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  • इलाज न मिलने से भारतीय मूल के शख्स की मौत पर कनाडा को भारत के विदेश मंत्रालय ने सुनाई खरी-खरी

    इलाज न मिलने से भारतीय मूल के शख्स की मौत पर कनाडा को भारत के विदेश मंत्रालय ने सुनाई खरी-खरी

    नई दिल्‍ली। कनाडा में भारतीय मूल के शख्स की कथित चिकित्सकीय लापरवाही से हुई मौत पर भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रधीर जायसवाल ने शुक्रवार को दो टूक कहा कि इस मामले की जिम्मेदारी कनाडा सरकार को लेनी ही चाहिए। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता साप्ताहिक प्रेस ब्रीफिंग में बताया कि मृतक भारतीय मूल का था, लेकिन वह कनाडा का नागरिक था।
    उन्होंने कहा, “व्यक्ति भले ही भारतीय मूल का था, लेकिन वह कनाडा का नागरिक था। इसलिए इस मामले में कनाडा सरकार की जिम्मेदारी बनती है।”

    मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 44 वर्षीय प्रशांत श्रीकुमार की कनाडा के एडमंटन शहर के ग्रे नन्स अस्पताल में इलाज का इंतजार करते हुए मौत हो गई। वह पेशे से अकाउंटेंट थे और तीन बच्चों के पिता थे। 22 दिसंबर को काम के दौरान उन्हें सीने में तेज दर्द हुआ, जिसके बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया। आरोप है कि गंभीर दर्द की शिकायत के बावजूद डॉक्टरों ने इसे गंभीर नहीं माना और उन्हें आठ घंटे से ज्यादा समय तक इंतजार कराया, जिससे उनकी मौत हो गई।
    ‘पापा, मैं दर्द सहन नहीं कर पा रहा’

    प्रशांत के पिता कुमार श्रीकुमार ने बताया, ‘‘उसने मुझसे कहा, ‘पापा, मैं दर्द सहन नहीं कर पा रहा हूं।’ उसने अस्पताल कर्मियों को भी बताया कि उसे असहनीय दर्द हो रहा है।” परिजनों के अनुसार, इसके बाद अस्पताल में प्रशांत का इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम (ईसीजी) किया गया था, लेकिन उन्हें बताया गया कि रिपोर्ट में कोई भी दिक्कत की बात सामने नहीं आई है और उन्हें इंतजार करने को कहा गया। उन्होंने बताया कि इस दौरान उनके बेटे को दर्द के लिए ‘टाएलेनॉल’ दवा दी गई। कुमार ने बताया कि वह इंतज़ार करता रहा, नर्से थोड़े अंतराल पर प्रशांत का रक्तचाप जांचती रहीं। कुमार ने बताया कि आठ घंटे से अधिक समय बीतने के बाद प्रशांत को उपचार के लिए बुलाया गया।
    परिवार में पत्नी और तीन बच्चे

    कुमार ने बताया, ‘‘बैठने के बाद 10 सेकंड ही बीते होंगे, उसने मुझे देखा, खड़ा हुआ, अपना हाथ सीने पर रखा और गिर पड़ा।’’ रिपोर्ट के अनुसार नर्सों ने चिकित्सकों को बुलाया लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी, प्रत्यक्ष तौर पर हृदयाघात से उनकी मौत हो गई। प्रशांत के परिवार में पत्नी और तीन बच्चे हैं जिनकी उम्र तीन, 10 और 14 वर्ष है।
    भारतीय छात्र की गोली मारकर हत्या मामले पर भी प्रतिक्रिया

    इसी ब्रीफिंग में विदेश मंत्रालय ने कनाडा में भारतीय छात्र की गोली मारकर हत्या पर भी गहरा दुख जताया।

    MEA ने कहा कि भारतीय दूतावास पीड़ित परिवार के संपर्क में है और हर संभव मदद की जा रही है। मृतक छात्र की पहचान शिवांक अवस्थी के रूप में हुई है, जो टोरंटो विश्वविद्यालय में पीएचडी का छात्र था। मंगलवार को यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो के स्कारबरो कैंपस के पास उसका शव मिला। पुलिस के अनुसार, उसे गोली मारी गई थी और इस मामले को हत्या मानकर जांच की जा रही है।

    रणधीर जायसवाल ने कहा, “यह एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना है। हम पीड़ित परिवार के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हैं और स्थानीय अधिकारियों के साथ मिलकर मामले की जानकारी जुटा रहे हैं।” इन दोनों घटनाओं के बाद कनाडा में भारतीय समुदाय की सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

  • पिछले 6 माह में बिगड़े भारत से रिश्ते… अमेरिकी ही कर रहे राष्ट्रपति ट्रंप की नीति का विरोध

    पिछले 6 माह में बिगड़े भारत से रिश्ते… अमेरिकी ही कर रहे राष्ट्रपति ट्रंप की नीति का विरोध


    वाशिंगटन।
    भारत (India) और अमेरिका (America) के रिश्ते पिछले 6 महीनों से लगातार खराब स्थिति में हैं। ऑपरेशन सिंदूर (Operation Sindoor) के बाद भारत ने खुले तौर पर अमेरिकी बयानों का विरोध किया, जिसके परिणाम स्वरूप ट्रंप प्रशासन (Trump Administration) ने पाकिस्तान (Pakistan) के साथ अपनी नजदीकी बढ़ाते हुए भारत पर आर्थिक हमला करने की कोशिश की। राष्ट्रपति ट्रंप की इस नीति का अमेरिका में ही कई लोगों ने विरोध किया, यहां तक कि उनके सहयोगियों ने भी भारत को लेकर अपनाई जा रही इस नीति का विरोध ही किया। अब अमेरिकी वैश्विक मामलों के जानकार, लेखक और प्रोफेसर फ्रांसिस फुकुयामा ने ट्रंप की इस नीति को लेकर उन पर हमला बोला है। उन्होंने कहा कि ट्रंप ने अपने निजी व्यवहार के लिए अमेरिका के हितों को दरकिनार कर दिया।

