Category: International

  • इजरायल की स्थापना की ऐतिहासिक कहानी: कैसे 1948 में बना यहूदी राष्ट्र और बदला पश्चिम एशिया का नक्शा

    इजरायल की स्थापना की ऐतिहासिक कहानी: कैसे 1948 में बना यहूदी राष्ट्र और बदला पश्चिम एशिया का नक्शा

    नई दिल्ली। 14 मई 1948 को तेल अवीव में यहूदी एजेंसी के अध्यक्ष डेविड बेन-गुरियन ने इजरायल की स्वतंत्रता की घोषणा की। इसके साथ ही लगभग 2,000 वर्षों के बाद यहूदियों का एक स्वतंत्र राष्ट्र अस्तित्व में आया और बेन-गुरियन देश के पहले प्रधानमंत्री बने। उसी दिन ब्रिटिश शासन की समाप्ति के बाद क्षेत्र में तनाव और संघर्ष की स्थिति भी तेजी से बढ़ गई।

    घोषणा के तुरंत बाद ही कई अरब देशों और यहूदी समुदायों के बीच संघर्ष शुरू हो गया। उसी शाम मिस्र की ओर से हवाई हमले की खबरें सामने आईं, जिससे हालात और तनावपूर्ण हो गए। हालांकि तेल अवीव में बिजली संकट और युद्ध की आशंका के बावजूद यहूदी समुदाय ने अपने नए राष्ट्र के जन्म को ऐतिहासिक क्षण के रूप में मनाया।

    आधुनिक इजरायल की नींव 19वीं सदी के अंत में शुरू हुए ज़ायोनिस्ट आंदोलन से जुड़ी मानी जाती है। 1896 में ऑस्ट्रियाई पत्रकार थियोडोर हर्ज़ल ने अपनी पुस्तक द ज्यूइश स्टेट में यहूदी राष्ट्र की अवधारणा को मजबूत किया और 1897 में स्विट्जरलैंड में पहला ज़ायोनिस्ट कांग्रेस आयोजित किया।

    प्रथम विश्व युद्ध के बाद ओटोमन साम्राज्य के पतन के साथ ब्रिटेन ने फिलिस्तीन पर नियंत्रण स्थापित किया। 1917 की बाल्फोर घोषणा के जरिए ब्रिटेन ने यहूदी मातृभूमि के समर्थन का संकेत दिया, जिसे बाद में लीग ऑफ नेशंस के शासनादेश में शामिल किया गया।

    इसके बाद 1920 और 1930 के दशक में फिलिस्तीन में यहूदियों और अरबों के बीच तनाव बढ़ता गया। ब्रिटिश शासन ने स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश में यहूदी आप्रवासन पर कई बार रोक लगाने का प्रयास किया, लेकिन संघर्ष लगातार बढ़ता रहा।

    द्वितीय विश्व युद्ध और होलोकॉस्ट के बाद यहूदी प्रवासन में तेजी आई। युद्ध के बाद ब्रिटेन ने मामला संयुक्त राष्ट्र को सौंप दिया, जहां 1947 में फिलिस्तीन के विभाजन का प्रस्ताव पारित हुआ। इसके तहत यहूदी और अरब क्षेत्रों का अलग-अलग विभाजन तय किया गया।

    14 मई 1948 को ब्रिटिश शासन की समाप्ति के साथ ही इजरायल राज्य की आधिकारिक घोषणा की गई। अगले ही दिन मिस्र, जॉर्डन, सीरिया, लेबनान और इराक की सेनाओं ने इजरायल पर हमला कर दिया, जिससे पहला अरब-इजरायल युद्ध शुरू हुआ।

    कम संसाधनों के बावजूद इजरायली सेना ने संघर्ष जारी रखा और बाद में कई क्षेत्रों पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। 1949 में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से युद्धविराम हुआ, जिसके बाद इजरायल की सीमाओं को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिली।

    इसके बाद 1967 के छह दिवसीय युद्ध में इजरायल ने अपने क्षेत्र का और विस्तार किया। 1979 में मिस्र के साथ ऐतिहासिक शांति समझौता हुआ, जिसके तहत सिनाई प्रायद्वीप वापस किया गया। 1993 में इजरायल और फिलिस्तीन मुक्ति संगठन (PLO) के बीच भी शांति समझौते की शुरुआत हुई, हालांकि क्षेत्र में तनाव और संघर्ष पूरी तरह खत्म नहीं हो सका।

