Category: International

  • सिंगापुर में जुबिन गर्ग की मौत के मामले में पोत संचालकों पर उठे सवाल, समुद्र में डूबने से गई थी गायक की जान

    सिंगापुर में जुबिन गर्ग की मौत के मामले में पोत संचालकों पर उठे सवाल, समुद्र में डूबने से गई थी गायक की जान


    नई दिल्ली। भारतीय गायक जुबिन गर्ग की डूबने की घटना ने नशे में धुत यात्रियों से निपटने के दौरान पोत संचालकों की जिम्मेदारियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह बात स्ट्रेट्स टाइम्स की रिपोर्ट में वकीलों के हवाले से कही गई है।

    रिपोर्ट में अन्य लोगों के साथ-साथ सिंगापुर की एक ला फर्म, ट्रायंगल लीगल के प्रबंध निदेशक निको ली का भी उल्लेख है, जिन्होंने सिंगापुर समुद्री और बंदरगाह प्राधिकरण (पोर्ट) के नियमों का हवाला दिया है। इसमें नशे में धुत यात्रियों को पोत पर चढ़ने से रोकने के प्रविधान हैं।

    क्या नशे में थे गायक?
    ली के अनुसार, पोत के मालिक, एजेंट या कप्तान को किसी भी ऐसे व्यक्ति को पोत पर चढ़ने की अनुमति नहीं देनी चाहिए, जो शराब या ड्रग्स के प्रभाव में हो और जिसका नशा पोत, चालक दल या किसी अन्य व्यक्ति की सुरक्षा को खतरे में डालता हो।

    स्ट्रेट्स टाइम्स ने ली के हवाले से कहा, ”नागरिक दायित्व के संदर्भ में, यह तर्क दिया जा सकता है कि पोत का कप्तान लापरवाह है, क्योंकि सामान्य लापरवाही के सिद्धांतों के तहत पोत पर सवार मेहमानों के प्रति उसकी प्रथम दृष्ट्या देखभाल की जिम्मेदारी होती है।”

    व्यक्तिगत रूप से स्पष्टीकरण की मांग
    गर्ग के मामले का हवाला देते हुए ली ने कहा कि परिस्थितियां गंभीर थीं, क्योंकि पोत के नियंत्रक को पता था कि यात्री नशे में था। उन्होंने आगे कहा कि गायक ने सभी यात्रियों के लिए दी गई सुरक्षा संबंधी जानकारी को शायद समझा नहीं होगा।

    पोत संचालक किसी चालक दल के सदस्य को सीधे उसकी निगरानी के लिए नियुक्त कर सकते थे या यह सुनिश्चित कर सकते थे कि जब वह समझने में सक्षम हो, तब उसे व्यक्तिगत रूप से स्पष्टीकरण दिया जाए।

  • न्यूक्लियर डील से लेकर सीजफायर बातचीत तक, क्यों माने जाते हैं ईरान के सबसे भरोसेमंद कूटनीतिज्ञ

    न्यूक्लियर डील से लेकर सीजफायर बातचीत तक, क्यों माने जाते हैं ईरान के सबसे भरोसेमंद कूटनीतिज्ञ



    नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव और बातचीत के दौर में एक नाम लगातार सुर्खियों में है अब्बास अराघची। ईरान के विदेश मंत्री अराघची को इस वक्त दोनों देशों के बीच चल रही वार्ताओं का सबसे अहम चेहरा माना जा रहा है। उन्हें एक सख्त लेकिन संतुलित ‘डील मेकर’ के रूप में जाना जाता है, जो जटिल हालात में भी बातचीत को दिशा देने की क्षमता रखते हैं।

    अराघची का कूटनीतिक सफर लंबा और बेहद प्रभावशाली रहा है। उन्होंने 2015 में ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में हुए ऐतिहासिक ईरान परमाणु समझौते (JCPOA) की बातचीत में अहम भूमिका निभाई थी। उस समय संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों और जर्मनी के साथ हुई इस डील में उनका रुख साफ, सख्त और रणनीतिक माना गया था।

