Category: International

  • लंदन में PoK को लेकर जोरदार प्रदर्शन, पाकिस्तान हाई कमीशन तक निकाला मार्च; गिरफ्तारियों के विरोध में गूंजे आजादी के नारे

    लंदन में PoK को लेकर जोरदार प्रदर्शन, पाकिस्तान हाई कमीशन तक निकाला मार्च; गिरफ्तारियों के विरोध में गूंजे आजादी के नारे

    नई दिल्ली । पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर से जुड़े मुद्दों की गूंज अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सुनाई देने लगी है। लंदन में बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों ने सड़कों पर उतरकर पाकिस्तान के खिलाफ विरोध मार्च निकाला और पाकिस्तान हाई कमीशन तक पहुंचकर अपनी मांगों को जोरदार ढंग से उठाया। प्रदर्शन के दौरान पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्र में चल रहे आंदोलन के समर्थन में नारे लगाए गए और हालिया गिरफ्तारियों पर भी कड़ी आपत्ति जताई गई।

    प्रदर्शनकारियों ने पार्लियामेंट स्क्वायर से पाकिस्तान हाई कमीशन तक मार्च किया। इस दौरान बड़ी संख्या में लोगों ने रैली में भाग लेते हुए पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर की मौजूदा स्थिति पर चिंता व्यक्त की। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि क्षेत्र में राजनीतिक गतिविधियों पर कार्रवाई और आंदोलन से जुड़े नेताओं की गिरफ्तारी लोकतांत्रिक अधिकारों के विपरीत है।

    विरोध मार्च में शामिल लोगों ने जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी के प्रमुख शौकत नवाज मीर और अन्य नेताओं की गिरफ्तारी की निंदा की। प्रदर्शनकारियों ने मांग की कि आंदोलन से जुड़े सभी नेताओं को जल्द रिहा किया जाए और स्थानीय नागरिकों को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने का अधिकार दिया जाए। उन्होंने कहा कि आंदोलन को दबाने के प्रयासों से लोगों में असंतोष और बढ़ रहा है।

    आंदोलन से जुड़े प्रतिनिधियों ने दावा किया कि पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में लोगों के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर लगातार आवाज उठाई जा रही है। उनका कहना है कि क्षेत्र में राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों को लेकर व्यापक असंतोष मौजूद है, जिसे अब अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। प्रदर्शन के दौरान भविष्य में आंदोलन को और तेज करने के संकेत भी दिए गए।

    जम्मू-कश्मीर नेशनल इंडिपेंडेंस अलायंस के चेयरमैन महमूद कश्मीरी ने प्रदर्शन को संबोधित करते हुए कहा कि विभिन्न देशों में रह रहे कश्मीरी समुदाय के लोग भी इस अभियान में अपनी भागीदारी दर्ज करा रहे हैं। उन्होंने कहा कि आंदोलन का उद्देश्य अपने मुद्दों को वैश्विक समुदाय के सामने रखना है और इसे आगे भी जारी रखा जाएगा।

    प्रदर्शन के दौरान कुछ प्रतिभागियों ने नियंत्रण रेखा से जुड़े मुद्दों और क्षेत्र में मानवीय परिस्थितियों पर भी अपनी चिंता व्यक्त की। उनका कहना था कि स्थानीय लोगों की समस्याओं का शांतिपूर्ण और स्थायी समाधान तलाशा जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने क्षेत्र में नागरिक अधिकारों और राजनीतिक स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय ध्यान आकर्षित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

    विशेषज्ञों का मानना है कि विदेशों में आयोजित ऐसे प्रदर्शन यह संकेत देते हैं कि पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर से जुड़े मुद्दे अब प्रवासी समुदायों के बीच भी चर्चा का विषय बन रहे हैं। हालांकि इन दावों और आरोपों पर अलग-अलग पक्षों के अपने-अपने दृष्टिकोण हैं। ऐसे में क्षेत्र की स्थिति और उससे जुड़े घटनाक्रम पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लगातार नजर बनी हुई है।

  • तीन देशों की अहम यात्रा पर रवाना हुए प्रधानमंत्री मोदी, इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के साथ आर्थिक व रणनीतिक साझेदारी को मिलेगा नया विस्तार

    तीन देशों की अहम यात्रा पर रवाना हुए प्रधानमंत्री मोदी, इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के साथ आर्थिक व रणनीतिक साझेदारी को मिलेगा नया विस्तार

    नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी छह दिवसीय विदेश यात्रा पर इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के दौरे के लिए रवाना हो गए हैं। यह यात्रा भारत के लिए कूटनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इस दौरान विभिन्न द्विपक्षीय बैठकों, उच्चस्तरीय वार्ताओं और भारतीय समुदाय के साथ संवाद के माध्यम से तीनों देशों के साथ सहयोग को और व्यापक बनाने पर जोर रहेगा। यात्रा का उद्देश्य व्यापार, निवेश, रक्षा, शिक्षा, तकनीक और लोगों के बीच संबंधों को नई दिशा देना भी है।

    रवाना होने से पहले प्रधानमंत्री ने कहा कि यह दौरा भारत के प्रमुख विकास साझेदार देशों के साथ संबंधों को और मजबूत करने का अवसर प्रदान करेगा। उन्होंने कहा कि आर्थिक और रणनीतिक सहयोग को नई गति देने के साथ-साथ युवाओं के लिए अधिक अवसर उपलब्ध कराने पर भी विशेष ध्यान रहेगा। उन्होंने विश्वास जताया कि इस यात्रा से भारत के वैश्विक सहयोग और क्षेत्रीय साझेदारी को नया बल मिलेगा।

