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  • दक्षिण कोरिया के इस द्वीप पर जाने वालों सावधान! भारतीय दूतावास ने क्यों जारी की ट्रैवल एडवायजरी

    दक्षिण कोरिया के इस द्वीप पर जाने वालों सावधान! भारतीय दूतावास ने क्यों जारी की ट्रैवल एडवायजरी

    नई दिल्‍ली। अधिकारियों के अनुसार, यात्रियों को यह साबित करने में सक्षम होना चाहिए कि उनके पास पूरे प्रवास के दौरान खर्च उठाने के लिए पर्याप्त धन है। इमिग्रेशन जांच के दौरान पूछे गए सवालों का शांत और सुसंगत तरीके से जवाब देना भी जरूरी बताया गया है।

    दक्षिण कोरिया का राजधानी सियोल स्थित भारतीय दूतावास ने मंगलवार को भारतीय नागरिकों के लिए एक अहम एडवायजरी जारी करते हुए दक्षिण कोरिया के जेजू द्वीप की यात्रा के दौरान विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी है।

    यह चेतावनी कंटेंट क्रिएटर सचिन अवस्थी को हाल ही में हिरासत में लिए जाने की घटना के बाद जारी की गई है, जिसने यात्रियों के बीच चिंता बढ़ा दी है। दूतावास ने अपने बयान में कहा कि समय-समय पर भारतीय यात्रियों को जेजू द्वीप पर प्रवेश से इनकार या वापस भेजे जाने की घटनाएं सामने आती रहती हैं, खासकर वीज़ा-फ्री सुविधा के तहत यात्रा करने वालों के साथ।

    एडवायजरी में स्पष्ट किया गया है कि जेजू का वीज़ा-मुक्त प्रवेश केवल अल्पकालिक पर्यटन के लिए मान्य है और अंतिम निर्णय वहां के इमिग्रेशन अधिकारियों के हाथ में होता है। यानी, वीज़ा-फ्री सुविधा होने के बावजूद प्रवेश की गारंटी नहीं होती। यात्रियों को सलाह दी गई है कि वे सभी आवश्यक दस्तावेज अपने साथ रखें, जिनमें कन्फर्म रिटर्न टिकट, पूरे प्रवास की होटल बुकिंग, दिन-वार यात्रा योजना, पर्याप्त वित्तीय संसाधनों का प्रमाण, कम से कम छह महीने का वैध पासपोर्ट, ट्रैवल इंश्योरेंस और ठहरने के स्थान की संपर्क जानकारी शामिल हैं।
    वित्तीय तैयारी पर विशेष जोर

    दूतावास ने यह भी चेतावनी दी कि यदि यात्री अपनी यात्रा योजना स्पष्ट रूप से नहीं बता पाते, तो उन्हें प्रवेश से रोका जा सकता है। एडवायजरी में वित्तीय तैयारी पर भी विशेष जोर दिया गया है। अधिकारियों के अनुसार, यात्रियों को यह साबित करने में सक्षम होना चाहिए कि उनके पास पूरे प्रवास के दौरान खर्च उठाने के लिए पर्याप्त धन है।

    इमिग्रेशन जांच के दौरान पूछे गए सवालों का शांत और सुसंगत तरीके से जवाब देना भी जरूरी बताया गया है।
    जेजू वीजा-फ्री योजना का हिस्सा नहीं

    दूतावास ने यह भी स्पष्ट किया कि जेजू वीज़ा-फ्री योजना के तहत मुख्य भूमि दक्षिण कोरिया की यात्रा की अनुमति नहीं है। यदि कोई यात्री बिना वीज़ा के वहां जाने की कोशिश करता है या निर्धारित अवधि से अधिक समय तक रुकता है, तो उस पर भविष्य में यात्रा प्रतिबंध लगाया जा सकता है। प्रवेश से इनकार की स्थिति में यात्रियों को अगले उपलब्ध विमान से वापस भेज दिया जाता है और तब तक उन्हें अस्थायी हिरासत केंद्र में रखा जा सकता है।

    सचिन अवस्थी को 38 घंटे हिरासत में रखा गया

    यह एडवायजरी उस घटना के बाद आई है, जिसमें सचिन अवस्थी और उनकी पत्नी को जेजू पहुंचने पर करीब 38 घंटे तक हिरासत में रखा गया और अंततः उन्हें महंगा वापसी टिकट लेकर लौटना पड़ा। अवस्थी ने इस अनुभव को साझा करते हुए कहा कि इमिग्रेशन का निर्णय उनका अधिकार है, लेकिन उनके साथ अपराधियों जैसा व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए था। बता दें कि जेजू द्वीप दक्षिण कोरिया का एक विशेष स्वायत्त प्रांत है, जहां विदेशी पर्यटकों के लिए सीमित वीज़ा-फ्री प्रवेश की व्यवस्था है। हालांकि, इस सुविधा का लाभ उठाने के लिए यात्रियों को सीधे किसी विदेशी देश से जेजू पहुंचना आवश्यक होता है; मुख्य भूमि दक्षिण कोरिया के रास्ते जाने पर वीज़ा अनिवार्य है।

  • नई दिल्ली घोषणापत्र: 91 देशों और वैश्विक संगठनों ने किया एआई सहयोग का ऐतिहासिक समर्थन

