जाए और वही प्रक्रिया उस बढ़त को आगे बढ़ाती रहे तो छोटा अंतर लगातार बड़ा हो सकता है। इसे ऑटोकैटेलिसिस के विचार से समझा जा सकता है।

    यहीं हेनरी कागान और केन्सो सोआई का काम खास बनता है। कागान ने दिखाया कि कैटेलिस्ट में बहुत छोटा बदलाव अंतिम उत्पाद में दोनों मिरर इमेज की मात्रा के बीच बहुत बड़ा अंतर पैदा कर सकता है। इसे नॉन लीनियर इफेक्ट कहा गया। इसके बाद सोआई ने ऐसी प्रक्रिया पर काम किया जिसमें प्रतिक्रिया से बनने वाला पदार्थ खुद उसी प्रतिक्रिया को आगे बढ़ाने में मदद करता है।

    इसका प्रभाव कितना बड़ा हो सकता है इसे 1995 और 2003 के प्रयोगों से समझा जा सकता है। एक प्रक्रिया में शुरुआत में केवल 2 प्रतिशत की बढ़त मिली लेकिन आगे चलकर वही रूप 87 प्रतिशत तक पहुंच गया। बाद में ऐसी प्रक्रिया भी दिखाई गई जिसमें बेहद छोटी शुरुआती बढ़त लगातार बढ़ती गई और एक मिरर इमेज 99.99 प्रतिशत तक प्रमुख रूप बन सकती थी। यानी शुरुआत का मामूली अंतर रासायनिक प्रक्रिया के दौरान असाधारण रूप से बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है।

    इस खोज ने जीवन की शुरुआत का रहस्य सीधे साबित नहीं किया है लेकिन इससे यह समझने का नया तरीका जरूर मिला है कि अगर शुरुआत में दोनों मिरर इमेज मौजूद हों तो उनमें से कोई एक रूप धीरे धीरे कैसे हावी हो सकता है। इसके अलावा ऐसी केमिस्ट्री दवाओं के साथ फ्लेवर खुशबू और खेती में इस्तेमाल होने वाले कुछ रसायनों के निर्माण में भी उपयोगी हो सकती है।

  • इमरान खान की रिहाई के लिए बढ़ा लॉन्ग मार्च, शहबाज शरीफ ने बातचीत की पेशकश की

    इमरान खान की रिहाई के लिए बढ़ा लॉन्ग मार्च, शहबाज शरीफ ने बातचीत की पेशकश की

    नई दिल्ली ।पाकिस्तान में पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की जेल से रिहाई की मांग को लेकर शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन लगातार आगे बढ़ रहा है। 4 अक्टूबर को खैबर पख्तूनख्वा के लक्की मरवत जिले से शुरू हुआ इमरान समर्थकों का लॉन्ग मार्च अब राजधानी इस्लामाबाद से करीब 180 किलोमीटर दूर रह गया है। खैबर पख्तूनख्वा के मुख्यमंत्री सोहेल अफरीदी के नेतृत्व में मार्च आगे बढ़ रहा है। राजधानी की ओर बढ़ते प्रदर्शन के बीच प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इमरान समर्थकों से बातचीत की पेशकश की है।

    शहबाज शरीफ ने प्रदर्शनकारियों से लॉन्ग मार्च और धरना खत्म करने की अपील की। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन खत्म करने के बाद सरकार उनके साथ बैठकर बातचीत करने के लिए तैयार है। प्रधानमंत्री का यह रुख इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे एक दिन पहले ही सरकार ने इमरान समर्थकों के साथ बातचीत से इनकार कर दिया था। हालांकि, सरकार की ओर से बातचीत की पेशकश किए जाने के बाद भी प्रदर्शनकारी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।

    इमरान खान के समर्थकों ने प्रधानमंत्री की बातचीत की पेशकश ठुकरा दी है। उनका कहना है कि वे इमरान खान की रिहाई की मांग से पीछे नहीं हटेंगे। प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांग पूर्व प्रधानमंत्री को जेल से रिहा करना है। उनका मार्च खैबर पख्तूनख्वा से आगे बढ़ते हुए राजधानी की ओर जा रहा है। इस बीच सरकार के सामने प्रदर्शन को नियंत्रित करने और राजधानी तक इसके पहुंचने से रोकने की चुनौती बनी हुई है।