    आज के दौर में जब ईरान और अमेरिका के रिश्ते बेहद नाजुक मोड़ पर हैं, अराघची की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है। वे न सिर्फ बातचीत को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, बल्कि ईरान के हितों को मजबूती से सामने भी रख रहे हैं। जानकार मानते हैं कि उनकी रणनीति ही तय करेगी कि यह वार्ता समझौते तक पहुंचेगी या फिर तनाव और बढ़ेगा।

    अराघची की पहचान एक ऐसे कूटनीतिज्ञ के रूप में है जो बैकडोर डिप्लोमेसी और खुले मंच—दोनों जगह समान दक्षता से काम करते हैं। यही वजह है कि उन्हें ईरान की विदेश नीति का ‘क्राइसिस मैनेजर’ भी कहा जाता है

  • Donald Trump vs Iran: बढ़ता टकराव, ‘महायुद्ध’ की धमकी से वैश्विक तनाव चरम पर

    Donald Trump vs Iran: बढ़ता टकराव, ‘महायुद्ध’ की धमकी से वैश्विक तनाव चरम पर


    नई दिल्ली। अमेरिका और Iran के बीच एक बार फिर टकराव तेज हो गया है, जहां हालात खुली जंग की ओर बढ़ते नजर आ रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के ताजा बयानों ने तनाव को और भड़का दिया है, जबकि ईरान ने पलटवार करते हुए ‘महायुद्ध’ की चेतावनी दे दी है। दोनों देशों के बीच यह बयानबाजी ऐसे समय में हो रही है जब क्षेत्र पहले से ही अस्थिर है और वैश्विक समुदाय की नजरें इस टकराव पर टिकी हैं।

    ईरानी सेना ने साफ संकेत दिया है कि अमेरिका और इजरायल किसी भी समय दोबारा हमला शुरू कर सकते हैं। ईरान के सैन्य मुख्यालय के उप-प्रमुख मोहम्मद जाफर असादी ने कहा कि अमेरिका पर भरोसा नहीं किया जा सकता और उसकी नीतियां अस्थिरता पैदा कर रही हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर अमेरिका कोई “नई हिमाकत” करता है, तो ईरान पूरी ताकत से जवाब देगा।

    दूसरी ओर, Donald Trump ने भी सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि ईरान के साथ बातचीत अभी अनिश्चित है और अगर जरूरत पड़ी तो सैन्य कार्रवाई से पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा समझौते के प्रस्ताव उन्हें स्वीकार नहीं हैं और आगे क्या होगा, यह हालात तय करेंगे। ट्रंप ने ईरान के नेतृत्व को “बिखरा हुआ” बताते हुए दावा किया कि वहां अंदरूनी मतभेद गहरे हैं, जिससे बातचीत मुश्किल हो रही है।

    तनाव के बीच एक और बड़ी खबर सामने आई है, जिसमें Islamic Revolutionary Guard Corps के 14 जवानों की मौत हो गई। यह हादसा तेहरान के पास जंजन इलाके में हुआ, जहां युद्ध के दौरान बचे विस्फोटक सामग्री में धमाका हो गया। युद्धविराम के बाद यह सबसे बड़ा नुकसान माना जा रहा है, जिसने हालात की गंभीरता को और बढ़ा दिया है।

    इधर, होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर भी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। अमेरिका लगातार ईरान पर इसे खोलने का दबाव बना रहा है, जबकि ईरान अपने रुख पर कायम है। यह जलमार्ग वैश्विक तेल सप्लाई के लिए बेहद अहम है, ऐसे में यहां किसी भी टकराव का असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

    विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा हालात में दोनों देशों के बीच कूटनीतिक रास्ते बेहद सीमित होते जा रहे हैं। एक तरफ जहां बातचीत की कोशिशें जारी हैं, वहीं दूसरी तरफ सैन्य विकल्प भी खुले हैं, जो किसी बड़े संघर्ष का संकेत दे रहे हैं। अगर तनाव इसी तरह बढ़ता रहा, तो यह टकराव क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक संकट में बदल सकता है।

  • डॉल्फिन से समुद्री जंग? ईरान की ‘सीक्रेट अंडरवॉटर स्ट्रैटेजी’ के दावों से बढ़ी हलचल

    डॉल्फिन से समुद्री जंग? ईरान की ‘सीक्रेट अंडरवॉटर स्ट्रैटेजी’ के दावों से बढ़ी हलचल


    नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बीच एक चौंकाने वाला दावा सामने आया है कि ईरान समुद्र के अंदर बारूदी सुरंगें बिछाने और दुश्मन जहाजों को निशाना बनाने के लिए प्रशिक्षित डॉल्फिन का इस्तेमाल कर सकता है। यह दावा ऐसे समय में किया गया है जब होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री मार्गों में से एक बना हुआ है और यहां किसी भी सैन्य गतिविधि का वैश्विक असर पड़ सकता है।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस कथित रणनीति में डॉल्फिन को विस्फोटकों या माइंस से लैस कर दुश्मन के जहाजों के पास भेजा जा सकता है। हालांकि, इस तरह के दावों की पुष्टि अब तक स्वतंत्र रूप से नहीं हुई है और कई विशेषज्ञ इसे सूचना युद्ध (Information Warfare) का हिस्सा भी मान रहे हैं। सैन्य विश्लेषकों का कहना है कि वास्तविक युद्ध में इस तरह के प्रयोग बेहद जटिल और जोखिम भरे होते हैं।

    इतिहास बताता है कि समुद्री जीवों का सैन्य उपयोग पूरी तरह नया नहीं है। संयुक्त राज्य अमेरिका और पूर्व सोवियत संघ जैसे देशों ने अतीत में डॉल्फिन और सी-लायन को माइन डिटेक्शन और अंडरवॉटर मिशन के लिए ट्रेन किया था। कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान ने भी साल 2000 के आसपास ऐसे प्रशिक्षित समुद्री जीव हासिल किए थे, लेकिन वर्तमान में उनकी वास्तविक क्षमता और तैनाती को लेकर कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं है।

    दूसरी ओर, होर्मुज जलडमरूमध्य में खतरे का बड़ा कारण अभी भी पानी के ऊपर होने वाले हमले और जहाजों की सुरक्षा है, न कि समुद्र के नीचे बिछाई गई माइंस। अमेरिकी अधिकारियों के बयान भी इस मुद्दे पर एक जैसे नहीं हैं कुछ इसे बड़ा खतरा मानते हैं, तो कुछ इसे सीमित जोखिम बताते हैं। हालांकि डोनाल्ड ट्रंप पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि अगर ईरान किसी भी तरह की माइन बिछाने की कोशिश करता है, तो उसे तुरंत नष्ट कर दिया जाएगा।

    रणनीतिक रूप से देखा जाए तो होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक तेल सप्लाई का अहम रास्ता है, और यहां किसी भी तरह का अवरोध या संघर्ष पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर असर डाल सकता है। ऐसे में डॉल्फिन जैसे असामान्य हथियारों की चर्चा भले ही सुर्खियां बना रही हो, लेकिन असली चिंता अब भी पारंपरिक सैन्य टकराव और समुद्री सुरक्षा को लेकर ही है।

  • ताइवान के पास अमेरिका-फिलीपींस की बड़ी चाल: NMESIS एंटी-शिप मिसाइल की तैनाती से चीन की बढ़ी बेचैनी

    ताइवान के पास अमेरिका-फिलीपींस की बड़ी चाल: NMESIS एंटी-शिप मिसाइल की तैनाती से चीन की बढ़ी बेचैनी


    नई दिल्ली ।अमेरिका और फिलीपींस ने ताइवान के बेहद करीब बटानेस प्रांत में अपने वार्षिक Balikatan सैन्य अभ्यास के दौरान NMESIS एंटी-शिप मिसाइल सिस्टम तैनात किया है। यह प्रांत फिलीपींस का सबसे उत्तरी इलाका है और ताइवान से लगभग 100 मील दक्षिण में स्थित है, इसलिए इस तैनाती को चीन के लिए एक स्पष्ट रणनीतिक संदेश माना जा रहा है।

