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  • आर्थिक संकट से जूझ रहे Pak को बड़ी राहत.. वर्ल्ड बैंक ने भी दी 70 करोड़ डॉलर के कर्ज को मंजूरी

    आर्थिक संकट से जूझ रहे Pak को बड़ी राहत.. वर्ल्ड बैंक ने भी दी 70 करोड़ डॉलर के कर्ज को मंजूरी


    इस्लामाबाद।
    आर्थिक संकट (Economic crisis) से जूझ रहे पाकिस्तान (Pakistan) को अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से लगातार राहत मिल रही है। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund- IMF) से बड़ी राशि की मंजूरी के बाद अब वर्ल्ड बैंक (World Bank) ने भी पाकिस्तान के लिए करोड़ों डॉलर का ऐलान किया है। वर्ल्ड बैंक ने शुक्रवार को कहा कि उसने पाकिस्तान को 700 मिलियन डॉलर (70 करोड़ डॉलर) की वित्तीय सहायता को मंजूरी दे दी है। यह राशि एक बहुवर्षीय पहल के तहत दी जा रही है, जिसका उद्देश्य देश की मैक्रोइकोनॉमिक स्थिरता को मजबूत करना और सार्वजनिक सेवाओं की डिलीवरी में सुधार करना है।

    विश्व बैंक के मुताबिक, यह धनराशि समावेशी विकास के लिए सार्वजनिक संसाधन – बहु-चरणीय प्रोग्रामेटिक दृष्टिकोण (PRID-MPA) के अंतर्गत जारी की जाएगी। इस कार्यक्रम के तहत पाकिस्तान को कुल मिलाकर 1.35 अरब डॉलर तक की वित्तीय सहायता मिल सकती है। स्वीकृत 700 मिलियन डॉलर में से 600 मिलियन डॉलर केंद्र स्तर के कार्यक्रमों के लिए निर्धारित हैं, जबकि 100 मिलियन डॉलर दक्षिणी प्रांत सिंध में एक प्रांतीय कार्यक्रम को समर्थन देने के लिए दिए जाएंगे।

    यह मंजूरी ऐसे समय आई है, जब अगस्त महीने में विश्व बैंक ने पाकिस्तान के सबसे अधिक आबादी वाले प्रांत पंजाब में प्राथमिक शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए 47.9 मिलियन डॉलर का अनुदान भी स्वीकृत किया था।

    हालांकि, पाकिस्तान की आर्थिक चुनौतियों को लेकर अंतरराष्ट्रीय संस्थानों की चिंता भी सामने आ चुकी है। नवंबर में प्रकाशित IMF-विश्व बैंक की एक संयुक्त रिपोर्ट, जिसे पाकिस्तान के वित्त मंत्रालय ने अपनी वेबसाइट पर अपलोड किया था, में कहा गया कि देश में खंडित नियामक व्यवस्था, अपारदर्शी बजट प्रक्रिया और राजनीतिक दखल निवेश को प्रभावित कर रहे हैं और राजस्व संग्रह को कमजोर बना रहे हैं।

  • Pakistan: उत्तर वजीरिस्तान में सुसाइड बॉम्बर ने सैन्य चौकी को उड़ाया, 4 सैनिकों की मौत

    Pakistan: उत्तर वजीरिस्तान में सुसाइड बॉम्बर ने सैन्य चौकी को उड़ाया, 4 सैनिकों की मौत


    इस्लामाबाद।
    पाकिस्तान (Pakistan) के उत्तर-पश्चिमी इलाके उत्तर वजीरिस्तान (North Waziristan) में शुक्रवार को एक बड़ा आतंकी हमला (Major terrorist attack) हुआ। सुसाइड कार बॉम्बर (Suicide car bomber) और तीन बंदूकधारियों ने एक गांव के पास स्थित सैन्य चौकी पर हमला किया, जिसके बाद घंटों चली गोलीबारी में चार पाकिस्तानी सैनिक मारे गए। इस हमले में कम से कम 15 नागरिक घायल हो गए, जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं।

    पाकिस्तानी सेना और स्थानीय पुलिस के अनुसार, यह इलाका खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में आता है, जो अफगानिस्तान की सीमा से सटा हुआ है और अतीत में पाकिस्तानी तालिबान तथा अन्य उग्रवादी संगठनों का गढ़ रहा है। पुलिस ने बताया कि धमाके की तीव्रता इतनी अधिक थी कि आसपास के कई मकान ढह गए, जिससे स्थानीय नागरिकों को गंभीर चोटें आईं। सेना के बयान में कहा गया कि सभी हमलावरों को सुरक्षा बलों ने मुठभेड़ के दौरान मार गिराया।

    सेना के मुताबिक, हमलावरों ने पहले चौकी की सुरक्षा घेराबंदी तोड़ने की कोशिश की, लेकिन असफल रहने पर विस्फोटकों से लदी एक गाड़ी को चौकी की बाहरी दीवार से टकरा दिया। इस विस्फोट से पास के घरों और एक मस्जिद को भी नुकसान पहुंचा। हालांकि किसी भी संगठन ने तुरंत हमले की जिम्मेदारी नहीं ली, लेकिन पाकिस्तानी सेना ने इस हमले के लिए तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) को जिम्मेदार ठहराया है। सेना का दावा है कि इस हमले की योजना अफगान सीमा के उस पार बनाई गई और वहीं से इसे निर्देशित किया गया।

