Category: International

  • जिनेवा में एआई गवर्नेंस पर वैश्विक मंथन, संयुक्त राष्ट्र के पहले ग्लोबल डायलॉग में भारत का नेतृत्व करेंगे केंद्रीय मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह

    जिनेवा में एआई गवर्नेंस पर वैश्विक मंथन, संयुक्त राष्ट्र के पहले ग्लोबल डायलॉग में भारत का नेतृत्व करेंगे केंद्रीय मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह

    नई दिल्ली। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के वैश्विक नियमन और जिम्मेदार उपयोग को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण पहल शुरू होने जा रही है। इसी क्रम में स्विट्जरलैंड के जिनेवा में 6 और 7 जुलाई को आयोजित होने वाले संयुक्त राष्ट्र के पहले एआई गवर्नेंस ग्लोबल डायलॉग में भारत सक्रिय भागीदारी करेगा। इस महत्वपूर्ण मंच पर केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री कीर्तिवर्धन सिंह भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करेंगे।

    यह वैश्विक संवाद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़े अंतरराष्ट्रीय सहयोग, नीति निर्माण और साझा मानकों को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से आयोजित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य ऐसा वैश्विक ढांचा तैयार करना है, जो विभिन्न देशों, क्षेत्रीय संगठनों, निजी क्षेत्र, शिक्षाविदों और अन्य हितधारकों के प्रयासों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित कर सके। तेजी से विकसित हो रही एआई तकनीकों को सुरक्षित, पारदर्शी और मानव-केंद्रित बनाने पर भी विशेष जोर दिया जाएगा।

    सम्मेलन में एआई के सामाजिक और आर्थिक प्रभाव, विकसित और विकासशील देशों के बीच तकनीकी अंतर को कम करने, सुरक्षित एवं भरोसेमंद एआई प्रणालियों के विकास तथा मानवाधिकारों के संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर व्यापक विचार-विमर्श होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इन मुद्दों पर वैश्विक सहमति भविष्य की डिजिटल अर्थव्यवस्था और तकनीकी सहयोग के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

    बैठक के दौरान एआई पर स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पैनल की पहली वार्षिक रिपोर्ट भी प्रस्तुत की जाएगी। इस रिपोर्ट में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की वर्तमान क्षमताओं, भविष्य की संभावनाओं और उससे जुड़े संभावित जोखिमों का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया गया है। रिपोर्ट का उद्देश्य नीति निर्माताओं को विश्वसनीय और तथ्य आधारित जानकारी उपलब्ध कराना है, ताकि भविष्य की नीतियां संतुलित और प्रभावी बनाई जा सकें।

    भारत लगातार जिम्मेदार और समावेशी एआई विकास की वकालत करता रहा है। डिजिटल नवाचार, तकनीकी सहयोग और क्षमता निर्माण के क्षेत्र में भारत की पहल को वैश्विक स्तर पर सकारात्मक दृष्टि से देखा जा रहा है। इसी क्रम में भारतीय प्रतिनिधिमंडल सम्मेलन के दौरान विकासशील देशों की आवश्यकताओं, तकनीकी समानता और डिजिटल समावेशन से जुड़े मुद्दों को भी प्रमुखता से उठाएगा।

    वैश्विक स्तर पर एआई तकनीक के तेजी से विस्तार ने नियामकीय ढांचे की आवश्यकता को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते साझा नियम और पारदर्शी व्यवस्था विकसित नहीं की गई, तो भविष्य में सुरक्षा, गोपनीयता और नैतिकता से जुड़ी चुनौतियां बढ़ सकती हैं। ऐसे में यह संवाद वैश्विक सहयोग को नई दिशा देने वाला महत्वपूर्ण मंच माना जा रहा है।

    जिनेवा में होने वाले इस पहले सत्र के बाद अगले चरण का आयोजन वर्ष 2027 में न्यूयॉर्क में किया जाएगा। उम्मीद की जा रही है कि इन बैठकों के माध्यम से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के सुरक्षित, जिम्मेदार और टिकाऊ उपयोग को लेकर अंतरराष्ट्रीय सहमति मजबूत होगी तथा वैश्विक डिजिटल शासन व्यवस्था को नई दिशा मिलेगी।

  • दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्ग पर ईरान का बड़ा कदम, होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों से वसूलेगा सर्विस फीस, मित्र देशों को मिल सकती है राहत

    दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्ग पर ईरान का बड़ा कदम, होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों से वसूलेगा सर्विस फीस, मित्र देशों को मिल सकती है राहत

    नई दिल्ली । ईरान ने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले व्यावसायिक जहाजों पर सर्विस फीस लगाने की दिशा में औपचारिक तैयारी शुरू कर दी है। तेहरान का कहना है कि यह व्यवस्था समुद्री सुरक्षा और जहाजों को दी जाने वाली सेवाओं के बदले लागू की जाएगी। इसके लिए ईरान ओमान के साथ मिलकर नई प्रणाली तैयार कर रहा है। इस घोषणा के बाद वैश्विक समुद्री व्यापार और ऊर्जा बाजार की नजरें इस प्रस्तावित व्यवस्था पर टिक गई हैं।