    प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने प्रदर्शन को लेकर चेतावनी भी दी है। उन्होंने कहा कि इस तरह के आंदोलन से देश की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए किए जा रहे प्रयास प्रभावित हो सकते हैं। उनके मुताबिक सरकार पिछले ढाई साल से अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए काम कर रही है और इसमें बाधा डालने की किसी भी कोशिश को स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि कानून अपना काम करेगा और लोगों की जान तथा संपत्ति की सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी है।

    राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर इमरान समर्थकों का मार्च पंजाब प्रांत तक पहुंचता है और उसे वहां अधिक जनसमर्थन मिलता है, तो शहबाज सरकार पर दबाव और बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में प्रदर्शन को नियंत्रित करना सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इमरान खान की राजनीतिक लोकप्रियता को देखते हुए उनके समर्थकों की बढ़ती संख्या पाकिस्तान की मौजूदा राजनीतिक स्थिति पर असर डाल सकती है।

    इस पूरे घटनाक्रम में सेना प्रमुख असीम मुनीर की भूमिका को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं हो रही हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इमरान खान के समर्थकों के आंदोलन के जरिए शहबाज शरीफ सरकार पर दबाव बन सकता है। उनके अनुसार, यदि सरकार प्रदर्शन को रोकने में कमजोर दिखाई देती है तो इससे प्रधानमंत्री की राजनीतिक स्थिति प्रभावित हो सकती है। हालांकि, शहबाज शरीफ के सत्ता से हटने को लेकर किए जा रहे दावे फिलहाल राजनीतिक विश्लेषण और अटकलों पर आधारित हैं।

    फिलहाल इमरान खान के समर्थकों का लॉन्ग मार्च इस्लामाबाद की ओर बढ़ रहा है और सरकार ने बातचीत का रास्ता खोलने की कोशिश की है। दूसरी ओर प्रदर्शनकारी इमरान की रिहाई की मांग पर कायम हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में मार्च की दिशा, उसे मिलने वाला समर्थन और सरकार की प्रतिक्रिया पाकिस्तान के राजनीतिक घटनाक्रम के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।

  • बर्फ के नीचे छिपे मायावी न्यूट्रिनो से ब्रह्मांड के रहस्य खोलने वाले फ्रांसिस हाल्जन को भौतिकी का नोबेल

    बर्फ के नीचे छिपे मायावी न्यूट्रिनो से ब्रह्मांड के रहस्य खोलने वाले फ्रांसिस हाल्जन को भौतिकी का नोबेल

    नई दिल्ली: रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज ने 2026 का भौतिकी नोबेल पुरस्कार फ्रांसिस हाल्जन को देने का फैसला किया है। उन्हें यह सम्मान आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी में योगदान और खगोलीय मूल के हाई एनर्जी न्यूट्रिनो की खोज के लिए दिया गया है। हाल्जन ने दक्षिण ध्रुव की बर्फ का इस्तेमाल न्यूट्रिनो नामक बेहद मायावी कणों को पकड़ने और ट्रैक करने के लिए करने का दृष्टिकोण विकसित किया। उनके वैज्ञानिक नेतृत्व और विचारों ने ऐसी वेधशाला के निर्माण का रास्ता तैयार किया, जिसके जरिए दूर ब्रह्मांड से आने वाले अत्यधिक ऊर्जावान न्यूट्रिनो का अध्ययन संभव हुआ।

    आइसक्यूब ऑब्जर्वेटरी एक घन किलोमीटर बर्फ में लगाए गए प्रकाश सेंसरों का विशाल नेटवर्क है। जब कोई न्यूट्रिनो किसी परमाणु नाभिक से टकराता है तो प्रकाश की चमक पैदा होती है। साफ ग्लेशियर बर्फ में लगाए गए सेंसर इस चमक को दर्ज कर सकते हैं और उसके आधार पर न्यूट्रिनो के बारे में जानकारी हासिल की जाती है। दक्षिण ध्रुव की बर्फ इस प्रयोग के लिए कई फायदे देती है। यह क्षेत्र भूगर्भीय रूप से स्थिर है और यहां प्रयोग के दौरान कई तरह के व्यवधान कम होते हैं। इसी आधार पर न्यूट्रिनो का पता लगाने की यह तकनीक आगे विकसित होती गई।