    इस पर अफगानिस्तान की ओर से तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। अफगान तालिबान लंबे समय से यह कहते रहे हैं कि वे किसी भी देश के खिलाफ अपनी जमीन का इस्तेमाल नहीं होने देते, जिसमें पाकिस्तान भी शामिल है। पाकिस्तानी सेना ने कहा कि पाकिस्तान को उम्मीद है कि अफगानिस्तान के तालिबान शासक अपने क्षेत्र से आतंकियों को पाकिस्तान पर हमले करने से रोकेंगे। साथ ही यह भी कहा कि पाकिस्तान को आतंकियों और उनके मददगारों के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार सुरक्षित है।

    हमले के कुछ घंटे बाद ही पाकिस्तान का विदेश मंत्रालय सक्रिय हुआ। मंत्रालय ने इस्लामाबाद में अफगान तालिबान के उप-मिशन प्रमुख को तलब कर औपचारिक विरोध दर्ज कराया। मंत्रालय के बयान में कहा गया कि पाकिस्तान ने अफगान भूमि से संचालित आतंकवादी हमलों के दोषियों और मददगारों के खिलाफ पूर्ण जांच और निर्णायक कार्रवाई की मांग की है। बयान में यह भी कहा गया कि अफगान तालिबान से यह अपेक्षा की गई है कि वह अपने क्षेत्र में सक्रिय सभी आतंकवादी समूहों के खिलाफ ठोस, तत्काल और सत्यापन योग्य कदम उठाए तथा पाकिस्तान के खिलाफ आतंकवाद के लिए अफगान जमीन के इस्तेमाल को पूरी तरह रोके।

    पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तनाव हाल के महीनों में बढ़ा है। अक्टूबर में सीमा पर झड़पें हुई थीं, जब काबुल में 9 अक्टूबर को हुए विस्फोटों के लिए अफगानिस्तान ने पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया था। बाद में कतर की मध्यस्थता से युद्धविराम तो हुआ, लेकिन नवंबर में तुर्की में हुई बातचीत में दोनों देश किसी ठोस समझौते पर नहीं पहुंच सके।

  • इमरान खान और बुशरा बीबी को 17 साल की सजा, करप्शन केस में PAK कोर्ट का फैसला

    इमरान खान और बुशरा बीबी को 17 साल की सजा, करप्शन केस में PAK कोर्ट का फैसला


    नई दिल्ली । पाकिस्तान में भ्रष्टाचार के एक बड़े मामले में पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान और उनकी पत्नी बुशरा बीबी को करारा झटका लगा है. फेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी की विशेष अदालत ने तोशाखाना II भ्रष्टाचार मामले में दोनों को 17-17 साल की कठोर जेल की सजा सुनाई. अदालत ने इमरान खान और बुशरा बीबी को दोषी ठहराते हुए यह फैसला सुनाया ।
    स्थानीय मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक यह मामला वर्ष 2021 से जुड़ा है जब सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस द्वारा इमरान खान को एक बेहद कीमती बुल्गारी ज्वेलरी सेट गिफ्ट में दिया गया था. जांच में सामने आया कि इस गहनों की वास्तविक कीमत 7 करोड़ 15 लाख पाकिस्तानी रुपये से अधिक थी लेकिन इसे मात्र 58 लाख रुपये में खरीदकर नियमों का उल्लंघन किया गया. अदालत ने इसे सरकारी विश्वास के साथ धोखाधड़ी और भ्रष्ट आचरण करार दिया ।
    इमरान खान 2023 से जेल में बंद
    यह फैसला अदियाला जेल में बनाए गए विशेष कोर्ट रूम में विशेष न्यायाधीश शाहरुख अरजुमंद ने सुनाया. गौरतलब है कि इमरान खान अगस्त 2023 से ही विभिन्न मामलों में जेल में बंद हैं. इससे पहले जनवरी 2025 में अल-कादिर ट्रस्ट मामले में भी इमरान खान को 14 साल और बुशरा बीबी को 7 साल की सजा सुनाई जा चुकी है. तोशाखाना केस पर हाईकोर्ट ने लगाई थी रोक हालांकि तोशाखाना मामले में अप्रैल 2024 में इस्लामाबाद हाईकोर्ट ने सजा पर रोक लगा दी थी. इमरान खान की कानूनी टीम ने संकेत दिए हैं कि वे तोशाखाना मामले के इस फैसले को भी हाईकोर्ट में चुनौती देंगे ।
  • बांग्लादेश संकट के बीच पाकिस्तान की गीदड़भभकी, इशाक डार बोले– पानी रोकना युद्ध की कार्रवाई के बराबर

    बांग्लादेश संकट के बीच पाकिस्तान की गीदड़भभकी, इशाक डार बोले– पानी रोकना युद्ध की कार्रवाई के बराबर


    नई दिल्ली
    /इस्लामाबाद:बांग्लादेश में जारी राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल के बीच पाकिस्तान ने एक बार फिर भारत के खिलाफ तीखे बयान देकर माहौल गरमाने की कोशिश की है। पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने भारत पर सिंधु जल संधि के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए कहा है कि यदि पानी की आपूर्ति रोकी जाती है तो इसे युद्ध की कार्रवाई के तौर पर देखा जाएगा।इशाक डार ने यह बयान शुक्रवार 19 दिसंबर को मीडिया से बातचीत के दौरान दिया। यह बयान ऐसे समय आया है जब पाकिस्तान ने चिनाब नदी के जल प्रवाह में बदलाव को लेकर भारत से औपचारिक रूप से स्पष्टीकरण मांगा है।

