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  • जब ‘बिस्मार्क’ ने डुबो दिया ब्रिटेन का गौरव, द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मन युद्धपोत की ताकत ने बदल दिए थे समीकरण

    जब ‘बिस्मार्क’ ने डुबो दिया ब्रिटेन का गौरव, द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मन युद्धपोत की ताकत ने बदल दिए थे समीकरण

    नई दिल्ली । द्वितीय विश्व युद्ध के इतिहास में कुछ युद्धपोत ऐसे रहे हैं जिनका नाम आज भी सैन्य रणनीति, समुद्री शक्ति और युद्धक क्षमता के प्रतीक के रूप में लिया जाता है। जर्मनी का युद्धपोत बिस्मार्क उनमें सबसे प्रमुख माना जाता है। वर्ष 1941 में अटलांटिक महासागर में उसकी मौजूदगी मात्र ने ब्रिटिश नौसेना के लिए गंभीर चुनौती खड़ी कर दी थी। यही कारण था कि उसे नष्ट करने के लिए ब्रिटेन को अपने इतिहास के सबसे बड़े नौसैनिक अभियानों में से एक चलाना पड़ा।

    मई 1941 में डेनमार्क स्ट्रेट के समुद्री क्षेत्र में हुई लड़ाई ने बिस्मार्क को विश्वभर में चर्चा का विषय बना दिया। इस युद्ध के दौरान उसने ब्रिटिश नौसेना के गौरव माने जाने वाले HMS Hood को कुछ ही मिनटों में समुद्र की गहराइयों में पहुंचा दिया। उस समय हूड ब्रिटेन का सबसे प्रतिष्ठित युद्धपोत था और उसकी तबाही ने पूरे ब्रिटिश साम्राज्य को झकझोर दिया। इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि बिस्मार्क केवल एक बड़ा जहाज नहीं, बल्कि अत्यंत खतरनाक युद्ध मशीन था।

    बिस्मार्क की सबसे बड़ी विशेषता उसका विशाल आकार था। लगभग 41,700 टन के मानक विस्थापन वाला यह युद्धपोत अपने दौर के सबसे बड़े और प्रभावशाली जहाजों में शामिल था। उस समय दुनिया के अधिकांश युद्धपोत उससे छोटे थे। केवल बाद में विकसित हुए कुछ अमेरिकी और जापानी युद्धपोत ही आकार में उससे आगे निकल सके।

    रफ्तार के मामले में भी बिस्मार्क अपने समकालीन युद्धपोतों से बेहतर माना जाता था। लगभग 56 किलोमीटर प्रति घंटे की अधिकतम गति उसे तेज कार्रवाई और रणनीतिक गतिशीलता प्रदान करती थी। विशाल आकार के बावजूद उसकी गति और संचालन क्षमता ने उसे युद्ध के मैदान में विशेष बढ़त दी।

    इस युद्धपोत की एक और बड़ी ताकत उसकी सुरक्षा प्रणाली थी। जहाज के ढांचे को कई जलरोधी खंडों में विभाजित किया गया था, जिससे गंभीर क्षति के बावजूद उसके डूबने की संभावना कम हो जाती थी। यही वजह थी कि बाद में ब्रिटिश नौसेना को उसे निष्क्रिय करने के लिए लगातार गोलाबारी, हवाई हमलों और टॉरपीडो का सहारा लेना पड़ा। बिस्मार्क की मजबूती ने उसे उस समय के सबसे सुरक्षित युद्धपोतों में स्थान दिलाया।

    हथियारों की दृष्टि से भी बिस्मार्क बेहद शक्तिशाली था। उसकी आठ 15 इंच की मुख्य तोपें एक साथ भारी मात्रा में विस्फोटक और स्टील के गोले दागने में सक्षम थीं। हालांकि जापान के यामाटो जैसे कुछ युद्धपोत उससे अधिक भारी गोलाबारी कर सकते थे, फिर भी बिस्मार्क की फायर कंट्रोल प्रणाली और लक्ष्य भेदन क्षमता उसे बेहद प्रभावशाली बनाती थी।

    डेनमार्क स्ट्रेट की लड़ाई में उसने ब्रिटिश युद्धपोत Prince of Wales को भी गंभीर क्षति पहुंचाई। सटीक गोलाबारी के कारण जहाज के कई हिस्सों को नुकसान हुआ और ब्रिटिश नौसेना को पीछे हटना पड़ा। हालांकि बाद में Prince of Wales ने मरम्मत के बाद फिर से अभियान में हिस्सा लिया, लेकिन उस संघर्ष ने बिस्मार्क की युद्ध क्षमता का प्रदर्शन पूरी दुनिया के सामने कर दिया।

    HMS Hood के विनाश के बाद ब्रिटेन ने बिस्मार्क को हर कीमत पर नष्ट करने का निर्णय लिया। दर्जनों युद्धपोतों, क्रूजरों और विमानों को उसके पीछा करने के लिए लगाया गया। कई दिनों तक चले इस विशाल अभियान के बाद अंततः बिस्मार्क को घेरकर डुबो दिया गया, लेकिन तब तक वह नौसैनिक इतिहास में अपनी अमिट पहचान बना चुका था।

    आज भी बिस्मार्क को केवल एक युद्धपोत नहीं, बल्कि समुद्री युद्धक शक्ति, तकनीकी उत्कृष्टता और द्वितीय विश्व युद्ध की सबसे चर्चित नौसैनिक घटनाओं के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है।

  • चीन की मदद से पाकिस्तान को मिली नई ताकत, लेकिन परमाणु और पारंपरिक पनडुब्बी क्षमता में भारत अभी भी कई कदम आगे