    NMESIS यानी Navy Marine Expeditionary Ship Interdiction System एक भूमि-आधारित, रिमोट-ऑपरेटेड मिसाइल सिस्टम है, जिसे दुश्मन के युद्धपोतों को निशाना बनाने के लिए डिजाइन किया गया है। Reuters के मुताबिक इसे C-130 विमान से बटानेस पहुंचाया गया और बेस्को इलाके में रखा गया, लेकिन यह सिर्फ प्रदर्शन और व्यवहार्यता जांच के लिए था, लाइव-फायर हमले के लिए नहीं। इसकी मारक क्षमता लगभग 185 किलोमीटर बताई गई है।

    अमेरिकी स्टाफ सार्जेंट डैरेन गिब्स के अनुसार, बटानेस जैसा इलाका सिस्टम को वास्तविक परिस्थितियों में परखने का मौका देता है, क्योंकि यहां प्रशिक्षण रोजमर्रा के माहौल से अलग है। उन्होंने यह भी कहा कि NMESIS को इस तरह बनाया गया है कि इसे दूर से संचालित किया जा सके, यानी इसके लिए वाहन के अंदर ड्राइवर या यात्री की जरूरत नहीं पड़ती।

    इस साल के Balikatan अभ्यास अब तक के सबसे बड़े अभ्यासों में से एक हैं। Reuters के मुताबिक इनमें 17,000 से ज्यादा सैनिक शामिल हैं, जिनमें करीब 10,000 अमेरिकी सैनिक हैं। अभ्यास 20 अप्रैल से 8 मई तक चल रहे हैं और इनमें समुद्री हमले, वायु-रक्षा और बहुराष्ट्रीय समन्वय की वास्तविक परिस्थितियों जैसी ट्रेनिंग पर जोर दिया जा रहा है।

    फिलीपींस के अधिकारियों का कहना है कि ऐसे अभ्यास दूरदराज के इलाकों में हथियारों की तैनाती और संचालन की व्यवहार्यता जांचने के लिए भी जरूरी हैं। बटानेस में NMESIS की तैनाती को इसी व्यापक तैयारी का हिस्सा बताया गया है।

    चीन ने इन अभ्यासों और अमेरिकी हथियारों की उपस्थिति पर बार-बार आपत्ति जताई है। Reuters के मुताबिक बीजिंग इसे क्षेत्रीय तनाव बढ़ाने वाला कदम मानता है, जबकि अमेरिका और फिलीपींस का कहना है कि ये अभ्यास किसी एक देश को निशाना बनाकर नहीं किए जा रहे।

    कुल मिलाकर, बटानेस में NMESIS की तैनाती सिर्फ एक सैन्य अभ्यास नहीं, बल्कि दक्षिण चीन सागर और ताइवान जलडमरूमध्य के बीच बदलते शक्ति-संतुलन का संकेत है। समुद्री युद्ध की रणनीति में अब छोटे द्वीप, रिमोट मिसाइल सिस्टम और तेज तैनाती वाले हथियार बेहद अहम हो चुके हैं।
     

  • रूस के दिल में यूक्रेन का बड़ा वार: 1700 किमी अंदर घुसकर Su-57 ठिकाने पर ड्रोन अटैक

    रूस के दिल में यूक्रेन का बड़ा वार: 1700 किमी अंदर घुसकर Su-57 ठिकाने पर ड्रोन अटैक


    नई दिल्ली। यूक्रेन और रूस के बीच जारी युद्ध में एक बार फिर बड़ा मोड़ आया है। यूक्रेन ने दावा किया है कि उसने रूस के भीतर करीब 1700 किलोमीटर तक घुसकर एक बड़ा ड्रोन हमला किया, जिसमें आधुनिक स्टील्थ फाइटर जेट Sukhoi Su-57 के ठिकानों को निशाना बनाया गया। अगर यह दावा सही साबित होता है, तो यह अब तक का सबसे गहरा और रणनीतिक हमला माना जाएगा, जिसने सीधे तौर पर व्लादिमीर पुतिन को झटका दिया है।

    यूक्रेन के मुताबिक, यह हमला चेल्याबिंस्क क्षेत्र के शागोल एयरबेस पर किया गया, जहां Sukhoi Su-34 जैसे बमवर्षक विमान भी तैनात थे। ड्रोन हमले के बाद इलाके में धमाकों की आवाजें सुनी गईं और सैन्य ठिकानों के पास मौजूद ट्रेनिंग सुविधाओं को नुकसान पहुंचने की खबरें सामने आई हैं। स्थानीय स्तर पर यह भी कहा गया कि एक अहम एविएशन ट्रेनिंग स्कूल के हैंगर प्रभावित हुए हैं।

