Category: International

  • अल्बर्टा में कनाडा से अलग होने की मांग तेज: 3 लाख हस्ताक्षर जुटे, अक्टूबर में रेफरेंडम की संभावना

    अल्बर्टा में कनाडा से अलग होने की मांग तेज: 3 लाख हस्ताक्षर जुटे, अक्टूबर में रेफरेंडम की संभावना



    नई दिल्ली। देश के पश्चिमी प्रांत अल्बर्टा में अलग देश बनने की मांग एक बार फिर तेज हो गई है। अलगाववादी समूहों ने दावा किया है कि उन्होंने जनमत संग्रह (रेफरेंडम) के लिए जरूरी संख्या से कहीं ज्यादा, करीब 3 लाख हस्ताक्षर जुटा लिए हैं, जबकि नियमों के अनुसार लगभग 1.78 लाख हस्ताक्षर ही पर्याप्त थे।

    रेफरेंडम की राह में अभी कई अड़चनें
    हालांकि इतने हस्ताक्षर जुटा लेना अंतिम मंजूरी नहीं है। अब इन हस्ताक्षरों की जांच चुनाव आयोग करेगा। इसके अलावा कानूनी अड़चनें भी मौजूद हैं, जिनकी वजह से फिलहाल प्रक्रिया पर अदालत की रोक भी लगी हुई है।अगर सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं, तो प्रस्तावित जनमत संग्रह 19 अक्टूबर को कराया जा सकता है, जिसमें अलगाव के मुद्दे पर भी मतदान संभव है।

    क्या पूछे जाएंगे सवाल?
    अगर वोटिंग होती है, तो जनता से पूछा जाएगा कि क्या अल्बर्टा को कनाडा से अलग होकर एक स्वतंत्र देश बनना चाहिए। लेकिन मौजूदा सर्वे बताते हैं कि अभी सिर्फ करीब 30% लोग ही अलग देश बनने के पक्ष में हैं।

    आर्थिक और राजनीतिक नाराजगी बनी वजह
    अल्बर्टा लंबे समय से कनाडा सरकार से असंतुष्ट रहा है। इसके पीछे मुख्य कारण हैं

    तेल और गैस से भारी कमाई के बावजूद कम लाभ मिलने की शिकायत

    टैक्स और संसाधनों के फैसलों पर ओटावा (केंद्र सरकार) का नियंत्रण

    पर्यावरण नियमों को लेकर टकराव

    अलग राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान की भावनाअल्बर्टा कनाडा के कुल तेल उत्पादन का बड़ा हिस्सा (लगभग 84%) देता है, जिससे वहां अलगाव की भावना और मजबूत होती गई है।

    सरकार का रुख अलग
    अल्बर्टा की प्रीमियर डेनिएल स्मिथ ने कहा है कि यदि कानूनी रूप से आवश्यक हस्ताक्षर पूरे होते हैं, तो वे जनमत संग्रह की अनुमति देंगी, लेकिन वह स्वयं अलग देश बनने के पक्ष में नहीं हैं।

    अमेरिका से जुड़ते आरोप और चर्चा
    कुछ रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि अमेरिका में कुछ राजनीतिक समूह अल्बर्टा के अलगाववादी नेताओं से संपर्क में हैं। यहां तक कि कुछ लोग इसे अमेरिका का 51वां राज्य बनाने की भी बात कर रहे हैं, हालांकि यह विचार आधिकारिक नहीं है।

    कनाडा का कड़ा रुख
    कनाडा में पहले भी अलगाववाद को लेकर सख्त नियम बनाए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार कोई भी प्रांत बिना स्पष्ट बहुमत और केंद्र सरकार की बातचीत के अलग नहीं हो सकता। इसके बाद 2000 में Clarity Act लागू किया गया, जिसने अलग होने की प्रक्रिया को और सख्त बना दिया।

    अल्बर्टा का अलगाव आंदोलन एक बार फिर चर्चा में जरूर है, लेकिन कानूनी बाधाएं, कम जन समर्थन और केंद्र सरकार का सख्त रुख इसे एक जटिल और लंबी प्रक्रिया बना देता है।

  • अंतरिक्ष में धरती से 30% बड़े ‘सुपर-अर्थ’ की सतह का पहली बार अध्ययन, जेम्स वेब टेलीस्कोप ने खोले रहस्य

    अंतरिक्ष में धरती से 30% बड़े ‘सुपर-अर्थ’ की सतह का पहली बार अध्ययन, जेम्स वेब टेलीस्कोप ने खोले रहस्य

    वॉशिंगटन। अंतरिक्ष विज्ञान में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करते हुए वैज्ञानिकों ने पहली बार किसी दूरस्थ चट्टानी ग्रह की सतह का विस्तृत अध्ययन किया है। यह शोध जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप की मदद से किया गया है, जिसमें एलएचएस 3844 बी नामक एक सुपर-अर्थ ग्रह के बारे में अहम जानकारियां सामने आई हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह ग्रह हमारे सौरमंडल के बुध ग्रह जैसा बेहद गर्म, अंधकारमय और पूरी तरह निर्जीव हो सकता है। इस अध्ययन के निष्कर्ष प्रतिष्ठित जर्नल ‘नेचर एस्ट्रोनॉमी’ में प्रकाशित हुए हैं।