    चीन की मदद से पाकिस्तान को मिली नई ताकत, लेकिन परमाणु और पारंपरिक पनडुब्बी क्षमता में भारत अभी भी कई कदम आगे

    नई दिल्ली । चीन में निर्मित पहली हंगोर-क्लास पनडुब्बी के पाकिस्तान पहुंचने के साथ ही दक्षिण एशिया में समुद्री शक्ति संतुलन को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। कराची नौसैनिक अड्डे पर आयोजित समारोह में पाकिस्तान ने इस उपलब्धि को अपने नौसेना आधुनिकीकरण कार्यक्रम का महत्वपूर्ण चरण बताया। हालांकि रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस नई पनडुब्बी के शामिल होने के बावजूद समुद्री शक्ति के व्यापक परिदृश्य में भारत की बढ़त स्पष्ट रूप से कायम है।

    पाकिस्तान लंबे समय से अपनी नौसैनिक क्षमताओं को मजबूत करने के लिए चीन के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाता रहा है। हंगोर-क्लास पनडुब्बी इसी सहयोग का हिस्सा है। यह डीजल-इलेक्ट्रिक प्रणाली पर आधारित आधुनिक अटैक सबमरीन है, जिसमें एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन तकनीक का उपयोग किया गया है। इस तकनीक की मदद से पनडुब्बी लंबे समय तक पानी के भीतर रह सकती है और उसकी पहचान करना अपेक्षाकृत कठिन हो जाता है।

    पाकिस्तान को कुल आठ हंगोर-क्लास पनडुब्बियां मिलने की योजना है। इनमें से कुछ का निर्माण चीन में किया जा रहा है, जबकि शेष का निर्माण तकनीकी हस्तांतरण के तहत कराची में होगा। इससे पाकिस्तान अपनी घरेलू रक्षा उत्पादन क्षमता को भी मजबूत करने का प्रयास कर रहा है।

    हालांकि रणनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो भारत और पाकिस्तान की पनडुब्बी क्षमताओं में अभी भी बड़ा अंतर मौजूद है। भारतीय नौसेना के पास परमाणु शक्ति से संचालित अरिहंत श्रेणी की बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां हैं, जिन्हें देश की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता का महत्वपूर्ण स्तंभ माना जाता है। ये पनडुब्बियां लंबे समय तक समुद्र की गहराइयों में रहकर रणनीतिक अभियानों को अंजाम देने में सक्षम हैं।

    रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार अरिहंत श्रेणी की भूमिका केवल युद्ध संचालन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की परमाणु त्रिस्तरीय प्रतिरोधक क्षमता का अभिन्न हिस्सा है। इस श्रेणी की तुलना पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों से करना उचित नहीं माना जाता, क्योंकि दोनों की रणनीतिक भूमिका अलग-अलग होती है।

    दूसरी ओर भारत की कलावरी श्रेणी की पनडुब्बियां भी आधुनिक तकनीक और उन्नत युद्धक प्रणालियों से लैस हैं। फ्रांसीसी डिजाइन पर आधारित इन पनडुब्बियों को कम ध्वनि उत्सर्जन, आधुनिक सेंसर और सटीक हथियार प्रणालियों के लिए जाना जाता है। समुद्री निगरानी, दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने और सामरिक अभियानों में इनकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि हंगोर-क्लास पाकिस्तान की पारंपरिक पनडुब्बी क्षमता को अवश्य मजबूत करेगी, लेकिन भारतीय नौसेना के परिचालन अनुभव, तकनीकी विविधता और संसाधनों के मुकाबले यह बढ़त सीमित है। भारतीय नौसेना के पास विमानवाहक पोत, उन्नत युद्धपोत, लंबी दूरी की मिसाइल प्रणालियां और बहुस्तरीय समुद्री सुरक्षा ढांचा मौजूद है, जो उसे क्षेत्रीय स्तर पर मजबूत स्थिति प्रदान करता है।

    भारत वर्तमान में प्रोजेक्ट-75I तथा स्वदेशी परमाणु अटैक पनडुब्बी कार्यक्रमों पर भी कार्य कर रहा है। इन परियोजनाओं के पूरा होने के बाद भारतीय नौसेना की पानी के भीतर संचालन क्षमता और अधिक सशक्त होने की उम्मीद है। इससे हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की रणनीतिक उपस्थिति और प्रभाव भी मजबूत होगा।

    विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान की नई पनडुब्बी उसकी नौसैनिक क्षमता में सकारात्मक वृद्धि का संकेत है, लेकिन इसे भारत की समुद्री बढ़त को चुनौती देने वाला निर्णायक बदलाव नहीं माना जा सकता। वर्तमान परिस्थितियों में समुद्री शक्ति, तकनीकी क्षमता, रणनीतिक संसाधनों और दीर्घकालिक सैन्य तैयारी के पैमानों पर भारत अब भी स्पष्ट रूप से मजबूत स्थिति में दिखाई देता है।

  • चार वर्षों तक कोमा से जूझने के बाद थाईलैंड की राजकुमारी का निधन, शाही परिवार और देश में शोक की लहर

    चार वर्षों तक कोमा से जूझने के बाद थाईलैंड की राजकुमारी का निधन, शाही परिवार और देश में शोक की लहर

    नई दिल्ली । थाईलैंड के शाही परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। देश के राजा महा वजीरालोंगकोर्न की सबसे बड़ी बेटी और उत्तराधिकार की प्रमुख दावेदारों में शामिल राजकुमारी बज्रकिटियाभा नरेंद्र देब्यावती का 47 वर्ष की आयु में निधन हो गया। पिछले लगभग चार वर्षों से वह गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के कारण कोमा में थीं और लगातार चिकित्सकीय निगरानी में उनका उपचार चल रहा था। उनके निधन की खबर सामने आते ही पूरे थाईलैंड में शोक का माहौल बन गया।