    आज भी इजरायल और फिलिस्तीन के बीच विवाद और संघर्ष की स्थिति बनी हुई है, जो पश्चिम एशिया की राजनीति और वैश्विक कूटनीति को लगातार प्रभावित करता रहा है।

  • सोने पर चीन का बड़ा दांव: लगातार खरीदारी से ग्लोबल मार्केट और डॉलर सिस्टम में बढ़ी हलचल

    सोने पर चीन का बड़ा दांव: लगातार खरीदारी से ग्लोबल मार्केट और डॉलर सिस्टम में बढ़ी हलचल

    नई दिल्ली। चीन की आक्रामक गोल्ड खरीदारी ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। दुनिया के सबसे बड़े आर्थिक खिलाड़ियों में शामिल चीन अब वैश्विक गोल्ड मार्केट में भी मजबूत ताकत बनकर उभर रहा है। चीन का केंद्रीय बैंक लगातार 18वें महीने बड़े पैमाने पर सोना खरीद रहा है, जिससे ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम और डॉलर आधारित व्यवस्था को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं।

    पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना (PBOC) ने अप्रैल 2026 में करीब 8 टन सोना खरीदा। इसके बाद चीन का आधिकारिक गोल्ड रिजर्व बढ़कर 7 करोड़ 28 लाख ट्रॉय औंस तक पहुंच गया है। मार्च 2026 के अंत तक इन भंडारों की अनुमानित कीमत लगभग 342.76 अरब डॉलर आंकी गई है।

    जानकारों के अनुसार, चीन की यह रणनीति केवल निवेश तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे दीर्घकालिक आर्थिक और भू-राजनीतिक सोच जुड़ी हुई है। बीजिंग लगातार अमेरिकी डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करने की दिशा में काम कर रहा है और विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा हिस्सा सोने में तब्दील कर रहा है।

    विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते तनाव, आर्थिक प्रतिबंधों और वैश्विक अनिश्चितताओं ने चीन को अपनी वित्तीय रणनीति बदलने के लिए प्रेरित किया है। चीन के लिए सोना ऐसा सुरक्षित एसेट माना जा रहा है, जिसे किसी भी बाहरी प्रतिबंध के जरिए नियंत्रित या फ्रीज नहीं किया जा सकता। यही वजह है कि वह इसे भविष्य की आर्थिक सुरक्षा के रूप में देख रहा है।

    इसके अलावा, चीन अपनी मुद्रा युआन को वैश्विक व्यापार में मजबूत स्थिति दिलाने की कोशिश भी कर रहा है। माना जा रहा है कि बड़े गोल्ड रिजर्व चीन की आर्थिक विश्वसनीयता बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं और अंतरराष्ट्रीय लेन-देन में युआन की स्वीकार्यता को मजबूती दे सकते हैं।

    गौरतलब है कि सोने की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बावजूद चीन की खरीदारी लगातार जारी है। इससे संकेत मिलता है कि बीजिंग अल्पकालिक लाभ के बजाय दीर्घकालिक रणनीतिक लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि चीन फिलहाल बाजार में हलचल मचाने के बजाय धीरे-धीरे मजबूत और सुरक्षित गोल्ड रिजर्व तैयार करने की नीति पर काम कर रहा है। हालांकि, उसकी लगातार बढ़ती मांग का असर अब वैश्विक गोल्ड मार्केट में साफ दिखाई देने लगा है। चीन के साथ आम निवेशकों की बढ़ती खरीदारी भी सोने की कीमतों को मजबूती दे रही है।

  • कंगाली से जूझ रहे पाकिस्तान ने फिर लिया कर्जा …, IMF ने दी 1.32 अरब डॉलर की नई किस्त को मंजूरी

    कंगाली से जूझ रहे पाकिस्तान ने फिर लिया कर्जा …, IMF ने दी 1.32 अरब डॉलर की नई किस्त को मंजूरी


    इस्लामाबाद।
    आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले पाकिस्तान (Pakistan) की हालत दिन-पर-दिन खराब होती जा रही है। उसकी भीख मांगने की आदत अब भी नहीं गई है। अब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund.- IMF) ने पाकिस्तान को बड़ा कर्ज दिया है। IMF बोर्ड ने मौजूदा कर्ज कार्यक्रमों के तहत करीब 1.32 अरब डॉलर की नई किस्त को मंजूरी दे दी। इसमें एक्सटेंडेड फंड फैसिलिटी (Extended Fund Facility.- EFF) के तहत लगभग 1.1 अरब डॉलर और जलवायु संबंधी रेजिलियंस एंड सस्टेनेबिलिटी फैसिलिटी के तहत करीब 22 करोड़ डॉलर शामिल हैं।