    भारत संधि को कमजोर कर रहा है

    डार ने आरोप लगाया कि भारत लगातार 1960 की सिंधु जल संधि को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने कहाहमने इस साल अप्रैल में भारत की ओर से संधि से एकतरफा हटने जैसे कदम देखे लेकिन अब जो हो रहा है वह समझौते के मूल सिद्धांतों पर सीधा हमला है। इसका असर न सिर्फ क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ेगा बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानून की विश्वसनीयता भी खतरे में पड़ जाएगी।
    पाकिस्तानी उप प्रधानमंत्री का कहना था कि भारत की ये कार्रवाइयां केवल तकनीकी मुद्दा नहीं हैं बल्कि इसके गंभीर रणनीतिक और मानवीय परिणाम हो सकते हैं।

    पहलगाम हमले के बाद बदले हालात

    गौरतलब है कि 22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के एक दिन बाद भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ कई कड़े और दंडात्मक कदम उठाए थे। इन्हीं में से एक कदम था सिंधु जल संधि को स्थगित करना।यह संधि विश्व बैंक की मध्यस्थता में 1960 में हुई थी जो भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों के जल बंटवारे को नियंत्रित करती है। दशकों से यह संधि दोनों देशों के बीच तनाव के बावजूद कायम रही है लेकिन हालिया घटनाओं ने इसे फिर विवाद के केंद्र में ला दिया है।

    कृषि और आजीविका पर खतरे का दावा

    इशाक डार ने दावा किया कि भारत द्वारा किए जा रहे कथित जल प्रवाह में हेरफेर के कारण पाकिस्तान के सिंधु आयुक्त को अपने भारतीय समकक्ष को पत्र लिखकर जवाब मांगना पड़ा है।उन्होंने कहा कि कृषि चक्र के अहम समय में पानी के प्रवाह में बदलाव पाकिस्तान के किसानों खाद्य सुरक्षा और आम नागरिकों की आजीविका के लिए सीधा खतरा है।डार के मुताबिक सिंधु बेसिन पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और उसमें किसी भी तरह का असंतुलन गंभीर संकट पैदा कर सकता है।

    बाढ़ और सूखे का खतरा

    पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने यह भी आरोप लगाया कि भारत ने संधि के तहत जरूरी जल विज्ञान संबंधी डेटा साझा करना पूर्व सूचना देना और संयुक्त निगरानी तंत्र को लगभग बंद कर दिया है।उनका कहना है कि इससे पाकिस्तान को अचानक बाढ़ या लंबे सूखे जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।इशाक डार ने चेतावनी भरे लहजे में कहापानी की आपूर्ति को हथियार बनाना अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ है और इसे युद्ध की कार्रवाई माना जाएगा।

    चिनाब में पानी छोड़े जाने से बढ़ा विवाद

    पाकिस्तान की नाराजगी की एक बड़ी वजह यह भी बताई जा रही है कि भारत ने हाल ही में बिना पूर्व सूचना के चिनाब नदी में पानी छोड़ा जिससे पाकिस्तान में बाढ़ जैसे हालात की आशंका पैदा हो गई। इस कदम के बाद इस्लामाबाद में राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हो गई।
    विश्लेषकों का मानना है कि आंतरिक और क्षेत्रीय दबावों के बीच पाकिस्तान एक बार फिर जल मुद्दे को कूटनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा है। भारत की ओर से फिलहाल इस बयान पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।

  • बांग्लादेश में ISI की सुनियोजित वापसी? पाक हाई कमीशन में स्पेशल सेल की खबरों से भारत अलर्ट

    बांग्लादेश में ISI की सुनियोजित वापसी? पाक हाई कमीशन में स्पेशल सेल की खबरों से भारत अलर्ट


    नई दिल्ली
    /बांग्लादेश में जारी राजनीतिक अस्थिरता के बीच खुफिया एजेंसियों की ताजा रिपोर्टें दक्षिण एशिया की सुरक्षा तस्वीर को लेकर गंभीर चेतावनी दे रही हैं। करीब पंद्रह वर्षों के अंतराल के बाद पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस ISI की गतिविधियों की वापसी की आशंका जताई जा रही है। इन घटनाक्रमों ने न सिर्फ ढाका बल्कि नई दिल्ली में भी सतर्कता बढ़ा दी है।सूत्रों के मुताबिक अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद बांग्लादेश की विदेश और सुरक्षा नीति में जो बदलाव शुरू हुआ था वह अब एक संगठित रणनीतिक ढांचे का रूप लेता दिख रहा है। खुफिया विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान इस राजनीतिक संक्रमण को अवसर के रूप में देख रहा है और बांग्लादेश में अपना प्रभाव दोबारा स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।

    सीएनएन न्यूज-18 की एक रिपोर्ट के अनुसार सबसे बड़ी चिंता का विषय ढाका स्थित पाकिस्तानी उच्चायोग के भीतर एक विशेष ISI सेल की कथित स्थापना है। रिपोर्टों में दावा किया गया है कि इस सेल में एक ब्रिगेडियर दो कर्नल और चार मेजर सहित थलसेना नौसेना और वायुसेना से जुड़े अधिकारी तैनात हैं। यह व्यवस्था सामान्य कूटनीतिक गतिविधियों से कहीं आगे मानी जा रही है।खुफिया सूत्र बताते हैं कि यह पूरा ढांचा अक्टूबर 2025 में पाकिस्तान के चेयरमैन जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी जनरल साहिर शमशाद मिर्जा की चार दिवसीय ढाका यात्रा के बाद औपचारिक रूप से सक्रिय हुआ। इस दौरे के दौरान ISI के वरिष्ठ अधिकारियों ने बांग्लादेश की नेशनल सिक्योरिटी इंटेलिजेंस NSI और डायरेक्टरेट जनरल ऑफ फोर्सेस इंटेलिजेंस DGFI के अधिकारियों के साथ बंद कमरे में कई बैठकें कीं।