    राजपरिवार की ओर से जारी आधिकारिक जानकारी के अनुसार, राजकुमारी की तबीयत पिछले कुछ समय से लगातार नाजुक बनी हुई थी। कई जटिल स्वास्थ्य समस्याओं के चलते उनके शरीर की स्थिति लगातार कमजोर होती गई। चिकित्सा विशेषज्ञों की टीम लंबे समय से उनका उपचार कर रही थी, लेकिन स्वास्थ्य में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया। अंततः उन्होंने जीवन की अंतिम लड़ाई हार दी।

    राजकुमारी की स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं दिसंबर 2022 में उस समय शुरू हुई थीं, जब वह एक आधिकारिक कार्यक्रम के सिलसिले में देश के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के दौरे पर थीं। इसी दौरान उन्हें अचानक हृदय संबंधी गंभीर समस्या का सामना करना पड़ा और वे बेहोश हो गईं। तत्काल उन्हें विशेष चिकित्सा सुविधा के लिए राजधानी लाया गया, जहां उनका इलाज शुरू हुआ। हालांकि उस घटना के बाद वह कभी पूरी तरह होश में नहीं लौट सकीं और लगातार कोमा की स्थिति में रहीं।

    राजकुमारी बज्रकिटियाभा को थाई शाही परिवार की सबसे प्रभावशाली और सक्रिय हस्तियों में गिना जाता था। उन्होंने केवल शाही जिम्मेदारियों तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि कानून, कूटनीति और सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी सार्वजनिक छवि एक शिक्षित, संवेदनशील और जिम्मेदार राजपरिवार सदस्य के रूप में स्थापित थी।

    उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने अमेरिका में कानून की पढ़ाई की और अंतरराष्ट्रीय स्तर की शैक्षणिक उपलब्धियां हासिल कीं। शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने कानूनी क्षेत्र में काम किया और न्याय व्यवस्था से जुड़े विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया। बाद में उन्हें विदेशों में अपने देश का प्रतिनिधित्व करने की जिम्मेदारी भी सौंपी गई, जहां उन्होंने राजनयिक के रूप में कार्य किया।

    राजकुमारी सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय भूमिका निभाती थीं। विशेष रूप से महिला अधिकारों और जेल सुधारों से जुड़े मुद्दों पर उनका योगदान उल्लेखनीय माना जाता है। उन्होंने महिला कैदियों और गर्भवती बंदियों के कल्याण के लिए कई पहल का समर्थन किया। इसी कारण उन्हें मानवाधिकार और सामाजिक न्याय से जुड़े मंचों पर भी सम्मान प्राप्त हुआ।

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उनकी पहचान मजबूत रही। कानून के शासन, न्यायिक सुधार और सामाजिक विकास के क्षेत्रों में उनकी सक्रियता को वैश्विक संस्थाओं ने भी सराहा था। बाद के वर्षों में उन्होंने सुरक्षा और प्रशासनिक जिम्मेदारियों का भी निर्वहन किया तथा राष्ट्रीय स्तर पर कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया।

    राजकुमारी के निधन को थाईलैंड के लिए एक बड़ी क्षति माना जा रहा है। राजनीतिक, सामाजिक और शाही हलकों में उनके योगदान को याद किया जा रहा है। देशभर में लोग उन्हें एक ऐसी शख्सियत के रूप में याद कर रहे हैं जिन्होंने सार्वजनिक जीवन में सेवा, जिम्मेदारी और समर्पण का उदाहरण प्रस्तुत किया।

    उनके निधन के साथ थाई शाही परिवार ने अपनी एक महत्वपूर्ण सदस्य को खो दिया है। आने वाले दिनों में देशभर में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किए जाने की संभावना है, जहां लोग उनके जीवन और योगदान को याद करेंगे।

  • होर्मुज संकट के बीच केंद्र का बड़ा दांव, असम और नागालैंड से बढ़ेगा तेल-गैस उत्पादन, ऊर्जा सुरक्षा को मिलेगा नया आ

    होर्मुज संकट के बीच केंद्र का बड़ा दांव, असम और नागालैंड से बढ़ेगा तेल-गैस उत्पादन, ऊर्जा सुरक्षा को मिलेगा नया आ

    नई दिल्ली । वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर मंडरा रहे अनिश्चितता के बादलों और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच भारत ने घरेलू ऊर्जा उत्पादन को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने असम और नागालैंड सरकारों के साथ हाइड्रोकार्बन की खोज और उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए त्रिपक्षीय समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। इस पहल को देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और आयातित ईंधन पर निर्भरता कम करने की दिशा में एक रणनीतिक प्रयास माना जा रहा है।

    भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों, विशेषकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में किसी भी प्रकार का व्यवधान देश की ऊर्जा आपूर्ति और कीमतों पर असर डाल सकता है। इसी पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार घरेलू तेल और गैस उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर विशेष ध्यान दे रही है। पूर्वोत्तर भारत को इस रणनीति का प्रमुख केंद्र बनाया जा रहा है, जहां प्राकृतिक संसाधनों की पर्याप्त संभावनाएं मौजूद हैं।

    पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि पूर्वोत्तर क्षेत्र में खोज और उत्पादन गतिविधियों के विस्तार की अपार संभावनाएं हैं। उन्होंने बताया कि देश के कुल कच्चे तेल भंडार का लगभग 22 प्रतिशत और प्राकृतिक गैस भंडार का करीब 15 प्रतिशत हिस्सा अकेले असम में मौजूद है। ऐसे में इस क्षेत्र का विकास भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