    एक इंटरव्यू के दौरान ट्रंप प्रशासन की विदेश नीति पर बात करते हुए प्रोफेसर ने कहा कि उनकी वैश्विक नीति क्या है इस पर कुछ भी नहीं कहा जा सकता। उन्होंने कहा, “ट्रंप की वैश्विक नीति निजी लाभ पर आधारित है। उदाहरण के लिए पिछले 20 से 30 वर्षों में अमेरिका में किसी की भी सरकार रही हो, वह भारत के साथ बेहतर रिश्ते बनाने की कोशिश करती रही है। क्योंकि हम दक्षिण एशिया में चीन को काउंटर करना चाहते हैं। लेकिन ट्रंप ने भारत के साथ रिश्तों को केवल इसलिए खराब कर दिया क्योंकि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें नोबेल पीस प्राइज के लिए समर्थन नहीं किया था।”

    प्रोफेसर ने कहा, “ट्रंप के इस फैसले से आप पूरी तरह से समझ सकते हैं कि कैसे उन्होंने अपने निजी लाभ के लिए अमेरिकी हितों को अलग रख दिया। ऐसे में अगर कोई यह सोच रहा है कि ट्रंप प्रशासन की कोई वैश्विक नीति होगी, तो वह परेशान ही होगा।”

    आपको बता दें, इस साल जनवरी में जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सत्ता में आए थे, तो भारत में लोगों की राय यह थी कि भारत और अमेरिका के रिश्ते सही होंगे। ट्रंप और पीएम मोदी की निजी दोस्ती दोनों देशों के बीच में मजबूत साझेदारी का आधार बनेगी। शुरुआती समय में ऐसा दिखा भी। लेकिन मई के महीने में सबकुछ बदल गया।

    पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत की तरफ से किए गए ऑपरेशन सिंदूर पर ट्रंप टीम का बयान दोस्ती वाला नहीं था। भारत सरकार के ऐलान करने से पहले ही ट्रंप ने सोशल मीडिया के जरिए सीजफायर का ऐलान कर दिया। यह भारत सरकार के लिए असहज करने वाली स्थिति थी। इसके बाद ट्रंप लगातार इस बात को कहते रहे कि भारत और पाकिस्तान के बीच उन्होंने सीजफायर करवाया है, जबकि भारत ने शुरुआत से ही इस बात को कहा कि सीजफायर के लिए पाकिस्तानी डीजीएमओ की तरफ से फोन आया था इसके बाद यह हुआ।

    दोनों देशों के बीच बिगड़ती इस परिस्थिति का पाकिस्तान ने बड़ी अच्छी तरह से फायदा उठाया। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने खुले तौर पर इस सीजफायर के लिए ट्रंप को धन्यवाद किया और लगे हाथ उन्हें नोबेल पीस प्राइज के लिए समर्थन भी दे दिया। इस पूरे वाकये के बाद भारत और अमेरिका के संबंध लगातार गिरावट की तरफ जाने लगे। अमेरिका ने भारत के ऊपर 50 फीसदी टैरिफ लगा दिया। ट्रंप और उनकी टीम की तरफ से लगातार भारत के खिलाफ बयानबाजी की जाने लगी। भारत ने भी अपनी स्थिति को साफ किया और ट्रंप या अमेरिका के आगे किसी भी तरीके से झुकने से इनकार कर दिया।

    दरअसल, कश्मीर और पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय स्थिति पर भारत की स्थिति दशकों से साफ रही है कि भारत इसमें किसी भी तीसरे देश का दखल नहीं चाहता है। शिमला समझौते के तहत पाकिस्तान भी इस पर राजी है, लेकिन पाकिस्तान हमेशा से ही इस मुद्दे में तीसरे देश को शामिल करने के लिए तैयार रहता है। ऐसे में अगर पीएम मोदी नोबेल के लिए ट्रंप को समर्थन देते तो यह भारत की साख के लिए सही नहीं होता और न ही भारत के स्टैंड के मुताबिक होता।

  • इजरायल ने सोमालिलैंड को दी स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता…अफ्रीकी संघ ने किया विरोध

    इजरायल ने सोमालिलैंड को दी स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता…अफ्रीकी संघ ने किया विरोध


    येरूशलम।
    इजरायल (Israel) ने शुक्रवार को औपचारिक रूप से सोमालिलैंड (Somaliland) को एक स्वतंत्र देश (Independent Country) के रूप में मान्यता दे दी है। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (Prime Minister Benjamin Netanyahu) ने सोमालिया से अलग हुए इस देश को मान्यता देने के का ऐलान करते हुए यहां के राष्ट्रपति अब्दिरहमान मोहम्मद अब्दुल्लाही (President Abdirahman Mohamed Abdullahi) को इजरायल के आधिकारिक दौरे का न्यौता भी दिया। गौरतलब है कि यह देश सोमालिया में चल रहे गृहयुद्ध के बाद अलग हुआ है, यह काफी समय से एक अलग देश के रूप में अपनी सत्ता चला रहा है। वहीं, दूसरी ओर अफ्रीकी संघ ने इजरायल के इस फैसले का विरोध किया है।