    IMF का कहना है कि पाकिस्तान ने आर्थिक सुधारों की दिशा में कुछ प्रगति दिखाई है और कठिन वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद अपनी अर्थव्यवस्था को संभालने की कोशिश की है। हालांकि यह मदद ऐसे समय में आई है जब पाकिस्तान पहले से ही गंभीर आर्थिक संकट, महंगाई और विदेशी मुद्रा की भारी कमी से जूझ रहा है।

    मध्य पूर्व में जारी तनाव और तेल की बढ़ती कीमतों ने पाकिस्तान की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में उछाल का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है, जिसके चलते केंद्रीय बैंक को अचानक ब्याज दरें बढ़ाने जैसा कदम उठाना पड़ा। विदेशी मुद्रा भंडार लगातार दबाव में हैं और आयात बिल बढ़ने से हालात और खराब हुए हैं। पाकिस्तान को अस्थायी राहत तब मिली जब सऊदी ने 3 अरब डॉलर की वित्तीय सहायता का भरोसा दिया। वहीं यूएई ने अपने पुराने कर्ज की वापसी का दबाव भी बढ़ा दिया, जिससे इस राहत का बड़ा हिस्सा संतुलन बनाने में ही खर्च होने की आशंका है।

    IMF ने शुक्रवार को एक बयान में कहा कि उसे इस संस्था की ‘एक्सटेंडेड फंड फैसिलिटी’ (EFF) के तहत लगभग $1.1 बिलियन और जलवायु पर केंद्रित ‘रेजिलियंस एंड सस्टेनेबिलिटी फैसिलिटी’ के तहत लगभग $220 मिलियन मिलने की उम्मीद है। IMF ने अपने बयान में आगे कहा, “EFF व्यवस्था के तहत पाकिस्तान के नीतिगत प्रयासों से अर्थव्यवस्था को स्थिर करने और एक चुनौतीपूर्ण वैश्विक माहौल, जिसमें मध्य पूर्व में चल रहा युद्ध भी शामिल है, के बीच भरोसा फिर से कायम करने में काफी प्रगति हुई है।” तेल की कीमतों में भारी उछाल के कारण पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ गया है, जिसके चलते केंद्रीय बैंक को कीमतों पर बढ़ते दबाव से निपटने के लिए एक अप्रत्याशित कदम उठाते हुए ब्याज दरें बढ़ानी पड़ीं।


    मित्र देशों के सामने हाथ फैलाता रहता है PAK

    पिछले कुछ सालों में पाकिस्तान बार-बार आईएमएफ, सऊदी अरब, चीन और अन्य मित्र देशों के सामने आर्थिक मदद के लिए हाथ फैलाता रहा है। आलोचकों का कहना है कि वहां की सरकारें स्थायी आर्थिक सुधारों की बजाय कर्ज लेकर संकट टालने की नीति अपनाती रही हैं। कमजोर टैक्स व्यवस्था, राजनीतिक अस्थिरता, बढ़ता रक्षा खर्च और निर्यात में अपेक्षित बढ़ोतरी न होना पाकिस्तान की सबसे बड़ी आर्थिक चुनौतियां बनी हुई हैं। यही कारण है कि हर कुछ वर्षों में देश भुगतान संकट में फंस जाता है और उसे बाहरी मदद की जरूरत पड़ती है।


    इससे नहीं खत्म होंगी आर्थिक समस्याएं

    एक्सपर्ट्स का मानना है कि IMF की यह नई किस्त पाकिस्तान को कुछ समय के लिए राहत जरूर दे सकती है, लेकिन इससे उसकी मूल आर्थिक समस्याएं खत्म नहीं होंगी। यदि पाकिस्तान ने उद्योग, निर्यात, कर संग्रह और ऊर्जा क्षेत्र में बड़े सुधार नहीं किए तो वह भविष्य में भी विदेशी कर्ज और बेलआउट पैकेज पर निर्भर रहेगा। फिलहाल हालात ऐसे हैं कि पाकिस्तान अपनी अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए फिर अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और मित्र देशों की मदद पर टिका हुआ नजर आ रहा है।