    नई दिल्ली घोषणापत्र: 91 देशों और वैश्विक संगठनों ने किया एआई सहयोग का ऐतिहासिक समर्थन


    नई दिल्ली, फ़रवरी 2026 । आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में वैश्विक सहयोग की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में ‘नई दिल्ली घोषणापत्र’ ने दुनिया भर के देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अनुसार, अब तक इस घोषणापत्र में 91 देशों और वैश्विक संगठनों ने समर्थन दिया है।

    पिछले सप्ताह नई दिल्ली में आयोजित ‘एआई इम्पैक्ट समिट 2026’ का समापन इस घोषणापत्र को अपनाने के साथ हुआ। यह घोषणा एआई के उपयोग को आर्थिक विकास, सामाजिक कल्याण और समावेशी प्रौद्योगिकी के लिए वैश्विक स्तर पर बढ़ावा देने का एक संकेतक माना जा रहा है। प्रारंभ में 21 फ़रवरी 2026 तक 88 देशों और संगठनों ने इसका समर्थन किया था। इसके तुरंत बाद बांग्लादेश, कोस्टा रिका और ग्वाटेमाला के शामिल होने से इस संख्या बढ़कर 91 हो गई।

    घोषणापत्र का मूल संदेश ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ के सिद्धांत से प्रेरित है। इसका मकसद एआई के लाभ को पूरी मानवता तक समान रूप से पहुँचाना और तकनीकी असमानताओं को कम करना है। बयान में यह स्पष्ट किया गया है कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग और बहु-हितधारक भागीदारी को मजबूत करना, राष्ट्रीय संप्रभुता का सम्मान करना और भरोसेमंद तथा सुलभ ढांचे के माध्यम से एआई को आगे बढ़ाना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

    घोषणापत्र में आर्थिक परिवर्तन में एआई की भूमिका को विशेष महत्व दिया गया है। ओपन-सोर्स और सुलभ एआई इकोसिस्टम को बढ़ावा देना, ऊर्जा-कुशल एआई अवसंरचना का निर्माण और विज्ञान, शासन तथा सार्वजनिक सेवा वितरण में एआई की भूमिका को मजबूत करना इसमें शामिल हैं। इसके साथ ही वैश्विक सहयोग को मजबूत करना और डिजिटल अवसंरचना तथा किफ़ायती कनेक्टिविटी के माध्यम से एआई की पूरी क्षमता का उपयोग सुनिश्चित करना भी प्रमुख बिंदु हैं।

    ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के सिद्धांत के अनुसार, घोषणापत्र एआई संसाधनों की वहनीयता और पहुँच बढ़ाने के महत्व को स्वीकार करता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सभी देश अपने नागरिकों के लिए एआई का विकास, अपनाना और उपयोग कर सकें। इसके अतिरिक्त, सुरक्षित, भरोसेमंद और मजबूत एआई को बढ़ावा देना समाज और अर्थव्यवस्था के लिए विश्वास निर्माण की बुनियाद के रूप में देखा गया है।

    विशेषज्ञों के अनुसार यह घोषणापत्र केवल तकनीकी सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक नीति और नैतिकता के स्तर पर भी एआई के संतुलित और जिम्मेदार उपयोग को बढ़ावा देता है। नई दिल्ली घोषणापत्र 91 देशों और संगठनों के हस्ताक्षर से यह संदेश देता है कि एआई अब केवल तकनीकी क्षेत्र की बात नहीं रही, बल्कि यह वैश्विक विकास, सामाजिक कल्याण और समान अवसरों की दिशा में एक साझा प्रयास बन गया है।

  • PAK: सख्त पहरे में जेल से अस्पताल ले जाए गए इमरान खान…आंखों में लगा दूसरा इंजेक्शन

    PAK: सख्त पहरे में जेल से अस्पताल ले जाए गए इमरान खान…आंखों में लगा दूसरा इंजेक्शन


    इस्लामाबाद।
    पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और पीटीआई संस्थापक इमरान खान (Imran Khan) को आंखों के इलाज के लिए अडियाला जेल से कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच Pakistan Institute of Medical Sciences (PIMS) लाया गया। निर्धारित फॉलो-अप जांच के दौरान विशेषज्ञ डॉक्टरों ने उनकी प्रभावित आंख में दूसरा एंटी-VEGF इंट्राविट्रियल इंजेक्शन लगाया। उपचार पूरा होने के बाद उन्हें वापस अडियाला जेल भेज दिया गया।

    अस्पताल प्रशासन की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया कि सुबह के समय उन्हें तय कार्यक्रम के अनुसार अस्पताल लाया गया। इंजेक्शन का उद्देश्य उनकी दृष्टि में सुधार लाना है। प्रक्रिया से पहले विशेषज्ञों के एक मेडिकल बोर्ड ने उनका विस्तृत परीक्षण किया।


    कार्डियक जांच भी की गई

    जांच टीम में कार्डियोलॉजिस्ट और फिजिशियन शामिल थे। कार्डियोलॉजिस्ट ने इकोकार्डियोग्राफी और ईसीजी जांच भी की। सभी परीक्षणों में उन्हें क्लिनिकली स्थिर पाया गया, जिसके बाद नेत्र संबंधी प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।