    बीजिंग में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान चीन में ईरान के राजदूत अब्दोलरेजा रहमानी फजली ने कहा कि होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही को अधिक व्यवस्थित और सुरक्षित बनाने के लिए नई व्यवस्था तैयार की जा रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जहाजों से लिया जाने वाला शुल्क टोल टैक्स नहीं बल्कि सर्विस फीस होगा, जिसे सुरक्षा, निगरानी और समुद्री सेवाओं के बदले वसूला जाएगा।

    ईरानी पक्ष का कहना है कि होर्मुज स्ट्रेट का एक हिस्सा उसके क्षेत्रीय जलक्षेत्र में आता है। ऐसे में जहाजों को सुरक्षित मार्ग उपलब्ध कराना, उनकी आवाजाही की निगरानी करना और भारी समुद्री यातायात से जुड़े पर्यावरणीय प्रभावों का प्रबंधन करना उसकी जिम्मेदारी है। इसी आधार पर सर्विस फीस को उचित और वैध बताया गया है।

    हालिया क्षेत्रीय संघर्ष के बाद व्यावसायिक जहाजों को लगभग 60 दिनों तक बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के इस समुद्री मार्ग से गुजरने की अनुमति दी गई थी। अब यह अंतरिम व्यवस्था समाप्त होने के बाद ईरान स्थायी नियम लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। हालांकि शुल्क की दर, लागू होने की तारीख और किन देशों पर यह व्यवस्था किस रूप में लागू होगी, इस बारे में अभी विस्तृत आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।

    ईरान ने यह भी संकेत दिया है कि हालिया संकट के दौरान जिन देशों ने उसका समर्थन किया, उन्हें नई व्यवस्था में विशेष रियायत मिल सकती है। राजदूत ने कहा कि कठिन समय में साथ खड़े रहने वाले देशों के हितों का ध्यान रखा जाएगा। हालांकि भारत सहित किसी भी देश का नाम लेकर यह स्पष्ट नहीं किया गया कि किन देशों को राहत मिलेगी और किस प्रकार की छूट दी जाएगी।

    भारत के संदर्भ में भी फिलहाल ऐसी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है कि भारतीय जहाजों को इस सर्विस फीस से छूट मिलेगी या उन्हें इसका भुगतान करना होगा। ऐसे में यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत पर इस नई व्यवस्था का क्या प्रभाव पड़ेगा। अंतिम नियम जारी होने के बाद ही विभिन्न देशों और शिपिंग कंपनियों पर पड़ने वाले वास्तविक असर का आकलन किया जा सकेगा।

    होर्मुज स्ट्रेट वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की दृष्टि से बेहद संवेदनशील समुद्री मार्ग माना जाता है। दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल और बड़ी मात्रा में तरलीकृत प्राकृतिक गैस का परिवहन इसी रास्ते से होता है। इसलिए इस मार्ग से जुड़ा कोई भी प्रशासनिक या शुल्क संबंधी बदलाव अंतरराष्ट्रीय शिपिंग लागत, ऊर्जा बाजार और वैश्विक व्यापार पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है। आने वाले दिनों में ईरान और ओमान द्वारा जारी किए जाने वाले अंतिम दिशा-निर्देशों पर पूरी दुनिया की नजर बनी रहेगी।

  • ईरान में अयातुल्ला अली खामेनेई को अंतिम विदाई, बेटों की मौजूदगी के बीच सुप्रीम लीडर मोज्तबा खामेनेई की गैरहाजिरी पर तेज हुई चर्चाएं

    ईरान में अयातुल्ला अली खामेनेई को अंतिम विदाई, बेटों की मौजूदगी के बीच सुप्रीम लीडर मोज्तबा खामेनेई की गैरहाजिरी पर तेज हुई चर्चाएं

    नई दिल्ली । ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई को शनिवार को तेहरान में पूरे राजकीय और धार्मिक सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। अंतिम संस्कार में देश के शीर्ष राजनीतिक, सैन्य और धार्मिक नेतृत्व की मौजूदगी रही, जबकि सबसे अधिक चर्चा मौजूदा सुप्रीम लीडर मोज्तबा खामेनेई की सार्वजनिक गैरमौजूदगी को लेकर हुई। सुरक्षा कारणों के चलते उनके समारोह में खुलकर शामिल न होने की खबरों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापक चर्चा को जन्म दिया।

    अंतिम नमाज के दौरान अली खामेनेई के परिवार के कई सदस्य मौजूद रहे। उनके बेटों मसूद, मेयसाम और मुस्तफा ने अंतिम रस्मों में हिस्सा लिया और अपने पिता को श्रद्धांजलि अर्पित की। वहीं, देश के कई वरिष्ठ अधिकारी और धार्मिक नेता भी इस अवसर पर उपस्थित रहे। समारोह के दौरान बड़ी संख्या में नागरिकों ने भी अपने पूर्व सर्वोच्च नेता को अंतिम विदाई दी।

    ईरानी प्रशासन के अनुसार, अंतिम नमाज का नेतृत्व वरिष्ठ धार्मिक नेता आयतुल्ला जाफर सोभानी ने किया। उनके साथ ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन, संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ, न्यायपालिका प्रमुख गुलामहुसैन मोहसनी एजेई तथा इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे। कुद्स फोर्स के कमांडर इस्माइल क़ानी सहित कई प्रमुख सैन्य अधिकारी भी समारोह का हिस्सा बने।