    टाइम्स ऑफ इजरायल की एक रिपोर्ट के अनुसार सोमालिया से अलग हुए इस क्षेत्र को 30 साल से अधिक समय के बाद किसी देश ने आधिकारिक तौर पर मान्यता दी है। इस ऐतिहासिक घोषणा पत्र पर प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और इजरायली विदेश मंत्री गिदेओन साआर ने हस्ताक्षर किए, जबकि सोमालिलैंड की तरफ से राष्ट्रपति अब्दुल्लाही ने।

    दोनों ही नेताओं ने इस मान्यता पत्र को ऐतिहासिक पल बताया। नेतन्याहू ने कहा कि इस क्षण से दोनों देशों के बीच में ऐतिहासिक मित्रता की शुरुआत होती है। दोनों देश आर्थिक क्षेत्रों , कृषि और सामाजिक विकास जैसे क्षेत्रों में साथ मिलकर काम करेंगे। इजरायल का यह फैसला अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप के पहले कार्यकाल में हुए अब्राहम अकॉर्ड की भावनाओं के अनुरूप है। इजरालय से मान्यता मिलने के बाद सोमालिलैंड ने कहा है कि वह भी इस समझौते में शामिल होना चाहता है। राष्ट्रपति ने एक्स पर अपनी खुशी जाहिर करते हुए लिखा कि यह दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी की शुरुआत है। उन्होंने कहा, “यह एक ऐतिसाहिक क्षण है। हम इसका गर्मजोशी के साथ स्वागत करते हैं।” सोमालिलैंड की राजधानी हरगेसा में भी लोगों ने इजरायल के इस कदम का स्वागत किया और सड़कों पर आकर जश्न मनाया।


    अफ्रीकी संघ, सोमालिया समेत कई देशों ने जताई आपत्ति

    इजरायल की नेतन्याहू सरकार के इस फैसले की कई देशों ने निंदा की है। सोमालिया ने इसे उसकी संप्रभुता पर जानबूझकर किया गया हमला बताया। सोमालिया के विदेश मंत्री ने कहा कि इस फैसले की वजह से क्षेत्र की शांति कमजोर होगी। वहीं, अफ्रीकी संघ ने कड़े शब्दों में इसकी निंदा करते हुए इस कदम को पूरी तरह से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि सोमालिलैंड नामक क्षेत्र अफ्रीकी महासंघ के सदस्य सोमालिया का अभिन्न हिस्सा है। उन्होंने कहा, “सोमालिया की एकता, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को कमजोर करने की कोई भी कोशिश एक खतरनाक मिसाल का काम कर सकती है, जिससे पूरे महाद्वीप की शांति और स्थिरता पर दूरगामी प्रभाव होगा।

    गृहयुद्ध से जूझ रहे सोमालिया के मुख्य सहयोगी तुर्किए ने इजरायल के इस फैसले का विरोध किया है। तुर्किए के विदेश मंत्रालय ने कहा कि इजरायल की यह पहल उसकी विस्तारवादी नीति से मेल खाती है। यह सोमालिया के आंतरिक मामलों में खुला हस्तक्षेप है। तुर्किए सोमालिया की एकता, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है।


    क्या है सोमालिलैंड की कहानी?

    अफ्रीकी महाद्वीप के हॉर्न पर बसे सोमालिया के अंतर्गत माने जाने वाले सोमालिलैंड को मान्यता देने वाला इजरायल पहला देश बना है। अभी तक इस क्षेत्र को किसी भी देश ने स्वतंत्र देश की मान्यता नहीं दी है। हालांकि, ब्रिटेन इथियोपिया, तुर्किए, यूएई,डेनमार्क, कीनिया और ताइवान जैसे देशों के साथ उसके अनौपचारिक राजनयिक संबंध हैं।

    ऐतिहासिक दृष्टि से 1960 के दशक में सोमालिलैंड को कुछ समय के लिए स्वतंत्रता मिली थी और उस समय इजरायल समेत कुल 35 देशों ने उसे मान्यता दी थी। लेकिन फिर बाद में वह स्वेच्छा से सोमालिया के साथ एकीकृत हो गया था। बाद में जब 1991 में सोमालिया गृहयुद्ध में उलझ गया तो सोमालिलैंड ने फिर से खुद को स्वतंत्र घोषित कर लिया। तब से लेकर अभी तक सोमालिलैंड एक अलग राज्य के रूप में ही काम कर रहा है। इसकी अपनी सरकार, अपनी मुद्रा और सुरक्षा बल है। सोमालिया के लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष के विपरीत सोमालिलैंड में अपेक्षाकृत शांत और स्थिर शासन देखने को मिलता है।


    क्या हैं इसके मायने?

    इजरायल का यह फैसला एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा है। विश्लेषकों के अनुसार, सोमालिलैंड की भौगौलिक स्थिति महत्वपूर्ण है। रेड सी के पास इजरायल को साझेदारों की जरूरत है। इन साझेदारों की मदद से वह भविष्य में यमन के हूती विद्रोहियों के खिलाफ कार्रवाई कर सकता है। इसके अलावा अब्राहम अकॉर्ड में एक और देश के शामिल होने से इजरायल को भी इसका लाभ होगा। हालांकि, इससे अन्य देश भड़क भी सकते हैं। वहीं,दूसरी ओर सोमालिलैंड पिछले 30 साल से अंतर्राष्ट्रीय मान्यता पाने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में इजरायल की तरफ से मिली यह मान्यता उसके लिए एक बड़ी संभावना की तरह है। मान्यता के बिना यह क्षेत्र गंभीर गरीबी से जूझ रहा है। क्योंकि इसे विदेशी लाभ भी लगभग न के बराबर मिलता है।