    हालांकि, रूस की ओर से इस दावे को पूरी तरह खारिज किया गया है। चेल्याबिंस्क के गवर्नर एलेक्सी टेक्सलर ने कहा कि यह केवल एक “नाकाम ड्रोन हमला” था, जिसे समय रहते रोक दिया गया और किसी तरह का बड़ा नुकसान नहीं हुआ। मॉस्को की चुप्पी और यूक्रेन के दावे—दोनों के बीच सच्चाई अब भी साफ नहीं हो पाई है।

    इस हमले ने एक बार फिर यूक्रेन की बदलती युद्ध रणनीति को उजागर किया है। कीव अब सिर्फ फ्रंटलाइन पर ही नहीं, बल्कि रूस के अंदर गहराई तक जाकर हाई-वैल्यू टारगेट्स को निशाना बना रहा है। इससे पहले भी यूक्रेन ने “स्पाइडर वेब” जैसे ऑपरेशन के जरिए रूसी एयरबेस और बमवर्षक विमानों को भारी नुकसान पहुंचाने का दावा किया था, जिसकी निगरानी खुद वोलोदिमिर जेलेंस्की कर रहे थे।

    सैटेलाइट तस्वीरों और सोशल मीडिया रिपोर्ट्स ने पहले भी ऐसे हमलों की पुष्टि की झलक दी है, जहां रूसी एयरबेस पर जले हुए निशान और तबाह ढांचे दिखाई दिए थे। अब इस नए हमले ने यह साफ कर दिया है कि ड्रोन युद्ध इस संघर्ष का सबसे निर्णायक हथियार बनता जा रहा है।

    कुल मिलाकर, रूस के अंदर इतनी गहराई में किया गया यह हमला सिर्फ सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक दबाव भी है—जो यह दिखाता है कि युद्ध अब सीमाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दुश्मन के “दिल” तक पहुंच चुका है।

  • लिपुलेख पर फिर गरमाया विवाद: भारत-चीन ने कैलाश यात्रा शुरू की, बालेन शाह सरकार के सामने कूटनीतिक परीक्षा

    लिपुलेख पर फिर गरमाया विवाद: भारत-चीन ने कैलाश यात्रा शुरू की, बालेन शाह सरकार के सामने कूटनीतिक परीक्षा


    नई दिल्ली। लिपुलेख दर्रा एक बार फिर दक्षिण एशिया की कूटनीति का सबसे संवेदनशील मुद्दा बन गया है। भारत के विदेश मंत्रालय ने 30 अप्रैल 2026 को घोषणा की कि कैलाश मानसरोवर यात्रा इस साल जून से अगस्त के बीच होगी, जिसमें कुल 1,000 तीर्थयात्रियों को 20 बैचों में भेजा जाएगा 10 बैच उत्तराखंड के लिपुलेख पास से और 10 बैच सिक्किम के नाथू ला मार्ग से। यह आयोजन भारत सरकार और चीन सरकार के समन्वय से हो रहा है और ऑनलाइन आवेदन भी शुरू हो चुके हैं।

    इसी फैसले ने नेपाल में एक नई राजनीतिक हलचल पैदा कर दी है। काठमांडू लंबे समय से लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी को अपना हिस्सा बताता रहा है और उसका तर्क 1816 की सुगौली संधि, संविधान संशोधन और आधिकारिक नक्शे पर आधारित है। नेपाल ने अगस्त 2025 में भारत-चीन के लिपुलेख मार्ग खोलने के फैसले पर औपचारिक विरोध दर्ज कराया था, और तब भी कहा था कि यह क्षेत्र “नेपाल का अविभाज्य हिस्सा” है।

    भारत ने नेपाल की आपत्ति को पहले भी खारिज किया है। नई दिल्ली का कहना है कि लिपुलेख मार्ग से सीमा व्यापार 1954 से जारी रहा है और हालिया व्यवस्था उसी पुरानी परंपरा की बहाली है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने नेपाल के दावों को ऐतिहासिक रूप से अस्थिर और अवरोध पर आधारित नहीं बताया था, साथ ही सीमाई मुद्दों पर नेपाल के साथ रचनात्मक बातचीत की बात भी कही थी।