    फ्रांसिस हाल्जन ने वर्ष 1988 में दक्षिण ध्रुव पर न्यूट्रिनो पकड़ने का अपना दृष्टिकोण पहली बार प्रस्तुत किया था। उनके विचार को दूसरे शोधकर्ताओं का समर्थन मिला और कुछ वर्षों के भीतर बर्फ में सेंसर लगाने के शुरुआती परीक्षण शुरू हुए। समय के साथ यह परियोजना बड़े वैज्ञानिक प्रयास में बदलती गई और आइसक्यूब दुनिया की सबसे बड़ी न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी बन गई। इसके जरिए वैज्ञानिक उन कणों का अध्ययन कर पा रहे हैं, जो ब्रह्मांड की अत्यंत ऊर्जावान घटनाओं और दूरस्थ स्रोतों से पृथ्वी तक पहुंचते हैं।

    न्यूट्रिनो को ब्रह्मांड के सबसे मायावी कणों में गिना जाता है, क्योंकि वे पदार्थ के साथ बहुत कम प्रतिक्रिया करते हैं और आसानी से उसके आर-पार गुजर सकते हैं। अन्य कणों की तुलना में न्यूट्रिनो अपनी दिशा बदले बिना और ऊर्जा खोए बिना पृथ्वी तक पहुंच सकते हैं। इसी वजह से वे ब्रह्मांड के उन हिस्सों और घटनाओं की जानकारी दे सकते हैं, जिन्हें दूसरे तरीकों से समझना मुश्किल होता है। वैज्ञानिक लंबे समय से जानते हैं कि ब्रह्मांड में प्राकृतिक स्रोत ऐसे कण पैदा करते हैं जिनकी ऊर्जा पृथ्वी की प्रयोगशालाओं में हासिल की जा सकने वाली ऊर्जा से लाखों गुना अधिक हो सकती है। इन स्रोतों की प्रकृति और उनके भीतर चलने वाली प्रक्रियाएं अब भी कई सवाल खड़े करती हैं।

    आइसक्यूब के जरिए हाई एनर्जी वाले खगोलीय न्यूट्रिनो की पुष्टि ने ब्रह्मांड के अध्ययन का नया क्षेत्र खोला है। ऐसे न्यूट्रिनो सुपरनोवा विस्फोट, ब्लैक होल के आसपास होने वाली प्रक्रियाओं और गामा रे बर्स्ट जैसी अत्यंत ऊर्जावान घटनाओं को समझने में मदद कर सकते हैं। न्यूट्रिनो खगोल विज्ञान के जरिए वैज्ञानिक दृश्य प्रकाश और अन्य तरंगों से अलग एक नए नजरिए से ब्रह्मांड को देख पा रहे हैं। दक्षिण ध्रुव की कठिन परिस्थितियों में इतनी विशाल ऑब्जर्वेटरी विकसित करने में हाल्जन के वैज्ञानिक नेतृत्व और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की महत्वपूर्ण भूमिका रही। यह सम्मान कण भौतिकी और खगोल भौतिकी के संगम में उनके योगदान को मान्यता देता है।

  • दुनिया में बजा भारतीय मूल की बेटी का डंका, हेली पिसाडी ने जीता मिस इंडिया वर्ल्डवाइड का खिताब

    दुनिया में बजा भारतीय मूल की बेटी का डंका, हेली पिसाडी ने जीता मिस इंडिया वर्ल्डवाइड का खिताब


    नई दिल्ली। भारतीय मूल की 19 वर्षीय हेली पिसाडी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए मिस इंडिया वर्ल्डवाइड 2026 का खिताब अपने नाम कर लिया है। त्रिनिदाद और टोबैगो का प्रतिनिधित्व करने वाली हेली ने दुनिया के अलग अलग देशों से पहुंची भारतीय मूल की प्रतिभागियों को पीछे छोड़ते हुए यह प्रतिष्ठित ताज हासिल किया। हेली फिलहाल कानून की पढ़ाई कर रही हैं और इतनी कम उम्र में मिली इस सफलता ने उन्हें भारतीय प्रवासी समुदाय के बीच चर्चा का प्रमुख चेहरा बना दिया है। यह प्रतियोगिता भारत के बाहर आयोजित होने वाली सबसे लंबे समय से चल रही भारतीय सौंदर्य प्रतियोगिताओं में शामिल है और इस वर्ष इसका 33वां संस्करण आयोजित किया गया।