  • बांग्लादेश में राजनीतिक दलों के मुस्लिम समर्थक कट्टरपंथी दिखने की होड़ में हैंपूर्व राजदूत महेश सचदेवा

    बांग्लादेश में राजनीतिक दलों के मुस्लिम समर्थक कट्टरपंथी दिखने की होड़ में हैंपूर्व राजदूत महेश सचदेवा


    नई दिल्ली । बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के कार्यवाहक अध्यक्ष तारिक रहमान ने 17 सालों के बाद घर वापसी की है। रहमान ने घर लौटने पर मिले गर्मजोशी भरे स्वागत के लिए देश के लोगों का दिल से शुक्रिया अदा किया। दूसरी ओर बांग्लादेश में हफ्तेभर में लगातार दूसरे अल्पसंख्यक हिंदू की हत्या का मामला सामने आया है। इन मुद्दों को लेकर पूर्व राजदूत महेश सचदेवा ने आईएएनएस से खास बातचीत की।

    पूर्व राजदूत महेश सचदेवा ने कहाकुछ हफ्तों में हिंदू युवक की हत्या की यह दूसरी घटना सामने आई हैजिसमें ज्यादातर सांप्रदायिक नफरत की वजह से हत्या की गई है। इससे कई तरह की चिंताएं पैदा हुई हैं। सबसे पहलेइससे पता चलता है कि बांग्लादेश की अंतरिम सरकार कानून-व्यवस्था बनाए रखने और सुरक्षा पक्की करने के लिए संघर्ष कर रही है।

    उन्होंने आगे कहादूसरा यह बांग्लादेश के राजनीतिक माहौल में गहरी पैठ जमाए हुए ‘इस्लामवाद’ को दिखाता हैजिसमें पार्टियां अपने विरोधियों से ज्यादा मुस्लिम समर्थक और कट्टरपंथी दिखने की होड़ में हैं। तीसराइससे यह सवाल उठता है कि क्या 12 फरवरी के चुनाव के बाद सांप्रदायिक दुश्मनी की यह लहर कम हो जाएगी या अगर ये ताकतें सत्ता में आती हैंतो क्या हालात और बिगड़ सकते हैं।

    तारिक रहमान की वापसी को लेकर महेश सचदेवा ने कहा17 साल के निर्वासन के बादतारिक रहमान बांग्लादेश लौट आए हैं। इस बात का चुनावी प्रक्रिया पर असर पड़ सकता हैक्योंकि 12 फरवरी के चुनाव में बीएनपी को सबसे आगे देखा जा रहा है। उन्होंने सुलह वाली बातें कहीइस बात पर जोर दिया कि बांग्लादेश मुसलमानों और ईसाइयों समेत सभी का है। निर्वासन के दौरान देश के विकास की तारीफ की और अवामी लीग सरकार के सुधारों को भी माना। जानकार बांग्लादेश की मौजूदा उथल-पुथल के बीच भारत और उनके आर्थिक और सामाजिक एजेंडे पर नरम रुख पर नजर रख रहे हैं।

    बता देंढाका नॉर्थ सिटी यूनिट ने पुरबाचल इलाके में जुलाई 36 एक्सप्रेसवे पर बीएनपी ने सफाई अभियान चलाया। इस सड़क का इस्तेमाल तारिक रहमान की रैली के लिए किया गया था। जुलाई 36 एक्सप्रेसवे को 300-फीट रोड के नाम से जाना जाता है। सफाई अभियान के दौरान ढाका नॉर्थ सिटी कॉर्पोरेशन डीएसीसी के वर्करपार्टी कार्यकर्ता और 300 किराए के सफाई कर्मचारी शामिल रहे और कचरे-मलबे को हटाया।

    ढाका नॉर्थ बीएनपी के संयोजक अमीनुल हक ने इस अभियान का नेतृत्व किया। कचरे को जल्दी हटाने के लिए सोलह ट्रक किराए पर लिए गए। इसके अलावाराजधानी के अलग-अलग इलाकों से 300 सफाई कर्मचारी लाए गए। इस बीचडीएनसीसी के सफाई कर्मचारी भी सड़क से कचरा साफ करने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं।

  • चीन बना रहा बांग्लादेश-म्यांमार में मिलिट्री बेस… पेंटागन रिपोर्ट में भारत को दी गई सतर्क रहने की सलाह

    चीन बना रहा बांग्लादेश-म्यांमार में मिलिट्री बेस… पेंटागन रिपोर्ट में भारत को दी गई सतर्क रहने की सलाह


    वाशिंगटन।
    अमेरिकी रक्षा विभाग (US Department of Defense) की नई रिपोर्ट को लेकर इन दिनों भारत से लेकर चीन तक में हलचल मची हुई है। इस रिपोर्ट में अमेरिका ने भारत को चीन से सतर्क रहने की हिदायत (India advised wary of China) दी है। अमेरिका का कहना है कि चीन भारत के साथ दोहरे मापदंड अपना रहा है। पेंटागन की रिपोर्ट में यह दावा भी है कि चीन अमेरिका और भारत को करीब नहीं आने देना चाहता। चीन ने इस रिपोर्ट पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि चीन और भारत के आपसी मामलों में अमेरिका को दूर रहना चाहिए। हालांकि अगर भारत के लिहाज से देखा जाए, तो रिपोर्ट में कुछ ऐसे मसले भी हैं, जो भारत की चिंताएं बढ़ा सकते हैं।