    पीआईएमएस प्रशासन के अनुसार, यह उपचार डे-केयर सर्जरी के तहत किया गया। पूरी प्रक्रिया पीआईएमएस और Shifa International Hospital के सलाहकार नेत्र रोग विशेषज्ञों और विट्रियोरेटिनल सर्जन की निगरानी में संपन्न हुई।


    इलाज के बाद तुरंत जेल वापसी

    अस्पताल की ओर से कहा गया कि इंजेक्शन के दौरान और उसके बाद उनकी स्थिति स्थिर रही। इलाज पूरा होने पर उन्हें फॉलो-अप से जुड़ी सलाह, जरूरी सावधानियां और मेडिकल दस्तावेज उपलब्ध कराए गए। इसके तुरंत बाद सुरक्षा घेरे में उन्हें पुनः अडियाला जेल ले जाया गया।


    15 गाड़ियों का काफिला, तीन सिग्नल जैमर तैनात

    पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इमरान खान को लगभग 15 वाहनों के काफिले में अस्पताल लाया गया। काफिले में काली गाड़ियां शामिल थीं और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तीन सिग्नल जैमर भी लगाए गए थे। अस्पताल परिसर और आसपास के इलाकों में अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात रहे। इलाज की पूरी प्रक्रिया सख्त सुरक्षा और चिकित्सकीय निगरानी में पूरी की गई।

  • पाकिस्तान में आर्थिक बदहाली के बीच नया संकट… दाल के लिए मचा हाहाकार

    पाकिस्तान में आर्थिक बदहाली के बीच नया संकट… दाल के लिए मचा हाहाकार


    फैसलाबाद।
    पड़ोसी देश पाकिस्तान (Pakistan) की आर्थिक बदहाली (Economic Distress) की खबरें नई नहीं हैं। खस्ताहाल पाकिस्तान दुनिया की कई वैश्विक संस्थानों (Global Institutions) से कर्ज लेकर अपनी जरूरतें पूरी कर पा रहा है। अब हाल ही में यह खबरें सामने आई हैं कि पाकिस्तान में दाल (Lentils) के लिए हाहाकार मचा हुआ है। स्थिति यह है कि पाकिस्तान अब अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए लगभग पूरी तरह आयात पर निर्भर हो चुका है। पाकिस्तान में दाल का उत्पादन लगातार घट रहा है, जिससे देश को जरूरतें पूरी करने के लिए हर साल करीब 98 करोड़ डॉलर आयात पर खर्च करने पड़ रहे हैं।

    एक रिपोर्ट के मुताबिक कृषि विशेषज्ञों ने इस हालात पर गंभीर चिंता जताई है और कहा है कि अगर उत्पादन नहीं बढ़ा तो आयात पर निर्भरता और बढ़ेगी। पंजाब पल्सेज इंपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष और ग्रेन मार्केट के चेयरमैन राणा मुहम्मद तैय्यब ने बताया कि 1998 से पहले पाकिस्तान दाल का प्रमुख निर्यातक देश था। लेकिन परवेज मुशर्रफ के दौर में लगाए गए निर्यात बैन के बाद किसानों का उत्साह कम हो गया, क्योंकि दाल कम मुनाफे वाली फसल बन गई। जानकारों के मुताबिक देश में हर साल करीब 16.2 लाख टन दाल की खपत होती है, जिसमें से लगभग 10.7 लाख टन आयात की जाती है। यानी पाकिस्तान को देश में खपत होने वाली करीब 80 प्रतिशत दाल आयात करनी पड़ती है।


    बारिश ने भी तरसाया

    तैय्यब ने जलवायु परिवर्तन के असर का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि थल जैसे वर्षा आधारित इलाकों में समय पर बारिश हो जाए तो पैदावार 35 प्रतिशत तक बढ़ सकती है, लेकिन बारिश कम होने पर भारी नुकसान होता है और किसान अगले सीजन में दाल बोने से हिचकते हैं।

    जानकारों ने जताई चिंता
    ये मुद्दे विश्व दाल दिवस के मौके पर आयूब एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट के पल्सेज रिसर्च इंस्टीट्यूट में आयोजित एक सेमिनार में उठाए गए। विशेषज्ञों ने कहा कि पाकिस्तान की सालाना जरूरत करीब 15 लाख टन है, लेकिन लोकल उत्पादन इसका सिर्फ एक छोटा हिस्सा ही पूरा कर पा रहा है। इसी कारण हर साल करीब 10 लाख टन दाल आयात करनी पड़ती है।

    AARI के पल्सेज सेक्शन के चीफ साइंटिस्ट खालिद हुसैन ने कहा कि दाल मानव पोषण और मिट्टी की उर्वरता दोनों के लिए जरूरी है। लेकिन सीमित मुनाफा और निर्यात बैन के कारण किसान इसकी खेती से बच रहे हैं। दाल उत्पादन बढ़ाने के मकसद से एक प्रस्ताव तैयार कर संबंधित अधिकारियों को भेजा गया है, लेकिन उसे अभी तक मंजूरी नहीं मिली है।

  • SC के झटके के बाद ट्रंप की नई वार्निंग… बोले- कोई खेल करेगा तो उप पर लगेगा पहले से ज्यादा टैरिफ