    अब इस विवाद का राजनीतिक असर काठमांडू में और तेज महसूस हो रहा है। एक चर्चित रिर्पोट के मुताबिक, हरपाल की नई सरकार, जिसकी कमान रैपर-राजनेता बालेन शाह के हाथ में है, पहले ही भ्रष्टाचार और प्रशासनिक सुधार जैसे मुद्दों पर सक्रिय है। ऐसे में लिपुलेख का मामला उसके लिए कूटनीतिक परीक्षा बन गया है एक ऐसा मुद्दा जिसे घरेलू राष्ट्रवाद, चीन-भारत संबंधों और सीमा संप्रभुता, तीनों के चश्मे से देखा जा रहा है।

    दरअसल, लिपुलेख सिर्फ एक पहाड़ी दर्रा नहीं, बल्कि हिमालयी भू-राजनीति का चौराहा है। यह भारत, नेपाल और चीन के त्रिकोणीय संवेदनशील क्षेत्र में आता है, और इसके जरिए होने वाला रास्ता धार्मिक यात्रा, व्यापार और सामरिक पहुंच तीनों दृष्टि से अहम है। यही वजह है कि यहां सड़क, तीर्थयात्रा और सीमा व्यापार, हर कदम पर राजनीतिक अर्थ ले लेते हैं।

    कुल मिलाकर, लिपुलेख विवाद अब सिर्फ नक्शे का विवाद नहीं रहा। भारत-चीन के बीच यात्रा और व्यापार की बहाली, नेपाल की संप्रभुता संबंधी आपत्तियां और बालेन शाह-नेतृत्व वाली सरकार की प्रतिक्रिया इन सबने इस दर्रे को फिर से दक्षिण एशिया के सबसे गर्म जियो-पॉलिटिकल मोर्चों में बदल दिया है।

  • समुद्र में ताकत का बड़ा दांव: तुर्की ने 60,000 टन के MUGEM एयरक्राफ्ट कैरियर की रफ्तार बढ़ाई

    समुद्र में ताकत का बड़ा दांव: तुर्की ने 60,000 टन के MUGEM एयरक्राफ्ट कैरियर की रफ्तार बढ़ाई


    नई दिल्ली। मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव और बदलते सामरिक समीकरणों के बीच तुर्की ने अपनी नौसैनिक ताकत को नई दिशा देने का बड़ा फैसला लिया है। राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगन के नेतृत्व में देश 60,000 टन वजनी ‘MUGEM’ एयरक्राफ्ट कैरियर प्रोजेक्ट को तेज़ी से आगे बढ़ा रहा है। अब इस विशाल युद्धपोत को 2028 के बजाय 2027 तक तैयार करने का लक्ष्य तय किया गया है, जो तुर्की की बढ़ती सैन्य महत्वाकांक्षा का साफ संकेत है।

    करीब 285 मीटर लंबा यह एयरक्राफ्ट कैरियर क्षमता और आकार के लिहाज से यूरोप के प्रमुख युद्धपोत Charles de Gaulle को भी चुनौती देता नजर आएगा। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस पर करीब 60 लड़ाकू विमान और अत्याधुनिक ड्रोन तैनात किए जा सकेंगे। ‘शॉर्ट टेक-ऑफ’ सिस्टम से लैस यह कैरियर समुद्र में चलते-फिरते एयरबेस की तरह काम करेगा।

    दरअसल, इजरायल के साथ बढ़ती तल्खी और ग्रीस-साइप्रस गठजोड़ के मजबूत होने से तुर्की खुद को पूर्वी भूमध्य सागर में दबाव में महसूस कर रहा है। इसी कारण अंकारा अब अपनी नौसैनिक क्षमता को तेजी से अपग्रेड कर रहा है। हालात ऐसे हैं कि नेफ्ताली बेनेट जैसे नेता तुर्की को “नया ईरान” तक बता चुके हैं, जिससे क्षेत्रीय तनाव और गहरा गया है।