    यात्रा का पहला पड़ाव इंडोनेशिया है, जहां प्रधानमंत्री कई उच्चस्तरीय कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे। दोनों देशों के बीच वर्षों से मजबूत सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और समुद्री संबंध रहे हैं। इस दौरे के दौरान द्विपक्षीय सहयोग के विभिन्न क्षेत्रों की समीक्षा के साथ भविष्य की साझेदारी को और व्यापक बनाने पर चर्चा होने की संभावना है। सांस्कृतिक विरासत से जुड़े कार्यक्रम भी यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा होंगे, जो दोनों देशों के ऐतिहासिक संबंधों को नई मजबूती देंगे।

    इंडोनेशिया के बाद प्रधानमंत्री ऑस्ट्रेलिया पहुंचेंगे, जहां रक्षा, सुरक्षा, व्यापार, निवेश, शिक्षा, कौशल विकास और तकनीकी सहयोग जैसे प्रमुख विषयों पर वार्ता होगी। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच पिछले कुछ वर्षों में रणनीतिक संबंध लगातार मजबूत हुए हैं। दोनों देशों के बीच इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सहयोग, उभरती प्रौद्योगिकियों, नवाचार और खेल विज्ञान जैसे क्षेत्रों में भी साझेदारी बढ़ाने पर विशेष जोर रहने की उम्मीद है।

    ऑस्ट्रेलिया प्रवास के दौरान प्रधानमंत्री भारतीय समुदाय के प्रतिनिधियों से भी मुलाकात करेंगे। विदेशों में बसे भारतीय समुदाय को भारत और संबंधित देशों के बीच सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है। ऐसे संवाद दोनों देशों के बीच लोगों के स्तर पर संपर्क को और मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं।

    यात्रा के अंतिम चरण में प्रधानमंत्री न्यूजीलैंड जाएंगे। इस दौरान दोनों देशों के बीच आर्थिक और व्यापारिक संबंधों को नई गति देने, निवेश बढ़ाने और व्यावसायिक सहयोग को विस्तार देने पर चर्चा होगी। साथ ही विभिन्न क्षेत्रों में द्विपक्षीय सहयोग को और मजबूत बनाने के उपायों पर भी विचार-विमर्श किया जाएगा। भारतीय समुदाय के साथ संवाद भी इस दौरे का महत्वपूर्ण हिस्सा रहेगा।

    भारत और न्यूजीलैंड के बीच व्यापार, शिक्षा, कृषि, नवाचार और सेवा क्षेत्र में सहयोग की संभावनाएं लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में यह यात्रा दोनों देशों के संबंधों को नई दिशा देने वाली मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि नियमित उच्चस्तरीय संवाद से दोनों देशों के बीच आर्थिक साझेदारी को और मजबूती मिल सकती है।

    प्रधानमंत्री की यह तीन देशों की यात्रा भारत की एक्ट ईस्ट नीति और मुक्त, समावेशी तथा नियम-आधारित हिंद-प्रशांत क्षेत्र की अवधारणा को भी आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। इसके साथ ही क्षेत्रीय स्थिरता, समुद्री सहयोग और वैश्विक साझेदारी को मजबूत करने के भारत के प्रयासों को भी इस दौरे से नई गति मिलने की उम्मीद है।

  • अंकारा में वैश्विक सुरक्षा पर बड़ा मंथन, नाटो समिट में ट्रंप का फोकस रक्षा बजट, हथियार सहयोग और रूस-यूक्रेन युद्ध पर रहेगा

    अंकारा में वैश्विक सुरक्षा पर बड़ा मंथन, नाटो समिट में ट्रंप का फोकस रक्षा बजट, हथियार सहयोग और रूस-यूक्रेन युद्ध पर रहेगा

    नई दिल्ली। वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था और बदलते भू-राजनीतिक हालात के बीच नाटो का आगामी शिखर सम्मेलन तुर्किए की राजधानी अंकारा में आयोजित होने जा रहा है। इस सम्मेलन में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मौजूदगी सबसे अधिक चर्चा में है। सम्मेलन के दौरान उनका मुख्य फोकस रक्षा खर्च बढ़ाने, सदस्य देशों के बीच जिम्मेदारियों के संतुलित बंटवारे और रक्षा औद्योगिक सहयोग को मजबूत करने पर रहेगा। इसके साथ ही रूस-यूक्रेन युद्ध और यूरोप की सुरक्षा से जुड़े मुद्दे भी प्रमुख एजेंडे में शामिल हैं।

    ट्रंप सम्मेलन के दौरान तुर्किए के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगे। दोनों नेताओं के बीच क्षेत्रीय सुरक्षा, रक्षा सहयोग और रणनीतिक साझेदारी को लेकर विस्तार से चर्चा होने की संभावना है। इसके अलावा ट्रंप यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की और सीरिया के अंतरिम राष्ट्रपति अहमद अल-शरा से भी अलग-अलग मुलाकात करेंगे। इन बैठकों में क्षेत्रीय संघर्षों, सुरक्षा सहयोग और भविष्य की रणनीति पर विचार-विमर्श किया जाएगा।

    समिट के कार्यक्रम के अनुसार ट्रंप नाटो नेताओं के आधिकारिक स्वागत समारोह, सामूहिक फोटो सत्र और कार्यकारी बैठकों में हिस्सा लेंगे। सम्मेलन के दौरान सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष रक्षा और सुरक्षा से जुड़े विभिन्न प्रस्तावों पर चर्चा करेंगे। समापन से पहले ट्रंप मीडिया को संबोधित करेंगे और उसके बाद अपनी निर्धारित द्विपक्षीय बैठकों को पूरा करेंगे।