    SC के झटके के बाद ट्रंप की नई वार्निंग… बोले- कोई खेल करेगा तो उप पर लगेगा पहले से ज्यादा टैरिफ


    वाशिंगटन।
    राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (President Donald Trump) ने टैरिफ फैसले (Tariff decision) पर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की रोक के बाद सोमवार को अदालत पर तीखा हमला बोला। उन्होंने फैसले को ‘बेवकूफाना’ करार देते हुए दावा किया कि इस निर्णय ने अनजाने में उनकी शक्तियों को और मजबूत कर दिया है। इस दौरान ट्रंप ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद टैरिफ को लेकर कोई देश अगर खेल करने की कोशिश करेगा, तो उस पर पहले से ज्यादा टैरिफ लगाया जाएगा।

    दरअसल, 20 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने 6-3 के बहुमत से कहा कि अंतर्राष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्तियां अधिनियम (IEEPA ) के तहत लगाए गए व्यापक वैश्विक टैरिफ अवैध हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि आपातकालीन शक्तियों के नाम पर राष्ट्रपति कांग्रेस के कराधान अधिकार, यानी टैरिफ लगाने की शक्ति का उपयोग नहीं कर सकते। फैसले के बाद ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लंबी पोस्ट लिखकर अदालत को हास्यास्पद, मूर्खतापूर्ण और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभाजनकारी बताया।


    ट्रुथ सोशल पर ट्रंप की प्रतिक्रिया

    ट्रंप ने लिखा कि वे लाइसेंस व्यवस्था का इस्तेमाल विदेशी देशों, खासकर उन देशों के खिलाफ ‘कड़े’ कदम उठाने के लिए कर सकते हैं, जो उनके अनुसार दशकों से अमेरिका का शोषण करते रहे हैं। हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि अदालत के फैसले से उनकी शक्तियां कैसे बढ़ गईं। उन्होंने यह भी कहा कि वे सुप्रीम कोर्ट का जिक्र छोटे अक्षरों में करेंगे, जो उनके अनुसार ‘पूर्ण अनादर’ का संकेत है।

    उनकी पोस्ट में लाइसेंस और शुल्क को लेकर भ्रम की स्थिति भी दिखी। अदालत ने कहा था कि राष्ट्रपति आर्थिक आपातकाल में व्यापारिक लाइसेंस जारी कर सकते हैं, लेकिन उन्हें टैरिफ के रूप में शुल्क लगाने का अधिकार नहीं है। ट्रंप ने शिकायत की कि वे देशों से लाइसेंस लेने को तो कह सकते हैं, लेकिन उनसे लाइसेंस शुल्क नहीं वसूल सकते, जबकि हर कोई लाइसेंस पर शुल्क लेता है।

    इस दौरान उन्होंने यह भी दावा किया कि अदालत ने अन्य कई टैरिफ को मंजूरी दी है, जिन्हें वे पहले से अधिक प्रभावी तरीके से लागू कर सकते हैं। ट्रंप ने सुप्रीम कोर्ट की आलोचना करते हुए केवल तीन न्यायाधीशों ( ब्रेट कावानॉ, क्लेरेंस थॉमस और सैमुअल अलिटो ) की सराहना की, जिन्होंने असहमति जताई थी।


    जन्मजात नागरिकता पर भी हमला

    अदालत पर हमला करते हुए ट्रंप ने जन्मजात नागरिकता के मुद्दे को भी उठाया। उन्होंने कहा कि 14वां संशोधन ‘गुलामों के बच्चों’ के लिए नहीं लिखा गया था। जबकि संविधान का यही संशोधन कहता है कि अमेरिका में जन्म लेने वाला हर व्यक्ति, जो अमेरिकी अधिकार क्षेत्र के अधीन है, नागरिक माना जाएगा।

    पिछले वर्ष ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश जारी कर अवैध प्रवासियों या अस्थायी वीजा पर रहने वालों के बच्चों को जन्मजात नागरिकता से बाहर करने की कोशिश की थी। उनका तर्क था कि गृहयुद्ध के बाद जो संशोधन लाया गया, उसका उद्देश्य केवल मुक्त गुलामों के बच्चों को नागरिकता देना था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि चीन समेत कुछ देश गर्भवती महिलाओं को अमेरिका भेजकर इस प्रावधान का ‘दुरुपयोग’ करते हैं।


    टैरिफ बढ़ाने की घोषणा

    शनिवार को अदालत द्वारा टैरिफ को 10 प्रतिशत तक सीमित करने के फैसले के बाद ट्रंप ने घोषणा की कि वे इसे बढ़ाकर 15 प्रतिशत करेंगे। उन्होंने कहा कि यह कदम पूरी तरह कानूनी और अनुमत है। साथ ही उन्होंने संकेत दिया कि आने वाले महीनों में उनका प्रशासन नए और कानूनी रूप से वैध टैरिफ लागू करेगा, ताकि ‘अमेरिका को फिर से महान बनाने’ की प्रक्रिया जारी रखी जा सकें।

  • US-ईरान तनाव के बीच अलर्ट: भारतीय दूतावास, तेहरान ने भारतीयों से तुरंत ईरान छोड़ने को कहा