    धरती से 48.5 प्रकाश-वर्ष दूर मौजूद है यह ग्रह
    एलएचएस 3844 बी पृथ्वी से लगभग 48.5 प्रकाश-वर्ष दूर स्थित है और आकार में हमारे ग्रह से करीब 30% बड़ा है। इसे सुपर-अर्थ श्रेणी में रखा गया है। सुपर-अर्थ वे ग्रह होते हैं जो पृथ्वी से बड़े तो होते हैं, लेकिन गैसीय दानव ग्रहों जितने विशाल नहीं होते।

    बेहद तेज कक्षा में घूमता है ग्रह
    यह ग्रह अपने तारे के बेहद करीब है और केवल 11 घंटे में अपने तारे का एक चक्कर पूरा कर लेता है। इस तेज परिक्रमा के कारण इसकी सतह पर अत्यधिक तापमान और कठोर परिस्थितियां बनी रहती हैं।

    वातावरण का कोई संकेत नहीं
    शोध में यह पाया गया है कि ग्रह पर किसी भी प्रकार का वातावरण मौजूद नहीं है। न तो वहां गैसीय परत है जो तापमान को नियंत्रित कर सके और न ही सतह को विकिरण से बचा सके। इसका मतलब यह है कि ग्रह सीधे अंतरिक्षीय विकिरण और उल्कापिंडों के प्रभाव में रहता है।

    बेसाल्ट जैसी चट्टानी सतह के संकेत
    वैज्ञानिकों के अनुसार इस ग्रह की सतह पृथ्वी जैसी नहीं है। प्रारंभिक विश्लेषण से संकेत मिले हैं कि इसकी सतह बेसाल्ट चट्टानों से बनी हो सकती है, जो ज्वालामुखीय लावा के ठंडा होने से बनती हैं।

    एमआईआरआई उपकरण ने निभाई अहम भूमिका
    इस अध्ययन में जेम्स वेब टेलीस्कोप पर लगे मिड-इंफ्रारेड इंस्ट्रूमेंट (MIRI) ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस उपकरण ने ग्रह से आने वाली इन्फ्रारेड रोशनी का विश्लेषण किया और सतह के तापीय गुणों का अध्ययन संभव बनाया। वैज्ञानिक सीधे ग्रह की तस्वीर लेने में सफल नहीं हो सके, लेकिन ग्रह और उसके तारे से आने वाले प्रकाश में सूक्ष्म बदलावों का विश्लेषण कर स्पेक्ट्रम तैयार किया गया, जिससे उसकी सतह की संरचना का अनुमान लगाया गया।

    भविष्य की खोजों के लिए बड़ी उम्मीद
    विशेषज्ञों का मानना है कि यह खोज भविष्य में अन्य चट्टानी ग्रहों की सतह और भूगर्भीय इतिहास को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे यह संभावना बढ़ती है कि आने वाले समय में दूरस्थ ग्रहों पर जीवन की संभावनाओं की भी गहराई से जांच की जा सकेगी।

  • होर्मुज में टेंशन हाई: फ्रांसीसी जहाज पर हमला, ट्रम्प ने ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ रोका; मिडिल ईस्ट में बढ़ा युद्ध का खतरा

    होर्मुज में टेंशन हाई: फ्रांसीसी जहाज पर हमला, ट्रम्प ने ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ रोका; मिडिल ईस्ट में बढ़ा युद्ध का खतरा



    नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में तनाव खतरनाक स्तर पर पहुंचता जा रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य में एक फ्रांसीसी कार्गो जहाज पर हमले ने हालात और गंभीर बना दिए हैं। CMA CGM ने पुष्टि की है कि उसके ‘सैन एंटोनियो’ जहाज को पार करते समय मिसाइल या ड्रोन से निशाना बनाया गया, जिसमें कई क्रू मेंबर घायल हो गए और जहाज को नुकसान पहुंचा।

    दुनिया के सबसे अहम व्यापारिक मार्गों में से एक 
    कंपनी के अनुसार, घायल कर्मचारियों को तुरंत सुरक्षित स्थान पर पहुंचाकर इलाज शुरू कर दिया गया है। इस घटना ने वैश्विक समुद्री सुरक्षा और तेल सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि यह इलाका दुनिया के सबसे अहम व्यापारिक मार्गों में से एक माना जाता है।
    ईरान ने इस फैसले पर तंज कसते हुए इसे अपनी रणनीतिक बढ़त बताया है।
    इसी बीच डोनाल्ड ट्रम्प ने बड़ा फैसला लेते हुए ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ ऑपरेशन को रोक दिया है। यह ऑपरेशन अमेरिका ने होर्मुज में फंसे जहाजों को सुरक्षित निकालने के लिए शुरू किया था, लेकिन इसे अचानक बंद करने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई सवाल खड़े हो गए हैं। ईरान ने इस फैसले पर तंज कसते हुए इसे अपनी रणनीतिक बढ़त बताया है।