    इस बार सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण विषय नाटो देशों द्वारा रक्षा बजट बढ़ाने की प्रतिबद्धता माना जा रहा है। पिछले वर्ष सदस्य देशों ने अपनी सकल घरेलू उत्पाद का पांच प्रतिशत रक्षा क्षेत्र पर खर्च करने की दिशा में आगे बढ़ने का संकल्प लिया था। अब इस लक्ष्य की दिशा में हुई प्रगति की समीक्षा की जाएगी। अमेरिका चाहता है कि सभी सदस्य देश अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने के लिए तय समयसीमा के भीतर रक्षा निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि करें।

    अमेरिकी पक्ष का मानना है कि यूरोप के कई देशों ने रक्षा खर्च बढ़ाने की दिशा में सकारात्मक कदम उठाए हैं। पोलैंड, नॉर्डिक देशों और बाल्टिक क्षेत्र के देशों को इस मामले में अग्रणी बताया जा रहा है, जबकि जर्मनी भी निर्धारित लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ रहा है। इसके बावजूद अमेरिका का मानना है कि सभी सदस्य देशों को समान रूप से जिम्मेदारी निभानी होगी ताकि गठबंधन का सामूहिक सुरक्षा ढांचा और अधिक मजबूत बन सके।

    सम्मेलन में रक्षा उत्पादन बढ़ाने और सैन्य उपकरणों के संयुक्त निर्माण पर भी विशेष जोर दिया जाएगा। अमेरिका का उद्देश्य सहयोगी देशों के साथ आधुनिक हथियार प्रणालियों, रक्षा तकनीक और उत्पादन क्षमता को बढ़ाना है। माना जा रहा है कि सम्मेलन के दौरान रक्षा क्षेत्र में कई बड़े निवेश और सैन्य खरीद से जुड़े समझौतों की घोषणा भी हो सकती है, जिनकी कुल कीमत अरबों डॉलर तक पहुंच सकती है।

    रूस-यूक्रेन युद्ध भी सम्मेलन के सबसे अहम विषयों में रहेगा। ट्रंप और जेलेंस्की की प्रस्तावित बैठक में युद्ध समाप्त करने के संभावित विकल्पों और कूटनीतिक प्रयासों पर चर्चा होने की संभावना है। अमेरिका का कहना है कि युद्ध को जल्द समाप्त करना मानवीय और वैश्विक सुरक्षा दोनों दृष्टि से आवश्यक है। बैठक के बाद ट्रंप की रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से भी बातचीत हो सकती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि रूस-यूक्रेन संघर्ष के बाद यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था तेजी से बदली है और इसी कारण नाटो अपने रणनीतिक ढांचे में व्यापक बदलाव कर रहा है। ऐसे समय में अंकारा समिट को गठबंधन की भविष्य की रक्षा नीति, सामूहिक सुरक्षा और सदस्य देशों की साझा जिम्मेदारियों को नई दिशा देने वाला महत्वपूर्ण सम्मेलन माना जा रहा है।

  • नाटो की एकजुटता पर उठे सवाल, अंकारा बैठक से पहले रक्षा बजट, अमेरिकी रणनीति और यूरोपीय असहमति बनी बड़ी परीक्षा

    नाटो की एकजुटता पर उठे सवाल, अंकारा बैठक से पहले रक्षा बजट, अमेरिकी रणनीति और यूरोपीय असहमति बनी बड़ी परीक्षा

    नई दिल्ली । अंकारा में इस सप्ताह होने जा रहे नाटो शिखर सम्मेलन से पहले संगठन के भीतर बढ़ते मतभेद एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों के बीच गठबंधन जहां एकजुटता का संदेश देने की तैयारी कर रहा है, वहीं रक्षा खर्च, पश्चिम एशिया की स्थिति और भविष्य की रणनीतिक दिशा जैसे मुद्दों पर सदस्य देशों के अलग-अलग रुख ने उसकी एकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

    सम्मेलन ऐसे समय आयोजित हो रहा है जब हाल के महीनों में पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव और ईरान से जुड़े घटनाक्रम ने सहयोगी देशों के बीच दृष्टिकोण का अंतर स्पष्ट कर दिया है। कई यूरोपीय देशों ने कूटनीतिक स्तर पर अमेरिका के उद्देश्य का समर्थन किया, लेकिन किसी भी सैन्य अभियान में प्रत्यक्ष भागीदारी से दूरी बनाए रखी। इससे यह संकेत मिला कि सुरक्षा संबंधी मामलों में सभी सदस्य समान रणनीति अपनाने के पक्ष में नहीं हैं।

    विश्लेषकों का मानना है कि यूरोपीय देशों की प्राथमिकताएं अमेरिका से अलग हैं। उनके लिए क्षेत्रीय स्थिरता, ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा और संभावित शरणार्थी संकट जैसे मुद्दे अधिक महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप से बचना उनकी रणनीतिक आवश्यकता माना जा रहा है। इराक, अफगानिस्तान और लीबिया जैसे संघर्षों के अनुभवों ने भी कई यूरोपीय सरकारों को सैन्य अभियानों को लेकर अधिक सतर्क बना दिया है।

    सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण विषय रक्षा बजट बढ़ाने की योजना रहने की संभावना है। सदस्य देशों ने पहले 2035 तक रक्षा खर्च को सकल घरेलू उत्पाद के पांच प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य स्वीकार किया था। हालांकि इस लक्ष्य को लागू करना कई देशों के लिए आसान नहीं माना जा रहा है। आर्थिक सुस्ती, बढ़ता सार्वजनिक कर्ज और सामाजिक कल्याण पर बढ़ते खर्च के कारण अनेक सरकारों के सामने संसाधनों का संतुलन बड़ी चुनौती बन सकता है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि कई यूरोपीय देशों में मतदाता स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा जैसी प्राथमिकताओं को रक्षा बजट से अधिक महत्व देते हैं। ऐसे में सरकारों के लिए सैन्य खर्च में बड़े स्तर की वृद्धि को राजनीतिक समर्थन दिलाना कठिन हो सकता है। यही कारण है कि लक्ष्य तय होने के बावजूद उसके क्रियान्वयन को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।

    नाटो की रणनीतिक दिशा को लेकर भी बहस तेज होती जा रही है। अमेरिका लंबे समय से यूरोपीय देशों से अपनी सुरक्षा व्यवस्था में अधिक वित्तीय और सैन्य योगदान की अपेक्षा करता रहा है। इसके पीछे उद्देश्य यह माना जा रहा है कि यूरोप अपनी पारंपरिक रक्षा जिम्मेदारियों का बड़ा हिस्सा स्वयं संभाले, जबकि अमेरिका अपनी प्राथमिकताओं को अन्य क्षेत्रों की ओर केंद्रित कर सके।

    सम्मेलन से पहले तुर्किए के कई शहरों में नाटो विरोधी प्रदर्शन भी देखने को मिले। प्रदर्शनकारियों ने रक्षा खर्च बढ़ाने के बजाय सार्वजनिक सेवाओं, शिक्षा और स्वास्थ्य पर अधिक निवेश की मांग की। उनका कहना है कि बढ़ते सैन्य बजट का असर सामाजिक कल्याण योजनाओं पर पड़ सकता है। इसी प्रकार के विरोध प्रदर्शन हाल के वर्षों में यूरोप के अन्य देशों में भी सामने आए हैं।

    विश्लेषकों का यह भी मानना है कि सम्मेलन के दौरान रक्षा खरीद से जुड़े कई महत्वपूर्ण समझौतों पर चर्चा हो सकती है। इससे सदस्य देशों की सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने का प्रयास होगा, लेकिन साथ ही यह बहस भी जारी रहेगी कि गठबंधन की भविष्य की रणनीति किस दिशा में आगे बढ़ेगी। ऐसे में अंकारा शिखर सम्मेलन केवल सुरक्षा सहयोग का मंच नहीं, बल्कि नाटो की आंतरिक एकजुटता और दीर्घकालिक भविष्य की भी अहम परीक्षा माना जा रहा है।

  • कतर दौरे में भारत-कतर रिश्तों को नई मजबूती, एस. जयशंकर ने प्रधानमंत्री अल थानी के साथ ऊर्जा, व्यापार और क्षेत्रीय मुद्दों पर की व्यापक चर्चा

    कतर दौरे में भारत-कतर रिश्तों को नई मजबूती, एस. जयशंकर ने प्रधानमंत्री अल थानी के साथ ऊर्जा, व्यापार और क्षेत्रीय मुद्दों पर की व्यापक चर्चा


    नई दिल्ली।
    विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने कतर की अपनी आधिकारिक यात्रा पूरी करते हुए दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण बातचीत की। दौरे के दौरान उन्होंने कतर के प्रधानमंत्री एवं विदेश मंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान अल थानी से मुलाकात कर ऊर्जा, व्यापार, निवेश, कनेक्टिविटी, सुरक्षा और लोगों के बीच संबंधों सहित द्विपक्षीय सहयोग के विभिन्न आयामों की व्यापक समीक्षा की। दोनों नेताओं ने भविष्य में सहयोग के नए अवसरों पर भी विस्तार से विचार-विमर्श किया।

    यह यात्रा विदेश मंत्री के बहु-देशीय पश्चिम एशिया दौरे का पहला चरण थी। इस दौरे का उद्देश्य क्षेत्र के प्रमुख देशों के साथ भारत के रणनीतिक और आर्थिक संबंधों को और मजबूत करना, क्षेत्रीय हालात पर चर्चा करना तथा साझा हितों से जुड़े मुद्दों पर समन्वय बढ़ाना है। कतर के बाद उनका कार्यक्रम बहरीन, कुवैत और ओमान की यात्राओं का भी है।

    बैठक के दौरान दोनों पक्षों ने ऊर्जा सुरक्षा, व्यापारिक सहयोग, निवेश बढ़ाने की संभावनाओं और आपसी संपर्क को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया। इसके साथ ही क्षेत्रीय और वैश्विक महत्व के कई मुद्दों पर भी विचारों का आदान-प्रदान हुआ। पश्चिम एशिया की मौजूदा परिस्थितियों और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़े विषय भी चर्चा के प्रमुख केंद्र रहे।

    विदेश मंत्री ने अमेरिका और ईरान के बीच जारी संवाद में कतर की सक्रिय मध्यस्थता भूमिका की सराहना की। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय शांति और स्थिरता बनाए रखने के प्रयासों में कतर की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। दोनों नेताओं ने साझा हितों वाले बहुपक्षीय विषयों पर भी सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता पर सहमति व्यक्त की।