  • भारत-जापान की बढ़ती रणनीतिक साझेदारी से चीन बेचैन, प्रधानमंत्री सनाए तकाइची के भारत दौरे पर 'टैप वॉटर' विवाद उछालकर रिश्तों पर उठाए सवाल

    भारत-जापान की बढ़ती रणनीतिक साझेदारी से चीन बेचैन, प्रधानमंत्री सनाए तकाइची के भारत दौरे पर 'टैप वॉटर' विवाद उछालकर रिश्तों पर उठाए सवाल

    नई दिल्ली । जापान की प्रधानमंत्री सनाए तकाइची के हालिया भारत दौरे के बाद एशियाई कूटनीति में एक नया विवाद सामने आया है। चीन के सरकारी मीडिया ने इस यात्रा के दौरान जापानी प्रतिनिधिमंडल द्वारा कथित तौर पर केवल बोतलबंद पानी के इस्तेमाल के मुद्दे को प्रमुखता देते हुए भारत-जापान संबंधों पर सवाल खड़े करने का प्रयास किया है। हालांकि भारत और जापान की ओर से इस विषय पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है, लेकिन इसे दोनों देशों की बढ़ती रणनीतिक साझेदारी के संदर्भ में देखा जा रहा है।

    चीनी सरकारी अखबार ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया कि जापानी प्रतिनिधिमंडल ने भारत में स्थानीय नल के पानी का उपयोग नहीं किया और पूरे दौरे के दौरान केवल पैक किए गए मिनरल वॉटर का ही इस्तेमाल किया। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि प्रतिनिधिमंडल के लिए पहले से बड़ी मात्रा में बोतलबंद पानी की व्यवस्था की गई थी तथा साफ-सफाई और स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों के लिए भी उसी का उपयोग किया गया। अखबार ने इस मामले को भारत के प्रति जापान के कथित दोहरे रवैये से जोड़ने की कोशिश की।

    रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि प्रधानमंत्री सनाए तकाइची ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ गर्मजोशीपूर्ण मुलाकात की और दोनों देशों के बीच मजबूत संबंधों पर जोर दिया। इसके बावजूद पानी के मुद्दे को उछालकर यह संदेश देने की कोशिश की गई कि व्यवहारिक स्तर पर जापान भारत को लेकर पूरी तरह सहज नहीं है। हालांकि इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है और न ही दोनों देशों ने इस विषय पर कोई आधिकारिक टिप्पणी की है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब भारत और जापान के बीच रक्षा, प्रौद्योगिकी, समुद्री सुरक्षा और महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति जैसे क्षेत्रों में सहयोग लगातार मजबूत हो रहा है। दोनों देशों ने हाल के वर्षों में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्थिरता और नियम-आधारित व्यवस्था को लेकर साझा दृष्टिकोण विकसित किया है। यही वजह है कि उनकी रणनीतिक साझेदारी को एशिया की बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    दोनों देशों के बीच नौसैनिक संचार प्रणाली, रक्षा तकनीक के संयुक्त विकास और महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाने जैसे कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी है। इन क्षेत्रों में चीन का लंबे समय से प्रभाव माना जाता रहा है। ऐसे में भारत और जापान की बढ़ती भागीदारी को बीजिंग अपने रणनीतिक हितों के लिए चुनौती के रूप में देख रहा है।

    हाल के संयुक्त बयानों में भारत और जापान ने दक्षिण चीन सागर तथा पूर्वी चीन सागर की स्थिति पर भी चिंता व्यक्त की है। दोनों देशों ने किसी भी क्षेत्र में बल प्रयोग या एकतरफा तरीके से यथास्थिति बदलने के प्रयासों का विरोध किया है। यद्यपि किसी देश का नाम नहीं लिया गया, लेकिन इसे क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े व्यापक संदेश के रूप में देखा गया। इसके बाद चीन ने भी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि किसी तीसरे देश को लक्ष्य बनाकर गठबंधन तैयार नहीं किए जाने चाहिए।

    विश्लेषकों का मानना है कि भारत की विनिर्माण क्षमता और जापान की उन्नत तकनीकी विशेषज्ञता भविष्य में कई रणनीतिक क्षेत्रों में नई संभावनाएं पैदा कर सकती है। यही कारण है कि दोनों देशों के बढ़ते सहयोग पर चीन लगातार नजर बनाए हुए है। ऐसे माहौल में ‘टैप वॉटर’ जैसे मुद्दे को प्रमुखता देकर भारत-जापान संबंधों को लेकर संदेह पैदा करने की कोशिश को व्यापक कूटनीतिक प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में देखा जा रहा है। फिलहाल दोनों देशों का ध्यान अपने दीर्घकालिक सहयोग को और मजबूत करने तथा क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा देने पर केंद्रित है।

  • ईरान में खामेनेई के अंतिम संस्कार के बीच ट्रंप का बड़ा दावा, लोगों के शोक पर जताई हैरानी, कहा- पूरी नेतृत्व व्यवस्था को निशाना बनाया जा सकता था

    ईरान में खामेनेई के अंतिम संस्कार के बीच ट्रंप का बड़ा दावा, लोगों के शोक पर जताई हैरानी, कहा- पूरी नेतृत्व व्यवस्था को निशाना बनाया जा सकता था