    पिछले 24 घंटों में हालात तेजी से बदले हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमेरिका ने नया प्रस्ताव पेश कर ईरान से हमले रोकने, माइंस हटाने और जहाजों से टोल वसूली बंद करने की मांग की है। वहीं, संयुक्त अरब अमीरात पर लगातार दूसरे दिन मिसाइल और ड्रोन हमले किए गए, हालांकि वहां के डिफेंस सिस्टम ने इन हमलों को हवा में ही नाकाम कर दिया।

    अमेरिका ने हालात को संभालने के लिए USS जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश वॉरशिप को भी होर्मुज भेजा था, लेकिन ऑपरेशन रुकने के बाद इसकी भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। वहीं, फुजैराह हमले में तीन भारतीय नागरिकों के घायल होने पर भारत ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है और सभी पक्षों से तुरंत हिंसा रोकने की अपील की है।

    तनाव के बीच चीन ने साफ कहा है कि अब युद्ध को रोकना बेहद जरूरी है। चीन के अनुसार, इस संघर्ष का असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सप्लाई पर पड़ सकता है। साथ ही उसने ईरान के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को भी दोहराया है।दूसरी ओर, शहबाज शरीफ ने ट्रम्प के फैसले की तारीफ करते हुए इसे क्षेत्र में शांति की दिशा में सही कदम बताया है।

    कुल मिलाकर होर्मुज में बढ़ता तनाव अब वैश्विक संकट का रूप लेता दिख रहा है। एक तरफ सैन्य गतिविधियां तेज हो रही हैं, तो दूसरी तरफ कूटनीतिक बयानबाजी भी चरम पर है। आने वाले दिनों में यह टकराव किस दिशा में जाएगा, इस पर पूरी दुनिया की नजर टिकी हुई है।

  • भारत-वियतनाम रिश्तों को नई रफ्तार: पीएम मोदी-तो लाम की बैठक में 13 बड़े समझौते, रणनीतिक साझेदारी और मजबूत

    भारत-वियतनाम रिश्तों को नई रफ्तार: पीएम मोदी-तो लाम की बैठक में 13 बड़े समझौते, रणनीतिक साझेदारी और मजबूत



    नई दिल्ली । नई दिल्ली के ऐतिहासिक हैदराबाद हाउस में बुधवार को भारत और वियतनाम के रिश्तों ने एक नई ऊंचाई छू ली, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वियतनाम के राष्ट्रपति तो लाम के बीच हुई अहम द्विपक्षीय बैठक के बाद दोनों देशों ने 13 बड़े समझौतों पर हस्ताक्षर किए। साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में पीएम मोदी ने साफ कहा कि भारत-वियतनाम संबंध अब “आधुनिक व्यापक रणनीतिक साझेदारी” के नए दौर में प्रवेश कर चुके हैं।

    पीएम मोदी ने अपने संबोधन में दोनों देशों के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रिश्तों को रेखांकित करते हुए बताया कि पिछले साल भारत से भेजे गए बौद्ध अवशेषों के दर्शन वियतनाम में डेढ़ करोड़ से ज्यादा लोगों ने किए। उन्होंने चंपा सभ्यता की पांडुलिपियों को डिजिटल रूप में संरक्षित करने की घोषणा करते हुए कहा कि यह साझेदारी सिर्फ विकास नहीं, बल्कि विरासत को भी सहेजने का प्रयास है।

    प्रधानमंत्री ने यह भी बताया कि पिछले एक दशक में भारत और वियतनाम के बीच द्विपक्षीय व्यापार दोगुना होकर 16 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। उन्होंने कहा कि तकनीक, पर्यटन, व्यापार और रक्षा जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के संबंध तेजी से मजबूत हुए हैं और अब इन्हें और विस्तार देने का समय है।

    इस दौरान हुए 13 समझौते कई अहम क्षेत्रों को कवर करते हैं, जिनमें डिजिटल पेमेंट, स्वास्थ्य, संस्कृति, पर्यटन, शिक्षा और तकनीक शामिल हैं। भारतीय रिजर्व बैंक और वियतनाम के स्टेट बैंक के बीच डिजिटल पेमेंट सहयोग, स्वास्थ्य क्षेत्र में दवा नियमन, और आईटी सेक्टर में साझेदारी जैसे समझौते भविष्य की आर्थिक मजबूती की दिशा तय करते हैं।

    वियतनाम के राष्ट्रपति तो लाम का यह भारत का पहला राजकीय दौरा है, जिसकी शुरुआत उन्होंने बिहार के बोधगया में महाबोधि मंदिर में पूजा के साथ की। इसके बाद दिल्ली पहुंचकर उनका औपचारिक स्वागत राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री मोदी ने किया।