    मिस इंडिया वर्ल्डवाइड 2026 का आयोजन त्रिनिदाद और टोबैगो के नेशनल एकेडमी फॉर द परफॉर्मिंग आर्ट्स में किया गया। इसी कार्यक्रम के दौरान वर्ल्डवाइड पेजेंट्स की को चेयरपर्सन नीलम सरन ने हेली पिसाडी को मिस इंडिया वर्ल्डवाइड का ताज पहनाया। जीत के बाद हेली को ताज और सैश के साथ देखा गया। उनकी इस उपलब्धि को भारतीय मूल के लोगों के लिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि प्रतियोगिता भारतीय संस्कृति और विरासत से जुड़े प्रतिभागियों को वैश्विक मंच प्रदान करती है।

    हेली पिसाडी की खासियत केवल उनकी खूबसूरती नहीं बल्कि उनकी शिक्षा और आत्मविश्वास भी है। वह कानून की पढ़ाई कर रही हैं और पढ़ाई के साथ उन्होंने अंतरराष्ट्रीय सौंदर्य प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। त्रिनिदाद और टोबैगो जैसे देश से भारतीय मूल की प्रतिनिधि के तौर पर इस मंच पर पहुंचना भी अपने आप में महत्वपूर्ण उपलब्धि है। प्रतियोगिता में अलग अलग देशों में रहने वाली भारतीय मूल की महिलाओं ने हिस्सा लिया और अपनी प्रतिभा तथा व्यक्तित्व का प्रदर्शन किया।

    इस आयोजन में केवल मिस इंडिया वर्ल्डवाइड का खिताब ही नहीं दिया गया बल्कि दो अन्य प्रमुख श्रेणियों में भी विजेताओं का चयन हुआ। अमेरिका का प्रतिनिधित्व करने वाली डॉ. श्रीदेवी मंगिनानी ने मिसेज इंडिया वर्ल्डवाइड 2026 का खिताब अपने नाम किया। वहीं नीदरलैंड्स की लूना जयराम मिस टीन इंडिया वर्ल्डवाइड 2026 चुनी गईं। इस तरह तीन अलग अलग देशों की भारतीय मूल की महिलाओं ने प्रतियोगिता के तीन प्रमुख खिताब अपने नाम किए।

    मिस इंडिया वर्ल्डवाइड प्रतियोगिता की शुरुआत तीन दशक से भी अधिक समय पहले हुई थी। इसका उद्देश्य दुनिया के अलग अलग हिस्सों में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों को अपनी संस्कृति और पहचान से जोड़ना भी है। समय के साथ यह प्रतियोगिता भारतीय प्रवासी समुदाय के लिए एक अंतरराष्ट्रीय मंच के रूप में अपनी पहचान बना चुकी है। प्रतियोगिता में शामिल होने वाली प्रतिभागियां अपनी भारतीय विरासत के साथ उस देश का भी प्रतिनिधित्व करती हैं जहां वे रहती हैं।

    हेली पिसाडी की जीत इसी वैश्विक भारतीय समुदाय की बढ़ती पहचान को दर्शाती है। त्रिनिदाद और टोबैगो में आयोजित इस आयोजन ने भारतीय मूल की प्रतिभाओं को एक मंच पर लाने का काम किया। 19 साल की हेली के लिए यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि वह अभी कानून की पढ़ाई कर रही हैं और शिक्षा के साथ उन्होंने सौंदर्य प्रतियोगिता में अंतरराष्ट्रीय सफलता हासिल की है। उनकी जीत ने भारतीय मूल की युवा प्रतिभाओं के लिए एक नई मिसाल कायम की है।

  • इमरान समर्थकों के लॉन्ग मार्च के बीच शहबाज शरीफ ने बढ़ाया बातचीत का हाथ, रखी ये शर्त

    इमरान समर्थकों के लॉन्ग मार्च के बीच शहबाज शरीफ ने बढ़ाया बातचीत का हाथ, रखी ये शर्त