    आधिकारिक तौर पर इन बैठकों का उद्देश्य बंगाल की खाड़ी में समुद्री निगरानी और क्षेत्रीय सहयोग बताया गया लेकिन सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इसका असली फोकस भारत की पूर्वी सीमाओं पर रणनीतिक नजर रखना हो सकता है।अगस्त 2024 के बाद ढाका और इस्लामाबाद के बीच रिश्तों में आई तेजी को भी असामान्य माना जा रहा है। जुलाई 2025 में दोनों देशों के बीच राजनयिकों आधिकारिक पासपोर्ट धारकों और यहां तक कि सैन्य कर्मियों के लिए वीजा-फ्री एंट्री पर सहमति बनी। इसके अलावा रावलपिंडी और ढाका के बीच उच्च स्तरीय सैन्य आदान-प्रदान कराची–चित्तागांव शिपिंग रूट और प्रस्तावित सीधी उड़ानों को भी खुफिया आवाजाही के संभावित कवर के रूप में देखा जा रहा है। खुफिया एजेंसियों का दावा है कि ISI का दीर्घकालिक एजेंडा बांग्लादेशी समाज विशेषकर युवाओं के बीच कट्टरपंथी विचारधाराओं को बढ़ावा देना है। जमात-ए-इस्लामी और इनकलाब मंच जैसे संगठनों के जरिए धार्मिक उग्रवाद को मजबूत करने की कोशिशों की भी बात कही जा रही है। विश्लेषकों के अनुसार पाकिस्तान का उद्देश्य एक ऐसा हाइब्रिड राजनीतिक ढांचा खड़ा करना है जो स्वाभाविक रूप से भारतीय हितों के प्रति शत्रुतापूर्ण हो।

    18 दिसंबर को छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की मौत के बाद ढाका में भड़की हिंसा को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है। कई पर्यवेक्षकों ने इसे एकमैनेज्ड क्राइसिस करार दिया है। ढाका में भारतीय उच्चायोग और चट्टोग्राम में सहायक उच्चायोग पर हमले मीडिया संस्थानों में आगजनी और सड़कों पर भय का माहौल-इन घटनाओं को फरवरी 12 को प्रस्तावित चुनावों को टालने और कट्टरपंथी ताकतों की पकड़ मजबूत करने की रणनीति से जोड़ा जा रहा है।इन सभी संकेतों के बीच भारत ने अपनी पूर्वी सीमाओं और कूटनीतिक प्रतिष्ठानों की सुरक्षा को लेकर सतर्कता बढ़ा दी है। क्षेत्रीय स्थिरता के लिहाज से बांग्लादेश में हो रहे इन घटनाक्रमों पर आने वाले दिनों में भारत और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर बनी रहेगी।

  • भीख और अवैध यात्रा से पाकिस्तान की बढ़ी मुश्किलें, 50 हजार से ज्यादा नागरिकों को कई देशों ने किया बाहर

    भीख और अवैध यात्रा से पाकिस्तान की बढ़ी मुश्किलें, 50 हजार से ज्यादा नागरिकों को कई देशों ने किया बाहर


    इस्लामाबाद/पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक और गंभीर शर्मिंदगी का सामना करना पड़ रहा है। आतंकवाद के आरोपों के बाद अब पाकिस्तानी भिखारियों और अवैध प्रवासियों के कारण कई देश परेशान हैं। हालात ऐसे हो गए हैं कि अलग-अलग देशों ने 50 हजार से अधिक पाकिस्तानी नागरिकों को या तो अपने यहां से बाहर निकाल दिया या एयरपोर्ट पर ही प्रवेश देने से रोक दिया।यह चौंकाने वाली जानकारी पाकिस्तान की नेशनल असेंबली की ओवरसीज पाकिस्तानियों और मानवाधिकारों पर स्थायी समिति की बैठक में सामने आई। बैठक में फेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी FIA के महानिदेशक रिफ्फत मुख्तार राजा ने विस्तृत आंकड़े पेश किए।

    सऊदी अरब सबसे सख्त हजारों पाकिस्तानी लौटाए गए

    एफआईए डीजी के मुताबिक इस साल सबसे ज्यादा निर्वासन सऊदी अरब से हुआ है। वहां भीख मांगने के आरोप में करीब 24000 पाकिस्तानी नागरिकों को देश से बाहर कर दिया गया। सऊदी प्रशासन का कहना है कि इन लोगों ने धार्मिक यात्राओं और वीजा की शर्तों का गलत इस्तेमाल किया।
    इसके अलावा संयुक्त अरब अमीरातUAE ने भी 6000 पाकिस्तानियों को निर्वासित किया जबकि अजरबैजान से करीब 2500 लोगों को भिखारी होने के आरोप में बाहर निकाला गया। इन घटनाओं के बाद पाकिस्तान की छवि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ा नुकसान पहुंचा है।