    बैठक से पहले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने भी राष्ट्रपति लाम से मुलाकात कर रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने पर चर्चा की। विदेश मंत्रालय के अनुसार, यह दौरा इसलिए भी खास है क्योंकि भारत और वियतनाम अपनी रणनीतिक साझेदारी के 10 साल पूरे कर रहे हैं।

    कुल मिलाकर, हैदराबाद हाउस में हुई यह मुलाकात सिर्फ औपचारिक नहीं बल्कि भविष्य की मजबूत साझेदारी का रोडमैप साबित हुई है, जो आने वाले वर्षों में दोनों देशों के रिश्तों को नई दिशा देगी।

  • होर्मुज में हमला, दुनिया में हड़कंप! फ्रांसीसी जहाज बना निशाना, ट्रंप ने अचानक रोका ऑपरेशन,क्या बढ़ने वाला है बड़ा युद्ध?

    होर्मुज में हमला, दुनिया में हड़कंप! फ्रांसीसी जहाज बना निशाना, ट्रंप ने अचानक रोका ऑपरेशन,क्या बढ़ने वाला है बड़ा युद्ध?



    नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने वैश्विक समुद्री व्यापार को गहरे संकट में डाल दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य में हालात उस समय और बिगड़ गए, जब फ्रांस की शिपिंग कंपनी CMA CGM के एक कार्गो जहाज पर हमला कर दिया गया। बताया जा रहा है कि ‘सैन एंटोनियो’ नाम का यह जहाज जब होर्मुज से गुजर रहा था, तभी उस पर मिसाइल या ड्रोन से हमला हुआ, जिसमें कई क्रू मेंबर घायल हो गए। हालांकि कंपनी ने पुष्टि की है कि सभी घायलों को सुरक्षित निकालकर इलाज के लिए भेज दिया गया है।

    इस हमले के बाद क्षेत्र में पहले से जारी तनाव और गहरा गया है। खासतौर पर इसलिए क्योंकि होर्मुज दुनिया के सबसे अहम तेल आपूर्ति मार्गों में से एक है, जहां से हर दिन सैकड़ों जहाज गुजरते हैं। लेकिन मौजूदा हालात में यह संख्या बुरी तरह प्रभावित हुई है।

    इसी बीच अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बड़ा फैसला लेते हुए ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ ऑपरेशन को अचानक बंद कर दिया। यह ऑपरेशन होर्मुज में फंसे जहाजों को सुरक्षित निकालने के लिए शुरू किया गया था, लेकिन दो दिनों में महज तीन जहाजों को ही सुरक्षित निकाल पाने के बाद इसे रोक दिया गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस ऑपरेशन को रोकने के पीछे क्षेत्रीय दबाव और बढ़ते सैन्य जोखिम बड़ी वजह माने जा रहे हैं।

    संयुक्त राष्ट्र में भी इस संकट को लेकर हलचल तेज हो गई है। अमेरिका ने सुरक्षा परिषद में एक प्रस्ताव पेश कर ईरान से हमले रोकने, समुद्री मार्ग सुरक्षित रखने और अवरोध हटाने की मांग की है। वहीं, चीन ने भी दोनों देशों से तुरंत तनाव कम करने और युद्ध जैसे हालात खत्म करने की अपील की है।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच खाड़ी क्षेत्र में हमलों का सिलसिला थमता नजर नहीं आ रहा। ब्रिटेन की समुद्री एजेंसी के अनुसार, हाल के महीनों में इस क्षेत्र में 40 से ज्यादा घटनाएं दर्ज की गई हैं, जिनमें 26 सीधे हमले शामिल हैं। इसके अलावा संदिग्ध गतिविधियां और जहाजों के अपहरण की घटनाएं भी सामने आई हैं।

    इस तनाव का असर सिर्फ क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी दिखाई दे रहा है। तेल सप्लाई प्रभावित होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनिश्चितता बढ़ रही है, जबकि हजारों नाविक समुद्र में फंसे हुए हैं। अनुमान है कि इस इलाके में 1500 से ज्यादा जहाज और हजारों क्रू मेंबर अभी भी जोखिम के बीच मौजूद हैं।

    कुल मिलाकर, होर्मुज में बढ़ता टकराव अब सिर्फ एक क्षेत्रीय संकट नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है। अब नजर इस बात पर है कि क्या कूटनीतिक प्रयास इस तनाव को कम कर पाएंगे या हालात और बिगड़ेंगे

  • हैदराबाद हाउस में हाई-प्रोफाइल मुलाकात! PM मोदी और वियतनाम राष्ट्रपति आमने-सामने, क्या होंगे बड़े समझौते?

    हैदराबाद हाउस में हाई-प्रोफाइल मुलाकात! PM मोदी और वियतनाम राष्ट्रपति आमने-सामने, क्या होंगे बड़े समझौते?