    MUGEM प्रोजेक्ट की सबसे खास बात इसकी भविष्य-केंद्रित तकनीक है। तुर्की इस पर स्टील्थ ड्रोन Bayraktar Kizilelma, नेवल ड्रोन Bayraktar TB3, हल्के लड़ाकू विमान Hurjet और पांचवीं पीढ़ी के फाइटर KAAN के नौसैनिक वर्जन को तैनात करने की तैयारी कर रहा है। यानी यह कैरियर पारंपरिक युद्धपोत से आगे बढ़कर ‘ड्रोन और एआई आधारित युद्ध’ का प्लेटफॉर्म बनने जा रहा है।

    तुर्की की रणनीति सिर्फ भूमध्य सागर तक सीमित नहीं है। Horn of Africa, खासकर सोमालिया और सूडान में बढ़ती सक्रियता के बीच यह कैरियर उसकी वैश्विक सैन्य पहुंच को मजबूत करेगा। ऊर्जा संसाधनों की सुरक्षा, समुद्री मार्गों पर पकड़ और तेजी से सैन्य तैनाती इन सभी में यह जहाज अहम भूमिका निभाएगा।

    कुल मिलाकर, MUGEM सिर्फ एक एयरक्राफ्ट कैरियर नहीं बल्कि तुर्की की ‘ग्लोबल पावर’ बनने की रणनीति का प्रतीक है जहां समुद्री ताकत, स्टील्थ तकनीक और ड्रोन युद्ध मिलकर आने वाले समय की जंग का नया नक्शा तैयार कर रहे हैं।

  • जर्मनी से 5000 अमेरिकी सैनिकों की वापसी: बयानबाजी से बढ़ा तनाव, NATO पर मंडराया खतरा

    जर्मनी से 5000 अमेरिकी सैनिकों की वापसी: बयानबाजी से बढ़ा तनाव, NATO पर मंडराया खतरा


    नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और जर्मन चांसलर Friedrich Merz के बीच बढ़ते जुबानी टकराव के बीच अमेरिका ने जर्मनी से करीब 5,000 सैनिकों को वापस बुलाने का बड़ा फैसला लिया है। अमेरिकी रक्षा विभाग के अनुसार यह प्रक्रिया अगले 6 से 12 महीनों में पूरी की जाएगी। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब ईरान मुद्दे पर अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच मतभेद लगातार गहराते जा रहे हैं।

    तनाव की शुरुआत उस वक्त हुई जब मर्ज ने एक कार्यक्रम में अमेरिका की रणनीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि वॉशिंगटन के पास स्पष्ट योजना नहीं है और ईरान के साथ उसकी कोशिशें बेअसर साबित हो रही हैं। इस बयान से नाराज ट्रंप ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए जर्मन नेतृत्व की आलोचना की और कहा कि उन्हें वैश्विक सुरक्षा की वास्तविक समझ नहीं है।

    दरअसल, जर्मनी में अमेरिकी सेना की मौजूदगी लंबे समय से यूरोप में NATO की सुरक्षा रणनीति का अहम हिस्सा रही है। वर्तमान में जर्मनी में 36,000 से ज्यादा अमेरिकी सैनिक तैनात हैं, जो यूरोप में अमेरिका की सबसे बड़ी सैन्य मौजूदगी में से एक है। यहां के प्रमुख सैन्य ठिकाने जैसे Ramstein Air Base और स्टुटगार्ट स्थित कमांड सेंटर पूरे यूरोप, अफ्रीका और मध्य पूर्व में अमेरिकी अभियानों के लिए ‘लॉन्चिंग पैड’ का काम करते हैं।

    हालांकि, ट्रंप पहले भी जर्मनी से सैनिक हटाने की कोशिश कर चुके हैं। उन्होंने NATO के 2% रक्षा खर्च लक्ष्य को लेकर जर्मनी की आलोचना की थी और 12,000 सैनिकों की वापसी का प्रस्ताव रखा था, जिसे बाद में Joe Biden प्रशासन ने रोक दिया था। अब एक बार फिर सैनिकों की वापसी का फैसला सामने आने से यूरोप-अमेरिका संबंधों में खटास बढ़ती दिख रही है।