    एयरपोर्ट पर ही रोके गए हजारों लोग

    एफआईए डीजी ने समिति को बताया कि सिर्फ निर्वासन ही नहीं बल्कि हजारों पाकिस्तानियों को विदेश यात्रा से पहले ही रोक दिया गया। जांच में सामने आया कि कई लोग उमरा वीजा का बहाना बनाकर यूरोप जाने की कोशिश कर रहे थे।उन्होंने कहा कि जब इन यात्रियों के दस्तावेजों की गहन जांच की गई तो उनमें यूरोपीय देशों में अवैध प्रवेश की योजना साफ नजर आई।एफआईए प्रमुख ने स्पष्ट शब्दों में कहामजबूत सबूतों के आधार पर ऐसे यात्रियों को एयरपोर्ट पर ही यात्रा की अनुमति नहीं दी गई।

    एशियाई देशों में भी संदिग्ध गतिविधियां

    एफआईए ने समिति को यह भी बताया कि कंबोडिया और म्यांमार जैसे देशों में भी पाकिस्तानी नागरिकों की संदिग्ध आवाजाही सामने आई है।आंकड़ों के अनुसार:इस साल 24000 पाकिस्तानी कंबोडिया गए जिनमें से 12000 अब तक वापस नहीं लौटे।वहीं 4000 लोग म्यांमार पर्यटक वीजा पर गए लेकिन करीब 2500 अभी तक लापता हैं।इन मामलों को मानव तस्करी अवैध काम और संगठित गिरोहों से जोड़कर देखा जा रहा है।

    कड़े कदमों से पासपोर्ट रैंकिंग में सुधार

    हालांकि एफआईए डीजी ने यह भी दावा किया कि हाल के महीनों में कड़े नियंत्रण उपायों के चलते कुछ सुधार देखने को मिला है।उन्होंने बताया कि पाकिस्तान का पासपोर्ट रैंकिंग में 118वें स्थान से सुधरकर 92वें स्थान पर आ गया है।उनका कहना था कि पहले पाकिस्तान अवैध प्रवासन के मामलों में दुनिया के शीर्ष पांच देशों में शामिल था लेकिन नीतियों में बदलाव और सख्ती के कारण स्थिति में आंशिक सुधार हुआ है।

    पहले भी हो चुके हैं सामूहिक निर्वासन

    इससे पहले जनवरी महीने में भी सऊदी अरब और अमेरिका समेत कई देशों ने एक ही हफ्ते में 200 से ज्यादा पाकिस्तानियों को निर्वासित किया था।पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इन निर्वासनों की वजह वीजा उल्लंघन कानूनी अपराध अवैध काम और मानव तस्करी रही।

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती चिंता
    इन घटनाओं ने पाकिस्तान की वैश्विक छवि पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। लगातार हो रहे निर्वासन और अवैध गतिविधियों के मामलों से साफ है कि कई देश अब पाकिस्तानी नागरिकों की आवाजाही को लेकर अधिक सख्त रुख अपना रहे हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पाकिस्तान ने इस समस्या पर ठोस और दीर्घकालिक कदम नहीं उठाए तो आने वाले समय में उसके नागरिकों के लिए विदेश यात्रा और रोजगार के रास्ते और मुश्किल हो सकते हैं।

  • वेनेजुएला पर अमेरिकी कार्रवाई को लेकर रूस की ट्रंप को सख्त चेतावनी, कहा-घातक गलती से होंगे भयावह नतीजे

    वेनेजुएला पर अमेरिकी कार्रवाई को लेकर रूस की ट्रंप को सख्त चेतावनी, कहा-घातक गलती से होंगे भयावह नतीजे


    नई दिल्ली/वेनेजुएला संकट एक बार फिर वैश्विक राजनीति के केंद्र में आ गया है। अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाने के बाद रूस ने खुलकर चेतावनी दी है। मॉस्को ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को आगाह करते हुए कहा है कि वेनेजुएला में किसी भी तरह की घातक गलती पूरे पश्चिमी गोलार्ध में अप्रत्याशित और गंभीर परिणाम पैदा कर सकती है। रूस ने साफ संकेत दिया है कि वह वेनेजुएला को अपना करीबी सहयोगी मानता है और इस मुद्दे पर पूरी तरह सतर्क है।

    दरअसल, हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वेनेजुएला के खिलाफ प्रतिबंधों को और सख्त करते हुए वहां से तेल ले जाने वाले टैंकरों की आवाजाही पर पूर्ण नाकाबंदी का आदेश दिया है। ट्रंप ने इसे “टोटल एंड कंपलीट ब्लॉकेड” करार दिया है। अमेरिका का कहना है कि यह कदम राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की सरकार पर दबाव बनाने के लिए उठाया गया है, जिसकी अर्थव्यवस्था बड़े पैमाने पर तेल निर्यात पर निर्भर है।अमेरिका ने इस कार्रवाई के तहत एक तेल टैंकर को जब्त भी किया है और कैरेबियन सागर में भारी नौसैनिक तैनाती की है। इस सैन्य मौजूदगी ने क्षेत्र में तनाव को और बढ़ा दिया है। अमेरिकी नौसेना की गतिविधियों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हस्तक्षेप की आशंकाएं तेज हो गई हैं।