    नई दिल्ली ।
    ईरान के दिवंगत सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के अंतिम संस्कार के दौरान अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव एक बार फिर वैश्विक चर्चा का विषय बन गया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस अवसर पर ईरान को लेकर कई तीखे बयान दिए, जिनमें संभावित सैन्य कार्रवाई, दोनों देशों के बीच बातचीत और अंतिम संस्कार में उमड़ी भीड़ को लेकर उनकी प्रतिक्रिया शामिल रही। उनके बयान ने दोनों देशों के संबंधों को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

    ट्रंप ने कहा कि यदि अमेरिका चाहता तो ईरान के शीर्ष नेतृत्व को एक साथ निशाना बनाया जा सकता था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया क्योंकि भविष्य में बातचीत की संभावना बनी रहनी चाहिए। उन्होंने यह भी दावा किया कि दोनों पक्षों ने अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी होने तक वार्ता से कुछ समय का विराम लेने पर सहमति बनाई है। उनके अनुसार इस अवधि में किसी भी पक्ष की ओर से नए हमले नहीं किए जाएंगे।

    अमेरिकी राष्ट्रपति ने अंतिम संस्कार के दौरान बड़ी संख्या में मौजूद लोगों और उनके शोक व्यक्त करने पर भी आश्चर्य जताया। उन्होंने कहा कि उन्हें पहले यह धारणा थी कि ईरान के भीतर बड़ी संख्या में लोग खामेनेई के विरोधी हैं, लेकिन अंतिम संस्कार में दिखाई दिए जनसमूह और भावनात्मक माहौल ने उन्हें हैरान कर दिया। उन्होंने यह भी कहा कि इस दृश्य को लेकर अलग-अलग व्याख्याएं की जा सकती हैं।

    ईरान में अंतिम संस्कार की प्रक्रिया कई चरणों में आयोजित की जा रही है। राजधानी तेहरान में श्रद्धांजलि कार्यक्रम के बाद धार्मिक महत्व वाले शहरों में भी विभिन्न रस्में आयोजित की जा रही हैं। अंतिम चरण में खामेनेई को उनके गृह नगर में सुपुर्द-ए-खाक किए जाने की योजना है। सुरक्षा कारणों से पूरे कार्यक्रम के दौरान व्यापक इंतजाम किए गए हैं।

    इस बीच ईरान के सर्वोच्च नेतृत्व से जुड़े परिवार की सुरक्षा को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। सुरक्षा जोखिमों को देखते हुए परिवार के कुछ प्रमुख सदस्यों के सार्वजनिक कार्यक्रमों से दूर रहने की जानकारी सामने आई है। माना जा रहा है कि मौजूदा हालात और क्षेत्रीय तनाव को देखते हुए अतिरिक्त सतर्कता बरती जा रही है।

    खामेनेई के निधन के बाद मध्य पूर्व की राजनीतिक स्थिति पहले से अधिक संवेदनशील बनी हुई है। अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे मतभेदों के कारण दोनों देशों के हर बयान और कदम पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर बनी हुई है। ऐसे समय में ट्रंप के हालिया बयान को क्षेत्रीय कूटनीति और सुरक्षा परिदृश्य के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच संभावित वार्ता, क्षेत्रीय सुरक्षा और राजनीतिक घटनाक्रम वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय बने रहेंगे। फिलहाल ईरान में अंतिम संस्कार की रस्में जारी हैं, जबकि अमेरिका की ओर से दिए गए ताजा बयान ने एक बार फिर दोनों देशों के संबंधों को अंतरराष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया है।

  • पाकिस्तान में गैंगरेप मामले ने बढ़ाई शहबाज सरकार की मुश्किलें, विदेश मंत्री इशाक डार के रिश्तेदार की गिरफ्तारी के बाद इस्तीफे की मांग हुई तेज

    पाकिस्तान में गैंगरेप मामले ने बढ़ाई शहबाज सरकार की मुश्किलें, विदेश मंत्री इशाक डार के रिश्तेदार की गिरफ्तारी के बाद इस्तीफे की मांग हुई तेज

    नई दिल्ली । पाकिस्तान के लाहौर में दो विदेशी महिलाओं के कथित अपहरण और गैंगरेप के मामले ने वहां की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है। इस मामले में विदेश मंत्री और उप-प्रधानमंत्री इशाक डार के करीबी रिश्तेदार की गिरफ्तारी के बाद विपक्षी नेताओं ने सरकार पर गंभीर सवाल उठाए हैं। घटना को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है और इशाक डार से इस्तीफे की मांग भी सामने आने लगी है।

    मामले के अनुसार, नीदरलैंड और वेनेजुएला की दो महिलाओं के साथ लाहौर में कथित तौर पर अपहरण और सामूहिक दुष्कर्म की घटना हुई। शिकायत दर्ज होने के बाद पुलिस ने जांच शुरू की और अब तक चार संदिग्धों को गिरफ्तार किया है। एक अन्य आरोपी की तलाश जारी है। अदालत ने गिरफ्तार आरोपियों को आगे की पूछताछ के लिए पुलिस हिरासत में भेज दिया है।