    दोहा प्रवास के दौरान डॉ. जयशंकर ने भारतीय समुदाय के प्रतिनिधियों से भी मुलाकात की। उन्होंने कतर के विकास और समाज में भारतीय समुदाय के योगदान की सराहना करते हुए कहा कि चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी भारतीय नागरिकों ने अपने दायित्वों का प्रभावी ढंग से निर्वहन किया है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि विदेशों में रह रहे भारतीयों का कल्याण सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है।

    विदेश मंत्री ने कहा कि भारतीय समुदाय के अनुभव, सुझाव और सहभागिता भारत-कतर संबंधों को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने दोनों देशों के बीच लोगों के स्तर पर मजबूत होते संबंधों को द्विपक्षीय साझेदारी की बड़ी ताकत बताया और भविष्य में इसे और विस्तार देने की प्रतिबद्धता दोहराई।

    उन्होंने कतर नेतृत्व का भारत के नागरिकों की सुरक्षा और उनके हितों का ध्यान रखने के लिए आभार भी व्यक्त किया। दोनों पक्षों ने इस बात पर सहमति जताई कि आर्थिक सहयोग के साथ-साथ सुरक्षा, कनेक्टिविटी और मानवीय संबंधों को भी आगे बढ़ाने से रणनीतिक साझेदारी को नई मजबूती मिलेगी।

    विदेश मंत्री का यह दौरा ऐसे समय में हुआ है जब पश्चिम एशिया में बदलते भू-राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच भारत क्षेत्र के देशों के साथ अपने सहयोग को और गहरा करने की दिशा में सक्रिय कूटनीतिक पहल कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस यात्रा से भारत और कतर के बीच ऊर्जा, व्यापार, निवेश तथा क्षेत्रीय सहयोग के क्षेत्रों में भविष्य की साझेदारी को नया विस्तार मिलने की संभावना मजबूत हुई है।

  • भारत को इजरायल का मजबूत मित्र बता बोले नेतन्याहू, '140 करोड़ लोगों का समर्थन हमारे साथ'

    भारत को इजरायल का मजबूत मित्र बता बोले नेतन्याहू, '140 करोड़ लोगों का समर्थन हमारे साथ'

    नई दिल्ली । इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भारत को अपने सबसे मजबूत और भरोसेमंद मित्र देशों में शामिल बताते हुए कहा है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र से उन्हें व्यापक समर्थन मिलता है। उन्होंने यह टिप्पणी ऐसे समय की है जब अमेरिका और इजरायल के संबंधों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज है और अमेरिकी नेतृत्व की ओर से भी अलग-अलग बयान सामने आए हैं।

    एक साक्षात्कार में नेतन्याहू ने कहा कि अमेरिका निश्चित रूप से इजरायल का महत्वपूर्ण सहयोगी है और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने कार्यकाल में इजरायल के पक्ष में कई अहम फैसले लिए हैं। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि दुनिया में इजरायल के मित्र केवल अमेरिका तक सीमित नहीं हैं। उनके अनुसार भारत उन प्रमुख देशों में शामिल है, जहां से इजरायल को मजबूत समर्थन प्राप्त होता है।

    नेतन्याहू ने भारत का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि 140 करोड़ आबादी वाले देश से उन्हें व्यापक समर्थन मिलता है। उन्होंने सोशल मीडिया पर भारतीय नागरिकों की सक्रियता का भी जिक्र किया और कहा कि उनके आधिकारिक फेसबुक पेज पर भारत से बड़ी संख्या में सकारात्मक प्रतिक्रियाएं और समर्थन देखने को मिलता है। उनके अनुसार यह दोनों देशों के बीच मजबूत जनसंपर्क और सकारात्मक भावनाओं का संकेत है।

    इजरायली प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि भारत के अलावा कई अन्य देशों के नेता भी निजी स्तर पर इजरायल के साथ सहयोग की इच्छा रखते हैं। उन्होंने दावा किया कि रक्षा, साइबर सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आधुनिक तकनीक जैसे क्षेत्रों में अनेक देश इजरायल के साथ साझेदारी बढ़ाना चाहते हैं। उनके अनुसार सुरक्षा और तकनीकी सहयोग भविष्य में अंतरराष्ट्रीय संबंधों का महत्वपूर्ण आधार बनता जा रहा है।

    नेतन्याहू की यह टिप्पणी अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के उस बयान के बाद आई है, जिसमें उन्होंने कहा था कि मौजूदा समय में डोनाल्ड ट्रंप ही ऐसे प्रमुख नेता हैं जो इजरायल के प्रति सबसे अधिक सहानुभूति रखते हैं। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए नेतन्याहू ने कहा कि ट्रंप निश्चित रूप से व्हाइट हाउस में इजरायल के सबसे बड़े मित्र रहे हैं, लेकिन इस मुद्दे पर सभी की राय समान होना जरूरी नहीं है। उन्होंने संकेत दिया कि इजरायल के कई अन्य अंतरराष्ट्रीय सहयोगी भी हैं, जिनमें भारत प्रमुख स्थान रखता है।

    साक्षात्कार के दौरान नेतन्याहू ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर भी अपनी सरकार का रुख दोहराया। उन्होंने कहा कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। उनका कहना था कि इस मुद्दे पर उनकी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सोच समान है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में अमेरिका और ईरान के बीच किसी परमाणु समझौते पर सहमति नहीं बनती है, तब भी इजरायल अपनी सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि नेतन्याहू का भारत का उल्लेख करना दोनों देशों के बीच लगातार मजबूत होते रणनीतिक संबंधों की ओर भी संकेत देता है। हाल के वर्षों में रक्षा, प्रौद्योगिकी, कृषि, साइबर सुरक्षा और व्यापार जैसे क्षेत्रों में भारत और इजरायल के बीच सहयोग लगातार बढ़ा है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मंच से भारत को सार्वजनिक रूप से मजबूत मित्र बताना दोनों देशों के संबंधों के महत्व को रेखांकित करने वाला बयान माना जा रहा है।