    US-ईरान तनाव के बीच अलर्ट: भारतीय दूतावास, तेहरान ने भारतीयों से तुरंत ईरान छोड़ने को कहा


    नई दिल्ली । मध्य पूर्व में तेजी से बदलते हालात और अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच तेहरान स्थित भारतीय दूतावास ने 23 फरवरी 2026 को एक अहम एडवाइजरी जारी कर ईरान में रह रहे भारतीय नागरिकों से तुरंत देश छोड़ने की अपील की है। दूतावास ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि मौजूदा सुरक्षा परिस्थितियों को देखते हुए छात्र, तीर्थयात्री, व्यापारी और पर्यटक उपलब्ध सभी साधनों, विशेषकर वाणिज्यिक उड़ानों, का उपयोग कर जल्द से जल्द ईरान से बाहर निकलने की योजना बनाएं। यह सलाह पहले 5 जनवरी और 14 जनवरी को जारी परामर्शों की निरंतरता में दोहराई गई है, लेकिन इस बार लहजा अधिक सतर्क और गंभीर है।

    दूतावास ने अपनी आधिकारिक एडवाइजरी में कहा है कि ईरान में स्थिति तेजी से बदल रही है और किसी भी संभावित आपात परिस्थिति से बचने के लिए एहतियात बरतना बेहद जरूरी है। भारतीय नागरिकों को विरोध प्रदर्शनों और भीड़भाड़ वाले इलाकों से दूर रहने, स्थानीय प्रशासन के निर्देशों का पालन करने और दूतावास के साथ लगातार संपर्क में बने रहने की सलाह दी गई है। साथ ही सभी से अपने पासपोर्ट, वीजा और अन्य पहचान दस्तावेज तैयार रखने को कहा गया है, ताकि आवश्यकता पड़ने पर तुरंत यात्रा की जा सके।

    दूतावास ने यह भी दोहराया है कि जिन भारतीयों ने अभी तक अपने प्रवास का पंजीकरण नहीं कराया है, वे तुरंत आधिकारिक लिंक के माध्यम से रजिस्ट्रेशन कराएं। यदि इंटरनेट कनेक्टिविटी में बाधा आ रही हो तो भारत में रह रहे उनके परिजन पंजीकरण प्रक्रिया पूरी कर सकते हैं। किसी भी आपात स्थिति में सहायता के लिए दूतावास ने हेल्पलाइन नंबर +989128109115, +989128109109, +989128109102 और +989932179359 जारी किए हैं। इसके अलावा [email protected] पर ईमेल के माध्यम से भी संपर्क किया जा सकता है। दूतावास ने भरोसा दिलाया है कि भारतीय समुदाय की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और हर संभव सहायता उपलब्ध कराई जाएगी।

    दरअसल, यह एडवाइजरी ऐसे समय आई है जब ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम पर पहुंचता दिख रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान को नए परमाणु समझौते पर सहमति के लिए सीमित समय का अल्टीमेटम दिया है और चेतावनी दी है कि विफलता की स्थिति में कड़े परिणाम भुगतने होंगे। रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका ने मध्य पूर्व क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा दी है, जिसमें युद्धपोत, फाइटर जेट्स और अन्य रणनीतिक संसाधन शामिल हैं। दूसरी ओर, ईरान में विरोध प्रदर्शन और झड़पों की खबरों ने हालात को और संवेदनशील बना दिया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कूटनीतिक प्रयास सफल नहीं होते तो क्षेत्र में सैन्य टकराव की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे परिदृश्य में भारतीय दूतावास का यह कदम एहतियाती और रणनीतिक दोनों ही दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बदलती परिस्थितियों के बीच भारतीय नागरिकों से अपील की गई है कि वे अफवाहों से बचें, केवल आधिकारिक सूचनाओं पर भरोसा करें और अपनी सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दें।

  • बांग्लादेशी सेना में बड़ा बदलाव, भारत में तैनात अधिकारी को वापस बुलाया

    बांग्लादेशी सेना में बड़ा बदलाव, भारत में तैनात अधिकारी को वापस बुलाया


    नई दिल्ली । बांग्लादेश सेना के उच्च कमान में रविवार को बड़ा फेरबदल हुआ जिसमें नए चीफ ऑफ जनरल स्टाफ की नियुक्ति भी शामिल है। इस बदलाव से प्रमुख रणनीतिक कमान और देश की मुख्य सैन्य खुफिया एजेंसी प्रभावित हुई है। ढाका ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार ये बदलाव प्रधानमंत्री तारिक रहमान की नई सरकार के सत्ता संभालने के कुछ दिनों बाद हुए। रिपोर्ट के मुताबिक लेफ्टिनेंट जनरल एम मैनुर रहमान को CGS नियुक्त किया गया जो पहले सेना प्रशिक्षण और सिद्धांत कमान ARTDOC के प्रमुख या जनरल ऑफिसर कमांडिंग GOC के पद पर थे।

    भारत में तैनात अधिकारी को वापस बुलाया
    भारत में बांग्लादेश उच्चायोग में रक्षा सलाहकार के पद पर तैनात ब्रिगेडियर जनरल मोहम्मद हाफिजुर रहमान को मेजर जनरल के दर्जे के साथ पैदल सेना डिवीजन का GOC बनने के लिए वापस बुलाया गया है।