    जांच के दौरान गिरफ्तार किए गए प्रमुख आरोपियों में मुहम्मद रज़ा डार का नाम सामने आया है। जांच एजेंसियों के अनुसार, वह इस मामले का मुख्य संदिग्ध माना जा रहा है। प्रारंभिक जांच में यह भी सामने आया कि दोनों विदेशी महिलाओं की मुलाकात रज़ा डार से पिछले वर्ष सिंगापुर में हुई थी। बाद में कथित तौर पर एक कारोबारी परियोजना के सिलसिले में संपर्क बढ़ा और महिलाओं के पाकिस्तान आने की व्यवस्था की गई।

    मामले के राजनीतिक पहलू ने तब और तूल पकड़ लिया जब विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि प्रभावशाली पारिवारिक संबंधों के कारण कार्रवाई में देरी हुई। विपक्ष का कहना है कि इतने गंभीर आरोपों के बावजूद मामले में निष्पक्ष और समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है। इसी मुद्दे को लेकर इशाक डार के पद पर बने रहने को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।

    विपक्षी नेता फैसल वावडा ने सार्वजनिक रूप से इशाक डार के इस्तीफे की मांग करते हुए कहा कि जब उनके करीबी रिश्तेदार पर इतने गंभीर आरोप लगे हैं, तब उन्हें सरकार के महत्वपूर्ण पदों पर बने रहने पर जवाब देना चाहिए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि आरोपी की गिरफ्तारी में देरी हुई और मामले में उच्च स्तर पर प्रभाव डालने की कोशिश की गई। हालांकि इन आरोपों पर सरकार की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

    घटना ने पाकिस्तान की कानून-व्यवस्था और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर भी बहस तेज कर दी है। विदेशी नागरिकों से जुड़े गंभीर आपराधिक मामलों का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी असर पड़ सकता है। ऐसे मामलों में पारदर्शी जांच और त्वरित न्यायिक प्रक्रिया को लेकर दबाव बढ़ना स्वाभाविक माना जा रहा है।

    फिलहाल पुलिस मामले की विस्तृत जांच कर रही है और फरार आरोपी की तलाश जारी है। जांच एजेंसियां घटना से जुड़े सभी पहलुओं की पड़ताल कर रही हैं, जबकि राजनीतिक हलकों में इस मामले को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। आने वाले दिनों में जांच की प्रगति और न्यायिक प्रक्रिया इस मामले की दिशा तय करेगी, वहीं यह घटनाक्रम पाकिस्तान की राजनीति और सरकार के लिए भी एक बड़ी चुनौती बनता दिखाई दे रहा है।

  • Heatwave Diplomacy यूरोप की लू पर ईरान की सियासी चाल बैन हटाने के बदले एसी सप्लाई का प्रस्ताव

    Heatwave Diplomacy यूरोप की लू पर ईरान की सियासी चाल बैन हटाने के बदले एसी सप्लाई का प्रस्ताव


    नई दिल्ली। यूरोप इन दिनों रिकॉर्ड तोड़ गर्मी और भीषण लू की मार झेल रहा है। कई देशों में तापमान 44 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने की आशंका जताई जा रही है जबकि स्पेन फ्रांस और अन्य हिस्सों में लगातार हीटवेव के कारण जनजीवन प्रभावित है। इसी बीच ईरान ने यूरोपीय देशों के सामने एक ऐसा प्रस्ताव रखा है जिसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति दोनों में नई चर्चा छेड़ दी है। ईरान ने कहा है कि यदि यूरोप उस पर लगाए गए प्रतिबंध हटाता है तो वह अपने यहां निर्मित एयर कंडीशनर और अन्य कूलिंग उपकरणों की आपूर्ति कर यूरोप को गर्मी से राहत दिलाने में मदद कर सकता है।

    यह प्रस्ताव तुर्की स्थित ईरानी दूतावास की ओर से सोशल मीडिया मंच एक्स पर साझा किया गया। पोस्ट में कहा गया कि वर्षों से आर्थिक प्रतिबंधों का सामना करने के बावजूद ईरान ने घरेलू तकनीक के दम पर एयर कंडीशनर और अन्य शीतलन उपकरण बनाने की क्षमता विकसित कर ली है। इतना ही नहीं देश अब बड़े पैमाने पर इनका उत्पादन और निर्यात करने की स्थिति में भी पहुंच चुका है। दूतावास ने संकेत दिया कि यदि यूरोपीय देश प्रतिबंधों में नरमी दिखाते हैं तो ईरान गर्मी से जूझ रहे देशों की मदद करने के लिए तैयार है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल व्यापारिक प्रस्ताव नहीं बल्कि एक कूटनीतिक संदेश भी है। ईरान लंबे समय से पश्चिमी देशों के आर्थिक प्रतिबंधों का विरोध करता रहा है। ऐसे में यूरोप की मौजूदा चुनौती को आधार बनाकर ईरान ने यह दिखाने की कोशिश की है कि प्रतिबंधों के बावजूद उसने तकनीकी आत्मनिर्भरता हासिल कर ली है और अब वह वैश्विक बाजार में अपनी भूमिका निभाने में सक्षम है।

    यूरोप इस समय जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों का सामना कर रहा है। कई देशों में गर्मी के पुराने रिकॉर्ड टूट रहे हैं। मौसम एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि आने वाले दिनों में तापमान और बढ़ सकता है जिससे जंगलों में आग लगने का खतरा भी बढ़ेगा। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बुजुर्गों बच्चों और पहले से बीमार लोगों को विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी है क्योंकि अत्यधिक तापमान उनके लिए जानलेवा साबित हो सकता है।