  • प्रधानमंत्री मोदी का इंडोनेशिया दौरा कई मोर्चों पर अहम, रणनीतिक सहयोग से लेकर डिजिटल कनेक्टिविटी तक बनेंगे नए आयाम

    प्रधानमंत्री मोदी का इंडोनेशिया दौरा कई मोर्चों पर अहम, रणनीतिक सहयोग से लेकर डिजिटल कनेक्टिविटी तक बनेंगे नए आयाम

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तीन देशों की विदेश यात्रा के पहले चरण में होने वाला इंडोनेशिया दौरा भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक सहयोग को नई दिशा देने वाला माना जा रहा है। 6 से 8 जुलाई तक प्रस्तावित इस दौरे के दौरान दोनों देशों के बीच रक्षा, व्यापार, समुद्री सुरक्षा, डिजिटल सहयोग, कृषि, खनिज संसाधनों और सांस्कृतिक संबंधों सहित कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में साझेदारी को और मजबूत बनाने पर विशेष जोर रहेगा।

    भारत और इंडोनेशिया के बीच व्यापक रणनीतिक साझेदारी पिछले कुछ वर्षों में लगातार मजबूत हुई है। प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय राजनीतिक संवाद को आगे बढ़ाने के साथ-साथ विभिन्न द्विपक्षीय समझौतों की समीक्षा और भविष्य की सहयोग योजनाओं को गति देने का अवसर भी मानी जा रही है। दोनों देश हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति, स्थिरता और सुरक्षित समुद्री मार्गों को साझा प्राथमिकता मानते हैं।

    रक्षा और समुद्री सुरक्षा इस यात्रा के प्रमुख एजेंडों में शामिल हैं। दोनों देशों के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास, रक्षा प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण और रक्षा उद्योग में सहयोग को और व्यापक बनाने पर चर्चा होने की संभावना है। समुद्री सुरक्षा, समुद्री निगरानी और हिंद महासागर क्षेत्र में समन्वय बढ़ाने पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा। दोनों देश क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए आपसी सहयोग को और मजबूत करने के पक्षधर हैं।

    आर्थिक सहयोग भी इस यात्रा का महत्वपूर्ण पहलू रहेगा। भारत और इंडोनेशिया के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगातार बढ़ रहा है और दोनों देश निवेश के नए अवसरों की तलाश में हैं। विनिर्माण, ऊर्जा, बुनियादी ढांचा, सूचना प्रौद्योगिकी, फार्मास्यूटिकल्स और कृषि जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की संभावनाओं पर चर्चा होगी। दोनों देशों के दीर्घकालिक विकास लक्ष्यों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करने पर भी जोर दिया जाएगा।

    महत्वपूर्ण खनिज संसाधनों के क्षेत्र में सहयोग को भी प्राथमिकता मिलने की संभावना है। इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी निर्माण और स्वच्छ ऊर्जा से जुड़े उद्योगों के लिए आवश्यक खनिजों की उपलब्धता को देखते हुए दोनों देश आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाने और औद्योगिक सहयोग बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।

    डिजिटल सहयोग इस यात्रा का एक और प्रमुख आयाम है। दोनों देशों के बीच डिजिटल भुगतान प्रणाली, ई-कॉमर्स, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और तकनीकी नवाचार के क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा देने की दिशा में प्रयास किए जाएंगे। इससे व्यापार, पर्यटन, निवेश और लोगों के बीच संपर्क को और अधिक सरल तथा प्रभावी बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।

    कृषि, खाद्य सुरक्षा और सामाजिक कल्याण से जुड़े क्षेत्रों में भी अनुभव साझा करने पर जोर रहेगा। टिकाऊ कृषि, खाद्यान्न सुरक्षा, सार्वजनिक वितरण व्यवस्था, डिजिटल कृषि और स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में दोनों देश एक-दूसरे के सफल मॉडलों से सीखने और सहयोग बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।

    इस यात्रा का सांस्कृतिक पक्ष भी विशेष महत्व रखता है। भारत और इंडोनेशिया के बीच हजारों वर्षों पुराने सांस्कृतिक, धार्मिक और समुद्री संबंध रहे हैं। साझा विरासत, सभ्यतागत जुड़ाव और लोगों के बीच संपर्क को और मजबूत बनाने के उद्देश्य से कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों और उच्चस्तरीय मुलाकातों का आयोजन भी प्रस्तावित है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह दौरा भारत और इंडोनेशिया के संबंधों को व्यापक रणनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक साझेदारी के नए चरण में पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

  • इजरायल में संवैधानिक संकट: नेतन्याहू सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का आदेश ठुकराया, विपक्ष ने बताया ‘लोकतंत्र पर खतरा’

    इजरायल में संवैधानिक संकट: नेतन्याहू सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का आदेश ठुकराया, विपक्ष ने बताया ‘लोकतंत्र पर खतरा’


    नई दिल्ली। इजरायल में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार और देश की सुप्रीम कोर्ट के बीच टकराव अब गंभीर संवैधानिक संकट का रूप लेता दिख रहा है। रविवार को इजरायली कैबिनेट ने सर्वसम्मति से निर्णय लेते हुए सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश को मानने से इनकार कर दिया, जिसमें कमर्शियल मीडिया रेगुलेटर सेकेंड अथॉरिटी फॉर टेलीविजन एंड रेडियो को अपना काम जारी रखने की अनुमति दी गई थी। पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट ने इस घटनाक्रम को ‘जंगल राज की आहट’ बताया है।