    लाहौर।
    पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने विपक्षी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) को बातचीत की सशर्त पेशकश की है। उन्होंने कहा कि अगर PTI इस्लामाबाद की ओर बढ़ रहे अपने लॉन्ग मार्च को तत्काल रोक देती है, तो सरकार बातचीत के लिए तैयार है। राजधानी में एक कार्यक्रम के दौरान शरीफ ने पार्टी नेतृत्व से प्रदर्शन की राजनीति छोड़कर बातचीत का रास्ता अपनाने की अपील की।

    शरीफ ने चेतावनी दी कि लगातार सड़क प्रदर्शनों से पाकिस्तान में फिर राजनीतिक अस्थिरता का दौर लौट सकता है। उन्होंने कहा कि देश पहले ही लंबे समय तक राजनीतिक उथल-पुथल का सामना कर चुका है और ऐसी स्थिति दोबारा पैदा नहीं होनी चाहिए।

    बातचीत टूटने के बाद आया बयान

    शहबाज शरीफ का यह बयान सरकार और PTI के बीच बातचीत बेनतीजा रहने के बाद आया है। हाल ही में नेशनल असेंबली के स्पीकर अयाज सादिक के चैंबर में दोनों पक्षों के बीच बातचीत हुई थी, लेकिन किसी समझौते तक नहीं पहुंचा जा सका।

    शरीफ ने PTI नेतृत्व पर बातचीत में गंभीरता से आगे नहीं बढ़ने का आरोप लगाया। उनका दावा है कि वार्ता के दौरान जिन मुद्दों पर शुरुआती सहमति बनी थी, PTI ने बाद में उनमें बदलाव कर दिया। सरकार के अनुसार, राजनीतिक तनाव कम करने और विवादों का समाधान निकालने के उद्देश्य से बातचीत शुरू की गई थी, लेकिन विपक्ष का रुख टकराव जारी रखने वाला रहा।

    अर्थव्यवस्था को लेकर जताई चिंता

    प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि करीब ढाई साल की आर्थिक स्थिरीकरण प्रक्रिया के बाद देश की अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत दिखाई देने लगे हैं।

    शरीफ के मुताबिक, मैन्युफैक्चरिंग, रेमिटेंस और निर्यात के क्षेत्र में सकारात्मक संकेत मिले हैं। ऐसे समय में लंबे धरने और राजनीतिक मार्च से कारोबारी गतिविधियां और आर्थिक विकास प्रभावित हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि अगर विरोध प्रदर्शनों के कारण आर्थिक गतिविधियां बाधित होती हैं तो इसका सीधा नुकसान राष्ट्रीय हितों को होगा।

    बातचीत के साथ कार्रवाई का भी संकेत

    शहबाज शरीफ ने कहा कि संघीय सरकार PTI के साथ बैठकर संवैधानिक तरीके से राजनीतिक विवादों का शांतिपूर्ण समाधान निकालने के लिए तैयार है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सड़क पर मार्च जारी रखते हुए सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश के बीच नई बातचीत नहीं होगी।

    सरकार का कहना है कि राजनीतिक संवाद का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं हुआ है, लेकिन राजधानी में कानून-व्यवस्था बनाए रखना उसकी प्राथमिकता है। शरीफ ने संकेत दिया कि अगर प्रदर्शन के कारण सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होती है या इस्लामाबाद को ठप करने की कोशिश की जाती है, तो कानून लागू कराने वाली एजेंसियां कार्रवाई कर सकती हैं।

  • फ्रांस में शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ छात्रों का उग्र प्रदर्शन, धमाके में 15 वर्षीय छात्र का हाथ उड़ा

    फ्रांस में शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ छात्रों का उग्र प्रदर्शन, धमाके में 15 वर्षीय छात्र का हाथ उड़ा


    पेरिस। फ्रांस में शिक्षा व्यवस्था की कथित खामियों के खिलाफ छात्रों का आंदोलन लगातार उग्र होता जा रहा है। स्कूलों में बढ़ती छात्र संख्या, शिक्षकों की कमी, जर्जर इमारतों और बुनियादी सुविधाओं के अभाव को लेकर छात्र सड़कों पर उतर आए हैं। कई स्थानों पर प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प के बाद हालात हिंसक हो गए। रिपोर्टों के मुताबिक, इस दौरान करीब 1,000 लोग घायल हुए हैं।