    नागालैंड को लेकर भी सरकार काफी आशावादी नजर आ रही है। विशेष रूप से असम-अराकान बेसिन की नागा-शुपेन बेल्ट में हाइड्रोकार्बन संसाधनों की बड़ी संभावनाएं बताई जा रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस क्षेत्र में कई ऐसे भंडार मौजूद हैं जिनका अभी तक पूर्ण दोहन नहीं हो पाया है। नई नीतिगत पहल और निवेश के माध्यम से इन संसाधनों का उपयोग बढ़ाया जा सकता है।

    सरकार के अनुसार, नए समझौते से तेल उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है। वर्तमान में कुछ क्षेत्रों में प्रतिदिन लगभग 1000 से 1500 बैरल उत्पादन हो रहा है, जिसे आने वाले वर्षों में कई गुना तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। यदि यह योजना अपेक्षित परिणाम देती है तो देश के घरेलू उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान मिल सकता है।

    केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी इस समझौते को पूर्वोत्तर के विकास से जोड़ते हुए कहा कि इससे तेल एवं गैस क्षेत्र में नए अवसर पैदा होंगे। उन्होंने विश्वास जताया कि यह पहल क्षेत्रीय आर्थिक विकास, औद्योगिक गतिविधियों और रोजगार सृजन को नई गति प्रदान करेगी। पूर्वोत्तर राज्यों को राष्ट्रीय विकास की मुख्यधारा से और अधिक मजबूती से जोड़ने में भी यह कदम उपयोगी साबित हो सकता है।

    पेट्रोलियम मंत्रालय का मानना है कि यह समझौता केवल संसाधनों की खोज तक सीमित नहीं है, बल्कि निवेशकों के लिए भरोसेमंद माहौल तैयार करने में भी मदद करेगा। स्पष्ट नीतिगत ढांचा, बेहतर समन्वय और नियामकीय सहयोग के कारण निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां दीर्घकालिक निवेश के लिए अधिक उत्साहित हो सकती हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार, यदि पूर्वोत्तर क्षेत्र में तेल और गैस उत्पादन बढ़ाने की योजनाएं सफल रहती हैं तो इससे ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी, स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ मिलेगा और देश की आयात निर्भरता कम करने के लक्ष्य को भी बल मिलेगा। मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में यह पहल भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखी जा रही है।

  • थाईलैंड की भावी शासक प्रिसेज बज्रकितियाभा का निधन…, 3 साल तक कोमा में रही

    थाईलैंड की भावी शासक प्रिसेज बज्रकितियाभा का निधन…, 3 साल तक कोमा में रही


    बैंकॉक।
    थाईलैंड (Thailand) की भावी शासक राजकुमारी, बज्रकितियाभा (Princess Bajrakitiyabha) का निधन हो गया है। शुक्रवार सुबह शाही परिवार ने एक बयान जारी कर इसकी पुष्टि की है। राजा महा वजिरालॉन्गकॉर्न (King Maha Vajiralongkorn) की सबसे बड़ी बेटी और देश की सबसे लोकप्रिय शाही हस्तियों में से एक, ‘प्रिंसेस भा’ पिछले साढ़े 3 साल से लाइफ सपोर्ट सिस्टम के सहारे कोमा में थीं। अब उनकी मौत से पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई है।

    पैलेस द्वारा जारी बयान के मुताबिक, 47 वर्षीय राजकुमारी बज्रकितियाभा ने बैंकॉक के एक अस्पताल में अंतिम सांस ली। इससे पहले शाही परिवार ने बीते दिनों एक बयान जारी कर बताया था कि उनकी हालत बिगड़ती जा रही है। मेडिकल टीम ने बताया था कि उनके पेट और आंतों में इन्फेक्शन फैल गया था और उनके कई अंदरूनी अंगों ने काम करना बंद कर दिया था। डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बावजूद स्थानीय समयानुसार गुरुवार रात उनका निधन हो गया।


    दिसंबर 2022 में हो गई थीं बेहोश

    राजकुमारी बज्रकितियाभा दिसंबर 2022 में बैंकॉक में अपने पालतू कुत्तों को वॉक कराने के दौरान अचानक बेहोश होकर गिर पड़ी थीं। डॉक्टरों के मुताबिक, दिल में माइकोप्लाज्मा इन्फेक्शन के कारण अचानक उनकी दिल की धड़कनें पूरी तरह अनियमित हो गई थीं। इससे उनके दिमाग में ऑक्सीजन की कमी हुई और वह कोमा में चली गईं। तब से उन्हें मशीनों के सहारे ही जीवित रखा गया था।


    सबसे योग्य उत्तराधिकारी थीं प्रिंसेज भा

    राजकुमारी को यहां के लोग प्यार से प्रिंसेज भा कहा करते थे। राजा वजिरालॉन्गकॉर्न की पहली पत्नी सोअमसावली से जन्मीं प्रिंसेज भा का जन्म 7 दिसंबर 1978 को हुआ था। वह अपने पिता की सात संतानों में सबसे बड़ी थीं। बचपन से ही वे काफी मेधावी थीं। आगे चलकर वे वह एक बेहद काबिल वकील थीं। उन्होंने अमेरिका की प्रतिष्ठित कॉर्नेल यूनिवर्सिटी से कानून में LLM और डॉक्टरेट की डिग्रियां हासिल की थीं।

    इसके बाद उन्हें राजघराने से अहम जिम्मेदारियां भी मिलीं। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में थाई मिशन के लिए काम किया। इसके बाद वे 2012 से 2014 तक ऑस्ट्रिया में थाईलैंड की राजदूत रहीं। इसके अलावा प्रिंसेज भा ने थाईलैंड की जेलों में बंद महिला कैदियों की स्थिति सुधारने और ड्रग्स मामलों में मिलने वाली कड़ी सजाओं के खिलाफ कानून में बड़े सुधारों की वकालत भी की थी। 2021 में उनके पिता ने उन्हें अपनी पर्सनल बॉडीगार्ड विंग का चीफ ऑफ स्टाफ नियुक्त किया था और उन्हें जनरल की रैंक दी थी।


    थाईलैंड के सिंहासन का अगला वारिस कौन?