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की सियासत और भारत-बांग्लादेश रिश्तों को लेकर एक नया दिलचस्प मोड़ सामने आया है। बांग्लादेश की प्रमुख राजनीतिक पार्टी Bangladesh Nationalist Party (BNP) ने पश्चिम बंगाल में BJP की संभावित जीत पर खुशी जताई है और इसे दोनों देशों के रिश्तों के लिए सकारात्मक संकेत बताया है।

    BNP के सूचना सचिव अजीजुल बारी हेलाल ने कहा कि अगर पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन होता है, तो भारत और बांग्लादेश के बीच लंबे समय से अटका तीस्ता नदी जल बंटवारा समझौता आगे बढ़ सकता है। उन्होंने सीधे तौर पर ममता बनर्जी सरकार को इस समझौते में सबसे बड़ी बाधा बताया। उनका कहना है कि केंद्र की भारतीय जनता पार्टी सरकार और बांग्लादेश, दोनों ही इस समझौते को अंतिम रूप देना चाहते थे, लेकिन राज्य स्तर पर सहमति नहीं बन पाई।

    बीएनपी BNP नेताओं को उम्मीद है कि अगर सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में सरकार बनती है, तो भारत-बांग्लादेश संबंधों में नई गति आएगी और सीमा व जल विवाद जैसे मुद्दों पर प्रगति हो सकती है। दरअसल, पश्चिम बंगाल की भौगोलिक स्थिति दोनों देशों के रिश्तों में अहम भूमिका निभाती है, क्योंकि बांग्लादेश के साथ सबसे लंबी सीमा इसी राज्य की लगती है।

    इस पूरे विवाद के केंद्र में है तीस्ता नदी, जो हिमालय से निकलकर सिक्किम और पश्चिम बंगाल से होते हुए बांग्लादेश पहुंचती है। इस नदी पर दोनों देशों के करोड़ों लोगों की आजीविका निर्भर है। बांग्लादेश लंबे समय से इस नदी के 50% पानी की मांग करता रहा है, जबकि भारत भी अपने हिस्से को लेकर संतुलन बनाए रखना चाहता है।

    तीस्ता जल बंटवारे को लेकर प्रयास कई बार हुए, लेकिन हर बार सहमति बनने से पहले ही मामला अटक गया। 2011 में एक प्रस्ताव तैयार हुआ था, जिसमें बांग्लादेश को 37.5% और भारत को 42.5% पानी देने की बात थी, लेकिन उस समय भी ममता बनर्जी के विरोध के चलते समझौता आगे नहीं बढ़ पाया।

    राज्य सरकार का तर्क रहा है कि तीस्ता नदी में पहले ही पानी का प्रवाह कम हो चुका है और अगर अतिरिक्त पानी साझा किया गया, तो उत्तर बंगाल में सिंचाई और पीने के पानी का संकट गहरा सकता है। यही वजह है कि राज्य स्तर पर इस मुद्दे पर लगातार आपत्ति जताई जाती रही है।

    गौरतलब है कि भारत और बांग्लादेश के बीच करीब 54 साझा नदियां हैं, लेकिन अब तक सिर्फ गंगा और कुशियारा नदी पर ही औपचारिक समझौते हो पाए हैं। तीस्ता नदी का मुद्दा अब भी दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा लंबित जल विवाद बना हुआ है।

    कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल की राजनीति का असर सिर्फ राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव भारत-बांग्लादेश के कूटनीतिक रिश्तों पर भी पड़ता है। अब देखना हगा कि आने वाले समय में सियासी समीकरण बदलते हैं या फिर तीस्ता का यह विवाद यूं ही अधूरा रह जाता है।

  • बंगाल की सियासत से ढाका तक हलचल! BJP की संभावित जीत पर खुश BNP, क्या अब सुलझेगा 10 साल पुराना तीस्ता विवाद?

    बंगाल की सियासत से ढाका तक हलचल! BJP की संभावित जीत पर खुश BNP, क्या अब सुलझेगा 10 साल पुराना तीस्ता विवाद?



    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की सियासत और भारत-बांग्लादेश रिश्तों को लेकर एक नया दिलचस्प मोड़ सामने आया है। बांग्लादेश की प्रमुख राजनीतिक पार्टी Bangladesh Nationalist Party (BNP) ने पश्चिम बंगाल में BJP की संभावित जीत पर खुशी जताई है और इसे दोनों देशों के रिश्तों के लिए सकारात्मक संकेत बताया है।

    BNP के सूचना सचिव अजीजुल बारी हेलाल ने कहा कि अगर पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन होता है, तो भारत और बांग्लादेश के बीच लंबे समय से अटका तीस्ता नदी जल बंटवारा समझौता आगे बढ़ सकता है। उन्होंने सीधे तौर पर ममता बनर्जी सरकार को इस समझौते में सबसे बड़ी बाधा बताया। उनका कहना है कि केंद्र की भारतीय जनता पार्टी सरकार और बांग्लादेश, दोनों ही इस समझौते को अंतिम रूप देना चाहते थे, लेकिन राज्य स्तर पर सहमति नहीं बन पाई।