  • बीजिंग पहुंचे ट्रंप, आज शिखर सम्मेलन में होंगे शामिल… जिनपिंग से इन मुद्दों पर होगी चर्चा

    बीजिंग पहुंचे ट्रंप, आज शिखर सम्मेलन में होंगे शामिल… जिनपिंग से इन मुद्दों पर होगी चर्चा


    बीजिंग।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) बुधवार को चीन (China) की राजधानी बीजिंग (Beijing) पहुंचे। यहां वे चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Chinese President Xi Jinping) के साथ ईरान युद्ध, व्यापार और ताइवान को अमेरिकी हथियारों की बिक्री जैसे अहम मुद्दों पर बहुप्रतीक्षित चर्चा करेंगे।

    शिखर सम्मेलन का मुख्य हिस्सा गुरुवार को होगा, जब दोनों नेता द्विपक्षीय वार्ता करेंगे और एक औपचारिक भोज में शामिल होंगे। चीनी राजधानी में एयर फोर्स वन के उतरने के बाद चीन की ओर से ट्रंप का भव्य स्वागत किया गया।

    व्हाइट हाउस के अनुसार, राष्ट्रपति का स्वागत चीनी उपराष्ट्रपति हान झेंग, वॉशिंगटन में चीन के राजदूत शी फेंग, विदेश मंत्रालय के कार्यकारी उप मंत्री मा झाओक्सू और बीजिंग में अमेरिकी दूत डेविड परड्यू द्वारा किया गया। स्वागत समारोह में लगभग 300 चीनी युवा, एक सैन्य सम्मान गार्ड और एक सैन्य बैंड शामिल हुए।

    ट्रंप की चीन यात्रा के दौरान उनके साथ जाने वाले अमेरिकी व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल में टिम कुक और ऐलन मस्क सहित अमेरिका के 16 प्रमुख कारोबारी शामिल हैं। व्हाइट हाउस ने ट्रंप के वॉशिंगटन से रवाना होने से पहले इन शीर्ष व्यवसायियों की सूची जारी की। यात्रा के दौरान ट्रंप की शी जिनपिंग से मुलाकात होने की संभावना है, जिसमें आर्थिक सहयोग और व्यापारिक पहलों पर चर्चा की जाएगी। सूची जारी होने के कुछ समय बाद सिसको ने पुष्टि की कि उसके मुख्य कार्यकारी अधिकारी अब इस यात्रा में शामिल नहीं होंगे।

    मस्क की भागीदारी ट्रंप और अरबपति कारोबारी के बीच संबंधों में फिर से आई नजदीकी को दिखाती है। मस्क पहले ट्रंप प्रशासन में वरिष्ठ सलाहकार रह चुके हैं और उन्होंने संघीय नौकरशाही में सुधार से जुड़े प्रयासों का नेतृत्व भी किया था, लेकिन पिछले वर्ष मतभेदों के बाद उन्होंने पद छोड़ दिया था। हाल के महीनों में दोनों के संबंधों में सुधार की खबरें सामने आई हैं। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, ट्रंप चीन के साथ नये निवेश और व्यापार बोर्डों के गठन की संभावनाओं पर भी चर्चा कर सकते हैं। प्रतिनिधिमंडल में प्रौद्योगिकी, वित्त, एयरोस्पेस और विनिर्माण सहित अमेरिकी उद्योग जगत के विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व शामिल है। प्रतिनिधिमंडल में शामिल प्रमुख अधिकारियों में लैरी फिंक, स्टीफन श्वार्ज़मैन, केली ऑर्टबर्ग, ब्रायन साइक्स, जेन फ्रेजर, जिम एंडरसन, लैरी कल्प और डेविड सोलोमन शामिल हैं।

  • चीन दौरे से पहले ट्रंप का बड़ा बयान, कहा- ईरान संकट सुलझाने में शी जिनपिंग की जरूरत नहीं

    चीन दौरे से पहले ट्रंप का बड़ा बयान, कहा- ईरान संकट सुलझाने में शी जिनपिंग की जरूरत नहीं

    नई दिल्ली । अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आज तीन दिवसीय चीन दौरे पर रवाना हो रहे हैं। इस यात्रा के दौरान उनकी चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ कई अहम वैश्विक मुद्दों पर द्विपक्षीय बातचीत होगी। हालांकि बीजिंग रवाना होने से पहले ट्रंप ने ईरान को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि ईरान संकट को हल करने के लिए उन्हें शी जिनपिंग की किसी मदद की जरूरत नहीं है। ट्रंप ने चेतावनी भरे अंदाज में कहा कि ईरान को अब सही रास्ता चुनना होगा, नहीं तो गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