    राजकुमारी बज्रकितियाभा के निधन से थाईलैंड में उत्तराधिकार को लेकर बड़ा संकट खड़ा हो गया है। 73 वर्षीय राजा वजिरालॉन्गकॉर्न ने अभी तक आधिकारिक रूप से अपने उत्तराधिकारी का नाम घोषित नहीं किया है। प्रिंसेस भा के निधन से पहले उन्हें ही सबसे योग्य उम्मीदवार माना जा रहा था। हालांकि सालों पहले थाईलैंड के कानून में महिला उत्तराधिकारी का प्रावधान नहीं था। लेकिन 1974 में संविधान संशोधन के बाद इन नियमों में बदलाव किए गए थे।

    प्रिंसेज भा की मौत के बाद सबसे अहम दावेदार 21 वर्षीय प्रिंस दिपंगकोर्न हैं। वे राजा की तीसरी पत्नी से पैदा हुए इकलौते बेटे हैं और फिलहाल एकमात्र वैध पुरुष उत्तराधिकारी भी हैं। हालांकि कम उम्र में इतनी बड़ी जिम्मेदारी संभालने की उनकी क्षमताओं पर सवाल उठ रहे हैं। इससे पहले राजा के अन्य चार बेटे भी थे। हालांकि राजा ने अपनी दूसरी शादी से हुए चार बेटों को 1996 में ही राजघराने से बेदखल कर दिया था। वे अपनी मां के साथ अमेरिका में रहते हैं और उनका शाही हक खत्म हो चुका है।

  • PoK में सस्ते आटा-चावल के लिए सड़क पर उतरे लोग…. Pak सेना ने की फायरिंग, 16 की मौत

    PoK में सस्ते आटा-चावल के लिए सड़क पर उतरे लोग…. Pak सेना ने की फायरिंग, 16 की मौत


    रावलकोट ।
    पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) (Pakistan-occupied Kashmir (PoK) में सस्ता आटा-चावल, किफायती बिजली और बुनियादी अधिकारों की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे आम लोगों को एक बार फिर पाकिस्तानी सेना (Pakistan Army) का कहर झेलना पड़ा। रावलकोट के ईदगाह मैदान में गुरुवार को उस समय भयानक मंजर नजर आया जब सैनिकों ने बिना चेतावनी गोलियां बरसानी शुरू कर दीं, जिसमें कम से कम 16 निहत्थे प्रदर्शनकारी मारे गए और 37 अन्य घायल हो गए।

    रावलकोट में आर्थिक तंगी से जूझ रहे करीब 60 से 70 हजार लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। इसमें पुरुष, महिलाएं और युवा सभी शामिल हैं। ईदगाह मैदान में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों पर पाकिस्तानी सेना और रेंजर्स की गोलियों की बरसात से अचानक हर तरफ भगदड़ मच गई। थोड़ी ही देर में पूरे इलाके में मंजर एकदम दिल दहला देने वाला था। खून से सनी सड़कों और खेतों में अपनों को ढूंढ़ते दुखी परिवार हक की आवाज उठाने की मानवीय कीमत चुकाने की निशानी बन गए हैं। पीओके में शुक्रवार से जारी विरोध प्रदर्शनों के दौरान इस तरह की दमनकारी कार्रवाई में अब तक 53 लोगों की जान जा चुकी है। पाकिस्तानी सेना यहां जितनी दमनकारी कार्रवाई कर रही है, सड़कों पर उतरे लोगों का हौसला उससे कहीं ज्यादा बुलंद है। इस खूनी कहर के बावजूद सैकड़ों की संख्या में प्रदर्शनकारी अब भी अपनी मांगों से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।


    आर-पार के मूड में जनता

    गोलीबारी के बाद भीड़ को संबोधित करते हुए आंदोलन के नेता सरदार अमन खान ने कहा कि संघर्ष अब एक निर्णायक दौर में पहुंच गया है और संकल्प लिया कि जान-माल के नुकसान के बावजूद यह आंदोलन जारी रहेगा। सड़कों पर मौजूद लोग कोई हथियार नहीं लिए हैं। वे बस सस्ते भोजन, सस्ती बिजली और सम्मानजनक जीवन की मांग कर रहे हैं। फिर भी, उन्हें जवाब में गोलियां मिली हैं।

  • US-Iran War: भारतीय नाविकों की मौत पर उठे सवाल, होर्मुज में 6 की जा चुकी हैं जान

    US-Iran War: भारतीय नाविकों की मौत पर उठे सवाल, होर्मुज में 6 की जा चुकी हैं जान


    तेहरान।
    अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध (America-Iran War) में भारतीय नाविकों (Indian sailors) की मौत के बाद कई सवाल उठ रहे हैं। संघर्ष शुरू होने के बाद अब तक 6 भारतीयों की मौत हो चुकी है। वहीं बीते एक सप्ताह में भारतीय नाविकों वाले 3 जहाजों पर हमले हुए हैं। अमेरिका (America) स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) में ओमान के तट के पास इन जहाजों को लगातार निशाना बना रहा है। बीते बुधवार को पालाऊ के झंडे वाले तेल टैंकर ‘एमटी सेट्टेबेलो’ पर हुए हालिया हमले में तीन भारतीय नाविकों की मौत हो गई है। ये नाविक हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश के रहने वाले थे। इसके बाद अब इलाके में तैनात भारतीयों की सुरक्षा पर सवालिया निशान लग गया है। ऐसे में समझते हैं कि इस वक्त कितने भारतीय नाविक समंदर में तैनात हैं और किस तरह उन्हें हर रोज अपनी जान की बाजी लगानी पड़ती है।