    BNP नेताओं को उम्मीद है कि अगर सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में सरकार बनती है, तो भारत-बांग्लादेश संबंधों में नई गति आएगी और सीमा व जल विवाद जैसे मुद्दों पर प्रगति हो सकती है। दरअसल, पश्चिम बंगाल की भौगोलिक स्थिति दोनों देशों के रिश्तों में अहम भूमिका निभाती है, क्योंकि बांग्लादेश के साथ सबसे लंबी सीमा इसी राज्य की लगती है।

    इस पूरे विवाद के केंद्र में है तीस्ता नदी, जो हिमालय से निकलकर सिक्किम और पश्चिम बंगाल से होते हुए बांग्लादेश पहुंचती है। इस नदी पर दोनों देशों के करोड़ों लोगों की आजीविका निर्भर है। बांग्लादेश लंबे समय से इस नदी के 50% पानी की मांग करता रहा है, जबकि भारत भी अपने हिस्से को लेकर संतुलन बनाए रखना चाहता है।

    तीस्ता जल बंटवारे को लेकर प्रयास कई बार हुए, लेकिन हर बार सहमति बनने से पहले ही मामला अटक गया। 2011 में एक प्रस्ताव तैयार हुआ था, जिसमें बांग्लादेश को 37.5% और भारत को 42.5% पानी देने की बात थी, लेकिन उस समय भी ममता बनर्जी के विरोध के चलते समझौता आगे नहीं बढ़ पाया।

    राज्य सरकार का तर्क रहा है कि तीस्ता नदी में पहले ही पानी का प्रवाह कम हो चुका है और अगर अतिरिक्त पानी साझा किया गया, तो उत्तर बंगाल में सिंचाई और पीने के पानी का संकट गहरा सकता है। यही वजह है कि राज्य स्तर पर इस मुद्दे पर लगातार आपत्ति जताई जाती रही है।

    गौरतलब है कि भारत और बांग्लादेश के बीच करीब 54 साझा नदियां हैं, लेकिन अब तक सिर्फ गंगा और कुशियारा नदी पर ही औपचारिक समझौते हो पाए हैं। तीस्ता नदी का मुद्दा अब भी दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा लंबित जल विवाद बना हुआ है।

    कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल की राजनीति का असर सिर्फ राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव भारत-बांग्लादेश के कूटनीतिक रिश्तों पर भी पड़ता है। अब देखना होगा कि आने वाले समय में सियासी समीकरण बदलते हैं या फिर तीस्ता का यह विवाद यूं ही अधूरा रह जाता है।

  • अमेरिका पर बढ़ रहा कर्ज, जीडीपी से ज्यादा हुआ राष्ट्रीय ऋण, डोनाल्ड ट्रंप के लिए बनी बड़ी चुनौती

    अमेरिका पर बढ़ रहा कर्ज, जीडीपी से ज्यादा हुआ राष्ट्रीय ऋण, डोनाल्ड ट्रंप के लिए बनी बड़ी चुनौती



    नई दिल्ली। अमेरिका में आर्थिक संकट की चिंता गहराती जा रही है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समय से जुड़ी चर्चाओं के बीच अब सबसे बड़ा मुद्दा देश पर बढ़ता कर्ज है, जो अब देश की जीडीपी से भी अधिक हो चुका है। यह स्थिति द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पहली बार देखने को मिली है, जिससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

    कमेटी फॉर ए रिस्पॉन्सिबल फेडरल बजट की रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल के अंत तक अमेरिका पर कुल कर्ज लगभग 31.27 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जबकि इसी अवधि में देश की जीडीपी करीब 31.22 ट्रिलियन डॉलर रही। यानी कर्ज ने आर्थिक उत्पादन को पीछे छोड़ दिया है।

    ताजा आंकड़ों के अनुसार, संयुक्त राज्य अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज 2026 में बढ़कर लगभग 39.2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह स्थिति 1940 के दशक के बाद पहली बार बनी है, जब युद्धकालीन खर्चों के कारण कर्ज जीडीपी से अधिक हो गया था।

    कर्ज बढ़ने की वजह क्या है?
    अर्थशास्त्रियों का कहना है कि मौजूदा कर्ज वृद्धि के पीछे कई कारण हैं टैक्स कटौती, बढ़ता ब्याज भुगतान, और सामाजिक सुरक्षा व स्वास्थ्य योजनाओं जैसे मेडिकेयर और सोशल सिक्योरिटी पर बढ़ता खर्च। रिपोर्ट के अनुसार, सरकार अब रक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर जितना खर्च करती है, उससे अधिक पैसा सिर्फ कर्ज के ब्याज भुगतान में जा रहा है। अनुमान है कि नेट ब्याज भुगतान ही सालाना 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक पहुंच चुका है।