    रिपोर्टों के अनुसार हाल के सप्ताहों में भीषण गर्मी के कारण स्पेन और फ्रांस सहित कई देशों में बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई है। प्रशासन लोगों को घरों में रहने पर्याप्त पानी पीने और धूप से बचने की सलाह दे रहा है। कई शहरों में आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं को भी अलर्ट पर रखा गया है।

    ईरान के प्रस्ताव को कुछ विश्लेषक राजनीतिक व्यंग्य के रूप में भी देख रहे हैं। उनका मानना है कि ईरान ने यह संदेश देकर यूरोपीय देशों की उस चुनौती की ओर इशारा किया है जिसमें विकसित होने के बावजूद वे चरम मौसम की परिस्थितियों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हालांकि अभी तक यूरोपीय देशों की ओर से इस प्रस्ताव पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

    जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे के बीच यह घटनाक्रम इस बात की भी याद दिलाता है कि मौसम से जुड़ी आपदाएं अब केवल पर्यावरण का विषय नहीं रह गई हैं बल्कि वे वैश्विक राजनीति व्यापार और कूटनीति को भी नई दिशा देने लगी हैं।

  • धरती की सबसे अनोखी बस्ती: सूरज के सबसे करीब बसे चिम्बोराजो के लोग, जानिए कैसे जीते हैं यहां के लोग

    धरती की सबसे अनोखी बस्ती: सूरज के सबसे करीब बसे चिम्बोराजो के लोग, जानिए कैसे जीते हैं यहां के लोग


    नई दिल्ली। अगर आप सोचते हैं कि धरती पर सूरज और अंतरिक्ष के सबसे करीब पहुंचने वाली जगह माउंट एवरेस्ट है, तो यह पूरी तरह सही नहीं है। वैज्ञानिक और भौगोलिक दृष्टि से यह गौरव दक्षिण अमेरिका के इक्वाडोर स्थित माउंट चिम्बोराजो को हासिल है।

    हालांकि समुद्र तल से सबसे ऊंचा पर्वत माउंट एवरेस्ट है, लेकिन पृथ्वी भूमध्य रेखा के आसपास उभरी हुई है। इसी वजह से भूमध्य रेखा के निकट स्थित चिम्बोराजो की चोटी, पृथ्वी के केंद्र से मापने पर अंतरिक्ष और सूरज के सबसे करीब पहुंचती है। इस बर्फीले और दुर्गम पर्वत की ढलानों पर आज भी हजारों लोग अपना जीवन बिता रहे हैं।

    समुद्र तल से 6,268 मीटर ऊंचे चिम्बोराजो की चोटी पर विशाल ग्लेशियर फैले हुए हैं। वहीं 3,500 से 4,200 मीटर की ऊंचाई के बीच फैले घास के मैदानों में छोटे-छोटे गांव बसे हैं। यहां मुख्य रूप से ‘क्वेशुआ’ और ‘पुरुहा’ आदिवासी समुदाय के कुछ हजार लोग रहते हैं, जिनके पूर्वजों ने सदियों पहले इस कठिन पर्वतीय क्षेत्र को अपना घर बनाया था।

    कम ऑक्सीजन में भी सामान्य जीवन
    इतनी अधिक ऊंचाई पर पहुंचने वाले अधिकांश लोगों को सांस लेने में परेशानी, सिरदर्द और चक्कर जैसी दिक्कतें होती हैं, लेकिन पीढ़ियों से यहां रहने वाले लोगों का शरीर कम ऑक्सीजन वाले वातावरण के अनुरूप ढल चुका है। यहां रात के समय तापमान अक्सर शून्य से नीचे चला जाता है और तेज ठंडी हवाएं लगातार चलती रहती हैं।

    कड़ाके की ठंड से बचने के लिए स्थानीय लोग मिट्टी की मोटी दीवारों वाले घर बनाते हैं, जिन्हें ‘चोजा’ कहा जाता है। इन घरों की छतों पर सूखी घास की मोटी परत बिछाई जाती है, जो दिन में गर्मी सोखकर रात में घर को गर्म बनाए रखती है। भोजन में गर्म जड़ी-बूटियों की चाय, आलू, चीज और एवोकाडो से बने सूप प्रमुख हैं, जबकि मांस भी उनके खानपान का अहम हिस्सा है। यहां की आजीविका खेती से अधिक पशुपालन पर आधारित है।

    ऊन देने वाले जानवरों पर टिकी आजीविका
    चिम्बोराजो क्षेत्र लामा, अल्पाका और विकुना जैसे ऊन देने वाले जानवरों का प्राकृतिक आवास है। इन्हीं की ऊन से स्थानीय लोग पारंपरिक मोटे कपड़े और पोंचो तैयार करते हैं, जो उन्हें कड़ाके की ठंड से बचाते हैं। पुरुष पोंचो पहनते हैं, जबकि महिलाएं लंबी ऊनी स्कर्ट और शॉल धारण करती हैं। बर्फ से ढके पहाड़ों के बीच उनके लाल, नीले और हरे रंग के पारंपरिक वस्त्र अलग ही आकर्षण पैदा करते हैं। खड़ी पहाड़ी ढलानों पर सामान ढोने में लामा आज भी उनके सबसे भरोसेमंद साथी हैं।