    आंकड़ों की बात करें तो भारतीय नाविक आज अंतरराष्ट्रीय कमर्शियल शिपिंग इंडस्ट्री की रीढ़ बन चुके हैं। भारत मर्चेंट नेवी वर्कफोर्स के मामले में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश है। रिपोर्ट्स के मुताबिक ग्लोबल मर्चेंट नेवी वर्कफोर्स के मामले में भारत की हिस्सेदारी लगभग 10 प्रतिशत है। इसके अलावा इस वक्त 3 लाख से अधिक भारतीय अंतरराष्ट्रीय कंटेनर जहाजों, बल्क कैरियर और तेल टैंकरों पर सक्रिय रूप से तैनात हैं।

    ये भारतीय अपनी बेहतरीन ट्रेनिंग, फर्राटेदार अंग्रेजी और तकनीक में निपुण होने की वजह से वैश्विक शिपिंग कंपनियां की पहली पसंद होते हैं। यही वजह है कि फारस की खाड़ी, लाल सागर या ओमान की खाड़ी से गुजरने वाले लगभग हर बड़े कमर्शियल जहाज पर भारतीय नाविक होते हैं।


    क्यों जान जोखिम में डालने को मजबूर?

    हर साल हजारों भारतीय युवा इस नौकरी की तरफ क्यों आते हैं? इसके पीछे कई वजहें हैं। विदेशी झंडे वाले जहाजों पर मिलने वाली सैलरी डॉलर में होती है। यह सैलरी भारत में मिलने वाली किसी भी शुरुआती कॉर्पोरेट या इंजीनियरिंग नौकरी की तुलना में कई गुना अधिक होती है। वहीं भारतीय कानूनों के अनुसार, अगर कोई नाविक एक वित्तीय वर्ष में 183 दिनों से अधिक देश से बाहर बिताता है, तो उसे NRI का दर्जा मिलता है और कमाई पूरी तरह से टैक्स-फ्री हो जाती है। इस तरह युवा इस जॉब की तरफ आकर्षित होते हैं।


    नहीं होता रास्ता बदलने का ऑप्शन

    अब समझते हैं कि नाविकों को रिस्क क्यों लेना पड़ता है। जहाजों पर काम करने वाले नाविकों के लिए खतरा तब बढ़ जाता है जब वे अनजाने में ‘ग्रे फ्लीट’ या ‘डार्क फ्लीट’ का हिस्सा बन जाते हैं। ये वैसे संदिग्ध जहाज होते हैं जो अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को दरकिनार कर चोरी-छिपे तेल और ईंधन की सप्लाई करते हैं। इनमें क्रू मेंबर्स के पास यह चुनने का अधिकार बहुत कम या न के बराबर होता है कि उनका जहाज किस देश से होकर गुजरेगा। रूट शिपिंग कंपनियां ही तय करती हैं। समुद्री यूनियनों ने लगातार यह मांग उठाई है कि नाविकों को संकट की घड़ी में हाई-रिस्क जोन में जाने से इनकार करने का अधिकार मिलना चाहिए, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सख्त नियम न होने के कारण भारतीय नाविकों को मजबूरन इसी रास्ते से गुजरना पड़ता है।

  • क्षेत्रीय सुरक्षा संकट गहराया, मिसाइल हमलों की आशंका के बीच कुवैत ने एयरस्पेस बंद कर उठाया एहतियाती कदम

    क्षेत्रीय सुरक्षा संकट गहराया, मिसाइल हमलों की आशंका के बीच कुवैत ने एयरस्पेस बंद कर उठाया एहतियाती कदम

    नई दिल्ली । मिडिल ईस्ट में लगातार बढ़ते सैन्य तनाव के बीच कुवैत ने एक महत्वपूर्ण और एहतियाती कदम उठाते हुए अपने हवाई क्षेत्र को अस्थायी रूप से बंद करने की घोषणा की है। यह निर्णय ऐसे समय लिया गया है जब क्षेत्र में सुरक्षा हालात लगातार संवेदनशील बने हुए हैं और नागरिक विमानन गतिविधियों पर संभावित खतरों की आशंका बढ़ गई है। कुवैत के इस कदम को क्षेत्रीय सुरक्षा रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसका उद्देश्य यात्रियों, विमान सेवाओं और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

    कुवैत के नागरिक उड्डयन प्रशासन की ओर से जारी निर्देशों के बाद देश के हवाई क्षेत्र में नागरिक विमानों की आवाजाही रोक दी गई। इसके साथ ही कई अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय उड़ानों का मार्ग बदलकर उन्हें वैकल्पिक हवाई अड्डों की ओर भेजा गया। कुछ समय तक कई विमान कुवैत की सीमा के बाहर मंडराते रहे, जिसके बाद उन्हें नए मार्गों पर भेजा गया। इस फैसले से क्षेत्रीय विमानन नेटवर्क पर भी असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।

    सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार हाल के दिनों में क्षेत्र में बढ़ी सैन्य गतिविधियों और मिसाइल हमलों की आशंकाओं को देखते हुए अतिरिक्त सतर्कता बरती जा रही है। इसी क्रम में कुवैत की वायु रक्षा प्रणालियों को भी सक्रिय रखा गया है। रक्षा तंत्र लगातार हवाई गतिविधियों पर नजर बनाए हुए है ताकि किसी भी संभावित खतरे का समय रहते जवाब दिया जा सके।