    पहली बार सरकार ने कोर्ट आदेश को नकारा
    इजरायल के इतिहास में यह पहली बार है जब किसी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को औपचारिक रूप से अस्वीकार किया है। विवाद की शुरुआत तब हुई जब पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के उन फैसलों पर रोक लगा दी थी, जिनके तहत मीडिया रेगुलेटर की नई परिषद के गठन की प्रक्रिया शुरू की गई थी।

    अदालत ने निर्देश दिया था कि मौजूदा परिषद ही अपना काम जारी रखे, क्योंकि कुछ सदस्यों के इस्तीफे पर राजनीतिक दबाव की आशंका जताई गई थी।

    सरकार का कड़ा रुख
    प्रधानमंत्री नेतन्याहू सरकार ने अदालत के फैसले को खारिज करते हुए कहा कि उसे कानून को बदलने या रद्द करने का अधिकार नहीं है। संचार मंत्री श्लोमो कारही और न्याय मंत्री यारिव लेविन ने संयुक्त बयान में कहा कि सरकार उन आदेशों को स्वीकार नहीं करेगी जो उनके अनुसार कानून के विरुद्ध हैं, और ऐसे आदेशों के आधार पर लिए गए निर्णय अमान्य माने जाएंगे।

    सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि मीडिया रेगुलेटर परिषद के भविष्य के किसी भी फैसले को वह मान्यता नहीं देगी, क्योंकि उसके अनुसार परिषद के पास आवश्यक कानूनी सदस्य संख्या नहीं है।

    विपक्ष और विशेषज्ञों की चेतावनी
    सरकार के इस कदम की विपक्ष और कानूनी विशेषज्ञों ने कड़ी आलोचना की है। डिप्टी अटॉर्नी जनरल गिल लिमोन ने चेतावनी दी कि यदि सरकार चयनात्मक रूप से अदालत के आदेशों का पालन करेगी तो यह कानून के शासन को कमजोर करने की दिशा में गंभीर कदम होगा।

    पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट ने कहा कि अदालत के आदेशों की अवहेलना से देश में अराजकता फैल सकती है और लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होगी।

    डेमोक्रेट्स पार्टी के नेता यायर गोलान ने आरोप लगाया कि सरकार चुनाव से पहले न्यायपालिका की शक्ति को कमजोर करने की कोशिश कर रही है, ताकि भविष्य में राजनीतिक फैसलों को प्रभावित किया जा सके।

    मीडिया और लोकतंत्र पर बहस तेज
    पत्रकार संगठनों और लोकतंत्र समर्थक समूहों ने भी सरकार के फैसले पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि यह मामला केवल एक मीडिया रेगुलेटर का नहीं, बल्कि इजरायल में प्रेस की स्वतंत्रता, लोकतंत्र और कानून के शासन पर सीधा प्रभाव डालने वाला मुद्दा बन चुका है।

  • पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर बढ़ा दबाव, निर्यात में गिरावट से व्यापार घाटा 39.5 अरब डॉलर पहुंचा, आयात निर्भरता बनी बड़ी चुनौती

    पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर बढ़ा दबाव, निर्यात में गिरावट से व्यापार घाटा 39.5 अरब डॉलर पहुंचा, आयात निर्भरता बनी बड़ी चुनौती

    नई दिल्ली । पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर बाहरी क्षेत्र का दबाव लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है। वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान देश का व्यापार घाटा बढ़कर 39.5 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में करीब 22 प्रतिशत अधिक है। आयात में तेज वृद्धि और निर्यात में गिरावट ने आर्थिक संतुलन को प्रभावित किया है, जिससे विदेशी मुद्रा प्रबंधन और बाहरी वित्तीय स्थिरता को लेकर नई चुनौतियां सामने आई हैं।

    आंकड़ों के अनुसार, पूरे वित्त वर्ष के दौरान पाकिस्तान का कुल आयात बढ़कर 69.6 अरब डॉलर हो गया, जबकि निर्यात घटकर 30.1 अरब डॉलर पर सिमट गया। आयात में लगभग 8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि निर्यात में करीब 6 प्रतिशत की कमी आई। दोनों के बीच बढ़ते अंतर ने व्यापार घाटे को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया।

    केवल जून महीने के आंकड़े भी चिंता बढ़ाने वाले रहे। महीने-दर-महीने आधार पर व्यापार घाटा लगभग 57 प्रतिशत बढ़कर 4.53 अरब डॉलर तक पहुंच गया। इस दौरान निर्यात में लगभग 10 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जबकि आयात में 26 प्रतिशत की तेज बढ़ोतरी देखने को मिली। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि घरेलू मांग बढ़ने के साथ आयात का दबाव लगातार मजबूत हो रहा है।

    आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान का व्यापार घाटा केवल अल्पकालिक समस्या नहीं बल्कि संरचनात्मक चुनौती बन चुका है। देश की अर्थव्यवस्था ऊर्जा, मशीनरी और औद्योगिक कच्चे माल जैसे आवश्यक उत्पादों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। दूसरी ओर निर्यात का आधार अभी भी सीमित है और उच्च मूल्य वाले उत्पादों की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम बनी हुई है।