    इस पूरे घटनाक्रम पर रूस ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। क्रेमलिन ने कहा है कि उसे उम्मीद है कि ट्रंप प्रशासन कोई ऐसा कदम नहीं उठाएगा, जिससे स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाए। रूस का मानना है कि वेनेजुएला के खिलाफ सैन्य या आक्रामक कार्रवाई न केवल क्षेत्रीय स्थिरता को नुकसान पहुंचाएगी, बल्कि इसके असर पूरे पश्चिमी गोलार्ध में महसूस किए जाएंगे।क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने बयान जारी कर कहा, हम निश्चित रूप से क्षेत्र के सभी देशों से संयम बरतने का आग्रह करते हैं, ताकि किसी भी तरह के अप्रत्याशित घटनाक्रम से बचा जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि कैरेबियन सागर में अमेरिकी युद्धपोतों की मौजूदगी के चलते हालात संवेदनशील बने हुए हैं और नाकाबंदी के परिणाम अभी स्पष्ट नहीं हैं।

    रूस ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह अपने सहयोगी और साझेदार वेनेजुएला के साथ लगातार संपर्क में है। मॉस्को लंबे समय से वेनेजुएला की सरकार का समर्थन करता रहा है और आर्थिक व राजनीतिक संकट के दौर में काराकास को सहारा देता आया है। अतीत में रूस ने वेनेजुएला की कमजोर अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए वित्तीय और ऊर्जा क्षेत्र में मदद की है।वहीं, वेनेजुएला ने अमेरिकी कदम को समुद्री डकैती करार देते हुए तीखी निंदा की है। मादुरो सरकार का कहना है कि अमेरिका अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन कर रहा है और उसकी संप्रभुता पर हमला कर रहा है। वेनेजुएला ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इस मुद्दे पर हस्तक्षेप की मांग भी की है।

    गौरतलब है कि इस सप्ताह की शुरुआत में ट्रंप ने दावा किया था कि वेनेजुएला दक्षिण अमेरिका के इतिहास में अब तक के सबसे बड़े नौसैनिक घेराव का सामना कर रहा है। इस बयान के बाद क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप की आशंकाएं और गहरा गई हैं।इसी बीच, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने इस महीने की शुरुआत में एक फोन कॉल के दौरान निकोलस मादुरो को अपना समर्थन दोहराया था। रूस के इस रुख से साफ है कि वेनेजुएला को लेकर अमेरिका और रूस के बीच टकराव और गहरा सकता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नए तनाव की स्थिति बन सकती है।

  • H-1B वीजा चाहने वाले भारतीयों की बढ़ी मुश्किलें, अमेरिका ने इंटरव्यू डेट अक्टूबर 2026 तक टाली

    H-1B वीजा चाहने वाले भारतीयों की बढ़ी मुश्किलें, अमेरिका ने इंटरव्यू डेट अक्टूबर 2026 तक टाली

    नई दिल्ली
    /अमेरिका में काम करने और अपने परिवार के साथ बसने का सपना देख रहे हजारों भारतीयों के लिए एक बार फिर निराशाजनक खबर सामने आई है। H-1B और H-4 वीजा के लिए इंटरव्यू का इंतजार कर रहे भारतीय आवेदकों की राह में नई अड़चन आ गई है। ताजा जानकारी के मुताबिक, इन वीजा कैटेगरी के लिए इंटरव्यू की तारीखें अब आगे बढ़ाकर अक्टूबर 2026 तक कर दी गई हैं। इससे पहले इन्हें फरवरी और मार्च 2026 तक टाल दिया गया था, लेकिन अब देरी और लंबी होती नजर आ रही है।

    मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भारतीय आवेदकों को अमेरिकी दूतावासों और कांसुलेट्स की ओर से सूचित किया गया है कि पहले से तय कई इंटरव्यू अपॉइंटमेंट्स को रद्द या री-शिड्यूल किया जा रहा है। डेक्कन क्रॉनिकल के साथ-साथ अमेरिकी मीडिया संस्थान द अमेरिकन बाज़ार ने भी दावा किया है कि बड़ी संख्या में वीजा अप्लीकेंट्स की इंटरव्यू डेट्स 2026 की आखिरी तिमाही तक खिसका दी गई हैं।इस लगातार हो रही देरी का असर अब सीधे आवेदकों की योजनाओं पर पड़ने लगा है। जनवरी और फरवरी 2026 में इंटरव्यू के लिए रजिस्ट्रेशन करा चुके कई भारतीय अपनी अपॉइंटमेंट्स कैंसिल कर रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि दोबारा बुकिंग करने पर शायद पहले की कोई तारीख मिल जाए। हालांकि, इमिग्रेशन विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा हालात में यह दांव उल्टा भी पड़ सकता है।

    हाल के हफ्तों में अमेरिकी कांसुलेट्स ने कई आवेदकों को ईमेल और नोटिस के जरिए बताया कि दिसंबर और जनवरी के लिए निर्धारित इंटरव्यू अब फरवरी या मार्च तक टाल दिए गए हैं। कुछ मामलों में यह देरी और ज्यादा बढ़कर 2026 के अंत तक पहुंच गई है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि यह कदम सुरक्षा जांच प्रक्रिया को मजबूत करने के लिए उठाया गया है।बताया जा रहा है कि वीजा आवेदकों की सोशल मीडिया स्क्रीनिंग अब पहले से कहीं ज्यादा सख्त कर दी गई है। आवेदकों के डिजिटल फुटप्रिंट की गहन जांच की जा रही है, जिसके चलते प्रोसेसिंग टाइम बढ़ गया है। इसी अतिरिक्त जांच प्रक्रिया को इंटरव्यू में देरी की मुख्य वजह माना जा रहा है।