    धमाके में 15 वर्षीय छात्र गंभीर घायल

    रिपोर्ट्स के अनुसार, लेंस शहर में प्रदर्शन के दौरान हुए एक धमाके में 15 वर्षीय छात्र गंभीर रूप से घायल हो गया। धमाके में उसका हाथ उड़ गया। उसे तत्काल अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उसके जबड़े की भी सर्जरी करनी पड़ी। प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने 5,000 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया है। इनमें करीब 90 प्रतिशत नाबालिग छात्र बताए जा रहे हैं।

    पुलिस कार्रवाई को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच मंगलवार को देशभर में आंदोलन के समर्थन में रैलियां आयोजित होने की उम्मीद है, जिनमें हजारों लोगों के शामिल होने की संभावना है।

    प्रधानमंत्री ने छात्रों की मांगों को बताया जायज

    फ्रांस के प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने देशव्यापी छात्र विरोध-प्रदर्शनों को शांत करने की कोशिश के तहत हड़ताल कर रहे स्कूली छात्रों की शिकायतों को “जायज” बताया है। ‘द गार्डियन’ की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार ने मंत्रियों को छात्रों की पांच प्रमुख मांगों पर काम करने और अक्टूबर 2026 के अंत तक प्रस्ताव तैयार कर पेश करने का निर्देश दिया है।

    400 से 500 स्कूलों में कक्षाएं प्रभावित

    फ्रांस के शिक्षा मंत्री एडुआर्ड गेफ्रे ने बताया कि सुरक्षा व्यवस्था पूरी नहीं होने के कारण करीब 400 से 500 उच्च विद्यालयों में कक्षाएं पूर्ण या आंशिक रूप से निलंबित कर दी गई हैं। उन्होंने कहा कि आंदोलन शुरू होने के बाद से 24 विद्यालयों में आगजनी या तोड़फोड़ की घटनाएं हुई हैं। हिंसा में शिक्षा विभाग के 85 कर्मचारी घायल हुए हैं। मंत्री ने मौजूदा स्थिति को अभूतपूर्व बताया।

    बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले सप्ताह पेरिस से शुरू हुआ छात्र आंदोलन अब मोंटपेलियर, नांत और मार्सिले सहित कई प्रमुख शहरों तक फैल चुका है। छात्र शिक्षा के गिरते स्तर में सुधार के साथ स्कूलों में बेहतर बुनियादी सुविधाओं की मांग कर रहे हैं।

    फ्रांस के न्याय मंत्री गेराल्ड डारमानिन के अनुसार, देश के करीब 3,700 विद्यालयों में से लगभग 735 विद्यालय इस उग्र आंदोलन से किसी न किसी रूप में प्रभावित हुए हैं।

    प्रवेश प्रक्रिया में पारदर्शिता और सुविधाओं में सुधार पर जोर

    प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने कहा कि सरकार छात्रों और शैक्षणिक कर्मचारियों की समस्याओं के समाधान के लिए तेजी से कदम उठा रही है। इसमें कक्षाओं का सुचारू संचालन, स्कूलों में सुविधाओं का सुधार और विश्वविद्यालय प्रवेश प्रक्रिया में पारदर्शिता जैसे मुद्दे शामिल हैं। सरकार विद्यालयों में तोड़फोड़ करने वालों से ही हुए नुकसान की भरपाई कराने संबंधी विधेयक को भी जल्द आगे बढ़ाने की तैयारी में है।

  • हेलीकॉप्टर से उतरते समय गिरते-गिरते बचीं US सेकंड लेडी ऊषा वेंस, गोद में था 9 हफ्ते का बच्चा

    हेलीकॉप्टर से उतरते समय गिरते-गिरते बचीं US सेकंड लेडी ऊषा वेंस, गोद में था 9 हफ्ते का बच्चा


    वॉशिंगटन।
    अमेरिका की सेकंड लेडी ऊषा वेंस सोमवार को मैरीलैंड स्थित ज्वाइंट बेस एंड्रयूज पर हेलीकॉप्टर से उतरते समय अचानक लड़खड़ा गईं। उस समय उनका नौ सप्ताह का बेटा एलेक नील वेंस बेबी कैरियर में उनकी गोद से बंधा हुआ था। ऊषा ने तुरंत रेलिंग पकड़कर खुद को संभाल लिया। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद यह चर्चा का विषय बना हुआ है।