    पेंटागन की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन अफ्रीका के जिबूती में मौजूद अपने इकलौते विदेशी मिलिट्री बेस के अलावा कई अन्य देशों में भी सैन्य ठिकाने बनाने की संभावना तलाश रहा है। इन देशों में भारत के कुछ पड़ोसी देश का नाम भी शामिल है। इन देशों में बांग्लादेश, श्रीलंका और म्यांमार का नाम भी जिक्र है, जहां चीन संभावित सैन्य अड्डों पर विचार कर रहा है। रिपोर्ट में पाकिस्तान का भी जिक्र है। हालांकि चीन के साथ पुराने रणनीतिक संबंधों के कारण पाक को अलग श्रेणी में रखा गया है।

    स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स का हिस्सा
    विशेषज्ञों की मानें तो यह चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीतिक योजना का हिस्सा है। इसके तहत चीन हिंद महासागर क्षेत्र में कई बंदरगाहों पर अपना सैन्य नेटवर्क विकसित कर रहा है। इन रणनीतिक साझेदारियों का जाल बिछाकर चीन समुद्री रास्तों पर अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है।

    भारत के लिए क्यों चिंता?
    भारत हिंद महासागर को अपना रणनीतिक क्षेत्र मानता है। ऐसे में पड़ोसी देशों में चीन के सैन्य या लॉजिस्टिक ठिकाने, भले ही सीमित क्यों ना हों, नई सुरक्षा चुनौतियां पैदा कर सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे चीन को मलक्का स्ट्रेट और बंगाल की खाड़ी जैसे अहम समुद्री रास्तों के पास सैन्य मौजूदगी का मौका मिल सकता है। हालांकि ऐसे किसी भी के खतरे को देखते हुए भारत भी अपनी सुरक्षा तैयारियों को मजबूत कर रहा है।

  • शहबाज शरीफ के करीबी ने भारत को दी धमकी- 'हमारी मिसाइलें दूर नहीं, अल्हम्दुलिल्लाह बांग्लादेश…'

    शहबाज शरीफ के करीबी ने भारत को दी धमकी- 'हमारी मिसाइलें दूर नहीं, अल्हम्दुलिल्लाह बांग्लादेश…'


    नई दिल्ली । मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में बांग्लादेश ना सिर्फ पिछड़ता जा रहा है बल्कि पूरी तरह से पाकिस्तान के चंगुल में फंसता नजर आ रहा है. इसका असर भी दिखने लगा है, क्योंकि पाकिस्तान अब बांग्लादेश की सुरक्षा की बातें करने लगा है, जबकि भारत ने ही बांग्लादेश को पाकिस्तान के अत्याचारों से छुटकारा दिलाया था. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज के नेता कामरान सईद उस्मानी ने अब भारत को धमकी दी है. उस्मानी ने कहा कि अगर भारत ने बांग्लादेश पर हमला किया तो पाकिस्तान पूरी ताकत से ढाका के साथ खड़ा होगा. इसके अलावा कामरान ने मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए संघर्ष को लेकर भी बयान दिया. कामरान सईद उस्मानी ने पाकिस्तान के साथ बांग्लादेश का झंडा लगाकर एक वीडियो जारी किया है.
    शहबाज की पार्टी के नेता ने भारत को दी गीदड़भभकी
    वीडियो में कामरान सईद उस्मानी को भारत को गीदड़भभकी देते हुए सुना जा सकता है. उन्होंने कहा कि आज मैं राजनेता के तौर पर नहीं, बल्कि उस शख्स के रूप में बात कर रहा हूं, जो बांग्लादेश की मिट्टी, तारीख, कुर्बानी और जुर्रत को सलाम पेश करता है. मैंने जब 2021 में ये कैंपेन शुरू की थी तो मेरे साथ कोई नहीं था. आज अल्हम्दुलिल्लाह बांग्लादेश और पाकिस्तान एक साथ खड़े हैं. आज मैं कोई सियासी बयान नहीं दूंगा, बात करूंगा उस्माना की. जो एक सोच था जो एक जुर्रतमंद आवाज थी. वो कहता था बांग्लादेश को किसी देश की कॉलोनी नहीं बनने दूंगा. मैं बांग्लादेश के अंदर किसी की दादागिरी कबूल नहीं करूंगा.

    उस्मान हादी का जिक्र कर क्या कहा

    उस्मानी ने कहा, ‘सबसे बड़ा मसला इस क्षेत्र के अंदर यह है कि जब कोई मुसलमान नौजवान उठता है और एक प्रभावी अवाज बनता है तो उसको दबा दिया जाता है. ये जो भारतीय राजनेता बैठे हैं वो अवाम को खून चूसने के लिए उन्हें कभी भी गुलामी से आजाद नहीं करना चाहते. चाहें वह बांग्लादेश का पानी बंद करने की सूरत में हो, चाहें वो फितना-ए-ख्वारिज के नाम से मुसलमान को मुसलमान से लड़ाने की सूरत में हो. मुसलमान अब उनकी इस साजिश को बड़े अच्छे तरीके से जान गया है. अब पाकिस्तान और बांग्लादेश का बच्चा-बच्चा उस्मान हादी है. उस्मान हादी को तो शहीद कर दिया, लेकिन उसकी सोच को शहीद नहीं कर सके.
    कामरान सईद ने आगे कहा कि आज मुक्कमल तौर पर भारत को बांग्लादेशी अवाम रिजेक्ट कर चुकी है. मैं अपने बांग्लादेशी भाई-बहनों को कहना चाहता हूं कि हम आपके साथ खड़े हैं. अगर कोई देश बांग्लादेश पर दबाव डालने की कोशिश करेगा या फिर बांग्लादेश पर हमले की कोशिश करेगा तो पाकिस्तान की अवाम आपके साथ खड़ी होगी. पाकिस्तानी फौज और हमारे मिसाइल आपसे दूर नहीं हैं. कामरान ने शेखी बघराते हुए कहा कि ऑपरेशन बुनयान अल मरसूस के जरिए आपको जिस कदर नाकों चने चबवाए थे, वो दोबारा कर देंगे.