    नई सरकार और चुनाव का संदर्भ

    बांग्लादेश राष्ट्रवादी पार्टी BNP ने 12 फरवरी को हुए चुनाव में दो-तिहाई बहुमत हासिल किया। 60 वर्षीय तारिक रहमान ने 17 फरवरी को प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली जिससे मुहम्मद यूनुस के 18 महीने के अंतरिम शासन का अंत हुआ।

    भारत-बांग्लादेश संवाद को बढ़ावा
    ढाका में नियुक्त भारतीय उच्चायुक्त प्रणय वर्मा ने कहा कि नई सरकार के साथ सक्रिय संवाद को लेकर भारत उत्सुक है। उन्होंने बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान से मुलाकात की और संवाद सहयोग और पारस्परिक हितों पर जोर दिया। उच्चायुक्त वर्मा ने कहा कि भारत बांग्लादेश के साथ हर क्षेत्र में सकारात्मक और भविष्योन्मुखी सहयोग को मजबूत करना चाहता है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि यूनुस के कार्यकाल के दौरान भारत-बांग्लादेश संबंधों में गिरावट आई थी और 1971 के बाद यह सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए थे।

  • अमेरिका के लोग ट्रंप की नीतियों और देश चलाने के तरीके से खुश नहीं… 60% टैरिफ फैसलों से नाराज

    अमेरिका के लोग ट्रंप की नीतियों और देश चलाने के तरीके से खुश नहीं… 60% टैरिफ फैसलों से नाराज


    वाशिंगटन।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) अपने कामों से अधिक अपने बयानों को लेकर चर्चा में रहते हैं। कब क्या कहेंगे, शायद ट्रंप खुद नहीं जानते। यही कारण है कि वे अक्सर चर्चा में बने रहते हैं। इस बीच एक सर्वे रिपोर्ट सामने आया है। इस सर्वे के अनुसार, अधिकतर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) की नीतियों और देश चलाने के तरीके से खुश नहीं है। फरवरी 2026 के सर्वेक्षण में ट्रंप की कुल अस्वीकृति दर (Disapproval Rating) लगभग 60% पहुंच गई है, जो उनके दूसरे कार्यकाल में अब तक की सबसे ऊंची दरों में से एक है और 2021 में पद छोड़ते समय वाली स्थिति के समान है। सर्वे के अनुसार, अधिकतर लोग महंगाई, टैरिफ, विदेश संबंध, आव्रजन और समग्र अर्थव्यवस्था जैसे रोजमर्रा के महत्वपूर्ण मुद्दों पर ट्रंप के तरीके से असहमत हैं।

    यह सर्वेक्षण ABC न्यूज/वाशिंगटन पोस्ट/इप्सोस द्वारा इप्सोस के नॉलेजपैनल के जरिए किया गया था, और यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा ट्रंप के पहले के वैश्विक टैरिफ को रद्द करने से ठीक पहले हुआ था। सर्वेक्षण के अनुसार, लगभग दो-तिहाई अमेरिकी (करीब 65%) ट्रंप द्वारा महंगाई से निपटने के तरीके से असहमत हैं। आयातित वस्तुओं पर टैरिफ लगाने के उनके तरीके को 64% लोग नापसंद करते हैं, जबकि 62% लोग विदेशी संबंधों को संभालने के तरीके से असहमत हैं। 58% प्रतिभागियों ने आव्रजन (इमिग्रेशन) को संभालने के तरीके का विरोध किया, और 57% ने कहा कि समग्र अर्थव्यवस्था को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है। इनमें से किसी भी मुद्दे पर ट्रंप को जनता से स्पष्ट समर्थन नहीं मिल रहा है।


    ट्रंप से नाखुश लेकिन डेमोक्रेट्स पर भरोसा नहीं

    सर्वे के अनुसार, अधिकतर लोग ट्रंप से नाखुश हैं, लेकिन अमेरिकी कांग्रेस में डेमोक्रेट्स पर भी पूरा भरोसा नहीं है। दरअसल, जब लोगों से पूछा गया कि देश की सबसे बड़ी समस्याओं को सुलझाने के लिए वे किस पर ज्यादा भरोसा करते हैं, तो राय लगभग बराबर बंट गई। ट्रंप (33%), डेमोक्रेट्स (31%), या ‘दोनों में से कोई नहीं’ (31%)। सर्वे रिपोर्ट से साफ है कि कई अमेरिकी दोनों पक्षों से नाखुश हैं।

    सर्वे के अनुसार, ट्रंप को सबसे कम समर्थन डेमोक्रेट्स और निर्दलीय (इंडिपेंडेंट) मतदाताओं से मिला, जिन्होंने लगभग हर मुद्दे पर उनसे असहमति जताई। इतना ही नहीं, रिपब्लिकन पार्टी में भी मतभेद हैं। रिपोर्ट के अनुसार, मेक अमेरिका ग्रेट अगेन (MAGA) आंदोलन के मजबूत समर्थक ज्यादातर ट्रंप के फैसलों से सहमत थे, लेकिन MAGA से खुद को अलग मानने वाले रिपब्लिकन अधिक आलोचनात्मक थे, खासकर महंगाई और विदेश नीति जैसे मुद्दों पर। कुल मिलाकर, ट्रंप की अस्वीकृति दर लगभग 60% है, जो उनके दूसरे कार्यकाल में अब तक की सबसे ऊंची दरों में से एक है और 2021 में पद छोड़ते समय वाली दर के बराबर है।