    सीढ़ियों से उतरते समय छूटा कदम

    वीडियो में ऊषा वेंस हेलीकॉप्टर की सीढ़ियों से नीचे उतरती दिखाई दे रही हैं। उनके साथ उनका नौ सप्ताह का बेटा एलेक भी था। सीढ़ियों के निचले हिस्से के पास अचानक उनका कदम चूक गया और वह कुछ क्षण के लिए अपना संतुलन खोती नजर आईं।

    ऊषा ने तुरंत रेलिंग पकड़ ली और खुद को संभाल लिया। इसके बाद उन्होंने अपने बच्चे को देखा और सामान्य रूप से आगे बढ़ गईं। घटना में ऊषा वेंस या उनके बच्चे के घायल होने की कोई जानकारी सामने नहीं आई है।

    पास खड़े सैन्यकर्मियों ने मदद क्यों नहीं की?

    वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि हेलीकॉप्टर के पास मौजूद कर्मचारियों या सैन्यकर्मियों ने ऊषा की मदद के लिए आगे कदम क्यों नहीं बढ़ाया। वीडियो में हेलीकॉप्टर के आसपास कई सैनिक नजर आ रहे हैं।

    हालांकि, फुटेज से यह स्पष्ट नहीं है कि सैन्यकर्मियों ने हस्तक्षेप क्यों नहीं किया। यह भी स्पष्ट नहीं है कि उस समय उनके लिए किसी विशेष सुरक्षा या औपचारिक प्रोटोकॉल का पालन करना जरूरी था या नहीं।

    क्या सैन्य प्रोटोकॉल के कारण नहीं बढ़े आगे?

    मीडिया रिपोर्टों और सैन्य प्रोटोकॉल से जुड़ी जानकारी के अनुसार, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति या उनके परिवार के सदस्य के विमान या हेलीकॉप्टर से उतरने के दौरान तैनात सैन्यकर्मी अक्सर औपचारिक सलामी और ‘एटेंशन’ की स्थिति में रहते हैं। ऐसे में वीडियो में दिखाई देने वाले सैन्यकर्मियों की प्रतिक्रिया को इसी प्रोटोकॉल के संदर्भ में देखा जा रहा है।

    बेटी को लेकर बाद में उतरे जेडी वेंस

    अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भी ऊषा वेंस के बाद हेलीकॉप्टर से नीचे उतरे। वह अपनी चार वर्षीय बेटी मिराबेल के साथ थे। रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसा प्रतीत हुआ कि उन्होंने ऊषा के लड़खड़ाने की घटना को नहीं देखा।

    इसके बाद पूरा परिवार उस विमान की ओर बढ़ गया, जिससे उन्हें एंकोरेज के लिए रवाना होना था।

    नवजात बच्चे के साथ 7.5 घंटे की यात्रा

    यह यात्रा जेडी वेंस के अलास्का दौरे का हिस्सा थी। वह मध्यावधि चुनाव से पहले प्रचार अभियान के लिए अलास्का जा रहे थे। वहां उन्हें रिपब्लिकन नेशनल कमेटी की एक रैली को संबोधित करना था। रैली में रिपब्लिकन सीनेटर डैन सुलिवन के दोबारा चुनाव लड़ने के प्रयास का समर्थन किया जाना था। सुलिवन का मुकाबला डेमोक्रेट मैरी पेल्टोला से है।

    एयर फोर्स टू में सवार होने से पहले वेंस ने बताया था कि ऊषा और उनके कुछ बच्चे भी उनके साथ यात्रा करेंगे। उन्होंने कहा था कि यह अलास्का यात्रा ऊषा का 50वां अमेरिकी राज्य दौरा होगा।

    जेडी वेंस ने मजाकिया अंदाज में यह भी कहा था कि परिवार अपने नौ सप्ताह के बच्चे को करीब 7.5 घंटे की यात्रा पर साथ ले जा रहा है। उन्होंने कहा था कि अगर बाद में भाषण के दौरान वह थके या तनाव में नजर आएं तो इसकी वजह नवजात बच्चे के साथ की गई लंबी यात्रा हो सकती है।