  • माधुरी दीक्षित की बहू दीक्षा जुनेजा के बोल्ड सीन से मचा तहलका वेब सीरीज ने उड़ाई रातों की नींद

    माधुरी दीक्षित की बहू दीक्षा जुनेजा के बोल्ड सीन से मचा तहलका वेब सीरीज ने उड़ाई रातों की नींद


    नई दिल्ली । बॉलीवुड की लिजेंड माधुरी दीक्षित इन दिनों अपनी नई वेब सीरीज मिसेज देशपांडे को लेकर चर्चा में हैं। इस सीरीज में माधुरी ने एक अलग तरह की भूमिका निभाई है लेकिन सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोर रही हैं उनकी ऑन-स्क्रीन बहू तन्वी का किरदार निभा रही अभिनेत्री दीक्षा जुनेजा।

    दीक्षा जुनेजा की एक्टिंग और स्क्रीन पर उनकी केमिस्ट्री ने इस सीरीज को और भी खास बना दिया है। खासकर पहले एपिसोड में दीक्षा और अभिनेता सिद्धार्थ चंदेकर के बीच फिल्माया गया एक बोल्ड सीन सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है। यह सीन दर्शकों के बीच चर्चा का विषय बन गया है और दीक्षा जुनेजा की लोकप्रियता में जबरदस्त इजाफा हुआ है।

    दीक्षा का करियर भी काफी दिलचस्प रहा है। वह पहले एक महिला पत्रकार थीं लेकिन बाद में उन्होंने एक्टिंग की दुनिया में कदम रखा। ओटीटी प्लेटफॉर्म पर अपनी पहचान बनाने के बाद उन्होंने मिसेज देशपांडे में अपनी एक्टिंग से दर्शकों का दिल जीत लिया। इससे पहले वह सारे जहां से अच्छा सीरीज में भी नसीमा के किरदार में नजर आ चुकी हैं।

    दीक्षा जुनेजा अपनी स्टाइल और ग्लैमरस अंदाज के लिए भी सोशल मीडिया पर फेमस हैं। उनकी तस्वीरें और अपडेट्स हमेशा वायरल होते रहते हैं और उनके फैंस उन्हें बेहद पसंद करते हैं। यदि आप भी इस सीरीज को देखना चाहते हैं तो मिसेज देशपांडे जियो हॉटस्टार पर उपलब्ध है। छह एपिसोड की यह सस्पेंस और इमोशन से भरपूर सीरीज आपको अंत तक बांधे रखेगी।

  • भारत से रिश्ते सुधारने के प्रयास…. यूनुस सरकार ने 50000 टन चावल खरीदने के प्रस्ताव को दी मंजूरी

    भारत से रिश्ते सुधारने के प्रयास…. यूनुस सरकार ने 50000 टन चावल खरीदने के प्रस्ताव को दी मंजूरी


    ढाका।
    बांग्लादेश (Bangladesh) की अंतरिम सरकार (Interim Government) के वित्त सलाहकार सालेहुद्दीन अहमद (Finance Advisor Salehuddin Ahmed) ने मंगलवार को कहा कि मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस (Muhammad Yunus) भारत के साथ तनावपूर्ण रिश्तों को आसान बनाने के लिए कदम उठा रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रशासन आर्थिक हितों को राजनीतिक बयानबाजी से अलग रखते हुए भारत के साथ व्यापारिक रिश्तों को आगे बढ़ाने पर काम कर रहा है।

    अहमद ने यह टिप्पणी अपने कार्यालय में सरकारी खरीद से जुड़े सलाहकार परिषद समिति की बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत में की। उन्होंने कहा कि मुख्य सलाहकार भारत के साथ राजनयिक रिश्तों में सुधार के लिए विभिन्न हितधारकों से संवाद कर रहे हैं। जब उनसे पूछा गया कि क्या यूनुस ने सीधे भारत से बात की है, तो अहमद ने कहा कि मुख्य सलाहकार ने सीधे तौर पर नहीं, लेकिन इस मसले से जुड़े लोगों से बातचीत जरूर की है।

    वित्त सलाहकार ने जोर देकर कहा कि बांग्लादेश की व्यापार नीति राजनीतिक कारणों से संचालित नहीं होती। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि भारत से चावल आयात करना वियतनाम या अन्य देशों की तुलना में सस्ता पड़ता है, तो आर्थिक दृष्टि से भारत से ही खरीदना उचित है। अहमद ने बताया कि भारत के बजाय वियतनाम से चावल मंगाने पर प्रति किलोग्राम लगभग 10 टका (0.082 अमेरिकी डॉलर) अधिक खर्च आता है।

    इस बीच, बांग्लादेश सरकार ने मंगलवार को भारत से 50,000 टन चावल खरीदने के प्रस्ताव को मंजूरी दी। अहमद ने कहा कि यह कदम दोनों देशों के बीच अच्छे संबंधों की दिशा में भी मददगार साबित हो सकता है, साथ ही इससे बांग्लादेश को आर्थिक लाभ भी होगा।

    अहमद की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब कूटनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ढाका और नई दिल्ली के बीच संबंध 1971 में पाकिस्तान से बांग्लादेश की स्वतंत्रता के बाद सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं। हाल के महीनों में दोनों देशों ने एक-दूसरे के राजनयिकों को तलब किया है और दोनों राजधानियों समेत विभिन्न स्थानों पर विरोध-प्रदर्शन भी हुए हैं।