    कपड़ा उद्योग अब भी पाकिस्तान का सबसे बड़ा निर्यात क्षेत्र बना हुआ है। हालांकि इस क्षेत्र से होने वाली आय में बहुत सीमित वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि निर्यात क्षेत्र अपेक्षित गति से विस्तार नहीं कर पा रहा। वैश्विक प्रतिस्पर्धा, उत्पादन लागत और मांग में उतार-चढ़ाव जैसे कारकों का असर भी निर्यात प्रदर्शन पर दिखाई दे रहा है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि घरेलू आर्थिक गतिविधियों में सुधार के साथ आयात की मांग तेजी से बढ़ रही है, लेकिन निर्यात उसी अनुपात में नहीं बढ़ पा रहा। यही असंतुलन व्यापार घाटे को लगातार बढ़ा रहा है। यदि निर्यात क्षमता में सुधार नहीं हुआ तो बाहरी भुगतान संतुलन और विदेशी मुद्रा भंडार पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

    व्यापार और उद्योग जगत से जुड़े प्रतिनिधियों ने भी निर्यात में लगातार कमजोरी को अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर संकेत बताया है। उनका मानना है कि निर्यात आधारित उद्योगों को प्रतिस्पर्धी बनाने, उत्पादन लागत कम करने और नए वैश्विक बाजारों तक पहुंच बढ़ाने के लिए प्रभावी नीतिगत कदम उठाने की आवश्यकता है।

    आर्थिक जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान के लिए आने वाले समय में सबसे बड़ी चुनौती आयात पर निर्भरता कम करना और निर्यात आधारित विकास मॉडल को मजबूत बनाना होगी। यदि व्यापार असंतुलन इसी तरह बढ़ता रहा तो इसका असर आर्थिक वृद्धि, विदेशी निवेश, मुद्रा विनिमय दर और समग्र वित्तीय स्थिरता पर भी पड़ सकता है।

  • भारत-इंडोनेशिया संबंधों को मिलेगा नया आयाम, पीएम मोदी के दौरे पर टैगोर की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी खास पुस्तक की जाएगी भेंट

    भारत-इंडोनेशिया संबंधों को मिलेगा नया आयाम, पीएम मोदी के दौरे पर टैगोर की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी खास पुस्तक की जाएगी भेंट


    नई दिल्ली ।
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 6 से 8 जुलाई तक इंडोनेशिया के दौरे पर रहेंगे, जहां उनके स्वागत की व्यापक तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। यह यात्रा भारत की इंडो-पैसिफिक रणनीति और दोनों देशों के बीच लगातार मजबूत होते संबंधों के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। जकार्ता सहित कई प्रमुख स्थानों पर स्वागत की तैयारियों के बीच इस दौरे का सांस्कृतिक महत्व भी विशेष रूप से चर्चा में है।

    प्रधानमंत्री के कार्यक्रम में द्विपक्षीय बैठकों के साथ भारतीय समुदाय से संवाद भी शामिल है। इस दौरान व्यापार, निवेश, समुद्री सहयोग, क्षेत्रीय सुरक्षा और सांस्कृतिक साझेदारी जैसे अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा होने की संभावना है। दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंधों को नई गति देने की दिशा में इस यात्रा को अहम माना जा रहा है।

    इस दौरे की एक विशेष उपलब्धि यह भी होगी कि प्रधानमंत्री मोदी को गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की ऐतिहासिक इंडोनेशिया यात्रा पर आधारित एक विशेष पुस्तक भेंट की जाएगी। यह वर्ष टैगोर की इंडोनेशिया यात्रा के 100 वर्ष पूरे होने का प्रतीक है, जिससे इस यात्रा का सांस्कृतिक महत्व और बढ़ गया है। पुस्तक में टैगोर की यात्रा, उनके अनुभवों और भारत तथा इंडोनेशिया के बीच सांस्कृतिक संबंधों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया गया है।

    बताया गया है कि इस पुस्तक पर पिछले दो वर्षों से शोध और लेखन का कार्य किया गया। शताब्दी वर्ष के अवसर पर इसके पूर्ण होने को एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। लेखक का मानना है कि यह पुस्तक दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक संबंधों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम बनेगी।

    रवींद्रनाथ टैगोर ने लगभग एक सदी पहले इंडोनेशिया की यात्रा के दौरान वहां की संस्कृति, कला और परंपराओं का गहन अध्ययन किया था। उन्होंने जावा, बाली, सुमात्रा, जकार्ता और अन्य क्षेत्रों का भ्रमण करते हुए भारतीय सांस्कृतिक प्रभावों को करीब से देखा। विशेष रूप से रामायण और महाभारत से जुड़े सांस्कृतिक स्वरूपों ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया था।

    अपनी यात्रा के दौरान टैगोर ने प्रसिद्ध बोरोबुदुर मंदिर का भी भ्रमण किया और वहां की सांस्कृतिक विरासत की सराहना की। उन्होंने स्थानीय कला, नृत्य और पारंपरिक शिल्प में गहरी रुचि दिखाई। उनकी इस यात्रा का प्रभाव बाद में भारतीय सांस्कृतिक और शैक्षणिक गतिविधियों में भी दिखाई दिया, जहां दक्षिण-पूर्व एशियाई कला और परंपराओं को विशेष महत्व दिया गया।

    प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा केवल कूटनीतिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि भारत और इंडोनेशिया के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक संबंधों को भी नई पहचान देगी। विशेषज्ञों का मानना है कि रणनीतिक सहयोग के साथ-साथ साझा सांस्कृतिक विरासत पर आधारित यह पहल दोनों देशों के रिश्तों को भविष्य में और अधिक मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।