    ट्रंप के सत्ता संभालने के हालात और हुए खराब

    इस बीच, अर्थव्यवस्था को लेकर लोगों का नजरिया भी निराशाजनक है। लगभग आधे अमेरिकियों का कहना है कि ट्रंप के सत्ता संभालने के बाद हालात और खराब हुए हैं। सिर्फ करीब 3% लोगों ने कहा कि अर्थव्यवस्था में सुधार हुआ है। सर्वेक्षण में शामिल केवल 22% लोगों ने ही आर्थिक रूप से खुद को बेहतर महसूस किया, जबकि अधिकांश ने कहा कि उनकी स्थिति पहले जैसी है या और खराब हो गई है।

    सर्वेक्षण में ट्रंप की राष्ट्रपति बनने की योग्यता पर भी सवाल उठे। सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक, आधे से ज्यादा अमेरिकियों ने कहा कि उनमें राष्ट्रपति बनने के लिए जरूरी मानसिक क्षमता नहीं है, और लगभग आधे ने कहा कि वे शारीरिक रूप से भी पूरी तरह स्वस्थ नहीं हैं। रिपब्लिकन इस पर काफी हद तक असहमत थे, लेकिन डेमोक्रेट्स और निर्दलीय मतदाताओं ने इन चिंताओं को मजबूती से साझा किया।

    भरोसा भी एक बड़ी समस्या है। लगभग 70% अमेरिकियों (दस में से सात) ने कहा कि ट्रंप ईमानदार या भरोसेमंद नहीं हैं। कई लोगों का मानना है कि वे राष्ट्रपति पद का दुरुपयोग अपने निजी फायदे के लिए कर रहे हैं, और अधिकांश को लगता है कि उन्होंने अपनी कानूनी शक्तियों का उल्लंघन किया है। वहीं, खास कार्रवाइयों के बारे में ज्यादातर अमेरिकी बच्चों के लिए अनुशंसित टीकों में कटौती का विरोध करते हैं और अन्य देशों में बदलाव लाने के लिए अमेरिकी सेना के इस्तेमाल का समर्थन नहीं करते। कई लोगों का यह भी मानना है कि प्रशासन जेफरी एपस्टीन फाइलों जैसे संवेदनशील मामलों पर पारदर्शी नहीं रहा है। बता दें कि यह सर्वेक्षण अमेरिका भर में 2500 से ज्यादा वयस्कों पर किया गया है।

  • US में हिंदू सबसे अधिक शिक्षित धार्मिक समुदाय, प्यू रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट में हुआ खुलासा

    US में हिंदू सबसे अधिक शिक्षित धार्मिक समुदाय, प्यू रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट में हुआ खुलासा


    वाशिंगटन।
    अमेरिका (America) में हिंदू सबसे अधिक शिक्षित धार्मिक समूह (Hindus most Educated Religious Group) हैं। प्यू रिसर्च सेंटर (Pew Research Center) की नई रिपोर्ट (New report ) से यह सामने आया है। 2023-24 के रिलिजियस लैंडस्केप स्टडी (RLS) में पाया गया कि यूएस में रहने वाले 70 प्रतिशत हिंदू वयस्कों के पास कम से कम बैचलर डिग्री या उससे उच्च शिक्षा है। यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है, जहां सभी अमेरिकी वयस्कों में मात्र 35 प्रतिशत के पास ही बैचलर डिग्री या उससे ज्यादा है। यह अध्ययन अमेरिका में धर्म और सार्वजनिक जीवन पर सबसे व्यापक सर्वेक्षणों में से एक माना जाता है, जिसमें 36908 वयस्कों से जुलाई 2023 से मार्च 2024 तक जानकारी ली गई।

    रिपोर्ट 19 फरवरी 2026 को जारी की गई। हिंदू समुदाय की यह उपलब्धि इमिग्रेशन पैटर्न से जुड़ी हुई है, क्योंकि अधिकांश हिंदू उच्च शिक्षा या कुशल वीजा के माध्यम से अमेरिका आए हैं। इस अध्ययन में हिंदुओं के बाद यहूदी दूसरे स्थान पर हैं, जहां 65 प्रतिशत वयस्कों के पास बैचलर डिग्री या उससे अधिक शिक्षा है। मुसलमान, बौद्ध और ऑर्थोडॉक्स ईसाई भी राष्ट्रीय औसत से ऊपर हैं। इनमें 40 प्रतिशत से अधिक (मुसलमानों में 44 प्रतिशत) वयस्कों के पास उच्च शिक्षा है। ये अल्पसंख्यक धार्मिक समूह अमेरिकी आबादी का छोटा हिस्सा हैं- हिंदू लगभग 0.5-1 प्रतिशत, मुसलमान 1-1.3 प्रतिशत और यहूदी लगभग 2 प्रतिशत।