    चीन दौरे पर हाई-प्रोफाइल डेलिगेशन
    13 से 15 मई तक चलने वाले इस दौरे में ट्रंप के साथ अमेरिका का एक बड़ा प्रतिनिधिमंडल भी चीन जा रहा है। इसमें उनके परिवार के सदस्य एरिक ट्रंप और लारा ट्रंप के अलावा कई वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं। डेलिगेशन में विदेश मंत्री मार्को रुबियो, रक्षा से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी पीट हेगसेथ, और अन्य कूटनीतिक व सुरक्षा सलाहकार जैसे जेमीसन ग्रीर, स्टीफन मिलर, स्टीवन चेउंग, जेम्स ब्लेयर और अन्य प्रमुख नाम शामिल हैं।

    ईरान मुद्दा प्राथमिकता में नहीं
    रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने स्पष्ट किया है कि चीन में शी जिनपिंग के साथ उनकी बातचीत का मुख्य फोकस ईरान मुद्दा नहीं होगा, हालांकि इस पर चर्चा जरूर होगी। ट्रंप ने दावा किया कि ईरान की सैन्य क्षमता कमजोर हो चुकी है और किसी भी समझौते का उद्देश्य अमेरिका और ईरान दोनों देशों के हित में होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि “हम सिर्फ अच्छी डील करेंगे।”

    रूस-यूक्रेन युद्ध पर दावा
    ट्रंप ने यह भी दावा किया कि रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध जल्द ही समाप्त होने की दिशा में है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में वैश्विक हालात में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि चीन दौरे के दौरान ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात से वैश्विक राजनीति और खासकर ईरान संकट पर क्या नई दिशा निकलती है।

  • ईरान का बड़ा बयान: हमला हुआ तो बढ़ेगा परमाणु कार्यक्रम, 90% तक यूरेनियम संवर्धन की दी चेतावनी

    ईरान का बड़ा बयान: हमला हुआ तो बढ़ेगा परमाणु कार्यक्रम, 90% तक यूरेनियम संवर्धन की दी चेतावनी



    नई दिल्ली। ईरान ने साफ संकेत दिए हैं कि अगर अमेरिका या इजरायल उसकी जमीन पर दोबारा सैन्य कार्रवाई करते हैं तो वह अपने परमाणु कार्यक्रम को और तेज कर सकता है, जिसमें यूरेनियम संवर्धन को 90 प्रतिशत शुद्धता तक बढ़ाने का विकल्प शामिल है। इसे परमाणु हथियार-स्तर के बेहद करीब माना जाता है।

    यह बयान ईरान की संसद से जुड़े एक प्रवक्ता इब्राहिम रेजाई की ओर से सामने आया है, जिन्होंने सोशल मीडिया पर कहा कि किसी भी नए हमले की स्थिति में देश के पास अपने परमाणु विकल्पों को और मजबूत करने के अलावा अन्य रास्ते भी होंगे और इस पर संसद में चर्चा की जाएगी।

    यह चेतावनी ऐसे समय में आई है जब पश्चिम एशिया में पहले से ही तनाव बना हुआ है और अमेरिका व इजरायल की संभावित कार्रवाई को लेकर अटकलें तेज हैं। दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे परमाणु अप्रसार समझौते के संदर्भ में गंभीर संकेत माना जा रहा है।

  • ऑपरेशन ‘एपिक फ्यूरी’ के बाद अमेरिका का बड़ा वार, ईरान की मदद करने पर चीनी कंपनियों पर लगाए सख्त प्रतिबंध

    ऑपरेशन ‘एपिक फ्यूरी’ के बाद अमेरिका का बड़ा वार, ईरान की मदद करने पर चीनी कंपनियों पर लगाए सख्त प्रतिबंध



    नई दिल्ली। ऑपरेशन ‘एपिक फ्यूरी’ के बाद अमेरिका ने ईरान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव और बढ़ा दिया है, जिसके तहत ईरान को तकनीकी और सैन्य सहायता देने के आरोप में तीन चीनी कंपनियों पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए हैं। वॉशिंगटन का कहना है कि इन कंपनियों ने सैटेलाइट इमेजरी और डेटा उपलब्ध कराकर मध्य पूर्व में अमेरिकी और सहयोगी सैन्य ठिकानों की सुरक्षा को खतरे में डाला।

    अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार प्रतिबंधित कंपनियों में चीन की हैंगझोउ स्थित “मीएन्ट्रॉपी टेक्नोलॉजी (जिसे मिजारविजन भी कहा जाता है)”, बीजिंग की “द अर्थ आई” और “चांग गुआंग सैटेलाइट टेक्नोलॉजी कंपनी” शामिल हैं। अमेरिका का दावा है कि इन कंपनियों ने या तो ओपन-सोर्स सैटेलाइट तस्वीरें जारी कीं या सीधे ईरान को संवेदनशील सैन्य लोकेशन की इमेजरी उपलब्ध कराई।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन सैटेलाइट तस्वीरों का इस्तेमाल कथित तौर पर मध्य पूर्व में अमेरिकी सेना और उसके सहयोगी ठिकानों की गतिविधियों पर नजर रखने और संभावित हमलों की योजना बनाने में किया गया। हालांकि चीन और संबंधित कंपनियों की ओर से इन आरोपों पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है।

    अमेरिका ने यह भी दावा किया है कि इनमें से एक कंपनी पर पहले भी प्रतिबंध लगाए जा चुके हैं, क्योंकि उस पर यमन में हूती विद्रोहियों को अमेरिकी सैन्य ठिकानों की जानकारी देने का आरोप था।

    इसके साथ ही अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने ईरान, चीन, बेलारूस और यूएई से जुड़े 10 व्यक्तियों और संस्थाओं पर भी कार्रवाई की है, जिन पर ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रमों के लिए तकनीक और कच्चा माल उपलब्ध कराने का आरोप है।

    वॉशिंगटन ने साफ किया है कि वह ईरान के सैन्य और परमाणु नेटवर्क को फिर से मजबूत होने से रोकने के लिए ऐसे प्रतिबंधों को आगे भी जारी रखेगा और अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन करने वाली किसी भी संस्था पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।

  • भारत के ऑपरेशन सिंदूर से हिल गया पाकिस्तान! परमाणु नीति बदलने की तैयारी में जुटा इस्लामाबाद

    भारत के ऑपरेशन सिंदूर से हिल गया पाकिस्तान! परमाणु नीति बदलने की तैयारी में जुटा इस्लामाबाद




    नई दिल्ली। पाकिस्तान में भारत के ऑपरेशन सिंदूर की पहली वर्षगांठ पर हुई एक बड़ी रणनीतिक बैठक ने इस्लामाबाद की बढ़ती चिंता को उजागर कर दिया है। राजधानी इस्लामाबाद में आयोजित इस हाई-लेवल चर्चा में पाकिस्तान के पूर्व सैन्य अधिकारियों, परमाणु रणनीतिकारों और सुरक्षा विशेषज्ञों ने खुलकर माना कि दक्षिण एशिया का सुरक्षा संतुलन तेजी से बदल रहा है और भारत की सैन्य, तकनीकी और साइबर क्षमता पाकिस्तान के लिए नई चुनौती बनती जा रही है।

    यह बैठक Centre for International Strategic Studies की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान हुई, जिसमें पाकिस्तान के कई बड़े रक्षा विशेषज्ञ शामिल हुए। चर्चा का मुख्य मुद्दा भारत की बदलती सैन्य रणनीति और भविष्य के युद्धों का नया स्वरूप रहा। विशेषज्ञों ने कहा कि आने वाले समय में युद्ध केवल सीमा पर टैंकों और मिसाइलों तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि साइबर अटैक, हाइब्रिड वॉरफेयर, सूचना युद्ध और मानसिक दबाव जैसी रणनीतियां निर्णायक भूमिका निभाएंगी।

    पाकिस्तान के पूर्व ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी चेयरमैन जनरल जुबैर हयात ने कहा कि आधुनिक युद्ध का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है और देशों को अब सिर्फ पारंपरिक हथियारों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। वहीं पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े वरिष्ठ रणनीतिकार लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) खालिद अहमद किदवई ने कहा कि हालिया घटनाओं ने पाकिस्तान की “डिटरेंस पॉलिसी” की ताकत और कमजोरियों दोनों को सामने ला दिया है। उन्होंने संकेत दिए कि मई 2025 में भारत-पाक तनाव के बाद पाकिस्तान अपनी सुरक्षा रणनीति की समीक्षा कर रहा है।