    तेजी से बढ़ता कर्ज
    आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक दशक में अमेरिकी कर्ज लगभग दोगुना हो गया है। 2017 में यह करीब 20.2 ट्रिलियन डॉलर था, जो अब 39 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुंच चुका है। 1990 की तुलना में यह वृद्धि कई गुना अधिक है। कांग्रेस बजट कार्यालय के अनुमान के अनुसार, अगर यही रफ्तार बनी रही तो 2036 तक अमेरिका का कुल कर्ज 53 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है।

    https://tw
    https://x.com/stats_feed/status/2051669630037418391?ref_src=twsrc%5Etfw%7Ctwcamp%5Etweetembed%7Ctwterm%5E2051669630037418391%7Ctwgr%5Ea6977655b8a7d43e5fe0892f94827f6498cbd36d%7Ctwcon%5Es1_&ref_url=https%3A%2F%2Fwww.aajtak.in%2Fbusiness%2Fnews%2Fstory%2Fdonald-trump-tension-us-debt-more-than-gdp-first-time-after-world-war-ii-see-latest-data-tutc-dskc-2544347-2026-05-06
    itter.com/stats_feed/status/2051669630037418391


    आर्थिक खतरे की आशंका
    विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार बढ़ता कर्ज अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए खतरा बन सकता है। इससे ब्याज दरों में वृद्धि, निवेशकों का भरोसा कमजोर होना और देश की क्रेडिट रेटिंग में गिरावट जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इसके अलावा, सरकार पर बढ़ते कर्ज का दबाव आम नागरिकों की जीवन-लागत को भी प्रभावित कर सकता है, जिससे महंगाई और आर्थिक अस्थिरता बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
  • अटलांटिक में क्रूज शिप पर हंता वायरस का कहर: 3 मौतें, भारत के लिए कितना खतरा

    अटलांटिक में क्रूज शिप पर हंता वायरस का कहर: 3 मौतें, भारत के लिए कितना खतरा


    नई दिल्ली। अटलांटिक महासागर में केप वर्डे के पास एक डच क्रूज शिप पर हंता वायरस के मामलों ने अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, जहाज पर इस संक्रमण से अब तक 3 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि कई अन्य यात्री बीमार हैं।

    बताया जा रहा है कि ‘एमवी होंडियस’ नाम का यह जहाज 1 अप्रैल को अर्जेंटीना के उशुआइया से अंटार्कटिका और दक्षिण अटलांटिक द्वीपों की यात्रा के लिए रवाना हुआ था। जहाज पर कुल 147 लोग (88 यात्री और 59 क्रू सदस्य) सवार थे। 6 से 28 अप्रैल के बीच संक्रमण के मामले सामने आए। एक मरीज की हालत गंभीर है, जबकि कुछ में हल्के लक्षण पाए गए हैं।

    क्या है हंता वायरस?

    हंता वायरस संक्रमण एक दुर्लभ लेकिन खतरनाक संक्रमण है, जो मुख्य रूप से संक्रमित चूहों के मूत्र, मल या लार के संपर्क से फैलता है। यह वायरस फेफड़ों को प्रभावित कर गंभीर श्वसन समस्या पैदा कर सकता है। इसके सामान्य लक्षणों में बुखार, सिरदर्द, उल्टी, दस्त और सांस लेने में तकलीफ शामिल हैं।

    WHO के मुताबिक, इस घटना में मानव-से-मानव संक्रमण की आशंका भी जताई गई है, जो आमतौर पर बहुत कम देखने को मिलता है, लेकिन दक्षिण अमेरिका के कुछ मामलों में ऐसा पाया गया है।

    जहाज पर हालात और वैश्विक प्रतिक्रिया

    केप वर्डे ने स्वास्थ्य सुरक्षा कारणों से जहाज को अपने बंदरगाह पर रुकने की अनुमति नहीं दी है। WHO विभिन्न देशों-नीदरलैंड, स्पेन, दक्षिण अफ्रीका और ब्रिटेन-के साथ मिलकर हालात पर नजर बनाए हुए है। मेडिकल टीमें जहाज पर पहुंचकर जांच और उपचार कर रही हैं।

    यात्रियों और क्रू को आइसोलेशन में रहने, मास्क पहनने, हाथों की सफाई रखने और दूरी बनाए रखने की सलाह दी गई है। जहाज को आगे स्पेन के कैनरी द्वीपों की ओर ले जाने पर भी विचार चल रहा है।

    भारत के लिए कितना खतरा?

    विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में हंता वायरस संक्रमण के मामले बेहद दुर्लभ हैं। फिलहाल यह घटना भारत के लिए सीधा खतरा नहीं मानी जा रही, क्योंकि संक्रमण सीमित क्षेत्र और जहाज तक ही केंद्रित है।

    हालांकि, अंतरराष्ट्रीय यात्रा को देखते हुए सतर्कता जरूरी है। स्वास्थ्य एजेंसियों को खासकर दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका से आने वाले यात्रियों की निगरानी बढ़ाने की सलाह दी गई है।

    घबराने की नहीं, सतर्क रहने की जरूरत

    WHO ने इस घटना को लेकर वैश्विक जोखिम को फिलहाल कम बताया है। भारत जैसे देश, जिन्होंने कोविड जैसी महामारी का सामना किया है, ऐसी परिस्थितियों से निपटने में सक्षम माने जाते हैं।