    हालांकि, वित्त सलाहकार ने इन आकलनों से आंशिक रूप से असहमति जताई। उन्होंने कहा- स्थिति इतनी खराब नहीं हुई है। उनके अनुसार, बाहरी तौर पर भले ही ऐसा लगे कि कई तरह की घटनाएं हो रही हैं, लेकिन कुछ बयान ऐसे होते हैं जिन्हें पूरी तरह रोका नहीं जा सकता।

    जब उनसे पूछा गया कि क्या लोग या बाहरी ताकतें भारत विरोधी बयान दे रही हैं, तो अहमद ने कहा कि बांग्लादेश किसी भी तरह की कड़वाहट नहीं चाहता। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि कोई बाहरी तत्व दोनों देशों के बीच तनाव भड़काने की कोशिश कर रहा है, तो यह किसी के भी हित में नहीं है।

    अहमद ने स्पष्ट किया कि ऐसे बयान या घटनाएं राष्ट्रीय अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं, बल्कि वे बांग्लादेश के लिए अनावश्यक रूप से जटिल हालात पैदा करती हैं। उनका कहना था कि सरकार का उद्देश्य व्यावहारिक और आर्थिक तर्कों के आधार पर फैसले लेना और पड़ोसी देशों के साथ स्थिर तथा सहयोगपूर्ण रिश्ते बनाए रखना है।

    बहरहाल, बांग्लादेश सरकार के इस रुख से संकेत मिलता है कि वह क्षेत्रीय स्थिरता और आर्थिक लाभ को प्राथमिकता देते हुए भारत के साथ संबंधों में सुधार की राह तलाश रही है, भले ही राजनीतिक बयानबाजी और कूटनीतिक तनावों की चुनौतियां बनी हुई हों।

  • US: अभी खत्म नहीं हुआ ट्रंप के Tariff का खेल, चाइना पर फिर फूटेगा टैरिफ बम

    US: अभी खत्म नहीं हुआ ट्रंप के Tariff का खेल, चाइना पर फिर फूटेगा टैरिफ बम


    वाशिगटन।
    डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ (Donald Trump Tariff) का खेल अभी खत्म नहीं हुआ है. अमेरिकी राष्ट्रपति (American President) एक बार फिर चीन पर टैरिफ लगाने (US Tariff On China) के लिए तैयार हैं और इसके लिए तारीख भी तय कर दी गई है. जी हां, अमेरिका चीन से आयात सेमीकंडक्टर चिप (Tariff On Chinese chips) टैरिफ बढ़ाने की तैयारी में है और लेकिन इसे 18 महीने के लिए अभी टाला गया है. चाइनीज चिप आयात पर ट्रंप कितना टैरिफ लगाएंगे इसकी दर भी कम से कम एक महीने पहले तय की जाएगी।


    18 महीने तक जीरो, फिर होगा फैसला

    न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका चीनी चिप्स पर टैरिफ में 18 महीने बाद बढ़ोतरी करेगा. Donald Trump प्रशासन ने मंगलवार को फेडरल रजिस्टर में दाखिल एक दस्तावेज में साफ किया है कि अमेरिका जून 2027 में चीनी सेमीकंडक्टर आयात पर टैरिफ बढ़ाएगा और इसके लागू होने से महीनेभर पहले Tariff Rate भी तय कर दिया जाएगा।

    डॉक्युमेंट्स के मुताबिक, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय द्वारा शेयर जानकारी में बताया गया है कि चीन से सेमीकंडक्टर आयात पर प्रारंभिक टैरिफ दर इन 18 महीनों के लिए शून्य (Zero Tariff) ही रहेगा. अमेरिका ने पाया है कि चीन सेमीकंडक्टर बिजनेस में अनुचित व्यापार प्रथाओं में लिप्त है. यह नोटिस पुराने चिप्स पर केंद्रित प्रोसेस का अगला चरण है, जो बिजनेस एक्ट की धारा 301 के तहत बाइडेन प्रशासन के दौरान शुरू हुई थी।


    23 जून की तारीख हो गई तय

    अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय की ओर से फाइलिंग में कहा गया है कि दशकों से China ने इस उद्योग पर अपना दबदबा कायम करने का टारगेट बनाकर तेजी से आक्रामक और व्यापक गैर-बाजार नीतियों को अपनाया है. हालांकि, नए टैरिफ को कम से कम 18 महीनों के लिए टालने का Donald Trump का निर्णय इस बात का संकेत भी देता है कि ट्रंप प्रशासन अमेरिका और चीन के बीच किसी भी व्यापारिक शत्रुता को कम करने की कोशिश कर रहा है.

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने बीते अक्टूबर महीने में ट्रेड टेंशन को खत्म करने के लिए एक करार किया था, जिसके अमेरिका ने कुछ Tariff Cut किया और चीन ने दुर्लभ पृथ्वी धातुओं (Rare Earth Metals) के निर्यात की अनुमति दी थी. अमेरिकी आयकर विभाग (USTR) द्वारा मंगलवार को दाखिल किए गए दस्तावेज में US Tariff On China की डेट 23 जून 2027 तय की गई है।

    टैरिफ के असर पर बारीक नजर
    NYT की रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि ट्रंप प्रशासन द्वारा टैरिफ बढ़ाने के लिए तय की गई 2027 की नई तारीख अमेरिकी कंपनियों को स्पष्टता प्रदान करती है, जिन्होंने कहा है कि वे इस बात पर बारीकी से नजर रख रही हैं कि अमेरिकी टैरिफ उनके व्यवसायों या आपूर्ति श्रृंखलाओं को कैसे प्रभावित (US Tariff Imapct) कर सकते हैं. ये टैरिफ कानून की धारा 232 के तहत ट्रंप प्रशासन द्वारा चीनी चिप्स आयात (China Cips Import) पर लगाए जाने वाले अन्य शुल्कों से अलग हैं।