    बैठक में शामिल विशेषज्ञों ने माना कि भारत तेजी से रक्षा आधुनिकीकरण, साइबर क्षमता और हाई-प्रिसिजन हथियारों पर काम कर रहा है। यही कारण है कि पाकिस्तान अब अपने “डिटरेंस मॉडल” को नए खतरों के हिसाब से ढालने की कोशिश कर रहा है। पाकिस्तान के रणनीतिक योजनाकारों का मानना है कि भविष्य में सीमित सैन्य कार्रवाई, साइबर हमले और सूचना युद्ध किसी भी संकट को तेजी से बड़े टकराव में बदल सकते हैं।

    इस दौरान पाकिस्तान के पूर्व राजनयिक जमीर अकरम ने दावा किया कि भारत की मौजूदा रणनीति से क्षेत्र में असुरक्षा बढ़ रही है। हालांकि भारत लगातार यह कहता रहा है कि उसकी सैन्य कार्रवाई केवल आतंकवाद और सीमा पार खतरों के खिलाफ जवाबी सुरक्षा नीति का हिस्सा है। भारत का साफ कहना है कि क्षेत्रीय शांति तभी संभव है जब आतंकवाद के खिलाफ ठोस कदम उठाए जाएं।

    गौरतलब है कि पिछले वर्ष पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान और पीओके में मौजूद 9 आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया था। इसके बाद पाकिस्तान की ओर से भारतीय सैन्य ठिकानों को टारगेट करने की कोशिश हुई, जिसके जवाब में भारतीय सेना ने ब्रह्मोस मिसाइलों से पाकिस्तान के 11 एयरबेस पर हमला किया था। भारत द्वारा जारी सैटेलाइट तस्वीरों ने इन हमलों की पुष्टि भी की थी।

    अब पाकिस्तान में हो रही रणनीतिक बैठकों और बदलते बयानों से साफ संकेत मिल रहे हैं कि भारत की सैन्य और तकनीकी ताकत ने इस्लामाबाद की चिंता बढ़ा दी है। यही वजह है कि पाकिस्तान अब भविष्य के युद्धों के लिए अपनी परमाणु और रक्षा नीति को नए सिरे से तैयार करने में जुटा हुआ है।

  • नूर खान एयरबेस पर ईरानी C-130 विमान विवाद: सैटेलाइट तस्वीरों ने पाकिस्तान की भूमिका पर उठाए गंभीर सवाल

    नूर खान एयरबेस पर ईरानी C-130 विमान विवाद: सैटेलाइट तस्वीरों ने पाकिस्तान की भूमिका पर उठाए गंभीर सवाल



    नई दिल्ली। पाकिस्तान के नूर खान एयरबेस को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है, जिसमें ईरानी C-130 विमान की मौजूदगी और सैटेलाइट तस्वीरों के आधार पर लगाए गए दावों ने नई राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स और सैटेलाइट इमेजरी के बाद पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल उठे हैं, जबकि इस्लामाबाद ने इन सभी आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया है।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक सीबीएस न्यूज ने अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से दावा किया था कि अमेरिका-ईरान तनाव और संघर्ष विराम के बाद कुछ ईरानी विमान पाकिस्तान के नूर खान एयरबेस पर देखे गए। इनमें C-130 जैसे सैन्य परिवहन विमान का भी जिक्र किया गया, जिन्हें खुफिया और लॉजिस्टिक ऑपरेशन में इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि, इन दावों की किसी स्वतंत्र एजेंसी ने आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।

    इसी बीच कुछ सैटेलाइट इमेजरी रिपोर्ट्स में एयरबेस पर एक C-130 जैसे विमान की तस्वीर सामने आने का दावा किया गया, जिसके बाद मामला और संवेदनशील हो गया। विशेषज्ञों के अनुसार केवल तस्वीरों के आधार पर किसी विमान की राष्ट्रीयता या उद्देश्य तय करना संभव नहीं होता, इसलिए यह दावा अभी भी विवादित है।

    पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इन सभी रिपोर्टों को “भ्रामक और तथ्यों से परे” बताते हुए कहा है कि नूर खान एयरबेस पर किसी भी विदेशी सैन्य विमान को छिपाकर रखने का कोई सवाल ही नहीं उठता। पाकिस्तान का कहना है कि जिन विमानों का उल्लेख किया जा रहा है, वे केवल कूटनीतिक और अस्थायी यात्राओं से जुड़े थे।