    कुवैत सरकार का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में नागरिक विमानन संचालन को सामान्य रूप से जारी रखना जोखिमपूर्ण हो सकता है। इसलिए सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए एयरस्पेस बंद करने का निर्णय लिया गया। अधिकारियों का कहना है कि यह कदम पूरी तरह एहतियाती है और स्थिति की निरंतर समीक्षा की जा रही है। हालात सामान्य होने के बाद हवाई क्षेत्र को दोबारा खोले जाने पर निर्णय लिया जाएगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि मिडिल ईस्ट में बढ़ता तनाव केवल सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव व्यापार, परिवहन और अंतरराष्ट्रीय संपर्कों पर भी पड़ सकता है। खाड़ी क्षेत्र दुनिया के सबसे व्यस्त विमानन गलियारों में शामिल है और यहां किसी भी प्रकार की सुरक्षा चुनौती का असर कई देशों की उड़ान सेवाओं पर पड़ता है। ऐसे में कुवैत का फैसला क्षेत्रीय विमानन सुरक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    हाल के दिनों में क्षेत्र में हुई घटनाओं ने सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। कुवैत ने यह भी संकेत दिया है कि नागरिक विमानन यातायात को किसी प्रकार के संभावित खतरे से बचाने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ हवाई निगरानी तंत्र को भी सक्रिय रखा गया है ताकि किसी भी आपात स्थिति से प्रभावी ढंग से निपटा जा सके।

    कुवैत द्वारा एयरस्पेस बंद करने का यह निर्णय इस बात का संकेत है कि मिडिल ईस्ट में जारी तनाव का प्रभाव अब सीधे नागरिक ढांचे और अंतरराष्ट्रीय परिवहन व्यवस्थाओं पर दिखाई देने लगा है। आने वाले दिनों में क्षेत्रीय हालात किस दिशा में बढ़ते हैं, इस पर न केवल सुरक्षा एजेंसियों बल्कि वैश्विक विमानन क्षेत्र की भी नजर बनी रहेगी।

  • महंगाई दर में लगातार तीसरे महीने उछाल, ट्रंप के ‘मुझे महंगाई पसंद है’ बयान से गरमाई अमेरिकी राजनीति

    महंगाई दर में लगातार तीसरे महीने उछाल, ट्रंप के ‘मुझे महंगाई पसंद है’ बयान से गरमाई अमेरिकी राजनीति

    नई दिल्ली । अमेरिका की अर्थव्यवस्था एक बार फिर बढ़ती महंगाई की चुनौती से जूझ रही है। गैस और ऊर्जा कीमतों में लगातार वृद्धि के चलते देश की खुदरा महंगाई दर मई महीने में तीन वर्षों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है। यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है जब अमेरिकी प्रशासन आर्थिक स्थिरता और उपभोक्ताओं को राहत देने के दावों पर जोर दे रहा है। महंगाई के नए आंकड़ों ने न केवल आर्थिक विशेषज्ञों बल्कि राजनीतिक विश्लेषकों का भी ध्यान अपनी ओर खींचा है।

    ताजा आर्थिक आंकड़ों के अनुसार मई में खुदरा महंगाई सालाना आधार पर 4.2 प्रतिशत दर्ज की गई, जो पिछले महीने के मुकाबले अधिक है। यह लगातार तीसरा महीना है जब महंगाई दर में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। मासिक स्तर पर भी कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई, जिससे उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव बढ़ा है। विशेष रूप से ईंधन और ऊर्जा क्षेत्र की कीमतों में बढ़ोतरी को इस उछाल का प्रमुख कारण माना जा रहा है।

    अर्थशास्त्रियों का मानना है कि महंगाई का यह स्तर अमेरिकी केंद्रीय बैंक के निर्धारित लक्ष्य से काफी ऊपर है। फेडरल रिजर्व लंबे समय से महंगाई को नियंत्रित करने और आर्थिक संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहा है, लेकिन ताजा आंकड़ों ने नीति निर्माताओं की चुनौतियों को और बढ़ा दिया है। यदि कीमतों में इसी तरह वृद्धि जारी रहती है तो ब्याज दरों और मौद्रिक नीतियों को लेकर नए निर्णयों की आवश्यकता पड़ सकती है।

    महंगाई के बढ़ते दबाव के बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एक टिप्पणी ने राजनीतिक माहौल को और गर्म कर दिया है। महंगाई से जुड़े सवालों के जवाब में उन्होंने आश्चर्यजनक रूप से सकारात्मक रुख अपनाते हुए कहा कि उन्होंने महंगाई को लेकर चिंता करना छोड़ दिया है और अब उन्हें यह पसंद है। उनके इस बयान ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है।

    विश्लेषकों का कहना है कि आर्थिक मुद्दे अमेरिकी मतदाताओं के लिए हमेशा महत्वपूर्ण रहे हैं और महंगाई सीधे आम लोगों के दैनिक जीवन को प्रभावित करती है। ऐसे में राष्ट्रपति की यह टिप्पणी विपक्षी दलों को सरकार पर हमला करने का अवसर दे सकती है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि बढ़ती जीवन-यापन लागत पहले से ही अमेरिकी परिवारों की चिंता का विषय बनी हुई है।

    ट्रंप के बयान के बाद विपक्षी नेताओं और समर्थकों ने इसे लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं दी हैं। उनका आरोप है कि सरकार आम लोगों की आर्थिक परेशानियों को गंभीरता से नहीं ले रही है। दूसरी ओर प्रशासन समर्थकों का कहना है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था अभी भी मजबूत स्थिति में है और दीर्घकालिक विकास के संकेत सकारात्मक बने हुए हैं।