    ईसाई समुदाय कुल आबादी का 70%
    अमेरिका में ईसाई समुदाय कुल आबादी का बड़ा हिस्सा लगभग 70 प्रतिशत है, लेकिन उनके कई उपसमूह जैसे इवैंजेलिकल प्रोटेस्टेंट (29 प्रतिशत) और ऐतिहासिक रूप से ब्लैक प्रोटेस्टेंट (24 प्रतिशत) में कॉलेज ग्रेजुएट्स का प्रतिशत राष्ट्रीय औसत से कम है। रिपोर्ट बताती है कि शिक्षा स्तर में अंतर मुख्य रूप से इमिग्रेशन और जनसांख्यिकीय कारकों से जुड़ा है। हिंदू, मुसलमान और बौद्ध समुदायों में से अधिकांश विदेशी मूल के हैं, जो अमेरिका में उच्च शिक्षा या स्किल्ड जॉब वीजा पर आते हैं। इससे इन समूहों में उच्च शिक्षित व्यक्तियों का अनुपात बढ़ जाता है। उदाहरण के लिए हिंदुओं में 77 प्रतिशत विदेश में जन्मे हैं।

    रिसर्च के नतीजे क्या कह रहे
    यह पैटर्न दिखाता है कि अमेरिका की इमिग्रेशन नीतियां कुशल और शिक्षित प्रवासियों को आकर्षित करती हैं, जिससे छोटे धार्मिक समूहों में शिक्षा का स्तर ऊंचा रहता है। कुल मिलाकर यह अध्ययन US में धार्मिक विविधता और शिक्षा के बीच संबंध को उजागर करता है। हिंदू और यहूदी जैसे समूह सबसे आगे हैं, जबकि मुसलमान और अन्य अल्पसंख्यक भी औसत से बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। यह निष्कर्ष अमेरिकी समाज में अल्पसंख्यक समुदायों की सफलता और योगदान को सामने रखता है। साथ ही, इमिग्रेशन के सकारात्मक प्रभाव को भी दर्शाता है।

  • अमेरिका-ईरान तनाव चरम पर? सुप्रीम लीडर खामेनेई का बड़ा दांव, लारिजानी को सौंपी अहम जिम्मेदारी

    अमेरिका-ईरान तनाव चरम पर? सुप्रीम लीडर खामेनेई का बड़ा दांव, लारिजानी को सौंपी अहम जिम्मेदारी


    नई दिल्ली । मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और संभावित टकराव की आशंकाओं के बीच ईरान की सत्ता संरचना में बड़ा फेरबदल देखने को मिला है। रिपोर्ट के मुताबिक ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई ने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े व्यापक अधिकार अपने भरोसेमंद सहयोगी अली लारीजानी को सौंप दिए हैं। इस कदम को संभावित युद्ध परिस्थिति में कमान को केंद्रीकृत करने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।

    लारिजानी के हाथ में सैन्य और कूटनीतिक कमान

    रिपोर्ट के अनुसार लारिजानी अब सुरक्षा सैन्य संचालन और कूटनीतिक पहलुओं से जुड़े अहम फैसले लेने की स्थिति में हैं। वे सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के प्रमुख पद पर रहते हुए परमाणु वार्ताओं क्षेत्रीय सहयोगियों से समन्वय और आंतरिक सुरक्षा व्यवस्थाओं की निगरानी कर रहे हैं। माना जा रहा है कि संभावित संघर्ष की स्थिति में तेज और एकीकृत निर्णय प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए यह बदलाव किया गया है।

    राष्ट्रपति की भूमिका सीमित उत्तराधिकार की तैयारी
    ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन की भूमिका इस बदलाव के बाद अपेक्षाकृत सीमित बताई जा रही है। विश्लेषकों का मानना है कि शीर्ष नेतृत्व ने आकस्मिक परिस्थितियों यहां तक कि नेतृत्व स्तर पर किसी अप्रत्याशित घटना को ध्यान में रखते हुए उत्तराधिकार की बहुस्तरीय व्यवस्था पर काम शुरू किया है। सेना को हाई अलर्ट पर रखने मिसाइल सिस्टम की रणनीतिक तैनाती और आंतरिक सुरक्षा बलों को तैयार रखने की खबरें भी सामने आई हैं।

    होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ी गतिविधियां
    रणनीतिक दृष्टि से अहम  क्षेत्र में ईरान की सैन्य गतिविधियों में तेजी देखी जा रही है। मिसाइल परीक्षण और नौसैनिक अभ्यासों की खबरों ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। यह जलमार्ग विश्व के बड़े हिस्से के तेल निर्यात का प्रमुख रास्ता है इसलिए यहां की हलचल का असर अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर भी पड़ सकता है।

    क्षेत्रीय समीकरण और वैश्विक नजर

    मध्य पूर्व पहले से ही संवेदनशील भू-राजनीतिक समीकरणों का केंद्र रहा है। ऐसे में तेहरान का यह कदम संकेत देता है कि ईरान संभावित टकराव की आशंका को गंभीरता से ले रहा है। हालांकि आधिकारिक स्तर पर व्यापक युद्ध की पुष्टि नहीं हुई है लेकिन सैन्य और सुरक्षा ढांचे में यह पुनर्संरचना बताती है कि देश किसी भी आपात स्थिति के लिए तैयार रहने की रणनीति अपना रहा है।