    इस स्थिति ने खासकर उन भारतीय प्रोफेशनल्स को ज्यादा प्रभावित किया है, जो पहले से अमेरिका में काम कर रहे हैं और अपने परिवार से अलग रह रहे हैं। H-4 वीजा का इंतजार कर रहे उनके जीवनसाथी और बच्चे महीनों से भारत में फंसे हुए हैं। बार-बार इंटरव्यू टलने से न केवल उनकी निजी जिंदगी प्रभावित हो रही है, बल्कि उनके करियर पर भी खतरा मंडराने लगा है। इमिग्रेशन वकीलों का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में अपॉइंटमेंट्स का एक साथ कैंसिल होना असामान्य है। द अमेरिकन बाज़ार से बातचीत में कई वकीलों ने बताया कि जिन आवेदकों के इंटरव्यू पहले 2026 की शुरुआत में तय थे, उन्हें अब सीधे अक्टूबर से दिसंबर 2026 की तारीखें दी जा रही हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि अमेरिकी वीजा सिस्टम पर दबाव लगातार बढ़ रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही, तो इसका असर अमेरिकी कंपनियों पर भी पड़ सकता है, जो भारतीय टैलेंट पर काफी हद तक निर्भर हैं। टेक, आईटी और हेल्थकेयर सेक्टर में कुशल पेशेवरों की कमी और बढ़ सकती है।फिलहाल H-1B और H-4 वीजा आवेदकों के सामने अनिश्चितता का दौर बना हुआ है। सभी की नजरें अमेरिकी प्रशासन की अगली घोषणा पर टिकी हैं, जिससे यह साफ हो सके कि इंटरव्यू प्रक्रिया में यह देरी अस्थायी है या आने वाले समय में और बढ़ सकती है।

  • यूक्रेन युद्ध रूस पर डाल रहा भारी आर्थिक बोझ, विशेषज्ञों की चेतावनी-आने वाले साल और कठिन

    यूक्रेन युद्ध रूस पर डाल रहा भारी आर्थिक बोझ, विशेषज्ञों की चेतावनी-आने वाले साल और कठिन

    Russia Ukraine War
    नई दिल्ली/रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध अब अपने चौथे वर्ष में प्रवेश करने वाला है। बीते लगभग चार वर्षों में इस संघर्ष ने न केवल हजारों सैनिकों और आम नागरिकों की जान ली हैबल्कि अरबों डॉलर के बुनियादी ढांचे को भी तबाह कर दिया है। अब अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ और आर्थिक विश्लेषक रूस को आगाह कर रहे हैं कि इस युद्ध की कीमत उसे लंबे समय तक चुकानी पड़ेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही युद्ध आज समाप्त हो जाएरूस को आर्थिक रूप से इससे उबरने में कई साल लग सकते हैं। विश्लेषकों के अनुसारयूक्रेन युद्ध के चलते रूस के सैन्य खर्च में अभूतपूर्व बढ़ोतरी हुई है। रक्षा बजट में 30 से 60 प्रतिशत तक की वृद्धि ने सरकारी वित्त पर जबरदस्त दबाव डाला है। इसके साथ ही पश्चिमी देशोंखासकर अमेरिका और यूरोपीय यूनियन द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों ने रूस की आमदनी के प्रमुख स्रोतों-तेल और गैस-को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। ऊर्जा निर्यात से होने वाली कमाई में गिरावट ने रूस की आर्थिक स्थिति को और कमजोर कर दिया है।

    बढ़ते खर्च और घटती आय के बीच रूसी सरकार की कर्ज पर निर्भरता लगातार बढ़ रही है। हाल ही में रूसी सरकार ने बॉन्ड जारी कर करीब 108.9 अरब रूबल का कर्ज उठाया। इसके साथ ही 2025 में अब तक कुल कर्ज जारी करने का आंकड़ा 7.9 ट्रिलियन रूबल तक पहुंच चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह आंकड़ा इस बात का संकेत है कि सरकार के पास बजट घाटा पाटने के लिए सीमित विकल्प रह गए हैं। रूस की एक और बड़ी चिंता उसका नेशनल वेल्थ फंड या आपातकालीन रिजर्व है। रिपोर्ट्स के मुताबिकइस रिजर्व का आधे से ज्यादा हिस्सा पहले ही खर्च हो चुका है। ऐसे में भविष्य में किसी बड़े आर्थिक झटके से निपटने की रूस की क्षमता कमजोर होती जा रही है। बजट घाटा लगातार बढ़ रहा है और इसकी मुख्य वजह सैन्य अभियानों पर हो रहा भारी खर्च माना जा रहा है।

    आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में रूस के सामने कई और चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। अगर वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें दबाव में रहींरूबल मजबूत बना रहा और आर्थिक विकास अनुमान से कम रहातो सरकार की मुश्किलें और बढ़ेंगी। मजबूत रूबल निर्यात को महंगा बना देता हैजिससे विदेशी मुद्रा कमाने में दिक्कत आती हैजबकि ऊंची ब्याज दरें कर्ज को और महंगा कर देती हैं।विश्लेषकों के अनुसारयदि तेल और गैस से होने वाली आय में और गिरावट आती है और ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैंतो रूस के सामने केवल तीन ही विकल्प बचेंगे। पहलासरकार टैक्स बढ़ा सकती हैजिससे आम जनता और उद्योगों पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। दूसरासामाजिक कल्याण और विकास से जुड़े अन्य जरूरी खर्चों में कटौती की जा सकती हैजिसका सीधा असर आम लोगों की जिंदगी पर पड़ेगा। तीसरा विकल्प है और अधिक कर्ज लेनाजो भविष्य में आर्थिक संकट को और गहरा कर सकता है।

    विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि युद्ध ने रूस की अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक कमजोरियों को उजागर कर दिया है। लंबे समय तक चले इस संघर्ष ने निवेशकों का भरोसा कमजोर किया है और विदेशी निवेश लगभग ठप हो चुका है। ऐसे में युद्ध के बाद भी रूस के लिए आर्थिक स्थिरता हासिल करना आसान नहीं होगा।कुल मिलाकरयूक्रेन युद्ध रूस के लिए सिर्फ सैन्य मोर्चे पर ही नहींबल्कि आर्थिक मोर्चे पर भी एक बड़ी चुनौती बन चुका है। विशेषज्ञों की चेतावनी साफ है-इस जंग की कीमत रूस को आने वाले कई वर्षों तक चुकानी पड़ सकती है।

  • बीजिंग में फिर बढ़ा प्रदूषण का खतरा, घनी धुंध से ढका शहर; AQI 215 पर पहुंचा, येलो अलर्ट जारी

    बीजिंग में फिर बढ़ा प्रदूषण का खतरा, घनी धुंध से ढका शहर; AQI 215 पर पहुंचा, येलो अलर्ट जारी


    नई दिल्ली /चीन की राजधानी बीजिंग में एक बार फिर वायु प्रदूषण ने चिंता बढ़ा दी है। गुरुवार 18 दिसंबर 2025 को शहर घनी धुंध की चपेट में रहा जिसके चलते वायु गुणवत्ता सूचकांक AQI 215 के स्तर तक पहुंच गया। यह स्तरबेहद अस्वास्थ्यकारी श्रेणी में आता है और आम लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा माना जाता है। वर्षों तक चले व्यापक सफाई अभियानों के बाद बीजिंग में इस तरह के प्रदूषण की वापसी को दुर्लभ लेकिन चिंताजनक माना जा रहा है।

    चीन की राष्ट्रीय वेधशाला ने हालात को देखते हुए बीजिंग समेत आसपास के कई इलाकों मेंयेलो अलर्ट जारी किया है। चेतावनी में कहा गया है कि मौसम की मौजूदा परिस्थितियों के कारण प्रदूषक तत्व वातावरण में फंसे हुए हैं जिससे धुंध और स्मॉग की स्थिति बनी हुई है। विशेषज्ञों के अनुसार सर्दियों में ठंडी हवा के साथ स्थिर मौसम और कम हवा की गति प्रदूषण को फैलने से रोकती है जिससे हवा की गुणवत्ता तेजी से बिगड़ जाती है।गुरुवार सुबह से ही बीजिंग के कई हिस्सों में दृश्यता काफी कम दर्ज की गई। ऊंची इमारतें धुंध में लिपटी नजर आईं और सड़कों पर वाहन धीमी गति से चलते दिखे। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बच्चों बुजुर्गों और सांस की बीमारी से पीड़ित लोगों को घर के अंदर रहने और अनावश्यक बाहर निकलने से बचने की सलाह दी है।

    राष्ट्रीय वेधशाला के मुताबिक बीजिंग के अलावा हेबेई तियानजिन हेनान अनहुई जियांग्सू हुबेई सिचुआन बेसिन और चोंगकिंग जैसे क्षेत्रों में भी भारी धुंध छाए रहने की संभावना है। इन इलाकों में भी वायु गुणवत्ता के स्तर में गिरावट दर्ज की जा सकती है। प्रशासन ने स्थानीय सरकारों को सतर्क रहने और जरूरत पड़ने पर आपात कदम उठाने के निर्देश दिए हैं।गौरतलब है कि एक दशक पहले तक बीजिंग दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में गिना जाता था। भारी उद्योगों कोयले से चलने वाले संयंत्रों और तेजी से बढ़ते वाहनों के कारण यहां की हवा बेहद जहरीली हो गई थी। हालात को सुधारने के लिए चीनी सरकार ने 2016 के बाद से कई सख्त कदम उठाए। भारी प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को या तो बंद किया गया या शहर से बाहर स्थानांतरित किया गया जिस पर अरबों डॉलर खर्च किए गए।

    इसके अलावा सर्दियों में कोयले से चलने वाली सार्वजनिक हीटिंग प्रणाली को चरणबद्ध तरीके से प्राकृतिक गैस और बिजली आधारित व्यवस्था में बदला गया। अधिकारियों के अनुसार इस बदलाव पर एक अरब डॉलर से अधिक की राशि खर्च हुई और इसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आए। इन उपायों से बीजिंग की वायु गुणवत्ता में बीते वर्षों में उल्लेखनीय सुधार हुआ था जिससे घनी धुंध की घटनाएं काफी कम हो गई थीं।हालांकि मौजूदा हालात यह दिखाते हैं कि मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों के चलते प्रदूषण फिर से गंभीर रूप ले सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही उत्सर्जन नियंत्रण में हों लेकिन सर्दियों के मौसम में थोड़ी सी लापरवाही या प्राकृतिक परिस्थितियां भी हवा को बेहद खराब बना सकती हैं।प्रशासन ने नागरिकों से अपील की है कि वे मास्क का इस्तेमाल करें बाहरी गतिविधियों को सीमितरखें और स्वास्थ्य संबंधी दिशा-निर्देशों का पालन करें। साथ ही स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है और जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त नियंत्रण उपाय लागू किए जा सकते हैं।