    इस पूरे विवाद के बीच अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल बढ़ गई है और पाकिस्तान की मध्यस्थ भूमिका को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं, हालांकि अभी तक कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया है जो इन आरोपों की पुष्टि करता हो।

  • रूस-पाकिस्तान की बढ़ती दोस्ती से बढ़ी भारत की चिंता! सस्ते तेल से लेकर सैन्य सहयोग तक गहराते रिश्ते

    रूस-पाकिस्तान की बढ़ती दोस्ती से बढ़ी भारत की चिंता! सस्ते तेल से लेकर सैन्य सहयोग तक गहराते रिश्ते




    नई दिल्ली। पाकिस्तान और रूस के बीच तेजी से बढ़ती नजदीकियों ने दक्षिण एशिया की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। ऊर्जा संकट, तेल व्यापार और सैन्य सहयोग को लेकर दोनों देशों के रिश्ते लगातार मजबूत होते दिखाई दे रहे हैं। रूस में पाकिस्तान के राजदूत Faisal Niaz Tirmizi ने संकेत दिए हैं कि पाकिस्तान एक बार फिर रूस से बड़े पैमाने पर तेल आयात बढ़ाने की तैयारी कर रहा है। इस बयान के बाद क्षेत्रीय रणनीतिक समीकरणों को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं।

    रूस की सरकारी समाचार एजेंसी TASS की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान ने होर्मुज जलडमरूमध्य संकट और वैश्विक ऊर्जा अस्थिरता के बीच रूसी तेल आयात बढ़ाने की योजना पर काम शुरू किया है। पाकिस्तान लंबे समय से आर्थिक संकट, विदेशी मुद्रा भंडार की कमी और बढ़ती महंगाई से जूझ रहा है। ऐसे में सस्ता रूसी तेल इस्लामाबाद के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है।

    दरअसल, पाकिस्तान ने पहली बार रूस से सस्ते तेल खरीदने की पहल तत्कालीन प्रधानमंत्री Imran Khan के कार्यकाल में की थी। इमरान खान की मॉस्को यात्रा के बाद दोनों देशों के बीच ऊर्जा सहयोग को लेकर बातचीत तेज हुई थी। इसके बाद अप्रैल 2023 में पाकिस्तान ने रूस को रियायती दरों पर कच्चे तेल का पहला आधिकारिक ऑर्डर दिया। जून 2023 में रूसी कच्चे तेल की पहली खेप कराची बंदरगाह पहुंची थी, जिसमें करीब 45 हजार मीट्रिक टन यूराल क्रूड शामिल था। खास बात यह रही कि पाकिस्तान ने इस तेल का भुगतान अमेरिकी डॉलर की बजाय चीनी युआन में किया था।

    हालांकि बाद में पाकिस्तान ने रूसी तेल आयात धीमा कर दिया था। इसकी बड़ी वजह रूसी क्रूड का भारी होना और खाड़ी देशों की तुलना में ट्रांसपोर्ट लागत ज्यादा होना बताया गया। लेकिन अब वैश्विक ऊर्जा संकट और मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान फिर से रूस की ओर झुकता दिखाई दे रहा है।

    सिर्फ ऊर्जा क्षेत्र ही नहीं, बल्कि रक्षा और सैन्य सहयोग में भी रूस और पाकिस्तान के संबंध मजबूत हो रहे हैं। दोनों देशों के बीच नियमित सैन्य अभ्यास और सुरक्षा सहयोग पहले से जारी हैं। यही कारण है कि रूस-पाकिस्तान की बढ़ती नजदीकियों को भारत के लिए रणनीतिक नजरिए से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि रूस पारंपरिक रूप से भारत का करीबी सहयोगी रहा है, लेकिन बदलती वैश्विक राजनीति में मॉस्को अब दक्षिण एशिया में अपने विकल्प भी मजबूत करना चाहता है। वहीं पाकिस्तान अपनी कमजोर अर्थव्यवस्था और ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए रूस के साथ रिश्ते गहरे करने में जुटा है।

    हालांकि भारत और रूस के बीच रक्षा, ऊर्जा और रणनीतिक साझेदारी अब भी बेहद मजबूत मानी जाती है, लेकिन पाकिस्तान और रूस के बढ़ते संपर्कों ने क्षेत्रीय राजनीति में नए समीकरणों की चर्चा जरूर तेज कर दी है।