  • तुर्किये में लीबिया के प्रतिनिधिमंडल को लेकर लौट रहा प्लेन क्रैश…आर्मी चीफ समेत 7 लोगों की मौत

    तुर्किये में लीबिया के प्रतिनिधिमंडल को लेकर लौट रहा प्लेन क्रैश…आर्मी चीफ समेत 7 लोगों की मौत


    अंकारा।
    तुर्किये (Turkey) में बड़ा विमान हादसा (Major Plane Crash) हो गया है। लीबिया (Libya ) के प्रधानमंत्री अब्दुल-हमीद दबीबे (Prime Minister Abdul-Hamid Dbeibeh) ने तुर्किये में हुए विमान हादसे में देश के सैन्य प्रमुख (मिलिट्री चीफ) मुहम्मद अली अहमद अल-हद्दाद (Military Chief Muhammad Ali Ahmed Al-Haddad) समेत सात लोगों की मौत की पुष्टि की है। यह हादसा मंगलवार शाम उस समय हुआ, जब लीबियाई प्रतिनिधिमंडल तुर्किये की राजधानी अंकारा से आधिकारिक दौरे के बाद अपने देश लौट रहा था।

    प्रधानमंत्री दबीबा की ओर से जारी बयान में इस घटना को दुर्घटनापूर्ण और बेहद दुखद बताते हुए कहा कि यह लीबिया के लिए एक बड़ी क्षति है। उन्होंने मृतकों के परिजनों के प्रति संवेदना भी व्यक्त की। लीबिया के सैन्य प्रमुख, चार अन्य अधिकारियों और तीन चालक दल के सदस्यों को ले जा रहा एक निजी विमान राजधानी अंकारा से उड़ान भरने के बाद दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें सवार सभी लोगों की मौत हो गई। लीबियाई अधिकारियों ने बताया कि दुर्घटना का कारण विमान में तकनीकी खराबी थी।


    तकनीकी खराबी के कारण टूटा संपर्क

    लीबिया के अधिकारियों के अनुसार उड़ान भरने के करीब 30 मिनट बाद विमान से संपर्क पूरी तरह टूट गया। प्रारंभिक जानकारी में कहा गया है कि यह संपर्क तकनीकी खराबी के कारण समाप्त हुआ। तुर्किये के अधिकारियों ने बताया कि लीबियाई प्रतिनिधिमंडल दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उच्च स्तरीय रक्षा वार्ता के लिए अंकारा में था।

    मलबा बरामद, हादसे की पुष्टि
    इससे पहले के गृह मंत्री अली येरलिकाया ने बताया था कि लीबियाई मिलिट्री चीफ और चार अन्य लोगों को ले जा रहे फाल्कन-50 श्रेणी के निजी जेट का मलबा अंकारा के पास बरामद कर लिया गया है। हालांकि, बाद में लीबिया के प्रधानमंत्री ने सभी के मारे जाने की आधिकारिक पुष्टि कर दी।

    इस दुर्घटना में मारे गए अन्य चार अधिकारी लीबिया के जमीनी बलों के प्रमुख जनरल अल-फितौरी गरैबिल, सैन्य विनिर्माण प्राधिकरण के प्रमुख ब्रिगेडियर जनरल महमूद अल-कतावी, चीफ ऑफ स्टाफ के सलाहकार मोहम्मद अल-असावी दियाब और चीफ ऑफ स्टाफ के कार्यालय में कार्यरत सैन्य फोटोग्राफर मोहम्मद उमर अहमद महजूब थे। तीनों चालक दल के सदस्यों की पहचान तुरंत पता नहीं चल पाई।

    उड़ान के तुरंत बाद हुआ हादसा
    तुर्किये के गृह मंत्री के मुताबिक, विमान ने मंगलवार शाम करीब 8:30 बजे अंकारा के एसेनबोगा एयरपोर्ट से उड़ान भरी थी। करीब 40 मिनट बाद एयर ट्रैफिक कंट्रोल का विमान से संपर्क टूट गया। इससे पहले विमान ने अंकारा के दक्षिण में स्थित हायमाना जिले के पास इमरजेंसी लैंडिंग का सिग्नल भेजा था। स्थानीय टीवी चैनलों पर दिखाए गए सुरक्षा कैमरा फुटेज में हायमाना क्षेत्र के आसमान में अचानक तेज रोशनी दिखाई दी, जिसे संभावित विस्फोट के रूप में देखा गया।

    तुर्किये दौरे पर थे अल-हद्दाद
    मुहम्मद अली अहमद अल-हद्दाद तुर्की के आधिकारिक दौरे पर अंकारा आए थे, जहां उन्होंने तुर्की के रक्षा मंत्री यासर गुलर और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात की थी। अल-हद्दाद पश्चिमी लीबिया के शीर्ष सैन्य कमांडर थे और संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में चल रहे लीबिया की बंटी हुई सेना को एकजुट करने के प्रयासों में उनकी अहम भूमिका मानी जाती थी।

    एयरपोर्ट बंद, उड़ानें डायवर्ट
    हादसे की खबर के बाद अंकारा एयरपोर्ट को अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया और कई उड़ानों को अन्य स्थानों पर डायवर्ट किया गया। फिलहाल हादसे के कारणों की जांच जारी है। इस घटना को लीबिया की सुरक्षा और राजनीति के लिहाज से गंभीर झटका माना जा रहा है।