    इस फैसले के पीछे एक बड़ी रणनीति भी मानी जा रही है। ट्रंप प्रशासन यूरोप से सैन्य फोकस हटाकर एशिया-प्रशांत क्षेत्र की ओर बढ़ाना चाहता है, ताकि China के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला किया जा सके।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह फैसला लागू होता है, तो इससे NATO की एकजुटता कमजोर हो सकती है और यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था पर असर पड़ सकता है। साथ ही, यह संदेश भी जा सकता है कि अमेरिका अब अपने पारंपरिक सहयोगियों के प्रति पहले जितना प्रतिबद्ध नहीं है।

    कुल मिलाकर, जर्मनी से सैनिकों की संभावित वापसी सिर्फ एक सैन्य निर्णय नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक राजनीति और शक्ति संतुलन का संकेत है, जिसका असर आने वाले समय में यूरोप और दुनिया की सुरक्षा व्यवस्था पर साफ दिखाई दे सकता है।

  • एवरेस्ट पर हाई-टेक टकराव: अमेरिका के ड्रोन टेस्ट पर रोक, नेपाल ने चीन को पहले दी थी अनुमति; ट्रंप के दूत भी रहे मौजूद

    एवरेस्ट पर हाई-टेक टकराव: अमेरिका के ड्रोन टेस्ट पर रोक, नेपाल ने चीन को पहले दी थी अनुमति; ट्रंप के दूत भी रहे मौजूद


    नई दिल्ली। नेपाल के एवरेस्ट बेस कैंप पर अमेरिका द्वारा किए जा रहे हाई-एल्टीट्यूड ड्रोन टेस्ट को स्थानीय प्रशासन ने अनुमति न होने के कारण रोक दिया, जिससे हिमालय क्षेत्र में तकनीक और भू-राजनीति को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। यह मामला उस समय और संवेदनशील हो गया जब कार्यक्रम में अमेरिका के विशेष दूत सर्जियो गोर की मौजूदगी भी रही।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिकी कंपनी “Freefly Systems” के भारी-भरकम इंडस्ट्रियल ड्रोन का प्रदर्शन एवरेस्ट बेस कैंप (करीब 5,364 मीटर ऊंचाई) पर किया गया, लेकिन इसे औपचारिक उड़ान परीक्षण की मंजूरी नहीं मिली थी। नेपाली अधिकारियों ने साफ किया कि केवल डेमो हुआ था, जबकि वास्तविक फ्लाइट टेस्ट रोक दिया गया।

    इस ड्रोन की समुद्र तल पर पेलोड क्षमता लगभग 15.88 किलोग्राम बताई जाती है, लेकिन इतनी ऊंचाई और कम ऑक्सीजन वाले वातावरण में इसकी वास्तविक क्षमता अभी भी परीक्षण के दायरे में ही है। अधिकारियों का कहना है कि एवरेस्ट जैसी कठिन परिस्थितियों में ड्रोन का प्रदर्शन तभी समझा जा सकता है जब इसे पूर्ण अनुमति के साथ उड़ाया जाए।

    नेपाल प्रशासन ने इस टेस्ट को लेकर सुरक्षा और डेटा कलेक्शन से जुड़ी चिंताएं भी जताई हैं, क्योंकि एवरेस्ट क्षेत्र नेपाल और चीन की सीमा पर स्थित एक संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र है। इसी वजह से सरकार ने किसी भी कमर्शियल या तकनीकी उड़ान से पहले विस्तृत अध्ययन की जरूरत बताई है।

    दिलचस्प बात यह है कि पिछले वर्ष नेपाल ने चीन की कंपनी DJI को इसी क्षेत्र में ड्रोन ऑपरेशन की अनुमति दी थी, जहां सफल हाई-एल्टीट्यूड डिलीवरी टेस्ट भी किया गया था। उस दौरान ड्रोन ने बेहद कठिन मौसम और ऊंचाई में 15 किलोग्राम तक सामान पहुंचाया था।

    अब अमेरिका और चीन दोनों की बढ़ती सक्रियता ने हिमालय क्षेत्र को हाई-टेक टेस्टिंग और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के नए केंद्र के रूप में उभार दिया है, जहां तकनीक के साथ-साथ भू-राजनीतिक संतुलन भी लगातार चुनौती बनता जा रहा है।