    पहाड़ नहीं, परिवार का संरक्षक
    स्थानीय लोगों के लिए चिम्बोराजो केवल एक पर्वत नहीं, बल्कि ‘पिता चिम्बोराजो’ है। उनका विश्वास है कि यह पर्वत उनकी रक्षा करता है। किसी भी खेती या शुभ कार्य से पहले वे पर्वत का आशीर्वाद लेते हैं। उनका मानना है कि पहाड़ के नाराज होने पर तूफान जैसी प्राकृतिक आपदाएं आती हैं।

    इस पर्वत से जुड़ी ‘हिएलेरोस’ नाम की एक सदियों पुरानी परंपरा भी प्रसिद्ध रही है। ‘हिएलेरोस’ यानी बर्फ निकालने वाले लोग ग्लेशियरों तक पहुंचकर बर्फ की बड़ी-बड़ी सिल्लियां काटते थे, उन्हें घास में लपेटकर नीचे के शहरों में बेचते थे। आधुनिक समय में यह परंपरा लगभग समाप्त हो चुकी है, लेकिन यह आज भी यहां के लोगों के संघर्ष और मेहनत की मिसाल मानी जाती है।

    बदलते मौसम के साथ बदल रही जिंदगी
    ग्लोबल वार्मिंग का असर अब चिम्बोराजो पर भी साफ दिखाई दे रहा है। तेजी से पिघलते ग्लेशियर भविष्य में इन बस्तियों के लिए पानी का संकट पैदा कर सकते हैं। बेहतर रोजगार और सुविधाओं की तलाश में कई युवा शहरों की ओर जा रहे हैं। वहीं, पहाड़ पर रहने वाले लोगों ने कम्युनिटी टूरिज्म को आजीविका का नया माध्यम बना लिया है। वे दुनिया भर से आने वाले ट्रैकर्स और पर्वतारोहियों के लिए गाइड का काम करते हैं, जबकि महिलाएं अपने हाथों से बुने ऊनी वस्त्र बेचकर आय अर्जित कर रही हैं।

    चिम्बोराजो के निवासी यह साबित करते हैं कि सीमित संसाधनों और कठिन प्राकृतिक परिस्थितियों के बावजूद दृढ़ इच्छाशक्ति के सहारे जीवन को सफल बनाया जा सकता है। यही वजह है कि उन्हें पूरी दुनिया में ‘सूरज का सबसे करीबी पड़ोसी’ होने का अनूठा गौरव प्राप्त है।

  • ट्रंप का खामेनेई के जनाजे पर पहुंचे ईरानी नेताओं पर बड़ा दावा, कहा- “चाहते तो एक ही वार में सबको मार सकते थे”

    ट्रंप का खामेनेई के जनाजे पर पहुंचे ईरानी नेताओं पर बड़ा दावा, कहा- “चाहते तो एक ही वार में सबको मार सकते थे”


    नई दिल्‍ली । अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर बड़ा दावा किया है. ट्रंप का कहना है कि ‘अमेरिका चाहता तो एक ही वार में ईरान के सभी बड़े नेताओं को हमेशा के लिए खत्म कर सकता था, जो अली खामेनेई के जनाजे में शामिल होने पहुंचे थे’. हालांकि, उन्होंने ऐसा नहीं किया, क्योंकि वो ईरान के साथ परमाणु बातचीत को आगे बढ़ाना चाहते हैं. यह हैरान करने वाली बात ट्रंप ने अपने एक इंटरव्यू कही.

    दरअसल, ट्रंप ने शनिवार को एक्सिओस (Axios) के साथ एक संक्षिप्त फोन इंटरव्यू में यह बयान दिया. इस दौरान उन्होंने साफ शब्दों में कहा, ‘एक ही वार में हम सबको खत्म कर सकते थे, लेकिन हम ऐसा नहीं करेंगे, क्योंकि फिर हमारे पास बातचीत करने के लिए कोई नहीं बचेगा’. उन्होंने आगे दावा किया कि ईरान इस समय समझौता करने के लिए पूरी तरह तैयार है और किसी भी तरह बातचीत शुरू करना चाहता है. ट्रंप के मुताबिक, अमेरिका की प्राथमिकता सिर्फ सैन्य कार्रवाई करना नहीं, बल्कि ईरान के साथ परमाणु मुद्दे पर बातचीत की संभावना को भी बनाए रखना है.

    फिलहाल दोनों पक्षों ने कुछ दिनों के लिए बातचीत को रोकने पर सहमति जताई है. इसकी वजह यह है कि पूर्व सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के जनाजे की रस्में अभी पूरी होनी बाकी हैं. इसी बातचीत में उन्होंने अपने उस पुराने दावे को फिर से दोहराया कि खामेनेई तो युद्ध के पहले ही दिन अमेरिका और इजरायल के एक साझा मिलिट्री ऑपरेशन में मारे गए थे.

    भीड़ देखकर हैरान हुए ट्रंप
    ईरान के इस पूरे घटनाक्रम पर बात करते हुए ट्रंप ने कहा कि वह अली खामेनेई के जनाजे में जुटी भीड़ को देखकर हैरान रह गए. उनके मुताबिक उन्हें लगता था कि वहां के लोग खामेनेई से नफरत करते हैं, इसलिए इतनी बड़ी भीड़ देखकर उन्हें आश्चर्य हुआ. ट्रंप ने यह भी कहा कि हो सकता है कि वहां मौजूद लोगों के आंसू सच्चे न हों.