    आने वाले महीनों में महंगाई का मुद्दा अमेरिकी राजनीति के केंद्र में रह सकता है। मध्यावधि चुनावों की तैयारियों के बीच आर्थिक प्रदर्शन, रोजगार, ऊर्जा कीमतें और उपभोक्ता खर्च जैसे विषय मतदाताओं के फैसलों को प्रभावित कर सकते हैं। राजनीतिक दल भी इन मुद्दों को चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहे हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि महंगाई पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हो पाया तो यह केवल आर्थिक चुनौती नहीं बल्कि राजनीतिक चुनौती भी बन सकती है। फिलहाल बाजार, निवेशक और आम नागरिक सभी आगामी आर्थिक नीतियों और सरकारी कदमों पर नजर बनाए हुए हैं। अमेरिका की आर्थिक दिशा और राजनीतिक बहस दोनों पर महंगाई का प्रभाव आने वाले समय में और स्पष्ट रूप से दिखाई दे सकता है।

  • भारत से कारोबार समेटने का बड़ा फैसला, अमेरिकी टेक कंपनी के कदम से सैकड़ों कर्मचारियों पर रोजगार संकट

    भारत से कारोबार समेटने का बड़ा फैसला, अमेरिकी टेक कंपनी के कदम से सैकड़ों कर्मचारियों पर रोजगार संकट


    नई दिल्ली ।
    वैश्विक कारोबारी माहौल में तेजी से हो रहे बदलाव और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित तकनीकों के बढ़ते उपयोग के बीच एक प्रमुख अमेरिकी डिजिटल रियल एस्टेट कंपनी ने भारत में अपना संचालन बंद करने का फैसला किया है। कंपनी के इस निर्णय से सैकड़ों कर्मचारियों के रोजगार पर प्रभाव पड़ने की संभावना जताई जा रही है। यह कदम वैश्विक कंपनियों द्वारा अपने परिचालन ढांचे को नए सिरे से व्यवस्थित करने की बढ़ती प्रवृत्ति को भी दर्शाता है।

    कंपनी ने अपने कर्मचारियों को भेजे संदेश में स्पष्ट किया है कि भारत में परिचालन समाप्त करने का निर्णय किसी कर्मचारी के प्रदर्शन से जुड़ा नहीं है। इसके बजाय यह व्यापक कारोबारी पुनर्गठन और संचालन मॉडल में बदलाव की रणनीति का हिस्सा है। कंपनी का मानना है कि उसके अधिकांश ग्राहक अमेरिका में स्थित हैं, इसलिए उनसे जुड़े परिचालन कार्यों को उसी क्षेत्र में संचालित करना अधिक प्रभावी और व्यावहारिक होगा।

    पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक कंपनियों ने लागत नियंत्रण और दक्षता बढ़ाने के लिए विभिन्न देशों में बड़ी परिचालन टीमें तैयार की थीं। हालांकि अब तकनीकी विकास, ऑटोमेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते उपयोग ने कई पारंपरिक प्रक्रियाओं को सरल बना दिया है। इसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में कर्मचारियों की आवश्यकता पहले की तुलना में कम होती जा रही है। यही कारण है कि कई कंपनियां अपने वैश्विक संचालन मॉडल की समीक्षा कर रही हैं और संसाधनों का पुनर्वितरण कर रही हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीकी क्षेत्र में यह बदलाव केवल एक कंपनी तक सीमित नहीं है। दुनिया भर में कई संगठन अपने कार्य संचालन को अधिक केंद्रीकृत और तकनीक आधारित बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इससे एक ओर उत्पादकता और लागत नियंत्रण में मदद मिल रही है, वहीं दूसरी ओर पारंपरिक परिचालन भूमिकाओं में कार्यरत कर्मचारियों के लिए नई चुनौतियां भी सामने आ रही हैं।

    कंपनी ने प्रभावित कर्मचारियों के लिए संक्रमण सहायता उपलब्ध कराने की बात कही है। इसके तहत वित्तीय सहायता, करियर मार्गदर्शन और नई नौकरी तलाशने में सहयोग जैसी व्यवस्थाएं शामिल की जा सकती हैं। कुछ कर्मचारियों को संक्रमण प्रक्रिया पूरी होने तक सीमित अवधि के लिए कार्य जारी रखने का अवसर भी दिया जा सकता है, ताकि संचालन बंद करने की प्रक्रिया व्यवस्थित ढंग से पूरी हो सके।

    रोजगार विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा समय में तकनीकी कौशल, डेटा विश्लेषण, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल संचालन से जुड़ी विशेषज्ञताओं की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में प्रभावित कर्मचारियों के लिए नए अवसरों की संभावनाएं भी मौजूद हैं, बशर्ते वे बदलती तकनीकी जरूरतों के अनुरूप अपने कौशल का विकास करें।

    भारतीय पेशेवरों की वैश्विक स्तर पर मजबूत पहचान को देखते हुए उद्योग जगत का मानना है कि प्रतिभाशाली कर्मचारियों के लिए नए अवसरों की कमी नहीं होगी। हालांकि इस तरह के फैसले यह संकेत जरूर देते हैं कि भविष्य का रोजगार बाजार पारंपरिक कार्यप्रणालियों की तुलना में अधिक तकनीक आधारित और परिणाम केंद्रित होने जा रहा है।

    विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले वर्षों में कंपनियां लागत, दक्षता और तकनीकी नवाचार के संतुलन पर अधिक ध्यान देंगी। ऐसे में वैश्विक कार्यबल को भी लगातार बदलती कारोबारी जरूरतों के अनुरूप स्वयं को तैयार करना होगा। भारत जैसे बड़े प्रतिभा केंद्र के लिए यह बदलाव चुनौती के साथ-साथ नए अवसरों का संकेत भी माना जा रहा है।