    हंता वायरस गंभीर जरूर है, लेकिन इसका फैलाव सीमित होता है। सही सावधानी, जागरूकता और निगरानी से इसे नियंत्रित किया जा सकता है-इसलिए घबराने के बजाय सतर्क रहना ज्यादा जरूरी है।

  • होर्मुज में फंसे जहाज निकालने के लिए US का बड़ा कदम….प्रोजेक्ट फ्रीडम पर लगाया अस्थायी ब्रेक

    होर्मुज में फंसे जहाज निकालने के लिए US का बड़ा कदम….प्रोजेक्ट फ्रीडम पर लगाया अस्थायी ब्रेक


    वाशिंगटन।
    अमेरिका और ईरान (America and Iran) के बीच जंग के बाद अब एक नया मोड़ आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) में फंसे जहाजों को निकालने के लिए चलाए गए ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ (‘Project Freedom’) को थोड़े समय के लिए रोक दिया है. साथ ही उन्होंने कहा कि ईरान के साथ बातचीत आगे बढ़ रही है और एक पक्का समझौता होने के करीब है. लेकिन नाकेबंदी जारी रहेगी. हालांकि, राष्ट्रपति के इस ऐलान के बाद तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई।

    इन सब के बीच सबसे बड़ी बात है कि अमेरिका ने ऑपरेशन एपिक फ्यूरी को खत्म करने का ऐलान किया है. अमेरिका के विदेश मंत्री मार्क रूबियो ने ये ऐलान किया है. उन्होंने साफ किया कि अब अमेरिका किसी नई लड़ाई की स्थिति नहीं चाहता और शांति का रास्ता अपनाना चाहता है।

    राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा कि पाकिस्तान और दूसरे देशों की मांग पर और अमेरिका की ‘जबरदस्त सैन्य सफलता’ के बाद दोनों पक्षों ने मिलकर यह ऑपरेशन थोड़े समय के लिए रोकने का फैसला किया।

    राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ बातचीत एक ‘पूरे और आखिरी समझौते’ की तरफ बढ़ रही है और बहुत अच्छी प्रगति हुई है. यह रोकना दरअसल यह देखने के लिए किया गया है कि क्या यह समझौता आखिरकार हो सकता है.


    लेकिन नाकेबंदी जारी रहेगी

    यहां एक बहुत जरूरी बात है. राष्ट्रपति ट्रंप ने साफ कहा कि भले ही प्रोजेक्ट फ्रीडम रुक गया हो लेकिन होर्मुज की खाड़ी पर अमेरिका की नाकेबंदी पूरी तरह जारी रहेगी. यानी जहाजों को निकालने का काम रुका है लेकिन ईरान पर दबाव कम नहीं हुआ.


    डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को कड़ी चेतावनी क्या दी?

    एक पत्रकार ने राष्ट्रपति ट्रंप से पूछा कि ईरान को संघर्ष विराम यानी युद्ध रोकने के समझौते का उल्लंघन करने के लिए क्या करना होगा. राष्ट्रपति ट्रंप ने जवाब दिया कि तुम्हें पता चल जाएगा. उन्होंने कहा कि ईरान जानता है कि उसे क्या नहीं करना है. इसके बाद ट्रंप ने एक बड़ी बात कही. उन्होंने कहा कि ईरान ने छोटी-छोटी नावों से छोटे-छोटे हथियारों से हमला किया था. और फिर उन्होंने कहा कि अब ईरान के पास कोई नाव ही नहीं बची. यानी राष्ट्रपति ट्रंप का सीधा इशारा था कि अमेरिका ने ईरान की नौसेना को इतना नुकसान पहुंचाया है कि उनके पास लड़ने के लिए कुछ बचा ही नहीं.


    ईरान के आम लोगों के बारे में डोनाल्ड ट्रंप ने क्या कहा?

    राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि ईरान के लोग विरोध प्रदर्शन करना चाहते हैं लेकिन उनके पास बंदूकें नहीं हैं. फिर उन्होंने कहा कि अगर 2 लाख लोग प्रदर्शन कर रहे हों और 5 या 6 बीमार सोच वाले लोग बंदूक लेकर आ जाएं और उन्हें आंखों के बीच गोली मारने लगें तो बहुत कम लोग वहां खड़े रह पाएंगे.


    UN का ईरान को अल्टीमेटम

    स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बढ़ते तनाव के बीच संयुक्त राष्ट्र में एक अहम प्रस्ताव तैयार किया गया है, जिसमें ईरान को सख्त चेतावनी दी गई है। इस प्रस्ताव के मुताबिक, अगर ईरान जहाजों पर हमले नहीं रोकता, अवैध टोल वसूली बंद नहीं करता और समुद्र में लगाए गए माइंस की जानकारी साझा नहीं करता, तो उस पर प्रतिबंध या अन्य कड़े कदम उठाए जा सकते हैं।