  • सिंधु जल विवाद पर पाकिस्तान के आरोपों की पड़ताल, जल संकट की जड़ में भारत नहीं बल्कि दशकों की नीतिगत लापरवाही?

    सिंधु जल विवाद पर पाकिस्तान के आरोपों की पड़ताल, जल संकट की जड़ में भारत नहीं बल्कि दशकों की नीतिगत लापरवाही?

    नई दिल्ली । पाकिस्तान में गहराते जल संकट को लेकर एक बार फिर भारत और सिंधु जल संधि चर्चा के केंद्र में हैं। पाकिस्तान की ओर से भारत पर पानी रोकने और जल संकट पैदा करने के आरोप लगाए जा रहे हैं, जबकि विशेषज्ञों का एक वर्ग मानता है कि मौजूदा स्थिति के पीछे सबसे बड़ी वजह पाकिस्तान की अपनी जल प्रबंधन प्रणाली, अधूरी परियोजनाएं और दशकों से चली आ रही नीतिगत कमियां हैं। इसी कारण यह बहस तेज हो गई है कि संकट का वास्तविक कारण सीमा पार की गतिविधियां हैं या घरेलू स्तर पर जल संसाधनों का कमजोर प्रबंधन।

    सिंधु जल संधि के तहत भारत और पाकिस्तान के बीच नदियों के जल बंटवारे की व्यवस्था पहले से निर्धारित है। भारत को आवंटित पूर्वी नदियों के जल का उपयोग करने का अधिकार प्राप्त है। हाल के वर्षों में भारत ने अपने हिस्से के पानी के बेहतर उपयोग के लिए कई सिंचाई और जल भंडारण परियोजनाओं पर काम तेज किया है। इन परियोजनाओं का उद्देश्य भारत को आवंटित जल संसाधनों का अधिकतम उपयोग करना है, न कि पाकिस्तान के हिस्से का पानी रोकना।

    विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान लंबे समय से पर्याप्त जलाशयों और आधुनिक जल संरक्षण ढांचे के निर्माण में अपेक्षित निवेश नहीं कर पाया। परिणामस्वरूप मानसून के दौरान बड़ी मात्रा में पानी बिना उपयोग के समुद्र में बह जाता है। इसके अलावा कई बड़े बांधों में वर्षों से गाद जमा होने के कारण उनकी जल भंडारण क्षमता भी लगातार कम होती गई है, जिससे सूखे और जल संकट की स्थिति और गंभीर होती है।

    जल संसाधन प्रबंधन से जुड़े जानकारों का यह भी मानना है कि पाकिस्तान के कई क्षेत्रों में पुरानी सिंचाई प्रणाली, रिसाव, अवैध जल दोहन और वितरण व्यवस्था की कमजोर निगरानी के कारण बड़ी मात्रा में पानी बर्बाद होता है। कृषि क्षेत्र में भी पानी के उपयोग की दक्षता अपेक्षाकृत कम मानी जाती है, जिससे उपलब्ध संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। कई शहरी क्षेत्रों में पाइपलाइन नेटवर्क की खराब स्थिति और अवैध जल आपूर्ति भी संकट को बढ़ाने वाले कारकों में शामिल हैं।

    हाल के वर्षों में भारत ने सीमावर्ती क्षेत्रों में जल संसाधनों के बेहतर उपयोग के उद्देश्य से कई परियोजनाओं को गति दी है। इनका उद्देश्य अपने हिस्से के जल का उपयोग बढ़ाना, सिंचाई सुविधाओं का विस्तार करना और जल संरक्षण को मजबूत बनाना है। विशेषज्ञों का कहना है कि इन परियोजनाओं को सिंधु जल संधि के प्रावधानों के अनुरूप तैयार किया गया है और इनका उद्देश्य जल प्रवाह को राजनीतिक हथियार बनाना नहीं बल्कि उपलब्ध अधिकारों का उपयोग करना है।

    दूसरी ओर पाकिस्तान में जल अवसंरचना से जुड़े निवेश में कमी, नए बांधों के निर्माण में देरी और जल संरक्षण योजनाओं के धीमे क्रियान्वयन को लेकर भी लगातार सवाल उठते रहे हैं। विभिन्न विश्लेषणों में यह बात सामने आई है कि यदि समय रहते जलाशयों का विस्तार, वितरण व्यवस्था का आधुनिकीकरण और जल संरक्षण पर प्रभावी निवेश किया जाता, तो वर्तमान संकट की गंभीरता काफी हद तक कम हो सकती थी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि जल संकट जैसे जटिल मुद्दे का समाधान केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से संभव नहीं है। दीर्घकालिक समाधान के लिए प्रभावी जल प्रबंधन, आधुनिक अवसंरचना, जल संरक्षण तकनीकों का व्यापक उपयोग और संसाधनों के वैज्ञानिक प्रबंधन की आवश्यकता होगी। ऐसे कदम ही भविष्य में जल सुरक्षा सुनिश्चित करने और क्षेत्रीय स्तर पर स्थायी समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।